21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उस लेख को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। पहला हिस्सा प्रस्तुत है।
हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी क्यों नहीं
नायक, खलनायक और संघर्ष का चक्कर
फ़िल्मों में पहले खलनायकी का बड़ा महत्व था। लोग नायक के साथ एकात्म होकर कुछ घंटे खलनायक से स्वयं ही लड़ने का काल्पनिक और अनोखा अनुभव प्राप्त करते थे। आज भी यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आज भी भोजपुरी या दक्षिण की फ़िल्मों में खलनायकी का होना एक ज़रूरी-सी शर्त बना हुआ है।

   भारत में फ़िल्मों का नायक ख़ूब संघर्ष करता दिखता रहा है। लावारिस, ग़ुलाम, बेघर, ग़रीब, अनाथ या जिसके माँ-बाप बचपन में मर गए हों, ऐसे नायकों की बाढ़ का दौर कुछ-कुछ अभी भी क़ायम है, जो कि पहले थमने का नाम नहीं ले रहा था। ग़रीब और साधारण आदमी का किरदार निभा-निभाकर धन्ना सेठ बननेवालों की संख्या कम नहीं है। कुछ फ़िल्मकारों ने वेश्याओं को भी नायिका के तौर पर दिखाकर, यह स्वीकारना पड़ेगा कि कई बार बेजोड़ और शानदार फ़िल्मों का निर्माण कर, करोड़ो कमाए हैं। कुछ लोगों को सच्ची घटना पर फ़िल्म बनानेवाले बड़े महान् नज़र आते हैं। सच्ची घटनाओं पर बननेवाली फ़िल्में लोगों को ज़्यादा खींचती है और इस वजह से फ़िल्मकार बोरियों में भरकर रुपये झाड़ ले जाते हैं और ताली पीटते रहनेवाले लोग बेवकूफ़ों की तरह ख़ुश होते हैं।
   वापस नायक और फ़िल्मी संघर्ष पर आते हैं। हिन्दी फ़िल्मों का नायक प्रायः क्रांतिकारी तभी बनता है, जब उसके अपने परिवार के सदस्य या किसी दोस्त या पड़ोसी या फिर आशिक़ पर किसी तरह का क़हर खलनायक द्वारा ढाया जाता है। यहाँ साफ़ समझ में आता है कि हिन्दी फ़िल्मों का नायक एक सनकी और बदला लेनेवाले से ज़्यादा शायद ही होता है। वह वास्तव में क्रांतिकारी सिर्फ़ ऐतिहासिक फ़िल्म में ही बनाया जाता है, या बनाए जाने की कोशिश का शिकार होता है। आमिर ख़ान की फ़िल्म रंग दे बसंती के प्रशंसकों की कमी नहीं है, लेकिन प्रशंसा की बजाय आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की कोशिश करते ही सारा खेल सामने आने लगता है और लोगों की भावनाओं के साथ खेलकर, उनका विज्ञापनी इस्तेमाल कर करोड़ों-अरबों पीट लेने का षडयंत्र साफ़ दिखने लगता है।
   पूँजीपति और शोषक वर्गों के खिलाफ़ बोलने की औक़ात तो नायकों में होती नहीं, इसलिए हिन्दी फ़िल्मों में नायिका और नायक से अक्सर यह सुनने को मिलता रहा है कि अमीर होना गुनाह नहीं है। हिन्दी फ़िल्मों में बहुत संघर्ष कर के आगे बढ़नेवाला नायक हमें बाद में पूँजीपति बनते ही दिखाया जाता रहा है। पता नहीं किस कोने में सारे नायकों को रखा जाता है कि कोई भी नायक लेनिन या भगतसिंह या चे नहीं बनता। फ़िल्मों में कभी भी समाजवादी क्रांति को सफल होते या लोगों को बेहतर ज़िंदग़ी जीते दिखाया ही नहीं जाता। उन्हें अमेरीकी नमूने (मॉडल) के विकास के सपने दिखाये जाते हैं। वह (नायक) संघर्ष करता है ख़ुद के लिए, परिवार के लिए, बहन के लिए, दोस्त के लिए, आशिक़ के लिए, कभी ऐसा नहीं दिखता कि वह पूँजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। वह संघर्ष करता है तो पूँजीपति से, सिर्फ़ उससे जिससे उसे निजी मामले के लिए बदला लेना है। साफ़ बात है कि पूँजीपति वर्ग से कभी संघर्ष करते, जीतते दिखाने की औक़ात निर्माताओं में नहीं रही है अपने यहाँ। यहाँ का नायक लड़ता है- अमरीश पुरी से, सदाशिव अमरापुरकर से, डैनी से, गुलशन ग्रोवर से, अनुपम खेर से, शक्ति कपूर से…। परिवर्तन कुछ ऐसा ही हुआ है कि पहले जहाँ पौराणिक कथाओं में राक्षस और देवता लड़ते थे, वहाँ अब खतरनाक चेहरेवाले (इन दिनों स्टाइलिश लुक वाले) खलनायक और नायक लड़ते हैं। हमें लगता है कि हिन्दी फ़िल्मों का नायक वर्गीय चेतना से लैस नहीं होता। हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी तो हो ही नहीं सकता… … चाहे आप पैग़ाम का उदाहरण ही क्यों नहीं ले लें, सुधारवादी भले दिख जाय।
नोटः हिन्दी फ़िल्मों का हाल शायद तमाम भारतीय फ़िल्मों का है… …