इस बार कुछ और बातें!
पिछले दिनों एक विद्यालय में जाने का अवसर मिला। वहाँ मेरे पूर्व शिक्षक ने बच्चों के लिए कुछ भाषण स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देने के लिए लिखने का निर्देश दिया। कुछ खास इच्छा न रहते हुए भी 10 भाषण लिखे। निर्देशानुसार भाषण में कोई कविता या शेर होने पर वह अच्छा लगेगा। हकीकत यह है कि कविता के अंश या शेर तालियाँ बजवाते हैं, इससे ज़्यादा शायद ही कुछ होता हो। पास में न कोई डायरी, न किताब, न नोट। कविता के चक्कर से छुटकारा कैसे भी मिल सका। उन दस भाषणों में से 7-8 को आज बच्चे विद्यालय द्वारा आयोजित समारोह में देंगे। यहाँ 15 अगस्त, 2012 के अवसर पर उन भाषणों में से कुछ दिए जा रहे हैं। संबोधन को भी यहाँ रहने दिया जा रहा है। हालाँकि वह जरूरी नहीं है।

1
उपस्थित सज्जनो, शिक्षकगण और मेरे सहपाठियो! आज 15 अगस्त के इस महत्वपूर्ण अवसर पर मुझे कुछ कहने का अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए मैं आपसबों का आभारी हूँ।
      15 अगस्त, 1947 के बाद आज 65 साल बीत गए हैं। हम हर साल इस दिन अपने देश की आजादी का उत्सव मनाते हैं। दो-ढाई सौ सालों की लम्बी ग़ुलामी से आज़ादी पाने में हमारे देश के लाखों लोगों की जानें गई हैं। अंग्रेजों से पहली लड़ाई लड़नेवाले बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से लेकर भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे कई शहीदों की कुर्बानी देकर हमारे देश को 1947 में आजादी मिल पाई।
      आज जब हमारे देश में आदर्श के नाम खिलाड़ी, फ़िल्मी सितारे और अमीर उद्योगपति सामने हैं, तब शहीदों की चमक फीकी पड़ती मालूम हो रही है। ज़रूरत है इस बात की कि भगतसिंह को हमारे बीच आदर्श के रूप में ठीक से स्थापित किया जाए।
      भगतसिंह से प्रेरणा लेकर इस देश, विश्व और मानवता के लिए कुछ करने की ज़रूरत है।
धरती हरी भरी हो आकाश मुस्कुराए
कुछ कर दिखाओ ऐसा इतिहास जगमगाए।
जय हिंद!                 जय मानवता!
2
प्यारे देशवासियो! हमारा देश आज 66वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। हमारे विद्यालय द्वारा आयोजित समारोह में मुझे भी कुछ कहने का अवसर प्रदान किया गया है। इस अवसर पर मैं आपसबों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
      आज हम अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो चुके हैं। लेकिन हमें निश्चिंत होकर बैठ नहीं जाना चाहिए। अपने ही देश में ऐसे कई गद्दार आसन जमाए हुए हैं, जो देश की स्वतंत्रता को खतरा पहुँचाने की कोशिशें करते हैं। हम सभी देशवासियों का यह कर्तव्य है कि हम उन गद्दारों से सावधान रहें।
कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से।
सम्भल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से।
      बाहर के दुश्मन से ज़्यादा खतरनाक घर में बैठा गद्दार होता है। देश की स्वतंत्रता को नीलाम करने के हजारों प्रयत्न होते रहे हैं। आज इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमसब यह प्रण लें कि हम देश और इसकी एक अरब से अधिक जनता की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा किसी भी कीमत पर करेंगे।
जय हिंद!           जय स्वतंत्रता!
3
उपस्थित सज्जनो! और मेरे सहपाठियो! मुझे इस स्वतंत्रता दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर आपसे कुछ कहने का मौका दिया गया है, इसलिए मैं आप सबों का आभारी हूँ।
      आजादी! इनसान तो क्या पशु-पक्षी भी आजाद रहना चाहते हैं। हमारे देश के साथ ऐसी दुर्घटना घटी कि वह सदियों तक विदेशियों के चंगुल में फँसा रहा। गुलामी कोई पसंद नहीं करता। भगतसिंह जैसे शहीदों ने कहा-
बड़ा ही गहरा दाग़ है यारों जिसका ग़ुलामी नाम है
उसका जीना भी क्या जीना जिसका देश ग़ुलाम है!
      फिर हजारों क्रांतिकारियों ने जान की बाजी लगा दी और वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बलिदान के फलस्वरूप हमें आजादी मिली और आज हम आजाद हैं। आजादी की कीमत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 7 लाख लोगों ने आज़ादी के लिए अपने प्राण गँवा दिए। आजादी अमूल्य है, इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। आजादी को हर कीमत पर हम बनाए रखें, इसी आग्रह के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
जय हिंद!           जय आजादी!
4
मेरे प्यारे देशवासियो! भारत के 66वें स्वतंत्रता दिवस पर मुझे कुछ कहने का अवसर मिला है। आज के दिन पूरे देश में खुशी और उत्साह का माहौल होता है। लेकिन जब हम आजादी के दीवानों की कहानियाँ पढ़ते हैं, तो दिल दहल जाता है। जेल में भूख हड़ताल की वजह से जतिनदास के प्राण चले गए, भगतसिंह को मात्र साढ़े तेईस साल की उम्र में फाँसी हो गई। सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, भगवतीचरण वोहरा जैसे क्रांतिकारी अंग्रेजों की हैवानियत के शिकार हुए। हजारों क्रांतिकारियों को गोली खानी पड़ी। सारे शहीद हमसे दूर चले गए। जान पर खेलकर हमें आजादी देनवाले क्रांतिकारी हमसे विदा लेते समय कहते थे-
गोली लगती रही ख़ून गिरते रहे
फ़िर भी दुश्मन को हमने न रहने दिया
गिर पड़े आँख मूँदे धरती पे हम
पर गुलामी की पीड़ा न सहने दिया
अपने मरने का हमको न गम साथियों
कर सफ़र जा रहे दूर हम साथियों।
      अब हमपर निर्भर करता है कि हम शहीदों के सपनों का भारत बनाना चाहते हैं या अहसानफ़रामोशी का सबूत बनना चाहते हैं। इस उम्मीद के साथ कि कोई तो शहीदों और उनके सपनों का खयाल करेगा, मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ। चलते-चलते भगतसिंह के वे दो नारे जो उन्होंने अदालत में लगाए थे-
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!        साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!
      बच्चों के भाषण होने से छोटे और सरल हैं ये सब! वरना आजादी पर पिछले साल साझा किए में आज भी बदलाव नहीं आया है। वन्दे मातरम् का नारा खुद को भी खास पसन्द नहीं। अब इस तरह के भाषण में आजादी का सच कैसे बयान किया जाता?

चलते-चलते

लोहिया जी ने अंग्रेजों के लिए कुछ इस तरह से कविता बनाई थी-

“दगाबाज, मक्कार, सितमगर बेईमान, जालिम हत्यारे
डाकू, चोर, सितमगर, पाजी, चले जा रहे हैं सा……।”

-भाषा के विभिन्न संदर्भ और डा राम मनोहर लोहिया से