कुछ दिनों से नियमित एक अंगरेज़ी माध्यम के एक छोटे-से स्कूल का हाल-चाल सुनने को मिल रहा है। क़रीब 150 बच्चे पढ़ते हैं उस स्कूल (विद्यालय से ज्यादा स्कूल समझा-कहा-जाना जाता है) में। नर्सरी से लेकर वर्ग (स्टैण्डर्ड) 6 तक चलने वाले इस स्कूल में पढानेवाले दो लोगों द्वारा रोज़ कई बातें पता चल रही हैं। पहले उस अनुभव का एक दृश्य देखिए, जो एक शिक्षक के साथ कुछ दिनों पहले वास्तव में हुआ।

शिक्षक (कक्षा या क्लास में) कॉपी निकाल लिए सब?
सभी बच्चे- जी। (एक बच्चा अपवाद है, वह कहता है- हँ’, ‘हँभोजपुरी में हाँया जीके लिए बहुप्रचलित शब्द है।)
शिक्षक देखता है कि सारे बच्चे कॉपी निकाल चुके हैं। उस बच्चे ने अभी नहीं निकाली है। शिक्षक के पूछने पर वह भोजपुरी में कहता है कि हमरा अभी तीने गो काँपी किनाइल बाऽ। (मेरे लिए अभी सिर्फ़ तीन कॉपियाँ ही खरीदी गई हैं।) भोजपुरी क्षेत्र में कॉपी को काँपी या कापी कहा जाता है। शिक्षक देखता है कि बच्चा हिन्दी नहीं बोल रहा, जबकि स्कूल में हिन्दी बोली जाती है। स्कूल अंगरेज़ी माध्यम भले है, लेकिन अंगरेज़ी बोलना या समझना कैसा है, यह विदित है। सभी बच्चों को होमवर्क (या टास्क लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में टास्क नहीं के बराबर चलता है, टास ही ज़्यादा चलता है) देने के लिए शिक्षक ने कॉपी निकलवाई है। बच्चे से शिक्षक कहता है कि कॉपी निकालो, तब बच्चा फिर अपनी बात दुहराता है कि तीन कॉपियाँ ही उसके पास हैं। शिक्षक पूछता है कि इंग्लिश की कॉपी नहीं है? तब बच्चा कहता है कि बाऽ यानी है। बच्चा हिन्दी समझ लेता है, लेकिन बोलने में असमर्थ रहता है। बच्चा कहता है- मिस जी! हमरा के टास दे दीं। हमरा हिन्दी बोले ना आवेला। (मिस जी, मुझे टास्क दे दीजिए। मुझे हिन्दी बोलने नहीं आती। शिक्षक स्त्री है, इसलिए मिस जी कहा है, वह भी दूसरे बच्चों की देखादेखी ही कहा होगा बच्चे ने।) फिर उसके पड़ोस की एक बच्ची कहती है कि वह अभी नया है, हिन्दी बोलना नहीं जानता, हिन्दी सीख लेगा।
      यह वाक़या उस शिक्षिका की नज़र में ख़ास हो या न हो, हमें वह इस समाज का सच्चा प्रतिनिधि लगता है। जिस इलाक़े में बच्चा अपनी भाषा के निकट की भाषा हिन्दी नहीं बोल पाता हो, वहाँ प्राथमिक शिक्षा (कुछ देर के लिए 12वीं के बाद अंगरेज़ी माध्यम को माफ़ कर देते हैं, क्योंकि मौज़ूदा हालातों में कई जगह अंगरेज़ी बाध्यकारी तो है ही।) अंगरेज़ी में देने का प्रचलन! मुझे पहली बार लगा कि अंगरेज़ी कहाँ तक पहुँच गई है। जिन बच्चों के घर में, पास में, पड़ोस में हिन्दी भी नहीं बोली जाती, 24 घंटे में जिसका हिन्दी से 8 घंटे का भी साथ नहीं चलता, उनको प्राथमिक शिक्षा, शुरू की ही शिक्षा अंगरेज़ी में!
इन इलाक़ों में या ऐसे बच्चों के लिए अंगरेज़ी माध्यम स्कूलों में अग़र अंगरेज़ी बोलने या अंगरेज़ी में ही बोलकर पढ़ाने का चलन हो, तो बच्चे 100 वाक्य में पाँच वाक्य और पाँच शब्द के एक वाक्य तक का मतलब समझने में भी असमर्थ होंगे, यह तो तय है। अंगरेज़ी में गणित का सवाल देने पर भी वे सवाल को समझाने को कहते हैं। फिर उन्हें हिन्दी में समझाना पड़ता है, या कहिए कि हिंग्रेज़ी में या कई बार हिन्दी में अनुवाद जैसा करना पड़ता है।
      दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिन बच्चों के लिए अंगरेज़ी परायी भाषा है, उनको अंगरेज़ी में शिक्षा देना का अर्थ भी कुछ और होता है। कहने को स्कूल में जी. के., सोशल साइंस, साइंस, संस्कृत, हिन्दी, इंग्लिश, मैथ आदि विषय पढ़ाये जाते हैं। जबकि सच यह है कि वे हर विषय में अंगरेज़ी किताब होने के चलते शब्दों का हिन्दी मतलब पूछते हैं। शब्द या वर्ड मिनिंग लिखाना होता है शिक्षक को। हर विषय का मतलब मात्र अंगरेज़ी पढ़ना होता है। साफ़ कहें तो 600 अंको की परीक्षा के विषय का एक ही मतलब है 700 अंकों की अंगरेज़ी। यानी बच्चे सिर्फ़ अंगरेज़ी ही पढ़ते हैं। जब शिक्षकों को हर शब्द अंगरेज़ी मानकर ही, अनुवाद कर के ही, अर्थ बताकर ही पढ़ाना पड़े, तो काहे का अंगरेज़ी माध्यम, यह तो अंगरेज़ी, मात्र अंगरेज़ी का स्कूल है, जैसे कोई विदेशी भाषा का शिक्षण-संस्थान हो स्कूल! वैसे भी हम जानते हैं कि अंगरेज़ी की क़िताब में पाठ के रूप में जीवनियाँ, सामाजिक बातें, कहानियाँ, भौगोलिक, वैज्ञानिक या ऐतिहासिक बातें पढ़ाई जाती हैं ही। यहाँ तो साफ़ है कि स्कूल में ठीक से न तो बच्चे विज्ञान, न गणित, न भाषा और न ही सामाजिक विज्ञान सीख रहे हैं, उन्हें तो बस अंगरेज़ी सिखाई (रटवाई) जा रही है। शिक्षक ख़ुद ही इतनी अंगरेज़ी नहीं जानता हमारे देश में… भारत इतना अंगरेज़ी बोलो आंदोलन चलाने के शताब्दियों बितने पर भी एक शेक्सपियर न पैदा कर सका।
      दुनिया का कोई शिक्षाविद् पता नहीं कैसे यह कह सकता है कि प्राथमिक कक्षाओं में ही बच्चों के ऊपर पूरी डिक्शनरी लादकर उसे रट्टू और टट्टू बना दिया जाए।
      मेरे छोटे से शहर में, जो भारत का एक ग्रामीण इलाक़ा ही कहा जाएगा, नये स्कूल अंगरेज़ी माध्यम के स्पेशल फ़ीचर के साथ खुलने लगे हैं। पहली बार मुझे भोजपुरी, हिन्दी या सभी लोकभाषाओं और अन्य भारतीय भाषाओं के भविष्य के प्रति निराशा (वह तो कहीं न कहीं रही है ही, आशा और सांत्वना देकर दिमाग़ को समझाना ज़ारी रहा है, शायद रहेगा ही।) होने लगी है। शहरी क्षेत्रों का हाल मालूम रहा है, इसलिए शहरों के बारे में विचार यथावत् हैं। लेकिन गाँवों में ऐसा हाल काल जैसा मालूम पड़ने लगा है। हालाँकि सत्य वही है, और निकट दशकों या शताब्दियों तक रहेगा भी कि भारत में अंगरेज़ी शोषकों की भाषा रही है, है और साधारण लोग, शोषित लोग अंगरेज़ी के उस हद तक शिकार नहीं हो सकेंगे कि हमारी भाषाएँ साफ़ मर-बिला जाएँ। इसका कारण है कि जिस देश की तीन चौथाई आबादी ढंग से खा नहीं सकती, तो वह उस देश की भाषाओं को क्या डुबाएगी या पार उतारेगी!
      फ़िलहाल ऐसे स्कूल असफल हों, इस कामना के साथ… … … क्योंकि जलचर नभचर हो नहीं सकता, वह मर जाएगा, मर जाएगा और मरेगा ही अग़र जल की भाषा छोड़ नभ की भाषा बोलेगा…
      हाँ, यह बता दें कि वह स्कूल चलाने वाले और उसके प्रिंसपल भारतीय संस्कृति के बड़े पक्षधर बनते हैं। 
Advertisements