‘अंग्रेजी ग्लोबल है’ (लघुकथा)

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अंग्रेजी ग्लोबल है
वह दुनिया के सबसे ताकतवर देश का प्रमुख था। इतनी जाँच के बाद तो चला था वो, फिर विमान दुर्घटना कैसे हो गयी? सारी अक़ल गुम हो गई। किसी निर्जन इलाके में दस घंटे तक बेहोश पड़ा रहा। यानचालक की लाश बगल में पड़ी है। वह भी बिना पेट के! कोई नहीं बचा। आखिर हवाई जहाज पाँच फुट से गिरा नहीं था, हजारों फुट की बात थी! होश आई तब कुछ देर तक कराहने के बाद उसका ध्यान उस स्थान के चारों ओर गया। यह कौन-सी जगह है? वह तो विश्व स्तरीय सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। आखिर विमान दुर्घटना हुई कैसे? एक… दो… तीन… चार… पाँच मिनट तक वह सोचता रहा। अच्छा, छोड़ो, अब हो गई तो हो गई। फिलहाल प्यास जोरों की लगी है! आस-पास कोई आदमी, कोई घर, कुछ भी नहीं दिखा। ये ग्यारहवाँ घंटा चालू है… प्यास बढ रही है। वह उठता है। यह भी एक संयोग ही है कि उसके शरीर पर खरोंच तक नहीं आई है। हाँ, कोट-टाई इस्तरी किए हुए थे, वे बुरी तरह मुड़-तुड़ गये हैं। … उठकर वह पूरब की तरफ चलना शुरू करता है। प्यास बढती जा रही है। … एक… दो… तीन… साढ़े तीन घंटे तक हाँफते-दौड़ते-भागते चलता गया। बहुत थक गया है वह। आखिर एक जगह ठस से बैठ गया। प्यास जानलेवा होती जा रही है। उसे याद आने लगता है, पिछले विश्व स्तरीय सम्मेलन में उसने जल संरक्षण पर भाषण दिया था, कहा था, जल ही जीवन है। आज वह समझ पा रहा है, जल ही जीवन है। अब शाम होने जा रही है। खेलने के लिए 5-7 बच्चों का झुंड इधर बढ़ता जा रहा है। फिर किशोरों की बारी आती है, 10-12 किशोर भी इधर आ रहे हैं। पलभर की झपकी में वह सपना देखता है, किशोर उसकी ओर बढ़ रहे हैं, उनके हाथों में बाँस का धनुष था, वह अब अंग्रेजी की किताब में बदलता जाता है, वह खुश हो जाता है क्योंकि उसे बताया गया है कि दुनिया में सबको अंग्रेजी सिखाने के लिए सारे हथियार इस्तेमाल किये गये हैं। सब लोग अंग्रेजी जानते हैं। करोड़ों-अरबों डालर के खर्चे का लाभ उसे दिख रहा है, किशोर अंग्रेजी के शब्दकोश लिये हुए उसकी ओर बढ रहे हैं। वह आज ही तो अंग्रेजी को आधिकारिक तौर पर ग्लोबल घोषित करने जा रहा था… कि विमान दुर्घटना हो गई। (क्योंकि उसकी ही घोषणा से आदमी आदमी है, वरना वह कुछ नहीं।) … तभी एक किशोर का बाण उसके बगल में आकर गिरता है। किशोर बाण लेने के लिए दौड़ता है। ज्योंही उसके निकट आता है, अधूरी नींद टूट जाती है। वह तुरंत किशोर का हाथ पकड़ लेता है, उसके मुँह से एक शब्द निकलता है- वॉ ट र। किशोर काला है, वह गोरा है… लेकिन इस वक्त बस वॉ ट र। किशोर नहीं समझता। वह चेहरे पर नहीं समझने के भाव लिए, थोड़ा सशंकित खड़ा है। तीसरी बार वॉ ट र, वॉ ट र, वॉ ट र… वह बोलता जा रहा है, उसकी आवाज़ धीमी होती जा रही है, वॉ… ट… र, वॉ… ट… र, वॉ… ट… र। चुप… मौन… किशोर का हाथ उसके हाथ से छूट जाता है। किशोर दौड़ता है… वापस किशोर आता है, 3-4 प्रौढों के साथ। प्रौढ भी वॉ ट र का मतलब नहीं समझते, किशोर उन्हे बता चुका है कि बेहोश आदमी वॉ ट र, वॉ ट र… जैसा कुछ बोलता जा रहा था। आदमी इतनी जल्दी नहीं मरता। फिर होश में आते ही वॉ ट र… । कोई नहीं समझ सका, भला ये वॉ ट र… क्या कह रहा है यह आदमी? शाम ढलनेवाली है। इसे उठाकर सब ले चलते हैं। इसी बीच टाई फट जाती है। … वॉ ट र, टे …क, ड्रिं… क… , नी… ड… , ग्ला… स… , ब्रिं… ग… … … जाने क्या-क्या बोलता जाता है यह आदमी। कुछ भी समझ नहीं सका कोई। बस्ती में पहुँचने पर गिलास दिखाई पड़ता है, वह दौड़ता है… गिलास खाली है… किशोर समझ जाता है, उसे पानी चाहिए… वह तुरंत पानी लाकर देता है। पानी पीते ही उस आदमी की अकल वापस आ जाती है, उसे समझ आ चुका है, यहाँ कोई अंग्रेजी नहीं समझता। … जैसे भी हो, यहाँ से वह भागना चाहता है! उसके मुँह से निकलता है, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल, थर्स्ट इज़ ग्लोबल, हंगर इज़ ग्लोबल, इमोशन्स आर ग्लोबल, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल(अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है, प्यास ग्लोबल है, भूख ग्लोबल है, आदमी की भावनाएँ ग्लोबल हैं, अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है)।

… … वह सपना देख रहा है। विश्व सम्मेलन शुरू है। बड़े-बड़े अक्षरों में आज अंग्रेजी को आधिकारिक तौर पर ग्लोबल घोषित करने की बात लिखी है। वह भाषण देता है और पहला वाक्य कहता है, अंग्रेजी ग्लोबल नहीं है, इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल… … सिर्फ दो घूँट पानी ने हमें सिखा दिया कि कोई भाषा ग्लोबल नहीं, संकेत ग्लोबल हो सकते हैं, मानवता ग्लोबल हो सकती है, अंग्रेजी की बदौलत जब दो घूँट पानी नहीं मिल सकता तब इसे क्या कहें ?  इंग्लिश इज़ नॉट ग्लोबल… … 

अफ़जल को मिले नोबेल शान्ति पुरस्कार, साथ में भारत रत्न भी

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महान क्रान्तिकारी अफ़जल साहब ने ऐसा क्या कर दिया कि सरकारें उन्हें हर दिन सरका रही हैं। पहले भाजपा ने और अब कांग्रेस ने, दोनों ने काम तो एक ही किया है सजा को सरकाते रहने का। नोबेल शान्ति पुरस्कार जो अधिकतर अशान्ति फैलाने वालों को दिया जाता है, ओबामा को दिया गया है। वह भी राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद ही। आखिर क्या किया है उसने? मैंने तो सुना है कि जिस समय नोबेल की घोषणा की गई उस समय भी अमेरिका युद्ध के विचारों में या युद्ध में डूबा हुआ था। उसका नेतृत्त्व तो ओबामा ही कर रहा था। लेकिन उसे यह पुरस्कार दिया गया। यह बताता है कि अमेरिका का नोबेल समिति पर कितना दबदबा है। पिछले बीस सालों में अमेरिका ने इतने नोबेल झटके हैं कि उसके पास नोबेल पुरस्कार रखने के लायक जगह भी कठिनाई से बन पाती है।

      अभी कुछ दिन पहले जब ओबामा भारत आया था तब भारत के लोग, भारत के सबसे कुपात्र छात्रों में से कुछ छात्र और हमारा कुपात्र मीडिया सब के सब अमेरिका की भक्ति में डूबे हुए थे। किसी भी चैनल पर ओबामा के सिवा ओबामा ही दिखता था। यह तो संभव नहीं है वरना भारत के चैनल ओबामा के नहाते समय और मुँह धोते या कुल्ला करते समय के भी फुटेज बिना दिखाए रह नहीं सकते थे। वैसे अगर सुबह-सुबह शौच करते समय का वीडियो भी मिल जाता तो बेचारे चैनल वाले अमृत का पान कर लेते लेकिन ये गई गुजरी व्यवस्था इन चीजों को तो दिखाने ही नहीं देती। ओबामा के नाचने से लेकर नचाने तक की खबर को भारत के मीडिया ने जम कर परोसा।

      मैं तो विषय से भटक गया! आइए वापस। जब सबसे ज्यादा युद्ध लड़ने वाले, हथियार बेचने वाले, परमाणु बम का लाइव परीक्षण करने वाले अमेरिका को शान्ति के नोबेल मिल सकते हैं तब अफ़जल भाई को क्यों नहीं? वैसे भी अफ़जल साहब ने गलत काम किया नहीं है। गाँधी की बात तो छोड़ दें। नोबेल के हकदार तो नेहरु भी थे। पंचशील, गुट निरपेक्ष, नि:शस्त्रीकरण या निरस्त्रीकरण के बावजूद वे नोबेल नहीं पा सके। अच्छा उनकी बात अभी नहीं। उन्होंने(ओबामा को उसने और अफ़जल को उन्होंने) तो भगतसिंह और गाँधी जी दोनों की इच्छाओं को एक साथ पूरा करने का प्रयास किया। यह कैसे? सबूत है भाई! गाँधी जी की इच्छा थी कि संसद भवन की बिल्डिंग को उड़ा दिया जाय, यह गुलामी का प्रतीक है। यह इच्छा तो अफ़जल भाई की कृपा से पूरी होने वाली थी लेकिन क्रांतिकारियों की तरह बेचारे पकड़ लिए गए। और अब भगतसिंह की बात। भगतसिंह ने सभा में बम फेंक कर कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की आवाज चाहिए। उस हिसाब से भगतसिंह के काम को और अधिक विस्तार देकर अफ़जल भाई और उनकी टीम ने तो पूरी संसद को उड़ाने की कोशिश की। यानि भगतसिंह से चार कदम नहीं, कई किलोमीटर आगे निकल गए। भगतसिंह ने किसी को मारने के लिए बम नहीं फेंका लेकिन अफ़जल भाई ने तो पूरी संसद के सारे भूत-प्रेतों को ही खत्म करने का निश्चय कर लिया था। समय भी तो 70 साल आगे जा चुका था। इसलिए भगतसिंह के सिद्धान्तों और योजनाओं को बदलकर और ताकतवर बनाना पड़ा।
      यह तो विश्वास हो गया कि अभी भी अंग्रेजी सरकार ही चल रही है जो किसी क्रान्तिकारी को छोड़ने वाली नहीं है। अब 1947 के पहले के इतिहास को हम सब समझ सकते हैं वो भी एक नए उदाहरण के साथ।
      अब बताइए कि अफ़जल साहब ने क्या गलत किया है? उन्होंने एक साथ भगतसिंह और गाँधी जी के सिद्धान्तों को पूरा करने की कोशिश की जो किसी दूसरे से सम्भव ही नहीं था। तो ऐसे भारत की शान्ति के लिए भगतसिंह के पदचिन्हों पर चलनेवाले के लिए नोबेल पुरस्कार की मांग के बारे में आपका क्या खयाल है?
            फिर भारत के सबसे प्रसिद्ध दो क्रांतिकारियों के पदचिन्हों पर चलनेवाले इस शख्स को भारत रत्न भी तो मिलना ही चाहिए। देश का सवाल है। भगतसिंह जिंदा होते तो संसद पर हमले के लिए अफ़जल की पीठ ठोकते लेकिन यह सरकार भगतसिंह की बात मानती और समझती ही कहाँ हैं? आज के भारत में अफ़जल का कदम उठाना सिर्फ़ एक सवाल ही छोड़ता है। क्योंकि यह कदम तो किसी भारतीय नागरिक को उठाना चाहिए लेकिन देश का युवा बेकार है। वह ऐसे महान कदम उठाएगा कहाँ से? उसे क्रिकेट और बॉलीवुड से फुरसत हो तब तो? एक भारतीय होने के नाते किसी ने यह शुभ काम तो किया नहीं। लेकिन जब अफ़जल साहब ने यह करने की कोशिश की तो हम सब भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर ध्यान देते ही नहीं हैं।

अन्तरराष्ट्रीय राजनीति और आतंकवाद पर लम्बा चौड़ा व्याख्यान देनेवालों के लिए यह आलेख नहीं है। क्योंकि आतंकवाद कोई नई समस्या नहीं है और मेरे नजर में इतनी बड़ी समस्या भी नहीं है कि इस पर प्रधानमंत्री से लेकर चपरासी तक दुख जताते रहें। वैसे शायद वे मन में सुख ही जताते हों।