‘अंग्रेजी ग्लोबल है’ (लघुकथा)

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अंग्रेजी ग्लोबल है
वह दुनिया के सबसे ताकतवर देश का प्रमुख था। इतनी जाँच के बाद तो चला था वो, फिर विमान दुर्घटना कैसे हो गयी? सारी अक़ल गुम हो गई। किसी निर्जन इलाके में दस घंटे तक बेहोश पड़ा रहा। यानचालक की लाश बगल में पड़ी है। वह भी बिना पेट के! कोई नहीं बचा। आखिर हवाई जहाज पाँच फुट से गिरा नहीं था, हजारों फुट की बात थी! होश आई तब कुछ देर तक कराहने के बाद उसका ध्यान उस स्थान के चारों ओर गया। यह कौन-सी जगह है? वह तो विश्व स्तरीय सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। आखिर विमान दुर्घटना हुई कैसे? एक… दो… तीन… चार… पाँच मिनट तक वह सोचता रहा। अच्छा, छोड़ो, अब हो गई तो हो गई। फिलहाल प्यास जोरों की लगी है! आस-पास कोई आदमी, कोई घर, कुछ भी नहीं दिखा। ये ग्यारहवाँ घंटा चालू है… प्यास बढ रही है। वह उठता है। यह भी एक संयोग ही है कि उसके शरीर पर खरोंच तक नहीं आई है। हाँ, कोट-टाई इस्तरी किए हुए थे, वे बुरी तरह मुड़-तुड़ गये हैं। … उठकर वह पूरब की तरफ चलना शुरू करता है। प्यास बढती जा रही है। … एक… दो… तीन… साढ़े तीन घंटे तक हाँफते-दौड़ते-भागते चलता गया। बहुत थक गया है वह। आखिर एक जगह ठस से बैठ गया। प्यास जानलेवा होती जा रही है। उसे याद आने लगता है, पिछले विश्व स्तरीय सम्मेलन में उसने जल संरक्षण पर भाषण दिया था, कहा था, जल ही जीवन है। आज वह समझ पा रहा है, जल ही जीवन है। अब शाम होने जा रही है। खेलने के लिए 5-7 बच्चों का झुंड इधर बढ़ता जा रहा है। फिर किशोरों की बारी आती है, 10-12 किशोर भी इधर आ रहे हैं। पलभर की झपकी में वह सपना देखता है, किशोर उसकी ओर बढ़ रहे हैं, उनके हाथों में बाँस का धनुष था, वह अब अंग्रेजी की किताब में बदलता जाता है, वह खुश हो जाता है क्योंकि उसे बताया गया है कि दुनिया में सबको अंग्रेजी सिखाने के लिए सारे हथियार इस्तेमाल किये गये हैं। सब लोग अंग्रेजी जानते हैं। करोड़ों-अरबों डालर के खर्चे का लाभ उसे दिख रहा है, किशोर अंग्रेजी के शब्दकोश लिये हुए उसकी ओर बढ रहे हैं। वह आज ही तो अंग्रेजी को आधिकारिक तौर पर ग्लोबल घोषित करने जा रहा था… कि विमान दुर्घटना हो गई। (क्योंकि उसकी ही घोषणा से आदमी आदमी है, वरना वह कुछ नहीं।) … तभी एक किशोर का बाण उसके बगल में आकर गिरता है। किशोर बाण लेने के लिए दौड़ता है। ज्योंही उसके निकट आता है, अधूरी नींद टूट जाती है। वह तुरंत किशोर का हाथ पकड़ लेता है, उसके मुँह से एक शब्द निकलता है- वॉ ट र। किशोर काला है, वह गोरा है… लेकिन इस वक्त बस वॉ ट र। किशोर नहीं समझता। वह चेहरे पर नहीं समझने के भाव लिए, थोड़ा सशंकित खड़ा है। तीसरी बार वॉ ट र, वॉ ट र, वॉ ट र… वह बोलता जा रहा है, उसकी आवाज़ धीमी होती जा रही है, वॉ… ट… र, वॉ… ट… र, वॉ… ट… र। चुप… मौन… किशोर का हाथ उसके हाथ से छूट जाता है। किशोर दौड़ता है… वापस किशोर आता है, 3-4 प्रौढों के साथ। प्रौढ भी वॉ ट र का मतलब नहीं समझते, किशोर उन्हे बता चुका है कि बेहोश आदमी वॉ ट र, वॉ ट र… जैसा कुछ बोलता जा रहा था। आदमी इतनी जल्दी नहीं मरता। फिर होश में आते ही वॉ ट र… । कोई नहीं समझ सका, भला ये वॉ ट र… क्या कह रहा है यह आदमी? शाम ढलनेवाली है। इसे उठाकर सब ले चलते हैं। इसी बीच टाई फट जाती है। … वॉ ट र, टे …क, ड्रिं… क… , नी… ड… , ग्ला… स… , ब्रिं… ग… … … जाने क्या-क्या बोलता जाता है यह आदमी। कुछ भी समझ नहीं सका कोई। बस्ती में पहुँचने पर गिलास दिखाई पड़ता है, वह दौड़ता है… गिलास खाली है… किशोर समझ जाता है, उसे पानी चाहिए… वह तुरंत पानी लाकर देता है। पानी पीते ही उस आदमी की अकल वापस आ जाती है, उसे समझ आ चुका है, यहाँ कोई अंग्रेजी नहीं समझता। … जैसे भी हो, यहाँ से वह भागना चाहता है! उसके मुँह से निकलता है, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल, थर्स्ट इज़ ग्लोबल, हंगर इज़ ग्लोबल, इमोशन्स आर ग्लोबल, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल(अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है, प्यास ग्लोबल है, भूख ग्लोबल है, आदमी की भावनाएँ ग्लोबल हैं, अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है)।

… … वह सपना देख रहा है। विश्व सम्मेलन शुरू है। बड़े-बड़े अक्षरों में आज अंग्रेजी को आधिकारिक तौर पर ग्लोबल घोषित करने की बात लिखी है। वह भाषण देता है और पहला वाक्य कहता है, अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल… … सिर्फ दो घूँट पानी ने हमें सिखा दिया कि कोई भाषा ग्लोबल नहीं, संकेत ग्लोबल हो सकते हैं, मानवता ग्लोबल हो सकती है, अंग्रेजी की बदौलत जब दो घूँट पानी नहीं मिल सकता तब इसे क्या कहें ?  इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल… … 

ग्रामीण इलाक़े में अंगरेज़ी माध्यम का एक स्कूल

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कुछ दिनों से नियमित एक अंगरेज़ी माध्यम के एक छोटे-से स्कूल का हाल-चाल सुनने को मिल रहा है। क़रीब 150 बच्चे पढ़ते हैं उस स्कूल (विद्यालय से ज्यादा स्कूल समझा-कहा-जाना जाता है) में। नर्सरी से लेकर वर्ग (स्टैण्डर्ड) 6 तक चलने वाले इस स्कूल में पढानेवाले दो लोगों द्वारा रोज़ कई बातें पता चल रही हैं। पहले उस अनुभव का एक दृश्य देखिए, जो एक शिक्षक के साथ कुछ दिनों पहले वास्तव में हुआ।

शिक्षक (कक्षा या क्लास में) कॉपी निकाल लिए सब?
सभी बच्चे- जी। (एक बच्चा अपवाद है, वह कहता है- हँ’, ‘हँभोजपुरी में हाँया जीके लिए बहुप्रचलित शब्द है।)
शिक्षक देखता है कि सारे बच्चे कॉपी निकाल चुके हैं। उस बच्चे ने अभी नहीं निकाली है। शिक्षक के पूछने पर वह भोजपुरी में कहता है कि हमरा अभी तीने गो काँपी किनाइल बाऽ। (मेरे लिए अभी सिर्फ़ तीन कॉपियाँ ही खरीदी गई हैं।) भोजपुरी क्षेत्र में कॉपी को काँपी या कापी कहा जाता है। शिक्षक देखता है कि बच्चा हिन्दी नहीं बोल रहा, जबकि स्कूल में हिन्दी बोली जाती है। स्कूल अंगरेज़ी माध्यम भले है, लेकिन अंगरेज़ी बोलना या समझना कैसा है, यह विदित है। सभी बच्चों को होमवर्क (या टास्क लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में टास्क नहीं के बराबर चलता है, टास ही ज़्यादा चलता है) देने के लिए शिक्षक ने कॉपी निकलवाई है। बच्चे से शिक्षक कहता है कि कॉपी निकालो, तब बच्चा फिर अपनी बात दुहराता है कि तीन कॉपियाँ ही उसके पास हैं। शिक्षक पूछता है कि इंग्लिश की कॉपी नहीं है? तब बच्चा कहता है कि बाऽ यानी है। बच्चा हिन्दी समझ लेता है, लेकिन बोलने में असमर्थ रहता है। बच्चा कहता है- मिस जी! हमरा के टास दे दीं। हमरा हिन्दी बोले ना आवेला। (मिस जी, मुझे टास्क दे दीजिए। मुझे हिन्दी बोलने नहीं आती। शिक्षक स्त्री है, इसलिए मिस जी कहा है, वह भी दूसरे बच्चों की देखादेखी ही कहा होगा बच्चे ने।) फिर उसके पड़ोस की एक बच्ची कहती है कि वह अभी नया है, हिन्दी बोलना नहीं जानता, हिन्दी सीख लेगा।
      यह वाक़या उस शिक्षिका की नज़र में ख़ास हो या न हो, हमें वह इस समाज का सच्चा प्रतिनिधि लगता है। जिस इलाक़े में बच्चा अपनी भाषा के निकट की भाषा हिन्दी नहीं बोल पाता हो, वहाँ प्राथमिक शिक्षा (कुछ देर के लिए 12वीं के बाद अंगरेज़ी माध्यम को माफ़ कर देते हैं, क्योंकि मौज़ूदा हालातों में कई जगह अंगरेज़ी बाध्यकारी तो है ही।) अंगरेज़ी में देने का प्रचलन! मुझे पहली बार लगा कि अंगरेज़ी कहाँ तक पहुँच गई है। जिन बच्चों के घर में, पास में, पड़ोस में हिन्दी भी नहीं बोली जाती, 24 घंटे में जिसका हिन्दी से 8 घंटे का भी साथ नहीं चलता, उनको प्राथमिक शिक्षा, शुरू की ही शिक्षा अंगरेज़ी में!
इन इलाक़ों में या ऐसे बच्चों के लिए अंगरेज़ी माध्यम स्कूलों में अग़र अंगरेज़ी बोलने या अंगरेज़ी में ही बोलकर पढ़ाने का चलन हो, तो बच्चे 100 वाक्य में पाँच वाक्य और पाँच शब्द के एक वाक्य तक का मतलब समझने में भी असमर्थ होंगे, यह तो तय है। अंगरेज़ी में गणित का सवाल देने पर भी वे सवाल को समझाने को कहते हैं। फिर उन्हें हिन्दी में समझाना पड़ता है, या कहिए कि हिंग्रेज़ी में या कई बार हिन्दी में अनुवाद जैसा करना पड़ता है।
      दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिन बच्चों के लिए अंगरेज़ी परायी भाषा है, उनको अंगरेज़ी में शिक्षा देना का अर्थ भी कुछ और होता है। कहने को स्कूल में जी. के., सोशल साइंस, साइंस, संस्कृत, हिन्दी, इंग्लिश, मैथ आदि विषय पढ़ाये जाते हैं। जबकि सच यह है कि वे हर विषय में अंगरेज़ी किताब होने के चलते शब्दों का हिन्दी मतलब पूछते हैं। शब्द या वर्ड मिनिंग लिखाना होता है शिक्षक को। हर विषय का मतलब मात्र अंगरेज़ी पढ़ना होता है। साफ़ कहें तो 600 अंको की परीक्षा के विषय का एक ही मतलब है 700 अंकों की अंगरेज़ी। यानी बच्चे सिर्फ़ अंगरेज़ी ही पढ़ते हैं। जब शिक्षकों को हर शब्द अंगरेज़ी मानकर ही, अनुवाद कर के ही, अर्थ बताकर ही पढ़ाना पड़े, तो काहे का अंगरेज़ी माध्यम, यह तो अंगरेज़ी, मात्र अंगरेज़ी का स्कूल है, जैसे कोई विदेशी भाषा का शिक्षण-संस्थान हो स्कूल! वैसे भी हम जानते हैं कि अंगरेज़ी की क़िताब में पाठ के रूप में जीवनियाँ, सामाजिक बातें, कहानियाँ, भौगोलिक, वैज्ञानिक या ऐतिहासिक बातें पढ़ाई जाती हैं ही। यहाँ तो साफ़ है कि स्कूल में ठीक से न तो बच्चे विज्ञान, न गणित, न भाषा और न ही सामाजिक विज्ञान सीख रहे हैं, उन्हें तो बस अंगरेज़ी सिखाई (रटवाई) जा रही है। शिक्षक ख़ुद ही इतनी अंगरेज़ी नहीं जानता हमारे देश में… भारत इतना अंगरेज़ी बोलो आंदोलन चलाने के शताब्दियों बितने पर भी एक शेक्सपियर न पैदा कर सका।
      दुनिया का कोई शिक्षाविद् पता नहीं कैसे यह कह सकता है कि प्राथमिक कक्षाओं में ही बच्चों के ऊपर पूरी डिक्शनरी लादकर उसे रट्टू और टट्टू बना दिया जाए।
      मेरे छोटे से शहर में, जो भारत का एक ग्रामीण इलाक़ा ही कहा जाएगा, नये स्कूल अंगरेज़ी माध्यम के स्पेशल फ़ीचर के साथ खुलने लगे हैं। पहली बार मुझे भोजपुरी, हिन्दी या सभी लोकभाषाओं और अन्य भारतीय भाषाओं के भविष्य के प्रति निराशा (वह तो कहीं न कहीं रही है ही, आशा और सांत्वना देकर दिमाग़ को समझाना ज़ारी रहा है, शायद रहेगा ही।) होने लगी है। शहरी क्षेत्रों का हाल मालूम रहा है, इसलिए शहरों के बारे में विचार यथावत् हैं। लेकिन गाँवों में ऐसा हाल काल जैसा मालूम पड़ने लगा है। हालाँकि सत्य वही है, और निकट दशकों या शताब्दियों तक रहेगा भी कि भारत में अंगरेज़ी शोषकों की भाषा रही है, है और साधारण लोग, शोषित लोग अंगरेज़ी के उस हद तक शिकार नहीं हो सकेंगे कि हमारी भाषाएँ साफ़ मर-बिला जाएँ। इसका कारण है कि जिस देश की तीन चौथाई आबादी ढंग से खा नहीं सकती, तो वह उस देश की भाषाओं को क्या डुबाएगी या पार उतारेगी!
      फ़िलहाल ऐसे स्कूल असफल हों, इस कामना के साथ… … … क्योंकि जलचर नभचर हो नहीं सकता, वह मर जाएगा, मर जाएगा और मरेगा ही अग़र जल की भाषा छोड़ नभ की भाषा बोलेगा…
      हाँ, यह बता दें कि वह स्कूल चलाने वाले और उसके प्रिंसपल भारतीय संस्कृति के बड़े पक्षधर बनते हैं। 

170 देशों में नोटों पर अंग्रेजी का हाल

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इस साल का पहला लेख हाजिर है। व्यस्तताओं और स्वास्थ्य कारणों से इस महीने सक्रियता लगभग शून्य रही है। 
हाल ही में सोचा कि दुनिया के देशों में नोटों पर अंग्रेजी का कितना कब्जा है ? इसलिए लगभग 170 देशों के नोटों पर एक अध्ययन किया। निष्कर्ष वही सामने आया जो आता लेकिन अँखमुँदे विद्वानों से कुछ भी कहना बेकार सा लगता है। अंग्रेजी वाले देश जैसे कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, जमैका, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रिका आदि की बात तो करनी ही नहीं क्योंकि इन देशों मे तो अंग्रेजी ही चलती है। आइए एक नजर डाल लेते हैं इस अध्ययन पर। लगभग 170 देशों के नोटों को देखने के लिए अन्तर्जाल और कुछ वेबसाइटों का सहयोग मिला, यह एक बड़ी बात थी। नोटों के नंबर तक कई देशों में अरबी आदि भाषाओं में देखने को मिले। उदाहरण के लिए यमन, इराक आदि देखे जा सकते हैं। कुछ देशों में मात्र बैंक के नाम अंग्रेजी में मिले तो कुछ में सिर्फ मुद्रा या राशि अंग्रेजी में लिखी मिली और सब कुछ गैर- अंग्रेजी में। वहीं सबसे ज्यादा देश ऐसे थे, जहाँ अंग्रेजी की आवश्यकता नोट पर बिलकुल महसूस नहीं की गई और जैसा सोचता था, वैसा ही हुआ और ऐसे देश सबसे ज्यादा रहे। इनमें से 101 देश ऐसे हैं, जिनके नोटों पर अंग्रेजी बिलकुल ही इस्तेमाल नहीं की गयी थी यानी एक वाक्य तक अंग्रेजी का नहीं था। इनमें दुनिया के विकसित माने जाने वाले देशों में सबसे अधिक देश थे। उदाहरण के लिए जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्वीडेन, स्विटजरलैंड आदि।


मारीशस- 1000 रु० – 2001

      वर्तमान जानकारी के अनुसार 42 विकसित देश अभी हैं, जिनमें गैर-अंग्रेजी वाले देशों की संख्या 30 से अधिक है और उनमें से 20 से अधिक देश अपने नोटों पर अंग्रेजी का इस्तेमाल किसी भी रूप में नहीं करते।
रूस- 5000 रूबल- 2010- नोट का अगला भाग

रूस- 5000 रूबल- 2010- नोट का पिछला भाग

      फिलीपिन्स और डेनमार्क अपने नोटों पर सिर्फ बैंक का नाम अंग्रेजी में लिखते हैं और सब बातें गैर- अंग्रेजी में। इसी तरह नेपाल और जार्जिया राशि अंग्रेजी मे भी लिखते हैं और शेष बातें क्रमशः  नेपाली और जार्जियाई में। इस तरह इन चार देशों को भी गैर-अंग्रेजी का इस्तेमाल करनेवाला माना जा सकता है। फिर 105 देश ऐसे हो जायेंगे जो अंग्रेजी से मुक्त नजर आ सकते हैं।
      दुनिया के 170 में से भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान को लेकर 32 देश ऐसे थे जिनके नोटों पर अंग्रेजी मे बैंक के नाम और राशि लिखी मिली। कुछ देश बहुत छोटे भी थे। जिन 101 देशों के नोटों पर किसी भी रूप मे अंग्रेजी नहीं थी, उनकी कुल जनसंख्या 224 करोड़ से अधिक है। चीन को लेकर स्पष्टता कुछ कम ही हुई। वरना देशों की संख्या 102 और कुल जनसंख्या 359 करोड़ होती।
फिर भी यदि देशों की संख्या को आधार बनायें तब दुनिया के लगभग आधे देश अंग्रेजी के दास कम से कम नोटों पर नजर नहीं आये। कुछ लोग ज्यादा काबिल बनते हुए अपना फैसला अंग्रेजी के पक्ष में सुनाएँ, इससे बेहतर होगा कि 100 से अधिक देशों का खयाल जरूर कर लें। वरना ऐसे लोगों से भी पाला पड़ा है जो संसार के 4-5 देशों के, जिनमें अंग्रेजी चलती है, लोगों से बात करके अंग्रेजी को सारे संसार की भाषा घोषित किए देते हैं।
अगर भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़कर बात करें तो 288 करोड़ लोगों के ये चार देश बाहर निकल जाते है। फिर अंग्रेजी में राशि और बैंक के नाम लिखने वाले देशों की संख्या 32 से घटकर 28 और ऐसा करने वाले देशों की कुल जनसंख्या सिर्फ 73 करोड़ रह जाती है जो दुनिया की कुल जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत है। इस तरह दुनिया में देशों की संख्या के हिसाब से 20 प्रतिशत भी नहीं और जनसंख्या के हिसाब से 15 प्रतिशत भी नहीं हैं अंग्रेजी के भक्तजन! (जिन 170 देशों पर मैंने काम किया उनमें से 140 देशों की कुल जनसंख्या ही लगभग 600 करोड़ है और 600 करोड़ संसार की कुल जनसंख्या का 86 प्रतिशत है।) अब आप स्वयं तय करें कि आपके देश के रूपये पर क्या होना चाहिए ? वैसे तो अपने यहाँ व्यक्तिवाचक संज्ञाओं का अनुवाद भी होता है। सदाबहार उदाहरण भारत का इंडिया के रूप में मौजूद है! (वे लोग यहाँ लिखने से बचें जो आकर कहना चाहते हों कि हमारे सोचने- लिखने- कहने से क्या होगा ?) 

भाषा पर एक बातचीत … ‘भाषा एक प्राथमिक सवाल क्यों है’

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एक मित्र से हुई बातचीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
‘भाषा एक प्राथमिक सवाल क्यों है’
हम: एक उदाहरण देखिए। 
मित्र: हाँ। 
हम: पूँजीवादी कितने है ? कितने प्रतिशत ? 
मित्र: पाँच फीसदी के करीब। 
हम: अंग्रेजी वाले कितने हैं ? 121 करोड़ में से कितने ?

मित्र: लगभग इतने ही होंगे। 
हम: क्यों ? फिर इतने कम लोगों का सारा कानून 121 करोड़ लोगो पर चलता है। क्यों ?
मित्र: आप बताइये। 
हम: पहले एक सवाल। कितने लोग जो अच्छी अंग्रेजी जानते- बोलते- समझते हैं वे भूख से मरते हैं ? गरीब हैं ?
मित्र: एक भी नहीं। 
हम: और कितने लोग अच्छी मैथिली, मगही, ब्रज,  गढवाली, हिन्दी- भोजपुरी बोलने वाले नौकरी को तरसते हैं ? तो निष्कर्ष खुद बताइए। मैं खोलता हूँ भोजपुरी सिखाने के लिए संस्थान। कितने लोग आएंगे ? क्या मैं कार खरीद सकता हूँ उस कमाई से ?
मित्र: हरगिज नहीं। 
हम: अब मैं खोलता हूँ अंग्रेजी स्पोकेन कोर्स ? कार तो कार,  कार की फैक्ट्री खोल सकता हूँ थोड़ा दिमाग लगाकर, चापलूसी कर। 
मित्र: सही। 
हम: तो शोषित वर्ग किस भाषा का है ? हिन्दी या अन्य भारतीय भाषा वाला या अंग्रेजी वाला ? 
मित्र: भाषा पहाड़ जैसा मुद्दा है। क्योंकि वह है। चप्पल खरीदो, चप्पल पर अंग्रेजी। कुदाल खरीदो, उस पर TATA अंग्रेजी। 
गंजी- धोती- लुंगी- टोपी- छाता- गमछा खरीदो हर जगह अंग्रेजी। कुदाल चलाने वाला समझता है अंग्रेजी ?
मित्र: नहीं। 
हम: आप बताइए ऐसा क्या है जिसे मजदूर किसान खरीदते हों और अंग्रेजी न लिखा गया हो। 
दवा- खाद- बीज तक पर अंग्रेजी। और लोग कहते हैं कि अंग्रेजी से दिक्कत नहीं ?
पाँचवी पास-आठवीं पास चपरासी का रेलवे-फार्म हो या कुछ भी। फार्म अंग्रेजी, प्रवेश- पत्र अंग्रेजी। परीक्षा परिणाम के लिए लगभग सब अंग्रेजी। 
अदालतों की तो बात ही छोड़ दो। आपकी जांघिया पर अंग्रेजी, पैंट पर अंग्रेजी। 
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आपको क्या लगता है ? इस विषय पर एक लेख के माध्यम से हम अपने विचार यथाशीघ्र ही रखने की कोशिश करेंगे। 

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास( चौथा और अन्तिम भाग):- अवश्य पढ़ें

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(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद  (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधानसे लिया गया है। इसे देखिए, लोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)



पहला भाग        दूसरा भाग        तीसरा भाग


अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का आधार अँगरेजी: एक भ्रमजाल



     ऐसे ही खेद की यह बात है कि अँगरेजी के कारण हममें कुछ यह भावना पैदा हो गई हो कि हम विदेशियों से कुछ हेय हैं और हम उनके समकक्ष तभी हो सकते हैं, जब हम उनकी भाषा में ही या अँगरेजी के माध्यम द्वारा उनसे बात करें। मेरी यह मान्यता है कि यही हेयता की भावना इस तर्क के पीछे है कि बाह्य जगत से हमारा सम्पर्क केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही हो सकता है। कहा यह जाता है कि आज संसार के विभिन्न देश एक-दूसरे के अत्यन्त निकट आ गये हैं उर इसलिए प्रत्येक देश और प्रत्येक जाति के लिए यह वांछनीय है कि सारे भू-मण्डल से अपना सम्पर्क बनायें रखे और जहाँतक हमारे देश का सम्बन्ध है, यह कहा जाता है कि यह सम्पर्क केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही रखा जा सकता है। प्रश्न यह होता है कि हमारे लिए ही यह क्यों आवश्यक है कि हमारा बाह्य जगत् से सम्पर्क अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही हो? यह बात फ्रांस, रूस, दक्षिण अमेरिका, चीन आदि के लिए आवश्यक क्यों नहीं है? क्या इन देशों का बाह्य जगत् से सम्पर्क नहीं है? क्या वे लोग संयुक्तराज्य में केवल अँगरेजी के द्वारा ही विचार-विनिमय करते हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि दक्षिणी अमेरिका के राज्यों के प्रतिनिधि स्पेनिश भाषा के माध्यम द्वारा, रूस के प्रतिनिधि रूसी भाषा के द्वारा और चीन के चीनी भाषा के द्वारा सब काम वहाँ करते हैं? यदि वे लोग अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम द्वारा बाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं, तो फिर ऐसी कौन-सी बाधा है कि हम अपनी भाषा के माध्यम द्वारा बाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित न कर सकें? यह ठीक है कि आज संयुक्तराष्ट्र में हिन्दी एक स्वीकृत भाषा नहीं है, किन्तु क्या इसका यह कारण नहीं है कि जिस समय संयुक्तराष्ट्र की स्थापना हुई थी, उस समय हम परतन्त्र थे और अँगरेजों के दास थे, अत: वहाँ हमारे सम्बन्ध में यह विचार ही पैदा न हुआ कि हमारी भी कोई माँग हो सकती है। चीन ने अपनी गरिमा रखने के लिए अपनी भाषा को वहाँ मान्य कराया, किन्तु क्या स्वतन्त्र होने के पश्चात् हमने एक दिन भी यह प्रयास किया है कि हमारी भाषा उस संगठन की एक स्वीकृत भाषा हो जाय? पर हम करते ही कैसे, जब हम अपने देश में ही अपनी भाषा को राज्यासन पर बिठाने को उत्सुक नहीं हैं। परिणाम यह हुआ है कि विदेशी हमको तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं और समझते हैं कि हम ऐसी बर्बर जाति के लोग हैं, जिनकी अपनी कोई भाषा नहीं और जो अपने भूतपूर्व शासकों की भाषा की जूठन से काम चलाते हैं। कैसा पतन है यह उस देश का, जिसकी भाषा एक दिन सारे दक्षिण एशिया और अन्य देशों की विचार-विनिमय की भाषा थी, जिसमें अनेक देशों के विद्यार्थी उस भाषा का ज्ञान उपार्जित करने को आते थे और जो देश सारे सभ्य जगत् का सांस्कृतिक केन्द्र था। कैसा पतन है कि आज उस देश के वासी इस बात में अपना गौरव समझें कि उनकी सन्तान केवल अँगरेजी बोल सकती है, इस देश की एक भाषा नहीं। हमारी आत्मा का हनन इससे अधिक और क्या हो सकता है और यह इसलिए हुआ है कि अँगरेजी हमपर लादी गई। राजनीतिक शास्त्र में एक सूत्र है कि यदि कोई जाति अन्य जाति पर अपना राज्य पूर्णत: जमाना चाहती है, तो उसे यह चाहिए कि वह विजित जाति की भाषा नष्ट कर दे। अँगरेजों ने इस प्रयोजन से हमपर अँगरेजी लादी थी। वे हमारी भारतीय आत्मा का हनन करना चाहते थे। वे इसमें कुछ सीमा तक सफल हुए, किन्तु हमारी क्रान्ति ने उन्हें पूर्णत: सफल न होने दिया, पर आज हमारी आत्मा की इस शत्रु को हमपर क्यों लादा जा रहा है?
अँगरेजी भाषा से मुझे कोई द्वेष नहीं, पर………
मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मुझे अँगरेजी भाषा से कोई विद्वेष नहीं है, किन्तु जो काँटा मेरे मन में चुभता है वह यह है कि इस भाषा को हमारे देश में विषमता का, शोषण का, वर्गप्रभुत्व का साधन बनाया जा रहा है और इसका ऐसा प्रयोग किया जा रहा है कि जिससे हमारे देश की आत्मा का हनन हो। इस विषय में मेरा वही मत है, जो अँगरेजों के सम्बन्ध में गांधीजी का था। वे सदा कहते थे कि उनकी अँगरेज जाति से शत्रुता नहीं, अँगरेजों से वे प्रेम करते हैं, परन्तु यह होते हुए भी अँगरेजी राज्य इस देश पर अस्वाभाविक है, इस देश की समस्त पीड़ाओं का कारण है, इसलिए उसे जाना ही चाहिए। अँगरेजी भाषा के सम्बन्ध में भी मेरी यही स्थिति है। यदि अँगरेजी से ऐसे ही बरता जाय, जैसा कि अन्य विदेशी भाषाओं से बरता जाता है, तो मैं उसका स्वागत करूँगा। न तो मुझे और न किसी हिन्दी या भारतीय भाषाप्रेमी को इस बात में कोई आपत्ति है या हो सकती है कि जो लोग चाहें, वे अँगरेजी सीखें, चाहे फ्रांसीसी सीखें, चाहे चीनी सीखें। यदि कुछ लोग कई भाषाएँ सीखना चाहते हों तो यह भी अच्छी बात होगी। और इसके लिए प्रबन्ध होना चाहिए। किन्तु, केवल इस दृष्टि से कि यहाँ अँगरेजी लादी जाय, यह दलील देना कि कई भाषाओं का ज्ञान-उपार्जन हर विद्यार्थी के लिए वांछनीय है, कुछ उचित बात नहीं है। मैं यह पूछना चाहता हूँ कि जो लोग आज इस वांछनीयता की दुहाई देते हैं, उनमें से कितनों ने यह सोचा भी है, प्रयास करने का तो प्रश्न ही नहीं, कि वे इस देश की कुछ भाषाएँ भी सीख लें। मुझे तो ऐसा लगता है कि अँगरेजी के अतिरिक्त उन्होंने कोई और भाषा सीखने का विचार तक नहीं किया और यहाँ तक कि जो भाषा उन्हें अपनी माता से मिलती थी, उसको भी उन्होंने भुला दिया और यह प्रयास किया कि उनकी संतान अँगरेजी के अतिरिक्त न और कुछ जाने, न बोले। अँगरेजी के मोह में वे इतने पागल हैं कि इस विचार से कि पाँच-छह वर्ष की अवस्था से हमारे देश के बालकों को वे अनिवार्यत: अँगरेजी पढ़ाने के लिए तर्क दे सकें, उन्होंने अँगरेजी बोलनेवालों देशों से विद्वान् बुलाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि छोटे बालकों के लिए कई भाषाएँ सीख लेना बहुत आसान होता है, और इसीलिए छोटी कक्षाओं में ही उन्होंने अँगरेजी  की पढ़ाई आरम्भ कर दी है। पर प्रश्न यह होता है कि अँगरेजी की ही क्यों? क्यों इस देश की कई भाषाओं का ज्ञान कराना ठीक नहीं? पर ऐसी कोई योजना नहीं दिखाई पड़ती। कहा यह जाता है कि फ्रांस का राजकुल अपने मुकुट को आँखों पर धरे पहाड़ के कगार पर जा रहा था और खड्ड में जा पड़ा एवं विनष्ट हो गया। कहीं इतिहास यह न कहे कि भारत में अँगरेजी-वर्ग इस अँगरेजी मुकुट को आँखों पर धरे इसी प्रकार खड्ड में जा पड़ा। मेरा यह प्रयास है कि समय रहते हम सँभल जाय और इसी दृष्टि से मैं आप सबका आह्वान करता हूँ कि आप इस महाप्रयास में लग जायँ कि इस देश की भाषाएँ शीघ्रतिशीघ्र राज्य-क्षेत्र में अपना उचित स्थान पा जायँ।
सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं का माध्यम
     इस प्रयास के दो पहलू हैं। एक तो उन बाधाओं को हटाना, जो हमारी भाषाओं की प्रगति को अवरुद्ध कर रही हैं। मेरे विचार में सबसे बड़ी बाधा तो यह है कि लोक-सेवा-आयोगों कि परीक्षा का माध्यम आज सर्वत्र केवल अँगरेजी है। यह उन प्रदेशों के प्रति घोर अन्याय है, जिन्होंने देशी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बना लिया है। उन प्रदेशों के विद्यार्थी इन परीक्षाओं में पिछड़े रह जाते हैं 
(यहाँ एक तथ्य की तरफ़ मैं आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा कि आखिर क्या वजह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में प्राय: (शायद 95 प्रतिशत या 100 प्रतिशत ऐसा ही होता है) अंग्रेजी माध्यम के उम्मीदवार ऊँचा स्थान हासिल करते हैं? क्या हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने वाला इतना बेवकूफ़ होता है और अगर ऐसा है, तो सरकार घोषित कर दे कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी हो ही नहीं सकती, केवल और केवल अंग्रेजी हो सकती है। वैसे भी आज से एक साल पहले संसद में गृह मंत्री से पूछे गये एक सवाल के जवाब में कहा गया था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। सबूत के लिए यहाँ देखें। पूरे देश में हिन्दी माध्यम के किसी उम्मीदवार के अन्दर ऐसी क्षमता है ही नहीं कि वह ऊँचा स्थान हासिल कर सके? कभी-कभार ऐसा गलती से हो जाता हो, तब उसकी बात अलग है। 2001-02 में कई लोगों ने शिकायत की थी कि हिन्दी माध्यम से होने के बावजूद साक्षात्कार में उनसे अंग्रेजी बोलने को कहा गया और अंग्रेजी में सवाल पूछे गए। मैं पूछना चाहता हूँ कि जब ऐसे उम्मीदवार लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद साक्षात्कार देने पहुंच सकते हैं, तब वे अभी भी बेवकूफ़ समझे जाते हैं? सिविल सेवा के लिए सिविल यानि साधारण लोगों की भाषा अपनाई जाती है? इस तरह की दुष्टता और कुचक्र का मतलब तो यही है सारे हिन्दी भाषी गधे हैं और कभी-कभार एक-दो को छोड़कर सर्वोच्च स्थान हासिल करने वाले 10-20 या 30 उम्मीदवार तो हिन्दी माध्यम का शायद ही हो सकता है। सरकार यह घोषित कर दे कि प्रशासनिक सेवा की परीक्षा देने का और प्रशासनिक सेवा में जाने का अधिकार सिर्फ़ अंग्रेजों की मानस संतानों को है और किसी को नहीं। – प्रस्तुतकर्ता) 
और इसलिए इन प्रदेशों में भी यह प्रयास हो रहा है कि शिक्षा का माध्यम पुन: अँगरेजी हो जाय। कम-से-कम विश्वविद्यालयों के शिक्षक इसी आधार पर वह तर्क देते हैं कि उच्च शिक्षा का माध्यम अभी अँगरेजी ही रहना चाहिए। भारत-सरकार और राज्य-सरकारों का यह कर्त्तव्य है कि वे देशी भाषाओं के प्रति इस घोर अन्याय को अविलम्ब बन्द कर दें। इसलिए, हिन्दी और अन्य देशी भाषाएँ इन परीक्षाओं का माध्यम स्वीकार की जानी चाहिए? इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि हमारे देश की भाषाएँ इन परीक्षाओं के लिए वैकल्पिक विषयों की सूची में भी सम्मिलित की जायँ। 

(हालांकि अब ऐसा हो चुका है, लेकिन सभी जानते हैं कि भाषाओं के मामले में किसका वर्चस्व है। – प्रस्तुतकर्ता)

यह कितनी भारी विडम्बना है कि इन परीक्षाओं के लिए यूरोप की प्रादेशिक भाषाएँ, अर्थात् फ्रेंच, जर्मन, इटालियन इत्यादि-इत्यादि वैकल्पिक विषयों में तो हों, किन्तु इस देश की एक भी प्रादेशिक भाषा उस सूची में न हो। मानों, हमारे राज-कर्मचारियों के लिए फ्रांसीसी या स्पेनिश सीखना तो वांछनीय है, किन्तु इस देश की एक भी प्रादेशिक भाषा जानना या सीखना वांछनीय नहीं है। अँगरेजों ने तो इस देश की भाषाओं को इन परीक्षाओं के लिए वैकल्पिक विषय इसलिए न रखा था कि उनकी तुलना में यहाँ के परीक्षार्थी अधिक सफलता प्राप्त न कर पायें और यूरोप की प्रादेशिक भाषाओं को इसलिए रखा था कि अँगरेज परीक्षार्थी भारतीयों की अपेक्षा उन परीक्षाओं में अधिक संख्या में सफल हो सकें। किन्तु, आज किस सिद्धान्त पर भारतीय भाषाओं का बहिष्कार किया जा रहा है? इस बहिष्कार के कारन इन भाषाओं की प्रगति में बाधा पड़ रही है और यह अविलम्ब दूर होना चाहिए।
उच्च न्यायालयों की भाषा
      इसके अतिरिक्त आज हमारी भाषाओं के सामने यह बाधा भी है कि उनका प्रयोग उच्च न्यायालयों में नहीं हो सकता। हमारा आज जो संविधान है, उसमें यह एक उपबन्ध है कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की भाषा केवल अँगरेजी होगी। परिणामत:, वहाँ व्यवसाय करनेवाले सब लोग अँगरेजी का ही प्रयोग कर सकते हैं और करते हैं। स्वभावत: सारे विधि-व्यवसायों का हित इसी में हो जाता है कि वे देशी भाषाओं से कुछ विशेष वास्ता न रखकर अँगरेजी से ही अपना वास्ता रखें। विधि के क्षेत्र से हमारी भाषाओं के इस बहिष्कार के कारण भी वे पनप नहीं पातीं। कैसी अजीब बात है कि जिस देश के निन्यानबे प्रतिशत लोग अँगरेजी का एक शब्द नहीं समझते, उनकी जीवन-व्यवस्था के लिए नियम और विधियाँ अँगरेजी में ही बनाई जायँ। जो कारखानों में काम करते हैं और जिनके लिए अँगरेजी करिया अक्षर भैंस बराबर है, उनके अधिकारों की विधियाँ भी अँगरेजी में बनाई जायँ।

(आठवीं और पाँचवी पास उम्मीदवार के लिए नियुक्ति के आवेदन-पत्र(फार्म) तक अंग्रेजी में छापे जाते हैं। – प्रस्तुतकर्ता) 

परिणाम यह है कि विधियों से जो अधिकार हमारे जनसाधारण को मिले हुए हैं और जो दायित्व उनपर रखे हुए हैं, उनसे वे सर्वथा अपरिचित रह जाते हैं और कुछ मुट्ठी-भर अँगरेजी पढ़े-लिखे हाथों की इसलिए कठपुतली हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त हमारी न्याय-प्रणाली इस अँगरेजी के कारन अत्यन्त खर्चीली और शिथिल गतिवाली हो गई है। जब कभी उच्च न्यायालय में कोई अपील जाती है, तब इस कारण कि उच्च न्यायालय की भाषा अँगरेजी है, उस मुकदमे की पूरी कार्यवाही का उल्था अँगरेजी में करना पड़ता है। इस उल्थे को पेपर-बुक कहा जाता है और इसके तैयार करने में पर्याप्त धन और समय का खर्च होता है। कभी तो पेपर-बुक हजारों रुपया खर्च बैठता है और वर्षों में यह तैयार होता है; किन्तु कैसे आश्चर्य की बात है कि न्याय-प्रणाली के इस दोष के प्रति विधि-आयोग ने संकेत तक नहीं किया है; क्योंकि अँगरेजी का चश्मा उसकी आँखों पर भी चढ़ा हुआ था और वह अँगरेजी से होनेवाली इस हानि को देख ही नहीं सकता था। मैं समझता हूँ कि हमारी भाषाओं की इस बाधा को भी तुरन्त दूर कर देना चाहिए और इस बात की अनुमति चाहिए कि उच्च न्यायालयों में और उच्चतम न्यायालय में देशी भाषाओं या हिन्दी का प्रयोग किया जा सके।
मन्त्रियों और शासन-तन्त्र की भाषा
       इसके अतिरिक्त हमारे मन्त्रियों और उच्च पदाधिकारियों द्वारा भी अँगरेजी का अपने सब कार्यों में प्रयोग हमारी भाषाओं के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। यथा राजा तथा प्रजा के सिद्धान्त के अनुसार इन मन्त्रियों की देखादेखी अन्य लोग भी इसी में अपना गौरव समझते हैं कि वे भी अपने विभिन्न कार्यों में अँगरेजी का प्रयोग करें, चाहे वह अँगरेजी कितनी ही टूटी-फूटी, गलत-सलत क्यों न हो।

(अभी तो केंद्र के सारे विशेष मंत्री अंग्रेजी के अलावे शायद ही कुछ बोलते हैं। कुछ चिल्लाते भी हैं, लेकिन अपने बच्चों को विदेशों में पता नहीं क्या पढ़ाते हैं? ऐसा क्या पढ़ने जाते हैं इनके लाडले-लाडलियाँ विदेश और अन्त में आकर भारत में करते क्या हैं, सब जानते ही हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एक पर्चा छापता है हर 14 सितम्बर को। उस पर हमारे वर्त्तमान गृह मंत्री के हस्ताक्षर हिन्दी में यानि नागरी में रहते हैं। लेकिन वर्त्तमान गृह मंत्री हिन्दी कब बोलते हैं? – प्रस्तुतकर्ता) 

अत:, हमारे मन्त्रियों और उच्च पदाधिकारियों को भी अपना यह कर्त्तव्य मानना चाहिए कि वे अपना सारा कार्य अपनी प्रादेशिक भाषाओं के माध्यम द्वारा ही करें। साथ ही सचिवालयों में भी हिन्दी-भाषा-भाषी क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग और इतर भाषाभाषी क्षेत्रों में वहाँ की भाषाओं का प्रयोग तुरन्त होना चाहिए, तभी हमारी भाषाओं को वह सम्मान मिलेगा, जो उनकी प्रगति के लिए प्राणवायु के समान है। शब्द-संचार के जो यान्त्रिक साधन आज अँगरेजी के लिए उपलब्ध हुए हैं, वे भारतीय भाषाओं के लिए भी अविलम्ब किये जाने चाहिए, तभी हमारी देशी भाषाओं के समाचार-पत्र उस बाधा से मुक्त हो सकेंगे, जो आज उन्हें घेरे हुए है और जिसके कारण वे उतनी शीघ्रता से समाचार नहीं दे सकते, जितना शीघ्रता से कि अँगरेजी-पत्र दे लेते हैं। बाधाएँ तो और भी हैं, किन्तु उन सब को गिनाना आवश्यक नहीं है। केवल इतना कह देना मैं पर्याप्त समझता हूँ कि हमारी भाषाओं को वे सब सुविधाएँ दी जानी चाहिए, जो अँगरेजी को दी जा रही हैं।
चारों हिन्दीभाषी राज्यों में हिन्दी चलाओ—योजना
      जहाँ तक हिन्दी-भाषाभाषी उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, और मध्यप्रदेशचार राज्यों का सम्बन्ध है, मैंने हाल ही हिन्दी चलाओ नामक एक योजना प्रस्तुत की है। इन चारों राज्यों में इस योजना को काफी समर्थन मिला है। कहा जाता है कि रचनात्मक ढंग की यह पहली ब्यौरेवार योजना है। जो कुछ हो, हमें प्रयत्न करना है कि इन चारों राज्यों में यह योजना कार्यरूप में परिणत की जाय।
हिन्दी का कहीं कोई विरोध नहीं
      परन्तु, जब मैं इन चारों हिन्दी-भाषाभाषी राज्यों में हिन्दी चलाने की बात कहता हूँ, तब यह न समझ लिया जाय कि मैं यह मानता हूँ कि जिन राज्यों अथवा क्षेत्रों की मातृभाषा हिन्दी नहीं है, वहाँ हिन्दी का ऐसा विरोध है, जिसपर ध्यान दिया जाय।
      हमारी संविधान-सभा ने सर्वमत से हिन्दी को इस देश की राजभाषा स्वीकृत किया था। आज यत्र-तत्र इतर भाषाभाषी कतिपय सज्जन हिन्दी का विरोध करते सुने जाते हैं। एक तो वे दक्षिण के चार राज्यों में से केवल तमिल-भाषाभाषी मद्रास के महानुभव हैं और कुछ बंगाल के। परन्तु, यह विरोध रोटियों के कारण है और जिस मद्रासराज्य में यह विरोध दिख रहा है, वहाँ इस विरोध के साथ ही हिन्दी सीखनेवालों की संख्या बढ़ी है। शेष भारत के किसी भी भाग में हिन्दी का कोई विरोध नहीं है। मैंने समूचे भारत के जाने कितने दौरे किये हैं और करता भी रहता हूँ और यह बात मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहता हूँ।
साहित्य-सर्जन
     दूसरा हमारे प्रयास का पहलू सर्जनात्मक हो मैं इस संस्था को बधाई देता हूँ कि इसने इस बारे में स्तुत्य कार्य दिया है।  किन्तु, हम अबतक के कार्य से सन्तोष करके नहीं बैठ सकते। हमें इस देश की आत्मा की अभिव्यक्ति अपनी भाषाओं के माध्यम द्वारा ही हर प्रकार से करनी है। हमारे साहित्यकारों का यह धर्म है कि वे अपनी जीवनानुभूति अपनी भाषाओं के सुन्दरतम शब्दों में अभिव्यक्त करके इन भाषाओं के साहित्य-भाण्डार को परिपूर्ण कर दें। हमारा देश आज एक महान् यात्रा पर चल पड़ा है। ऐसी यात्रा पर, जो उस महामन्दिर में उपासना के लिए है, जिसके प्रसाद से हमारे देश के प्रत्येक नर-नारी का जीवन सब दृष्टियों से सम्पन्न, समृद्ध और आनन्दमय हो जायगा।
आह्वान
     पिछली शताब्दियों में अनेक कारणों से हमारा जीवन गतिहीन हो गया था और इस कारण हम अन्य जातियों से बहुत पिछड़ गये। हमें अब बड़े पग बढ़ाकर उनके समकक्ष आ जाना है और यह हम तभी कर पायेंगे, जब हमारे प्रत्येक नागरिक के हृदय में यह ज्योति जग जाये कि उस के प्रयास पर उसका और हम सबका भविष्य निर्भर करता है। हमें उसे गतिमान बना देना है, गाँव-गाँव और नगर-नगर में हमें यह नवसंदेश पहुंचा देना है। यह काम हमारे भाषा के साहित्यिकों का है, कवियों का है, कलाकारों का है और साथ ही हमारे दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का है। मैं आपका आह्वान करता हूँ कि आप इस ज्योति-शिखा को लेकर इस भाषा की अपार शक्ति को लेकर ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में अलख जगायें। हमारे जन-मानस को आन्दोलित कर दें, जिससे कि वे सब बाधाओं को हटाकर, सब विदेशी जंजीरों को तोड़कर अपना भाग्य-निर्माण करने के लिए और संसार की जातियों में अपना उचित स्थान प्राप्त करने के लिए, द्रुतगति से अग्रसर हो सकें।
(अब आश्चर्य होता है कि ऐसा पचास सालों बाद भी न हो पाया है। उल्टे पिछले पचास सालों में अंग्रेजी के जुआ-घर खुलते गए हैं और अब तो गाँव में भी खुल रहे हैं। क्या यह आह्वान फिर किया जाय? वैसे भी यह मामला अब चालीस सालों से दबा हुआ है। आप क्या चाहते हैं?  -प्रस्तुतकर्ता)

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास(भाग-3):- अवश्य पढ़ें

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(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद  (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधानसे लिया गया है। इसे देखिए, लोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)

वैज्ञानिक उधार खाता

     हमारी भाषाओं में इस प्रकार का साहित्य पहले हो और तब वे शिक्षा का माध्यम बनाई जायँ, यह बात किसी से यह कहने के समान है कि तैरना पहले सीख लो और पानी में पीछे घुसो।


(यह एक ऐसा तर्क है जिसका जवाब शब्द से शायद ही दिया जा सके। गाँधी जी ने भी यही कहा था कि बिना पाठ्यक्रम और किताबों के इन्तजार के अपनी भाषा लाओ, बाद में किताबें पीछे-पीछे आ जाएंगी। प्रस्तुतकर्ता)


इस प्रश्न के एक पहलू और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पहलू पर अबतक लोगों की दृष्टि नहीं गई है। विज्ञान का इतिहास हमें यह बताता है कि नये-नये वैज्ञानिक तथ्यों की खोज और नये-नये यन्त्रों का निर्माण विश्वविद्यालय से उपाधि-प्राप्त विद्यार्थियों ने इतना नहीं किया है, जितना कि उन लोगों ने किया है, जिन्हें कि जीवन में स्वयं की समस्याएँ स्वयं अपनी प्रतिभा से सुलझानी पड़ती हैं, अर्थात् श्रमिकों ने और शिल्पियों ने। हम यह समझे बैठे हैं कि हमारे विश्वविद्यालयों में जो पाठ पढ़ाये जाते हैं, उन्हीं के सहारे इन विश्वविद्यालयों के स्नातक हमारी सब यान्त्रिक और आर्थिक समस्याओं का हल कर लेंगे। एक प्रकार से देखा जाय, तो विज्ञान के क्षेत्र में भी हम इसी भरोसे बैठे हैं कि पाश्चात्य जगत् से मिले वैज्ञानिक उधार-खाते से हमारा उसी प्रकार काम चल जायगा, जिस प्रकार कि आर्थिक क्षेत्र में विदेशी धन के उधार-खाते से हम चला रहे हैं।


(आज के स्थिति की तुलना भी करके देख लीजिए। पचास साल पहले की जो स्थिति थी, आज भी कुछ वैसी ही है।प्रस्तुतकर्ता)


किन्तु, भारत के भौगोलिक वातावरण से और भारत के प्राकृतिक परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए केवल पाश्चात्य जगत् के उधार के उधार से हमारा काम नहीं चलने का और यदि किसी सीमा तक चल भी जाय तो, हम अपने देश को विज्ञान के उस स्तर तक नहीं ला सकेंगे, जिस स्तर तक कि अन्य देश अपनी नई-नई खोजों को, नये-नये यन्त्र-निर्माण के द्वारा पहुँच गये हैं और आगे भी पहुँचेंगे। यदि हम वैज्ञानिक जगत् में दूसरों के समकक्ष बनना चाहते हैं, तो हमें स्वयं नई-नई वैज्ञानिक खोजें और नये-नये प्रकार के यन्त्र-निर्माण करने होंगे और यह सब हम पाश्चात्य जगत् की जूठन से नहीं कर पायेंगे। 


(यहाँ ध्यान दें कि ये बातें एक आवेश में कही गई बात नहीं है, बल्कि विज्ञान के विकास की प्रक्रिया को समझने के बाद कही गई हैं। – प्रस्तुतकर्ता)


इसके लिए यह आवश्यक होगा कि हमारा प्रत्येक श्रमिक, प्रत्येक कृषक, प्रत्येक नर-नारी इस बात के लिए सचेष्ट हो जाय कि जो समस्याएँ उसके सामने आती हैं उनके समाधान के लिए अहर्निश नई-नई युक्तियाँ सोचे, नये-नये यन्त्र निकाले और इस प्रकार नये-नये वैज्ञानिक तथ्यों का पता चलाये। आवश्यकता नवनिर्माण अथवा उत्पत्ति की जननी है(Necessity is the mother invention)। जब जीवन की चुनौती हम स्वीकार करते हैं, तभी हम नये सत्य खोज निकालते हैं, नये यन्त्र, नई युक्तियाँ बना पाते हैं। स्पष्ट है कि हम अपने देश के निन्यानबे प्रतिशत वासियों को यह अवसर इस कारण प्रदान नहीं कर पा रहे कि हम अँगरेजी से चिपटे हुए हैं और अपने इस देश में हमने यह भ्रम फैला रखा है जिसे अँगरेजी नहीं आती, वह किसी प्रकार की वैज्ञानिक खोज या वैज्ञानिक निर्माण नहीं कर सकता। विदेशी भाषा के माध्यम द्वारा पढ़ने के लिए अपने युवकों को मजबूर करके हमने उनकी प्रतिभा को तो कुण्ठित कर ही दिया है, उनको रट्टू मण्डूक बना ही दिया है, साथ ही हमने अपने देश के साधारण जन में भी असहायता की, विचारशून्यता की प्रवृत्ति पैदा कर दी है और ज्ञान के स्रोत हर प्रकार से अवरुद्ध कर दिये हैं। हमारा आर्थिक तन्त्र आज लँगड़ी चाल से चल रहा है, उसमें जनता के हृदय का स्पंदन नहीं है, उसके पीछे जनबल नहीं है, इस देश का महान् अपरिमित जनबल नहीं है। सच तो यह है कि हमारा अँगरेजी-वर्ग अपने स्वार्थवश यह भूल बैठा है कि इस देश की कितनी हानि इस अँगरेजी के कारण हो रही है। हम अनेक वर्षों तक अपनी राष्ट्रीय महासभा में यह बात अपने संकल्पों, अपने प्रस्तावों द्वारा कहते रहे हैं कि अँगरेजी के कारन हमारे देश का महान् सांस्कृतिक, आर्थिक और नैतिक महापतन हुआ है। जब हम यह बात कहते थे, तब हमारा आशय इतना ही न था कि हमारा पतन इस कारण हुआ कि इस देश में अँगरेज राजतन्त्र के प्रमुख पदों पर आसीन थे और वे उस तन्त्र को अपने स्वार्थ के लिए चलाते थे, वरन् हमारे मन में यह बात भी थी कि इस पतन का कारण वह भाषा भी है, जिसके द्वारा वह अपना शासन इस देश में चला रहे थे। अँगरेजी भाषा के कारण हमारी अपने देश की भाषाएँ पंगु हो गईं। उनको वह दाना-पानी न मिला, जो उनके स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक था। अँगरेजी के कारण हमारे जनसाधारण असहाय हो गये; क्योंकि राज-दरबार में जाने पर वे शासकों से अपनी भाषा में न तो बात कर सकते थे और न शासकों की भाषा समझ सकते थे, अत: उन्हें अपने जीवन की गाढ़ी कमाई शासकों के दलालों को इसलिए देनी पड़ी कि वे दलाल इनकी बात शासकों तक पहुंचा सकें और शासकों के आदेश उन्हें समझा सकें। अँगरेजी के कारण हमारे देश के शिल्पी, हमारे देश के महान् वास्तुकार दर-दर के भिखारी हो गये। जिन लोगों ने कोणार्क जैसे मन्दिर का निर्माण किया था, उनके वैसे ही कुशल वंशज केवल इसलिए रंक हो गये कि वे अँगरेजी न जानते थे और अँगरेजी साम्राज्य के राज-दरबार में केवल वे ही कुशल वास्तुकार माने जाते थे, जिन्होंने किसी अँगरेजी वास्तु-विज्ञान के विद्यालय में शिक्षा पाई थी। अँगरेजी ने हमें प्रगति-पथ पर तो क्या चलाया, हमसे वह विज्ञान, वह शिल्प, वह कला भी बहुत-कुछ छीन ली, जो हम अँगरेजी राज्यकाल के पूर्व अर्जित कर पाये थे। आज भी अँगरेजी से हमारी कितनी हानि हो रही है, इसपर जरा विचार कीजिए। अँगरेजी के मोह के कारण हमारे सहस्रों विद्यार्थी इंग्लैण्ड, अमरीका के विद्यालयों में जाकर पढ़ते हैं और इस प्रकार देश का करोड़ों रुपया विदेशों में खर्च हो रहा है। हमारे यहाँ आज अँगरेजी की पढ़ाई प्राथमिक विद्यालयों में भी अनिवार्य कर दी गई है। परिणामत:, हमें अपनी प्राथमिक कक्षाओं के लिए अँगरेजी की पुस्तिकाएँ भी विदेशों से आयात करने के लिए सम्भवत: करोड़ों रुपया खर्च करना पड़ रहा है। 


(आज आयात तो नहीं करना पड़ता लेकिन जो लोग अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में अपने बच्चों की किताबें खरीदते हैं, उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि धन का कितना बड़ा अपव्यय देश में हर साल होता है। – प्रस्तुतकर्ता)


आखिर, यह सब क्यों हो रहा है? वह कौन-सी बात है, जिसके लिए प्राथमिक कक्षाओं में अँगरेजी  पढ़ानी आवश्यक समझी जा रही है और उसकी पढ़ाई पर धनराशि व्यय की जा रही है? आखिर, प्राथमिक कक्षाओं में इस अँगरेजी-पढ़ाई से हमारे ग्रामीण बालकों को क्या लाभ होता है? इसके अतिरिक्त हमारे देश में अँगरेजी का उच्च स्तर बनाये रखने के लिए एक विशेष संस्था हैदराबाद में कायम की गई है, जिसपर लाखों रुपया खर्च होगा। इस प्रकार, जो धन सर्जनात्मक कार्यों और आर्थिक उत्पादन के लिए काम में लाया जा सकता था, वह आज इस विफल प्रयास में खर्च किया जा रहा है कि इस देश को अँगरेजी-भाषाभाषी बना दिया जाय और यहाँ की भाषाओं का अस्तित्व नष्ट हो जाय। कैसे मजे की बात है कि अँगरेजी की पढ़ाई प्राथमिक कक्षाओं से तो अनिवार्य की जा रही है, किन्तु जिस हिन्दी को हमारी प्रभुता-सम्पन्न संविधान-सभा ने संघ की भाषा विहित किया था, उसकी पढ़ाई कई प्रदेशों में अनिवार्य नहीं की गई है और यह पूरा प्रयास किया जा रहा है कि वह उन प्रदेशों में प्रवेश न कर पाये। मैं समझता हूँ कि कुछ लोगों के मन में यह परिकल्पना वर्त्तमान है कि अँगरेजी को प्राथमिक करके इस देश के वासियों को वैसा ही अँगरेजी का ज्ञान करा दिया जाय, जैसा कि अफ्रिका के नीग्रो लोगों को कराया गया और इस प्रकार उन्हें टूटी-फूटी अँगरेजी में अपनी बात व्यक्त करने के योग्य बनाकर यह कह दिया जाय कि इस देश के अधिकतर वासी अँगरेजी-भाषाभाषी हैं और इसलिए अँगरेजी का ही यहाँ अक्षुण्ण साम्राज्य बना रहे। यद्यपि उनकी परिकल्पना कभी सफल नहीं हो सकती, फिर भी वे लोग मोहवश इस प्रकार का प्रयास कर रहे हैं और किसी-न-किसी बहाने से देश के धन, समय और शक्ति का अपव्यय इस लक्ष्य-पूर्त्ति के लिए कर रहे हैं। किन्तु, स्पष्ट है कि इस प्रकार हमारे देश की महान् हानि हो रही है। अँगरेजी के कारण हमारा नैतिक पतन भी कुछ कम नहीं हुआ है। हमारे देश में भ्रष्टाचार और युवकों में अनुशासनहीनता और उद्दण्डता भी बहुत-कुछ इसी कारण फैली है कि अँगरेजी देशों से आनेवाली कौमिक पढ़-पढ़कर हमारे विद्यार्थी कुछ ऐसी बातों की ओर आकृष्ट होते हैं, जो कि हमारी मर्यादाओं, हमारी परम्पराओं, हमारे आदर्शों के सर्वथा प्रतिकूल हैं। और, इस प्रकार अनुशासन का आधार, अर्थात् आदर्शों में आस्था और परम्पराओं के प्रति आदर नष्टप्राय होता जा रहा है। साथ ही, अँगरेजी के मोह के कारण हमारे देश में आज यह भावना घर करती जा रही है कि हमारी भाषाएँ पंगु हैं और इस प्रकार हमारे देश में ऐसे वर्ग की सृष्टि हो रही है, को अपनी जाति, अपनी भाषा और अपने देश का भद्दा परिहास करने से नहीं चुकता। आजकल इस वर्ग के लोग यत्र-तत्र भारतीय भाषाओं और विशेषत: हिन्दी का मजाक उड़ाते दिखते हैं। अँगरेजी का एक शब्द लेकर वह उसके लिए कोई मनमाना हिन्दी का लम्बा-चौड़ा पर्याय देकर और उस पर्याय के प्रति परिहास कर यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हिन्दी-जैसी उपहासास्पद भाषा कोई हो ही नहीं सकती। 



(और यह भी एक बड़ा सच है कि उपहास करनेवालों को हिन्दी या अपनी भाषा का कोई ज्ञान नहीं होता। लेकिन वे अपने किसी भाषावैज्ञानिक या महान भाषाविद से कम नहीं समझते। एक शब्द सुना और कह डालते हैं कि हिन्दी ऐसी है और वैसी है। – प्रस्तुतकर्ता) 



उनलोगों के मन में सम्भवत: यह विचार उठता ही नहीं कि अपनी भाषा का परिहास अपनी जननी का परिहास है। भाषा हमारी माता के समान होती है, वह हमारे सांस्कृतिक शरीर की रचना करती है, उसका पोषण करती है, उसको अनुप्राणित करती है। अत:, अपनी भाषा पर कींचड़ उछालना अपनी माँ पर कींचड़ उछालना है। मैं संसार-भर में घूमा हूँ, पर मुझे एक भी ऐसा देश और जाति नहीं दिखाई दी, जिसके लोग अपनी भाषा का स्वयं अनादर तो क्या, किसी अन्य से भी अनादर सहन कर सकें। किन्तु, इस अँगरेजी-मोह के कारण हमारे देश में ऐसे लोग हैं, जो इस बात में कभी नहीं हिचकिचाते कि वे अपनी भाषा का अनादर करें और उसकी खिल्ली उड़ायें। जब भी वे बोलते हैं, तभी अपनी भाषा का परिहास करते हैं और उसके लेखकों और उपासकों की खिल्ली उड़ाते हैं। उन्हें सम्भवत: यह खयाल नहीं आता कि ऐसा करके वे अपने मुख पर ही कलक-कालिमा पोत रहे हैं और यदि आता भी है, तो सम्भवत: अपने अँगरेजी-प्रेम के कारण वे अपना काला मुँह करने के लिए भी तैयार हैं। इतना ही नहीं, इस अँगरेजी के कारण हमारा देश एक प्रकार से इंग्लैण्ड का अनुवाद बनाया जा रहा है। वैसा ही अनुवाद, जैसा कि शेक्सपियर ने अपने एक नाटक में अपने एक पात्र का करके दिखाया है। मैं समझता हूँ कि आपलोगों ने मिड समर नाइट्स ड्रीम नाटक पढ़ा होगा। इसमें एक पात्र बॉटम नामी है, जिसके जिसके सिर पर एक मसखरे वनदेव ने गधे का सिर रख दिया था, उसे देखकर उसका मित्र सहसा कह उठता है-‘Bottom Thou art Translated.’

हमारी भाषाओं पर अक्षमता का आरोप
      हमारे वे अँगरेजी के उपासक यह मान बैठे हैं कि हमारे देश में जो कुछ अच्छाई आनी है, वह सब अँगरेजी-साहित्य के अनुवाद से आती है और इसीलिए वे, समय-समय पर इस देश की भाषाओं के उपासकों को चुनौती देते रहते हैं कि इस अँगरेजी शब्द का क्या देशी पर्याय है या उस अँगरेजी शब्द का क्या देशी पर्याय है, मानों हमें अँगरेजी के पर्यायों के अतिरिक्त और कुछ काम रह ही नहीं गया है। वे बार-बार कहते हैं कि देशी भाषाओं में यह क्षमता नहीं कि वे अँगरेजी शब्दों की विभिन्न ध्वनियों को व्यक्त कर सकें और इसलिए उनमें यह क्षमता भी नहीं है कि वे अँगरेजी भाषा में उपलब्ध अमूल्य वैज्ञानिक, दार्शनिक और अन्य प्रकार की निधियों को यथावत् व्यक्त कर सकें। इस बात ला ढिंढोरा सारे जगत् में पीटते हैं कि भारतीय भाषाएँ पंगु हैं, अक्षम हैं और इसलिए भारत में अँगरेजी रखी जा रही है, रखी जायगी, पढ़ाई जा रही है और पढ़ाई जायगी। कैसा पतन है यह हमारा कि हम यह मान बैठे हैं कि हममें अपनी कोई नैसर्गिक सर्जन-शक्ति नहीं है, हम कोई मौलिक सृष्टि नहीं कर सकते, ऐसा नहीं है, हम ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में स्वयं कुछ नहीं दे सकते। यह बात कि किसी विशेष अँगरेजी शब्द की सब ध्वनियों को हम किसी एक भारतीय शब्द से व्यक्त नहीं कर सकते, ऐसा नहीं है, जिससे भारतीय भाषाओं की अक्षमता लेशमात्र भी सिद्ध होती हो। हर शब्द के पीछे उस जाति का इतिहास होता है, उस भूमि का वातावरण होता है, भौगोलिक परिस्थितियाँ होती हैं, जिस जाति और जिस देश में उस शब्द का प्रयोग होता रहा है। प्रत्येक अँगरेजी शब्द के पीछे इंग्लैण्ड की भौगोलिक परिस्थितियाँ। इंग्लिश जाति का इतिहास और वहाँ के सामाजिक सम्बन्ध और संस्थाएँ हैं, अत: भारतीय भाषाओं का तो प्रश्न ही क्या, संसार की किन्हीं अन्य भाषाओं में भी ऐसा कोई शब्द नहीं मिल सकता, जो उनकी सब ध्वनियों को यथावत् व्यक्त कर सके। इसी प्रकार, भारतीय भाषाओं के शब्दों के लिए भी अँगरेजी में कभी ऐसे पर्याय नहीं मिल सकते, जो उनके शुद्ध स्वरूप और विभिन्न ध्वनियों को यथावत् व्यक्त कर सकें। मैं पूछता हूँ कि क्या कोई अँगरेजी का महारथी मुझे जलेबी, बालुसाई, गुलाबजामुन, दहीबड़े, चाट जैसे हमारे साधारण शब्दों का ठीक-ठीक अँगरेजी-पर्याय बता सकता है? तब क्या यह कहा जा सकता है कि अँगरेजी भाषा पंगु है, अक्षम है और उसमें विचारों की अभिव्यक्ति की शक्ति नहीं है? बात यह है कि जब भी एक भाषा में निहित विचारों और भावनाओं को दूसरी भाषाओं में अनूदित करने का अवसर आता है, तब यह सम्भव नहीं होता कि अनुवाद पूर्णत: मूल को ध्वनित कर सके। थोड़ा-बहुत अन्तर रह ही जाता है, पर उस कारण किसी भाषा की अक्षमता की दुहाई नहीं पीटी जाने लगती। पर, जो लोग माता के समान आदरणीय अपनी भाषा का उपहास और तिरस्कार करने पर तुले हुए हैं, वे भला यह कहने में क्यों संकोच करेंगे कि हमारी भाषाएँ आधुनिक जगत् के योग्य नहीं हैं। मैं इस सम्बन्ध में एक बात और कहना चाहता हूँ। आजकल हिन्दी का तिरस्कार करने के लिए बराबर यह कहा जाता है कि जो हिन्दी काम में लाई जा रही है, वह इतनी क्लिष्ट, इतनी दुरूह है और की जा रही है कि कोई उसे नहीं समझ सकता। मेरी यह मान्यता है कि यह बात उन लोगों द्वारा अधिकतर दुहराई जा रही है, जो हिन्दी के कभी समर्थक नहीं थे, जिन्होंने हिन्दी जीवन में कभी पढ़ी नहीं, जो हिन्दी से आज भी लगभग अपरिचित हैं और जो यह समझते हैं कि यही भाषा सरल है, जो उनकी अपनी समझ में आ जाय, अर्थात् जो स्वयं अपने को ही इस बात का मापदण्ड माने बैठे हैं कि कौन-सी भाषा दुरूह और कौन-सी सरल है। कम-से-कम जो लोग वैज्ञानिक दृष्टि से सब प्रश्नों पर विचार करने की दुहाई देते हैं, उन्हें यह तो सोचना चाहिए कि स्वयं अपने को ही और अपने सीमित ज्ञान को ही किसी प्रश्न के निर्णय के लिए मापदण्ड न मान लेना चाहिए। विज्ञान का यह पहला सिद्धान्त है कि निजी व्यक्तित्व को ओझल करके प्रश्न पर विचार किया जाय। किन्तु, हिन्दी का यह दुर्भाग्य है कि उसके विषय में विचार करते समय कुछ ऐसे महान् व्यक्ति भी, जो सब दृष्टि से परमपूज्य और आदरणीय हैं, इस विचार की वैज्ञानिक प्रणाली को भूल जाते हैं। आज जो हिन्दी लिखी जा रही है, वह कहाँ तक बोधगम्य और जनप्रिय है, इस बात का निर्णय तो इसी से हो जाता है कि हिन्दी के समाचार-पत्र, हिन्दी पुस्तकें जनता में कितनी बिकती हैं, कितनी पढ़ी जाती हैं। स्मरण रहे कि ये हिन्दी की पुस्तकें या ये हिन्दी के समाचार-पत्र ऐसी परिस्थितियों में जनता द्वारा गृहीत किये जा रहे हैं, जो हिन्दी और अन्य देशी भाषाओं के सर्वथा प्रतिकूल कर दी गई हैं। आज हिन्दी और देशी भाषाओं को वैसी कोई सुविधा प्राप्त नहीं है, जैसी अँगरेजी के लिए उदारता से उपलब्ध की जा रही है। यह सभी को ज्ञात है और इस सम्बन्ध में लोकसभा, राज्यसभा आदि में भी काफ़ी प्रश्नोत्तर तथा भाषण हो चुके हैं कि हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के पत्रों को सरकारी विज्ञापन उस प्रकार नहीं मिलते, जिस प्रकार अँगरेजी-पत्रों को मिलते हैं, चाहे इन भारतीय भाषाओं के पत्रों की ग्राहक-संख्या अँगरेजी-पत्रों से अधिक ही क्यों न हो। विज्ञापन देने के सम्बन्ध में सरकार की इस नीति में तुरन्त परिवर्तन होना आवश्यक है। विना इसके भारतीय भाषाओं के पत्रों का स्तर ऊँचा नहीं उठ सकता और न उनका आर्थिक ढाँचा सुधर सकता और न उनका सम्मान ही बढ़ सकता। क्या संघ और क्या राज्य सर्वत्र ही अँगरेजी पढ़े-लिखे को ही शासन में पद मिलता है, जिसकी अँगरेजी अच्छी नहीं, वह सेवा-आयोगों द्वारा ली जानेवाली परीक्षाओं में कदापि सफल नहीं हो सकता। इसका परिणाम यह हो रहा है कि जिन प्रदेशों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाएँ कर दी गई हैं, वहाँ के विद्यार्थी इन परीक्षाओं में अपने को पिछड़ा हुआ पाते हैं। इस प्रकार, उन प्रदेशों को दण्ड दिया जा रहा है, जिन्होंने भारतीय भाषाओं का आँचल पकड़ा है। फिर, इसमें क्या आश्चर्य की बात है कि अनेक माता-पिता जो अपनी संतान का भविष्य उज्जवल करना चाहते हैं, इस बात की माँग करें कि अँगरेजी पुन: शिक्षा का माध्यम बनाई जाय और अँगरेजी का स्तर ऊँचा किया जाय। साथ ही, इसमें क्या आश्चर्य की बात है कि हमारे देश का अभिजात-वर्ग इस बात का प्रयास करे कि उसके पुत्र-पुत्रियाँ अँगरेजी या पब्लिक स्कूलों में प्रवेश पा जायँ। कुछ दिन हुए, एक आँग्ल भारतीय नेता ने दम्भ के साथ कहा था कि मन्त्री लोग भी आँग्ल भारतीय विद्यालयों में अपने बालकों को प्रविष्ट करने के लिए लालायित रहते हैं। पर, जब हिन्दी और अन्य देशी भाषाओं के गले में फाँसी डाल दी गयी है और उनका आसरा लेनेवालों के लिए कोई भविष्य नहीं छोड़ा गया है, तब इसमें आश्चर्य कि अपने बालकों को उच्च आसन पर बिठाने के इच्छुक माता-पिता इन आँग्ल भारतीय विद्यालयों में उनको प्रवेश कराना चाहें। इसपर भी देशी भाषाओं की पुस्तकें लाखों की संख्या में बिकती हैं और पढ़ी जाती हैं और पाठकों को यह कभी नहीं लगता कि उनकी भाषा उनकी समझ में नहीं आती।
अँगरेजी-भक्तों की वैज्ञानिक शब्दावली का फॉर्मूला
     मजे की बात यह है कि लोग इस बात की बहुत दुहाई देते हैं कि हिन्दी अत्यन्त सरल बनाई जाय, उन्हीं लोगों ने यह फैसला भी कर दिया है कि जहाँतक वैज्ञानिक शब्दावली का प्रश्न है, वह पूरी-की-पूरी अँगरेजी भाषा से ज्यों-की-त्यों ले ली जाय। क्या यह बात उन्हें नहीं दिखती कि वह शब्दावली हमारे देशवासियों के लिए, अत्यन्त दुरूह और क्लिष्ट होगी और यहाँ के 99.9 प्रतिशत लोग उसे समझने में पूर्णत: असमर्थ होंगे। मैं इस सम्बन्ध में आपके समक्ष कुछ उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ। नीम जैसे सरल सुबोध और जनप्रिय शब्द के लिए अब हमारी वैज्ञानिक शब्दावली में Azadirachta Indica लिखा जायगा। मैं नहीं जानता कि आपमें से कितने लोग और आपमें से ही क्यों, इस देश में से कितने लोग इस शब्द को समझ पायेंगे। मैं तो यह भी कहता हूँ कि अँगरेजी के हिमायतियों में से भी 99 प्रतिशत इसको बोल न सकेंगे, समझने का तो प्रश्न ही क्या। ऐसा ही दूसरा शब्द हल्दी है, जिसके लिए हमारी वैज्ञानिक शब्दावली में लिखा जायगा Curuma Longa, धनिये के लिए लिखा जायगा Coriandrum Satibum, हींग के लिए लिखा जायगा Ferula Asa Foetida; इसी प्रकार सोने को Aurum कहा जायगा, लोहे को Ferrum और सीसे को Plumbum कहा जायगा। 


(एक और उदाहरण और देख लेते हैं। अंग्रेजी में एक रोग का नाम है (कई जगह इस शब्द को अंग्रेजी का सबसे बड़ा शब्द कहा गया है) pneumonoultramicroscopicsilicovolcanoconiosis, अब इसे जरा पढ़कर देख लें। अंग्रेजी-मोहियों से आग्रह है कि इसे एक बार पढ़ कर सुना दें। अब यह नहीं कि हिन्दी के बड़े-बड़े शब्द खोजकर लाएँ और कहें कि यह भी तो भारी है। वैसे हिन्दी में ऐसे एक शब्द, लौहपथगामी-सूचक-दर्शक-हरित-ताम्र-लौह-पट्टिका का जिक्र भी आया है। वैसे तो इस शब्द पर संदेह है लेकिन आप तुलना कर लें कि किसे बोलना आपके लिए आसान है। – प्रस्तुतकर्ता)


मैंने कुछ अन्य शब्दों की एक सूची तैयार की है, जिसको यहाँ पढ़कर सुनाना आवश्यक नहीं है, इस सूची में तो कुछ ही शब्द दिये हुए हैं, किन्तु ऐसे ही लाखों शब्द, जिन्हें कोई नहीं समझ सकता, हिन्दी पर लादने का निश्चय किया जा चुका है। मैं यह पूछता हूँ कि सरलता का सिद्धान्त इस क्षेत्र में क्यों लुप्त हो गया। यदि यह कहा जाय कि वैज्ञानिक क्षेत्र में यह आवश्यक है कि शब्द बड़े निश्चित और सधे हुए हों और इसलिए कठिन शब्दों से नहीं बचा जा सकता हो, तो फिर यह कहना कि अन्य क्षेत्रों में सूक्ष्म विचार व्यक्त करने के लिए या भावों की चामत्कारिक अभिव्यक्तियों के लिए कठिन शब्द आवश्यक न होंगे, ठीक नहीं है। शब्दों का चयन विषय के अनुसार होता है और एक विषयवालों को दूसरे विषय के शब्द दुरूह लगा करते हैं। इसका एक बड़ा उत्तम उदाहरण अभी हाल में मिला है। संयुक्तराष्ट्र में वक्ताओं के भाषणों का तात्कालिक अनुवाद करने के लिए अत्यन्त योग्य अनुवादक और कई भाषाओं के ज्ञाता नियुक्त हैं। कुछ दिन हुए, वैज्ञानिकों के एक सम्मेलन में इन अनुवादकों को वैज्ञानिकों के भाषणों का अनुवाद करने का काम सौंपा गया, किन्तु इनमें से एक भी उसे न कर पाया; क्योंकि जिन  विषयों की चर्चा इस वैज्ञानिक सम्मेलन में थी, उन विषयों से ये अनुवादक परिचित न थे। अत:, यदि हिन्दी की अन्य भारतीय भाषाओं की विभिन्न विषयक शब्दावली हमारे कुछ राजनीतिज्ञों की समझ में न आये तो उन्हें यह न समझना चाहिए कि जान-बूझकर कोई इन भाषाओं को दुरूह बना रहा है और कम-से-कम उन लोगों को तो इस सम्बन्ध में कुछ कहने का अधिकार हो ही नहीं सकता, जिन्होंने भारतीय भाषाओं में से किसी को पढ़ने का कष्ट नहीं उठाया है। अत: मेरा विनम्र निवेदन है कि अँगरेजी के भक्त हमारी भाषाओं का निरादर और अपमान करने से अब अलग रहें। यह हमारे देश का अपमान है, हमारी सांस्कृतिक जननी का अपमान है।
(जारी…)

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास(भाग-2):- अवश्य पढ़ें

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(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधान‘ से लिया गया है। इसे देखिएलोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)

अँगरेजी और भारतीय भाषाओं की शब्द-सृजन-शक्ति:
इंग्लैण्ड में विज्ञान का प्रवेश लातनी और यूनानी भाषा के द्वारा हुआ। यदि मैं भूलता नहीं तो इंग्लैण्ड में रोजर बेकन (कुछ स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, रोजर बेकन को दुनिया के सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों में माना जाता है। – प्रस्तुतकर्ता) ने अपना कार्य अधिकतर इन्हीं भाषाओं के ज्ञान के सहारे किया और उसके पश्चात् भी अनेक वर्षों तक इंग्लैण्ड के विद्वान् इन भाषाओं का सहारा अपनी विधि, अपनी शिक्षा, अपने विज्ञान के लिए लेते रहे। सच तो यह है कि आज भी अँगरेजी में यह शक्ति नहीं कि वह नये-नये वैज्ञानिक तथ्यों के लिए अपने निज के शब्द दे सके। आज भी इंग्लैण्ड के वैज्ञानिक इन तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए लातनी या यूनानी भाषा का सहारा लेते हैं। (ध्यान देने की बात है जब आप विज्ञान, तकनीक सहित उच्चतर की भी विषय का अध्ययन अंग्रेजी में करते हैं, तो वहाँ सारे पारिभाषिक शब्दों में या सारे महत्वपूर्ण शब्दों में अधिकांश लैटिन या लातनी और यूनानी या ग्रीक को ही पायेंगे। सबूत के लिए आप चाहे जिस विज्ञान को देख लें। खासकर मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, रसायन विज्ञान के तो लगभग सारे शब्द ही गैर-अंग्रेजी के हैं। यहाँ आपको बता दें कि किसी वनस्पति या जन्तु का वैज्ञानिक का नाम आप अंग्रेजी में रख ही नहीं सकते। सबूत के लिए अन्तरराष्ट्रीय पादप-नामकरण नियम (International Rules of Botanical Nomenclature) तथा अन्तरराष्ट्रीय प्राणि-नामकरण नियम (International Rules of Zoological Nomenclature) मौजूद हैं। इसमें एक है अनुच्छेद 3 जो स्पष्ट कहता है कि वैज्ञानिक नाम सदैव लैटिन में अथवा लैटिनी शब्दों से बनने चाहिए।यह नियम 1985-86 में तो था, अभी का नहीं कह सकता। इन नामों की वैज्ञानिकता की जानकारी के लिए जरा यहाँ एक नजर डाल लें।) मुझे पूर्ण विश्वास है कि जो लोग दुहाई देते हैं कि अँगरेजी के बिना भारत अन्धकार के गर्भ में चला जायगा, उनमें से अनेक वनस्पतिशास्त्र के ऐसे एक भी शब्द को न समझ सकेंगे, जो उस विज्ञान के क्षेत्र में अँगरेजी भाषा में प्रयोग किये जाते हैं। वे सभी शब्द अँगरेजी में यूनानी या लातनी भाषा से लिये गये हैं और मैं तो यह समझता हूँ कि सम्भवत: उन्हें निन्यानबे प्रतिशत अँगरेजी भी न समझ में आती हो। मैं नहीं जानता कि इस ओर अँगरेजी के हिमायतियों की दृष्टि गई है या नहीं कि अँगरेजी भाषा में शब्द-निर्माण की शक्ति लगभग नहीं के बराबर है और उस दृष्टि से सभ्य भाषाओं में उतनी दरिद्र भाषा सम्भवत: संसार में कोई न होगी! हिन्दी के सम्बन्ध में बहुधा इन लोगों द्वारा यह कहा जाता है कि वह दरिद्र भाषा है। हिन्दी ही क्यों, ये लोग सब भारतीय भाषाओं को दरिद्र भाषा मानते हैं, किन्तु मेरा यह निजी अनुभव है कि हिन्दी में नये शब्द-निर्माण करने की नैसर्गिक शक्ति है। उदाहरणार्थ, संस्कृत का एक शब्द चूर्ण कई वस्तुओं को व्यक्त करने के लिए काम में लाया जाता था, किन्तु हिन्दी ने उसी आधार पर कई शब्द बना लिये। चून, चूना, चूर्ण- ये तीन शब्द पृथक्-पृथक् वस्तुओं को व्यक्त करते हैं और इनका निर्माण हिन्दी ने अपनी शक्ति के आधार पर किया है। ऐसे एक नहीं, अनेक उदाहरण आपको हिन्दी भाषा में मिलेंगे। (जैसे पत्र से पत्ता, पत्ती, पत्र भी बनाए गए हैं और ऐसे उदाहरण एक नहीं हजारों-लाखों की संख्या की मौजूद हैं। – प्रस्तुतकर्ता) इसलिए, यह कहना कि हिन्दी दरिद्र भाषा है, पूर्णत: निराधार है। हाँ, जिन लोगों को हिन्दी के , का ज्ञान नहीं, जिन्होंने अपने जीवन का एक क्षण हिन्दी-साहित्य के अध्ययन में नहीं लगाया और जिनके मन में हिन्दी के प्रति अकारण ही विद्वेष और उपेक्षा का भाव है और रहा है, यदि वे कहने लगें कि हिन्दी दरिद्र भाषा है, तो आश्चर्य कि बात ही क्या? किन्तु, यदि शुद्ध भाषा-विज्ञान की दृष्टि से अँगरेजी और हिन्दी का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय, तो पता चलेगा कि केवल भाषा की दृष्टि से कौन-सी भाषा बलशाली है और कौन-सी असहाय और दुर्बल। जो भी हो, इस सम्बन्ध में क्या एक क्षण के लिए भी शंका हो सकती है कि अँगरेजी विज्ञान के लिए एकमात्र देववाणी नहीं है। भगवान् ने यही विधान कर दिया होता कि अँगरेजी ही विज्ञान की भाषा होगी, तो फिर क्या रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन या अन्य देश विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी ही प्रगति कर पाते? यह केवल उपहासास्पद बात है कि अँगरेजी का प्रगति से कोई विशेष सम्बन्ध है। प्रगति तो केवल इसपर आश्रित है कि मनुष्य की यह भावना और विश्वास हो कि जो भूतकाल से मिला है, उसपर ही पूर्णत: आश्रित न रहकर, उसी से सर्वथा बँधे न रहकर, जीवन को अधिक समृद्ध और आनन्दमय बनाने के लिए नये-नये प्रयोग किए जायँ, नई-नई दिशाएँ खोजी जायँ। ( अब तक के दुनिया के मुख्य 1000 से अधिक वैज्ञानिक गैर-अंग्रेजी वाले रहे हैं। बिना अंग्रेजी के ये सब जब आगे बढ़ सकते हैं, आविष्कार कर सकते हैं, तब यह बात अपने आप साबित हो जाती है कि अंग्रेजी ही विज्ञान के ज्ञान और प्रगति का आधार नहीं है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रूस में अब तक 300 से अधिक बड़े वैज्ञानिक / गणितज्ञ हुए हैं जबकि अमेरिका में यह संख्या 500 से कम ही है और यह भी ध्यान रहे कि रूस की जनसंख्या अमेरिका के आधे से भी कम है। और रूस की भाषा अंग्रेजी नहीं है। – प्रस्तुतकर्ता) वह धारण क्या हम इस देश के वासियों में अपनी भाषा द्वारा नहीं फैला सकते? क्या यह विचार उनके मन में नहीं बैठा सकते? क्या इस सम्बन्ध में एक क्षण के लिए भी किसी प्रकार की शंका होनी चाहिए? अत:, मेरा निवेदन है कि अँगरेजी  के पक्ष में इस प्रकार तर्क देना बड़ा असंगत और अत्यन्त उपहासास्पद है।
भारत की एकता के लिए क्या अँगरेजी  आवश्यक है?
ऐसी ही एक दलील यह है कि भारत की एकता का आधार और स्रोत अँगरेजी है। यह कहा जाता है कि भारत के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं और वहाँ के वासियों के लिए परस्पर विचार-विनिमय करना केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही सम्भव है; अँगरेजी जाननेवाले इन भाषाभाषी प्रदेशों के प्रत्येक नगर और नगरी में मिलते हैं, इस कारण अँगरेजी भाषा के प्रयोग करनेवाले के लिए भारत में किसी स्थान में कठिनाई नहीं होती; यह भारत की किसी अन्य भाषा के सम्बन्ध में लागू नहीं है, इसलिए आज जो सुविधा अँगरेजी के द्वारा हमें प्राप्त है और जिस सुविधा के कारण एक दृष्टि से भारत की एकता बनी हुई है, उसे छोड़ देने में कोई विशेष तुक नजर नहीं आती। (आज के सन्दर्भ में यहाँ बता दें कि भारत में सवा छह लाख से अधिक गाँव हैं और लगभग आठ हजार शहर और इन गाँवों में 99 प्रतिशत या इससे भी अधिक लोग अंग्रेजी नहीं बोल सकते। यह आँकड़ा इससे स्पष्ट हो सकता है, अगर मान लें कि एक गाँव में औसत 1300 लोग हैं, तो क्या हर गाँव में 13 लोग ऐसे हैं, जो सारा काम अंग्रेजी में कर सकते हैं? और लगभग 35 करोड़ लोग जो शहरों में रहते हैं, क्या उनमें से पंद्रह करोड़ लोग भी ऐसे हैं जो अंग्रेजी में सब कुछ कर सकने में समर्थ हैं? और वह भी तब जब इस व्याख्यान के पचास साल बीत चुके हैं और अंग्रेजी का राज बरकरार है! यानि पिछले 160-70 सालों में अंग्रेजी के घोर प्रचलन के बावजूद भारत में 20 करोड़ लोग भी अंग्रेजी नहीं समझ पाए। – प्रस्तुतकर्ता) इसके अतिरिक्त इनका यह दावा भी है अँगरेजी-साहित्य के अध्ययन के कारण ही भारत में राष्ट्रीय भावना जागरित हुई और भारत में लोग यह सोचने लगे कि हम किसी जाति-विशेष या प्रदेश-विशेष के न होकर सब भारत-माता की सन्तान हैं, अत: अँगरेजी हमारी राष्ट्रीयता की जननी है, पोषिका है। इसलिए, यदि अँगरेजी हमारे देश से हट गई, तो परस्पर विचार-विनिमय के अभाव के कारण और राष्ट्रीय एकसूत्रता के अभाव के कारण हमारा राष्ट्र छोटी-छोटी इकाइयों में बँट जायगा। (अगर अंग्रेजी ही राष्ट्रीयता की जननी है तो 1757 में पलासी का युद्ध लड़ने वाले सिराजुद्दौला बंगाल से, 1857 में लड़ने वाले वीरकुँवर सिंह बिहार यानि उत्तर भारत से, लक्ष्मीबाई मध्य भारत से, नाना साहब पेशवा, दक्षिण से टीपू सुल्तान जैसे लोगों ने कब अंग्रेजी की शिक्षा ली और अंग्रेजी के जानकार कब बन गये? कहा जा सकता है कि ये सब राजघराने के थे। लेकिन 1857 के संघर्ष में अंग्रेजी भाषा और उसके द्वारा बनाई गई एकता का पर्दाफ़ाश हो जाता है। – प्रस्तुतकर्ता) कुछ अँगरेजी के पक्षपाती यह तर्क भी उपस्थित करते हैं कि अँगरेजी ही ऐसी भाषा है, जिसके मनन और अध्ययन में हमारे देश के विभिन्न प्रदेशवालों को एक समान प्रयास करना पड़ता है, एक-सी ही कठिनाइयों से संघर्ष करना पड़ता है; किन्तु यदि भारत की कोई एक भाषा भारत की राजभाषा बन गई, तो अन्य प्रदेशवालों को अन्य भाषाभाषियों की अपेक्षा राजकीय जीवन में अधिक सुविधाएँ प्राप्त हो जायँगी और इस प्रकार अन्य प्रदेशवासियों के प्रति यह घोर अन्याय होगा। कहते हैं कि जादू वह, जो सिर पर चढ़कर बोले। अँगरेजों का जादू इस सम्बन्ध में पूरा उतरता है। वे चले गये, किन्तु, जो मन्त्र वे फूँक गये थे, जो पट्टी वे पढ़ा गये थे, वह वह आज अपना पूरा प्रभाव दिखा रही है। इस बात को आपलोग भूले न होंगे कि अँगरेज भारत में अपने राज्य के पक्ष में मुख्यत: यही तर्क देते थे कि भारत की एकता उसी राज्य की नींव पर आधृत है। (यानि एकता के लिए ब्रिटिश शासन की जरूरत है, तो आज भी बुला लें अंग्रेजों को फिर से? -प्रस्तुतकर्ता) उनके आने के पहले भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा था और उसकी जनता राष्ट्रीयता से सर्वथा अपरिचित थी। (यह सही है कि छोटे-छोटे राज्यों में देश बँटा था लेकिन भारत का नाम कहाँ से आया? दुष्यन्त की कहानी गलत हो सकती है लेकिन उसके पुत्र भरत के नाम पर भारत देश कैसे हुआ? महाभारत की कथा काल्पनिक हो सकती है लेकिन अंग्रेजों से हजारों साल पहले महाभारत में अर्जुन के लिए भारत संबोधन कैसे आया? प्रस्तुतकर्ता) भारत में उनकी यह गर्वोक्ति थी कि जबतक भारत में हमारा राज्य है, तभी तक भारत में एकता है, यदि हम यहाँ से एक क्षण के लिए भी अपना प्रभुत्व हटा लेंगे, तो भारत के पुन: टुकड़ेटुकड़े हो जायेंगे और यहाँ परस्पर ऐसी मार काट मच जायगी, ऐसा अनाचार और अत्याचार फैल जायगा कि किसी भी भारतीय कुमारी का सतीत्व बचा न रहेगा। (और अंग्रेजों ने किसी का सतीत्व-हरण नहीं किया था! यहाँ बस एक सवाल उठाना है कि अंग्रेज भारत की एकता पर इतना ध्यान क्यों रखे हुए थे। इतना प्रेम उन्हें भारत से था तब हिन्दी-उर्दू को दो अलग भाषा मानकर पढ़वाना क्यों शुरु किया गया। जबकि हिन्दी-उर्दू भाषाएँ अंग्रेजों के आने के पहले अलग दो भाषाएँ नहीं थीं। और अंग्रेजों द्वारा ही क्यों किया गया? देश का विभाजन करने की बात मुगल काल से लेकर 1947 तक कब की गयी? सिर्फ़ अंग्रेजों के आने के बाद ही, ऐसा क्यों? और क्यों अंग्रेजों को भारत की एकता में इतनी रुचि थी? बड़े निर्मल हृदय और महात्मा लोग थे वे? प्रस्तुतकर्ता ) उनका यह भी तर्क था कि इस देश के विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों, विभिन्न भाषाभाषी और प्रादेशिक जातियों के अधिकार की रक्षा वे निष्पक्ष भाव से करते हैं और सबको सम न्याय प्रदान करते हैं, किन्तु यदि वे चले गये, तो भारत का सम्प्रदाय-विशेष या जाति-विशेष या प्रदेश-विशेष, दूसरे सम्प्रदायों, दूसरी जातियों और प्रदेशों पर छा जायगा और उनको पैरों-तले रौंद देगा। आप देखेंगे कि अँगरेजों के इन्हीं तर्कों की पुनरावृत्ति आज हमारे अँगरेजी के हिमायती इस सम्बन्ध में कर रहे हैं। अपने गौरांग गुरुओं की शिक्षा का कितनी कुलता से वे पालन कर रहे हैं। किन्तु, ये सब तर्क थोथे हैं, निराधार हैं। थोड़े-से विचार से यह स्पष्ट हो जायगा कि इस सब स्वार्थ के पीछे उनका वैसा ही स्वार्थ है, जैसा कि अँगरेजी का स्वार्थ उनके अपने राज्य के समर्थन के पीछे था। अँगरेजी के द्वारा इन लोगों के लिए यह सम्भव हो रहा है कि वे भारत की जनता के कन्धे पर बैठकर भारत की जनता से उसी प्रकार परिश्रम कराकर, जैसा कि अँगरेज कराते थे, स्वयं सुख भोगें, गुलछर्रे उड़ायें। सिन्दबाद नाविक की कहानी में जिस प्रकार हम पढ़ते थे कि सिन्दबाद की गरदन पर सवार होकर उसके गले को अपने पाँवों में कसकर और दबाकर उस व्यक्ति ने सिन्दबाद को दौड़ाया, उससे परिश्रम कराया और स्वयं आनन्द भोगा, उसी प्रकार आज ये ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से निकले श्याम वर्णवाले, (दुर्योग से आज भी ऐसे लोग हैं जिन्हें इस सन्दर्भ में देखा जा सकता है। नाम लेने की आवश्यकता नहीं है, जो इन जगहों से निकलकर आए हैं। – प्रस्तुतकर्ता) किन्तु आँग्ल चेतना और आत्मावाले हमारे देश की जनता के कन्धे पर कसकर आसन जमाये बैठे हैं और हर प्रकार से उनका शोषण कर रहे हैं तथा भोली-भाली विभिन्न प्रदेशों की जनता को विमुख करने को इस प्रकार के तर्क दे रहे हैं। नहीं तो, क्या वे यह नहीं जानते कि इस देश में अँगरेजी जाननेवालों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं हैं और इस एक प्रतिशत की एकता भारत की एकता नहीं कही जा सकती। क्या इस बात से इनमें से कोई भी इनकार कर सकता है कि आज भी लाखों की संख्या में सुदूर दक्षिण के ग्रामवासी, जिन्हें अँगरेजी  का एक शब्द भी नहीं आता, उत्तर-भारत के काशी, मथुरा, हरद्वार और बदरीनाथ जैसे महान् तीर्थ-स्थानों में प्रतिवर्ष यात्रा के लिए आते हैं। क्या यह बात सत्य नहीं है कि उत्तर-भारत के अनेक ग्रामवासी सुदूर रामेश्वरम् की यात्रा करने के लिए सहस्रों की संख्या में जाते हैं? क्या इन लोगों का काम अँगरेजी के बिना नहीं चलता? क्या वे अपने सब धार्मिक संस्कार और जीवन के अन्य व्यापार अपनी यात्रा में हिन्दी के माध्यम द्वारा नहीं करते? क्या यह सत्य नही है कि भारत के प्रत्येक धार्मिक तीर्थस्थान में हिन्दी जाननेवाले पण्डे नहीं मिलते या नहीं होते, तब फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि भारत के विभिन्न प्रदेशवासियों के विचार-विनिमय का माध्यम केवल अँगरेजी है? आसाम के चाय-बगानों में, कलकत्ता के बड़े बाजार में, बम्बई की चौपाटी पर और सुदूर दक्षिण में सर्वत्र ही हमें हिन्दीभाषा-भाषी श्रमिक कार्य करते मिलते हैं, हिन्दी भाषा-भाषी व्यापार करते मिलते हैं, हिन्दी भाषा-भाषी पण्डे धार्मिक संस्कार करते मिलते हैं। सचमुच यह महान् आश्चर्य की बात होती, यदि ऐसा न होता। अँगरेजी तो सभी अभी कुल एक सौ वर्ष से ही इस क्षेत्र में आई थी। उससे पहले भी हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों में विचार और वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था। अत: स्वाभाविक ही मध्यदेश की यह भाषा हिन्दी उस विचार-विनिमय का माध्यम बन गई थी और बनी रही और बनी रहेगी।
अतीत और वर्त्तमान के वर्ग-संघर्ष और विग्रह का कारण कौन?
    
     अँगरेजी-वर्ग अधिक-से-अधिक यही कह सकता है कि उसकी अपनी एकता अँगरेजी के आधार पर है, यद्यपि इस सम्बन्ध में भी पूरी-पूरी शंका की जा सकती है। यदि वर्त्तमान भारतीय राजनीतिक कलह का वास्तविक कारण ढूँढा जाय, तो हमें यह पता चलेगा कि इस अँगरेजी से मोह रखनेवाले व्यक्तियों में ही परस्पर सर्वाधिक द्वेष और स्पर्द्धा वर्त्तमान है। क्या यह सत्य नहीं है कि भारत की राजनीति में जो विष-वृक्ष बोया गया, वह उन लोगों ने बोया या उन लोगों के माध्यम द्वारा बोया गया, जो इस बात के लिए लालायित थे कि अँगरेजी साम्राज्य द्वारा इस देश की जनता से दुही जानेवाली सम्पत्ति में उनका भी कुछ साझा हो जाय! अँगरेजी साम्राज्य के तंत्र में छोटी-मोटी नौकरी पाने के लिए कौन लालायित था, वही तो जिसने यह अँगरेजी पढ़ ली थी। नौकरियाँ थोड़ी थीं और अँगरेजी पढ़े-लिखे अधिक। अत:, इन अँगरेजी पढ़े-लिखे लोगों ने परस्पर एक-दूसरे की जड़ काटने के लिए हर प्रकार के साम्प्रदायिक, प्रादेशिक और भाषा-जाति-विभेद पैदा किये और उन्हें तीव्रातितीव्र किया। क्या यह सत्य नहीं है कि पाकिस्तान के आन्दोलन के जन्मदाता इसी अँगरेजी-वर्ग के कुछ लोग थे? उन्होंने भोली-भाली जनता को अपने स्वार्थ के लिए गुमराह किया और देश को टुकड़े-टुकड़े कर डाला। क्या यह सत्य नहीं है कि इसी अँगरेजी-वर्ग के कुछ लोगों ने अँगरेजी कि शह पर इस देश में उत्तर और दक्षिण का प्रश्न उठाया और उत्तरवासियों के विरुद्ध दक्षिण क कुछ प्रदेशों में एक प्रकार का जेहाद प्रारम्भ कर दिया। यदि ऐसा न होता तो आश्चर्य की बात होती। जिन लोगों ने सर्वप्रथम अँगरेजी पढ़नी प्रारम्भ की थी, उन लोगों ने उसका अध्ययन ज्ञानोपार्जन-विज्ञान और दर्शन के ज्ञान के लिए नहीं किया था, वरन् हमारे देश के पूज्य गुरुजनों के आदेश की अवहेलना कर अधिकांशत: इस प्रयोजन से प्रारम्भ किया था कि वे भी अँगरेजी राज्य की लूट में कुछ हिस्सा पाये। हो सकता है कि कुछ ऐसे व्यक्ति रहे हों, जिन्होंने अँगरेजी का अध्ययन अँगरेजी की सफलता का रहस्य जानने के लिए आरम्भ किया हो, किन्तु ऐसे संख्या नगण्य थी। किन्तु, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अधिकांशत: ऐसे लोग स्वार्थरत थे, अपने ही निजी सुख और समृद्धि की भावना से प्रेरित थे। भला वे लोग भारत की एकता की बात सोचें, यह तो महान् आश्चर्य की बात होती! (दक्षिण के नाम भाषाई झगड़े फैलाने वाले लोग, गाँधी जी के जीते जी क्यों न बोले? गाँधी के मरते ही कौन लोग थे, जिन्होंने अंग्रेजी को पंद्रह वर्षों तक रखने के लिए कहा और इनकी बात मानने के बावजूद आज 60 साल से अधिक समय बीत जाने पर भी अंग्रेजी ज्यों-की-त्यों नहीं है, बल्कि बढ़ रही है। अंग्रेजी के पक्षधर और इसके ज्ञाता 1950 में 50 लाख भी न थे। फिर भी क्यों अंग्रेजी को स्वीकार किया गया था और वह पंद्रह वर्षों तक के लिए। ये सभी लोग अंग्रेजी की बजाय दूसरी भाषाओं को पढ़ना और समझना ही नहीं चाहते। और इस चलते तानाशाही ढंग से 50 लाख लोग 35-40 करोड़ लोगों पर अपनी मर्जी थोपते हैं। सवाल यह भी है कि क्यों ऐसा किया गया? लेकिन देश के दुर्भाग्य से ऐसा हुआ है और उसे कौन बदलेगा? – प्रस्तुतकर्ता)
हम इन्हें दुभाषिया कहें या बहुरुपिया?
     यह बात आज भी है कि जो लोग अँगरेजी की हिमायत करते हैं, उनमें से निन्यानबे प्रतिशत भारत की एकता की बात मन में नहीं रखते। वे केवल इस एकता की दुहाई अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिए देते हैं। नहीं तो क्या यह प्रश्न उनके मन में नहीं उठता कि आज अँगरेजी के कारण भारत की निन्यानबे प्रतिशत जनता और राज्य के बीच खाई पैदा हो गई है और बढ़ती जा रही है। क्या उनको यह सोचने का समय नहीं मिलता कि अँगरेजी के कारण आज भारत के निन्यानबे प्रतिशत नागरिक राज-दरबार में प्रवेश नहीं कर पाते। उनकी सन्तान को कहीं कोई राजपद नहीं मिलता। (लेकिन एक ग्रामीण युवक या युवती किसी बड़े पद पर पहुँच जायँ, तो यह पूरे देश के लिए समाचार बन जाता है। इसका क्या अर्थ है? यही न कि गाँव के लोग अगर ऐसा कर दें तो यह असमान्य है? यहाँ एक बात आपको याद दिला दें कि जब कोई अंग्रेज भारत में अधिकारी बनकर आता था, तब हिन्दी की परीक्षा उसके लिए अनिवार्य थी और वह भी सन् 1900 के पहले भी, लेकिन आज हम आजाद देश के भारत में भारतीय प्रशासनिक सेवा में किसे अनिवार्य देखते हैं? अंग्रेजी को। यह तरक्की है भारत के लोगों ने, नेताओं ने, तथाकथित बुद्धिमानों ने। संसार का ऐसा कोई देश मैं तो नहीं जानता जहाँ विदेश सेवा के अतिरिक्त इस तरह की अनिवार्यता हो कि अपने देश में काम करने के लिए हम किसी दूर के देश या दूसरे ग्रह की भाषा जानें। यह एक दुखद सच है।  क्यों अंग्रेजों के लिए हिन्दी की परीक्षा अनिवार्य थी? उन्हें मालूम था कि भारत की मुख्य भाषा कौन है लेकिन इन अंग्रेजी-भक्तों को मालूम नहीं है यह! प्रस्तुतकर्ता) वे मूक, निरीह, असहाय रहते चले आ रहे हैं, उनके हृदय में यह भावना जागरित नहीं हो पाती कि यह राजतन्त्र, यह देश की सम्पत्ति, इस देश की विशाल भूमि, इसके नदी-पहाड़ सब उनके हैं। आज भी वे अकिंचन बने हुए हैं और यही समझते हैं कि उनके सर पर बैठी सरकार ही उनकी भाग्यविधात्री है, वे स्वयं उनके संचालक नहीं। क्या भारत की एकता के लिए यह आवश्यक नहीं कि भारत के जन-जन के हृदय में यह विचारधारा तरंगित होने लगे कि हम सबका भाग्य एक है, हम सबकी सम्पत्ति एक है, हम सबका इतिहास एक है। मैं विनम्रता से पूछ्ता हूँ कि क्या यह बात अँगरेजी भाषा के द्वारा सम्भव है? क्या यह स्पष्ट नहीं कि यदि अँगरेजी के माध्यम द्वारा यह सम्भव होती, तो फिर हमारे ग्रामों में हमारी साधारण जनता से ये लोग अँगरेजी भाषा के माध्यम द्वारा वार्त्तालाप करते, अपने व्याख्यान अँगरेजी में देते। मैं इस बात की चुनौती देता हूँ कि ये लोग अँगरेजी के द्वारा भारत की एकता बनी रहने की बात कहते हैं, वे जरा साहस कर हमारे गाँवों में जाकर हमारी जनता से केवल अँगरेजी में बोलें और अपने इस तर्क को चरितार्थ करें। पर, मैं जानता हूँ कि उनमें से एक में भी यह सामर्थ्य नहीं। इन्हें हम दुभाषिया कहें या बहुरुपिया? कैसा महान आश्चर्य है कि देश की एकता को छिन्न-भिन्न करनेवाले देश की एकता की दुहाई दें। देश की राष्ट्रीयता को तिलांजलि देनेवाले, इस देश की वेष-भूषा, खान-पान, आचार-विचार, रीति-रिवाज, इतिहास और संस्कृति का उपहास और तिरस्कार करनेवाले व्यक्ति और पाश्चात्य योरप, विशेषत: इंग्लैण्ड को अपना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक घर और देश माननेवाले व्यक्ति राष्ट्रीयता का यह बाना दिखाने के लिए पहन लें। इनकी राष्ट्रीयता का अर्थ इस देश को छोटा इंग्लैण्ड बनाना (आज के सन्दर्भ में अमेरिका। क्योंकि यहाँ बार-बार नकल बनने यानि छायाप्रति बनने की कोशिश होती है। आज अमेरिका है तो अमेरिका, कल जर्मनी है तो जर्मनी और इस तरह बस पीछे-पीछे चलने की तैयारी रहती है और इस काम में भी बार-बार मुँह की खानी पड़ती है। – प्रस्तुतकर्ता) है और इसीलिए यह स्वाभाविक है कि अपने उस स्वप्न के निर्माण के लिए ये लोग अँगरेजी भाषा को अनिवार्य समझें। किन्तु यदि विचारपूर्वक हम सोचें, तो स्पष्ट पता चल जायगा कि हमारे देश में राष्ट्रीय भावना का उद्भव किसी भी तरह अँगरेजी के द्वारा नहीं हुआ। राष्ट्रीय भावना की उत्पत्ति किसी भी जाति में उस समय होती है, जब वह आर्थिक विकास की उस स्थिति में पहुँच जाती है, जब केवल ग्राम, केवल नगर अथवा केवल जनपद के क्षेत्र में हो, उसका आर्थिक व्यापार सीमित नहीं रहता और नहीं रह सकता। उस समय इन छोटी इकाइयों की सीमा को लाँघकर अनेक नगरवासी, अनेक ग्रामवासी और अनेक जनपदवासियों के हृदय परस्पर बिंध जाते हैं और उन्हें यह दिखने लगता है कि हमारे हित दूसरे देशवासियों के हित से पृथक् हैं और परस्पर एक हैं। कभी-कभी राष्ट्रीय भावना की जागृति उस समय होती है, जब एक जाति का किसी विदेशी जाति से संघर्ष हो जाता है। (यह वाक्य अवश्य ध्यान रखें। इसका सबूत गली में, घर में, विद्यालय में, जिले में, राज्य में हर जगह हर दिन देखने को मिलता है। आज भी जब कभी किसी समुदाय का संघर्ष किसी दूर के समुदाय से होता है, तब वह समुदाय एकजुट होकर पहले दूर के समुदाय से लड़ता है और उसके हर सदस्य में सामुदायिक भावना का जन्म होता है। यह एक सार्वभौम सत्य जैसा है। – प्रस्तुतकर्ता) हमारे देश में इस प्रकार की आर्थिक स्थिति यान्त्रिक और शक्ति-चालित उद्योग के विकास के कारण पैदा हुई और फैली है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है, जिसकी पुष्टि आपको इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में राष्ट्रीय भावना की जागृति के इतिहास से मिल जायगी। यह संसार-विदित है कि आयरलैण्ड में राष्ट्रीय भावना का उद्रेक उस भाषा के पुनर्निमाण से हुआ, जिसका अँगरेजों ने बीज तक लगभग नष्ट कर दिया था। आयरलैण्ड के राष्ट्रीय नेता गैलिक भाषा के पुनर्निर्माता थे, पुन:प्रतिष्ठाता थे। क्या यह सत्य नहीं है कि हमारे देश में भी काँगरेस का आन्दोलन तब तक निष्प्राण था, जब तक वह केवल अँगरेजी जाननेवाले वर्ग तक सीमित था और उसमें जीवन-ज्योति उसी समय जगी, जब पूज्य बापू ने हिन्दी को और भारतीय भाषाओं को उस आन्दोलन का आधार बनाया और ग्राम-ग्राम में, नगर-नगर में भारतीय भाषाओं के माध्यम द्वारा स्वाधीनता का अलख जगा दिया। भारतीय राष्ट्रीयता का इतिहास जनसाधारण का इतिहास है। आज यदि अँगरेजी जाननेवाला वर्ग इस महान् सृष्टि को हथिया लेना चाहता है, इसका गौरव अपना बना लेना चाहता है, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। जिसकी रग-रग में स्वार्थ बसा है, उससे और क्या आशा की जा सकती है? पर, उनके लिए यह सम्भव नहीं कि वे इस बनी-बनाई राष्ट्रीयता को कायम रख सकें। क्या यह स्पष्ट नहीं है कि अँगरेजी का यदि आधिपत्य बना रहा, यदि उसने अपना शोषण कायम रखा, तो भारतीय जन-जीवन शोषक और शोषितों के परस्पर संघर्ष से खण्ड-खण्ड हो जायगा। कैसे अचम्भे की बात है कि ये लोग भी न्याय की बात करते हैं। पर, ऐसा लगता है कि न्याय की इनकी अपनी विशेष परिभाषा है। सम्भवत:, ये लोग इस बात को न्याय नहीं समझते कि भारत के प्रत्येक नर-नारी के लिए यह सुविधा प्राप्त हो कि वह इस देश के राजतन्त्र में सुगमता से प्रवेश कर सके, राजकाज के संचालन में भाग ले सके, राजपदों पर आसीन हो सके। यदि ये लोग इस बात को न्याय मानते, तो क्या ये यह न सोचते कि यह बात तबतक सम्भव न होगी, जबतक कि भारत का राजतन्त्र अँगरेजी में लिपटा रहेगा। जैसा मैं अभी कह चुका हूँ कि भारत के निन्यानबे प्रतिशत जनता के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह इस राजतन्त्र में किसी प्रकार से भाग ले सके और वह इसलिए सम्भव नहीं है कि वह अँगरेजी नहीं जानती और इस राजतन्त्र के द्वार पर बड़े मोटे अक्षरों में लिखा है कि अँगरेजी न जाननेवालों के लिए यहाँ प्रवेश निषिद्ध है। (न्यायालयों की भाषा का ध्यान रहे और यह भी कि भारत के उच्चतम न्यायालय में निम्नतम व्यवस्था के तहत अंग्रेजी का राज आज तक बना हुआ है। देश के लोग बस एक वोट बन कर रह गए हैं और इससे अधिक उनका महत्व नहीं है। – प्रस्तुतकर्ता) सम्भ्वत:, इन लोगों की न्याय की परिभाषा वही है, जो साधारण दफ्तरी लोगों की होती है। दफ्तरों में काम करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति यह मानता है कि उसकी तरक्की हुई, तो न्याय हुआ और तरक्की न हुई, तो अन्याय अर्थात् वहाँ निजी स्वार्थ का दूसरा नाम न्याय है। जब ये लोग न्याय की बात करते हैं, तब वहाँ भी यही गन्ध आती है, नौकरी में हमारी प्रगति रुक जायगी, हम नौकरी में उतने आगे नहीं बढ़ पायेंगे , जितने अन्य; अर्थात् इनके निजी स्वार्थ का ही नाम न्याय है। पर, ये लोग इस बात को प्रदेश-प्रदेश के बीच न्याय का बाना पहना देते हैं, मानों इनके अपने प्रदेश में ये स्वयं अपनी साधारण जनता के प्रति न्याय कर रहे हों, उसके अधिकारों की रक्षा के लिए लालायित हों। स्वयं अपने स्वार्थ पर डटे रहकर, अपनी ही वैयक्तिक प्रगति को ध्यान में रखकर और अपनी जनता के प्रति पूर्ण अन्याय करते रहकर ये लोग न्याय की दुहाई दें, इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है? अँगरेजी ही परस्पर इन प्रदेशों में नौकरी के सम्बन्ध में समता रख सकती है, इससे बड़ी अनर्गल बात और क्या हो सकती है? क्या इन लोगों को यह नहीं दिखाई पड़ता कि इसी तर्क के आधार पर उन्हें एक दिन अँगरेजों को भी वापस बुलाना पड़ेगा। यदि भारत में भारत की किसी भाषा के प्रयोग से अन्य प्रदेशों के प्रति अन्याय होगा, तो फिर क्या भारत के किसी प्रदेश के व्यक्ति के हाथ में नेतृत्व जाने से इन लोगों को अन्य प्रदेशों के प्रति अन्याय न लगेगा, और तब क्या ये लोग इस बात की दुहाई न देने लगेंगे कि भारत का नेता भारतीय न होना चाहिए, वह तो इनके आँग्ल गुरुओं में से एक होना चाहिए। मैं आप सबका ध्यान इस भयावह बात की ओर विशेषतः खींचना चाहता हूँ कि जो देशभाषा को विदेशी मान सकते हैं, वे देश-भाई को भी विदेशी मान सकते हैं और अपने भाई का गला काटने के लिए विदेशियों को भी आमन्त्रित कर सकते हैं।
प्रजातन्त्र की सफलता क्या अँगरेजी पर निर्भर है?
      न्याय शब्द का जिस प्रकार उल्टे अर्थ में ये लोग प्रयोग करते हैं, सम्भवत: उसी प्रकार इनके प्रजातन्त्र शब्द का अर्थ है। साधारणत: प्रजातन्त्र से यही बोध होता है कि प्रजा अपना शासन स्वयं करे, राजतन्त्र में उसका प्रमुख भाग हो। अपनी राजनीतिक समस्याओं पर वह स्वयं सोच-विचार कर अपनी नीति निर्धारित करे। स्पष्ट है कि ऐसा राजनीतिक तन्त्र तभी स्थापित हो सकता है, जब उसका सारा कामकाज जनता की अपनी भाषा में हो। अत:, जब भी कोई देश साम्राज्यवादिता के चंगुल से छूटकर स्वतन्त्र हुआ है, उसने तुरन्त अपना सारा कामकाम अपनी जनता की भाषा में करना आरम्भ कर दिया है। संसार के इतिहास में अन्यत्र ऐसा कोई उदाहरण न मिलेगा, जहाँ स्वतन्त्र देश अपनी भाषा में अपना राजकाज न चलाता हो। केवल हमारा ही अनोखा देश है जो स्वतन्त्र कहलाता है, किन्तु जिसका राजकाज देश की भाषा में न होकर उस भाषा में होता है, जो हमारे पिछले शासकों की भाषा थी और जिसे हमपर उन्होंने अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर लादा था। इससे भी अनूठी बात यह है कि यहाँ का राजतन्त्र प्रजातन्त्र कहलाता है, जबकि यहाँ कि निन्यानबे प्रतिशत जनता उस भाषा से सर्वथा अपरिचित है, जिसमें यहाँ का सारा राजकाज यहाँ का शासक-वर्ग करता है। इस अनोखेपन पर गर्व करें या आँसू बहायें? पर, कैसा आश्चर्य है कि यहाँ अँगरेजी  जाननेवाला वर्ग कहता है कि यदि अँगरेजी भाषा न रखी गई, तो इस देश में प्रजातन्त्र का प्रयोग सफल न हो सकेगा। इन लोगों के अनुसार प्रजातन्त्र हमने इंग्लिश्तान से आयात किया है। इन लोगों का कहना है कि प्रजातान्त्रिक प्रणाली और संसदीय राजतन्त्र जगत् को इनके परम गुरु इंगलैण्ड की देन है। इंग्लैण्ड की इस अपूर्व देन के हृदय-तल में अँगरेजी बसी हुई है। तत्सम्बन्धी सारा साहित्य अँगरेजी भाषा में है। उसकी पारिभाषिक शब्दावली अँगरेजी  भाषा में है। उसका विधि-विधान सब अँगरेजी में है। अत:, यदि हमें इस प्रजातान्त्रिक और संसदीय प्रणाली को सफल बनाना है, इसकी जड़ें इस देश में मजबूत करनी हैं, तो हमें अँगरेजी भी अपने यहाँ रखनी है और उसके माध्यम द्वारा अपना कामकाज चलाना है। मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं कि ये लोग समझें कि इस जगत् में जो कुछ श्रेष्ठ है, जो कुछ सुन्दर है, जो कुछ उपास्य है, वह सब इनके परम गुरु इंग्लैण्ड का है और इंग्लैण्ड में है। किन्तु, इस बात को समझने के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं कि प्रजातान्त्रिक प्रणाली का कुछ विशिष्ट सम्बन्ध नहीं है। फ्रांस की राज्यक्रान्ति तक इंग्लैण्ड में केवल सामन्तों का राज्य था और वहाँ जनसाधारण को बालिग मताधिकार तो पिछले प्रथम महायुद्ध के पश्चात् मिला। इसके विपरीत युग-युगान्तर से हमारे देश में अपने सामाजिक और सामूहिक मामलों की व्यवस्था ग्राम-पंचायतों के द्वारा करने की परिपाटी चली आ रही थी और हमारे देश के लोग उस परिपाटी में अभ्यस्त थे। मैं नहीं जानता कि अँगरेजी-वर्ग के लोग उस पंचायत-प्रणाली को प्रजातान्त्रिक प्रणाली मानने के लिए तैयार हैं या नहीं। समाजशास्त्र के निष्पक्ष विद्यार्थी तो उस प्रणाली को प्रजातान्त्रिक प्रणाली का आदि रूप सर्वदा स्वीकार करते रहे हैं। तथ्य तो यह है किसी भी देश की शासन-प्रणाली उसी देश के आदर्शों और भावनाओं के अनुसार होती है। अत:, हमारे देश में भी वर्त्तमान प्रणाली की सफलता, विफलता, हमारे इतिहास, हमारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था, हमारे आदर्शों और भावनाओं पर निर्भर करेंगी, न कि अँगरेजी पर, चाहे हम कैसी ही दृढ श्रृंखला से अपने को इंग्लैण्ड के चौखट से कसकर कितना ही क्यों न बाँध लें, चाहे हम मे की संसदीय प्रणाली की प्रसिद्ध पुस्तक के कितने ही पारायण क्यों न करें, हमारे देश का राजतन्त्र उस रूप में कार्य नहीं कर सकता, न ही कर सकेगा, जिस रूप में कि इंग्लैण्ड में कार्य करता रहा है। अत:, इस बात में लेशमात्र भी तथ्य नहीं कि अँगरेजी बनाये रखने से हम अपने इस तन्त्र को ठीक उसी ढर्रे पर चला सकेंगे, जैसा कि वह इंग्लैण्ड में चलता है। यह हमारा अपना है, इसका निर्माण हमारी सर्वप्रभुतासम्पन्न जनता ने अपनी संविधान-सभा के द्वारा किया है। यह हमारे देश की समस्याओं को ध्यान में रखकर बना है और इसमें अनेक ऐसी बातें हैं, जो न तो इंग्लैण्ड में और न इंग्लैण्ड के किसी अधिराज्य में पाई जाती हैं। अत:, इस बात का प्रयास करना कि यह पूर्णतया भारतीय राजतन्त्र इंग्लैण्ड के राजतन्त्र के ही ढर्रे पर चले, इस तन्त्र का अपमान है और हमारे देश का एवं जनता का अपमान है। कम-से-कम इस आधार पर अँगरेजी को रखने का समर्थन तो घाव पर नमक छिड़कने के समान है।
देश के द्रुत आर्थिक विकास के लिए अँगरेजी की आवश्यकता एक भ्रम
            सबसे अनोखी बात जो अँगरेजी के पहले पक्षपाती उसके समर्थन में कह देते हैं; वह यह है कि हमारे द्रुत आर्थिक विकास के लिए अँगरेजी की परम आवश्यकता है। कहा यह जाता है कि द्रुत आर्थिक विकास के लिए हमें अनेक इंजीनियर, शिल्पी और वैज्ञानिक चाहिए। हमारे पास इस समय सारा साहित्य अँगरेजी में उपलब्ध है और भारतीय भाषाओं में वह साहित्य उपलब्ध नहीं है। अत: हम, पर्याप्त संख्या में इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिल्पी इस अँगरेजी साहित्य के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र तैयार कर सकते हैं। यदि हम थोथी राष्ट्रीय भावना से बँधे रहकर यह प्रयास करें कि हमारी देशी भाषाओं के माध्यम द्वारा हम अपने विद्यार्थियों को इन विषयों की शिक्षा दें, तो हमें अनेक वर्ष व्यर्थ में यह साहित्य अपनी भाषाओं में तैयार करने के लिए खो देने पड़ेंगे और इस प्रकार हमारा आर्थिक विकास न हो पायगा। जिस ढंग से यह बात कही जाती है, उससे ऐसा लगता है कम-से-कम यह तर्क तो अकाट्य है। किन्तु, है यह भी धोखे-भरी बात। अबतक हम सब यही समझते रहे हैं और मानते रहे हैं कि शिक्षा का मूलमन्त्र परिचित के आधार पर अपरिचित का बोध कराना है। इसी कारण संसार-भर के शिक्षाशास्त्री यह मानते हैं कि मातृभाषा के माध्यम द्वारा समय और शक्ति की पूर्ण मितव्ययिता के साथ और अत्यन्त तीव्र गति से बालक को शिक्षा दी जा सकती है। अत:, यह स्पष्ट है कि भारत में तीव्रातितीव्र गति से देशवासियों को शिक्षित करने का माध्यम अँगरेजी हरगिज नहीं हो सकती। केवल अँगरेजी सीखने में ही हमारे विद्यार्थी को कम-से-कम दस वर्ष व्यतीत कर देने पड़ते हैं। इसके विपरीत अच्छा कामचलाऊ ज्ञान एक-दो वर्ष में ही हो जाता है। स्पष्ट है, यदि हम अपने देश में हर प्रकार की शिक्षा अपनी मातृभाषा द्वारा अपने युवकों को दें, तो वह लगभग आधे समय में उतना ज्ञानोपार्जन कर लेंगे, जितने में कि आज वे अँगरेजी के माध्यम द्वारा करते हैं। हर विद्यार्थी के कम-से-कम पाँच-छह वर्ष बच जायेंगे और यदि हम इन वर्षों को विद्यार्थियों की संख्या से गुणा कर दें, तो हमको पता चलेगा कि हम अपने देशवासियों के लाखों वर्ष इस प्रकार बचा लेंगे और जो समय इस प्रकार बचेगा, उसे देश विभिन्न प्रकार अधिकाधिक आर्थिक विकास में लगा सकेंगे। यह दलील कि हमारी भाषाओं में साहित्य नहीं है, कुछ महत्त्व नहीं रखती। यदि हमने उस धन और समय का, जो हम आज अँगरेजी-माध्यम के कारण व्यर्थ गँवा रहे हैं, शतांश भी आवश्यक साहित्य के निर्माण के लिए लगाया होता, तो अबतक हमारे पास अपनी भाषाओं में वर्षों पूर्व सब आवश्यक वैज्ञानिक और शिल्पिक साहित्य हो जाता। पर, हमारे अँगरेजी-वर्ग के लोगों ने ही हर प्रकार की बाधा खड़ी करके यह नहीं होने दिया। इस प्रकार के साहित्य का निर्माण तब होता है, जब उसके लिए माँग हो। किन्तु, जब अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही शिक्षा दी जाती रहे, तो अपनी भाषाओं में ऐसे साहित्य का निर्माण होने का प्रश्न पैदा हो ही कैसे सकता है? न तो कोई लेखक और न कोई प्रकाशक इस बात के लिए तैयार होगा कि वह अपना समय और धन उस साहित्य के तैयार करने में लगाये, जिसकी माँग के सब द्वार यत्नपूर्वक पूर्णत: बन्द कर दिये गये हों। (जो लोग यह सवाल करते हैं कि हमारी भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य नहीं है, उनको यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इसकी वजह क्या है? लेकिन अगर आप सचमुच इस बात के लिए चिन्तित हैं, तब क्या सिर्फ़ यह कहने भर से काम हो जाएगा? एनरिको फर्मी जैसे लेखक की किताब भी आज से 40 साल पहले ही भारत में हिन्दी में उपलब्ध थी। हिन्दी अकादमियों और आयोगों जैसी संस्थाओं ने अभी तक हजारों वैज्ञानिक किताबों का प्रकाशन किया है। आप चाहें तो इन किताबों की जानकारी सारी अकादमियों से प्राप्त कर सकते हैं। इन किताबों के 35-40 से उपलब्ध होने के बावजूद न तो प्रचारित किया गया और न अपनी भाषा में विज्ञान पढ़ाने दिया गया। इसके पीछे की चाल आप समझ सकते हैं। -प्रस्तुतकर्ता)
(जारी…)

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