सिर्फ सॉरी शब्द कहना सही है ? ( फेसबुक से, भाग- 1)

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बहुत सारे विचार दिमाग में लिखने को उकसाते हैं, लेकिन इधर नहीं लिखा कुछ। सोचा कि फेसबुक पर कई बार कुछ अच्छे विचार तो उतर जाते हैं ही या कई बार कुछ काम का भी लिख दिया जाता है, तो उसे सँजोकर यहाँ प्रस्तुत करने का खयाल आया। पहला भाग प्रस्तुत हैः

31 जनवरी 2012
2012 को रामानुजन की याद में भारत में राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया गया है।

इस अत्यंत प्रतिभाशाली और महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन, जिन्हें दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शुमार किया जाता है, पर एक किताब आई, नाम था मैन हू नेव(या न्यू) इनफिनिटी किताब के लेखक थे राबर्ट कैनिगेल। कैनिगेल ने इस बहुप्रशंसित ग्रंथ को लिखने के लिए कुछ सप्ताह रामानुजन के जन्मस्थान में भी बिताये थे। यह किताब 1991 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। 


अब ज़रा ध्यान देनेवाली बात सुनें 
इस किताब का जर्मन अनुवाद 1993 में, जापानी अनुवाद 1994 में, कोरियाई संस्करण 2000 में, चीनी संस्करण 2002 में, इतालवी अनुवाद 2003 में, थाई अनुवाद 2007 में, यूनानी संस्करण 2008 में प्रकाशित हुआ। लेकिन तय है कि भारतीय भाषाओं के संस्करण अब तक नहीं आये हैं। किताब लिखे जाने को 20 साल बीत चुके हैं। किताब बहुत आवश्यक और बेहतरीन मानी गयी है। पृष्ठ 400 से ज्यादा हैं। 
क्या आपको इन भाषाओं में इस महान किताब के अनुवाद होने के वर्ष से उस भाषा के लोगों और उस भाषा के देश को लेकर कुछ पता चलता है! 
मुझे सबसे ज्यादा हिन्दी विरोधी लोगों के राज्य तमिल को लेकर अफसोस होता है क्योंकि इन्होंने अंग्रेजी के तलवे चाटने में कोई कसर छोड़ी और खुद तमिल का भला भी करते हैं, करनेवाले लगते हैं। उनके नाम पर हर साल एक दिवस मनानेवाले राज्य ने तमिल अनुवाद भी पेश नहीं किया है, जहाँ तक मेरी जानकारी है।
भारत जिनपर गर्व कर सकता है, ऐसे एकदम गिने चुने लोगों में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बचपन से उनको थोड़ा जाना हैएक आकर्षण पैदा होता हैमेरे सबसे प्रिय लोगों मे हैं रामानुजनहाँ 32 साल की उम्र में चल बसे थे वे
विशेष: रामानुजन के सामने विवेकानंद की देन का कोई महत्व नहीं है।
पढना चाहते हैं तो 
www.4shared.com/get/mABclt8P/The_Man_Who_Knew_Infinity_-_A_.html पर जाएँ…


30 जनवरी 2012
क्या अफसोस व्यक्त करने के लिए सिर्फ सॉरी शब्द कहना सही है ? सॉरी का अर्थ जितना होता है, उतना ही माफी माँगने के लिए प्रयोग करना ठीक वैसे ही है जैसे एक छोटा बच्चा जिसकी भाषा अभी अच्छी नहीं है, वह मुझे भूख लगी है कि जगह सिर्फ रोना शुरू कर दे या नानी की जगह सिर्फ नीकहे। सॉरी का अर्थ एक वाक्य कैसे हो सकता है। इसे कूटशब्द या कोड की तरह इस्तेमाल करना ऐसे लगता है जैसे भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कोई आतंकवादी अपने मित्र को संदेश भेज रहा हो। … … … असहमतियाँ विशेष रूप से आमंत्रित हैं।
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गोपाल गोडसे की किताब गाँधी वध क्यों पढते वक्त एक बात हमेशा दिखती है कि वह कोई सनकी आदमी लिख रहा है, बोल रहा हैअदालत में नाथूराम का बयान देखने पर कितनों को महानता के दर्शन होते हैं लेकिन उस बयान मे सिवाय इस बात के कि गोडसे हिन्दू है, एक ब्राह्मण हैकोई बात महत्वपूर्ण नहीं होती… … कोई वैज्ञानिकता नहीं, कोई समझ नहीं लेकिन फिर भी गोडसे के भक्तों की कमी भी नहीं हमारे देश में।
26 जनवरी 2012
भारत में संविधान चुटकुले की किताब है!
×  ×  ×
प्रतियोगिता नहीं सहयोगिता… … यह होना चाहिए… … वरना हमारे देश में समस्याएँ खासकर बेरोजगारी बरकरार रहेगी ही। सही हूँ मैं ? … … और हमारे आधुनिक नौटंकीबाज विचारक मैनेजमेंटियाते हैं पटक पटक कर, लोगों को पीछे धकेल कर जीना सिखाते हैं… … वैसे ये क्या खाक़ सिखायेंगे!
25 जनवरी 2012
फिल्मों में नौकरों से, गँवारों से हिन्दी, क्षेत्रीय भाषाएँ बोलवाई जाती हैं, लेकिन साहब या मेमसाहब मालिक या अंग्रेजी बोलते हैं। स्कूल देखिएगा तो अंग्रेजी में पढ़ाई हो रही है। इसका सीधा सा अर्थ तो इतना ही है कि हिन्दी नौकरों की भाषा है, दाइयों की भाषा है?
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क्या कहूँ उस देश को ( कविता)

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यह संभवतः 30 जनवरी 2008 को लिखी कविता है। समय का जिक्र करना आदत-सी है। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि कोई ऐतिहासिक सामग्री प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसके यह अंश मुझे भाषा की दृष्टि से बहुत पसंद हैं- 

बन रहे हैं शस्त्र ऐसे
नाश का भी नाश कर दें
आदमी की शक्तियों से
जहाँ भय, भयभीत!

अब पूरी कविता:


हो रहा हो रक्तरंजित
पिता भी जिस राष्ट्र का
बोल मेरे मीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

बरसती हैं गोलियाँ
आज पानी की जगह
देखता है नभ कृषक को
जल के लिए, विपरीत !
क्या कहूँ उस देश को ।
बन रहे हैं शस्त्र ऐसे
नाश का भी नाश कर दें
आदमी की शक्तियों से
जहाँ भय, भयभीत !
क्या कहूँ उस देश को ।
जहाँ सपने देखने को
बच्चे नहीं आजाद हैं,
मुस्कुराहट डर रही है
ऐसे रहे दिन, बीत !
क्या कहूँ उस देश को ।
कह रहे पुरखे मनुज के
मेरी नहीं संतान ये ।
पूछा गया मुझसे जहाँ
किसने दिया अधिकार
जो ये गा रहे हो गीत !
बोल मेरे मीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

वसंत क्या है / गिरनेवाले पत्ते / तुम बताओ और ऋतुराज वसंत आया देखो (कविता)

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किसी के आग्रह पर कविता लिखना उचित नहीं मालूम पड़ता। लेकिन यह गलती एक-दो बार कर ही गया हूँ। जून, 2005 में लिखी यह कविता उसी तरह की एक गलती का परिणाम है। वसंत ऋतु का आना-जाना पता नहीं कैसा होता है! बाद के दिनों में सनकी या लिखते जाने की आदत घटी तब एक हाइकु कविता वसंत ऋतु पर लिखी थी, पहले वह पढिए फिर ‘ऋतुराज वसंत आया देखो’ शीर्षक कविता पढिए। 

वह हाइकु कविता:

वसंत क्या है
गिरनेवाले पत्ते
तुम बताओ। 

अब ‘ऋतुराज वसंत आया देखो’ कविता:

ऋतुराज वसंत आया देखो।
सब के दुखों का अंत आया देखो।
हर कली दुल्हन बनी, इस ऋतु के आगमन से।
देवता भी देखते हैं, और उस विस्तृत गगन से।
इंद्र को देखो ज़रा, वे
                 कह रहे हैं मुस्कुरा कर।
त्याग क्यों ना स्वर्ग को दें,
                 घर बना लें इस धरा पर।
वसंत के गुण गा रहा वह संत आया देखो।
ऋतुराज वसंत आया देखो।
प्रसन्नता सब के हृदय में
                 हर तरफ़ है दिख रही।
हरीतिमा की लेखनी है
                 ख़ुद की कथा को लिख रही।
गर्मी, जाड़ा और वर्षा
             गये ना जाने कहां।
पेड़-पौधे; जीव-जंतु
             आ गये गाने यहां।


इसके मनोहर चित्र को बनाने के लिए
वह चित्रकार श्रीमंत आया देखो।
ऋतुराज वसंत आया देखो।
देखो इधर, देखो उधर,
                 है हर तरफ़ हरियाली।
नये पत्तों से भरी हैं,
                 तरुवर की हर डाली।
इधर कोयल कूकती है
                 उधर पंछी गा रहे।
हर्षोल्लासित जीव सारे
             एक साथ जा रहे।


वसंत के वर्णन से हारा-थका
प्रकृति का सुकुमार कवि पंत आया देखो।
ऋतुराज वसंत आया देखो।

आज छब्बीस जनवरी है (कविता)

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एक सादा, बिलकुल साधारण-सी कविता जो 26 जनवरी को ही 2007 में लिखी गयी थी। 

आज सुबह साढ़े आठ बजे
मंत्रीजी की गाड़ी से
कुचल गया एक ग़रीब दौड़ता बच्चा
चारों तरफ़ मची अफ़रा-तफ़री है
क्योंकि आज छब्बीस जनवरी है। 

पाँच हजार की आबादी वाले गाँव में
एक हजार लोग नव बजे
दुनिया छोड़ चुके
इसका कारण भूखमरी है
क्योंकि आज छब्बीस जनवरी है।
सोने पर हीरे जड़े गए
मैले कपड़े पर कीचड़
मैं कवि हूं इसलिए दोस्तों
मुझे भी तो हड़बड़ी है
क्योंकि आज छब्बीस जनवरी है। 
पीले सूखे पत्तों पर नहीं
गाय की आँखों पर प्लास्टिक चिपकाये गये
हरे रंग के
गाय ने समझा घास हरी है
क्योंकि आज छब्बीस जनवरी है। 

मरने को आतुर बूढ़े की
दोनों आँखें दो छोरों पर
टिकी हैं ऐसे मानो
मूसलाधार बारिस में छिद्रोंवाली कोई छतरी है
क्योंकि आज छब्बीस जनवरी है।   

170 देशों में नोटों पर अंग्रेजी का हाल

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इस साल का पहला लेख हाजिर है। व्यस्तताओं और स्वास्थ्य कारणों से इस महीने सक्रियता लगभग शून्य रही है। 
हाल ही में सोचा कि दुनिया के देशों में नोटों पर अंग्रेजी का कितना कब्जा है ? इसलिए लगभग 170 देशों के नोटों पर एक अध्ययन किया। निष्कर्ष वही सामने आया जो आता लेकिन अँखमुँदे विद्वानों से कुछ भी कहना बेकार सा लगता है। अंग्रेजी वाले देश जैसे कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, जमैका, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रिका आदि की बात तो करनी ही नहीं क्योंकि इन देशों मे तो अंग्रेजी ही चलती है। आइए एक नजर डाल लेते हैं इस अध्ययन पर। लगभग 170 देशों के नोटों को देखने के लिए अन्तर्जाल और कुछ वेबसाइटों का सहयोग मिला, यह एक बड़ी बात थी। नोटों के नंबर तक कई देशों में अरबी आदि भाषाओं में देखने को मिले। उदाहरण के लिए यमन, इराक आदि देखे जा सकते हैं। कुछ देशों में मात्र बैंक के नाम अंग्रेजी में मिले तो कुछ में सिर्फ मुद्रा या राशि अंग्रेजी में लिखी मिली और सब कुछ गैर- अंग्रेजी में। वहीं सबसे ज्यादा देश ऐसे थे, जहाँ अंग्रेजी की आवश्यकता नोट पर बिलकुल महसूस नहीं की गई और जैसा सोचता था, वैसा ही हुआ और ऐसे देश सबसे ज्यादा रहे। इनमें से 101 देश ऐसे हैं, जिनके नोटों पर अंग्रेजी बिलकुल ही इस्तेमाल नहीं की गयी थी यानी एक वाक्य तक अंग्रेजी का नहीं था। इनमें दुनिया के विकसित माने जाने वाले देशों में सबसे अधिक देश थे। उदाहरण के लिए जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्वीडेन, स्विटजरलैंड आदि।


मारीशस- 1000 रु० – 2001

      वर्तमान जानकारी के अनुसार 42 विकसित देश अभी हैं, जिनमें गैर-अंग्रेजी वाले देशों की संख्या 30 से अधिक है और उनमें से 20 से अधिक देश अपने नोटों पर अंग्रेजी का इस्तेमाल किसी भी रूप में नहीं करते।
रूस- 5000 रूबल- 2010- नोट का अगला भाग

रूस- 5000 रूबल- 2010- नोट का पिछला भाग

      फिलीपिन्स और डेनमार्क अपने नोटों पर सिर्फ बैंक का नाम अंग्रेजी में लिखते हैं और सब बातें गैर- अंग्रेजी में। इसी तरह नेपाल और जार्जिया राशि अंग्रेजी मे भी लिखते हैं और शेष बातें क्रमशः  नेपाली और जार्जियाई में। इस तरह इन चार देशों को भी गैर-अंग्रेजी का इस्तेमाल करनेवाला माना जा सकता है। फिर 105 देश ऐसे हो जायेंगे जो अंग्रेजी से मुक्त नजर आ सकते हैं।
      दुनिया के 170 में से भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान को लेकर 32 देश ऐसे थे जिनके नोटों पर अंग्रेजी मे बैंक के नाम और राशि लिखी मिली। कुछ देश बहुत छोटे भी थे। जिन 101 देशों के नोटों पर किसी भी रूप मे अंग्रेजी नहीं थी, उनकी कुल जनसंख्या 224 करोड़ से अधिक है। चीन को लेकर स्पष्टता कुछ कम ही हुई। वरना देशों की संख्या 102 और कुल जनसंख्या 359 करोड़ होती।
फिर भी यदि देशों की संख्या को आधार बनायें तब दुनिया के लगभग आधे देश अंग्रेजी के दास कम से कम नोटों पर नजर नहीं आये। कुछ लोग ज्यादा काबिल बनते हुए अपना फैसला अंग्रेजी के पक्ष में सुनाएँ, इससे बेहतर होगा कि 100 से अधिक देशों का खयाल जरूर कर लें। वरना ऐसे लोगों से भी पाला पड़ा है जो संसार के 4-5 देशों के, जिनमें अंग्रेजी चलती है, लोगों से बात करके अंग्रेजी को सारे संसार की भाषा घोषित किए देते हैं।
अगर भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़कर बात करें तो 288 करोड़ लोगों के ये चार देश बाहर निकल जाते है। फिर अंग्रेजी में राशि और बैंक के नाम लिखने वाले देशों की संख्या 32 से घटकर 28 और ऐसा करने वाले देशों की कुल जनसंख्या सिर्फ 73 करोड़ रह जाती है जो दुनिया की कुल जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत है। इस तरह दुनिया में देशों की संख्या के हिसाब से 20 प्रतिशत भी नहीं और जनसंख्या के हिसाब से 15 प्रतिशत भी नहीं हैं अंग्रेजी के भक्तजन! (जिन 170 देशों पर मैंने काम किया उनमें से 140 देशों की कुल जनसंख्या ही लगभग 600 करोड़ है और 600 करोड़ संसार की कुल जनसंख्या का 86 प्रतिशत है।) अब आप स्वयं तय करें कि आपके देश के रूपये पर क्या होना चाहिए ? वैसे तो अपने यहाँ व्यक्तिवाचक संज्ञाओं का अनुवाद भी होता है। सदाबहार उदाहरण भारत का इंडिया के रूप में मौजूद है! (वे लोग यहाँ लिखने से बचें जो आकर कहना चाहते हों कि हमारे सोचने- लिखने- कहने से क्या होगा ?)