जेपी ही गायब थे आडवाणी की यात्रा में, हाँ…नीतीशायण चालू रही

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बारह तारीख (12-10-11) को पटना आने के क्रम में सैकड़ों जगह बैनर दिखे। छपरा में एक दिन पहले ग्यारह तारीख को जयप्रकाश नारायण की जयंती पर खूब तमाशा हुआ था। छपरा से पटना लगभग 70 किलोमीटर है। लेकिन 70 किलोमीटर के रास्ते पर मुझे जयप्रकाश नारायण की तस्वीर सिर्फ़ 2-3 जगह ही दिखी। दिखे तो बस नीतीश, आडवाणी और छोटे-बड़े तथाकथित महान नेता। सुषमा स्वराज को बिहार की प्रशंसा करके बहुत सुकून मिलता है, बिहार मतलब नीतीश के बिहार की। कुछ बातें हैं बिहार के बारे में, उस दिन की यात्रा के बारे में, राजनीति के बारे में।

      बैनरों पर जेपी नहीं दिखे, और जहाँ दिखे वहाँ भी उनकी तस्वीर से कई गुनी बड़ी तस्वीर औरों की दिखी। यह एक नजरिए से कोई बड़ी या बुरी बात नहीं भी हो सकती है। लेकिन इसमें आयोजक अपना विज्ञापन अधिक कर रहा है, ऐसा तो साफ नजर आता है। वैसे आडवाणी की यात्रा को शुरू जेपी के यहाँ से की जाय, इसके पीछे कारण क्या है? जहाँ तक मेरी समझ है, अभी बिहार के नीतीश और गुजरात के मोदी में राष्ट्रीय स्तर पर महान बनाई गई या बनवाई गई छवि को लेकर नीतीश कुछ आगे हैं। क्योंकि मोदी के साथ मुद्दा ही कुछ ऐसा जुड़ा है कि वे कुछ अलग मालूम पड़ते हैं। बिहार में धमाकेदार जीत और पहले ही केंद्रीय मंत्री रह चुकने से नीतीश और उनके गुरू-चेले कुछ मत्त-से हैं। सो एक बड़ा कारण तो यह रहा, नीतीश के बिहार को यात्रा शुरू की उपयुक्त जगह मानने का। दूसरा कारण यह रहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई या तमाशा जो भी हो रहा है, इसकी गम्भीर शुरूआत भी जेपी ने की थी, ऐसा माना जाता है। एक और कारण बिहार में भाजपा-जदयू की स्थिति का इतना मजबूत होना भी रहा होगा। आखिर भाजपा या आडवाणी को जेपी पहली बार कैसे याद आए? जेपी के गाँव में यात्रा को लेकर अचानक से बिजली का आ जाना, आखिर बिहार सरकार को नवम्बर 2005 से अक्तूबर 2011 तक यह गाँव या बिजली तनिक भी याद नहीं आए? क्योंकि अचानक जेपी के गाँव में बिजली आ गई थी। नीतीश ने सड़क बनवाने की भी बात सिताबदियारा(जेपी के यहाँ) प्रकरण को लेकर कही थी। यह सब पाखंड का साफ-साफ प्रदर्शन नहीं तो और क्या है?
      सुनने में आया कि छपरा के इस तामझामी यात्रारंभ में ढाई करोड़ का खर्चा आया। और यह सब पैसा दिया एक अभियंता ई सच्चिदानंद राय ने। ये बनियापुर के बताए जाते हैं। इनको इस बार जदयू का टिकट नहीं मिल पाया था। इन्होंने बिहार राज्य पथ परिवहन निगम को सौ बसें भी दी हैं, ऐसा सुनने को मिला। ईडेन सिटी नाम से छपरा में महँगे घर बनाए रहे हैं, जो बिकेंगे भी महँगे ही। वैसे सवाल तो यह भी है कि एक आदमी जो एक अभियंता हो, उसके पास इतनी सम्पत्ति कि 100 बसें खरीद सके या ढाई करोड़ आयोजन पर खर्च कर सके? जाहिर है या तो यह लूट की कमाई है या बाप-दादाओं की सम्पत्ति के नाम पर दिखाई जा रही सम्पत्ति है। अब ऐसा तो लगने ही लगा है कि अगली बार नीतीश सरकार में सच्चिदानंद राय को मंत्री पद मिलना तय है।
      आडवाणी, सुषमा, जेटली सहित कुछ नए युवा नेता भी खूब राग अलाप रहे थे ग्यारह को। सुषमा स्वराज तो नीतीश से भी ज्यादा नीतीश सरकार की प्रशंसा करती हैं अपने भाषणों में। संयोग या दुर्योग से इनके भाषणों से प्रभावित होने वाले लोग भी हैं। वैसे स्वराज अच्छा बोलती ही हैं। जब एक अच्छा वक्ता किसी के पक्ष में बोल रहा हो या झूठ बोल रहा हो तो पकड़ना और मुश्किल हो ही जाता है।
अगले दिन अखबार वाले जैसा कि आप जानते हैं, नीतीशायण में लगे रहे। प्रभात खबर तो जान की बाजी तक लगाने में जुटा है इस काम में। कुछ पन्ने रोज इसीलिए निकाले ही जाते हैं कि नीतीश की वंदना हो सके। यही हाल प्रभात खबर के संपादकीय का है।  वैसे बता दें कि प्रभात खबर सच्चिदानंद राय के ईडेन सिटी का विज्ञापन कुछ ज्यादा ही करता है। यहाँ तक कि ईडेन बसों से अगर आप यात्रा करें तो पढ़ने को इसी की कुछ प्रतियाँ दिखती हैं। सत्ता और दौलत से तालमेल तो दिखता ही है।
तो बात शुरू हुई थी आडवाणी और जेपी से। एक बात हमेशा ध्यान आती है कि जिस देश में 1947 तक की लड़ाई में लाखों नवजवान शामिल थे, उसमें आडवाणी या वाजपेयी का नाम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल क्यों नहीं है? जबकि उनकी उम्र इतनी तो थी ही कि वे लड़ सकें। 1947 के पहले आडवाणी जैसे लोग या नेता अगर नहीं लड़ रहे थे या उस समय इनका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था, तो इन्हें हम तो राष्ट्र का भला चाहने वाला नहीं मानेंगे। या फिर यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जेपी के आन्दोलन का लाभ मिलने पर जो लोग सत्ता में आए, उनमें आडवाणी भी शामिल थे और वह भी केंद्रीय मंत्री की हैसियत से। तो जिस जेपी के चलते इन्हें यह मिला उसी जेपी को आज तक भाजपा ने या आडवाणी ने क्यों याद नहीं किया? और आज याद करने का मतलब क्या है? हमारी समझ से इसे अवसरवादिता कहने में हर्ज नहीं है।
(कुछ बेतरतीबी से लिखा यह लेख कुछ सुगठित नहीं भी हो सकता है)

इधर से गुजरा था सोचा सलाम करता चलूँ…

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जगजीत सिंह का जाना मीडिया के लिए अमिताभ के जन्मदिन की खबर पर भारी पड़ गया। 40 साल तो दोनों ने गुजारे हैं संगीत और फिल्म जगत में। फिर भी जगजीत का अमिताभ पर भारी पड़ना उनकी हैसियत को दर्शाता तो है ही। अमिताभ ने अपने जन्मदिन की बात तो लिखी है अपने लिखाई-मशीन से लेकिन जगजीत पर नहीं लिखा कुछ। जब ट्वीट पर ही अखबार टूट पड़े हैं, तो वहीं पर अमिताभ ने भी काम चलाया है।
            जगजीत के जाने पर सबसे अलग और बहुत ईमानदारी से याद करते हुए लिखा दिनेश चौधरी जी ने। वे लिखते हैं जगजीत साहब के चले जाने की खबर एक चैनल पर देखकर झटका लगा। पर उम्मीद खत्म नहीं हुई थी, यह सोचकर कि ये चैनलवाले तो उल्टी-सीधी सच-झूठ खबरें देते ही रहते हैं, चलो किसी और चैनल पर देखें। चैनल बदल दिया। लेकिन दूसरे-तीसरे हरेक चैनल पर यही खबर।
और उम्मीद भी की थी कि जगजीत साहब अस्पताल से बाहर आकर फिर से गालिब की ग़ज़लों को गायेंगे। उनके अस्पताल में दाखिल होने के एक दिन पहले ही अखबारों में यह खबर पढ़ी थी कि गालिब की ग़ज़लों के साथ जगजीत व गुलजार साहब की जोड़ी एक बार फिर सामने आ रही है। इसी उम्मीद में मैं ग़ज़लों के पूरे सफरनामे को याद कर रहा था कि जगजीत साहब फिर से अपनी ग़ज़लों की महफिल सजायेंगे, पर अफसोस ऐसा हो न सका क्योंकि इस बार सच बोल रहे थे कमबख्त चैनल वाले! कितने बेरहम होते हैं खबरों पर काम करने वाले कि इधर जगजीत साहब गुजरे नहीं कि वे विकिपीडिया में हैंसे अपडेट होकर थेहो गये।

विकीपीडिया में हैं से थे, सोचिए कैसी अन्तर्जालीय कोशिश है, जगजीत साहब को याद करने की! दिनेश जी संगीत और गजल की बेहतर समझ रखते हैं। इन दिनों जगजीत साहब के बहाने गजलों के उस दौर को याद करते हुए वे लगातार लिख रहे थे, जब गजलों ने फिल्मी गीतों की तरह अपना स्थान लोगों के बीच बनाना शुरू किया था। दिनेश जी ने ध्यान दिलाया कि उम्र जलवों में बसर हो, ये जरूरी तो नहीं गजल में जगजीत साहब ने अजान की आवाज सुनाई है। इस गजल को यहाँ सुना भी जा सकता है। दिनेश जी के लिखे को पढ़िएगा, जो उन्होंने गजल गायकी की यात्रा पर लिखा है और लिख रहे हैं।

सबसे पहले पता चला भूषण जी के चिट्ठे पर। तुरन्त विकीपीडिया पर गया और शाम तीन-चार बजे पता चला कि सचमुच वे नहीं रहे। अखबारों ने भी पन्ने खर्च किए हैं। किसी बड़े गायक का जाना पहली बार हुआ मेरे होश में। (होश हमारे यहाँ उस अवस्था को कहते हैं जब बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाय और उसे ठीक से समझने और याद रखने की क्षमता पैदा हो चुकी हो) बहुत सारी जगहों पर अलग-अलग किस्म से उन्हें श्रद्धांजलि दी गई है। मखमली आवाज की बात बहुत जगह की जाती रही है, की गयी थी। मुझे नहीं पता कि मखमली आवाज कैसी होती है? आवाज में ऊँची आवाज, भारी आवाज आदि तो समझ में आता है, लेकिन यह लरजती या खनखनाती आवाज और मखमली आवाज मेरी समझ में नहीं आती। 

एक अनीश्वरवादी के लिए जगजीत का जाना

मैं किसी आत्मा-वात्मा में यकीन नहीं करता। इसलिए जहाँ भी लिखा देखा कि भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे, मुझे गुस्सा आया। आखिर कैसा भगवान है जो चित्रा सिंह के परिवार में पहले जगजीत-चित्रा के पुत्र को खा जाता है, फिर बेटी को आत्महत्या (ईश्वर के लिए परात्महत्या, परमात्महत्या नहीं) करवा देता है और अब जगजीत को भी मार डालता है! फिर भी सारे लोग ठगी का शिकार बने हुए जगजीत साहब की आत्मा को शान्त करने में लगे हुए हैं। 

जगजीत का जाना एक दुनिया का जाना है। आप कह सकते हैं कि एक अनीश्वरवादी का सम्बन्ध इन बातों से कैसे हो सकता है। हमारी समझ में हमारे पास कई दुनियाएँ हैं। उनमें से एक के खत्म हो जाने से जीवन न सही, एक दुनिया तो खत्म-सी होती ही है। हालांकि मैंने जगजीत को कभी आँखों से देखा नहीं। हाँ, उनके कुछ वीडियों देखे हैं। उनकी तस्वीरें देखी हैं और शायद बड़ी-बड़ी आँखें भी जिनमें सुख तो नहीं ही दिखता था। उनकी आँखें बिलकुल अलग हैं…थीं। यह सच है कि जिसने उन्हें देखा ही नहीं, उसे सिर्फ़ आवाज से मतलब हो सकता है। लेकिन जबतक हमें मालूम होता है कि उसे गाने वाला जिंदा है, चलता-फिरता है, बोलता है, गाता भी है, तब कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जैसे ही यह खबर आती है कि अब वह नहीं रहा, सारी बातें महत्वपूर्ण हो उठती हैं। उन्होंने भक्ति गीत गाए। हर किस्म के गाने-गजल-गीत गाए होंगे। यह कोई आसान बात नहीं कि जिस देश में हम सिर्फ़ उन्हीं गायकों को याद करते हैं या सुनते हैं जो फिल्मों में गाते रहे हैं। भारत में तो बड़े गायक का अर्थ ही है फिल्मों के गीत गानेवाला। लेकिन इन सब फिल्मी गायकों के बीच जगजीत एक अलग नाम था, है। इस देश की सीमाओं के पार भी गैर-फिल्मी गीतों-गजलों को गाकर जगजीत ने जो स्थान हासिल किया, वह एक मिसाल है। मैं कोई समीक्षक नहीं और न ही जगजीत को बहुत सुननेवाला रहा हूँ, हालांकि वे मेरे प्रिय गायकों में हैं और रहे हैं, हमेशा रहेंगे। मैं जिस जगजीत सिंह की बात कर रहा हूँ वह व्यक्ति नहीं, मात्र गायक है क्योंकि हम उन्हें इसीलिए जानते हैं और इस वक्त तो मैं इसके बाहर सोचना भी नहीं चाहता।
मैंने हमेशा सोचा-माना-कहा-लिखा है (इसका अधिकारी तो एकदम नहीं मैं) उनकी धीमी आवाज में गाने की आदत का कोई जोड़ नहीं। जितनी धीमी आवाज पर आवाज बैठ जाती है, बिगड़ जाती है, उस आवाज में जगजीत गाते थे, बेहतर गाते थे, लाजवाब गाते थे।
जगजीत का जाना…मतलब…एक पूरे संगीत का जाना
गानों का शौक नहीं था मुझे। इंटर में पढ़ने के लिए जब पटना गया, तो बगल वाले कमरे में किशोर कुमार का एक फैन रहता था। नाम था सरोज मानसी (मानसी शायद उसके गाँव आदि का नाम था)। उसके दरवाजे पर कलम या स्केच से मोटे अक्षरों में लिखा था सरोज मानसी। किशोर कुमार के गाने रेडियो पर खूब बजते थे। विविध भारती का राज था, रेडियो मिर्ची का आगमन अभी नहीं हुआ था। मैं गानों को सुनने में कोई रुचि नहीं रखता था। सरोज गानों का ऐसा शौकीन था कि जब पढ़ने के लिए बाहर कोचिंग जाता और बिजली नहीं रहती तब भी उसका रेडियो न होता और अक्सर गाने कमरे से बाहर सुनाई पड़ते थे। और जब वह कमरे में होता तब तो बजना ही था। लेकिन बहुत जल्दी वह दूसरी जगह चला गया।
कुछ दिनों बाद मेरे बगल वाले कमरे में सुजीत नाम का लड़का आया। जगजीत सिंह को सुनने का शौकीन। ध्यान रहे ये लोग ऐसे शौकीन नहीं थे कि कैसेट लाकर सुन सकें, शायद आर्थिक या पारिवारिक कारण रहे होंगे। प्राय: हर सुबह या हर शाम को कानों में आवाज आती ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो। और कोई गीत याद नहीं मुझे। सुजीत मेरे कमरे से सटे बगल वाले कमरे में ही रहता था। अब गाने हमेशा सुनाई पड़ने लगे। गानों का अभ्यस्त होने लगा मैं। अब नहीं बजना पता चलने लगा या महसूस होने लगा। फिल्मों का शौक भी नहीं था उस समय। अब गानों और फिल्मों की तरफ़ कुछ झुकाव होने लगा था। ये दौलत भी ले लो को, ऐसा कौन आदमी है जो बुरा मानता है या पसन्द नहीं करता! इस तरह धीरे-धीरे रफी, लता मंगेशकर सहित एक-से-एक लाजवाब गायक प्रिय होते गए।
फिर घर आना हुआ और सीडी प्लेयर का आगमन घर में हो चुका था। एकदिन एक सीडी आई गजलों की। मैंने नहीं लाई। कैसेट की दुकानों पर जाना अच्छा नहीं माना जाता था। कम से कम मेरे घर में। आज भी बहुत अन्तर नहीं है इन बातों में। लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं। अन्तर्जाल यानी इंटरनेट की कृपा से अधिक मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती है। हाँ, तो सीडी सुनना शुरू किया। अनूप जलोटा और जगजीत सिंह की गायी गजलें शब्दों से कम, आवाज से ही अधिक पसंद आयीं। एक गजल थी- जिंदग़ी यूँ हुई बसर तनहा। काफ़िला साथ और सफ़र तनहा। गाने वाले थे, जगजीत सिंह। बचपन से राष्ट्रीय गीतों का शौक पहले भी रहा था लेकिन गैर-राष्ट्रीय गीतो-गजलों का कोई रिश्ता नहीं था मुझसे। यह गजल इतनी पसन्द आई कि सबसे प्रिय गजलों में आज भी शुमार है। यह भी कह सकते हैं कि सबसे पहले जिस गजल को मैंने ठीक से पसन्द किया, वह जगजीत सिंह का गाया हुआ था। सम्भवत: यह गुलजार साहब की लिखी गजल है।
बाद में जब प्रोग्रामिंग पढ़ रहे थे, उस समय एक ऐसा अन्तराल भी आया था जिसमें अपने कम्प्यूटर के गानों को सुनना शुरू किया। हालांकि आज तक यह सम्भव नहीं हो सका और सम्भव है भी नहीं कि कम्प्यूटर के सारे गाने सुने जा सकें। गाने सुनने का अर्थ मेरे लिए ऊँची आवाज में दूसरों को परेशान करना कभी नहीं रहा है। न ही खूब ऊँची आवाज के लिए साउंड के अन्य साधनों में कोई रुचि है। बस गाने सुनने हैं, आवाज ठीक से आनी चाहिए, इससे अधिक जरूरत नहीं रही कभी।

 उस दौरान जगजीत की भी बारी आई। रात भर कानों में हेडफोन, कानों में जगजीत सिंह की आवाज, हाथ कीबोर्ड पर प्रोग्राम लिखने में और इसी तरह सुबह करके 4-5 -6 बजे जाकर सोने का काम भी किया। फिर जगजीत सिंह की गजलें जो शो में गायी गई थीं, को वीडियो के साथ भी सुनने का मौका मिला। तब पता चला वे बहुत तेज भी गाते हैं, पंजाबी टोन में। कई बार ऐसा लगा कि पूरा ध्यान लगाकर उनके बोले शब्दों को सुने बिना शब्द कान तक पहुँचते ही नहीं, इतनी धीमी आवाज में भी वे गाते थे। हाँ, उनका किया वह खाँसी वाला विज्ञापन पसन्द नहीं आया था। उनकी आँखें हमेशा ध्यान खींचती थीं। एक बार शायद यह भी सुना कि वे गजलें लिखते भी थे और बाद में गाने की योजना भी थी। शायद गाया भी हो, मुझे जानकारी नहीं। जगजीत सिंह ने जब दोहे गाये, तब भी एक नये तरीके से। दोहे हमने महेन्द्र कपूर से लेकर कई गायकों की आवाज में सुने हैं। जगजीत ने भी गाए, तब धुन अलग थी लेकिन वह भी अच्छी रही। ठीक इसी तरह कल चौदहवीं की रात थी को गुलाम अली और जगजीत सिंह, दोनों की आवाज में सुनिए। दोनों का अलग और अपना अंदाज है। दोनों को सुनना अच्छा लगता है। लेकिन मेरी समझ में गुलाम अली की तुलना में अधिक मधुर आवाज में इस गजल को जगजीत ने ही गाया है। उसमें एक जगह जोगी शब्द आता है, वहाँ जगजीत सिंह जोगी पर बहुत देर तक ठहरते हैं और आभास होने लगता है कि यहाँ जोगी है। इस तरह से अनूप जलोटा भी खूब प्रभावित करते हैं, जहाँ वे मैं नहीं माखन खायो में सुबह और शाम का आभास करा देते हैं। आजतक मनुष्य संगीत, लय और धुनों को ठीक से लिखने में असमर्थ ही रहा। इसलिए हम शब्दों में साफ कह ही नहीं सकते। इसके लिए तो ध्वनि या आवाज ही विकल्प है।
जगजीत सिंह की आवाज भी लता मंगेशकर की आवाज की तरह बाद में बदल गई थी, जैसा कि मुझे लगता है। बाद में और अच्छी आवाज में गाने गाते थे वे, लता के साथ भी ऐसा ही है। यह जरूर बेहतर होता कि जगजीत की जगह कुछ घटिया गायक गुजर जाते, लेकिन यह किसी की मुट्ठी में नहीं, ईश्वर की भी मुट्ठी में नहीं। वरना वह दौलत भी ले लेता, शोहरत भी ले लेता और लौटा देता …
जगजीत को गजल सम्राट कहा गया। पता नहीं सम्राट के बिना साम्राज्य कैसे चलेगा? दारू पीकर गाने वाले और उल्टी खोपड़ी करके ढिसुम-ढिसुम किस्म के गाने जो पार्टियों में बजते हैं, ये दसदिनी गाने तो निश्चित ही भुला दिए जाएंगे लेकिन जगजीत के गाए को भुलाने की हैसियत किसकी है?…
मोहम्मद अजीज का गाया मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया गाना याद आ रहा है। जगजीत सिंह के गाए कुछ गानों-गजलों को यहाँ पढ़ भी सकते हैं। स्मृति डॉट कॉम गानों को पढ़ने की शानदार साइट है, सम्भवत: हिंदी गानों के लिए इकलौती।
 जगजीत को लेकर हमने भी अपनी बहुत सारी बातें कहीं। न चिट्ठी न कोई संदेश को ही अधिकांश अखबारों आदि ने मुख्य शीर्षक बनाया उनके जाने पर।

होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो को सुनकर बच्चन की तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाये याद आती है।

जिंदगी तो कभी नहीं आई, मौत आई जरा-जरा कर के, अभी ये बात चित्रा सिंह के बारे में सही साबित हो रही है।

जगजीत ने इतना ही कहा कि इधर से गुजरा था सोचा सलाम करता चलूँ… 

गरीबी का हिसाब-किताब और मेरा अर्थशास्त्र

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ध्यान दें: यह लेख कुछ लोगों के लिए नहीं है। वे कौन हैं, यह पढ़कर वे स्वयं जान लें।
लीजिए हम भी अर्थशास्त्री हो गए। हम बिलायत के पीएचडी नहीं हैं भाई। इसलिए जीडीपी-फीडीपी समझा नहीं पाएंगे। इसलिए कुछ सीधी-सीधी बात कहेंगे। एक दिन खयाल आया कि भारत का अर्थशास्त्र क्या है, तो कुछ चीजें दिमाग ने मुझसे कहीं। हम वह अर्थशास्त्र रखने जा रहे हैं, जो भिखारी से लेकर किसान तक को समझ में आ सके। समझने के लिए अक्षरज्ञान होना भी आवश्यक नहीं है। हाँ, यह मेरी कोई बपौती (होती तो यह भी अपनी नहीं है।) नहीं है कि इसे मैंने ही सोचा है और दूसरे किसी ने कभी नहीं सोचा होगा, इसका दावा कर दूँ।

गरीबी सापेक्ष है, निरपेक्ष नहीं। बिना अमीरी के गरीबी का कोई अर्थ नहीं। गरीबी और अमीरी की जड़ है सम्पत्ति के बँटवारे के असमान विभाजन की घोर अन्यायपूर्ण नीति। हमें पता है कि इस बँटवारे में बहुत-से लोगों को कोई अन्याय नहीं दिखता।
पहला ज्ञान:
भारत के 70 प्रतिशत लोगों के पास देश की 30 प्रतिशत सम्पत्ति है या 80 प्रतिशत के पास 20 प्रतिशत सम्पत्ति है। इसमें कौन सही है, इसमें भारी झगड़ा-लफड़ा है। इसलिए हम दोनों पर ध्यान दे लेते हैं।
अगर 70 प्रतिशत वाली बात सही है तब
देश की कुल सम्पत्ति 100 रू मान लेते हैं। और देश में कुल जनसंख्या भी 100 है, यह भी मान लेते हैं।
अब 70 प्रतिशत लोगों के पास 30 रू हैं और 30 प्रतिशत लोगों के पास 70 रू हैं।
इस प्रकार 70 प्रतिशत लोगों में 30 रू को बाँटते हैं तो 30/70 = 42 पैसे प्रति व्यक्ति।
और 30 प्रतिशत लोगों में 70 रू को बाँटते हैं तो 70/30= 233 पैसे प्रति व्यक्ति।
इस तरह असमानता= 233 / 42 = साढ़े पाँच गुनी।
अगर 80 प्रतिशत वाली बात सही है तब
देश की कुल सम्पत्ति 100 रू मान लेते हैं। और देश में कुल जनसंख्या भी 100 है, यह भी मान लेते हैं।
अब 80 प्रतिशत लोगों के पास 20 रू हैं और 20 प्रतिशत लोगों के पास 80 रू हैं।
इस प्रकार 80 प्रतिशत लोगों में 20 रू को बाँटते हैं तो 20/80 = 25 पैसे प्रति व्यक्ति।
और 20 प्रतिशत लोगों में 80 रू को बाँटते हैं तो 80/20= 400 पैसे प्रति व्यक्ति।
इस तरह असमानता= 400 / 25 = सोलह गुनी।
हालांकि असलियत यह है कि 90 प्रतिशत सम्पत्ति सिर्फ़ दस प्रतिशत लोगों के हाथ में है। सबूत है कि भारत सरकार का कुल कर्ज, भारत के मात्र बीस-तीस व्यवसायी चुका सकते हैं। उदाहरण के लिए, टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अजीम प्रेमजी आदि।
इसलिए अब 90 प्रतिशत वाली बात पर विचार करते हैं।
देश की कुल सम्पत्ति 100 रू मान लेते हैं। और देश में कुल जनसंख्या भी 100 है, यह भी मान लेते हैं।
अब 90 प्रतिशत लोगों के पास 10 रू हैं और 10 प्रतिशत लोगों के पास 90 रू हैं।
इस प्रकार 90 प्रतिशत लोगों में 10 रू को बाँटते हैं तो 10/90 = 11 पैसे प्रति व्यक्ति।
और 10 प्रतिशत लोगों में 90 रू को बाँटते हैं तो 90/10= 900 पैसे प्रति व्यक्ति।
इस तरह असमानता = 900 / 11 = लगभग बयासी गुनी।
इस तरह एक आदमी दूसरे आदमी से अस्सी गुना कम अमीर है या कहें कि गरीब है। तो यही है इस देश का अर्थशास्त्र। वह नकली अर्थशास्त्र है जो टीवी में, अखबारों में, कोट-टाई धारी लोगों के दिमाग में घुसा हुआ है।
यह सारा हिसाब उसी औसत के नियम से लगाया गया है जिससे हमारे महान अर्थशास्त्री लोग प्रति व्यक्ति आय को विकास का मानक मानते हैं। भले ही दो व्यक्तियों की आय क्रमश: दो रू और दो लाख रू हो और औसत आय 200000 + 2 = 200002 / 2 = 100001 यानी एक लाख एक रू बताई जाय। जिस हिसाब से देश विकास कर रहा है, यह माना जाता है, वही हिसाब मैंने यहाँ अपनाया है। अब इस हिसाब में मरेगा तो दो रू वाला। फिर भी देश विकास कर रहा है!
दूसरा ज्ञान यहाँ है लेकिन इसे भी किसान-मजदूर लोग थोड़ी कठिनाई से समझेंगे। लेकिन यहाँ जाइए जरूर।
अब बताइए कि कैसा लगा यह आसान हिसाब-किताब? घटिया, महाघटिया, कम घटिया, थोड़ा अधिक घटिया, थोड़ा कम घटिया, सौ प्रतिशत घटिया आदि ढेर सारे विकल्प हैं। उत्तर इन्हीं में चुन लीजिए।

एक बार फ़िर आ जाओ (गाँधी जी पर एक गीत)

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हमेशा की तरह आज दो अक्तूबर को गाँधी जी अधिक, लाल बहादुर शास्त्री कम ही याद किए जाएंगे। हम भी गँधियाते थे पहले। कई बार गाँधी जी कविताई का विषय बनते रहे थे। लेकिन अब यह सब 2004-05 के बाद बन्द है। विवेकानन्द भी इसी तरह कई बार अपने विषय होते थे। अभी थोड़े दिनों पहले ही आपने गाँधी जी पर जय हे गाँधी! हे करमचंद!! कविता पढ़ी थी यहाँ। आज गाँधी जी के प्रति सम्मान तो है लेकिन पहले जितनी श्रद्धा तो नहीं ही रही। उनपर एक कविता या गीत जो कहें, गाँधी जयंती, 2004 पर गाने के लिए ही मानिए, लिखा था। क्योंकि गाँधी जी लोकप्रिय क्यों विषय पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, तो सोचा कि एक गीत भी हो जाए। हालांकि इसे गाया नहीं जा सका और बाद में 26 जनवरी, 2005 को इसे गाया गया। अब इन दिवसों में रुचि तो है नहीं। …इस रचना में भावनाएँ हैं, अब थोड़ा रूखा हूँ। पहले की अधिकांश मान्यताएँ एकदम बदल गईं है। फिर भी मेरी सबसे प्रिय खुद की रचनाओं में यह रचना आज भी शामिल है। अगर आप मोहम्मद रफ़ी का गाया क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे या इधर चलने वाला गीत कलियुग बैठा मार कुंडली की तर्ज पर इस रचना को गाकर देखें, तो आपको पसन्द जरूर आएगा। मुझे इसकी कुछ पँक्तियाँ बहुत पसन्द हैं, अब यह अपनी प्रशंसा ही सही, लेकिन सच है।
यह रही वह रचना 
             (गीत) एक बार फ़िर आ जाओ
बापू आपसे फ़िर आने का,
विनती करता शरणागत है।
एक बार फ़िर आ जाओ तुम,
आ पड़ी तेरी ज़रूरत है।
छुआछूत को तुमने बापू,
हमसे दूर हटाया था।
सत्य, अहिंसा और प्रेम का,
हमको पाठ पढ़ाया था।
हिंदी को ही तुमने बापू,
राष्ट्रभाषा स्वीकार किया।
थी जन के हृदय की भाषा,
तुमने देशोद्धार किया।
बापू आपसे फ़िर … … … …
दलितों को तुमने समाज में,
उच्च स्थान दिलाया था।
तुमने अपने उत्तम चरित्र से,
पूरा संसार हिलाया था।
ना जाने है कैसी हो गयी,
बापू युग की हालत है।
एक आदमी को दूज़े से,
ना जाने क्यों नफ़रत है।
आवश्यकता आन पड़ी अब,
एक नहीं शत गाँधी की।
जड़ से इस तम की बगिया को,
फेंके ऊँखाड़, उस आँधी की।
बापू आपसे फ़िर … … … …
चारों तरफ़ पश्चिम-पश्चिम की,
लगी ना जाने क्यों रट है।
सूख रहा बूढ़ा बेचारा,
इस भारत का यह वट है।
बढ़ती जाती आज ज़रूरत,
बापू हमको तेरी है।
भारत के इस दीपक गृह में,
छायी आज अँधेरी है।
मुक्त देश को किया तुम्हीं ने,
लोकप्रियता प्राप्त हुई।
हम जिस दिन आज़ाद हुए,
उस दिन उन्नति समाप्त हुई।
बापू आपसे फ़िर … … … …
क्या मुंबई है, क्या काशी है,
होता चारों तरफ़ पतन।
छोड़ के सब भारतीय संस्कृति,
अपनाते केवल फ़ैशन।
दिन प्रतिदिन जाता है भारत,
तीव्र गति से रसातल में।
केवल तुमसे आशा बापू,
इस विनाश के दलदल में।
अंत में कहता तुमसे बापू,
बिलखता ये शरणागत है।
ऐसी हालातों में बापू,
तेरी सिर्फ़ ज़रूरत है।
बापू आपसे फ़िर … … … …