स्वामी विवेकानंद का दूसरा पक्ष

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स्वामी विवेकानंद वह पहले प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, जिनसे मेरा परिचय हुआ और मैं इन्हें जितना संभव हुआ, पढता गया। तब मैं नवीं कक्षा में था। यहाँ विवेकानंद के बनाये हुए सुंदर चेहरे से बाहर कुछ देखने की कोशिश की है मैंने। विवेकानंद के भक्तों से गुजारिश है कि खिसियाने से पहले पढ लें इसे। यहाँ कई बातें अप्रत्यक्ष रूप से विषय से संबंधित हैं, भले वे अलग दिखें या थोड़ी लंबी हो जाएँ।
धर्म संसद में विवेकानंद
 स्वामी विवेकानंद बलि प्रथा के समर्थन में रहते थे। अपने स्मरण से कहना चाहता हूँ कि गाँधी जी एक बार कलकते गये थे, वहाँ दक्षिणेश्वर (संभवतः) में बलि का आधिक्य देखकर वे दुखी हुये। उन्होंने विरोध किया तो उनसे कहा गया था कि  तुम बच्चे हो। तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी। गाँधी जी केसत्य के प्रयोग या आत्मकथासे लिए गए इस अंश को देखें।
     गोखले के साथ एक महीना – 3
      मै यह कह सकता हूँ कि इसी महीने मैने कलकत्ते की एक-एक गली छान डाली। अधिकांश काम मै पैदल चलकर करता था । इन्हीं दिनों मैं न्यायमूर्ति मित्र से मिला। सर गुरुदास बैनर्जी से मिला। दक्षिण अफ्रीका के काम के लिए उनकी सहायता की आवश्यकता थी । उन्हीं दिनो मैने राजा सर प्यारीमोहन मुकर्जी के भी दर्शन किये।
      कालीचरण बैनर्जी ने मुझ से काली-मन्दिर की चर्चा की थी। वह मन्दिर देखने की मेरी तीव्र इच्छा थी। पुस्तक मे मैने उसका वर्णन पढ़ा था। इससे एक दिन मैं वहाँ जा पहुँचा। न्यायमूर्ति का मकान उसी मुहल्ले मे था। अतएव जिस दिन उनसे मिला, उसी दिन काली-मन्दिर भी गया। रास्ते में बलिदान के बकरों की लम्बी कतार चली जा रही थी। मन्दिर की गली में पहुचते ही मैने भिखारियो की भीड़े लगी देखी। वहाँ साधु-संन्यासी तो थे ही। उन दिनो भी मेरा नियम हृष्ट-पुष्ट भिखारियो को कुछ न देने का था। भिखारियों ने मुझे बुरी तरह घेर लिया था।
      एक बाबाजी चबूतरे पर बैठे थे। उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा, ‘क्यो बेटा, कहाँ जाते हो?’
      मैने समुचित उत्तर दिया। उन्होंने मुझे और मेरे साथियो को बैठने के लिए कहा। हम बैठ गये।
      मैने पूछा, ‘इन बकरों के बलिदान को आप धर्म मानते हैं ?’
      ‘जीव की हत्या को धर्म कौन मानता हैं ?’
      ‘तो आप यहाँ बैठकर लोगों को समझाते क्यो नही ?’
      ‘यह काम हमारा नही हैं। हम तो यहाँ बैठकर भगवद् भक्ति करते हैं।
      ‘पर इसके लिए आपको कोई दूसरी जगह न मिली ?’
      बाबाजी बोले, ‘हम कहीं भी बैठे, हमारे लिए सब जगह समान हैं। लोग तो भेंड़ो के झूंड की तरह हैं। बड़े लोग जिस रास्ते ले जाते हैं, उसी रास्ते वे चलते हैं। हम साधुओ का इससे क्या मतलब?’
      मैने संवाद आगे नहीं बढाया। हम मन्दिर में पहुँचे। सामने लहू की बह रही थी। दर्शनो के लिए खड़े रहने की मेरी इच्छा न रही। मैं बहुत अकुलाया, बेचैन हुआ। वह दृश्य मैं अब तक भूल नहीं सका हूँ। उसी दिन मुझे एक बंगाली सभा का निमंत्रण मिला था। वहाँ मैने एक सज्जन से इस क्रूर पूजा की चर्चा की। उन्होंने कहा , ‘हमारा ख्याल यह है कि वहाँ जो नगाड़े वगैरा बडते हैं, उनके कोलाहल मे बकरो को चाहे जैसे भी मारो उन्हें कोई पीड़ा नही होती।
      उनका यह विचार मेरे गले न उतरा। मैने उन सज्जन से कहा कि यदि बकरो को जबान होती तो वे दूसरी ही बात कहते। मैने अनुभव किया कि यह क्रूर रिवाज बन्द होना चाहिये। बुद्धदेव वाली कथा मुझे याद आयी। पर मैने देखा कि यह काम मेरी शक्ति से बाहर हैं। उस समय मेरे जो विचार थे वे आज भी हैं। मेरे ख्याल से बकरों के जीवन का मूल्य मनुष्य के जीवन से कम नही हैं। मनुष्य देह को निबाहने के लिए मै बकरे की देह लेने को तैयार न होऊँगा। मै यह मानता हूँ कि जो जीव जितना अधिक अपंग हैं, उतना ही उसे मनुष्य की क्रूरता से बचने के लिए मनुष्य का आश्रय पाने का अधिक अधिकार हैं। पर वैसी योग्यता के अभाव में मनुष्य आश्रय देने मे असमर्थ हैं। बकरो को इस पापपूर्ण होम से बचाने के लिए जितनी आत्मशुद्धि और त्याग मुझ मे हैं, उससे कहीँ अधिक की मुझे आवश्यकता हैं। जान पड़ता हैं कि अभी तो उस शुद्धि और त्याग का रटन करते हुए ही मुझे मरना होगा। मैं यह प्रार्थना निरन्तर करता रहता हूँ कि ऐसा कोई तेजस्वी पुरुष और ऐसी कोई तेजस्विनी सती उत्पन्न हो, जो इस महापातक में से मनुष्य को बचावे, निर्दोष प्राणियों की रक्षा करे औऱ मन्दिर को शुद्ध करे। ज्ञानी, बुद्धिशाली, त्यागवत्तिवाला और भावना-प्रधान बंगाल यह सब कैसं सहन करता है ?
      राहुल सांकृत्यायन भी कलकते में जाकर बलि के विरोध में जोरदार भाषण कर आये थे। तब उनका स्वागत लाठियों से किया गया था। …  … धार्मिक असहिष्णु तो होते हैं भाई।
      विवेकानंद 1902 में गुजर गये। उसके पहले 1901 या 1902 में गाँधी जी उनसे मिलने के गये (उन दिनों विवेकानंद का नाम कुछ ज्यादा ही था) तो विवेकानंद को उनसे मिलने नहीं दिया गया। विवेकानंद बीमार चल रहे थे। … मुझे इतना तो लगता है कि अगर कोई अंग्रेज या अमेरिकी मिलने आता तो विवेकानंद से मिलने दिया जाता… क्योंकि कहीं न कहीं वे मोहग्रस्त थे दोनों (अमेरिका और इंग्लैंड) से। मेरे इस विचार से असहमति हो सकती है।
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ब्रह्मसमाज का यथासंभव निरीक्षण करने के बाद यह तो हो ही कैसे सकता था कि मैं स्वामी विवेकानन्द के दर्शन न करुँ? मैं अत्यन्त उत्साह के साथ बेलूर मठ तक लगभग पैदल पहुँचा। मुझे इस समय ठीक से याद नही हैं कि मैं पूरा चला था या आधा। मठ का एकान्त स्थान मुझे अच्छा लगा था। यह समाचार सुनकर मै निराश हुआ कि स्वामीजी बीमार हैं, उनसे मिला नही जा सकता औऱ वे अपने कलकत्ते वाले घर में है। मैने भगिनी निवेदिता के निवासस्थान का पता लगाया। चौरंगी के एक महल मे उनके दर्शन किये। उनकी तड़क-भड़क से मैं चकरा गया। बातचीत मे भी हमारा मेल नही बैठा।
गोखले से इसकी चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘वह बड़ी तेज महिला हैं। अतएव उससे तुम्हारा मेल न बैठे, इसे मै समझ सकता हूँ।
(गोखले के साथ एक महीना 2 से)

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शिक्षा विषयक मुद्दे
      शिक्षाविद के तौर पर विवेकानंद को बी एड पाठ्यक्रमों में पढाया जाता है। यह अलग बात है कि विवेकानंद के पास मौलिक चिंतन शिक्षा के मामले में देखने को मुश्किल से मिलता है। स्त्री को उपन्यास नहीं पढना चाहिए, यह भी मानते थे विवेकानंद। शिक्षा में असमानता का भाव रखते थे विवेकानंद। अफलातून यानी प्लेटो ने जिस बात को 2400 साल पहले समझ लिया था, वह विवेकानंद को 19वीं शताब्दी में भी समझ नहीं आई कि स्त्री और पुरुष को शिक्षा में समान समझा जाना चाहिए। यहाँ तो विवेकानंद तो एकदम पिछड़े मालूम पड़ते हैं।
      शिक्षा विषयक भाषणों के बावजूद उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा की वकालत कभी की है, ऐसा नहीं लगता। अंग्रेजी बोलना उनका शौक था।
पूरी जिंदगी में भारतीय भाषा या हिन्दी में दिए हुए भाषणों का प्रतिशत 10 भी शायद ही है। बांग्ला का भी यही हाल है… मतलब सिर्फ अंग्रेजी झाड़ते थे।
अन्य मुद्दे
      अपनी जिंदगी में अंग्रेजों के इतने नजदीक रहते हुए भी कभी प्रत्यक्षतः भारत या शोषित देशों की आजादी के समर्थन में नहीं दिखे वे। यह और बात है कि सुभाषचंद्र बोस ने अपने आदर्श के रूप में विवेकानंद को चित्रित किया है।
      इनका बयान था कि भारत का किसान यूरोप के दार्शनिकों से अधिक जानता है आत्मा, परमात्मा आदि के बारे में।
      कभी पूँजीपतियों का विरोध खुलकर नहीं किया इन्होंने। लूट की व्यवस्था पर बड़े धार्मिक अंदाज में दयालुता जैसे भुलावे का जो घृणित अभियान हमारी धार्मिक कथाओं में भरा पड़ा है, उसका खंडन नहीं किया इन्होंने।
      1893 से 1902 तक अपने प्रसिद्धि के काल में एकदम कम समय अपने देश में गुजारनेवाले रहे हैं वे। किताबों में पढने को मिलता है कि उनके प्राण भारत में अटके हुए थे लेकिन प्रश्न यह है कि अमेरिका या इंग्लैंड में ऐसा कौन सा जरूरी काम कर रहे थे कि लगातार चार सालों तक भारत से बाहर रहे वे।
ओशो की बात
1986 के आसपास, ओशो यानी रजनीश को जब अमेरिका से निष्कासित किया गया तथा दुनिया के अधिकांश देशों ने उनपर प्रतिबंध लगाने की कवायद शुरू की थी, तब ओशो ने कुछ ऐसे विचार रखे थे स्वामी विवेकानंद के बारे में।
        मुझसे पहले पूरब से विवेकानंद, रामतीर्थ, कृष्णमूर्ति तथा सैकड़ों अन्य लोग दुनिया भर में गए हैं लेकिन उनमें से एक भी व्यक्ति पूरे विश्व द्वारा इस भाँति निंदित नहीं किया गया जिस भाँति मैं निंदित किया गया हूँ, क्योंकि उन सभी ने राजनीतिज्ञों जैसा व्यवहार किया। जब वे किसी ईसाई देश में होते तो ईसाईयत की प्रशंसा करते और मुस्लिम देश में वे इस्लाम की प्रसंशा करते। स्वभावतः किसी ईसाई देश में यदि पूरब का कोई आदमी, जो कि ईसाई नहीं है, ईसा मसीह की गौतम बुद्ध की तरह प्रशंसा करता है तो ईसाई प्रसन्न होते हैं, अत्यंत प्रसन्न होते हैं। और इनमें से एक भी व्यक्ति ने पश्चिम के एक भी ईसाई को पूरब के जीवन दर्शन में, पूरब की जीवन-शैली में नहीं बदला। इसी दौरान पश्चिम से ईसाई मिशनरी यहाँ आते रहे और लाखों लोगों को ईसाई बनाते रहे।
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हरे कृष्ण आंदोलन ने क्राइस्ट के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला है। इसके विपरीत हरे कृष्ण आंदोलन ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि क्राइस्ट सिर्फ कृष्ण का ही दूसरा नाम है। बंगला भाषा में बहुत से लोगों के नाम हैं कृष्टो, जो कृष्ण का ही एक रूप है। हरे कृष्ण आंदोलन के लोग पश्चिम को यही समझाते रहे कि क्राइस्ट सिर्फ कृष्ण का ही दूसरा नाम है। स्वभावतः लोग खुश हुए। उन्हें कोई कठिनाई न थी।
      कृष्णमूर्ति ने कभी किसी धर्म का नाम लेकर न तो निंदा की, न आलोचना की। यह शुद्ध राजनीति है। विवेकानंद ने ईसाईयत की उतनी ही प्रशंसा की है, जितनी अन्य किसी बात की। फिर वे लोग क्यों इनके खिलाफ होते?… … …
तो हमारे विवेकानंद ने सच नहीं बोलकर सब धर्मों का पक्ष लिया जैसा कि अबतक प्रायः हर धोखेबाज करता आया है। सब धर्मों को महान बनाने की फिल्मी भावना जैसे- मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखनायाकोई धर्म बुरा नहीं सिखाताया फिरसब धर्म एक रास्ते पर ले जाते हैंजैसे नारों के माध्यम से हमारे सामने आती है। यह और बात है कि सब धर्मों का पक्ष लेनेवाले सभी लोगों को धर्मों का ज्ञान नहीं के बराबर होता है। आस्था से निष्पक्षता नहीं आ सकती, यह ध्यान रहे।
      जिन लोगों को ओशो की इस बात का प्रमाण चाहिए, वे विवेकानंद के भाषणों को पढें। भाषणों में कुरआन से लेकर बाइबिल तक, सबकी चाटुकारिता उन्हें मिल सकती है। अब्राहम कोवूर ने भी बाइबिल को बहुत ही अश्लील किताब माना है। बाइबिल के अश्लील होने की बात पर फिर कभी होगी। 
बाइबिल पर ओशो यह भी कहते हैं- पश्चिम जिस ग्रंथ कोपवित्र बाइबिलकहे चला जाता है, वह पूरा अश्लीलता से भरा हुआ है- पाँच सौ पृष्ठ अश्लीलता के, नितांत अश्लीलता के। उस पवित्र ग्रंथ पर हर देश में प्रतिबंध लगाना चाहिए। पूरी दुनिया में आज उसे जला देना चाहिए।
      विवेकानंद चमत्कारों को कैसे वैधता प्रदान करते हैं, यह जानने के लिए मिशन से प्रकाशित एक किताब जो मन की शक्तियाँ या सिद्धियाँ जैसे किसी नाम से उपलब्ध है, देखें। चमत्कारों पर ओशो ने कुछ इस तरह कहा है-

      यहाँ भी विवेकानंद का जिक्र हुआ है और यह आरोप सही भी है।
संदर्भ-
3) रामकृष्ण मिशन से प्रकाशित किताबें, जैसे- शिकागो वक्तृता, युगनायक विवेकानंद (विवेकानंद की अब तक लिखित सबसे बड़ी जीवनी जिसके लेखक स्वामी गम्भीरानंद हैं, यह किताब बांग्ला में लिखी गयी थी), विवेकानंद, भारत का भविष्य, विवेकानंद के सान्निध्य में, युवकों के प्रति, भारतीय नारी, शिक्षा, राजयोग, विवेकानंद सत्साहित्य (अंग्रेजी में एक फ़ाइल में अंतर्जाल पर उपलब्ध है। हिन्दी में भी डिजिटल लाइब्रेरी पर मौजूद है) आदि
4) फिर अमृत की बूँद पड़ी ओशो,
आदि
… … हमें विवेकानंद हमेशा अतिप्रचारित व्यक्ति लगते हैं। …  सबके बावजूद स्वाभाविक है कि उनका सकारात्मक पक्ष भी होगा ही।
चलते-चलते मिशन के बारे में-

      रामकृष्ण मिशन में प्रायः सब कुछ पहले अंग्रेजी में छपता है, फिर सालों बाद उसका अनुवाद भारतीय भाषाओं में या हिन्दी में आता है। युवाओं में अंग्रेजी का प्रचार करने में मिशन खूब काम आता है।
      मिशन में जाकर कभी देखेंगे तो पता लेगा कि संन्यासी कितने त्यागी होते हैं? राजसी सुख भोगते हैं वे।
      मिशन 100 वर्ष पार कर चुका है। उपलब्धियाँ बस किताबें और आश्रम ही दिखती हैं।

अब तो अपना असली नाम भी भूल गया हूँ… (भोजपुरी से हिन्दी में अनूदित)

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अभी आब ता आपन असली नाम भी भुला गईल बानी… शीर्षक से एक व्यंग्य या लघुकथा या जो कहें, पढा। सोचा कि इसे पढवाते हैं। प्रस्तुत है इसका हिन्दी अनुवाद। हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा हिन्दी में था, फिर भी अनुवाद करने की कोशिश की है। 
शहर में पिछले १० दिन से एक मनोचिकित्सक की बड़ी धूम मची थी, हर आदमी के मुँह से एक ही बात कि अगर आप डिप्रेशन के शिकार हैं, तो इस मनोचिकित्सक से ज़रूर मिलें, यह मनोचिकित्सक आपकी समस्या २ मिनट में ठीक कर देगा, आपको अवसादमुक्त कर देगा। और यह बात झूठी भी नहीं थी, पिछले १ महीने से जो भी डिप्रेशन का शिकार उसके पास गया उसे उसने २ दिन में ठीक कर दिया। 
यह सब सुन और जान कर एक आदमी सुबह से उसके क्लिनिक में अपना इलाज करवाने के लिए भूखा-प्यासा लाइन में लगा रहा। भूख के मारे उसकी हालत ख़राब हो गई तब जाकर दिन में २ बजे उसका नंबर आया। गया डॉक्टर की केबिन में, कुर्सी पर बैठा। 


मनोचिकित्सक- आप का नाम क्या है?

मरीज- दुनिया ने हजारों नाम दिए हैं, अब तो अपना असली नाम भी हम भूल गए हैं। 
मनोचिकित्सक- आप तो काफी गहरे अवसाद के शिकार लगते हैं, खैर कोई बात नहीं, हम आपको ठीक कर देंगे। आप चिंता मत कीजिये। सबसे पहले आप यह बात अपने मन में बिठा लीजिये की ये अवसाद यानि डिप्रेशन की बीमारी दवा से नहीं बल्कि अपने मन को बदलने से ठीक होगी। 
मरीज- डॉक्टर साहेब, ई सब बात छोड़िए, बस आप हमको वह दवा बताइये जिसकी आजकल सब लोग चर्चा करते हैं, कि उससे हर तरह का अवसाद २ दिन में ठीक हो जायेगा। 
मनोचिकित्सक- जी बिलकुल… 
इतना कहकर मनोचिकित्सक उठ गया और केबिन की खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।  
मनोचिकित्सक- यहाँ आइये, उस अनोखी दवा जिससे हर तरह का अवसाद ठीक हो जाता है, की दूकान यहाँ से दिखती है, बस आप को आज शाम वहीं जाना है और वहीं आपकी बीमारी का इलाज हो जायेगा बस २ घंटे में। 
मरीज- अरे वह तो सर्कस का तम्बू लगा है, पिछले एक महीने से वहाँ सर्कस दिखाया जाता है!
मनोचिकित्सक- जी हाँ, सर्कस का तम्बू! उसी में अवसाद का इलाज है, आप वहाँ जाइये, आज का शो देखिये। उस सर्कस में एक जोकर है, जब आप उसके कारनामों को देखेंगे तो हँसते-हँसते लोट-पोट हो जायेंगे और तब जाकर आपको इस बात का एहसास होगा की हँसना और हँसना ही ज़िन्दगी है, मैं अपने सारे मरीजों को वहीं भेजता हूँ सर्कस देखने और उन सबको इस बात का एहसास २ घंटे में ही हो जाता है कि अगर ज़िन्दगी में हँसी शामिल हो जाये तो अवसाद अपने आप भाग जायेगा। आप भी जायें आज ही वहाँ, फिर फायदा देखिये उस जोकर के कारनामों का।
मरीज- डॉक्टर साहब, वो जोकर “मैं ही हूँ”। 
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यह अंश भी अंत में था उसमें- 

कहने का अर्थ यह है कि हमारी ज़िन्दगी में चाहे जितने भी दुःख भरे हों, फिर भी हम सबको हमेशा ऐसे काम करने की कोशिश करनी चाहिए कि हमारी वजह से दूसरे की ज़िन्दगी में ख़ुशियाँ भर जायें।