योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-3)

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योद्धा संन्यासी का जीवन 

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अपने सत्तर वर्ष के जीवन में वे निरंतर सक्रिय रहे और एक साथ कई मोर्चों पर! हर मोर्चे पर उनका एक खास मकसद दिखाई देता है। भारतीय इतिहास के अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड में उन्होंने अपना लेखन कार्य शुरू किया। भारत की स्वाधीनता का आंदोलन प्रथम विश्व युद्ध के बाद तेज हुआ और उसमें विभिन्न धाराओं का संघर्ष ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगा। समाज सुधार की धारा बंगाल से विकसित हुई जिसका प्रभाव संपूर्ण देश के बुद्धिजीवियों पर पड़ा। राहुल ने अपना जीवन समाज सुधारक संन्यासी के रूप में शुरू किया; यह महज एक संयोग नहीं। वे प्रेमचंद की तरह आर्यसमाज के प्रभाव में आए और फिर कांग्रेस से भी प्रभावित हुए। लेकिन प्रेमचंद की ही तरह उनका इन धाराओं से मोहभंग भी हुआ। फिर उन्होंने पतनोन्मुख भाववाद के विरुद्ध बौद्ध दर्शन को एक वैचारिक-आधार के रूप में ग्रहण किया। भारतीय समाज की संरचना, जाति, वर्ण और वर्ग की विशिष्टता एवं शोषण के विभिन्न रूपों की जटिलता आदि तमाम सवालों से लगातार जूझते रहे। इनका समाधान उन्हें मार्क्सवादी दर्शन में दिखाई पड़ा। वैज्ञानिक चेतना और समग्र विश्वदृष्टि के लिए अनवरत आत्मसंघर्ष उनकी प्रारंभिक रचनाओं में खुलकर व्यक्त हुआ है। ज्ञान की पिपासा और निरंतर कार्य करने की बेचैनी उनके व्यक्तित्व की विलक्षण विशेषताएँ हैं। उनका मानना था कि ज्ञान, विचार द्वारा वस्तु को जानने की एक चिरंतन तथा अंतहीन प्रक्रिया है और ज्ञानात्मक चेतना मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व से निर्धारित और प्रभावित होती है।

साहित्य-दर्शन और इतिहास के बारे में राहुल जी का यह परिप्रेक्ष्य क्रमश: विकसित होता गया। उन्होंने अपने जीवन काल में जो कुछ लिखा, उसमें समाज को समझने, समझाने और उसे बेहतर रूप में बदलने की बौद्धिक कोशिश दिखाई देती है। इस क्रम में अगर उनसे कहीं कोई गलती या किसी खास विश्लेषण में यांत्रिकता दिखाई देती है तो इसके पीछे उस युग की बौद्धिक संरचना की अपनी सीमाएँ भी हैं। फिर राहुल जैसे विराट रचनाफलक वाले लेखक के साथ तो यह और भी सहज है पर रचना के स्तर पर उनकी वैचारिक तेजस्विता, मौलिक प्रतिभा और प्रतिबद्धता बेमिसाल है।

उनकी रचनात्मकता तीन मोर्चे पर सक्रिय दिखाई देती है। एक तरफ वह जीवन और समाज की वैज्ञानिक दृष्टि से पड़ताल करती है, दूसरी तरफ वह जीवन में हस्तक्षेप करते हुए आम जनता के मानसिक स्तर को उन्नत करने के प्रयास से प्रेरित है और तीसरे मोर्चे पर वह जनता की सांस्कृतिक जरूरत को पूरा करने की जिम्मेदारी निभाते हुए जन-साहित्य की परंपरा को समृद्ध करती है। समाज और जीवन के सरोकारों और समकालीन सामाजिक समस्याओं पर अपनी बेबाक राय जाहिर करते हुए कई बार वे प्रचार-साहित्य और अभियानी-लेखन के स्तर पर भी उतरे। लेकिन यहाँ भी उनका स्तर उतना ही उच्च है, जितना अपने सृजनात्मक साहित्य में! तुम्हारी क्षय”, “क्या करें”, “साम्यवाद ही क्यों?”, “भागो नहीं दुनिया को बदलो”, “तीन नाटक”, और रामराज्य और मार्क्सवाद जैसी पुस्तकें इसका उदाहरण हैं।
राहुल जी की जनपक्षधरता और तीव्र अन्वेषणात्मक प्रतिभा विवादों से परे है। अपने लेखन कार्यकाल के 34-35 वर्षों में उन्होंने लगभग 50 हजार पृष्ठों का साहित्य प्रकाशित किया। अभी भी उनकी कुछ पाण्डुलिपियाँ अप्रकाशित हैं। अपने सक्रिय जीवन की समस्त संभावनाओं का उन्होंने भरपूर उपयोग किया। एक बार किसी मित्र ने उनकी इस बात के लिए आलोचना कर दी कि आप हमेशा काम में जल्दबाजी दिखाते हैं। इतना लिखते हैं कि जल्दबाजी के कारण कई काम पूर्णता को नहीं छू पाते। इस पर राहुल जी ने बुद्ध को उद्धृत किया—“बुद्ध कह गए हैंसब्बम् खनिकम् (सब कुछ क्षणिक है) और फिर लेनिन ने भी कहा है कुछ भी अन्तिम नहीं है। इसलिए मैं नहीं मानता कि कोई भी मनुष्य पूर्ण है। मैंने कोई सत्य का एकाधिकार नहीं रखा है। मैं अपना काम करता हूँ। भावी पीढी आएगी और मेरे काम को सुधारेगी।
राहुल सांकृत्यायन के महान क्रांतिदर्शी कार्यकर्ता बहुत सारे लोग आज भी अनभिज्ञ हैं। कम लोगों को मालूम है कि वे बिहार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। 20 अक्टूबर, 1939 ईo को जब बिहार में भाकपा की इकाई गठित हुई तो पहली स्थापना बैठक में उपस्थित कुल 19 लोगों में एक राहुल जी भी थे। वे किसान आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती, कार्यानन्द शर्मा और राहुल सांकृत्यायन बिहार प्रांतीय किसान सभा के शलाका पुरुष माने जाते हैं। सन् 1939 ईo के शुरू में ही किसान सभा ने राहुल जी को छपरा जिले के किसान संघर्षों को संगठित करने की जिम्मेदारी सौंपी। फरवरी, ’39 में वे छपरा गए और वहाँ  आंदोलन का नेतृत्व करते रहे। अमवारी नामक एक गाँव में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा संरक्षित जमींदारों के एक गिरोह ने उन पर कातिलाना हमला कराया। 20 फरवरी, सन् 1939 को उन्हें गाँव के बाहर खेत में पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। फिर इसी हालत में पुलिस उन्हें जेल ले गई। इस घटना की सूचना जंगल में आग की तरह बिहार और फिर देश भर में फैल गई। उस वक्त के अखबारों ने भी इस घटना पर विस्तृत खबरें छापीं। रामवृक्ष बेनीपुरी और प्रोo मनोरंजन ने इस पर कई रचनाएँ लिखीं। जेल के अन्दर भी राहुल जी ने आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने किसान क्रांतिकारियों को राजनैतिक कैदी का दर्जा दिलाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल भी की। 1 अप्रैल, 1939 ईo को संपूर्ण बिहार में राहुल पर हमला विरोधी दिवस मनाया गया। वे सन् 1940 ईo में किसान सभा के प्रांतीय अध्यक्ष चुने गए। इसी वर्ष अखिल भारतीय किसान सभा के पाँचवे अधिवेशन (जो आंध्रप्रदेश के पलासा में होने वाला था) के लिए उन्हें सभापति भी मनोनीत किया गया। राहुल जी के जीवन और कर्म में सिद्धान्त और व्यवहार की जैसी एकरूपता दिखाई देती है वह सचमुच बेमिसाल है।
एक अध्यापक के रूप में उन्होंने सोवियत संघ के लेनिनग्राद में दो वर्षों तक कार्य किया। सन् 47 ईo में स्वदेश लौटे तो यहाँ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बंबई अधिवेशन के सभापति बनाए गए। सन् 47-48 ईo में भाषा-विवाद को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी से उनके गहरे मतभेद हुए। बंबई में साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में दिए भाषण पर भाकपा-नेतृत्व को घोर आपत्ति थी। इस प्रकरण को लेकर वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर दिए गए। लेकिन सदस्यता से वंचित रहने की स्थिति में भी वह भाकपा और उसकी राजनीतिक गतिविधियों का निरंतर समर्थन और सहयोग करते रहे। फरवरी, सन् 1955 ईo में फिर से कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। निधन के समय तक कम्युनिस्ट बने रहे।
उन्होंने कमलाजी से विवाह किया। सन् 1953 और 55 ईo में क्रमश: पुत्री जया और पुत्र जेता पैदा हुए। सन् 50 ईo में ही मसूरी में घर बसाया। लेकिन वह कहीं रुकने वाले कहाँ थे? सन् 58 ईo में फिर चीन गए। सन् 59 ईo में आए और मसूरी छोड़ दार्जिलिंग बसे। इसी वर्ष उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिर सन् 59-61 ईo के दौरान वे श्रीलंका में दर्शनशास्त्र के महाचार्य रहे।
सन् 1961 ईo के दिसम्बर महीने में स्मृति लोप का आघात हुआ और वे बिस्तर पर पड़ गए। एक महान् क्रांतिदर्शी लेखक यायावर और आंदोलनकारी के पाँव ठिठक गए। लगातार चलते ही रहने वाले इस विराट व्यक्तित्व के सामने मौत आ खड़ी हुई। सोवियत संघ में सात महीने तक चिकित्सा हुई। लेकिन 14 अप्रैल, 1963 का दिन आ पहुँचा।
जीवन और सृजन के प्रति उनकी अदम्य जिजीविषा आगे आने वाली पीढ़ियों को अनवरत काल तक प्रेरणा देगी। डॉo प्रभाकर माचवे ने उनके विपुल सृजनात्मक साहित्य के विषय की विविधताओं और विस्तार पर आश्चर्य प्रकट करते हुए लिखा है—“तिब्बत जैसे वर्जित प्रदेश की दुर्गम यात्राओं की बाधाओं और राष्ट्रीय आंदोलन के राजनैतिक संघर्ष में कारावास की कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने इतने ग्रंथ कैसे रचे ?”1 छह फुट लंबी स्वस्थ और सुंदर देहयष्टि वाले राहुल ने तेरह-चौदह वर्ष की अवस्था से मृत्यु तक लगातार संघर्ष किया। समाज और मानव जीवन की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे। अपने जीवन के किसी भी पल को व्यर्थ गुजरने नहीं देना चाहते थे, हर समय किसी न किसी योजना में लगे रहते।
वे आजीवन एक महान् बौद्धिक-योद्धा की तरह असत्य, अन्याय और अंधविश्वास से जूझते रहे। बौद्धदर्शन से मिली रोशनी ने उनके मार्क्सवादी विचारक को पैनी दृष्टि और तीक्ष्ण तर्क-शक्ति दी। उनका मानना था कि मार्क्सवाद को भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों में ठोस ढंग से लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त सामंती मूल्यों, जातिवाद-संप्रदायवाद और इन्हें सैद्धांतिक जामा पहनाने के ब्राह्मणवादी चिंतन का घोर विरोध किया। इतिहास की व्याख्या के क्रम में उन्होंने जाति-प्रथा का जमकर विरोध किया और इसे समाज की ऐसी विकृति के रूप में चिन्हित किया जो मानव संबंध और सामाजिक आर्थिक विकास की प्रक्रिया को क्षति पहुँचा रही है। उनका मानना था कि जन्म के आधार पर इस प्रकार का विभाजन झूठा और नितांत समाज विरोधी है। पूर्वजों द्वारा समाज के व्यवस्थित संचालन के लिए कर्म के आधार पर चार वर्णों में विभाजित व्यवस्था की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा—“कार्य विभाजन की यह प्रणाली अपनी उपयोगिता खोकर झूठे भेद-भाव के गर्त में जा पड़ी है। उन्होंने यहाँ तक कहा—“जब तक जाति-पाति की व्यवस्था समाप्त नहीं होगी भारत के विकास के लिए किए गए सभी प्रयत्न अपूर्ण रहेंगे।2
राहुल जी सामाजिक विषमताओं, धर्म एवं संप्रदाय से जुड़ी कुरीतियों, ब्राह्मणवादी चिंतन की जनविरोधी चालबाजियों, मायावाद, रहस्यवाद और पुनर्जन्मवाद पर प्रहार करते हुए भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं की व्याख्या करते हैं। वे इन दार्शनिक धाराओं के वर्गीय सरोकारों की शिनाख्त करते हैं। चलताऊ जार्गनवाद(जागरणवाद ही होना चाहिए शायद – प्रस्तुतकर्ता)  का सहारा लेने के बजाय बड़े सहजग्राह्य ढंग से इनकी व्याख्या करते हैं। अंधविश्वासों पर प्रहार करते हुए वह भारतीय इतिहास के जाने-पहचाने घटनाक्रमों से उदाहरण भी देते हैं कौटिल्य के अर्थशास्त्र को देखने से साफ पता चलता है कि हजारों प्रकार के मिथ्या विश्वास, जिन्हें इस बीसवीं शताब्दी में ब्रह्मविद्या, योग और महात्माओं का चमत्कार कहकर सुशिक्षित लोग प्रचारित करना चाहते हैं, उन्हें मौर्य-साम्राज्य का यह महान् राजनीतिज्ञ झूठा समझता है।
इस महान् रचनाकार के जीवन और कृतित्व की विविधता, गंभीरता और गहराई को देखकर सचमुच आश्चर्य होता है कि इतना सारा काम करने के लिए वह अपने समय का समायोजन कैसे कर लेते थे। वह एक स्वाधीनता सेनानी थे, एक क्रांतिदर्शी किसान नेता और एक कम्युनिस्ट नेता, उपन्यासकार-कहानीकार, गीतकार-नाटककार, निबंधकार, दार्शनिक-विचारक, इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता थे। इन क्षेत्रों में किए गए उनके काम असाधारण महत्व के साबित हुए। ऐसा लगता था मानो वे हर चुनौतीपूर्ण इच्छित काम को समाप्त करने की जल्दी में थे। पूरी उम्र को उन्होंने सार्थक बनाया और 21 वर्षीय राम ओदार साधू से 69 वर्षीय राहुल सांकृत्यायन के जीवन के एक-एक मिनट का उन्होंने उपयोग किया।
उनके रचना-कर्म और जीवन-कर्म का सबसे प्रमुख लक्ष्य समाज-परिवर्तन और मनुष्य की वास्तविक मुक्ति के महान् आदर्शों से अनुप्राणित था। कम लोगों को मालूम है कि मार्क्स-ऐंग्लिस (ऐंगिल्स प्रस्तुतकर्ता) के कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो को हिन्दी में लाने का पहला प्रयास राहुल सांकृत्यायन और आचार्य नरेंद्र देव ने संयुक्त रूप से किया। सन् 1931 ईo में राहुल जी और नरेंद्र देव ने मिलकर इस ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद किया। महान् कथाकार प्रेमचंद ने इन्हें प्रेरित किया। हिन्दी रूपान्तरण प्रेमचंद के ही प्रेस में छप रहा था। प्रेस पर पुलिस ने छापा डाला। कई और परेशानियों के कारण वह छप नहीं सका। इस बात की चर्चा स्वयं राहुल जी ने प्रेमचंद स्मृति शीर्षक अपने एक लेख में की है। उन्होंने अपनी दर्जनों पुस्तकों और पुस्तिकाओं (बुकलेट) के माध्यम से हिन्दी भाषी प्रदेशों की कई पीढ़ियों को मार्क्सवादी दर्शन और विचारधारा की ओर प्रेरित किया। आने वाली पीढ़ियाँ भी उनके साहित्य को पढ़कर सामाजिक बदलाव और मानव मुक्ति के महान् उद्देश्यों से अपने को जोड़ती रहेंगी। राहुल जी के प्रिय सहयोगी रहे, हिन्दी के कवि बाबा नागार्जुन ने उनकी महान् उपलब्धियों का इन शब्दों में मूल्यांकन किया है “….कितना विचित्र वह व्यक्ति है जिसे किसानों ने अपनी संस्था का प्रमुख चुना, प्रगतिशील लेखकों ने जिसको अपना पथ-प्रदर्शक घोषित किया और अब हिन्दी जगत् के साहित्यिकों ने जिसे अपने महासम्मेलन का अध्यक्ष निर्वाचित किया है।
1. राहुल सांकृत्यायन : प्रभाकर माचवे, पृष्ठ 27
2. मानव समाज: राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ 106

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आईने में नेता (कविता)

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आईने में चेहरा देखते ही
डर जाता है आईना।

आखिर कौन है यह
जिसके सामने जाने से डरता है
आईना भी,
जो बेजान है
जिसकी शक्ल आईने में
बदल जाती है
और दिखता है कोई
पुराणों में वर्णित
राक्षस जैसा, डरावना
शायद नेता है!
आईने में जब यह व्यक्ति देखता है खुद को
नजर आता है चौरासी लाख पेटों वाला
भूत
लेकिन चेहरा तो नहीं दिखता ऐसा
फिर आईना झूठ बोल रहा है?
कहते हैं आईना सच ही बोलता है
इस हिसाब से
यह नेता ही है…

मार्क्स कहाँ गलत है? – राजेन्द्र यादव

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अंग्रेजी में एक मुहावरा है प्रॉफ़ेट ऑफ द डूम यानी क़यामत का मसीहा। कुछ लोग क़यामत की भविष्यवाणियाँ करते हैं, परम-निष्ठा और विश्वास से उसकी प्रतीक्षा करते हैं और जब वह आने लगती है तो उत्कट आह्लाद से नाचने-गाने लगते हैं; देखा, मैंने कहा था आयेगी और आ गयी! अब इस आने में भले ही अपना घर-बार ही क्यों न शामिल हो। क़यामत के परिणामों से अधिक प्रसन्नता उन्हें अपनी बात के सच हो जाने पर होती है। पूर्वी-यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारें धड़ाधड़गिर या उलट रही हैं, प्रदर्शन और परिवर्तन हो रहे हैं; लोग जिंदगी को अपने ढंग से ढालने और बनाने में लगे हैं और हम खुश हैं कि हम जानते थे, यही होगा। क्योंकि कम्युनिज्म असंभव है। मार्क्स ग़लत है। मैं गंभीरता से सोचना चाहता हूँ कि इस चरम-सत्य की खोज क्यों उन्हें इतना प्रसन्न करती है? मार्क्स क्यों ग़लत है? मार्क्स ने ऐतिहासिक और तार्किक प्रमाणों से यही तो कहा था कि मनुष्य-मनुष्य के बीच शोषण, असमानता और अन्याय की जो व्यवस्थाएँ रही हैं उन्हें समाप्त होना चाहिए इन्हें जायज़ और शाश्वत सिद्ध करने के जो तरीक़े ईजाद किये गये हैं उन्हें गहराई से समझने, उद्घाटित करने और उखाड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए क्योंकि यह इतिहास की माँग है। अब तक के मानव-समाजों का अध्ययन हमें यही सिखाता है कि इन विषमताओं के स्वरूप या उनके विरुद्ध लड़ने के मानवीय प्रयास क्या रहे हैं? क्या मानव-विकास अंधेरे की लक्ष्यहीन दौड़ है या उसके अपने कुछ नियम हैं? अगर नियम हैं तो क्या हैं? अब मेरी समझ में सचमुच नहीं आता कि इसमें आखिर ऐसा क्या है जो अभारतीय है या मार्क्स ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि उसे बार-बार कब्र खोद कर सूली पर लटकाया जाना चाहिए? शायद मार्क्स का अपराध इतना है कि बाकी लोगों की तरह उसने शोषण और अन्याय को दूर करने के सिद्धांत को सिर्फ एक सपने, मनुष्य को बराबर बताने वाले श्लोक और सदाशयी आकांक्षा या ईश्वरीय आशीर्वाद के रूप में ही क्यों नहीं रहने दिया हमें क्यों यह समझाने की कोशिश की कि यह सब ऐतिहासिक, भौतिक और व्यावहारिक है। इसके स्वरूप और तरीके हमेशा बदलते रहे हैं और इन्हें बदला जा सकता है, बदलना चाहिए। जहाँ तक समझ में आता है, सिर्फ दो ही तरह के लोग इसके विरोध में होने चाहिए एक वे जिनके पैरों तले जमीन इस सिद्धांत से खिसक रही हो, दूसरे वे जो सचमुच विश्वास करते हैं कि शोषण, अन्याय या असमानता शाश्वत हैं, ईश्वरीय हैं और आवश्यक या अनिवार्य है चूँकि वे हमेशा से हैं, इसलिए वे हमेशा रहेंगे, उन्हें रहना चाहिए। इन स्थितियों का कोई भी बदलाव उन्हें अभारतीय और अप्राकृतिक लगता है। वे अगर खुद इन स्थितियों के शिकार हैं तो यह उनकी नियति है।


      बहरहाल, यथास्थिति को अपनी व्यक्तिगत नियति मानने वाले चाहे जितने खुश और उल्लसित होते रहें, ऐतिहासिक नियति यही है कि आदमी बार-बार स्थितियों को बदलेगा, तोड़ेगा, बनायेगा और बेहतर जिंदगी की कोशिश करेगा। एक बार अपनी स्थिति और उसे बदलने के तरीके या क्षमता जान लेने के बाद कोई भी वह नहीं रहता जो पहले था। पूर्वी-यूरोप में भी यही प्रयोग चल रहा है और तीसरी दुनिया के देशों में भी। उसी रूस के समर्थन से, जो कल-तक हमारा स्वर्ग था।
      वस्तुत: न यह कम्युनिज्म की पराजय है, न पूँजीवादी डैमोक्रेसी की जीत। हो सकता है इस द्वंद्वात्मकता से उभरनेवाला कोई तीसरा ही रूप हो। गोर्बाचोव के ग्लासनोस्त ने इतना तो सिद्ध कर ही दिया है कि कम्यूनिज़्म का स्तालिनवादी मॉडल अब चल नहीं सकता। उसे हर जगह टूटना है, और सबसे पहले वह टूट रहा है पूर्वी-यूरोप के उन देशों में जहाँ द्वितीय महायुद्ध की बंदर-बाँट में कम्यूनिज़्म ऊपर से लाद दिया गया। वह वहाँ के अपने संघर्षों और अपने परिश्रम से अर्जित की गयी व्यव्स्था नहीं थी। इसलिए उसके प्रति विद्रोह, एक थोपी गयी व्यवस्था के प्रति विद्रोह है, एकाधिकार के खिलाफ संघर्ष है कम्यूनिज़्म के खिलाफ नहीं। हो सकता है कि नयी उभरने वाली पार्टियों और शक्तियों के नाम वे न रहें जिनके खिलाफ यह सारी जद्दोजहद है मगर अपनी अन्तर्वस्तु में वे पूँजीवादी नहीं ही होंगी। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस बदलाव के गुणात्मक स्वरूप वे नहीं होंगे जो तीसरी दुनिया के संघर्षशील देशों में हैं। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि क्रांति का निर्यात नहीं होता। हमेशा ऊपर से लादी जाने वाली व्यवस्था; दमन, भ्रष्टाचार और एकाधिकारी अधिनायकवाद को जन्म देती है घर-घर नीचे तक उसकी कल्याण योजनाओं को पहुँचाने वाले, चमचों और दलालों में बदल जाते हैं सर्वोच्च सत्ता का नाम लेकर हर अधिकारी छोटे-छोटे तानाशाहों का रूप ले लेता है। असंतोष, प्रतिरोध और क्रांतियाँ हमेशा नीचे, अपनी जड़ों से उभरने वाली शक्तियाँ हैं।
[मेरी तेरी उसकी बात, हंस, फरवरी, 1990]

100 में 99 मुस्लिम धोती नहीं पहनते। क्यों?

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भारत में इस्लाम पर बोलना हमेशा से विवादास्पद रहा है। कोई कहता है कि फलाँ व्यक्ति या नेता तुष्टिकरण की नीति अपना रहा है, तो कोई मुस्लिमों का पक्ष लेने पर हिन्दुओं का विरोधी कह देता है। भारतीय इतिहास का अपना शून्य के बराबर ज्ञान जिसे ज्ञान भी नहीं ही कहना चाहिए, से मैंने फ़ेसबुक पर जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के नोट पर कुछ बातें रखीं। कुछ सवाल हैं, जो कई बार सोचने के लिए बाध्य करते हैं या जिनका उत्तर नहीं मिलता या मैं जिनका उत्तर नहीं खोज पाता।
      यहाँ चतुर्वेदी जी का नोट है और नीचे मेरे विचार, जो मैंने फ़ेसबुक पर रखे थे।


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रूढ़िवाद की देन है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष

इस्लामिक दर्शन और धर्म की परंपराओं के बारे में घृणा के माहौल को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है मुसलमानों और इस्लाम धर्म के प्रति अलगाव को दूर किया जाए। मुसलमानों को दोस्त बनाया जाए। उनके साथ रोटी-बेटी के संबंध स्थापित किए जाएं। उन्हें अछूत न समझा जाए। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को निर्मित करने लिए जमीनी स्तर पर विभिन्न धर्मों और उनके मानने वालों के बीच में सांस्कृतिक -सामाजिक आदान-प्रदान पर जोर दिया जाए। अन्तर्धार्मिक समारोहों के आयोजन किए जाएं। मुसलमानों और हिन्दुओं में व्याप्त सामाजिक अलगाव को दूर करने के लिए आपसी मेलजोल,प्रेम-मुहब्बत पर जोर दिया जाए। इससे समाज का सांस्कृतिक खोखलापन दूर होगा,रूढ़िवाद टूटेगा  और सामाजिक परायापन घटेगा।
      भारत में करोड़ों मुसलमान रहते हैं लेकिन गैर मुस्लिम समुदाय के अधिकांश लोगों को यह नहीं मालूम कि  मुसलमान कैसे रहते हैंकैसे खाते हैं, उनकी क्या मान्यताएं, रीति-रिवाज हैं। अधिकांश लोगों को मुसलमानों के बारे में सिर्फ इतना मालूम है कि दूसरे वे धर्म के मानने वाले हैं । उन्हें जानने से हमें  क्या लाभ है। इस मानसिकता ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के सामाजिक अंतराल को बढ़ाया है। इस अंतराल ने संशय,घृणा और बेगानेपन को पुख्ता किया है।
     मुसलमानों के बारे में एक मिथ है कि उनका खान-पान और हमारा खान-पान अलग है, उनका धर्म और हमारा धर्म अलग है। वे मांस खाते हैं, गौ मांस खाते हैं। इसलिए वे हमारे दोस्त नहीं हो सकते। मजेदार बात यह है कि ये सारी दिमागी गड़बड़ियां कारपोरेट संस्कृति उद्योग के प्रचार के गर्भ से पैदा हुई हैं।
    सच यह है कि मांस अनेक हिन्दू भी खाते हैं,गाय का मांस सारा यूरोप खाता है। मैकडोनाल्ड और ऐसी दूसरी विश्वव्यापी खाद्य कंपनियां हमारे शहरों में वे ही लोग लेकर आए हैं जो यहां पर बड़े पैमाने पर मुसलमानों से मेलजोल का विरोध करते हैं। मीडिया के प्रचार की खूबी है कि उसने मैकडोनाल्ड का मांस बेचना, उसकी दुकान में मांस खाना, यहां तक कि गौमांस खाना तो पवित्र बना दिया है, लेकिन मुसलमान यदि ऐसा करता है तो वह पापी है,शैतान है ,हिन्दू धर्म विरोधी है।
     आश्चर्य की बात है जिन्हें पराएपन के कारण मुसलमानों से परहेज है उन्हें पराए देश की बनी वस्तुओं, खाद्य पदार्थों , पश्चिमी रहन-सहनवेशभूषाजीवनशैली आदि से कोई परहेज नहीं है। यानी जो मुसलमानों के खिलाफ ज़हर फैलाते हैं वे पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अंधभक्तों की तरह प्रचार करते रहते हैं। उस समय उन्हें अपना देशअपनी संस्कृतिदेशी दुकानदारदेशी मालदेशी खानपान आदि कुछ भी नजर नहीं आता। अनेक अवसरों पर यह भी देखा गया है कि मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने वाले पढ़े लिखे लोग ऐसी बेतुकी बातें करते हैं जिन्हें सुनकर आश्चर्य होता है। वे कहते हैं मुसलमान कट्टर होता है। रूढ़िवादी होता है। भारत की परंपरा और संस्कृति में मुसलमान कभी घुलमिल नहीं पाएवे विदेशी हैं।
    मुसलमानों में कट्टरपंथी लोग यह प्रचार करते हैं कि मुसलमान तो भारत के विजेता रहे हैं।वे मुहम्मद बिन कासिम,मुहम्मद गोरी और महमूद गजनवी की संतान हैं। उनकी संस्कृति का स्रोत ईरान और अरब में है। उसका भारत की संस्कृति और सभ्यता के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सच यह नहीं है।
   सच यह है कि 15वीं शताब्दी से लेकर आज तक भारत के सांस्कृतिक -राजनीतिक-आर्थिक निर्माण में मुसलमानों की सक्रिय भूमिका रही है। पन्द्रहवीं से लेकर 18वीं शताब्दी तक उत्तरभारत की प्रत्येक भाषा में मुसलमानों ने शानदार साहित्य रचा है। भारत में तुर्क,पठान अरब आदि जातीयताओं से आने शासकों को अपनी मातृभाषा की भारत में जरूरत ही नहीं पड़ी,वे भारत में जहां पर भी गए उन्होंने वहां की भाषा सीखी और स्थानीय संस्कृति को अपनाया। स्थानीय भाषा में साहित्य रचा। अपनी संस्कृति और सभ्यता को छोड़कर यहीं के होकर रह गए। लेकिन जो यहां के रहने वाले थे और जिन्होंने अपना धर्म बदल लिया था उनको अपनी भाषा बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई। जो बाहर से आए थे वे स्थानीय भाषा और संस्कृति का हिस्सा बनकर रह गए।
   हिन्दी आलोचक रामविलास शर्मा ने लिखा है मुसलमानों के रचे साहित्य की एक विशेषता धार्मिक कट्टरता की आलोचना, हिन्दू धर्म के प्रति सहिष्णुताहिन्दू देवताओं की महिमा का वर्णन है। दूसरी विशेषता यहाँ की लोक संस्कृति,उत्सवों-त्यौहारों आदि का वर्णन है। तीसरी विशेषता सूफी-मत का प्रभाव और वेदान्त से उनकी विचारधारा का सामीप्य है।
   उल्लेखनीय है दिल्ली सल्तनत की भाषा फारसी थी लेकिन मुसलमान कवियों की भाषाएँ भारत की प्रादेशिक भाषाएँ थीं। अकबर से लेकर औरंगजेब तक कट्टरपंथी मुल्लाओं ने सूफियों का जमकर विरोध किया। औरंगजेब के जमाने में उनका यह प्रयास सफल रहा और साहित्य और जीवन से सूफी गायब होने लगे। फारसीयत का जोर बढ़ा।       
 भारत में ऐसी ताकतें हैं जो मुसलमानों को गुलाम बनाकर रखने ,उन्हें दोयमदर्जे का नागरिक बनाकर रखने में हिन्दू धर्म का गौरव समझती हैं। ऐसे संगठन भी  हैं जो मुसलमानों के प्रति अहर्निश घृणा फैलाते रहते हैं। इन संगठनों के सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव का ही दुष्परिणाम है कि आज मुसलमान भारत में अपने को उपेक्षित,पराया और असुरक्षित महसूस करते हैं।
    जिस तरह हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन सक्रिय हैं वैसे ही मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन भी सक्रिय हैं। ये एक ही किस्म की विचारधारा यानी साम्प्रदायिकता के दो रंग हैं।
    हिन्दी के महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने हिन्दू-मुस्लिम भेद को नष्ट करने के लिए जो रास्ता सुझाया है वह काबिलोगौर है। उन्होंने लिखा-‘‘ भारतवर्ष में जो सबसे बड़ी दुर्बलता है ,वह शिक्षा की है। हिन्दुओं और मुसलमानों में विरोध के भाव दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाय। परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों,दोनों एक-दूसरे की सभ्यता को पढ़ें और सीखें। फिर जिस तरह भाषा में मुसलमानों के चिह्न रह गए हैं और उन्हें अपना कहते हुए अब किसी हिन्दू को संकोच नहीं होता, उसी तरह मुसलमानों को भी आगे चलकर एक ही ज्ञान से प्रसूत समझकर अपने ही शरीर का एक अंग कहते हुए हिन्दुओं को संकोच न होगा। इसके बिना,दृढ़ बंधुत्व के बिना ,दोनों की गुलामी के पाश नहीं कट सकते,खासकर ऐसे समय ,जबकि फूट डालना शासन का प्रधान सूत्र है।’’
   भारत में मुसलमान विरोध का सामाजिक और वैचारिक आधार है जातिप्रथावर्णाश्रम व्यवस्था। इसी के गर्भ से खोखली भारतीयता का जन्म हुआ है जिसे अनेक हिन्दुत्ववादी संगठन प्रचारित करते रहते हैं। जातिप्रथा के बने रहने के कारण धार्मिक रूढ़ियां और धार्मिक विद्वेष भी बना हुआ है।
     भारत में धार्मिक विद्वेष का आधार है सामाजिक रूढ़ियाँ। इसके कारण हिन्दू और मुसलमानों दोनों में ही सामाजिक रूढ़ियों को किसी न किसी शक्ल में बनाए रखने पर कट्टरपंथी लोग जोर दे रहे हैं। इसके कारण हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष बढ़ा है। सामाजिक एकता और भाईचारा टूटा है। हिन्दू-मुसलमान एक हों इसके लिए जरूरी है धार्मिक -सामाजिक रूढ़ियों का दोनों ही समुदाय अपने स्तर पर यहां विरोध करें।
   हिन्दू-मुस्लिम समस्या हमारी पराधीनता की समस्या है। अंग्रेजी शासन इसे हमें विरासत में दे गया है। इस प्रसंग में निराला ने बड़ी मार्के की बात कही है। निराला का मानना है हिन्दू मुसलमानों के हाथ का छुआ पानी पिएंपहले यह प्राथमिक साधारण व्यवहार जारी करना चाहिए। इसके बाद एकीकरण के दूसरे प्रश्न हल होंगे।
      निराला के शब्दों में हिन्दू-मुसलमानों में एकता पैदा करने के लिए इन समुदायों को ‘‘वर्तमान वैज्ञानिकों की तरह विचारों की ऊँची भूमि’’ पर ले जाने की जरूरत है। इससे ही वे सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त होंगे।
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मेरी बात
पढ़ा। कुछ ठीक, कुछ असहमति। वैसे मुसलमान भारत के शासक जब थे तब उन्होंने अंग्रेजों की तरह लूटा नहीं और भारत को उस तरह बरबाद भी नहीं किया, यह सही है। हालाँकि मुस्लिम शासकों के द्वारा ही अंग्रेजों को यहाँ प्रश्रय दिया गया। और भारत में अंग्रेजों के साथ संघर्ष करने वाले प्रमुख और सबसे पहले राजाओं में सिराजुद्दौला भी मुस्लिम थे, और भारत को अंग्रेज सत्ता के चरणों में डालने का पहला कारण भी मीरजाफ़र, मुस्लिम ही था। यह तो वास्तव में होता है कि हिन्दू लोगों में एक बड़ा हिस्सा धर्म से लटकता नहीं रहता लेकिन मुस्लिम लोग कुरआन को आसमानी किताब कहकर उससे चिपके रहते हैं और प्रगति का भविष्य अंधकार में ले जाते हैं। रही भाषा की बात, तो कुछ कारण होते ही हैं झगड़े के। जैसे पटना दूरदर्शन से उर्दू समाचार सुनिए। उसमें कार्यक्रम की जगह प्रोग्राम कहा जाता है लेकिन कार्यक्रम नहीं। मतलब वे अरबी-फ़ारसी पर्याय न होने पर या सहजता से उपलब्ध न होने पर अंग्रेजी की गोद में जाते हैं लेकिन तत्सम शब्दों या भारत के देशज शब्दों से उन्हें दुश्मनी है। जबकि हिन्दी प्रदेश का हर आदमी, हिन्दी समाचारवाचक हर दिन अरबी-फ़ारसी शब्द के बोलता है और वह इफ़रात मात्रा में। भाषायी दुराग्रह क्यों है मुसलमानों में?
या एक और सवाल उठा सकते हैं। कि क्यों हिन्दू पैजामा-कुरता जो तुर्की-ईरानी लोगों का पहनावा है, आराम से पहनता है, लेकिन मुसलमान लोग धोती-कुरता नहीं पहनते। क्यों?
निश्चय ही हिन्दूवादी कई संगठन मुसलमानों के खिलाफ़ अंध प्रचार करते रहे हैं, लेकिन मुसलमान इनसे अधिक ही दोषी है, कम नहीं। राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं कि हिन्दू में अगर जाति व्यवस्था है, शूद्र-सवर्ण है तो मुसलमानों में भी पठान आदि का झगड़ा है। शिया-सुन्नी का झगड़ा है। मतलब इतिहास बड़ा विचित्र है।
कहीं श्वेत-अश्वेत, नीग्रो आदि का झगड़ा तो कहीं ईसाई-यहूदी का झगड़ा, कहीं हिन्दू-मुस्लिम का झगड़ा, कहीं कुछ, कहीं कुछ। यानी विश्व का इतिहास हर जगह एक जैसा ही रहा है।
बात रही मांस खाने-बेचने की तो साहब, व्यापार का कोई धर्म नहीं है, पूँजीवादियों का एक ही धर्म है, वह है पूँजी।
आज भी नबी, पैगम्बर के बहाने इस्लाम यह खूँटा ठोके रहता है कि संसार में अब हजरत मोहम्मद से महान और ज्ञानी नहीं होगा। कुरआन अन्तिम और आसमानी ग्रंथ है। इसपर तर्क यह कि सब धर्मों में या उनके ग्रंथों में कमी होती है, इसलिए महापुरुष बदलते रहते हैं, लेकिन इस्लाम में सब कुछ ठीक है। अब ऐसी बातें कहने वाले को भला हम कैसे समझें-समझाएँ?
समस्या धर्म में है, जाति में है और आप कह रहे हैं कि दोनों धर्म आपस में मिलें या एक दूसरे को समझें। यह तो हमें पीछे धकेलने की बात हो जाएगी। धर्म और भगवान की सत्ता को ऊँखाड़ना हमारा लक्ष्य होना चाहिए, न कि झूठी राजनीति या मित्रता के नाम पर इस अत्याचार को चलने देने का मौका मिलना चाहिए।
इस लेख के कई अंश बहुतों को ठीक नहीं भी लग सकते। 

योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-2)

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योद्धा संन्यासी का जीवन

महापंडित राहुल सांकृत्यायन एक महान् रचनाकार, अन्वेषी इतिहासकार और जनयोद्धा थे। भारतीय नवजागरण की चेतना के इस महान् अग्रदूत ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रगतिशील और प्रौढ़ वैचारिक मूल्यों से जोड़ते हुए एक नई रचना-संस्कृति विकसित की। व्यक्तित्व की तरह उनका रचना-संसार भी व्यापक और बहुआयामी है। सचमुच, आश्चर्य होता है कि किशोरवय में ही घर-बार छोड़कर संन्यासी बन गये राहुल व्यवस्थित शिक्षा-दीक्षा और समय एवं सुविधा सम्बन्धी कठिनाइयों के बावजूद इतने महान् रचनाकार और बुद्धिजीवी कैसे बने!
जिज्ञासा और संघर्ष की प्रखर चेतना ने साधारण परिवार में जन्में बालक केदारनाथ को राहुल सांकृत्यायन के रूप में विकसित किया। ग्यारह वर्ष की अवस्था से शुरु हुई उनकी ज्ञान-यात्रा स्मृति लोप होने तक जारी रही। बुद्ध के इस वचन को उन्होंने हमेशा अपने जीवन-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण सूत्र माना –“मैंने ज्ञान को अपने सफर में नाव की तरह लिया है, सिर पर एक बोझ की तरह नहीं।

 उनका जन्म आजमगढ़ (उत्तरप्रदेश) जिले के पंदाहा गाँव, अपने नाना के घर रविवार, 9 अप्रैल, 1893 ईo को हुआ। पिता गोवर्द्धन पाण्डेय कनैला गाँव के रहने वाले थे। जन्म के समय उनकी माता कुलवंती देवी अपने मायके आई हुई थीं। नाना ने उनका नाम केदारनाथ रखा। वह चार भाइयों और एक बहन में सबसे ज्येष्ठ थे। बालक केदारनाथ को सन् 1898 ईo में मदरसे में दाखिल कराया गया। सन् 1900 ईo में आस-पास के कई गाँवों में हैजे की बीमारी फैली। गाँव का एक साथी बिरजू हैजे का शिकार हुआ। राहुल जी पर अपने मित्र की मृत्यु का शोक काफी दिनों तक छाया रहा। जनेऊ के लिए नाना रामशरण पाठक सन् 1902 ईo में उन्हें विंध्याचल ले गए। भविष्य के महान् यायावर और पर्यटक की संभवत: यह पहली यात्रा थी। उन्होंने पहली बार पहाड़ के दर्शन किए। सन् 1904 ईo में 11 वर्ष की अवस्था में परिवार वालों ने उनकी शादी कर दी। बालक केदारनाथ को यह सब तमाशा सा लगा। इस बारे में इन्होंने लिखा है—“उस वक्त ग्यारह वर्ष की अवस्था में मेरे लिए यह तमाशा था। जब मैं सारे जीवन पर विचारता हूँ तो मालूम होता है कि समाज के प्रति विद्रोह का प्रथम अंकुर पैदा करने में उसने ही पहला काम किया। सन् 1908 ईo में जब मैं पंद्रह साल का था, तभी से मैं उसे शंका की नजर से देखने लगा था। सन् 1908 ईo के बाद से तो मैं गृहत्याग का बाकायदा अभ्यास करने लगा, जिसमें भी इस तमाशे का थोड़ा-बहुत हाथ जरूर था। माँ कुलवंती देवी पहले ही चल बसी थीं। मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र 28 साल की थी। माँ के मर जाने के बाद राहुल का ननिहाल में पालन-पोषण हुआ था।
सन् 1907 ईo आते-आते राहुल का घर-परिवार से मोहभंग-सा होने लगा। इसी वर्ष वे पहली बार घर से भागे और कलकत्ता पहुँचे। फिर दूसरी बार सन् 1909 ईo में कलकत्ता गए। वहाँ कई तरह के काम किए। बनारस के सुँधनी साहू की वहाँ एक बड़ी दुकान थी। राहुल को उसमें नौकरी मिली। इस बीच वह बनारस भी रहे। सन् 1910 ईo के बाद से ही घुमक्कड़ी और सधुक्कड़ी उनके जीवन में रचबस गई। इस घुमक्कड़ संन्यासी का नाम पड़ा- राम ओदार दास। सन् 1911-12 ईo में पंडित मुखराम के यहाँ उनकी भेंट परसा मठ (छपरा) के महंत रामकुमार दास से हुई। वे मठ में रहने लगे और सन् 1912-13 ईo में महंत के उत्तराधिकारी तय किए गए। इस बीच एक बार वे कनैला-पंदाहा भी गए। लोगों ने बहुत फटकारा लेकिन कुछ ही दिनों बाद वे फिर परसा मठ पहुँच गए। लेकिन धीरे-धीरे मठ के बँधे-बँधाए जीवन की यांत्रिकता से वे ऊबने लगे। सन् 1913-14 ईo में उन्होंने दक्षिण भारत की लंबी यात्रा की। जुलाई, 1913 ईo में उन्होंने परसा मठ छोड़ा। आसनसोल, आद्रा, खड्गपुर होते हुए वे पुरी और फिर मद्रास पहुँचे। तिरूमलै भी गए। उन्होंने यहाँ तमिल सीखी। फिर तिरुपति कांजी कांचीपुरम् और रामेश्वरम् गए। सन् 1914 ईo में एक बार फिर परसा मठ लौटे। कुछ दिनों तक यहाँ रहने के बाद वे अयोध्या गए। इसी दौरान वे आर्य समाज के प्रभाव में आए। तब तक उन्होंने वेदांत का अध्ययन कर लिया था। इस इलाके में बलि चढ़ाने की परंपरा थी। काली मंदिर में बकरे की बलि देने के विरोध में उन्होंने एक जोरदार व्याख्यान दिया। सनातनी पुरोहितों ने उन्हें लाठियों से पीटा। वे एक युवा नास्तिक-आर्य समाजी संन्यासी के रूप में चर्चित हो चुके थे। फिर उन्होंने आगरा में रहते हुए संस्कृत, अरबी के धर्म ग्रंथों और इतिहास का अध्ययन किया। मेरठ से छपने वाले भास्कर में राहुल जी का पहला लंबा लेख इसी दौरान छपा। वह ढोंगी साधुओं के खिलाफ था। सन् 1916 ई में वे लाहौर गए और वहाँ संस्कृत एवं अरबी ग्रंथों का विशद् अध्ययन किया। सन् 1917 ईo में रूसी क्रांति हुई। उसकी खबरें राहुल जी रुचि के साथ पढ़ते। सन् 1918 ईo में उन्होंने साम्यवादी दर्शन का अध्ययन शुरु किया। उस वक्त इस बारे में बहुत कम साहित्य उपलब्ध था। सन् 1921-22 ईo में रूस के तत्कालीन कम्युनिस्ट नेता ट्राटस्की की प्रसिद्ध पुस्तक बोल्शेविज्म एवं विश्वक्रांति पढ़ने को मिली। 29 अक्टूबर, 1922 ईo को वे कांग्रेस के जिला सचिव चुने गए। फिर उन्होंने नेपाल की यात्रा की। यहाँ बौद्ध विद्वानों, लामाओं और भिक्षुओं से ज्ञान प्राप्त किया।
राहुल जी ने संन्यासी जीवन में ज्ञानार्जन किया और इस ज्ञान ने उन्हें समाज और राजनीति से जोड़ा। 11 जनवरी, 1922 ईo को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया। बक्सर जेल में रहे। रिहा होने के बाद यात्रा पर निकले। लौटने पर आंदोलन छिड़ा और और फिर जेल गए। अप्रैल, सन् 1923 ईo में उन्हें हजारीबाग जेल में भेजा गया। जेल प्रवास के दौरान उन्होंने बाईसवीं सदी नामक पुस्तक की रचना की। उनका जेल जाना, जेल में अध्ययन-लेखन, बाहर निकलकर आंदोलनों में शामिल होना और फिर जेल जाने का सिलसिला निरंतर जारी रहा।
18 अप्रैल, 1925 ईo को दो वर्ष की सजा भुगतकर हजारीबाग जेल से रिहा हुए। इस वक्त तक यह विद्वान संन्यासी बिहार में ब्रिटिश हुकूमत के लिए सिरदर्द बन चुका था। प्रशासन ने उन्हें आंदोलनकारी नेता के रूप में चिन्हित कर लिया था। सन् 1926 ईo में वे कानपुर कांग्रेस के लिए प्रतिनिधि और आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। उसी वर्ष उन्होंने तिब्बत की यात्रा की। फिर गोहाटी कांग्रेस में भाग लिया।
सन् 1922 ईo से 37 के बीच के वर्ष राहुल जी के जीवन और चिंतन के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जीवन-जगत, दर्शन, राजनीति और धर्म का गहरा अध्ययन किया। सन् 1930-31 ईo आते-आते वे अनीश्वरवादी हो गए। बौद्ध-दर्शन ने उन्हें गहरे सार तक प्रभावित किया। इसके अध्ययन के क्रम में वे तिब्बत, श्रीलंका और चीन गए। सन् 1927-28 ईo में उन्होंने श्रीलंका में अध्ययन और अध्यापन किया। सन् 1929-30 ईo के दौरान सवा साल उन्होंने तिब्बत में बिताए। सन् 30 ईo में भारत के लिए रवाना होने से पहले पुस्तकें, चित्रपट और अन्य महत्वपूर्ण चीजें बाँधकर खच्चरों के माध्यम से कलिंगपोंग रवाना कर दिया। अब वे रामओदार साधु से राहुल सांकृत्यायन बन गए। श्रीलंका स्थित विद्यालंकार विहार में बौद्ध भिक्षु के रूप में दीक्षित होने के बाद यह नया नाम मिला।
सन् 1932-33 ईo में वे यूरोप की यात्रा पर रहे। सन् 1934 ईo में दुबारा तिब्बत गए। वे कम्युनिस्ट-दर्शन के नज़दीक आ गए। इंग्लैंड-प्रवास के दौरान वे डेली-वर्कर नामक पत्र नियमित पढ़ते थे। उस वक्त अपने राजनीतिक चिंतन में आए परिवर्तन को उन्होंने स्वयं ही रेखांकित किया है मैं कम्युनिस्ट पार्टी का मेम्बर नहीं था लेकिन लेनिन-स्टालिन की पार्टी को छोड़ मैं किसी के विचारों और कार्यप्रणाली को पसन्द नहीं करता था। सन् 35 ईo में उन्होंने जापान, कोरिया, मंचूरिया, ईरान और सोवियत संघ की यात्रा की। सन् 1936 ईo में तीसरी बार तिब्बत गए। फिर 1937 ईo में दूसरी बार सोवियत संघ जा पहुँचे। सन् 1936-37 ईo के दौरान उन्होंने गांधीवाद और साम्यवाद और जमींदारी-प्रथा जैसे लेख लिखे। सोवियत संघ में उनकी मुलाकात लोला (पूरा नामएलेना नर्वेर्तोवना कोजैरोवस्काया) नामक प्रबुद्ध महिला से हुई। वह अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और मंगोल भाषाएँ बोल सकती थीं। उन्होंने लोला से रूसी सीख ली और उसे संस्कृत सिखाया। राहुल ने लोला से विवाह कर लिया और 5 सितम्बर, 1938 ईo को एक पुत्र ईगोर का जन्म हुआ। लेकिन जन्म से पहले ही राहुल स्वदेश लौट आए। लोला नहीं आ सकी।
यहाँ आने पर उन्होंने कई स्थानों पर आन्दोलन में भाग लिया। कांग्रेस से उनका पूरी तरह मोहभंग हो चुका था। सन् 1938-39 ईo में अमवारी के किसानों का नेतृत्व किया। बड़हिया रेवड़ा और गया के किसान आन्दोलन में भी भाग लिया। फरवरी, 1939 ईo में अमवारी आन्दोलन के दौरान उन पर प्राणघातक हमला हुआ और जेल भेजे गए। जेल-प्रवास में उन्होंने तुम्हारी क्षय लिखी। 10 मई को जेल से रिहा हुए। छितौली किसान आन्दोलन में भाग लेते वक्त फिर गिरफ्तार हुए और हजारीबाग जेल भेजे गए। जेल में अनशन कर दिया। अनशन के 17वें दिन उन्हें रिहा किया गया।
सन् 1940 ईo में उन्हें प्रान्तीय किसान सभा का सभापति चुना गया। उधर रामगढ़ कांग्रेस के लिए प्रतिनिधि और प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए। मार्च महीने में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग से देवली कैंप जेल भेजे गए। यहीं पर उन्होंने कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के साथ 23 अक्टूबर, 1941 ईo से इतिहास प्रसिद्ध भूख हड़ताल की।
इस दौरान उन्होंने अपनी पुस्तकें—“दर्शन-दिग्दर्शन, विश्व की रूपरेखा, मानव समाज, वैज्ञानिक भौतिकवाद, बौद्धदर्शन लिखीं। राहुलजी दो दर्जन से अधिक भाषाओं के ज्ञाता थे पर उन्होंने आमतौर पर हिन्दी में ही लिखना पसंद किया। प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता और उनके सहकर्मी रहेरमेश सिन्हा, अली अशरफ और इंद्रदीप सिन्हा के अनुसार वे 34 भाषाएँ जानते थे। मित्र और सहयोगी रहे डॉo प्रभाकर माचवे ने भी लिखा है—“वे 34 से अधिक भाषाओं के ज्ञाता थे। यह जानकर विस्मय होता कि कैसे उन्होंने इतनी भाषाएँ सीखीं!

(जारी…)

प्रभात प्रकाशन मतलब भाजपा-जदयू का प्रकाशन…राष्ट्रीय पुस्तक मेला, पटना से लौटकर

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इस बारह तारीख को पुस्तक मेले में गए। बहुत अच्छा तो नहीं कह सकते लेकिन अच्छा ही लगा। वैसे भी पुस्तक मेले में पाठक को किताब लेकर पढ़ने-देखने की जितनी छूट दुकानदार देते हैं, उतनी दुकान में तो देते नहीं। नेशनल बुक ट्रस्ट और बिहार सरकार ने मिलकर पुस्तक मेला आयोजित किया है। पटना पुस्तक मेला भी जल्द ही लगेगा। सरकारी प्रकाशनों की किताबें भी खूब महँगी हुई हैं। अकादमियाँ भी किताब इतने कम दाम में बेचती हैं कि आम आदमी के खरीदने का सवाल ही नहीं उठता।
      विज्ञापनबाजी और करियर के नाम पर दुकानें धीरे-धीरे पुस्तक मेले में बढ़ती जा रही हैं। और पर्चियाँ भी पाठकों को पकड़ा ही दी जाती हैं। लोगों की जेब और हाथ में पर्चियाँ कैसे ठूँस या पकड़ा दी जाती हैं, इसपर दो-तीन साल पहले का एक कार्टून जरूर याद आ जाता है, जो सम्भवत: हिन्दुस्तान में छपा था। वह खोजने पर मिल नहीं रहा। हालाँकि मैं पोस्टरों, पर्चों से दूर रहता हूँ, विज्ञापन कुछ ठीक नहीं लगता। विज्ञापन पर कुछ विचार रखूंगा कभी।

      हाँ, तो रपट लिखने-विखने हमें आती नहीं। इसलिए सीधे बात पर आते हैं।

एक कोई पत्रकार महाशय (नाम रत्नेश था शायद) भाषण दे रहे थे। कह रहे थे कि कुछ दिन पहले उनसे निबन्ध लिखवाने के लिए किसी ने उनको दो-ढाई सौ किताबें दीं, और वह भी 3-400-500 पेज(उन्होंने पेज ही कहा था) की सब। और जनाब 4-5 महीने में सब पढ़ गए और धमाकेदार निबन्ध लिख गए। सम्भवत: मौर्य टीवी(प्रकाश झा का है) में काम करते हैं। ऐसे ही लग रहा है कि सफेद झूठ झाड़ रहे हैं।
      जयप्रकाश नारायण पर पढ़नेवालों के लिए सस्ता साहित्य मंडल ने कुछ कृपा की है। वहाँ से काफी कम कीमत पर जयप्रकाश पर कुछ पढ़ने-सोचने को मिल रहा है।
      बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी पुरानी किताबों पर नए दाम की मुहर लगाकर किताबें बेच रही हैं। एक चीज पर ध्यान गया और मैंने अकादमी वालों से कहा भी। दर्शनशास्त्र की कोई किताब थी। लेखक- हरिमोहन झा। मैथिली के स्वनामधन्य साहित्यकार। उनकी खट्टर काका का कोई जवाब नहीं। उसके कुछ अंश संशयवादी विचारक पर आप पढ़ सकते हैं। हाँ, तो किताब फिर से छपी है और उसपर लेखक के बारे में लिखा है कि सम्प्रति वे पढ़ा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि उनकी मृत्यु 1985 में ही हुई थी। और किताब का नया संस्करण भी इधर आया है। लेकिन अकादमी के लोगों को इससे भी मतलब नहीं कि लेखक जीवित है या मृत और उसका पता भी किताब में छाप गये।
      और सब अपनी किताबें बेच रहे हैं, उनपर अधिक नहीं कहना है। प्रभात प्रकाशन के बारे में जरूर कुछ कहना है। वहाँ, मैं बोल रहा हूँ सिरीज की किताबें आई हैं, जैसे- मैं तिलक बोल रहा हूँ, मैं विवेकानन्द बोल रहा हूँ, मैं भगतसिंह बोल रहा हूँ आदि। आश्चर्य तो तब हुआ जब उस सैकड़ों पन्ने की किताब में अलग-अलग विषयों पर सूक्तियों की तरह बहुत सारे वाक्य पढ़ने को मिले। लेकिन ईश्वर, समाजवाद, नास्तिकता, आस्तिकता आदि पर कुछ नहीं था। अब कोई बताए कि जब किसी विचारक की किताब में सैकड़ों विषयों पर उसकी बातें रखी जा रही हैं तब इन विषयों या बिन्दुओं को क्यों छोड़ा गया है? वामपंथ की आलोचना पर भी किताबें दिखी। निश्चय ही आलोचना भी एक आवश्यक चीज या विधा है। लेकिन वहाँ भाजपा या संघ के लोगों द्वारा घृणात्मक और राजनीतिक आलोचना ही दिखी। नीतिन गडकरी, आडवाणी, जसवंत सिंह, अरुण शौरी सहित सब भाजपाइयों की किताबें दिखीं। कलाम को छापकर भी प्रभात ने भाजपाई होने का ही प्रमाण दिया था। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश की बिहार पर किताबें हैं, जिसमें नीतीश कुमार का यशोगान किया गया होगा, मैंने देखा तो नहीं लेकिन लगा ऐसा ही। स्वयं नीतीश की किताब भी है। मतलब साफ कहें तो मुझे लगा कि प्रभात प्रकाशन मतलब भाजपा-जदयू…
इससे अधिक नहीं कहना है कुछ…बहुत कुछ लिखा जा सकता था लेकिन मेरे वश का नहीं है फिलहाल…
      

नेहरु और नेताजी पर भगतसिंह के विचार

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बाल दिवस यानी चौदह नवम्बर के पहले जवाहर लाल नेहरु के खिलाफ़ भाई विश्वजीत सिंह जी ने एक लेख लिखा है। इन दिनों बहस का इरादा भी नहीं है मेरा, इसलिए यहाँ इस लेख को प्रस्तुत करने के बाद मैं किसी बहस में पड़ना भी नहीं चाहता। एक अक्तूबर को ही यह लेख मैंने टंकित कर लिया था। संयोग से विश्वजीत भाई ने याद दिला दिया, सो आज यहाँ लगा रहा हूँ। इसे भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज, सम्पादक – चमनलाल से लिया है। नेहरु के प्रति भगतसिंह के विचारों से मतभेद हो सकता है क्योंकि नेहरु भी 1928 में जो थे या रहे थे, वही नेहरु तो 1947 या 1962 में नहीं रहे होंगे।
नए नेताओं के अलग-अलग विचार
[जुलाई, 1928 के किरती में छपे इस लेख में भगतसिंह ने सुभाषचन्द्र बोस और जवाहरलाल नेहरू के विचारों की तुलना की है।]

असहयोग आन्दोलन की असफलता के बाद जनता में बहुत निराशा और मायूसी फैली। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों ने बचा-खुचा साहस भी खत्म कर डाला। लेकिन देश में जब एक बार जागृति फैल जाए तब देश ज्यादा दिन तक सोया नहीं रह सकता। कुछ ही दिनों बाद जनता बहुत जोश के साथ उठती तथा हमला बोलती है। आज हिन्दुस्तान में फिर जान आ गई है। हिन्दुस्तान फिर जाग रहा है। देखने में तो कोई बड़ा जन-आन्दोलन नजर नहीं आता लेकिन नींव जरूर मजबूत की जा रही है। आधुनिक विचारों के अनेक नए नेता सामने आ रहे हैं। इस बार नौजवान नेता ही देशभक्त लोगों की नजरों में आ रहे हैं। बड़े-बड़े नेता बड़े होने के बावजूद एक तरह से पीछे छोड़े जा रहे हैं। इस समय जो नेता आगे आए हैं वे हैं- बंगाल के पूजनीय श्री सुभाषचन्द्र बोस और माननीय पण्डित श्री जवाहरलाल नेहरू। यही दो नेता हिन्दुस्तान में उभरते नजर आ रहे हैं और युवाओं के आन्दोलनों में विशेष रूप से भाग ले रहे हैं। दोनों ही हिन्दुस्तान की आजादी के कट्टर समर्थक हैं। दोनों ही समझदार और सच्चे देशभक्त हैं। लेकिन फिर भी इनके विचारों में जमीन-आसमान का अन्तर है। एक को भारत की प्राचीन संस्कृति का उपासक कहा जाता है तो दूसरे को पक्का पश्चिम का शिष्य। एक को कोमल हृदय वाला भावुक कहा जाता है और दूसरे को पक्का युगान्तरकारी। हम इस लेख में उनके अलग-अलग विचारों को जनता के समक्ष रखेंगे, ताकि जनता स्वयं उनके अन्तर को समझ सके और स्वयं भी विचार कर सके। लेकिन उन दोनों के विचारों का उल्लेख करने से पूर्व एक और व्यक्ति का उल्लेख करना भी जरूरी है जो इन्हीं स्वतन्त्रता के प्रेमी हैं और युवा आन्दोलनों की एक विशेष शख्सियत हैं। साधू वासवानी चाहे कांग्रेस के बड़े नेताओं की भाँति जाने माने तो नहीं, चाहे देश के राजनीतिक क्षेत्र में उनका कोई विशेष स्थान तो नहीं, तो भी युवाओं पर, जिन्हें कि कल देश की बागडोर संभालनी है, उनका असर है और उनके ही द्वारा शुरू हुआ आन्दोलन भारत युवा संघ इस समय युवाओं में विशेष प्रभाव रखता है। उनके विचार बिल्कुल अलग ढंग के हैं। उनके विचार एक ही शब्द में बताए जा सकते हैं वापस वेदों की ओर लौट चलो। (बैक टू वेदस)। यह आवाज सबसे पहले आर्यसमाज ने उठाई थी। इस विचार का आधार इस आस्था में है कि वेदों में परमात्मा ने संसार का सारा ज्ञान उड़ेल दिया है। इससे आगे और अधिक विकास नहीं हो सकता। इसलिए हमारे हिन्दुस्तान ने चौतरफा जो प्रगति कर ली थी उससे आगे न दुनिया बढ़ी है और न बढ़ सकती है। खैर, वासवानी आदि इसी अवस्था को मानते हैं। तभी एक जगह कहते हैं
      हमारी राजनीति ने अब तक कभी तो मैजिनी और वाल्टेयर को अपना आदर्श मानकर उदाहरण स्थापित किए हैं और या कभी लेनिन और टॉल्स्टाय से सबक सीखा। हालांकि उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि उनके पास उनसे कहीं बड़े आदर्श हमारे पुराने ॠषि हैं। वे इस बात पर यकीन करते हैं कि हमारा देश एक बार तो विकास की अन्तिम सीमा तक जा चुका था और आज हमें आगे कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि पीछे लौटने की जरूरत है।
सम्भवत: ये चित्र साधू वासवानी का है
      आप एक कवि हैं। कवित्व आपके विचारों में सभी जगह नजर आता है। साथ ही यह धर्म के बहुत बड़े उपासक हैं। यह शक्ति धर्म चलाना चाहते हैं। यह कहते हैं, इस समय हमें शक्ति की अत्यन्त आवश्यकता है। वह शक्ति शब्द का अर्थ केवल भारत के लिए इस्तेमाल नहीं करते। लेकिन उनको इस शब्द से एक प्रकार की देवी का, एक विशेष ईश्वरीय प्राप्ति का विश्वास है। वे एक बहुत भावुक कवि की तरह कहते हैं
      “For in solitude have communicated with her, our admired Bharat Mata, And my aching head has heard voices saying…The day of freedom is not far off.”…Sometimes indeed a strange feeling visits me and I say to myself – Holy, holy is Hindustan. For still is she under the protection of her mighty Rishis and their beauty is around us, but we behold it not.
      अर्थात् एकान्त में भारत की आवाज मैंने सुनी है। मेरे दुखी मन ने कई बार यह आवाज सुनी है कि आजादी का दिन दूर नहीं…कभी कभी बहुत अजीब विचार मेरे मन में आते हैं और मैं कह उठता हूँ हमारा हिन्दुस्तान पाक और पवित्र है, क्योंकि पुराने ॠषि उसकी रक्षा कर रहे हैं और उनकी खूबसूरती हिन्दुस्तान के पास है। लेकिन हम उन्हें देख नहीं सकते।
      यह कवि का विलाप है कि वह पागलों या दीवानों की तरह कहते रहे हैं हमारी माता बड़ी महान है। बहुत शक्तिशाली है। उसे परास्त करने वाला कौन पैदा हुआ है। इस तरह वे केवल मात्र भावुकता की बातें करते हुए कह जाते हैं “Our national movement must become a purifying mass movement, if it is to fulfil its destiny without falling into clasaa war one of the dangers of Bolshevism.”
      अर्थात् हमें अपने राष्ट्रीय जन आन्दोलन को देश सुधार का आन्दोलन बना देना चाहिए। तभी हम वर्गयुद्ध के बोल्शेविज्म के खतरों से बच सकेंगे। वह इतना कहकर ही कि गरीबों के पास जाओ, गाँवों की ओर जाओ, उनको दवा-दारू मुफ्त दो समझते हैं कि हमारा कार्यक्रम पूरा हो गया। वे छायावादी कवि हैं। उनकी कविता का कोई विशेष अर्थ तो नहीं निकल सकता, मात्र दिल का उत्साह बढ़ाया जा सकता है। बस पुरातन सभ्यता के शोर के अलावा उनके पास कोई कार्यक्रम नहीं। युवाओं के दिमागों को वे कुछ नया नहीं देते। केवल दिल को भावुकता से ही भरना चाहते हैं। उनका युवाओं में बहुत असर है। और भी पैदा हो रहा है। उनके दकियानूसी और संक्षिप्त-से विचार यही हैं जो कि हमने ऊपर बताए हैं। उनके विचारों का राजनीतिक क्षेत्र में सीधा असर न होने के बावजूद बहुत असर पड़ता है। विशेषकर इस कारण कि नौजवानों, युवाओं को ही कल आगे बढ़ना है और उन्हीं के बीच इन विचारों का प्रचार किया जा रहा है।
            अब हम श्री सुभाषचन्द्र बोस और श्री जवाहरलाल नेहरू के विचारों पर आ रहे हैं। दो-तीन महीनों से आप बहुत-सी कान्फ्रेंसों के अध्यक्ष बनाए गए और आपने अपने-अपने विचार लोगों के सामने रखे। सुभाष बाबू को सरकार तख्तापलट गिरोह का सदस्य समझती है और इसीलिए उन्हें बंगाल अध्यादेश के अन्तर्गत कैद कर रखा था। आप रिहा हुए और गर्म दल के नेता बनाए गए। आप भारत का आदर्श पूर्ण स्वराज्य मानते हैं, और महाराष्ट्र कान्फ्रेंस में अध्यक्षीय भाषण में अपने इसी प्रस्ताव का प्रचार किया।
      पण्डित जवाहरलाल नेहरू स्वराज पार्टी के नेता मोतीलाल नेहरू ही के सुपुत्र हैं। बैरिस्टरी पास हैं। आप बहुत विद्वान हैं। आप रूस आदि का दौरा कर आए हैं। आप भी गर्म दल के नेता हैं और मद्रास कान्फ्रेंस में आपके और आपके साथियों के प्रयासों से ही पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव स्वीकृत हो सका था। आपने अमृतसर कान्फ्रेंस के भाषण में भी इसी बात पर जोर दिया। लेकिन फिर भी इन दोनों सज्जनों के विचारों में जमीन-आसमान का अन्तर है। अमृतसर और महाराष्ट्र कान्फ्रेंसों के इन दोनों अध्यक्षों के भाषण पढ़कर ही हमें इनके विचारों का अन्तर स्पष्ट हुआ था। लेकिन बाद में बम्बई के एक भाषण में यह बात स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ गई। पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस जनसभा की अध्यक्षता कर रहे थे और सुभाषचन्द्र बोस ने भाषण दिया। वह एक बहुत भावुक बंगाली हैं। उन्होंने भाषण आरंभ किया कि हिन्दुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष सन्देश है। वह दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा। खैर, आगे वे दीवाने की तरह कहना आरम्भ कर देते हैं चांदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की यह सूझ का परिणाम था, उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार ने लिखा है कि हममें यह हमारे आँसू ही जमकर पत्थर बन गए हैं। वह भी वापस वेदों की ओर ही लौट चलने का आह्वान करते हैं। आपने अपने पूना वाले भाषण में राष्ट्रवादिता के सम्बन्ध में कहा है कि अन्तर्राष्ट्रीयतावादी, राष्ट्रीयतावाद को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं, लेकिन यह भूल है। हिन्दुस्तानी राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है, न निजी स्वार्थ से प्रेरित है और न उत्पीड़नकारी है, क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो सत्यम् शिवम् सुन्दरम् है अर्थात् सच, कल्याणकारी और सुन्दर।
      यह भी वही छायावाद है। कोरी भावुकता है। साथ ही उन्हें भी अपने पुरातन युग पर बहुत विश्वास है। वह प्रत्येक बात में अपने पुरातन युग की महानता देखते हैं। पंचायती राज का ढंग उनके विचार में कोई नया नहीं। पंचायती राज और जनता के राज वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बहुत पुराना है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए नई चीज नहीं है। खैर, उन्होंने सबसे ज्यादा उस दिन के भाषण में जोर किस बात पर दिया था कि हिन्दुस्तान का दुनिया के लिए एक विशेष सन्देश है। पण्डित जवाहरलाल आदि के विचार इसके बिल्कुल विपरीत हैं। वे कहते हैं
जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष सन्देश है। इंग्लैंड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है। मैं तो कोई विशेष बात अपने देश के पास नहीं देखता। सुभाष बाबू को उन बातों पर बहुत यकीन है। जवाहरलाल कहते हैं
“Every youth must rebel. Not only in political sphere, but in social, economic and religious spheres also. I have not much use for any man who comes and tells me that such and such thing is said in Koran, Every thing unreasonable must be discarded even if they find authority for in the Vedas and Koran.”
[यानी] प्रत्येक नौजवान को विद्रोह करना चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्र में भी। मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं जो आकर कहे कि फलाँ बात कुरान में लिखी हुई है। कोई बात जो अपनी समझदारी की परख में सही साबित न हो उसे चाहे वेद और कुरान में कितना ही अच्छा क्यों न कहा गया हो, नहीं माननी चाहिए।
यह एक युगान्तरकारी के विचार हैं और सुभाष के एक राज-परिवर्तनकारी के विचार हैं। एक के विचार में हमारी पुरानी चीजें बहुत अच्छी हैं और दूसरे के विचार में उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाना चाहिए। एक को भावुक कहा जाता है और एक को युगान्तरकारी और विद्रोही। पण्डित जी एक स्थान पर कहते हैं
      “To those who still fondly cherish old ideas and are striving to bring back the conditions which prevailed in Arabia 1300 years ago or in the Vedic age in India. I say, that it is inconvinciable that you can bring back the hoary past. The world of reality will not retrace its steps, the world of imaginations may remain stationary.”
            वे कहते हैं कि जो अब भी कुरान के जमाने के अर्थात् 1300 बरस पीछे के अरब की स्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं, जो पीछे वेदों के जमाने की ओर देख रहे हैं उनसे मेरा यह कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह युग वापस लौट आएगा, वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती, काल्पनिक दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो। और इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता महसूस करते हैं।
      सुभाष बाबू पूर्ण स्वराज के समर्थन में हैं क्योंकि वे कहते हैं कि अंग्रेज पश्चिम के वासी हैं। हम पूर्व के। पण्डित जी कहते हैं, हमें अपना राज कायम करके सारी सामाजिक व्यवस्था बदलनी चाहिए। उसके लिए पूरी-पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने की आवश्यकता है।
      सुभाष बाबू मजदूरों से सहानुभूति रखते हैं और उनकी स्थिति सुधारना चाहते हैं। पण्डित जी एक क्रांति करके सारी व्यवस्था ही बदल देना चाहते हैं। सुभाष भावुक हैंदिल के लिए। नौजवानों को बहुत कुछ दे रहे हैं, पर मात्र दिल के लिए। दूसरा युगान्तरकारी है जो कि दिल के साथ-साथ दिमाग को भी बहुत कुछ दे रहा है।
“They should aim at Swaraj for the masses based on socialism. That was a revolutionary change with they could not bring out without revolutionary methods…Mere reform or gradual repairing of the existing machinery could not achieve the real proper Swaraj for the General Masses.”
अर्थात् हमारा समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार पूर्ण स्वराज होना चाहिए, जो कि युगान्तरकारी तरीकों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। केवल सुधार और मौजूदा सरकार की मशीनरी की धीमी-धीमी की गई मरम्मत जनता के लिए वास्तविक स्वराज्य नहीं ला सकती।
यह उनके विचारों का ठीक-ठाक अक्स है। सुभाष बाबू राष्ट्रीय राजनीति की ओर उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनिया की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है। परन्तु पण्डित जी राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकलकर खुले मैदान में आ गए हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे सामने दोनों विचार आ गए हैं। हमें किस ओर झुकना चाहिए। एक पंजाबी समाचार पत्र ने सुभाष की तारीफ के पुल बाँधकर पण्डित जी आदि के बारे में कहा था कि ऐसे विद्रोही पत्थरों से सिर मार-मारकर मर जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि पंजाब पहले ही बहुत भावुक प्रान्त है। लोग जल्द ही जोश में आ जाते हैं और जल्द ही झाग की तरह बैठ जाते हैं।
सुभाष आज शायद दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक खुराक नहीं दे रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों को इन युगान्तरकारी विचारों को खूब सोच-विचार कर पक्का कर लेना चाहिए। इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख्त जरूरत है और यह पण्डित जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अन्धे पैरोकार बन जाना चाहिए। लेकिन जहाँ तक विचारों का सम्बन्ध है, वहाँ तक इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्कलाब के वास्तविक अर्थ, हिन्दुस्तान के इन्कलाब की आवश्यकता, दुनिया में इन्कलाब का स्थान क्या है, आदि के बारे में जान सकें। सोच-विचार के साथ नौजवान अपने विचारों को स्थिर करें ताकि निराशा, मायूसी और पराजय के समय में भी भटकाव के शिकार न हों और अकेले खड़े होकर दुनिया से मुकाबले में डटे रह सकें। इसी तरह जनता इन्कलाब के ध्येय को पूरा कर सकती है। 
(समाप्त)

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