आंख और इलाज (कविता)

टिप्पणी करे

आंख और इलाज
लोगों की
करतूत देखते-देखते
भगवान की भी
आंख
हो गयी ख़राब ।
गया वो
अस्पताल में
वहां
देखा उसने
डॉक्टरों की डॉक्टरी
और उनकी फ़ीस
नहीं हो पाया
वहां उसकी आंखों का इलाज़ ।
फ़िर गया वो
सरकारी अस्पताल में
देखा उसने
नि:शुल्क ऊपर लिखा है
सिर्फ़ लिखने के लिए
सोचा
जब मर जाऊंगा
तब आएगी
मेरी बारी
वह
वहां से चल दिया ।
फ़िर वह
दौड़े-दौड़े आया
ग्रामीण-क्षेत्र के
ईमानदार डॉक्टरों के पास
वहां देखा उसने
इलाज़ के लायक़
थे ही नहीं उपकरण
और दवाएं ।
फ़िर पहुंचा वह
हारा-थका
संतों की शरण में
वहां भी
उसे नहीं मिला कुछ
डॉक्टरों से भी अधिक फ़ीस
और संतों की साधना
और उनके तेज से
उसे रहना पड़ा दूर ही
बात दूसरी थी
असल में
वह पवित्रतम है
फिर भी वहां था
उसे
अपवित्र हो जाने का डर ।
अब
उसने सोचा
शुद्ध महात्माओं के पास जाऊं
उसे पता ही नहीं मिल सका उनका
क्योंकि ना जाने
किस पहाड़ की कंदरा में
वास था उनका ।
अब वह बैठा था
परेशान
सुनसान सड़क पे
उसका कोई परम भक्त
जा रहा था उस रास्ते से
वह भी बैठ गया
कराहने की आवाज़ सुन
वह सोच ही नहीं सकता था
वह अपने भगवान के साथ था
बिना यह जाने
वह ले गया अपने घर
भगवान बेचारे
थे कई दिनों के भूखे
भक्त ने
दो रोटी और नमक दिया
खाने को
पीने को
एक ग्लास पानी ।
भगवान की एक आंख
तो देख नहीं सकी
कुछ भी
किंतु दूसरी आंख ने देखा
चार रोटियां
दो रोटियां खाने के बाद
टटोलती रहीं
उसकी अंगुलियां
जैसे समंदर में
टटोल रहा हो मोती ।
भगवान की क्षुधा कहां मिट पायी
इन दो रोटियों से
फ़िर भी
कुछ तो ज़रूर मिला था उसे ।
भक्त भला आंखें कैसे ठीक कर सकता था
वह डॉक्टर तो नहीं था ।
रात को
सुलाया उसने
खाट पर
भगवान को
वो भी
बिना चादर के
जिसे आदत है
सर्प के शरीर पर
सोने की
स्वयं सो गया
नीचे जमीं पर ।
अचानक रात को
खुली उसकी आंख
देखा उस भगवान ने
एक ऐसा दृश्य
वह भी विह्वल हो उठा
भले ही
आनद का सागर है वो ।
खांस रहा था
जोर-जोर से
वह भक्त
भगवान नहीं जानता था
उसने तो रोटी खा ली थी
मगर, वह भक्त
भूखा रह गया था
उस रात ।
वह दो रोटियां
तो उसे ख़ुद मिली थीं
कई दिनों पर
खाने के लिए
बड़े प्रेम से
रखा था उन्हें
उसने
अपने लिए ।
भगवान को याद आई
अपनी शक्ति
उसी क्षण
उसने सोचा
दे डालूं सारी ख़ुशियां
डाला अपने जेबों में
दिल के जेबों में हाथ
वह चौंक गया था
पॉकेटमार ने
उसकी जेब से
उसकी शक्ति
गायब कर दी थी
वह सोच के आधा पागल हो गया
अपनी हालत के बारे में
उसे आंख लग गयी
अगले सुबह
उठते ही देखा उसने
अंतिम सांस
गिन रहा था
वह भक्त
उसने कहा
भगवान से
आप ही मेरे प्रभु हैं
मुझे पूरा विश्वास है
क्योंकि मुझे पूरा विश्वास था
आप मुझे नहीं करेंगे निराश
इतना कहते ही
उड़ गये उसके प्राण-पखेरु ।
भगवान को
पता चला बाद में
वह भक्त
उस देश का
राष्ट्रपिता रह चुका था
पूर्व-जन्म में
जिसे भुला दिया था
उसके राष्ट्र ने
अगले जन्म में
वह भक्त हो गया था ।
अब भगवान ने
रेलवे स्टेशन पर कटायी
एक टिकट
बैठ गया ट्रेन में
टिकट चेकर आया
टिकट मांगी
भगवान ने दिखा दिया
अपना टिकट
टिकट चेकर ने कहा
टिकट नकली है
भगवान सोचने लगा
टिकट नकली था या
टिकट चेकर
जो हो उसे उसे देने पड़े
कुछ रूपये
टिकट चेकर को
फ़िर भीड़ में
धक्के खाकर
गिर पड़ा
भगवान
उस चलती ट्रेन से ।
टूट गया
एक पैर
भगवान का
बेचारे को
लाठी की
लेनी पड़ी मदद
कुछ आगे गया
लंगड़ाते-लंगड़ाते
एक पुलिसवाला
पीट रहा था
एक निर्दोष को
अपनी लाठी से
टूट गयी उसकी लाठी
निर्दोष ख़ून से लथपथ हो चुका था
देख रहे थे लोग
किसी तमाशे की तरह
तभी
पुलिसवाले की नज़र पड़ी
भगवान पर
उसने कहा-
अबे लंगड़े
तू इधर क्या कर रहा है
लाठी छिन ली उसने ।
भगवान बेचारे
किसी भी तरह
गये एक नदी के किनारे
पास में ही ।
वहां टहल रहे थे
एक शिक्षक महोदय
संयोग से
किसी मेडिकल कॉलेज में
आई-डिपार्टमेंट के
हेड थे
भगवान ने
जब
यह सब जाना
वे प्रसन्न हुए
यह सोच
शिक्षक परोपकारी होते हैं
त्यागी होते हैं
इलाज हो गया
मेरी आंखों का
अभी सोच रहे थे
तभी आया एक नवयुवक
जो था उनका छात्र
उसने सूटकेस लिया था
अपने हाथों में
गुरुदेव ने
सूटकेस ले लिया
कहा- ठीक है
जाओ
परीक्षा में
तुम ही आओगे प्रथम
अब भगवान को आई अक़्ल
वे समझ गए सब
तब तक गुरुदेव और शिष्य जा चुके थे ।
फ़िर आयी
एक चार पहिये की गाड़ी
उसके पीछे कई ट्रक
ट्रकों में लदे थे कुछ
नदी के किनारे ही
एक तरफ़ कोने में
बना था एक बड़ा-सा घर
वहां बनती थी दवाएं
चार पहिए वाली गाड़ी से
निकला एक आदमी
चल पड़ा उस ओर
कोने में
जहां दवाएं बनती थीं
भगवान को पता चला
दवाओं की असलियत ।
वे
देख रहे थे
नदी कि ओर
तभी दिखाई पड़ा
एक नाव
वे उठ खड़े हुए
लगता था कोई पूर्व-परिचित
नाव निकट आयी
उसमें से निकले धन्वन्तरि
भगवान सवार हो गए उसमें
चल पड़े अपने घर
लेकिन
इस प्रण के साथ
नहीं आऊंगा अब
कभी धरती पर
तभी से
भूल गए हैं वे
धरती और धरती के लोगों को ।
रचना –06.09.05, 8:30 प्रात:

आखिर कौन है ये भगतसिंह?

टिप्पणी करे

भगतसिंह के बहाने अपनी बात

भगतसिंह- एक जाना पहचाना नाम विशेष रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक्शन हीरो के तौर पर। इस नाम के बारे में मुझे क्यों कुछ कहने की जरुरत हो रही है जबकि इस नाम के उपर लाखों पन्ने भरे जा चुके हैं, करोड़ों रूपये का व्यापार हिन्दी सिनेमा कर चुका है। कुछ तो ऐसा है जरुर कि मैं कुछ कहना चाह रहा हूं। तो चलिए भगतसिंह की रेलगाड़ी में सैर करते हैं।

      पहली बात ये कि हम भगतसिंह को कैसे जानते हैं, कितना जानते हैं तो हम सिर्फ़ यही जानते हैं कि भगतसिंह एक क्रांतिकारी थे जो हिंसक तरीके से आजादी चाहते थे। उनका जन्म पंजाब में हुआ था। उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी सौंडर्स की हत्या, एसेम्बली में बम फेंकना जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। उन्हें 23 मार्च 1931 को सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी दे दी गई। और गांधीजी ने उन्हें बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। उनका नारा था इंकलाब जिंदाबाद!! यही जानकारी अधिकांश लोगों को है जो भगतसिंह-भगतसिंह का शोर मचाते हैं और गांधी चोर था, गांधी ऐसा था, वैसा था कहते फिरते हैं। और कुछ उत्साह से 15 अगस्त और 26 जनवरी को उनके नाम पर कुछ गाने गाना, लोट-लोट कर नौटंकी करना, डांस करना और बहुत से बहुत हुआ तो किसी संगठन के बोर्ड पर भगतसिंह का फोटो लगाकर ब्रांड की तरह भगतसिंह का इस्तेमाल करना बस यही काम हमारे द्वारा किये जाते हैं। मैंने किसी मां-बाप को यह बताते हुए न देखा है न सुना है कि वो अपने बच्चों को भगतसिंह बनने की ओर प्रेरित करते हों। आप पूछ कर देख लें बच्चों से कि क्या बनना चाहते हो? जवाब होगा- सलमान खान, शाहरुख खान, सचिन तेंदुलकर, धोनी, मुकेश अंबानी, बिल गेट्स, डाक्टर, इंजीनियर, मिस इंडिया, हीरो, हीरोइन। बस यहीं तक सोच हो सकती है। इससे आगे कुछ सोचना तो दूर की बात है। मैं अक्सर देखता हूं कि युवा जिनका काम सुबह शाम शराब, गाली-गलौज, अभद्रता, ग्लैमर, बाइक और सिगरेट का इस्तेमाल करना होता है गांधी से जलते हैं क्योंकि गांधी ग्लैमरस नहीं हैं, बूढे हैं देख कर मन दुखी हो जाता है तो बेचारे भगतसिंह के नाम पर कूदते हैं कि हिंसा बहुत अच्छी चीज है पर दुख इस बात का है कि न तो उनको भगतसिंह के बारे में ज्यादा मालूम है न ही गांधी के बारे में। वैसे यह जरुर बता दूं कि भगतसिंह से ज्यादा वे गांधी जी के ही बारे में जानते हैं। मेरा दावा ये नहीं मैं बहुत ज्यादा जानता हूं दोनों के बारे में। गांधी का सम्पूर्ण वांगमय 50 हजार से ज्यादा पृष्ठों में भारत सरकार ने छापा है। और भगतसिंह का सब कुछ सिर्फ़ चार-पांच सौ पृष्ठों में सिमटा हुआ है। अगर आप भगतसिंह की किताब या विचारधारा की बात करेंगे तो ये भाग खड़े होते हैं। मैं बता दूं कि मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो भगतसिंह के नाम पर लड़ने को तैयार हो जाते हैं लेकिन मैंने जब भगतसिंह की किसी किताब या लेख पर उनका ध्यान दिलाया तो उन्होंने पलटी मार दी। भगतसिंह का पक्ष युवा वर्ग खूब लेता है लेकिन जैसे ही भगतसिंह जैसा बनने की बात आती है उसका ध्यान अमेरिका, इंग्लैंड, दौलत, ऐशो आराम  पर चला जाता है।   
      पंजाब जिसे सुनते ही पगड़ी की याद आ जाती है जहां पहचानना मुश्किल होता है कि कौन कैसा है? सारे लोग एक ही जैसे दिखते हैं वहीं एक अलग सा दिखने वाला बच्चा पैदा होता है 28 सितम्बर 1907 को। चूंकि कोई देश या इतिहास इसके पीछे नहीं पड़ता कि लेनिन, मार्क्स, हिटलर, बुद्ध या कोई और किसका बेटा है, ठीक उसी तरह यह बच्चा किसका बेटा है मुझे बताने में कोई रूचि नहीं। यहां मैं एक बात कहना चाहता हूं कि अगर कोई ये समझे कि फलां आदमी या महापुरुष के माता पिता बड़े महान थे  जो उन्होंने किसी महापुरुष को जन्म दिया या पाला तो ये बिल्कुल ही मानने लायक नहीं है क्योंकि सब जानते हैं दुनिया के लगभग सारे महान या क्रांतिकारी आदमी के मां-बाप की वे इकलौती संतान नहीं थे। लगभग सभी के एक से ज्यादा संतान थी। तब अगर वे वाकई में महान थे और बहुत बुद्धिमान, शक्तिशाली या गुणवान थे तो उन्होंने अपने दूसरे बेटे को महान क्यों नहीं बना दिया। जहां तक मुझे याद आ रहा है, विवेकानंद दस से ज्यादा भाई-बहन थे तो क्यों नहीं उनके माता-पिता ने दूसरा विवेकानंद पैदा कर दिया। कोई आदमी अपने मां-बाप से शरीर लेकर पैदा होता है पर उसकी खुद की सोच, समय की जरुरत, उसका खुद का मंथन, खुद का संघर्ष आदि उसे महान बनाते हैं न कि किसी खास का बेटा होना।
      उस बच्चे की जीवनी बताना मेरा लक्ष्य नहीं इसलिए यहां लम्बी जीवनी नहीं चलेगी। लेकिन उन घटनाओं का जिक्र जरुर होगा जिससे वह बच्चा भगतसिंह बना। घर में सदस्यों का आजादी के आंदोलन से किसीन-किसी तरह से पहले से जुड़ा हुआ होना, बचपन में ही जलियांवाला बाग हत्याकांड को नजदीक से जानना, आंदोलनों का दौर होना ये सारे कारण उस समय मौजूद थे। लेकिन बेखौफ मौत, हंसते हुए फांसी पर चढना, फांसी के पहले चिंता नहीं होने की वजह से वजन का बढ़ जाना, लम्बी भूख हड़ताल, मरने के समय किसी भगवान, वाहे गुरु जैसे छलावे या सहारों का स्मरण भी न करना, अल्पायु में घोर अध्ययन, एक विचारक होना और सबसे महत्वपूर्ण साढे तेईस साल की उम्र में दुनिया से चले जाना- ये घटनाएं बताती हैं भगतसिंह नाम का युवक भगतसिंह क्यों और कैसे बना?
किताबों, भाषा, साहित्य और हिन्दी पर
      21 फरवरी 1921 को 140 सिखों को महन्त नारायणदास ने बड़ी बेरहमी से मार डाला था ननकाना साहिब में। इसमें अंग्रेजों की मदद महन्त को मिली थी। बहुतों को जिंदा जला डाला गया था। इस घटना से आहत लोगों ने पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरु कर दी। लोग पंजाबी सीखने पढ़ने, लिखने लगे। भगतसिंह ने भी इस प्रभाव में आकर पंजाबी सीखी। यही पंजाबी भाषा एक बार उनके लेखन का विषय बनी। 1924 में पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के लिए उन्होंने एक लेख लिखा था पंजाबी भाषा और उसके लिपि की समस्या पर। इस लेख भगतसिंह ने साहित्य और भाषा पर विचार किया है। अब आज के युवाओं के लिए साहित्य और भाषा का महत्व कितना रह गया है? जरा देखते हैं। अगर एक छात्र हिन्दी से एम ए कर रहा हो तो उसे और छात्र एवं लोग बड़ी नीची दृष्टि से देखते हैं। जब हमें पता चलता है कि मेरे बगल में एक लेखक रहते हैं तब हम उनके उपर हंसते हैं और कहते हैं- वह कुछ नहीं बस टाइम बर्बाद करता है। मेरी मातृभाषा भोजपुरी है। लेकिन जब मैं घर में या बाहर भोजपुरी बोलता हूं तब कभी-कभी लोग या ज्यादातर मेरे रिश्तेदार मुझे मूर्ख समझते हैं। उन्हें मैं पुराना लगता हूं। पुराना जानकर अगर फेंकना ही किसी का उद्देश्य हो तब भगतसिंह भी 80 साल पुराने हो चुके हैं और उन्हें भी हमें हमेशा के लिए दफना देना चाहिए!
आज हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी नहीं, अंग्रेजी है। मैं यह बात होशोहवास में कह रहा हूं। हमारे देश में जब आप किसी के घर जाते हैं तो वहां बच्चों के माता-पिता क ख ग सुनाने को नहीं कहते, बच्चा ए बी सी डी अगर सुनाता है तब उनके कलेजे को ठंढक पड़ती है। अगर कोई ग्रामीण क्षेत्र का बच्चा अपने रिश्तेदार के यहां शहर जाता है और वह अच्छी अंग्रेजी नहीं जानता तो उसे मानसिक परेशानी और कुंठा का शिकार होना पड़ता है और फिर टूटी-फूटी ही सही लेकिन अंग्रेजी का उपयोग अपने दैनिक जीवन में वो शुरु कर देता है। इस देश में एक खासियत ये है कि यहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। हर भाषा के अपने-अपने तर्क और पक्ष हैं लेकिन भगतसिंह के अनुसार समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक साहित्य, एक आदर्श और एक राष्ट्र बनाना पड़ेगा; परन्तु समस्त एकताओं से पहले एक भाषा का होना जरुरी है ताकि हम एक-दूसरे को भली-भांति समझ सकें। एक पंजाबी और एक मद्रासी इकट्ठे बैठकर केवल एक दूसरे का मुंह ही न ताका करें, बल्कि एक दूसरे के विचार तथा भाव जानने का प्रयत्न करें, परन्तु यह पराई भाषा अंग्रेजी में नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की अपनी भाषा हिन्दी में। भाषा के लिए आखिर इतना जोर क्यों? भाषा ही हमारे बीच एक ऐसी माध्यम है जिसके सहारे हम एक दूसरे से सम्पर्क करते हैं। अपनी भाषा हम क्यों इस्तेमाल करें यह प्रश्न जिसके दिमाग में आता है उसे सोचना चाहिए क्या किसी देश ने अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा से अपना विकास किया है या नहीं। भगतसिंह ने हिन्दी को सर्वांगसम्पूर्ण लिपि वाली भाषा कहा है।  यहां हम यह बता दें कि हिन्दी क्यों और कैसे अंग्रेजी से आसान और बेहतर है और कैसे यह भगतसिंह के बात को सच साबित करती है?
1)      हिन्दी के पास नये-नये शब्द बनाने की अपार क्षमता है अंग्रेजी के पास नहीं। तो हमारी हिन्दी में तो हर चीज के लिए बनायी जा सकती है।
2)      हिन्दी के पास जितने वर्ण हैं उनमें संसार की लगभग सभी भाषाओं के शब्दों के उच्चारण की क्षमता है।
3)      जैसे लिखे वैसे पढे ऐसी तो बहुत ही कम भाषाएं हैं उनमें से हिन्दी है। जर्मन, फ्रेंच और अंग्रेजी जैसी भाषाएं ऐसी नहीं हैं कि हम जो लिखें वहीं पढे। कुछ शब्द जैसे Manager जर्मन में मैनेजर पढा ही नहीं जाता।
4)      तमिल में वर्णों के वर्ग में कुछ वर्ण होते ही नहीं। जहां तक मुझे याद है तमिल में गांधी को कांधी लिखना पड़ता है। बांग्ला में लक्ष्मी लिखते हैं पढ़ते हैं लोखी। भगतसिंह के अनुसार एक बार एक अनुवादक ने ॠषि नचिकेता को उर्दू में लिखा होने से नीची कुतिया समझकर ए बिच आफ लो ओरिजिन अनुवाद किया था। इसमें दोष उर्दू भाषा और लिपि का था। उन्हीं के अनुसार पंजाबी में हलन्त और संयुक्ताक्षर के अभाव के कारण बहुत सारे शब्दों को ठीक से नहीं लिखा जा सकता है। चीनी की तो महिमा ही अपार है। वहां तो हर शब्द के लिए ही चिन्ह निश्चित किये गये हैं। उनमें शायद नये शब्दों को लिखने के लिए चिन्ह ही नहीं हैं। हमारे यहां अंग्रेजी पढ़ते समय बच्चों को अलग से याद कराना पड़ता है कि ये शब्द साइलेंस वाले हैं।
5)      अंग्रेजी में एक होता है Article जिसका स्थान हिन्दी में है ही नहीं। ठीक इसी तरह से कैपिटल और स्माल अल्फाबेट्स का भी ध्यान लिखते समय रखना पड़ता है। लोग कहते हैं हिन्दी में वर्ण ज्यादा हैं तो क्या अंग्रेजी में लिखने के तरीकों को मिलाकर 104(26*2*2)  अल्फाबेट्स नहीं हैं।  और वर्ण ज्यादा होने का ही फायदा है कि हम अधिकांश भाषाओं के शब्द हिन्दी में सुनकर लिख सकते हैं।
6)      एक विषय है विशेषण। अंग्रेजी में तो लम्बा-चौड़ा अध्याय है। साथ ही याद रखना पड़ता है कि किस शब्द का रूप अब क्या होता है। हिन्दी में तत्सम शब्दों के साथ तर या तम लगाने से ही काम खत्म। अगर शब्द तत्सम नहीं है तब उससे या सबसे जोड़ लीजिये और हो गया काम। जैसे- सुंदर से सुंदरतर या सुंदरतम और खराब से उससे खराब या सबसे खराब।
7)      एक भयानक अध्याय है Preposition शायद अंग्रेजी का सबसे ज्यादा बड़ा और पूरा नहीं हो सकने वाला अध्याय। अब हिन्दी में देखते हैं। Over, On, At आदि का झंझट ही नहीं। अगर उपर है तो बस उपर है।
8)      चाय बनाना, सवाल बनाना, दाढ़ी बनाना, खाना बनाना, मूर्ख बनाना, घर बनाना, सामान बनाना आदि के लिए To prepare tea, to solve, to shave, to cook food, to make fool, to build, to manufacture, to create इस्तेमाल किये जाते हैं। अब देखिए हिन्दी में बनाना मतलब बनाना, क्या बना रहे हैं इसको अलग से याद रखने का कोई काम नहीं।
9)      हमारे यहां या किसी भी सभ्यता में आदर का होना आवश्यक है। अंग्रेजी में He was a teacher. थे या था पता नहीं। Suman is going. लड़का है या लड़की पता नहीं। You तुम है या आप कुछ पता नहीं। लिंग के मामले में भी अंग्रेजी कुछ खास नहीं। आदर की कोई भावना ही नहीं है अंग्रेजी में। फिर यह सभ्य कैसे हो गयी?
10)  अपवादों की बात करें तो जिस भाषा में अपवाद कम हों वह उतनी ही अच्छी या वैज्ञानिक भाषा होती है।
11)  एक बार मेरे एक शिक्षक ने कह दिया कि अंग्रेजी में सुंदर के लिए बहुत सारे शब्द हैं जैसे- नाइस, ब्यूटीफुल, फाइन आदि। मैंने कहा कि हिन्दी में पर्यायवाची शब्दों को देख लें तो पता चले। किसी-किसी शब्द के सौ से ज्यादा अर्थ हैं। इस मामले में अंग्रेजी हिन्दी से ज्यादा कैसे समृद्ध हो गयी। एक शब्द है- सारंग या हरि इनके अर्थ देख लें तो पता चले कि एक शब्द के लिए हमारे पास कितने शब्द हैं।
12)  अनुवाद के मामले में भी अंग्रेजी बहुत गरीब भाषा है। जैसे सरकार सड़क बनवाती है का अंग्रेजी होता है कि सरकार बनी हुई सड़क प्राप्त करती है। यानि प्रेरणार्थक क्रियाओं के मामले में भी हिन्दी निर्विवाद अंग्रेजी से ज्यादा समृद्ध है।
13)  जिस तकनीक की भाषा का हम शोर मचाते हैं उसमें तो अधिकतर शब्द लैटिन, जर्मन आदि से लिए गए हैं। रासायनिक तत्वों के नाम तो कुछ ही अंग्रेजी के होंगे या नहीं भी होंगे। इस तरह से रसायनशास्त्र तो अंग्रेजी ने उधार के शब्दों से चला रखे हैं।
14)  एक Question Tags होता है जिसे सबको पढना पड़ता है लेकिन हिन्दी में इसके लिए कोई माथा पच्ची नहीं करनी होती।
15)  छंद, रस या अलंकार के मामले में तो हिन्दी का कोई जोड़ ही जल्दी नहीं मिलेगा। कविता लिखने के इतने तरीके हैं हिन्दी में कि आप सारे में लिख ही नहीं पायेंगे।
16)  भाषा सीखने के लिए शब्द और व्याकरण हम ये ही दो चीजें सीखते हैं। व्याकरण तो मैंने बता दिया। शब्दों के मामले में संयुक्त शब्दों को बनाने की या इस्तेमाल करने की परंपरा या जो छूट हिन्दी में है वो कभी अंग्रेजी देती ही नहीं। हम बहुत सारे शब्द हिन्दी में बिना जाने भी प्रयोग कर सकते हैं अगर हिन्दी के शब्दों से हमारा थोड़ा भी अच्छा परिचय हो लेकिन अंग्रेजी में एक-एक शब्द सीखना पड़ता है तब जाकर हम अंग्रेजी सीखते हैं। ऐसा नहीं कि हर जगह अंग्रेजी कमजोर ही है बहुत जगह उसमें भी कुछ चीजें आसान हो जाती हैं।
17)  नियमों के मामले में जिस भाषा के नियमों की संख्या जितनी कम हो उसे उतना ही सरल या आसान माना जायेगा। इस हिसाब से ये बताने की जरुरत नहीं कि हिन्दी में अंग्रेजी से कम नियम होते हैं या ज्यादा।
ये कुछ बातें जो अभी याद आईं मैंने लिखीं। अगर किसी भाषा की सरलता को जानना हो तो सबसे आसान और कारगर उपाय यह है कि हम किसी ऐसे आदमी से दूर-दूर तक जो हिन्दी और अंग्रेजी नहीं जानता उसे दोनों भाषाएं सिखाने के बाद देख सकते हैं कि कौन सी भाषा जल्दी सीखी जा सकती है। फिर भी हर जगह युवक स्पीकिंग कोर्स करते हुए पाए जाते हैं। वहां उन्हें 100 दिन में, 3 महीने, 4 महीने या 6 महीने में धाराप्रवाह अंग्रेजी सीखायी जाती है। यह एक बहुत बड़ा सच है कि कोई भी भाषा कठिन परिश्रम के बाद ही आती है न कि कुछ दिन हाय, हेल्लो, गुड मार्निंग, बाय आदि के इस्तेमाल से। आप चाहे कितनी भी अच्छी हिन्दी जानते हों आपसे कोई हिन्दी सीखने नहीं आता लेकिन एक नौसिखिये से अंग्रेजी सीखने के लिए भीड़ लग जाती है। कोई भी हिन्दुस्तानी बिना अपनी मातृभाषा में सोचे अपनी बात अंग्रेजी में तो कहता नहीं फिर सीधे हिन्दी में ही क्यों न कही जाय। दक्षिण के लोगों के लिए इतना ही कहना है कि जब वे अंग्रेजी सीखकर दूसरे राज्यों से सम्पर्क कर सकते हैं तब हिन्दी सीखकर क्यों नहीं। हिन्दी इसलिए कि यह भाषा भारत में लगभग 80 करोड़ लोग जानते, समझते, बोलते , पढते या लिखते हैं। क्या हमें यह याद नहीं करना चाहिए कि सात लाख बत्तीस हजार क्रांतिकारियों ने अपनी जान अंग्रेजों को भगाने के लिए दी थी और हम उसी अंग्रेजों की अंग्रेजी को अपने घर में आदर के साथ बिठाये हुए हैं।
      न्याय शास्त्र पर भारत में बहुत पहले से किताबें लिखी जाती रही हैं फिर भी हम न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी रखे हुए हैं। अंतर्राष्ट्ररीय स्तर पर हमारे देश का नाम शायद दुनिया में एक अनोखा उदाहरण है जिसे हम अपने देश की भाषा में नहीं बल्कि अंग्रेजी में रखे हुए हैं यानि इंडिया। हमारे देश का नाम भारत होना चाहिए था लेकिन अंग्रेजों की मानस संतानें हमारे देश में आज भी हैं। दुनिया में दो सौ से ज्यादा देश हैं। एक हमारा ही काम अंग्रेजी के बिना नहीं चलता। लगभग 10-12 देशों के अलावे अंग्रेजी किसी भी देश वह स्थान नहीं रखती जो हमारे देश में रखती है। जर्मनी, फ्रांस, रूस, जापान आदि देश क्या अपनी भाषाओं के दम पर आज सब कुछ नहीं कर रहे? फिर हमारे देश में अंग्रेजी का कुत्ता क्यों सबको काटे जा रहा है? अगर अंग्रेजी जानने भर से ही कोई नौकरी पा लेता तो क्या इंग्लैंड में कोई भी गरीब नहीं, भिखारी नहीं। गणित और विज्ञान के क्षेत्र में रूस का स्थान आप से छुपा नहीं है फिर भी हम क्यों अंग्रेजी के पिछलग्गू बने हुए हैं? अर्थशास्त्र भी चाणक्य के जमाने से है फिर भी हमें अंग्रेजी में अर्थशास्त्र क्यों पढाया जाता है? हमारे हिन्दी में जब यह खासियत है कि वह अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने में मिला लेती है तब भी हमें विकलांग भाषा की जरुरत क्यों होनी चाहिए? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जगदीश चंद्र बसु के सारे शोध-पत्र बांग्ला में लिखे गये थे। हमें अपनी भाषा का इस्तेमाल करना ही होगा वरना एक दिन भाषायी रूप से हम सौ प्रतिशत अंग्रेजी के गुलाम हो जायेंगे।
      हमारे यहां बिहार में दूरदर्शन पर उर्दू समाचार सवा सात बजे से प्रसारित किया जाता है। मैं हमेशा देखता हूं कि जिस शब्द का उर्दू में अभाव है उसे अंग्रेजी में कहा जाता है जैसे कार्यक्रम को प्रोग्राम। ऐसे अनेक शब्द हैं जिनके लिए अंग्रेजी के शब्द इस समाचार में इस्तेमाल किये जाते हैं। ऐसी भाषायी कट्टरता बिल्कुल ठीक नहीं है। जब हम हिन्दी में हरेक वाक्य में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल करते हों, हमारी फिल्मों की भाषा हिन्दी नहीं हिन्दी-उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी हो तब इन उर्दू वालों की समझ पर दुख होता है। किसी भी तरह की संकीर्णता या कट्टरता का विरोध होना चाहिए। यह हमारे देश के लिए घातक है।
      भारत एक ऐसा देश है जहां हमें तब अच्छा समझा जाता है, विद्वान समझा जाता है जब हमारे घरों में अंग्रेजी की किताबें हों और अंग्रेजी अखबार आता है लेकिन अन्य देशों में लोगों को तब सभ्य समझा जाता है जब उनके घरों में उनके अपनी भाषा की किताबें हों और उनकी भाषा का अखबार हर दिन आता हो। आंकड़े कहते हैं कि अंग्रेजी भाषा के कारण लाखो-करोड़ों बच्चे पढाई बीच में ही छोड़ देते हैं। फिर भी हम क्यों कुछ करोड़ लोगों के लिए ही सोचते हैं और अंग्रेजी को सब कुछ बनाने पर तुले हुए हैं। आज भी गांवों में लगभग 90 करोड़ लोग रहते हैं। आप चले जाइए और अंग्रेजी का एक छोटा सा अनुच्छेद उन्हें पकड़ा दीजिए और कहिए कि इसका अर्थ वे अपनी भाषा में बता दें तो मेरा दावा है कि कुछ गांवों को छोड़कर सारे गांवों में एक-दो आदमी भी ऐसा नहीं मिलेगा। पूरे भारत में दो करोड़ लोग भी ठीक से अंग्रेजी नहीं समझते-जानते हैं। हमारे देश का इतिहास या और किसी भी विषय की पाठ्यपुस्तक का मूल अंग्रेजी में लिखा जाता है फिर उसे हिन्दी में अनूदित करके छापा जाता है और इस अनुवाद के दौरान ऐसी मूर्खता भरी गलतियां की जाती हैं कि कभी-कभी शब्दों को समझना शिक्षकों के लिए भी बहुत कठिन हो जाता है। अपनी भाषा के प्रति कोई सम्मान अधिकांश लोगों में  है ही नहीं। लेकिन हमारी सरकार जब किताब छापती है तब भगतसिंह को आतंकवादी करार दिया जाता है। ऐसी महान सरकार के सरदार जी जैसे प्रधानमंत्री का हिन्दी प्रेम सभी जानते हैं। हम जानते हैं कि दुनिया की सबसे अच्छी सोच अंग्रेजी में नहीं पैदा हुई। दर्शन या साहित्य के मामले में जर्मनी, फ्रांस या रूस ही आगे हैं। वैसे भी जब अंग्रेजी को इंगलैंड की राष्ट्रभाषा बनाया जा रहा था तब ठीक वही तर्क दिये गये थे जो आज हिन्दी के विरोध में दिये जाते हैं। वहां बुद्धिमान लोगों ने कहा था कि अंग्रेजों जाहिलों, गंवारों की भाषा है। इसका विरोध किया गया था।
      एक और बहुत ही महत्वपूर्ण बात कि हमारी चिंता दुनिया के प्रति इस मामले में क्यों इतनी ज्यादा है कि हमारी बात दूसरे देश कैसे समझेंगे? जब सभी देश के नायक, राजनेता या लोग कहीं भी अपनी भाषा बोलते हैं और वे चिंता नहीं करते कि हम या कोई दूसरा उनकी बात कैसे समझेंगे तब हमें क्यों सोचना चाहिए कि वे कैसे समझेंगे? इस बात की चिंता से कोई लाभ नहीं होने वाला। एक और गम्भीर बात कि दूसरे देश अपने सारे दस्तावेज या पत्र अपनी भाषा में तैयार करते हैं तब हम अंग्रेजी में तैयार करके क्यों उन्हें बताना चाहते हैं कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था से लेकर हमारी सारी योजनाएं अंग्रेजी में हैं और इन्हें वे आसानी से समझकर इनका इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं। एक बात ध्यान दें कि सारे देशों में राजदूत या दूतावास होते हैं जो एक दूसरे की भाषा समझने में भी काम आते हैं।
      वैज्ञानिक यह बात कह चुके हैं कि संस्कृत कम्प्यूटर के लिए सबसे अच्छी भाषा है और सब जानते हैं कि हिन्दी का उद्भव संस्कृत से ही हुआ है।
      लोगों का कहना होगा कि भगतसिंह के जमाने में अंग्रेजी की हालत दूसरी थी, अब हमारी जरुरत बन गयी है अंग्रेजी। लेकिन कोई भी आदमी जरा सोचें कि सिवाय हमारी मानसिक गुलामी के अंग्रेजी की क्या और कितनी जरुरत है? हिन्दी को विस्थापित करने की सोची समझी चाल के अलावे अंग्रेजी का प्रयोग क्या है? हम जरा गौर से देखें  और सोचें तब हमें पता चलेगा कि अंग्रेजी का लबादा हमने बिना मतलब के ही ओढ़ रखा है। हमारे सारे काम हिन्दी या भारतीय भाषाओं से चलते हैं या चल सकते हैं। अंग्रेजी तो सिर्फ़ नौटंकी के लिए रखी गयी है। अंग्रेजी की आवश्यकता तो ऐसे बतायी जाती है जैसे खाना से लेकर सोना तक इसके बिना होगा ही नहीं। यानि अंग्रेजों के आने के पहले भारत में लोग कुछ करते ही नहीं थे। अगर हरेक आदमी अंग्रेजी पढने लगे तो ऐसा लगता है कि सारे लोग अमेरिका और इंग्लैड में ही नौकरी करेंगे। अगर विदेशों से या विदेशियों से बात करने की जरुरत होती है तो कितने लोगों की आवश्यकता है? क्या पूरे देश को ब्रिटेन की महारानी से मिलना है? हमें किसी भी निजी या सरकारी कार्यालय में हाथ पर गिनने लायक कर्मचारी मिलेंगे जिनको अंग्रेजी में बात करने की जरुरत है? एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक कम्पनी है भारत में जिसमें कुल 10000 लोग काम करते हैं। तो इन 10000 लोगों में सिर्फ़ 2-4 या पांच को ही अंग्रेजी के इस्तेमाल की जरुरत(बनावटी जरुरत, मैं नहीं मानता कि यह जरुरी है) होती है तब क्यों सारे देश को अंग्रेजी के कुत्ते से कटवाने पर हम तुले हुए हैं?
      सवाल सिर्फ़ भाषा का नहीं, हमारे अपने स्वाभिमान,शहीदों के सम्मान, राष्ट्रीय अस्मिता का भी है। इसलिए हम अंग्रेजी का विरोध करते हैं। आगे यह बात भी आयेगी अंग्रेजी सीखने के पीछे लोगों की मानसिकता क्या होती हैं?
      अब सवाल है साहित्य का। भगतसिंह के जेल की डायरी में लगभग 43 लेखकों और 100 से ज्यादा किताबों का जिक्र आया है। यानि भगतसिंह युवावस्था में ही किताबों और साहित्य के प्रति रुचि रखते थे और भरपूर अध्ययन भी करते थे। क्योंकि उन्हें मालूम था कि भाषा को जानने के बाद अध्ययन ही वह रास्ता है जो हमें चिंतन के उन सारे घरों से हमारा परिचय कराता है जो बहुत समय लगाने के बाद, बहुत सोचने के बाद और लम्बे और कठिन मानसिक परिश्रम से बनाया गया है। उन्होंने इतनी कम उम्र में ही दुनिया के लगभग सभी प्रमुख लोगों को पढा जो उस समय चेतना और चिंतन संसार में छाये हुए थे जैसे- मार्क्स, लेनिन, टाल्स्टाय, गोर्की आदि। अध्ययन और लेखन से उनका गहरा नाता रहा है। वे हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाएं अच्छी जानते थे। वे कभी बलवंत तो कभी विद्रोही नाम से भी लिखा करते थे। इन नामों की वजह से हो सकता है कि अभी भी उनका लिखा बहुत कुछ प्रकाश में नहीं आया हो। यहां सवाल है कि आज के युवा अध्ययन और साहित्य का कितना महत्व समझते हैं? इस विषय पर थोड़ा विचार करते हैं।
      भगतसिंह का मानना था कि किसी भी देश या समाज का साहित्य ही उसकी धरोहर है। और इसलिए साहित्य का संरक्षण और संवर्धन रुकना नहीं चाहिए। हम खुद सोचें कि आखिर हम अपने बीते कल को कैसे जानते हैं या भगतसिंह को ही कैसे जानते हैं? सीधा सा उत्तर है किताबों से। मौखिक जानकारी के साथ छेड़छाड़ होने की उम्मीद ज्यादा आसान होती है। वैसे यह छेड़छाड़ किताबों के साथ भी मुश्किल नहीं। लेकिन मौखिक चीजों को बचाकर रखना किताबों या साहित्य की तुलना में बहुत कठिन होता है। मानव ने अपने विकास के मार्ग में कौन-कौन से रोड़े देखे या क्या-क्या पाया चाहे वह विज्ञान की उपलब्धि हो, इतिहास या गणित की हो चाहे कला, संगीत आदि की हो इन सारे चीजों को साहित्य और किताबें ही बचाकर रखती हैं। लेकिन अब सवाल यह है हम आज कितना साहित्य पढते हैं? कितनी किताबें पढी जाती हैं? युवाओं के पास जवाब है कि उन्हें समय नहीं मिलता, फिल्म देखना है, रोमांस करना है, कोर्स और पढाई पर ध्यान देना है, टीवी, रेडियो या फिर इंटरनेट भी हैं, मोबाइल जैसा असुर भी है ही, आखिर पढाई करें तो कैसे? अगर कोई पढता है या अध्ययन में रुचि रखता है तो उसे उसी के मित्र पढाकू, किताबी कीड़ा कहते हैं या चिढाते हैं। बात वास्तव में रुचि की है। मां-बाप बचपन से ही चाहते हैं कि स्कूल की पढाई ही सब कुछ है। नंबर लाने के लिए तो पढाई करनी होती है। शहरों में हर जगह मुझे यही लगता है कि मां-बाप बच्चों को मशीन बनाने के लिए पढा रहे हैं। ट्यूटर आता है, उससे कहा जाता है सिलेबस पूरा करा दीजिये। अगर नंबर आ गये तो बस हो गई पढाई। बहुत से लोग कहते हैं कि पढनेवाले कम नहीं हैं। कुछ का कहना है कि अब साहित्य जैसी चीज कौन पढेगा? विज्ञान पढने का जमाना है। एक बात गौर करने लायक है कि हाल के वर्षों में वैज्ञानिक कम हो रहे हैं। कमाऊ इंजीनियर ज्यादा। सभी जानते हैं कि विज्ञान नया कुछ देता है तो सिर्फ़ जिज्ञासा और खोजी स्वभाव, कठिन परिश्रम और रुचि होने से। विज्ञान का पढने का एक अच्छा उदाहरण दे रहा हूं। पटना में बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी है। अकादमी ने ऐसी किताबें छापी हैं जो दुर्लभ हैं। रसायन, गणित या भौतिकी ही नहीं चिकित्सा और अभियांत्रिकी पर हिन्दी में ऐसी-ऐसी किताबे हैं जो बहुत खोजना पड़ता है तब जाकर मिलती हैं। एक से एक देशी-विदेशी लेखकों की किताबें। लेकिन अगर वह किताब 1973 में छपी थी 1000 प्रति तो आज भी खत्म नहीं हुई और अभी भी वही संस्करण मिलता है। अब कहा जायेगा कि लोगों को मालूम नहीं है कि ऐसी किताबें मिलती हैं। तो बता दूं कि पुस्तक मेले में लाखों लोग आते हैं हर साल फिर भी उन किताबों की प्रति बची हुई ही है।
      कई धार्मिक पत्रिकाएं दस हजार से लाखों की संख्या में छपती हैं और बिकती हैं। पर साहित्य या अन्य चिंतन जैसे समाज, दर्शन आदि पर किताबें छपती हैं सैकड़ों की संख्या में और वो भी ज्यादा कीमत की। लेकिन अंग्रेजी में एक सनक चल रही है कि कोई भी नया लेखक कुछ भी लिखता है तो हजारों प्रतियां छपती हैं और बिकती भी हैं। पढनेवाले हैं तो वह बस वही लोग हैं जो उस क्षेत्र के हैं जैसे हिन्दी साहित्य का शिक्षक, लेखक या छात्र ही हिन्दी की किताबें पढते हैं। यानि हमारे युवा वर्ग में पढने की प्रवृत्ति घटी है। इसके विपरीत शोर मचाने की प्रवृत्ति बढी है। मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिला हूं जो घर, सड़क, स्कूल आदि में बिना अध्ययन किए या कुछ जाने खूब बहस करते हैं लेकिन जब कहता हूं कि यह किताब पढो या खरीदो तब बहाना शुरु हो जाता है।  ऐसा नहीं कि वो मेरे द्वारा बतायी गयी किताबों के अलावा दूसरी किताब खरीदते हैं या पढते हैं। अखबार या टीवी से छूटते ही क्रिकेट या दूसरा नशा उन्हें घेर लेता है। फिर दोस्त भी हैं। यहां तक कि अगर कोई किताब आप किसी को पढने को दें तो वह महीनों रखी रह जाती है। यानि न तो खरीदकर पढते हैं न ही किसी से मांगकर। अब सवाल पैदा होता है कि वैचारिक या मानसिक खुराक मिलेगी कैसे जो वे सोचें! इसमें अधिकांश दोष होता है मां-बाप का। बचपन से कोर्स में डुबाने का नतीजा यही होता है कि बच्चे जब युवा होते हैं तब कोर्स के अलावे, रोजगार आधारित या व्यावसायिक पढाई के अलावे वे दूसरी किताबों को बेकार समझते हैं। अगर युवा चाहते हैं कि उन्हें चिंतन के लिए अच्छा खुराक मिले तो उन्हें पढना तो पड़ेगा ही। क्योंकि किताबों में स्याही और कागज नहीं विचार होते हैं। भगतसिंह ने कहा था- क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। और विचार पढने से आते हैं। ऐसा नहीं कि पढने से ही विचार आते हैं। लेकिन जब हम पढते हैं तो समझते हैं कि हम क्या हैं और हमें क्या होना चाहिए? अगर हम किताबों को कचरा समझकर फेंक देंगे तो भविष्य का क्या होगा।
      किताबें जीवन में रोशनी का संचार करती हैं। जब आप किसी की जीवनी या विचार पढते हैं तब आप महसूस करते हैं कि वह आदमी या योद्धा या क्रांतिकारी या महापुरुष हमारे साथ है, हमारा दोस्त बन गया है। हमें जीवन के संघर्ष के दिनों में इनकी सहायता मिलती है। और कहा भी गया है कि किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त हैं। पुस्तकालयों की बुरी स्थिति के जिम्मेदार हम हैं। जब हमने वहां जाना छोड़ दिया तब उसकी हालत बिगड़ गयी। जीवन को बेहतर बनाती हैं किताबें। एक अलग समझ विकसित करती हैं किताबें। किताबें हमें बहुत बार रास्ता भी दिखाती हैं। भगतसिंह ने अपनी छोटी आयु में ही डान ब्रीन की आत्मकथा का अनुवाद किया था। और जब आप उसे पढेंगे तो लगेगा कि भगतसिंह के बहुत से विचार या कार्य उस किताब से प्रेरित हैं। भगतसिंह का एसेम्बली में बम फेंकना अनायास ही नहीं था। यह घटना फ्रांस में घटित बम फेंकने की घटना से ही प्रेरित होकर अंजाम दी गयी थी। कहा जाता कि आदमी जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। और सोचने के लिए दिमागी खुराक चाहिए। गांधी के उपर भी बहुत सी किताबों का असर पड़ा था। उन्हीं किताबों से गांधी का निर्माण होता है।
      एक बात अक्सर आप देखेंगे। जिंदा आदमी महान नहीं माने जाते। और जब आप किसी भी क्षेत्र के महान आदमी से मिलना चाहते हैं तब पता चलता है कि वह तो मर चुका है। ऐसा हमेशा नहीं लेकिन ज्यादातर होता है। तब एक ही उपाय बचता है उस आदमी की किताबें जिनमें वह अपने अनुभवों, उपलब्धियों, विचारों को समेटे रहता है। पढने के बाद ही पता चलता है कि किताबें क्यों पढी जानी चाहिए। सुभाषचंद्र बोस ने भी विवेकानंद की किताबों को पढने के बाद ऐसा ही कहा था। यहां तक सारे धर्मों के अपने अपने ग्रंथ हैं जिन्हें वे अपना आधार मानते हैं। कई बार हम पढने के नाम पर कुछ कचरे भी पढ जाते हैं। लेकिन हमें किसी चीज को पढने के बाद उसपर खुले दिमाग से सोचना चाहिए  तब जाकर उस किताब के प्रति अपनी धारणा बनानी चाहिए।
मान लीजिए कि किसी भी तरह अंग्रेजी स्पोकेन आप सीख लेते हैं। अब सीखने के बाद आप बोलेंगे क्या? बोलने के लिए ही तो सिखा था। अब इतना तो तय है कि बोलने के लिए कुछ बात चाहिए। और वह बात कहां से मिले यह फिर एक समस्या है। जवाब आसान है कि पढने से। किताबों को पढना ही भगतसिंह, सुभाष, गांधी या वैज्ञानिक बनाता है। क्योंकि हमारे आस-पास ऐसे लोग आसानी से मिलते नहीं जो सही रास्ता दिखायें तब किताबें जीवन के रास्ते में उजाला बनकर आती हैं। याद रहे आदमी मर जाते हैं, विचार जिंदा रहते हैं। अमर शहीद भगतसिंह शरीर से हमारे पास नहीं हैं लेकिन विचार से वे हमारे पास हैं। तो पढना और लिखना बिल्कुल आवश्यक है वैचारिक प्रगति के लिए। लेकिन लिखने को भी हमारे समाज और मां-बाप ने रोक दिया है। युवक तो लिखना चाहते ही नहीं। इसके पीछे कारण तलाशने पर मिलता है कि बचपन से हमने खुद से लिखना सीखा ही नहीं। शिक्षक प्रश्नों का उत्तर लिखा देते हैं। उसे रट कर परीक्षा में जाकर लिख देते हैं और इस तरह से लिखने का जो मौलिक तरीका था हम उसे मशीनी अंदाज में करते हुए अपनी प्रतिभा और सोच को छिन्न-भिन्न कर डालते हैं। 
हमें क्रांति की तलवार को विचारों की सान पर तेज करने के लिए घोर अध्ययन और चिंतन की जरुरत होती है। इसलिए पढना और लिखना आवश्यक कार्य हो जाते हैं। हमें कहानी-कविता कहकर साहित्य का अपमान नहीं करना चाहिए। जब तक हम साहित्य को समझेंगे नहीं तब तक भगतसिंह की बात हमसे कोसों दूर रहेगी। भगतसिंह कहते हैं-यह तो निश्चय ही है कि साहित्य के बिना कोई देश अथवा जाति उन्नति नहीं कर सकती, परन्तु साहित्य के लिए सबसे पहले भाषा की आवश्यकता होती है।
भगतसिंह साहित्य को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं यह समझने के लिए उन्हीं के शब्दों में-जिस देश के साहित्य का प्रवाह जिस ओर बहा, ठीक उसी ओर वह देश भी अग्रसर होता रहा। किसी भी जाति के उत्थान के लिए ऊंचे साहित्य की आवश्यकता हुआ करती है। ज्यों-ज्यों देश का साहित्य ऊंचा होता जाता है, त्यों-त्यों देश भी उन्नति करता जाता है। देशभक्त, चाहे वे निरे समाज-सुधारक हों अथवा राजनीतिक नेता, सबसे अधिक ध्यान देश के साहित्य की ओर दिया करते हैं। यदि वे सामाजिक समस्याओं तथा परिस्थितियों के अनुसार नवीन साहित्य की सृष्टि न करें तो उनके सब प्रयत्न निष्फल हो जाएं और उनके कार्य स्थाई न हो पाएं।
भगतसिंह कहते हैं कि रूसो और वाल्टेयर के साहित्य के बिना फ्रांस में तथा कार्ल मार्क्स, मैक्सिम गोर्की, टाल्स्टाय के साहित्य के बिना रूस में क्रांति नहीं हो पाती। इन लेखकों ने वर्षों तक लिखा तब जाकर इनके लेखन ने क्रांति में अपनी अहम भूमिका निभायी। इसलिए युवकों को चाहिए कि वे साहित्य पर ध्यान दें, साहित्यिक रचनाएं पढ़ें और खुद भी हो सके तो रचें। लेखक बहुत परिश्रम से लिखता है, काफी सोचने के बाद लिखता है फिर हमें उन्हें बेकार नहीं जाने देना चाहिए। क्या प्रेमचंद को पढने से हमें उस समय के समाज का पता नहीं चलता? हमें अच्छी रचनाएं जरुर पढनी चाहिएं। इससे हमारे समय का सदुपयोग भी होता है।

क्या सचमुच गाने लायक है हमारा राष्ट्रगान (श्रुतिलेख)

टिप्पणी करे

राजीव दीक्षित से मेरा पहला परिचय हाल ही में इंटरनेट के माध्यम से हुआ। मैं उनसे और उनके अंग्रेजों के समय के इतिहास की और भारत की गुलामी से पूर्व की स्थिति पर इतिहास की जानकारी से प्रभावित हुआ। उनका जन्म 1967 में उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे आई आई टी के छात्र, फ्रांस में इंजीनियर और वैज्ञानिक भी रहे। कलाम के साथ भी काम किया। आजादी बचाओ आंदोलन के प्रणेता रहे। अल्पायु में ही 2010 में उनकी मृत्यु हो गयी। बाद में वे योग वाले बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान आंदोलन के सचिव रहे और इस आंदोलन के दौरान कई बेहद महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए। उनके कुछ व्याख्यान मैंने सुने और सुन रहा हूं। फिर सोचा कि इन व्याख्यानों को शब्द में बदल दिया जाय तो सबसे पहला श्रुतिलेख आपके सामने है। यह व्याख्यान सबसे छोटा था (19 मिनट 45 सेकेंड का) इसलिए शुरुआत इससे ही कर रहा हूं। यह काम बहुत कठिन है। कम से कम मेरे लिए तो बहुत श्रमसाध्य है। फिर भी मैंने इसे सुनकर ज्यों का त्यों एक -एक शब्द लिखा है। भारतीयता और भारत को समझने में उनके व्याख्यानों से मदद मिलती है। अब आपको राजीव के व्याख्यान पढने को मिलते रहेंगे। यह व्याख्यान कब का है, कहां दिया गया, मुझे नहीं मालूम। इस व्याख्यान में आनंदमठ और गीतांजलि की बात आयी है। इसलिए इन दोनों को डाउनलोड करने के लिए लिंक दे रहा हूं।

एक लिंक यह भी है इससे संबंधित।
-चंदन कुमार मिश्र
जन गण मन और वंदे मातरम् की कहानी
व्याख्यान: राजीव दीक्षित
“………उन्होंने इस गाने को लिखा। लिखने के बाद सात साल लगे। उसके बाद ये गाना लोगों के सामने आया। क्योंकि उन्होंने जब ये गाना लिखा, उसके बाद एक उपन्यास लिखा उसका नाम था- आनंदमठ। उसमें इस गीत को डाला। वो उपन्यास छपने में सात साल लगे। अठारह सौ बयासी में ये आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा बना- वंदे मातरम्। और उसके बाद जब लोगों ने उस उपन्यास को पढ़ा तो इसका अर्थ पता चला कि वंदे मातरम् क्या है? आनंदमठ उपन्यास बंकिम चन्द्र चटर्जी ने लिखा था अंग्रेजी सरकार के विरोध में और अंग्रेजी सरकार को सहयोग करने वाले उन राजा-महाराजाओं के विरोध में जो किसी भी जाति और सम्प्रदाय के हों लेकिन अंग्रेज सरकार को सहयोग करते हों। फिर उसमें उन्होंने बगावत की भूमिका लिखी और ये कहा कि अब बगावत होनी चाहिए, विद्रोह होना चाहिए ताकि इस अंग्रेजी सत्ता को हम पलट सकें। और इस तरह से वंदे मातरम् को सार्वजनिक गान बनना चाहिए- ये उन्होंने घोषित किया। उनकी एक बेटी हुआ करती थी, बंकिम चन्द्र चटर्जी की, जिसका अपने पिताजी से बहुत मतभेद था। मतभेद किस बात पर था? उनकी बेटी कहती थी कि आपने वंदे मातरम् लिखा है, इसके शब्द बहुत क्लिष्ट हैं। और बोलने और सुनने वाले की ही समझ में नहीं आयेंगे। तो गीत को आप ऐसा सरल बनाइए जो बोलनेवाले और सुननेवाले को समझ में आए। तो उस समय बंकिम चन्द्र चटर्जी ने कहा कि देखो आज तुम्हें लगता है कि ये क्लिष्ट है लेकिन मेरी बात याद रखो थोड़े दिन के बाद ये गान भारत के हर नौजवान के होठों पर होगा। हर क्रांतिवीर की प्रेरणा बनेगा। उसके बाद हम सब जानते हैं कि ये घोषणा करने के लगभग बारह साल के बाद चटर्जी जी का स्वर्गवास हो गया। वो जीवित नहीं रहे। बाद में उनकी बेटी और परिवार के लोगों ने ये जो आनंदमठ पुस्तक की, जिसमें ये गान था, इसका बड़े पैमाने पर प्रचार किया। वो पुस्तक पहले बांग्ला में बनी। फिर बाद में उसका मराठी हुआ, हिन्दी हुआ, तमिल, तेलगू, कन्नड़ बहुत सारी भाषाओं में छपी और उस पुस्तक ने क्रांतिकारियों में जोश भरने का काम किया। उस पुस्तक में क्या था- ये पूरी व्यवस्था का विरोध करें क्योंकि ये विदेशी है, आततायी है। ऐसा वो सब था। उसमें बहुत सारी ऐसी जानकारियां थीं जो लोग सुनकर उबलते थे, जानकर उबलते थे। अंग्रेजी सरकार ने बार-बार इस पुस्तक पर पाबंदी लगायी, कई बार इसके बहुत सारे अंश काट-छांट दिये। कई बार इसको जलाया गया। लेकिन पुस्तक की मूल प्रति किसी -न-किसी रूप में सुरक्षित रही। तो ये आगे बढ़ती रही। 1905 में अंग्रेजों की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया। एक अंग्रेज अधिकारी था- कर्जन। उसने बंगाल को दो हिस्सों में बांट दिया। एक पूर्वी बंगाल, एक पश्चिमी बंगाल। पूर्वी बंगाल था मुसलमानों के लिए और पश्चिमी बंगाल था हिन्दुओं के लिए। हिन्दू और मुसलमान के आधार पर ये भारत का पहला बंटवारा था। तो भारत के कई सारे ऐसे लोग जो जानते थे कि आगे क्या हो सकता है, उन्होंने इस बंटवारे का विरोध किया। और बंग-भंग के विरोध में एक आंदोलन शुरु हुआ। इस आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता थे- लाला लाजपत राय जो उत्तर भारत में थे, विपिन चन्द्र पाल जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतृत्त्व करते थे और लोकमान्य बाल गांगाधर तिलक जो पश्चिम और मध्य भारत के बड़े नेता थे। इन तीनों नेताओं ने अंग्रेजों के बंग-भंग सॉरी अंग्रेजों के बंगाल विभाजन के खिलाफ आंदोलन शुरु किया। और इस आंदोलन का एक हिस्सा था- अंग्रेजों भारत छोड़ो, अंग्रेजी सरकार से असहयोग करो, अंग्रेजी कपड़े मत पहनो, अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करो। और दूसरा हिस्सा था पाजिटीव कि भारत में स्वदेशी का निर्माण करो, स्वदेशी के पथ पर आगे बढ़ो। लोकमान्य तिलक ने इस आंदोलन को अपने शब्दों में स्वदेशी आंदोलन कहा। अंग्रेजी सरकार इसको बंग-भंग विरोधी आंदोलन के नाम से कहती रही। लोकमान्य तिलक कहते थे ये हमारा स्वदेशी आंदोलन है। ये छ: साल चला। इस आंदोलन की ताकत इतनी थी कि अंग्रेजों के खिलाफ जो उन्होंने कहा वो पूरे भारत ने स्वीकार कर लिया। जैसे उन्होंने एक ऐलान किया कि अंग्रेजी कपड़े खरीदना बंद करो, करोड़ों भारतवसियों ने अंग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर दिया। और उसी समय भले हिन्दुस्तानी कपड़ा मिले, मोटा मिले, खादी का मिले वही पहनना है। फिर उन्होंने कहा -अंग्रेजी ब्लेड का बहिष्कार करो तो भारत के लाखों नाईयों ने अंग्रेजी ब्लेड से दाढ़ी बनाना बंद कर दिया, वो उस्तरा हिन्दुस्तान में वापस लौट आया। फिर लोकमान्य तिलक ने कहा -अंग्रेजी चीनी खाना बंद करो क्योंकि शक्कर उस समय इंग्लैड से बनकर आती थी, भारत में गुड़ बनता था। तो हजारों लाखों हलवाईयों ने गुड़ डालकर मिठाई बनाना शुरु कर दिया। फिर उन्होंने अपील किया कि अंग्रेजी कपड़े से और अंग्रेजी साबुन से अपने घर को मुक्त करो तो हजारों लाखों धोबियों ने अंग्रेजी साबुन से कपड़े धोना बंद कर दिया। फिर उन्होंने पुरोहितों को कहा कि आप शादी कराओ अगर लड़के-लड़कियों की तो उनके शरीर पर अंग्रेजी वस्त्र न हों तभी शादी कराओ। अगर वो अंग्रेजी वस्त्र पहनकर शादी करें तो शादियों का बहिष्कार करो। तो पुरोहित समाज ने सूट-पैंट-टाई पहनने वाले दूल्हों का बहिष्कार कर दिया। इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला। छ: साल के अंदर अंग्रेजी सरकार घबड़ा गई क्योंकि उनका माल बिकना बंद हो गया। ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चौपट हो गया। तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज सरकार पर दबाव डाला कि हमारा तो सारा धंधा ही खतम हो गया है भारत में। अब हमको कुछ भी उपाय नहीं है। आप इन भारतवासियों की मांग को मंजूर करो तो मांग क्या थी? एक मुख्य मांग थी कि बंगाल का जो बंटवारा किया है हिन्दू-मुसलमान के आधार पर ये वापस करो। हमें संप्रदाय के आधार पर बंटवारा नहीं चाहिए। और आप जानते हैं कि अंग्रेजों की सरकार ने झुकना स्वीकार किया और 1911 में डिवीजन आफ बंगाल ऐक्ट कानून वापस लिया गया और बंगाल को फिर से एक किया गया। तब लोकमान्य तिलक को ये समझ में आ गया कि अगर अंग्रेजों को झुकाना है तो इनका बहिष्कार ही सबसे बड़ी उपाय है और ताकत है। ये छ: साल जो आंदोलन चला 1905 से 1911 इस आंदोलन का मूल मंत्र था – वंदे मातरम्। ये जितने कार्यकर्ता थे लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चन्द्र पाल के साथ काम करनेवाले उनकी संख्या एक करोड़ बीस लाख से ज्यादा थी। वो हर कार्यक्रम में वंदे मातरम् का उद्घोष करते थे। कार्यक्रम के ही शुरुआत में वंदे मातरम् गाते थे। कार्यक्रम के अंत में भी वंदे मातरम् गाया जाता था। बाद में क्या हुआ कि 1911 में लोकमान्य तिलक और इन सब लोगों के दबाव में और बंगाल में इतना जबरदस्त आंदोलन हो गया उसके दबाव में अंग्रेजों की सरकार ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट कर दिया। अंग्रेजों को ऐसा लगता था कि अब हम कलकत्ता में सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि बंगाल इस आंदोलन का केंद्र था। तो उन्होंने अपने को सुरक्षित करने के लिए कलकत्ता से भागकर दिल्ली में शरण ली और 1911 में दिल्ली भारत की राजधानी बन गयी। उसके बाद अंग्रेजों ने एक दूसरा काम किया कि भारत के लोगों को शांत करने के लिए जो अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह से भरे हुए थे। अंग्रेजी राजा को भारत में आमंत्रित किया। जार्ज पंचम भारत में आया सन 1911 में। और जब जार्ज पंचम भारत में आया तो इन अंग्रेज अधिकारियों ने जार्ज पंचम के स्वागत के लिए एक गीत लिखवाया। और उस गीत का नाम है -जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्यविधाता। क्योंकि इस गीत के सारे के सारे शब्द अंग्रेजी राजा जार्ज पंचम की स्तुति का गान हैं। जन गण मन अधिनायक, अधिनायक माने सुपरहीरो। भारत की जनता है, भारत के जो लोग हैं उनके तुम सुपरहीरो, तुम्हारी जय हो। माने कौन? – जार्ज पंचम। इस गीत को जिन्होंने लिखा वो थे श्री रवींद्रनाथ टैगोर। और रवींद्रनाथ टैगोर की लिखी हुई एक चिट्ठी मेरे पास है जो कभी समय आने पर मैं टीवी चैनल के माध्यम से पूरे देश को दिखाने वाला हूं। उस चिट्ठी में उन्होंने अपने बहनोई को लिखा है जो थे सुरेंद्रनाथ बनर्जी और लंदन में रहते थे। आई सी एस आफिसर थे। उनको उन्होंने लिखा है कि ये गीत मेरे उपर अंग्रेज अधिकारियों ने दबाव डलवाकर लिखवाया है, वंदे मातरम् के पैरेलल। क्योंकि उस समय भारत में हर जगह उद्घोष था  वंदे मातरम् का। हर क्रांतिवीर गाता था वंदे मातरम्। और इस वंदे मातरम् को और ज्यादा लोकप्रियता तब मिली जब भारत का सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी खुदीराम बोस फांसी के फंदे पर चढ़ा तो वंदे मातरम् कहते हुए चढ़ा। उसके बाद तो सभी क्रांतिकारियों ने इसको बना लिया कि फांसी पर जायेंगे तो वंदे मातरम् गायेंगे। वो चाहे भगतसिंह हो चाहे आशफाक उल्ला हो चाहे उधम सिंह हो चाहे शचींद्रनाथ सान्याल हों चाहे कोई भी हो। सब ने फांसी पे चढ़ने को स्वीकार किया वंदे मातरम् के घोष से। अंग्रेजों को इससे बहुत चिढ़ होती थी। तो अंग्रेजों का ये कहना था कि इसके पैरेलल कोई गाना प्रचारित किया जाय। और उस समय 1911 में आपको मैं ऐतिहासिक जानकारी दे रहा हूं कि रवींद्रनाथ टैगोर का परिवार अंग्रेजों के बहुत नजदीक था। रवींद्रनाथ टैंगोर के परिवार के ज्यादा लोगों ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी में काम किया। उनके बड़े भाई जो अवनींद्रनाथ टैगोर थे वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के बहुत सालों तक कलकत्ता डिविजन के डायरेक्टर रहे। काफी पैसा उनके परिवार का ईस्ट इंडिया कम्पनी में लगा था। तो अंग्रेजों से बहुत सहानुभूति थी- रवींद्रनाथ टैंगोर की। ये सहानुभूति खतम हुई 1919 में जब जलियांवाला बाग हत्या कांड हुआ। और गांधी जी ने रवींद्रनाथ टैगोर को गाली देते हुए कहा कि अभी भी तुम्हारी आंखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरता तो कब उतरेगा? तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए? तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए? आप जानते हैं 1911 में ये गान जब लिख दिया तो उन्होंने अपने बहनोई को कहा कि ये गान तो मैंने अंग्रेजों के कहने पर लिखा है। शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इसलिए कृपया इसको न गाया जाए तो अच्छा है। लेकिन अंत में एक लाइन लिख दिया कि ये चिट्ठी किसी को न दिखायें क्योंकि मैं सिर्फ आप तक ये सीमित रखना चाहता हूं। कभी मेरी मृत्यु हो जाए तो जरुर सबको बताएं। 1941 में रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु हो गई। तब बनर्जी साहब की कृपा से ये चिट्ठी लोगों के सामने आई। उसकी एक कॉपी मेरे पास भी है। और उन्होंने पूरे देश को कहा कि जन गण मन को न गाया जाय। उसी बीच में कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी और एक बड़ा संगठन बन चुकी थी। कांग्रेस में जबतक लोकमान्य तिलक थे , लाला लाजपत राय थे, विपिन चंद्र पाल थे तब तक वंदे मातरम् ही गाया गया। बाद में आप जानते हैं कि लोकमान्य तिलक का कांग्रेस के नेताओं से मतभेद हुआ। और कांग्रेस के नेताओं में उनका सबसे ज्यादा मतभेद हुआ पंडित मोतीलाल नेहरु के साथ। क्योंकि मोतीलाल नेहरुजी की योजना ये थी कि अंग्रेजों के साथ कोई संयोजित सरकार बने -कोलीसन गवर्मेंट। और उसके लिए वो बार-बार कहते थे। और लोकमान्य तिलक कहते थे कि अंग्रेजों के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। तो इस मुद्दे पर मतभेद था। तो ये कांग्रेस से निकल गये। तो फिर इन्होंने एक गरम दल बनाया। तो कांग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल, एक गरम दल। गरम दल के लीडर- लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल- ये सब बड़े कांग्रेस के लीडर थे। तो ये हर जगह वंदे मातरम् गाते थे। फिर ये नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजों के साथ रहते थे। अंग्रेजों की कहना, अंग्रेजों की सुनना, उनके नजदीक जाना, उनकी मीटिंगों शामिल होना वगैरह-वगैरह् और वो हर समय अंग्रेजों से समझौते के मूड में रहते थे। तो जब 1911 में ये गाना लिख दिया तो ये नरम दल वालों ने इस गाने को गाना शुरु कर दिया। कई बार ये गरम दलवालों को चिढ़ाने के लिए गाना गाया करते थे। बाद में क्या हुआ कांग्रेस के बड़े-बड़े अधिवेशन हुआ करते थे, उनमें ये बहुत बहस होती थी- कौन सा गाना गाया जाय? तो वंदे मातरम् पर सबकी सहमति होती थी लेकिन नरम दल का छोटा-सा एक गुट था जो अंत में फिर जन गण मन गा लेता था। बाद में क्या हुआ कि ये नरम दल के कुछ खुराफाती लोगों ने एक वायरस छोड़ दिया। और वो वायरस ये छोड़ दिया कि ये मुसलमानों को नहीं गाना चाहिए। क्योंकि इसमें बुतपरस्ती है माने बुत की पूजा है। मुसलमानों को आप जानते हैं कि एक बड़ा करेंट लगता है ये सुनते ही। तो बिना सोचे समझे उनको करेंट दौड़ गया। तो जो मुस्लिम लीग के नेता थे, चूंकि मुस्लिम लीग 1906 में बन चुकी थी और उसी के कहने पर बंगाल का विभाजन भी हुआ था तो मुस्लिम लीग के नेताओं में करेंट दौड़ गया। मोहम्मद अली जिन्ना जब इसके प्रेसीडेंट बने तो इन्होंने इसके खिलाफ बोलना शुरु कर दिया कि वंदे मातरम् सांप्रदायिक गाना है। हम इसे नहीं गायेंगे। फिर इन्होंने क्या किया कि दुश्मनी निकालने के लिए जहां भी वंदे मातरम् गाया जाता था वहीं पर जन गण मन गाते थे। जहां वंदे मातरम्  होता था वहीं जन गण मन  होता था। तो एक तरह से जन गण मन और वंदे मातरम् में कम्पटीशन शुरु करा दिया। अंत में ये क्म्पटीशन इतना आगे बढ़ा कि 1941 में जब टैगोरजी मर गये तो भी ये सत्य उद्घाटित होने के बाद भी मुस्लिम लीग ने कहा हम तो यही गायेंगे। अब अंत में क्या हुआ भारत आजाद हुआ 1947 में इसी झगड़े के साथ कि वंदे मातरम् कि जन गण मन? वंदे मातरम् कि जन गण मन? फिर ये कंस्टिट्यूएंट एसेम्बली की बहस हुई जिसमें  319 लोग थे। इन सभी  में एक को छोड़कर सब ने माना कि वंदे मातरम् ही होना चाहिए राष्ट्रगान। एक ने नहीं माना। वो एक कौन थे- पंडित जवाहरलाल नेहरु। उन्होंने नहीं माना। क्यों नहीं माना? तो वो कहते हैं कि मुसलमानों को इससे दुख होता है। उनके दिल को चोट पहुंचती है तो हम क्यों गाएं इसको? माने हिन्दुओं के दिल को चोट पहुंचे तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता । मुसलमानों के दिल को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। और नेहरुजी कहते थे कि इस समय मुस्लिम लीग की राजनीति चल रही है। भारत का बंटवारा किया है। इसका तोड़ करने के लिए मुसलमानों को साथ रखना जरुरी है। तो उनकी इन बातों को मान लेना ही अच्छा है। तो नेहरुजी बार-बार यही तर्क देते थे। अंत में क्या हुआ कि सभी कंस्टिट्यूएंट एसेम्बली के मेम्बर्स ने कहा कि हमको तो ये बैठता नहीं है जन गण मन। तो फैसला कौन करे तो गांधी जी के पास पहुंचे तब तक गांधीजी जीवित थे। तो गांधीजी ने कहा कि जन गण मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूं। और तुम वंदे मातरम् के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गाना निकालो। तो उन्होंने कहा आप ही निकाल के दे दो। तो गांधीजी ने एक गाना निकाल के दिया जो हमारा बाद में झंडा गान था। उसके पहले वो झंडा गान नहीं था। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। इसकी शान न जाने पाए, चाहे आन भले ही जाए। ये जो गाना था गांधीजी ने कहा इसको बना लो। तो नेहरुजी उसपे भी तैयार नहीं। अब नेहरुजी का तर्क क्या था? नेहरुजी का तर्क था कि ये गाना ऑर्केस्ट्रा पे नहीं बज सकता और जन गण मन ऑर्केस्ट्रा पे बज सकता है। और जन गण मन आप जानते हैं अंग्रेजों का लिखवाया हुआ गीत था जार्ज पंचम के स्वागत के लिए। इसके एक-एक शब्द को ध्यान दें। जन गण मन अधिनायक जय हे, तुम्हारी जय हो। भारत भाग्य विधाता, तुम भारत के भाग्य विधाता हो। पंजाब सिंध गुजरात मराठा, द्राविड़ उत्कल बंग, विंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग। तब शुभना में जागे। हम तुम्हारे नाम की शुभकामनाओं के लिए तब शुभ आशिष मांगे आशिष मांगते हैं तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो। जार्ज पंचम ने जब ये सुना तो उसको अर्थ तो समझ में नहीं आया। फिर उसने इंग्लिश ट्रांसलेशन कराया। तो जार्ज पंचम का स्टेटमेंट था कि इतनी खुशामद तो मेरी इंग्लैंड में भी कोई नहीं करता। बहुत खुश हुआ जार्ज पंचम। कौन है रवींद्रनाथ टैगोर, बुलाओ, मेरे पास लेके आओ। तो रवींद्रनाथ टैगोर को  परिचय कराया गया। अंत में जार्ज पंचम जब विदा हुआ तो उस समय की वो नोबुल प्राइज कमिटी का चेयरमैन भी था। तो उसने रवींद्रनाथ टैगोर का नाम नोबुल प्राइज के लिए रिकमेंड कर दिया। क्योंकि वो उनके गीत से प्रभावित था। अब रवींद्रनाथ टैगोर के लिए संकट खड़ा हो गया कि जिस गाने को वो खुद अच्छा नहीं मानते, दबाव में लिखा हुआ है उसी पर नोबेल प्राइज मिल रहा है। तो उन्होंने अंग्रेजों से कहा कि कम-से-कम एक कृपा करो मेरे उपर कि पूरे देश में ये प्रचारित करो कि मेरी गीतांजलि पर ये मिल रहा है नोबेल पुरस्कार। तो हम सब जानते हैं गीतांजलि पर नोबुल प्राइज मिला है। गीतांजलि में कोई दम नहीं है कि उसको नोबुल प्राइज दिया जा सके।  मैंने गीतांजलि कई बार पढ़ी है। ऐसा कुछ दम नहीं है। उससे ज्यादा अच्छी कविताएं इस देश में बहुत सारे कवियों की लिखी गयी हैं। लेकिन छुपा दिया उन्होंने इसको और पूरे देश में प्रचारित कर दिया कि ये गीतांजलि पर मिल गया। वास्तव में हुआ ये था कि जार्ज पंचम का इतना चाटुकारिता भरा गान जो गा दिया उसपर वो खुश होके नोबेल प्राइज दे गया। गांधीजी को जब ये सच्चाई पता चली तो 1919 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ तो गांधीजी ने बहुत कड़क पत्र लिखा रवींद्रनाथ टैगोर को। और वो पत्र आप पढ़ेंगे तो रो देंगे। इतनी गालियां सभ्य शब्दों में वो दे सकते थे वो उन्होंने दिया। फिर खुद गांधीजी मिलने गये कि तुम अभी तक अंग्रेजों की स्वामीभक्ति में डूबे हुए हो। अभी भी उनका सहयोग कर रहे हो। ये हमारे भारत के लोगों को मार रहे हैं, काट रहे हैं। कब इनका साथ छोड़ोगे? तब रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी उपाधियां वापस की और अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उन्होंने लिखना शुरु किया। 1919 के पहले रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे गये लेख सब अंग्रेजी सरकार के समर्थन में हैं। फिर 1919 के बाद उन्होंने जो लेख लिखे हैं वो थोड़े-थोड़े उनके विरोध में गये। तो जन गण मन ऐसा गान है जो उन्होंने लिख दिया जार्ज पंचम के लिए। और हम हिन्दुस्तानियों ने पंडित नेहरु के कहने पर उसको राष्ट्रगान बना लिया। जबकि 318 सांसद संसदीय समिति जो थी न सॉरी कंस्टिट्यूएंट एसेम्बली के 318 लोग वो कहते थे कि वंदे मातरम् होना चाहिए। अकेले नेहरुजी कहते थे जन गण मन होना चाहिए। और नेहरुजी माने वीटो, उस जमाने का। आप में बहुत सारे बुजुर्ग जिन्होंने नेहरुजी को देखा है, यहां हैं। नेहरुजी माने वीटो। नेहरुजी ने जो कहा वही कानून। नेहरुजी ने कहा वही आदेश। नेहरुजी ने कहा वही कैबिनेट का फैसला। और जो नेहरुजी ये धमकी दें कि मैं सरकार छोड़ रहा हूं तो पूरी कांग्रेस हिलना शुरु हो जाती। उस जमाने में इंडिया इज नेहरु, नेहरु इज इंडिया ये नारा। बाद में इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा ये नारा। तो इस तरह का वो था जैसे नीरो के समय में जैसे क्लौडियस के समय में वैसे ये। तो नेहरुजी का कहना माने अंतिम वाक्य तो कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया कि भई यही ठीक है। फिर इन्होंने तब तक इसको लटकाकर रखा जब तक गांधीजी की हत्या नहीं हुई। गांधीजी की हत्या के बाद इसको पिटारे में से निकाल लिया और जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया। अब विद्रोह की स्थिति ना आये पूरे देश में, तो वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दे दिया। कि भई ये भी चले और ये भी चले, वो जो क्या कहना दोनों को संतोष रहे। तो ये है इतिहास। और आज हिन्दुस्तान की सरकार ने एक सर्वे किया है पूरे हिन्दुस्तान का और वो रिपोर्ट अभी आयी है थोड़े दिन पहले। अर्जुन सिंह की मिनिस्ट्री में है। वो रिपोर्ट में ये पूछा गया था भारत के लोगों से कि आपको कौन-सा गान ज्यादा पसंद है- जन गण मन या वंदे मातरम्? नाइंटी एट प्वाइंट एट परसेंट लोगों ने कहा है- वंदे मातरम्। फिर अभी थोड़े दिन पहले बीबीसी ने एक सर्वे किया है। ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन। उन्होंने एक स्पेशल फीचर बनाया है- वंदे मातरम् पर जो आजकल दिखाया जा रहा है लंदन में। तो बीबीसी ने एक सर्वे किया है कि जहां-जहां भारतवासी रहते हैं दुनिया में, उनसे पूछा जाय। तो उन सर्वे में से नाइंटी नाइन परसेंट लोगों ने कहा है- वंदे मातरम्। और बीबीसी के सर्वे से एक नयी जानकारी मिली है कि दुनिया में सबसे लोकप्रिय गानों में वंदे मातरम् दूसरे नंबर पर है। दुनिया में! बहुत सारे देश इसको समझते नहीं हैं लेकिन इसकी जो लय है न और इसका जो संगीत है वो कहते हैं कि ये हममें जज्बा पैदा कर देता है। इसमें संगीत और लय देने का काम किया था- पंडित विष्णु दिगम्बर पलुष्कर ने। बहुत बड़े संगीतज्ञ थे हम सब जानते हैं। विष्णु दिगम्बर पलुष्कर ने इसकी लय बनाई। और इसमें ये जो आज जिस लय में हम गाते हैं न, ये उनकी दी हुई लय है विष्णु दिगम्बर पलुष्कर की। उन्होने ये लय बनाकर गाना शुरु किया। बीच में जो संगीत भरा गया है वो भी उन्हीं के समय का है। बाद में ये वंदे मातरम् लता मंगेशकर ने गाया, आशा भोसले ने गाया। थीम वही है जो विष्णु दिगम्बर पलुष्कर की है। तो ये इतिहास है वंदे मातरम् का और उसके साथ है जन गण मन का। अब हम तय करें कि क्या गाना है? बहुत बहुत धन्यवाद।

आम आदमी क्या करे, अंधी है सरकार (दोहे)

1 टिप्पणी

हिन्दी साहित्य में एक बहुत ही मशहूर छंद रहा है दोहा। दो पंक्तियों में कुछ कहने के लिए यह भक्तिकालीन युग में काफी इस्तेमाल में लाया गया। कुछ लोगों का तो मानना है कि अब इसमें कोई शक्ति शेष बची ही नहीं या यूं कहें कि इसकी सारी शक्ति निचोड़ ली गयी। फिर भी आज दोहे लिखे जा रहे हैं। पहले के कवियों को धर्म, भक्ति, राजा के गुणगान और स्त्री के रूप श्रृंगार के अलावा और कोई विषय शायद ही मिलते थे। जब राजा महाराजा कवियों को सोने की मुद्राएं दे रहे हों तो भला उन्हें और समस्याएं कहां से दिखतीं। कबीर के दोहों को सब लोगों ने सुना है। दोहा इस अर्थ में भी खास है कि इसका सहज प्रवाह और तुकांत होने का गुण लोगों को आसानी से अपनी ओर खींचता था और शायद है भी। जब कोई छंद लय में बंधा हुआ हो तो उसे दुहराना या याद रखना सरल हो जाता है। जैसे हम अक्सर शेर याद रखते हैं और उनका इस्तेमाल अलग-अलग जगहों पे करते हैं ठीक वैसे ही दोहों को भी याद रखा जा सकता है। मुक्तक काव्य में दोहे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

     आज नयी कविता का यानि अतुकांत कविता का समय है। कुछ पारंपरिक छंदों का प्रयोग अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। उन छंदों की सीढ़ियों पर चढकर ही आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य अपने वर्तमान रूप में हमारे सामने हैं।
     दोहों को सुनते-सुनते इस खास शैली में कुछ कहने की आदत मेरे अंदर भी धीरे धीरे पैदा हो गयी। यहां मैं कुछ दोहों को रख रहा हूं जिनकी रचना मैंने हिन्दी में की है।
चोरी चोरों के यहाँ, लुटते कैसे लोग ?
ऐसा फैला देश में, अब चोरी का रोग ॥
*        *        *
मैंने देखा है नहीं, जिसके जैसा फ्रॉड ।
आगे जो शैतान से, कहते उसको गॉड ॥
*        *        *
भूखों पर पड़ती नहीं, जिसकी कभी निगाह ।
कैसी ये करतूत है, वाह वाह अल्लाह ॥
*        *        *
करते क्या हो दोस्तों, उससे तुम फ़रियाद ।
आती है ये पुलिस जब, घर लुटने के बाद ॥
*        *        *
बिना काम के सुन रहे, धर्मों के उपदेश ।
रोटी कपड़ा के लिए, तरस रहा जब देश ॥8॥
*        *        *
आओ बतलाएं तुम्हें, सब धर्मों का मर्म ।
धर्म-धर्म जपते रहो, करते रहो अधर्म ॥
*        *        *
स्वयं बैठ कर स्वर्ग में, करते नर्क प्रदान ।
कहलाते परमात्मा, कहलाते भगवान ॥
*        *        *
टिकट बेच कर स्वर्ग के, पैसे रहे समेट ।
अलग-अलग भगवान के, अलग-अलग हैं रेट ॥
*        *        *
धर्मों के इतिहास में, लूटे गये गरीब ।
भगवानों की लूट से, बनता गया नसीब ॥
*        *        *
जब चढ़ता विश्वास का, सबके ऊपर भूत ।
तर्क करेगा कौन फ़िर, मांगे कौन सबूत ?
*        *        *
कठिन बहुत पहचानना, घूमे पहन नक़ाब ।
अब शर्बत की ग्लास में, बिकने लगी शराब ॥
*        *        *
सुबह-सुबह जब हाथ में, आता है अखबार ।
दिखता पहले पेज़ पर, केवल भ्रष्टाचार ॥
*        *        *
नमक छिड़क कर जख़्म पर, होता आज इलाज ।
रोगी होगा एक दिन, पूरा देश समाज ॥
*        *        *
.सी. रूम में रात भर, मना जीत का जश्न
मंत्री से क्यों पूछते, अब विकास का प्रश्न?
*        *        *
मुझको ही क्यों ना मिले, अब जनता का वोट ।
जेब-जेब में जब गिरा, हो सौ-सौ का नोट ॥18॥
*        *        *
नेताजी को क्या पता, क्या रोटी का भाव ?
घुसा नदी में जब नहीं, एक बार भी नाव ॥
*        *        *
ज़िस्म बेचने को जहाँ, औरत है मज़बूर ।
बरस रहा है देश में, क्या अल्ला का नूर ॥
*        *        *
इतना ही है देश में, धर्मों का इतिहास ।
रोटी खायें साधुजन, कर्षक केवल घास ॥
*        *        *
लाखों की जानें गईं, कारण रीति-रिवाज ।
जब-जब निकली देश में, प्रेमी की आवाज ॥
*        *        *
गली-गली में फैलती, क्यूं नफ़रत की आग ।
डरे-डरे से फूल हैं, डरे-डरे से बाग ॥
*        *        *
न्यायालय में हम गये, आज देखने न्याय ।
सजा मिली निर्दोष को, दोषी को गुड बॉय ॥
*        *        *
हर ऑफिस में हो रहा, हर पल अत्याचार ।
आम आदमी क्या करे, अंधी है सरकार ॥
*        *        *
होता रोज तबाह है, जाने क्यों इंसान।
इंसानों की भीड़ में, ढूंढ रहा पहचान॥

स्त्री और शब्द (कविता)

1 टिप्पणी

एक कविता जो मैंने 29 नवंबर 2010 को लिखी थी, आपके सामने है। 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इसी अवसर पर सोचा कि यह कविता आपके सामने रखूं। इसमें हो सकता है कि शब्द ठीक से न पिरोया गया हो। अर्थ छितराये हुए हों। लेकिन मेरी पुरानी आदत है कि मैं अपने पहले की लिखी चीजों में कोई बदलाव नहीं करता क्योंकि वो मुझे याद दिलाती है कि मैंने उसे कैसे लिखा था। तो पढिए और बताइए लिखने वाला किस हद तक सिरफिरा मालूम पड़ता है।
स्त्री और शब्द
क्यों?
आखिर क्यों?
होता है वह हरेक शब्द
स्त्रीलिंग
जो आदमी को परेशान करता है
जिंदगी, समस्या, दिक्कत
जरूरत, दौलत, कीमत
जमीन-जायदाद, वसीयत
सरकार, पुलिस
पढ़ाई, गरीबी
बीमारी, तबीयत
प्यास, आस
हड़बड़ी, गड़बड़ी
समय की घड़ी
परीक्षा, नौकरी
ताकत, हैसियत।
लिखने वाले के लिए
भाषा, कलम, किताब, कॉपी।
चिंता, निराशा, अभिलाषा
कामना, भावना
हर वो चीज
जो लाचार है
क्यों बन जाती है औरत।
क्यों बन जाते हैं छलने वाले शब्द
जो पुल्लिंग नहीं हैं –
हँसी, मुस्कान, आँख
जो बिकती है वो भी
जिसमें बेची जाती है वो भी
चीज, वस्तु
दुकान।
जो तोड़ती है दिलों को
दुश्मनी, मुहब्बत, हवस।
जब होती है चहल-पहल
समय बन जाता है दिन
जब हो जाता है शांत, सहमा हुआ समय
बन जाता है रात, सुबह, शाम।
सीना ताने खड़ा रहता है शोर
पर चुप रहती है शांति।
पहले होता है देश
फिर बन जाता है राज्य
तय करते हुए सफ़र
फिर बन जाता है – पंचायत
बनते हैं कानून
चुप रहती है संसद
लोकसभा, राज्यसभा, विधान सभा
सब कुछ बन जाता है स्त्रीलिंग।
सब कुछ छिन लेती है
मौत
फिर स्त्री बनकर।
जिसके पास बल है
वही रहता पुल्लिंग।
समस्या का समाधान
दौलत से अमीर
चीज से मालिक या खरीदार
हड्डियों से शरीर
प्यास बुझाता है पानी
भाषा से व्याकरण
लिखने से साहित्यकार
जनता से नेता।
कुछ लोग कह सकते हैं मेरे विरुद्ध
अन्य शब्द, शब्दकोष से लेकर।
क्योंकि अक्षर और वर्ण से लेकर
शब्द और वाक्य तक
पुल्लिंग कोश में पाये जाते हैं पुल्लिंग।
छोटी होती है, – कथा, कविता, गजल
लेकिन कथा-संग्रह, कविता संग्रह
सारे संग्रह
बन जाते हैं पुल्लिंग।
उपन्यास रहता है पुल्लिंग
छोटी उपन्यासिका बन जाती
स्त्रीलिंग।
किसने गढ़े हैं
सारे शब्द
किसी आदमी ने नहीं
किसी पुल्लिंग शब्द ने गढ़ा होगा
क्योंकि
हम सब शब्द हैं केवल
जब निकल जाती है जान
मर जाती है मानवता
छुप जाती है संवेदना
तब हम बन जाते हैं
शरीर से
लाश
एक स्त्रीलिंग शब्द।

रफी का सिर्फ एक ही पूरक है वह है -रफी

टिप्पणी करे

मनुष्य का जन्म दर्द से ही शुरु होता है। माता की प्रसव पीड़ा के साथ ही एक मनुष्य का आगमन इस संसार में होता है। शायद मनुष्य की दर्द पहली अनुभूति है। इसलिए ही कहा जाता है कि कविता से संगीत तक सभी का जन्म दुख या दर्द से ही हुआ है। संगीत में सबसे अहम स्थान है आवाज। सबसे पहले आदमी ने गाना शुरु किया होगा। इसके बाद ही तरहतरह के वाद्य-यंत्र आए। सिर्फ़ आवाज के साथ यानि बिना वाद्य-यंत्रों के या सिर्फ एक ही वाद्य-यंत्र की सहायता से सबसे ज्यादा गाने गाने वालों में रफी शायद पहला नाम है।


गाना चाहे प्रेम का हो चाहे देश के लिए रफी का सिर्फ एक ही पूरक है वह है -रफी। रफी मतलब एक पूरा संसार। आवाज का एक बहुत ही करुण, अद्भुत और असीम संसार। मैं कुछ गानों का उल्लेख करुंगा जिससे पता चलता है कि रफी की आवाज का मतलब क्या होता है? बात दर्द से शुरु हुई है तो पहले दर्द भरे गीतों को ही लेते हैं।
ये दुनिया नहीं जागीर किसी की‘, ‘ग़म उठाने के लिए मैं तो जिये जाउँगा‘, ‘खिलौना जानकर तुम तो मेरा दिल तोड़ जाते हो‘, ‘खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी‘, ‘आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले‘, ‘रहा गर्दिशों में हरदम मेरे इश्क़ का सितारा‘, ‘नसीब में जिसके जो लिखा था‘, ‘भरी दुनिया में आखिर दिल को समझाने कहां जाएं‘, ‘इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ‘, ‘क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में‘, मशहूर विदाई गीत बाबुल की दुआएँ लेती जा‘, ‘पैसे की पहचान यहां इंसान की कीमत कोई नहीं‘, ‘क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फितरत छुपी रहे‘, ‘आया रे खिलौनेवाला खेल खिलौने लेके आया रे‘, ‘अगर बेवफा तुझको पहचान जाते‘, ‘हम तुम से जुदा होके मर जायेंगे रो-रो के‘, ‘कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया‘, ‘मेरी कहानी भूलने वाले‘, ‘टूटे हुए ख्वाबों ने‘, ‘ ये जिंदगी के मेले‘, ‘इक दिल के टुकड़े हजार हुए‘,’ चलो रे डोली उठाओ कहार‘, ‘मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया‘, ‘दिल का सूना साज‘, ‘अपनों को जो ठुकराएगाजैसे गानों को सुनने के बाद जीवन संगीत हो जाता है।
विशेष रूप से प्यासा का गाना ये महलों ये तख्तों ताजों की दुनियातो प्यासा को सचमुच शानदार फिल्म से दुबारे और शानदार बना देता है। ये सारे गाने लिखने वालों ने भी डूबकर लिखा है।
अब बात अगर देशभक्ति गानों की नहीं करें तो रफी साहब को महसूस करने में एक अजीब अधूरापन लगने लगेगा।
एक बात ध्यान देने लायक है कि भारत में जो भी देशभक्ति गाने प्रसिद्ध हैं उन्हें गाने वाले रफी, महेन्द्र कपूर, मन्ना डे, प्रदीप, हेमंत कुमार, मुकेश और लता मंगेशकर के अलावा और कोई है, यह खयाल ही नहीं आता। अभिनेता की बात करें तो सिर्फ दो चेहरे याद आते हैं- पहला दिलीप कुमार और दूसरा मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार।
बात रफी साहब की हो रही है तो उनके गाये देशभक्ति गाने हैं- शहीद(1948) कावतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो‘, नया दौर(1957) का ये देश है वीर जवानों का‘ , शहीद(1965) का दो बार गया ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी और कसमऔर सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है‘, सिकंदर-ए-आजम(1965) का जहां डाल-डाल पर सोने की चिडियां करती हैं बसेरा‘, देशप्रेमी(1982) का मेरे देशप्रेमियों आपस में प्रेम करो देशप्रेमियोंअभी मुझे याद आ रहे हैं।
अब विशेष रूप से ऐ वतन ऐ वतन जो भगतसिंह वाली फिल्म शहीद में गाया गया, उसके बारे में। इस गाने अलगअलग शब्दों में दो बार फिल्म में गाया गया था। वैसे तो रफी हर गाना ही दिल को चीर कर गाते हैं लेकिन दूसरा गाना तो रफी साहब ने ऐसा गाया है मानो अपना कलेजा निकाल कर ही रख दिया है। इस गाने को सुनकर पत्थर क्या अगर भगवान सचमुच होता तो जरुर पिघल जाता। अगर आप शहीदों की सच्ची आवाज सुनना चाहते हैं तो मैं आपसे आग्रह करता हूं इस गाने को जरुर सुनें, आप समझ सकेंगे कि रफी किस गायक को कहा जाता है। जो कहते हैं कि संगीत मनोरंजन के लिए है उनको ये गाना सुनकर पता चल जायेगा कि संगीत और शहीद कैसे एक दूसरे में विलीन हो गए हैं। इस गाने की लय और रफी साहब की आवाज ही नहीं इसका एकएक शब्द हमारे वेदों-पुराणों से बहुत ज्यादा महत्व रखता है। ऐसेऐसे गायक, गीतकार, संगीतकार हमारे देश में हुए हैं जिन्होंने कुछ पलों को बिल्कुल जिंदा ही कर दिया है। ऐसे लोगों में रफी साहब को भूल ही कौन सकता है।
अब चलते-चलते इस अमर गायक के गाये हुए उसी अमर गाने की वो कड़ियां जो आपको गुनगुनाने के लिए दे रहे हैं जो आपको कहीं-न-कहीं मजबूर कर देंगी……
तू न रोना, कि तू है भगतसिंह की माँ
मर के भी लाल तेरा मरेगा नहीं
घोड़ी चढ़के तो लाते है दुल्हन सभी
हँसके हर कोई फाँसी चढ़ेगा नहीं
इश्क़ आजादी से आशिक़ों ने किया
देख लेना उसे हम ब्याह लायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी क़सम
तेरी राहों मैं जां तक लुटा जायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन
जब शहीदों की अर्थी उठे धूम से
देशवालों तुम आँसू बहाना नहीं
पर मनाओ जब आज़ाद भारत का दिन
उस घड़ी तुम हमें भूल जाना नहीं
लौटकर आ सके ना जहां में तो क्या
याद बन के दिलों में तो आ जायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी क़सम
तेरी राहों मैं जां तक लुटा जायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन

अंग्रेजी और अंग्रेजों के शासन में जी रहे हैं हम

टिप्पणी करे

एक वेबसाइट है भारत सरकार की। प्रकाशन विभाग आता है सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत उसी की बात कर रहा हूं। मैं पिछले दो-तीन वर्षों से इस साइट पर जाकर भारत 2008, 2009, 2010 तक किताब डाउनलोड करता था। लेकिन इस बार इण्डिया 2011 वह भी बहुत ही घटिया रूप में सिर्फ़ कुछ पन्नों में उसकी झलक दिखायी गई है, तो बहुत देर के बाद आ गयी है लेकिन भारत 2011 का अभी तक कोई अता-पता नहीं। हमारे प्रधानमंत्री और लगभग सारे मंत्री अंग्रेजों की मानस संतानें हैं। शायद इसलिये ऐसा हो रहा है कि जो किताब साल के शुरु में ही आ जाती थी वह आज तक इस साल में 60 दिन बीत जाने पर भी नहीं आयी है। और मुझे लगता भी नहीं कि आयेगी। हमारी सारी सरकारें खासकर वर्तमान सरकार अंग्रेज लोगों से भरी पड़ी है। प्रधानमंत्री को साल में एक दो बार ही आप हिन्दी और पंजाबी बोलते सुन पायेंगे। हमारे देश में एक और इतिहास है कि एक ऐसे आदमी को जिसे भारत की 80 करोड़ से भी ज्यादा जनता बोल सकती है, समझ सकती है ऐसी भाषा नहीं जानने वाले को राष्ट्रपति बनाकर भारत का प्रतिनिधि बनाया जाता है। शायद ही किसी देश में ऐसा हुआ हो कि एक राष्ट्राध्यक्ष अपनी राष्ट्रभाषा जानता ही नहीं हो।

बात यहीं तक नहीं है लोकसभा में जब किसानों पर या आम आदमी पर गलती से भी कभी बहस हो गयी तब सारी बहस लगभग अंग्रेजी में ही होती है। किसान कितनी अंग्रेजी जानते हैं, सब समझते होंगे या जानते होंगे। हमारे बिहार राज्य के एक महापुरुष हैं सुशील कुमार मोदी। उन्होंने कुछ महीने पहले एक बात कही थी कि पहले वे लोग अंग्रेजी के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे अब अंग्रेजी के पक्ष में आंदोलन करने की जरुरत है। धन्य हैं ऐसे प्राणी। हमारे सभी नेताओं, मंत्रियों को सिर्फ़ 14 सितम्बर को हिन्दी की याद आती है। अखबारों में विज्ञापन आते हैं, शुभकामनाएं दी जाती हैं, शपथ लिए जाते हैं कि आज से हम ज्यादा से ज्यादा काम (सारे नहीं) हिन्दी में करेंगे। मुख्यमंत्री महाशय किसी-किसी कार्यक्रम में भी शिरकत करते नजर आते हैं, कभी दिनकर के नाम पर तो कभी शिवपूजन सहाय के नाम पर। लेकिन जैसे ही वे एक किताब लिखते हैं या लिखाते हैं पता नहीं, अंग्रेजी में लिखते हैं क्योंकि उसदिन 14 सितम्बर नहीं होता।



बातें तो बहुत हैं इस बारे में लेकिन अभी नहीं बाद में कभी जम कर इस पर लिखेंगे और बात करेंगे। चलते चलते एक-दो छोटी-छोटी बातें सुन लीजिए। बान की मून संयुक्त राष्ट्र के महासचिव होकर भी कोरियाई में भाषण देते हैं। अधिकांश विदेशी नेता अपनी भाषा में कहते, लिखते देखे जाते हैं लेकिन हमारे देश के महान लोग वाकई में विद्वान हैं, खाते हैं, बोलते हैं, लिखते हैं, पढते हैं अंग्रेजी में ही। एक महान आत्मा हैं लालकृष्ण आडवाणी, हिन्दुओं, हिन्दुत्व की खूब बात करनेवाले आत्मकथा लिखते हैं तो अंग्रेजी में और यशवंत सिंह भी लिखते हैं तो अंग्रेजी में।

इसी बीच एक ऐसे आदमी के बारे में जो निश्चय हि संसार के सबसे बड़े विद्वानों में से एक होगा- राहुल सांकृत्यायन। इस आदमी के बारे में इतना ही कहना काफी होगा। ये सारे नेता और मंत्री मिलकर जितना जानते होंगे उससे ज्यादा ये आदमी जानता होगा। जेल में बंद रहकर भी एक से एक ऐतिहासिक ग्रंथ इसने लिखे। भाषाएं इतनी जानता था जितनी ये नेता और मंत्री मिलकर भी उतनी नहीं जानते होंगे। संख्या देने की जरुरत ही नहीं है। लेकिन इस आदमी की सारी किताबों में कुछ ही किताबें अंग्रेजी में होंगी। मतलब राहुलजी ने अंग्रेजों के जमाने में रहकर भी किताबें अंग्रेजी में नहीं लिखीं। इनके किताबों की संख्या 150 के करीब है। इसमें दस किताबें भी अंग्रेजी में नहीं होंगी। 100 से ज्यादा हिन्दी में ही होंगी। याद रखें किताबों की संख्या न कि भाषणों को लिखकर छापी जाने वाली किताबें। विषय भी अलग-अलग। कभी मार्क्स पर कभी इस्लाम पर तो कभी पूरे विश्व के दर्शन पर, कभी नाटक, कभी उपन्यास, कभी भाषा पर, कभी इतिहास पर, कभी विज्ञान पर कलम चलाने वाले इस आदमी ने संसार के कई देशों की यात्राएं की थीं। अंतिम बात ध्यान रखें इस आदमी का अंग्रेजी ज्ञान कितना रहा होगा मैं नहीं जानता। पर ये जरुर कह सकता हूं कि सभीं नेताओं, मंत्रियों यहां तक कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक सभी को हजारों क्लास दे सके इतना तो वह व्यक्ति जानता होगा।

एक महान आत्मा हैं जवाहरलाल नेहरु। अपनी बेटी को पत्र से लेकर भारत का इतिहास तक अंग्रेजी में लिखते थे।