अंधी यह सरकार बहुत है (कविता)

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अंधी यह सरकार बहुत है
यह जनता लाचार बहुत है

कहाँ माँगते एसी कमरे चाहे मोटरकारें
फिर भी गोली चलवाती हैं ये अंधी सरकारें
दो रोटी ही मिल जाए बस
इतना ही आधार बहुत है 

करते दौलत की खातिर जो हरदिन मारामारी
हमसे ये सब क्या बोलेंगे मुल्ले और पुजारी
मस्जिद में दीनार बहुत है
मंदिर में व्यभिचार बहुत है

दास बनाया जिसने तुमको खुद को तुलसीदास कहा
छल-प्रपंच से भरा हुआ यह भारत का इतिहास रहा
तुम ताड़न के अधिकारी हो
उसकी जय जयकार बहुत है 

दस करोड़ का तोहफा अगर मित्तल बुलाए घर
रईसों, मंत्रियों के साथ यह सत्ता का आडंबर
चावल, मिट्टी-तेल तनिक-सा
हमपर यह उपकार बहुत है?
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नन्दी की पीठ का कूबड़ (बाल कहानी)- दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी

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नन्दी की पीठ का कूबड़

दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी
हिन्दी अनुवाद: अरविन्द गुप्ता
(प्रोफेसर कोसम्बी द्वारा रचित बच्चों के लिए शायद यह एक मात्र कहानी है। यह कहानी उन्होंने अपने सहयोगी दिव्यभानुसिंह चावडा को, 1966 में, अपनी असामयिक मृत्यु से कुछ दिन पहले ही भेजी थी। यह कहानी किसी भी भाषा में पहली बार प्रकाशित हो रही है।)
(गाँव के वार्षिक मेले का अवसर है। उसमें जानवरों की खरीद-फरोख्त का अच्छा कारोबार होगा। गाँव के मुखिया का बेटा राम, सुबह-सुबह अपने नन्दी बैल को चराने ले जाता है। शाम को नन्दी जानवरों की जलूस की अगुवाई करेगा। जंगल के एक छोर पर तालाब है। धीरे-धीरे वहाँ बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे राम के बहुत से मित्र इकट्ठे हो जाते हैं। वे सभी एक सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करते हैं – भारतीय बैलों के पीठ पर कूबड़ क्यों होता है?)

रामः नन्दी! यह बताओ कि बैलों की पीठ पर ही कूबड़ क्यों होता है? जरा भैंस को देखो। और उधर घोड़े को देखो। उनकी पीठ तो एकदम चपटी है।
तभी राम का कुत्ता मोती दौड़ता और हाँफता हुआ आया। मोती ने कहा, ‘भौं, भौं! क्या तुम्हें पता है – जब मैं बिल्ली को पकड़ने दौड़ता हूँ तो वो अपनी पीठ मेहराब जैसे ऊपर उठाती है। नन्दी की पीठ के साथ भी शायद यही हुआ होगा। उसे किसी ने डराया होगा।उसके बाद मोती और नन्दी पानी पीने चले गए।
टर! टर! टर!मेंढक पानी से कूदते हुए टर्राया। हमारे बहादुर नन्दी को डराना काफी मुश्किल काम है। कुछ दिन पहले शेर ने पूरा दम लगाया फिर भी उसे भगा नहीं पाया। अब सब देखो – मैं कैसे फूलकर कुप्पा होता हूँ। मुझे लगता है कि नन्दी ने मेरी तरह ही अपने कूबड़ में हवा भर ली होगी।
यह सुनकर बूढ़ा नाग, पीपल के पेड़ की जड़ के बिल में से बाहर निकला। हिस! हिस! उसने फुँफकारते हुए कहा, हवा से सिर्फ छाती भरती है, पीठ नहीं। मैंने एक बार मोटा चूहा निगला और फिर मैं पूरे हफ्ते सोता रहा। तब मेरा शरीर भी बीच में फूल गया था। नन्दी ने भी जरूर कोई मोटी चीज निगली होगी।
हा! हा! हा!भालू चीखते हुए जंगल में से बाहर आया। नन्दी हमेशा छोटी-छोटी चीजें ही खाता है। तुम्हें क्या लगता है  उसने एक बड़ा कद्दू निगला है? पिछले साल मैंने मधुमक्खियों के छत्ते से शहद चुराया था। उसके बाद मधुमक्खियों ने मुझे जम कर काटा। उससे मेरा चेहरा एक तरफ बुरी तरह से फूल गया। मुझे लगता है कि हमारे नन्दी को भी किसी ने काटा होगा।
इसी बीच बंदर भी पीपल के पेड़ से कूदता हुआ नीचे आया। खों! खों! खों! देखो इस पेड़ के फल खाने के बाद मेरे नीचे के गाल किस तरह फूल जाते हैं। नन्दी घास चरता है। उसने जरूर उस घास को अपने कूबड़ में उसे छिपाया होगा। छिपी घास को ही वो बाद में धीरे-धीरे करके चबायेगा। देखो वो कैसे घास की जुगाली कर रहा है?’
तुम आखिर एक लालची बंदर की तरह ही बोले,’ राम ने कहा। देखो, नन्दी का कूबड़ हमेशा एक-जैसा ही रहता है। फल खाने के बाद तुम्हारे गाल एकदम पिचक जाते हैं। पर नन्दी का कूबड़ बिल्कुल एक-समान ही रहता है।
नन्दी ने कहा, ‘मुझे लगता था कि जिस प्रकार सभी बैलों के सींग होते हैं वैसे ही सभी बैलों का कूबड़ भी होता होगा। कल मुझे जिला स्तरीय प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार मिला। वहाँ पर यूरोप से लाये कुछ बैल भी थे। मुझे वो बैल कुछ अजीब लगे! उनके न तो सींग थे और उनकी पीठ भी एकदम चपटी, सपाट थी। यूरोप के बैल एक-दूसरे से फुसफुसाकर कह रहे थे, ‘जरा देखो उस कुबड़े बैल को, जिसे पहला ईनाम मिला है! मुझे इस सबके पीछे मनुष्य की ही कारिस्तानी नजर आती है। पीठ में कूबड़ के कारण बैल पर हल का जुआ अच्छी तरह बैठता है। कूबड़ के कारण ही मैं हल और बैलगाड़ी को बेहतर तरीके से खींच पाता हूँ। यूरोप के बैलों ने मुझे बताया – उनके देशों में जुताई के लिए पहले घोड़ों का उपयोग होता था। अब खेतों की जुताई मशीनों द्वारा की जाती है।
राम ने इससे असहमति जतायीः इस पुस्तक के अनुसार भगवान शिव नन्दी की सवारी करते हैं। भगवान ने नन्दी की पीठ पर कूबड़ इस लिए बनाया जिससे वो उसपर झुककर कुछ आराम कर सकें। देखो, इस चित्र में भगवान कितनी आसानी से नन्दी पर सवारी कर रहे हैं। हमारे गाँव का कुलदेवता तो स्वयं यह पीपल का पेड़ है। चलो, अब पीपल के पेड़ से ही नन्दी के कूबड़ का कारण पूछते हैं।
बूढ़े पीपल के पेड़ ने उत्तर दियाः नन्दी ने सही ही कहा। मनुष्य ने बैलों को अपने लिए बनाया है। इंसानों ने ही मोती जैसे कुत्ते बनाए हैं। इंसानों ने ही धान और गेहूँ बनाया है। साथ-साथ, मनुष्य ने खुद को भी बनाया है।
रामः यह कैसे सम्भव है? हमारा नया घर पिछले वर्ष बना था। कई लोगों ने उसे मिलकर बनाया था। उसके लिए पेड़ों को काटा गया। फिर लट्ठों और तख्तों को लम्बाई में काटा गया। इसके लिए कई लोगों को मेहनत करनी पड़ी। उसके बाद पूरे फ्रेम को कीलें ठोक कर जोड़ा गया। मैंने छत पर फूस बिछाने में अपने पिताजी की मदद की। परंतु हमने नन्दी को कैसे बनाया? वो छोटे बछड़े जैसा पैदा हुआ था और तभी से उसके पीठ पर कूबड़ है। दो साल पहले मोती एकदम छोटा पिल्ला था। मैंने बस इतना ही किया। माँ से निगाह बचाकर अपनी थाली में से मोती को कुछ अपना खाना खिलाया। हमने तो मोती को कुत्ता नहीं बनाया। अनाज पैदा करने के लिए हमने खेत में सिर्फ बीज बोए। इससे, बस चार महीने में हमें उसी प्रकार का बहुत सारा और अनाज मिला। हमने तो वो अनाज नहीं बनाया।
पीपल का पेड़ः राम तुम एक बहुत होशियार लड़के हो। यही सीखने का अच्छा तरीका है – बस प्रश्न पूछते रहो। तब तक प्रश्न पूछो जब तक तुम सच की जड़ तक नहीं पहुँचो। अब ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें वही बताने जा रहा हूँ जिसे मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। आज से हजारों साल पहले मनुष्य लगभग उसी तरह रहते थे जैसे आज तुम्हारा मित्र बंदर रहता है। वे भोजन और फलों के लिए पेड़ों पर चढ़ते। वो बेर और कुकुरमुत्ते तोड़ते। वे जमीन के अंदर से कंद खोदकर निकालते। मनुष्य बिल्कुल भालू की तरह ही शहद इकट्ठा करते। वे कभी-कभी भालू की तरह ही अपने पंजों से मछलियों का शिकार करते। वे मांस के लिए अन्य जानवरों का शिकार करते। तब न तो आग थी, न हल और न ही घर और झोपडि़याँ। तब गाँव भी नहीं थे। फिर ग्राम देवता का सवाल ही पैदा नहीं होता है। लोग इधर-उधर से भोजन एकत्र कर अपना जीवन चलाते थे। परंतु अब लोग अपना भोजन उगाते हैं।
रामः पर अगर हम इस प्रकार जी सकते थे तो फिर हमने क्यों भोजन उगाया? देखो मेरे पिता और बड़ा भाई खेतों पर कितनी मेहनत करते हैं। क्या हम इतनी मेहनत किए बिना जिन्दा नहीं रह सकते?’
पीपल का पेड़ः हर समय पर्याप्त मात्रा में भोजन इकट्ठा करना सम्भव नहीं होता है। कभी-कभी सूखा पड़ता है जिससे नदी-नाले सूख जाते हैं। मछलियाँ मर जाती हैं। शिकारी जानवर दूर-दराज चले जाते हैं। फल भी नहीं मिलते हैं। एक बात और है – पूरे साल भर चीजें इकट्ठी करना सम्भव नहीं होता है। इंसान को भोजन इकट्ठा करके उसे संभाल-संजोकर रखना सीखना पड़ा। बारिश के बाद की फसल अक्सर बहुत अच्छी होती है। आप पूरे साल उस फसल का अनाज खा सकते हैं। अगर अधिक उपज होगी तो उससे ज्यादा लोग जीवित रह पायेंगे। मैं अपनी सबसे ऊपर की टहनी से पाँच बड़े गाँवों को देख सकता हूँ। पुराने जमाने में इस पूरे इलाके में मुझे पाँच लोग भी नजर नहीं आते थे।
रामः ठीक है। पर लोगों ने मेरे मोती जैसे कुत्ते क्यों बनाए?’
पीपल का पेड़ः पुराने जमाने में शिकार के समय भेड़िये भी आदमियों की तरह शिकार का पीछा करते थे। यह देख मनुष्यों ने कुछ भेडि़यों के बच्चों को पाला। इनमें से अधिकतर बड़े होकर दुबारा जंगली भेड़िये बने और चले गए। परंतु उनमें से कुछ मनुष्यों के साथ रहने लगे। वे लोगों के लिए शिकार का पीछा करने लगे। इसके बदले में लोग उन्हें बचा हुआ मांस और हड्डियाँ खाने को देते। इस प्रकार जंगली भेड़िये पालतू बने। अब हम उन्हें कुत्ते के नाम से जानते हैं।
रामः मुझे खुशी है कि लोगों ने ऐसा किया। अगर मोती नहीं होता तो मैं भला क्या करता? परंतु नन्दी की पीठ पर कूबड़ किस तरह आया? शायद वो शुरू से ही था। मुझे अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला।
पीपल का पेड़ः मनुष्यों के लिए जंगली हिरणों का लगातार पीछा करना काफी कठिन काम था। गाय-बैल भी जंगली जीव थे। परंतु वो धीमी गति से चलते थे। मनुष्य मांस के लिए उनका पीछा करते। कुछ समय बाद उन्होंने मोती की तरह ही कुछ गाय-बैल के बछड़ों को भी पालतू बनाया। इसके लिए उन्होंने सबसे तगड़े बछड़ों को चुना। उनमें से कुछ की पीठ पर छोटा कूबड़ था। कूबड़ के कारण लोगों को अधिक मांस मिलता था। इसके लिए वो लगातार कूबड़ वाले बछड़ों को चुनते रहे और उन्हें भरपेट खाने को देते रहे। इससे धीरे-धीरे कूबड़ बड़ा होने लगा। मनुष्यों को कूबड़ वाले गाय-बैलों को पालतू बनाना ज्यादा आसान लगा। गायें दूध देतीं। अब धीरे-धीरे लोग शिकार करने की बजाए गाय-बैल पालने लगे। इस तरह धीरे-धीरे नन्दी जैसे, बड़े कूबड़ वाले बैल विकसित हुए।
रामः यह तो बहुत होशियारी की बात है। पर यह अनाज कैसे विकसित हुए?’
पीपल का पेड़ः सदियों पहले मैंने लोगों को भूख मिटाने के लिए पत्ते और घास के बीज खाते हुए देखा था। इसके अलावा खाने को कुछ और नहीं था। धीरे-धीरे उन्होंने सबसे मोटे बीजों को छाँट कर अलग किया। सभी घासें एक-जैसी नहीं होती हैं। लोगों ने पाया कि अच्छी घासें सबसे मुलायम और नर्म मिट्टी में ही अच्छी उगती हैं। मुलायम मिट्टी सभी जगह नहीं मिलती है। परंतु अगर कंद को एक नुकीली छड़ से खोदकर निकाला जाए तो अगले साल उस जगह पर अच्छी घास उगेगी। इसी कारण लोगों ने मोटी घास के बीजों को बोने के लिए जमीन में गड्ढे खोदने शुरू किए। लोग अगली फसल के लिए हमेशा सबसे मोटे बीज ही बोते।
रामः हम अनाज के बीजों को तो इस तरह नहीं बोते हैं। हम हल से खेत जोतते हैं। लोगों ने हल का उपयोग करना कैसे सीखा?’
पीपल का पेड़ः इसे सीखने में उन्हें बहुत समय लगा। पहले उन्होंने नुकीली छड़ से जमीन की सतह को खुरचा। परंतु उससे कोई खास फायदा नहीं हुआ। वैसे, कच्चा अनाज खाने में बहुत अच्छा नहीं होता। इसके लिए इंसान ने आग की जानकारी हासिल की। शुरू में उन्हें जंगल की भीषण आग से डर लगता था। वे आग और जंगली जीवों को देखकर डर से भागते थे। फिर उन्होंने खाना पकाना सीखा। वे आग से मिट्टी के बर्तन पका पाये। जमीन की गहरी जुताई के लिए उन्हें ऐसी चीज की जरूरत थी जो अधिक ताकत से खींच सके। तब उन्होंने हल के टेढ़े फल को खींचने के लिए बैलों का इस्तेमाल करना शुरू किया। हल को खींचने के लिए मनुष्य को बड़े जानवरों की जरूरत थी। इसलिए उन्होंने जानवरों को मांस के लिए मारना बंद किया। इस प्रकार उन्हें नन्दी जैसे बढि़या और ताकतवर बैल मिले।
रामः जरा कल्पना करो मेरे नन्दी को मारने की! कितनी बेवकूफी की बात है। पर अभी आपने मनुष्य द्वारा खुद अपने निर्माण का जिक्र किया था।
पीपल का पेड़ः मैंने अभी तुम्हें बताया कि किस प्रकार मनुष्य को आग ने भयभीत करना बंद किया। शुरू में लोग आग को भगवान के रूप में पूजते थे। धीरे-धीरे इंसानों ने आग बनाना सीखी। इसके लिए उन्होंने दो सूखी लकडि़यों को आपस में रगड़ा। फिर उन्होंने मुझे और नन्दी को पूजना शुरू किया। हमने मनुष्य को भोजन दिया। मेरे फल अभी भी खाने योग्य हैं। परंतु अब लोगों को मेरे छोटे भाई अंजीर के फल ज्यादा स्वादिष्ट लगते हैं। अंजीर आकार में बड़ी और मीठी होती हैं। वैसे अंजीर का पेड़ छोटा और कमजोर होता है। उसे अच्छी मिट्टी की जरूरत होती है। और साथ में ढेर पानी की भी। जंगल की सफाई, कटाई हुई। लेकिन मैं भाग्यवश बच गया। कई बार जंगल में आग लगी और मेरे परिवार के तमाम सदस्य मारे गए। मैं कई बार बाल-बाल बचा। लोग आज भी आग, नन्दी और मेरी पूजा करते हैं। पर अब यह पूजा-उपासना कम हो रही है। हमने मनुष्य को नहीं बनाया। मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ।
रामः फिर किसने बनाया?’
पीपल का पेड़ः वर्तमान मनुष्य को खुद उसने ही बनाया है। शुरू में वो छोटा और बंदर जैसा अच्छा दोस्त था। परंतु वो निस्सहाय था। आग के बाद उसने धातुओं को खोजा। पहले तांबा। फिर लोहा। उससे पहले मनुष्य ने पत्थरों के औजार बनाए। लोगों ने शिकार के लिए तीर-कमान बनाए। उन्होंने भोजन को संचित कर सुरक्षित रखने के लिए टोकरियाँ और चमड़े के थैले बनाए। मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल बनाए। इस प्रकार लोगों को अधिक भोजन मिल पाया। खेती-बाड़ी की कठिन मेहनत ने मनुष्य को बलवान बनाया। लोग अपने सिर पर भारी बोझ ढोने लगे। इस कारण लोग सीधे खड़े होकर चलने लगे। लोगों ने झोपडि़याँ और घर बनाये। वे कपड़े पहनने लगे। पुराने जमाने में कई बड़े-बूढ़े मनुष्य भी मेरी छाँव तले नंगे रहते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम बचपन में नंग-धड़ंग घूमते थे।
रामः गर्मी के दिनों में मुझे अभी भी कपड़े बिल्कुल नहीं सुहाते हैं। परंतु मेरी माँ मुझे नंग-धड़ंग दौड़ने से मना करती हैं। अब मुझे आप एक बात और बतायें। यह भगवान कब आये?’
पीपल का पेड़ः पहले लोगों ने चीजों के उगने के बारे में जाना। उन्होंने उगती चीजों को अपने उपयोग के लिए इकट्ठा किया। इससे लोगों को लगा कि सभी चीजों को कोई महान माता जन्म देती है। हम अभी भी कहते हैं, ‘पृथ्वी हमारी माता है।फिर इंसान ने इकट्ठी की गई चीजों से कहीं ज्यादा चीजें खुद बनाना सीखीं। तब उसने सोचा, ‘मुझे भी किसी ने बनाया होगा?’ तब इंसानों ने भगवान को जन्म दिया। लोगों ने कहा, ‘भगवान ने हर चीज बनायी है।परंतु मुझे असली सच पता है। मैं मनुष्य के सभी भगवानों से अधिक बूढ़ा हूँ। मैंने मनुष्य को स्वयं खुद का निर्माण करते हुए देखा है। उसे अभी इस काम को और आगे बढ़ाना है। वो कभी-कभी मनुष्य जाति के अन्य लोगों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार करता है।
अब शाम ढलने लगी थी। राम की माँ एक टोकरी में लाल फूल लेकर आयीं। उन्होंने टोकरी को तालाब के किनारे रखा। फिर उन्होंने बूढ़े पीपल के पेड़ के सामने झुक कर उसका नमन किया। राम की मित्र मंडली वहाँ से खिसक ली। माँ ने कहा, राम, इधर आओ। जल्दी तैयार हो। आज रात को नन्दी को जलूस में सबसे आगे रहना है। तुम्हें पता है कि नन्दी अन्य गाय-बैलों से पहले पैदा हुआ था। चलो, नन्दी को घर ले चलकर उसे सजायें।

‘अंग्रेजी ग्लोबल है’ (लघुकथा)

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अंग्रेजी ग्लोबल है
वह दुनिया के सबसे ताकतवर देश का प्रमुख था। इतनी जाँच के बाद तो चला था वो, फिर विमान दुर्घटना कैसे हो गयी? सारी अक़ल गुम हो गई। किसी निर्जन इलाके में दस घंटे तक बेहोश पड़ा रहा। यानचालक की लाश बगल में पड़ी है। वह भी बिना पेट के! कोई नहीं बचा। आखिर हवाई जहाज पाँच फुट से गिरा नहीं था, हजारों फुट की बात थी! होश आई तब कुछ देर तक कराहने के बाद उसका ध्यान उस स्थान के चारों ओर गया। यह कौन-सी जगह है? वह तो विश्व स्तरीय सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। आखिर विमान दुर्घटना हुई कैसे? एक… दो… तीन… चार… पाँच मिनट तक वह सोचता रहा। अच्छा, छोड़ो, अब हो गई तो हो गई। फिलहाल प्यास जोरों की लगी है! आस-पास कोई आदमी, कोई घर, कुछ भी नहीं दिखा। ये ग्यारहवाँ घंटा चालू है… प्यास बढ रही है। वह उठता है। यह भी एक संयोग ही है कि उसके शरीर पर खरोंच तक नहीं आई है। हाँ, कोट-टाई इस्तरी किए हुए थे, वे बुरी तरह मुड़-तुड़ गये हैं। … उठकर वह पूरब की तरफ चलना शुरू करता है। प्यास बढती जा रही है। … एक… दो… तीन… साढ़े तीन घंटे तक हाँफते-दौड़ते-भागते चलता गया। बहुत थक गया है वह। आखिर एक जगह ठस से बैठ गया। प्यास जानलेवा होती जा रही है। उसे याद आने लगता है, पिछले विश्व स्तरीय सम्मेलन में उसने जल संरक्षण पर भाषण दिया था, कहा था, जल ही जीवन है। आज वह समझ पा रहा है, जल ही जीवन है। अब शाम होने जा रही है। खेलने के लिए 5-7 बच्चों का झुंड इधर बढ़ता जा रहा है। फिर किशोरों की बारी आती है, 10-12 किशोर भी इधर आ रहे हैं। पलभर की झपकी में वह सपना देखता है, किशोर उसकी ओर बढ़ रहे हैं, उनके हाथों में बाँस का धनुष था, वह अब अंग्रेजी की किताब में बदलता जाता है, वह खुश हो जाता है क्योंकि उसे बताया गया है कि दुनिया में सबको अंग्रेजी सिखाने के लिए सारे हथियार इस्तेमाल किये गये हैं। सब लोग अंग्रेजी जानते हैं। करोड़ों-अरबों डालर के खर्चे का लाभ उसे दिख रहा है, किशोर अंग्रेजी के शब्दकोश लिये हुए उसकी ओर बढ रहे हैं। वह आज ही तो अंग्रेजी को आधिकारिक तौर पर ग्लोबल घोषित करने जा रहा था… कि विमान दुर्घटना हो गई। (क्योंकि उसकी ही घोषणा से आदमी आदमी है, वरना वह कुछ नहीं।) … तभी एक किशोर का बाण उसके बगल में आकर गिरता है। किशोर बाण लेने के लिए दौड़ता है। ज्योंही उसके निकट आता है, अधूरी नींद टूट जाती है। वह तुरंत किशोर का हाथ पकड़ लेता है, उसके मुँह से एक शब्द निकलता है- वॉ ट र। किशोर काला है, वह गोरा है… लेकिन इस वक्त बस वॉ ट र। किशोर नहीं समझता। वह चेहरे पर नहीं समझने के भाव लिए, थोड़ा सशंकित खड़ा है। तीसरी बार वॉ ट र, वॉ ट र, वॉ ट र… वह बोलता जा रहा है, उसकी आवाज़ धीमी होती जा रही है, वॉ… ट… र, वॉ… ट… र, वॉ… ट… र। चुप… मौन… किशोर का हाथ उसके हाथ से छूट जाता है। किशोर दौड़ता है… वापस किशोर आता है, 3-4 प्रौढों के साथ। प्रौढ भी वॉ ट र का मतलब नहीं समझते, किशोर उन्हे बता चुका है कि बेहोश आदमी वॉ ट र, वॉ ट र… जैसा कुछ बोलता जा रहा था। आदमी इतनी जल्दी नहीं मरता। फिर होश में आते ही वॉ ट र… । कोई नहीं समझ सका, भला ये वॉ ट र… क्या कह रहा है यह आदमी? शाम ढलनेवाली है। इसे उठाकर सब ले चलते हैं। इसी बीच टाई फट जाती है। … वॉ ट र, टे …क, ड्रिं… क… , नी… ड… , ग्ला… स… , ब्रिं… ग… … … जाने क्या-क्या बोलता जाता है यह आदमी। कुछ भी समझ नहीं सका कोई। बस्ती में पहुँचने पर गिलास दिखाई पड़ता है, वह दौड़ता है… गिलास खाली है… किशोर समझ जाता है, उसे पानी चाहिए… वह तुरंत पानी लाकर देता है। पानी पीते ही उस आदमी की अकल वापस आ जाती है, उसे समझ आ चुका है, यहाँ कोई अंग्रेजी नहीं समझता। … जैसे भी हो, यहाँ से वह भागना चाहता है! उसके मुँह से निकलता है, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल, थर्स्ट इज़ ग्लोबल, हंगर इज़ ग्लोबल, इमोशन्स आर ग्लोबल, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल(अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है, प्यास ग्लोबल है, भूख ग्लोबल है, आदमी की भावनाएँ ग्लोबल हैं, अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है)।

… … वह सपना देख रहा है। विश्व सम्मेलन शुरू है। बड़े-बड़े अक्षरों में आज अंग्रेजी को आधिकारिक तौर पर ग्लोबल घोषित करने की बात लिखी है। वह भाषण देता है और पहला वाक्य कहता है, अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल… … सिर्फ दो घूँट पानी ने हमें सिखा दिया कि कोई भाषा ग्लोबल नहीं, संकेत ग्लोबल हो सकते हैं, मानवता ग्लोबल हो सकती है, अंग्रेजी की बदौलत जब दो घूँट पानी नहीं मिल सकता तब इसे क्या कहें ?  इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल… … 

क्यों – कमला बक़ाया (कविता)

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यह बच्चों के लिए रची गई एक साधारण-सी कविता है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह एक असाधारण कविता है। कमला बक़ाया की यह कविता इस देश और दुनिया के हर बच्चे तक पहुँचाई जानी चाहिए, ऐसा हमें लगता है। यहाँ प्रस्तुत है-

क्यों – कमला बक़ाया
कहानी बहुत पुरानी है,
पर अब तक याद ज़ुबानी है।
इक छोटा-सा घर कच्चा था,
उसमें माँ थी, इक बच्चा था।
बिन बाप मड़ैया सूनी थी,
माँ पर मेहनत दूनी थी।
यह बच्चा बड़ा हुआ ज्यों-ज्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”


है बाप नहीं मेरा -पर क्यों?
दिन-रात अंधेरा है घर क्यों?
इतनी है हमें ग़रीबी क्यों?
और साथ में मोटी बीबी क्यों?
बहुतेरा माँ समझाती थी,
हर तरह उसे फुसलाती थी,

पर बच्चा हठ्ठी बच्चा था,
और आन का अपनी सच्चा था।

यह आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

माँ ने कुछ काम सँभाला था,
रो-धोकर उसको पाला था।

फिर वह भी उसको छोड़ गई,
दुनिया से नाता तोड़ गई।
बच्चे को अब घर-बार नहीं,
माँ की ममता और प्यार नहीं।
बस रैन-बसेरा सड़कों पे,
और साँझ-सबेरा सड़कों पे।
वह हर दम पूछा करता, “क्यों?”
दुनिया में कोई मरता क्यों?
यूँ फंदे कसे ग़रीबी के,
घर पहुँचा मोटी बीबी के।
घर क्या था बड़ी हवेली थी,
पर बीबी यहाँ अकेली थी।
गो नौकर भी बहुतेरे थे,
घर इनके अलग अंधेरे थे।
बच्चे को बान पुरानी थी,
कुछ बचपन था, नादानी थी।
पूछा- यह बड़ी हवेली क्यों?
बीबी यहाँ अकेली क्यों?

नौकर-चाकर सब हँसते थे,
कुछ तीखे फ़िक़रे कसते थे।

भोले बच्चे! पगलाया क्यों?
हर बात पे करने आया, “क्यों?”
दिन-रात यहाँ हम मरते हैं,
सब काम हम ही तो करते हैं।

रूखा-सूखा जो पाते हैं,
वह खाते, शुकर मनाते हैं।
क़िस्मत में अपनी सैर नहीं,
छुट्टी माँगो तो ख़ैर नहीं।
चलती है कहाँ फ़क़ीरों की?
है दुनिया यहाँ अमीरों की।
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा था नौकर बीबी का,
फिर देखा मज़ा ग़रीबी का।
दिन भर आवाज़ें पड़ती थीं,
हो देर तो बीबी लड़ती थी।
बावर्ची गाली देता था,
कुछ बदले माली लेता था।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

नित पकते हलुवे-मांदे क्यों?
हम रगड़ें जूठे भांडे क्यों?
बीबी है चुपड़ी खाती क्यों?
सूखी हमें चपाती क्यों?

यह बात जो बीबी सुन पाई,
बच्चे की शामत ले आई।
क्यों हरदम पूछा करता, “क्यों?”
हर बात पे आगे धरता, “क्यों?”
यह माया है शुभ कर्मों की,
मेरे ही दान औधर्मों की।
सब पिछला लेना-देना है,
कहीं हलवा कहीं चबेना है।
माँ-बाप को तूने खाया क्यों?
भिखमंगा बनकर आया क्यों?

मुँह छोटा करता बात बड़ी,
सुनती हूँ मैं दिन-रात खड़ी।
इस “क्यों” में आग लगा दूँगी,
फिर पूछा, मार भगा दूँगी।
बच्चा यह सुन चकराया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
माँ-बाप को मैंने खाया क्यों?
भिखमंगा मुझे बनाया क्यों?
फिर बोला! पाजी, हत्यारा!
कह बीबी ने थप्पड़ मारा।
बच्चा रोया, ललकारा- क्यों?
तुमने हमको मारा क्यों?
दिल बात ने इतना तोड़ दिया,
बच्चे ने वह घर छोड़ दिया।
वह फिरा किया मारा-मारा
लावारिस, बेघर, बेचारा।
न खाने का, न पानी का,
यह बदला था नादानी का।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”
इक ग्वाला दूध लिए जाता,
भर गागर मुँह तक छलकाता।
बच्चे का मन जो ललचाया,
भूखा था, पास चला आया।
यह दूध कहाँ ले जाते हो?
इतना सब किसे पिलाते हो?

थोड़ा हमको दे जाओ ना!

लो दाम निकालो, आओ ना।
पैसे तो मेरे पास नहीं।
तो दूध की रखो आस नहीं।
जो बच्चा पैसा लाएगा,
वह दूध-दही सब खाएगा।

यह सुन वह सटपटाया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
दुनिया सब दूध उड़ाए क्यों?
भूखा ग़रीब मर जाए क्यों?

ग्वाला बोला- दीवाना है,
कुछ दुनिया को पहचाना है?
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चे ने मुँह की खाई तो,
पर भूख न मिटने पाई यों।
गो थककर बच्चा चूर हुआ,
पर भूख से फिर मजबूर हुआ
थी पास दुकान मिठाई की,
लोगों ने भीड़ लगाई थी।
कोई लड्डू लेकर जाता था,
कोई रबड़ी बैठा खाता था।
क्या सुर्ख़-सुर्ख़ कचौरी थी,
कूंडे में दही फुलौरी थी।
थी भुजिया मेथी आलू की,
और चटनी साथ कचालू की।

बच्चा कुछ पास सरक आया,
न झिझका और न शर्माया।
भइया हलवाई सुनना तो,
पूरी-मिठाई हमें भी दो।
कुछ पैसा-धेला लाए हो?
यूँ हाथ पसारे आए हो?
पैसे तो अपने पास नहीं।
बिन पैसे मिलती घास नहीं।
हम देते हैं ख़ैरात नहीं,
पैसे बिन करते बात नहीं।

दमड़ी औक़ात कमीने* की,

यह सूरत खाने-पीने की!
अब रस्ता अपना नापो ना,
क़िस्मत को खड़े सरापो ना।
हलवाई ने धमकाया ज्यों,
फिर उसके मुँह पर आया, क्यों?
कहते हो मुझे कमीना* क्यों?
मेरा ही मुश्किल जीना क्यों?
बच्चा हूँ, मैं बेजान नहीं,
बिन पैसे क्या इंसान नहीं?
हट, हट! क्यों शोर मचाया है,
क्या धरना देने आया है?
नहीं देते, तेरा इजारा है?
क्या माल किसी का मारा है?
अब चटपट चलता बन ज्यों-त्यों,
नहीं रस्ते नाप निकलता क्यों?
जो बच्चा पैसे लाएगा,
लड्डू-पेड़ा सब पाएगा।

यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा थककर बेहाल हुआ,
भूखा, बेचैन, निढाल हुआ।
आगे को क़दम बढ़ाता था,
तो सिर चकराया जाता था।
तरसा था दाने-दाने को,
कुछ बैठ गया सुस्ताने को।
हिस था ठंडे-पाले का,
न होश उस गंदे नाले का।

थी सरदी खूब कड़ाके की
तपन पेट में फ़ाक़े की।
कुछ दूर को कुत्ता रोता था,
न जाने क्या-कुछ होता था।

दिखता हर तरफ़ अंधेरा था,
कमज़ोरी ने कुछ घेरा था।
आँखें उसकी पथराई थीं,
बेबस बाँहें फैलाई थीं।

वह ऐसे डूब रहा था ज्यों,

फिर मुँह पर उसके आया, क्यों?”
आराम से कोई सोता क्यों?
कोई भूखा-नंगा रोता क्यों?
फिर जान पड़ी बेहोशी-सी,
एकदम गुमसुम ख़ामोशी-सी।
देखा कोई बूढ़ा आता है,
इक टाँग से कुछ लँगड़ाता है।
वह पास को आया बच्चे के,
सिर को सहलाया बच्चे के।
क्यों बच्चे सरदी खाता है,
यूँ बैठा ऐंठा जाता है?

बाबा मेरा घर-बार नहीं,
करने वाला कोई प्यार नहीं।
मैं ये ही पूछा करता- क्यों?
मुझ जैसा भूखा मरता क्यों?
कहते हैं रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।

पर ऐसी रीत पुरानी क्यों?
मैं पूछूँ- यह नादानी क्यों?

यह तो कुछ नहीं बताते हैं,
उलटे मुझको धमकाते हैं।
बुड्ढे ने उसको पुचकारा,
यूँ अपना हाल कहा सारा।
हाँ, है तो रीत पुरानी यह,
पर अपनी ही नादानी यह।
गर सब ही पूछा करते यों,
जैसे तुम, पूछ रहे हो, “क्यों?
तो अब तक रंग बदल जाता,
दुनिया का ढंग बदल जाता।
है समझ नहीं इन बातों की,
है करामात किन हाथों की।

हम ही तो महल उठाते हैं,

हम ही तो अन्न उगाते हैं।
सब काम हम ही तो करते हैं,
फिर उलटे भूखों मरते हैं।
बूढ़ा तो हूँ, बेजान नहीं,
क्या मन में कुछ अरमान नहीं?

मैंने भी कुनबा पाला था,
बरसों तक काम सँभाला था।
जब तक था ज़ोर जवानी का,
मुँह देखा रोटी-पानी का।
यह टाँग जो अपनी टूट गई,
रोटी भी हम से रूठ गई।
कुछ काम नहीं कर पाता हूँ,
यूँ दर-दर ठोकर खाता हूँ।
जोड़ों में होता दर्द बड़ा,
गिर जाता हूँ मैं खड़ा-खड़ा।
न बीबी है, न बच्चा है,
इक सूना-सा घर कच्चा है।
मैं भी सोचा करता हूँ यों,
आहे ग़रीब है भरता क्यों?

कहानी यहाँ अधूरी है,
इसकी हमको मजबूरी है।
कुछ लोग यह अब भी कहते हैं,
जो दूर कहीं पर रहते हैं,
उनको था दिया सुनाई यों,
इक बच्चा पूछ रहा था, क्यों?
वह सड़क किनारे बैठा था,
नीला, सरदी से ऐंठा था।
पर दोनों होंठ खुले थे यों
जैसे वह पूछ रहा था, क्यों?
फुलौरी- पकौड़ापकौड़ीफुलौरा, पकोड़ा, पकोड़ीघी या तेल में पकी हुई बेसन या पीठी की बरी या बट्टी
कचालू-  एक प्रकार की अरवी।
दमड़ी- पैसे का आठवाँ भाग।
इजारा- अधिकार, हक़, स्वत्व, दावा, दख़ल, अधिकृति, इख्तियार, अख़्तियार;  वह अधिकार जिसके आधार पर कोई वस्तु अपने पास रखी अथवा किसी से ली या माँगी जा सकती हो
* ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। समाज के यथार्थ प्रतिबिंबन के लिए लेखक कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं, किंतु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए।

स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों के चार भाषण

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इस बार कुछ और बातें!
पिछले दिनों एक विद्यालय में जाने का अवसर मिला। वहाँ मेरे पूर्व शिक्षक ने बच्चों के लिए कुछ भाषण स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देने के लिए लिखने का निर्देश दिया। कुछ खास इच्छा न रहते हुए भी 10 भाषण लिखे। निर्देशानुसार भाषण में कोई कविता या शेर होने पर वह अच्छा लगेगा। हकीकत यह है कि कविता के अंश या शेर तालियाँ बजवाते हैं, इससे ज़्यादा शायद ही कुछ होता हो। पास में न कोई डायरी, न किताब, न नोट। कविता के चक्कर से छुटकारा कैसे भी मिल सका। उन दस भाषणों में से 7-8 को आज बच्चे विद्यालय द्वारा आयोजित समारोह में देंगे। यहाँ 15 अगस्त, 2012 के अवसर पर उन भाषणों में से कुछ दिए जा रहे हैं। संबोधन को भी यहाँ रहने दिया जा रहा है। हालाँकि वह जरूरी नहीं है।

1
उपस्थित सज्जनो, शिक्षकगण और मेरे सहपाठियो! आज 15 अगस्त के इस महत्वपूर्ण अवसर पर मुझे कुछ कहने का अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए मैं आपसबों का आभारी हूँ।
      15 अगस्त, 1947 के बाद आज 65 साल बीत गए हैं। हम हर साल इस दिन अपने देश की आजादी का उत्सव मनाते हैं। दो-ढाई सौ सालों की लम्बी ग़ुलामी से आज़ादी पाने में हमारे देश के लाखों लोगों की जानें गई हैं। अंग्रेजों से पहली लड़ाई लड़नेवाले बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से लेकर भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे कई शहीदों की कुर्बानी देकर हमारे देश को 1947 में आजादी मिल पाई।
      आज जब हमारे देश में आदर्श के नाम खिलाड़ी, फ़िल्मी सितारे और अमीर उद्योगपति सामने हैं, तब शहीदों की चमक फीकी पड़ती मालूम हो रही है। ज़रूरत है इस बात की कि भगतसिंह को हमारे बीच आदर्श के रूप में ठीक से स्थापित किया जाए।
      भगतसिंह से प्रेरणा लेकर इस देश, विश्व और मानवता के लिए कुछ करने की ज़रूरत है।
धरती हरी भरी हो आकाश मुस्कुराए
कुछ कर दिखाओ ऐसा इतिहास जगमगाए।
जय हिंद!                 जय मानवता!
2
प्यारे देशवासियो! हमारा देश आज 66वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। हमारे विद्यालय द्वारा आयोजित समारोह में मुझे भी कुछ कहने का अवसर प्रदान किया गया है। इस अवसर पर मैं आपसबों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
      आज हम अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो चुके हैं। लेकिन हमें निश्चिंत होकर बैठ नहीं जाना चाहिए। अपने ही देश में ऐसे कई गद्दार आसन जमाए हुए हैं, जो देश की स्वतंत्रता को खतरा पहुँचाने की कोशिशें करते हैं। हम सभी देशवासियों का यह कर्तव्य है कि हम उन गद्दारों से सावधान रहें।
कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से।
सम्भल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से।
      बाहर के दुश्मन से ज़्यादा खतरनाक घर में बैठा गद्दार होता है। देश की स्वतंत्रता को नीलाम करने के हजारों प्रयत्न होते रहे हैं। आज इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमसब यह प्रण लें कि हम देश और इसकी एक अरब से अधिक जनता की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा किसी भी कीमत पर करेंगे।
जय हिंद!           जय स्वतंत्रता!
3
उपस्थित सज्जनो! और मेरे सहपाठियो! मुझे इस स्वतंत्रता दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर आपसे कुछ कहने का मौका दिया गया है, इसलिए मैं आप सबों का आभारी हूँ।
      आजादी! इनसान तो क्या पशु-पक्षी भी आजाद रहना चाहते हैं। हमारे देश के साथ ऐसी दुर्घटना घटी कि वह सदियों तक विदेशियों के चंगुल में फँसा रहा। गुलामी कोई पसंद नहीं करता। भगतसिंह जैसे शहीदों ने कहा-
बड़ा ही गहरा दाग़ है यारों जिसका ग़ुलामी नाम है
उसका जीना भी क्या जीना जिसका देश ग़ुलाम है!
      फिर हजारों क्रांतिकारियों ने जान की बाजी लगा दी और वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बलिदान के फलस्वरूप हमें आजादी मिली और आज हम आजाद हैं। आजादी की कीमत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 7 लाख लोगों ने आज़ादी के लिए अपने प्राण गँवा दिए। आजादी अमूल्य है, इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। आजादी को हर कीमत पर हम बनाए रखें, इसी आग्रह के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
जय हिंद!           जय आजादी!
4
मेरे प्यारे देशवासियो! भारत के 66वें स्वतंत्रता दिवस पर मुझे कुछ कहने का अवसर मिला है। आज के दिन पूरे देश में खुशी और उत्साह का माहौल होता है। लेकिन जब हम आजादी के दीवानों की कहानियाँ पढ़ते हैं, तो दिल दहल जाता है। जेल में भूख हड़ताल की वजह से जतिनदास के प्राण चले गए, भगतसिंह को मात्र साढ़े तेईस साल की उम्र में फाँसी हो गई। सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, भगवतीचरण वोहरा जैसे क्रांतिकारी अंग्रेजों की हैवानियत के शिकार हुए। हजारों क्रांतिकारियों को गोली खानी पड़ी। सारे शहीद हमसे दूर चले गए। जान पर खेलकर हमें आजादी देनवाले क्रांतिकारी हमसे विदा लेते समय कहते थे-
गोली लगती रही ख़ून गिरते रहे
फ़िर भी दुश्मन को हमने न रहने दिया
गिर पड़े आँख मूँदे धरती पे हम
पर गुलामी की पीड़ा न सहने दिया
अपने मरने का हमको न गम साथियों
कर सफ़र जा रहे दूर हम साथियों।
      अब हमपर निर्भर करता है कि हम शहीदों के सपनों का भारत बनाना चाहते हैं या अहसानफ़रामोशी का सबूत बनना चाहते हैं। इस उम्मीद के साथ कि कोई तो शहीदों और उनके सपनों का खयाल करेगा, मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ। चलते-चलते भगतसिंह के वे दो नारे जो उन्होंने अदालत में लगाए थे-
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!        साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!
      बच्चों के भाषण होने से छोटे और सरल हैं ये सब! वरना आजादी पर पिछले साल साझा किए में आज भी बदलाव नहीं आया है। वन्दे मातरम् का नारा खुद को भी खास पसन्द नहीं। अब इस तरह के भाषण में आजादी का सच कैसे बयान किया जाता?

चलते-चलते

लोहिया जी ने अंग्रेजों के लिए कुछ इस तरह से कविता बनाई थी-

“दगाबाज, मक्कार, सितमगर बेईमान, जालिम हत्यारे
डाकू, चोर, सितमगर, पाजी, चले जा रहे हैं सा……।”

-भाषा के विभिन्न संदर्भ और डा राम मनोहर लोहिया से

कवि भाषाविद् कितने आये । अंश अरब भी कह क्या पाये ॥(?)

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हाल में फेसबुक पर लिखा था….

फेसबुक पर निजी बातें नहीं लिखता रहा हूँ। समाज से बातों का जुड़ाव रहे, ऐसी कोशिश रही है। लेकिन आज एक निजी बात……


मई, 2006 में मुझे कृष्ण पर कुछ लिखने का (सच कहूँ तो महाकाव्य लिखने का, भले ई बुझाय चाहे नहीं बुझाय कि महाकाव्य क्या है 🙂 ) मन हुआ। जमकर भक्तिभाव से चौपाइयाँ, दोहे लिखा। पहला दोहा था।


अतिप्रिय राधाकृष्ण को करूँ नमन कत बार।

कौन पूछता है मुझे थक गये जब कर्तार॥

फिर उसी साल दो-चार पन्ने लिखे तब तक धर्म और भगवान से विश्वास उठ गया और फ़िर आज मैं वह नहीं हूँ, जो पहले था।

कैसे भक्ति के ‘महान’ गाने रवीन्द्र की गीतांजलि बन जाते हैं, या विनय पत्रिका, इसका गवाह मैं स्वयं हूँ! सब बस एक पागलपन है, कोरी कल्पना है। भक्ति गीत गाने से कैसे आँसू बहने लग सकते हैं, यह भी आस्तिकता के समय मैंने महसूस किया।

चलिए वह रचना यहाँ रख देते हैं। आस्तिकता के लगभग सभी चरणों या कुछ अनुभवों से गुजरने के बाद यह रचना हुई थी। आज की बात साफ़ अलग है। खैर, छोड़िए। “श्रीकृष्ण दर्शन” नाम से लिखने का इरादा किया था इसे। तीन दिन लिखने के बाद काम बंद! सो उतना ही है।

श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:
दोहा अतिप्रिय राधा कृष्ण को, करूं नमन कत बार । (?)
      कौन पूछता है मुझे , थक गये जब कर्त्तार ॥
चौपाई:

कोटि-कोटि वंदन महेश की । और साथ नंदन गणेश की ॥
देवराज औ पावक अक्षर । जन्मभूमि औ जननी भाष्कर ॥     
पवन पवनसुत श्रीहनुमत की । वसुंधरा गोकुल भारत की ॥
वेद पुराण ग्रंथ गीता की । वृंदावन औ मां सीता की ॥
छंद : भारती तुलसी गुरु से, विनती अब चंदन करे ।
    वाल्मीकि धनदेव की , भाँति विविध वंदन करे ॥
    भूधर नदी पंकज सुमन, जो सृष्टि का श्रृंगार है ।
    और जलधि जल जलद को, नमन शत-शत बार है ॥
चौपाई:

सूर मनोज अन्न अंबर की ।  संत सकल तरुवर हिमकर की ॥
दुर्गा मीरा गोपी सब की । मारे कृष्ण नदी में डुबकी ॥
वास करो मन में नारायण । लगे कृष्णमय हर क्षण हर कण ॥
दोहा: रा निकले ज्योहिं मुख से, त्योहिं मिले आनंद ।
      कहते मुख बंद हुआ, राम नाम सुख कंद ॥ (i)
      यमुना को मैं कर रहा, अगणित बार प्रणाम ।
      गंगा को सुमिरण करूं, जो है श्रीसुख धाम ॥
-04.05.06
______________________________________________________
चौपाई:

कलि सत त्रेता युग द्वापर औ । नवरस नभचर छंद अमर औ
जीव जगत सब गौरी कमला । पशु गौ नर नारी अतिविमला ॥
मीन कमठ शूकर वामन की । दसावतार विष्णु भगवन की ॥
परशुराम राघव हलधर की । कृष्ण बुद्ध कल्कि नरवर की ॥
छंद: वंदना मेरी सुनो हे, ध्यान दे केशव जरा ।
    है ये मस्तक क्या करूं, अज्ञान सागर से भरा ॥
कर सकूं वर्णन भला जो, इतनी क्षमता है कहाँ ?
    तेरे बिना इस मूढ़ का, क्यों चित्त रमता है यहाँ ॥
चौ.

चरण आपके सीस विधाता । महिमा सबकी बालक गाता ।
कवि भाषाविद् कितने आये । अंश अरब भी कह क्या पाये ॥(?)
कृष्ण कन्हैया अंतरयामी । क्षमा चाहता नीचा कामी ॥
दो.
    इसने दु:साहस किया, क्षमा करो घनश्याम ।
    लीला तव गाने चला, जिसका चंदन नाम ॥(2)
    तुम ही मेरे इष्ट हो, तुम ही मेरे तात ।
    तुम ही मेरे हो सभी, पिता प्रभु भी मात ॥
-05.05.06
______________________________________________________
   
चौ.
    धन्य धन्य मेरा विद्यालय । शिक्षादाताओं की जय-जय ॥
    मिले जहाँ चिंतन के डैने । भाषा सीखी जिनसे मैंने ॥
    हे हिंदी भाषानिर्माता ! औ संस्कृत हे भाषामाता ॥
    नमस्कार सब भाषाओं की । सभी ज्ञान के दाताओं की ॥
छं.   यंत्र के निर्माणकर्त्ता, और सभी वैज्ञानिकों ।
    इस जगत के रत्नगृह के, हे अमूल्य श्रीमाणिकों ॥
    कविता जगत के नरवरों, रचना तुम्हारी अमर हो ।
    देवगुरु वाचस्पति के, श्रीचरणों में ये सर हो ॥
चौ.
    सृष्टिसहायक जन्म मरण की । दुराचार औ सदाचरण की ॥
    दुराचार अगर नहीं रहते । प्रभु-महिमा सब कैसे कहते ॥
  धरती पालक सब किसान की । रसना, मानव तन महान की ॥
दो. दिशा अंक दस देश सब, धर्म अर्थ औ काम ।
    चंदन सबको नमन है, मोक्ष सहित तव नाम ॥(3)
-08.05.06

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बुर्जुआ भाषा वालीं हिन्दी फ़िल्में

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21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उसी लेख के संपादित और परिवर्धित रूप को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। आज तीसरा और अन्तिम हिस्सा प्रस्तुत है।

फ़िल्मों पर लिखना शुरू करने पर सबसे पहले भाषा को लेकर ही लिखा था, आज भाषा पर कुछ बातें…
बुर्जुआ भाषा वालीं हिन्दी फ़िल्में

भारत में सबसे ज़्यादा फ़िल्में हिन्दी के नाम पर बनती हैं। यह और बात है कि उन फ़िल्मों में हिन्दी दाल में नमक की तरह भी हो सकती है। भाषा की दृष्टि से अगर हम इन हिन्दी फ़िल्मों पर विचार करें, तो यह बात सामने आती है कि इन फ़िल्मों का दर्शक वर्ग जिसे लक्ष्य करके फ़िल्म बनाई गई होती है, पूँजीवादी मानसिकता और पूँजीवादी बुर्जुआ चेतना में ही जी रहा होता है। यहाँ मुख्य रूप से हम उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद बनी फ़िल्मों पर ही विचार करेंगे।
      भाषा को वर्तमान भारत में बहुत महत्वपूर्ण माननेवाले लोगों की संख्या कम ही लगती है। अधिकांश लोगों और चिंतक कहे जानेवाले लोगों में यह बात ज़्यादा प्रचलित हो चुकी है कि भाषा एक बिलकुल सामान्य या लगभग महत्वहीन मुद्दा है। अधिकांश तथाकथित चिंतकों को भाषा के नाम पर की जानवाली बहसें, गम्भीर विचार बेकार की लफ़्फ़ाजी ही मालूम पड़ते हैं। वहीं ऐसे लोग भी हैं, जो यह मानते हैं कि भाषा एक ज़रूरी मुद्दा तो है, लेकिन उसपर ध्यान देने की कोई कोशिश करते वे नज़र नहीं आते।
      1990 के बाद बनी हिन्दी फ़िल्मों के नाम अंगरेज़ी या हिंगरेज़ी में रखे जाने लगे। 1990 के पहले भी फ़िल्मों के नाम पर अंगरेज़ी या अंगरेज़ी मिश्रित होते थे, लेकिन उनका प्रतिशत बहुत कम या नगण्य था। लेकिन यह प्रचलन 1990 के बाद जोरों से बढ़ा है। मामला सिर्फ़ नाम का नहीं है, यह मुद्दा एक संस्कृति का है, दर्शकों और निर्माताओं की चेतना का है। कहने की ज़रूरत नहीं कि अंगरेज़ी समझनेवाले दर्शकों का प्रतिशत कितना है। फ़िल्मों में नाम के बाद अगर संवाद की भाषा पर बात करें, तो आलम यह है कि छोटे शहर में रहनेवाले सापेक्षतः थोड़ी अंगरेज़ी समझनेवाले भी इन दिनों बननेवाली किसी फ़िल्म के सारे संवाद समझने की स्थिति में नहीं कहे जा सकते। उदाहरण के लिए पटना, जो बिहार की राजधानी है और देश के प्रमुख शहरों में जिसकी गिनती की जाती है, में रहनेवाले वैसे दर्शक जो स्नातक स्तर की शिक्षा ले रहे हैं, शायद ही उनमें से दस प्रतिशत ऐसे हैं, जो किसी फ़िल्म के सारे संवाद समझ सकें। एक सच्चाई यह भी है कि यूरोप के लोगों की तुलना में भारतीयों का शब्द-ज्ञान और भाषायी चेतना का स्तर नीचा है। यहाँ हमें ऐसे लोगों से हर रोज़ मुलाक़ात होती है, जो अपना शब्द-ज्ञान बढ़ाने की जगह लेखक या पुस्तक की भाषा को, ख़ासकर अंगरेज़ी को छोड़कर हिन्दी आदि भाषाओं के मामले में तो ज़रूर ही, दोषी मानते हैं। ज़रा उनकी खँचड़ई देखिए- इसीलिए तो हिन्दी समझ नहीं आती, बड़ा भारी लिखते हैं सब हिन्दी वाले, अंगरेज़ी कितनी सरल लिखते हैं लेखक लेकिन हिन्दी वाले ऐसा लिखते हैं कि किसी को बुझाता नहीं है। ये सारे कथन उन्हीं अंगरेज़ी समर्थकों के हैं, जो अंगरेज़ी के एक शब्द नहीं जानने पर गर्व से डिक्शनरी खोल लेते हैं, लेकिन हिन्दी का कोई शब्द नहीं जानते तो कोई बात नहीं। उनकी सोच यह होती है कि पाँचवी कक्षा को दी जानेवाली विज्ञान की शिक्षा वाली भाषा और वैसे ही शब्दों से स्नातकोत्तर के विज्ञान की शिक्षा भी दी जाय। उनकी उदारता अंगरेज़ी के लिए दिखती है, जहाँ उन्हें शब्दों को रटने की उज्जवल संस्कृति का पक्षधर बनकर शोर मचाते देखा जा सकता है।
      फ़िल्मों में संवाद की दृष्टि से अंगरेज़ी का प्रभाव इतना बढ़ा है कि 120 मिनट की फ़िल्म में 40 मिनट से ज़्यादा तक अंगरेज़ी बोलते देखा जा सकता है। इस महान् परिवर्तन के बावजूद फ़िल्म हिन्दी की ही कही जाती है। और राजेन्द्र यादव के अनुसार उसे हिन्दी कहना भी होगा, और यह वास्तव में सही भी है। 
      अंगरेज़ी का बुर्जुआ से कितना संबंध है, यह सहज ही समझा जा सकता है। फ़िल्मों के दृश्य, उनमें दिखाए जानेवाले मक़ान, गाड़ियाँ, वस्त्र सब बता सकते हैं कि फ़िल्मों का लक्ष्य-दर्शक-वर्ग कौन है। भारत के 75 से 80 प्रतिशत लोग इस स्थिति में नहीं हैं कि वे सिनेमाघरों में जाकर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर सकें। इसके बावजूद फ़िल्मों से होनेवाली आय निर्माता, अभिनेता और फ़िल्म वितरक या फ़िर सिनेमाघरों के मालिकों को तेज़ी से करोड़पति, अरबपति बना रही है। यही हाल अंगरेजीदाँ महात्माओं का है, वे उसी काम के लिए 10,000 पाते हैं, जिस काम के लिए हिन्दी वाले को 100 रु० या 1000 रु०  मिलते हैं। आमदनी और रहन-सहन के बीच यह खाई, जिसका आधार योग्यता कम, भाषायी दुष्चक्र ज़्यादा है, हमें भाषा पर सोचने को, उसे गम्भीर और महत्वपूर्ण मुद्दा मानने को मज़बूर कर देती है।
      इतना तो आसानी से समझ में आता है कि फ़िल्मों की भाषा का अंगरेज़ीमय होते जाना भारत के सबसे ज़्यादा शोषितों के समझ में नहीं आता। इक्के-दुक्के अंगरेज़ीदाँ का शोषण भी हो सकता है, लेकिन इस अपवाद से इस पूरे मामले को पलटा तो नहीं जा सकता। भारत के किसान, मज़दूर और अल्प-आय वाले लोगों को फ़िल्मों की यह भाषा कम (नहीं के बराबर। वैसे तो उन्हें फ़िल्म के लिए फ़ुरसत ही नहीं है।) समझ आती है। इससे इतना तो कह सकते हैं कि फ़िल्मों की भाषा शोषितों और सर्वहाराओं की भाषा नहीं रही है, वह तेज़ी से बुर्जुआ की भाषा में बदल रही है।
            भाषा को आधार मानकर फ़िल्मों पर दृष्टि डालने से यह निष्कर्ष सामने आता दिखता है कि जनसाधारण की भाषा फ़िल्मों में नहीं है, वह बुर्जुआ संस्कृति की वाहिका होती जा रही है।

ठीक इसी मुद्दे पर लिखा यह लेख भी पढ़ सकते हैं। 

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