क्यों – कमला बक़ाया (कविता)

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यह बच्चों के लिए रची गई एक साधारण-सी कविता है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह एक असाधारण कविता है। कमला बक़ाया की यह कविता इस देश और दुनिया के हर बच्चे तक पहुँचाई जानी चाहिए, ऐसा हमें लगता है। यहाँ प्रस्तुत है-

क्यों – कमला बक़ाया
कहानी बहुत पुरानी है,
पर अब तक याद ज़ुबानी है।
इक छोटा-सा घर कच्चा था,
उसमें माँ थी, इक बच्चा था।
बिन बाप मड़ैया सूनी थी,
माँ पर मेहनत दूनी थी।
यह बच्चा बड़ा हुआ ज्यों-ज्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”


है बाप नहीं मेरा -पर क्यों?
दिन-रात अंधेरा है घर क्यों?
इतनी है हमें ग़रीबी क्यों?
और साथ में मोटी बीबी क्यों?
बहुतेरा माँ समझाती थी,
हर तरह उसे फुसलाती थी,

पर बच्चा हठ्ठी बच्चा था,
और आन का अपनी सच्चा था।

यह आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

माँ ने कुछ काम सँभाला था,
रो-धोकर उसको पाला था।

फिर वह भी उसको छोड़ गई,
दुनिया से नाता तोड़ गई।
बच्चे को अब घर-बार नहीं,
माँ की ममता और प्यार नहीं।
बस रैन-बसेरा सड़कों पे,
और साँझ-सबेरा सड़कों पे।
वह हर दम पूछा करता, “क्यों?”
दुनिया में कोई मरता क्यों?
यूँ फंदे कसे ग़रीबी के,
घर पहुँचा मोटी बीबी के।
घर क्या था बड़ी हवेली थी,
पर बीबी यहाँ अकेली थी।
गो नौकर भी बहुतेरे थे,
घर इनके अलग अंधेरे थे।
बच्चे को बान पुरानी थी,
कुछ बचपन था, नादानी थी।
पूछा- यह बड़ी हवेली क्यों?
बीबी यहाँ अकेली क्यों?

नौकर-चाकर सब हँसते थे,
कुछ तीखे फ़िक़रे कसते थे।

भोले बच्चे! पगलाया क्यों?
हर बात पे करने आया, “क्यों?”
दिन-रात यहाँ हम मरते हैं,
सब काम हम ही तो करते हैं।

रूखा-सूखा जो पाते हैं,
वह खाते, शुकर मनाते हैं।
क़िस्मत में अपनी सैर नहीं,
छुट्टी माँगो तो ख़ैर नहीं।
चलती है कहाँ फ़क़ीरों की?
है दुनिया यहाँ अमीरों की।
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा था नौकर बीबी का,
फिर देखा मज़ा ग़रीबी का।
दिन भर आवाज़ें पड़ती थीं,
हो देर तो बीबी लड़ती थी।
बावर्ची गाली देता था,
कुछ बदले माली लेता था।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

नित पकते हलुवे-मांदे क्यों?
हम रगड़ें जूठे भांडे क्यों?
बीबी है चुपड़ी खाती क्यों?
सूखी हमें चपाती क्यों?

यह बात जो बीबी सुन पाई,
बच्चे की शामत ले आई।
क्यों हरदम पूछा करता, “क्यों?”
हर बात पे आगे धरता, “क्यों?”
यह माया है शुभ कर्मों की,
मेरे ही दान औधर्मों की।
सब पिछला लेना-देना है,
कहीं हलवा कहीं चबेना है।
माँ-बाप को तूने खाया क्यों?
भिखमंगा बनकर आया क्यों?

मुँह छोटा करता बात बड़ी,
सुनती हूँ मैं दिन-रात खड़ी।
इस “क्यों” में आग लगा दूँगी,
फिर पूछा, मार भगा दूँगी।
बच्चा यह सुन चकराया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
माँ-बाप को मैंने खाया क्यों?
भिखमंगा मुझे बनाया क्यों?
फिर बोला! पाजी, हत्यारा!
कह बीबी ने थप्पड़ मारा।
बच्चा रोया, ललकारा- क्यों?
तुमने हमको मारा क्यों?
दिल बात ने इतना तोड़ दिया,
बच्चे ने वह घर छोड़ दिया।
वह फिरा किया मारा-मारा
लावारिस, बेघर, बेचारा।
न खाने का, न पानी का,
यह बदला था नादानी का।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”
इक ग्वाला दूध लिए जाता,
भर गागर मुँह तक छलकाता।
बच्चे का मन जो ललचाया,
भूखा था, पास चला आया।
यह दूध कहाँ ले जाते हो?
इतना सब किसे पिलाते हो?

थोड़ा हमको दे जाओ ना!

लो दाम निकालो, आओ ना।
पैसे तो मेरे पास नहीं।
तो दूध की रखो आस नहीं।
जो बच्चा पैसा लाएगा,
वह दूध-दही सब खाएगा।

यह सुन वह सटपटाया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
दुनिया सब दूध उड़ाए क्यों?
भूखा ग़रीब मर जाए क्यों?

ग्वाला बोला- दीवाना है,
कुछ दुनिया को पहचाना है?
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चे ने मुँह की खाई तो,
पर भूख न मिटने पाई यों।
गो थककर बच्चा चूर हुआ,
पर भूख से फिर मजबूर हुआ
थी पास दुकान मिठाई की,
लोगों ने भीड़ लगाई थी।
कोई लड्डू लेकर जाता था,
कोई रबड़ी बैठा खाता था।
क्या सुर्ख़-सुर्ख़ कचौरी थी,
कूंडे में दही फुलौरी थी।
थी भुजिया मेथी आलू की,
और चटनी साथ कचालू की।

बच्चा कुछ पास सरक आया,
न झिझका और न शर्माया।
भइया हलवाई सुनना तो,
पूरी-मिठाई हमें भी दो।
कुछ पैसा-धेला लाए हो?
यूँ हाथ पसारे आए हो?
पैसे तो अपने पास नहीं।
बिन पैसे मिलती घास नहीं।
हम देते हैं ख़ैरात नहीं,
पैसे बिन करते बात नहीं।

दमड़ी औक़ात कमीने* की,

यह सूरत खाने-पीने की!
अब रस्ता अपना नापो ना,
क़िस्मत को खड़े सरापो ना।
हलवाई ने धमकाया ज्यों,
फिर उसके मुँह पर आया, क्यों?
कहते हो मुझे कमीना* क्यों?
मेरा ही मुश्किल जीना क्यों?
बच्चा हूँ, मैं बेजान नहीं,
बिन पैसे क्या इंसान नहीं?
हट, हट! क्यों शोर मचाया है,
क्या धरना देने आया है?
नहीं देते, तेरा इजारा है?
क्या माल किसी का मारा है?
अब चटपट चलता बन ज्यों-त्यों,
नहीं रस्ते नाप निकलता क्यों?
जो बच्चा पैसे लाएगा,
लड्डू-पेड़ा सब पाएगा।

यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा थककर बेहाल हुआ,
भूखा, बेचैन, निढाल हुआ।
आगे को क़दम बढ़ाता था,
तो सिर चकराया जाता था।
तरसा था दाने-दाने को,
कुछ बैठ गया सुस्ताने को।
हिस था ठंडे-पाले का,
न होश उस गंदे नाले का।

थी सरदी खूब कड़ाके की
तपन पेट में फ़ाक़े की।
कुछ दूर को कुत्ता रोता था,
न जाने क्या-कुछ होता था।

दिखता हर तरफ़ अंधेरा था,
कमज़ोरी ने कुछ घेरा था।
आँखें उसकी पथराई थीं,
बेबस बाँहें फैलाई थीं।

वह ऐसे डूब रहा था ज्यों,

फिर मुँह पर उसके आया, क्यों?”
आराम से कोई सोता क्यों?
कोई भूखा-नंगा रोता क्यों?
फिर जान पड़ी बेहोशी-सी,
एकदम गुमसुम ख़ामोशी-सी।
देखा कोई बूढ़ा आता है,
इक टाँग से कुछ लँगड़ाता है।
वह पास को आया बच्चे के,
सिर को सहलाया बच्चे के।
क्यों बच्चे सरदी खाता है,
यूँ बैठा ऐंठा जाता है?

बाबा मेरा घर-बार नहीं,
करने वाला कोई प्यार नहीं।
मैं ये ही पूछा करता- क्यों?
मुझ जैसा भूखा मरता क्यों?
कहते हैं रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।

पर ऐसी रीत पुरानी क्यों?
मैं पूछूँ- यह नादानी क्यों?

यह तो कुछ नहीं बताते हैं,
उलटे मुझको धमकाते हैं।
बुड्ढे ने उसको पुचकारा,
यूँ अपना हाल कहा सारा।
हाँ, है तो रीत पुरानी यह,
पर अपनी ही नादानी यह।
गर सब ही पूछा करते यों,
जैसे तुम, पूछ रहे हो, “क्यों?
तो अब तक रंग बदल जाता,
दुनिया का ढंग बदल जाता।
है समझ नहीं इन बातों की,
है करामात किन हाथों की।

हम ही तो महल उठाते हैं,

हम ही तो अन्न उगाते हैं।
सब काम हम ही तो करते हैं,
फिर उलटे भूखों मरते हैं।
बूढ़ा तो हूँ, बेजान नहीं,
क्या मन में कुछ अरमान नहीं?

मैंने भी कुनबा पाला था,
बरसों तक काम सँभाला था।
जब तक था ज़ोर जवानी का,
मुँह देखा रोटी-पानी का।
यह टाँग जो अपनी टूट गई,
रोटी भी हम से रूठ गई।
कुछ काम नहीं कर पाता हूँ,
यूँ दर-दर ठोकर खाता हूँ।
जोड़ों में होता दर्द बड़ा,
गिर जाता हूँ मैं खड़ा-खड़ा।
न बीबी है, न बच्चा है,
इक सूना-सा घर कच्चा है।
मैं भी सोचा करता हूँ यों,
आहे ग़रीब है भरता क्यों?

कहानी यहाँ अधूरी है,
इसकी हमको मजबूरी है।
कुछ लोग यह अब भी कहते हैं,
जो दूर कहीं पर रहते हैं,
उनको था दिया सुनाई यों,
इक बच्चा पूछ रहा था, क्यों?
वह सड़क किनारे बैठा था,
नीला, सरदी से ऐंठा था।
पर दोनों होंठ खुले थे यों
जैसे वह पूछ रहा था, क्यों?
फुलौरी- पकौड़ापकौड़ीफुलौरा, पकोड़ा, पकोड़ीघी या तेल में पकी हुई बेसन या पीठी की बरी या बट्टी
कचालू-  एक प्रकार की अरवी।
दमड़ी- पैसे का आठवाँ भाग।
इजारा- अधिकार, हक़, स्वत्व, दावा, दख़ल, अधिकृति, इख्तियार, अख़्तियार;  वह अधिकार जिसके आधार पर कोई वस्तु अपने पास रखी अथवा किसी से ली या माँगी जा सकती हो
* ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। समाज के यथार्थ प्रतिबिंबन के लिए लेखक कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं, किंतु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए।
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स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों के चार भाषण

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इस बार कुछ और बातें!
पिछले दिनों एक विद्यालय में जाने का अवसर मिला। वहाँ मेरे पूर्व शिक्षक ने बच्चों के लिए कुछ भाषण स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देने के लिए लिखने का निर्देश दिया। कुछ खास इच्छा न रहते हुए भी 10 भाषण लिखे। निर्देशानुसार भाषण में कोई कविता या शेर होने पर वह अच्छा लगेगा। हकीकत यह है कि कविता के अंश या शेर तालियाँ बजवाते हैं, इससे ज़्यादा शायद ही कुछ होता हो। पास में न कोई डायरी, न किताब, न नोट। कविता के चक्कर से छुटकारा कैसे भी मिल सका। उन दस भाषणों में से 7-8 को आज बच्चे विद्यालय द्वारा आयोजित समारोह में देंगे। यहाँ 15 अगस्त, 2012 के अवसर पर उन भाषणों में से कुछ दिए जा रहे हैं। संबोधन को भी यहाँ रहने दिया जा रहा है। हालाँकि वह जरूरी नहीं है।

1
उपस्थित सज्जनो, शिक्षकगण और मेरे सहपाठियो! आज 15 अगस्त के इस महत्वपूर्ण अवसर पर मुझे कुछ कहने का अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए मैं आपसबों का आभारी हूँ।
      15 अगस्त, 1947 के बाद आज 65 साल बीत गए हैं। हम हर साल इस दिन अपने देश की आजादी का उत्सव मनाते हैं। दो-ढाई सौ सालों की लम्बी ग़ुलामी से आज़ादी पाने में हमारे देश के लाखों लोगों की जानें गई हैं। अंग्रेजों से पहली लड़ाई लड़नेवाले बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से लेकर भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे कई शहीदों की कुर्बानी देकर हमारे देश को 1947 में आजादी मिल पाई।
      आज जब हमारे देश में आदर्श के नाम खिलाड़ी, फ़िल्मी सितारे और अमीर उद्योगपति सामने हैं, तब शहीदों की चमक फीकी पड़ती मालूम हो रही है। ज़रूरत है इस बात की कि भगतसिंह को हमारे बीच आदर्श के रूप में ठीक से स्थापित किया जाए।
      भगतसिंह से प्रेरणा लेकर इस देश, विश्व और मानवता के लिए कुछ करने की ज़रूरत है।
धरती हरी भरी हो आकाश मुस्कुराए
कुछ कर दिखाओ ऐसा इतिहास जगमगाए।
जय हिंद!                 जय मानवता!
2
प्यारे देशवासियो! हमारा देश आज 66वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। हमारे विद्यालय द्वारा आयोजित समारोह में मुझे भी कुछ कहने का अवसर प्रदान किया गया है। इस अवसर पर मैं आपसबों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
      आज हम अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो चुके हैं। लेकिन हमें निश्चिंत होकर बैठ नहीं जाना चाहिए। अपने ही देश में ऐसे कई गद्दार आसन जमाए हुए हैं, जो देश की स्वतंत्रता को खतरा पहुँचाने की कोशिशें करते हैं। हम सभी देशवासियों का यह कर्तव्य है कि हम उन गद्दारों से सावधान रहें।
कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से।
सम्भल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से।
      बाहर के दुश्मन से ज़्यादा खतरनाक घर में बैठा गद्दार होता है। देश की स्वतंत्रता को नीलाम करने के हजारों प्रयत्न होते रहे हैं। आज इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमसब यह प्रण लें कि हम देश और इसकी एक अरब से अधिक जनता की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा किसी भी कीमत पर करेंगे।
जय हिंद!           जय स्वतंत्रता!
3
उपस्थित सज्जनो! और मेरे सहपाठियो! मुझे इस स्वतंत्रता दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर आपसे कुछ कहने का मौका दिया गया है, इसलिए मैं आप सबों का आभारी हूँ।
      आजादी! इनसान तो क्या पशु-पक्षी भी आजाद रहना चाहते हैं। हमारे देश के साथ ऐसी दुर्घटना घटी कि वह सदियों तक विदेशियों के चंगुल में फँसा रहा। गुलामी कोई पसंद नहीं करता। भगतसिंह जैसे शहीदों ने कहा-
बड़ा ही गहरा दाग़ है यारों जिसका ग़ुलामी नाम है
उसका जीना भी क्या जीना जिसका देश ग़ुलाम है!
      फिर हजारों क्रांतिकारियों ने जान की बाजी लगा दी और वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बलिदान के फलस्वरूप हमें आजादी मिली और आज हम आजाद हैं। आजादी की कीमत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 7 लाख लोगों ने आज़ादी के लिए अपने प्राण गँवा दिए। आजादी अमूल्य है, इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। आजादी को हर कीमत पर हम बनाए रखें, इसी आग्रह के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
जय हिंद!           जय आजादी!
4
मेरे प्यारे देशवासियो! भारत के 66वें स्वतंत्रता दिवस पर मुझे कुछ कहने का अवसर मिला है। आज के दिन पूरे देश में खुशी और उत्साह का माहौल होता है। लेकिन जब हम आजादी के दीवानों की कहानियाँ पढ़ते हैं, तो दिल दहल जाता है। जेल में भूख हड़ताल की वजह से जतिनदास के प्राण चले गए, भगतसिंह को मात्र साढ़े तेईस साल की उम्र में फाँसी हो गई। सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, भगवतीचरण वोहरा जैसे क्रांतिकारी अंग्रेजों की हैवानियत के शिकार हुए। हजारों क्रांतिकारियों को गोली खानी पड़ी। सारे शहीद हमसे दूर चले गए। जान पर खेलकर हमें आजादी देनवाले क्रांतिकारी हमसे विदा लेते समय कहते थे-
गोली लगती रही ख़ून गिरते रहे
फ़िर भी दुश्मन को हमने न रहने दिया
गिर पड़े आँख मूँदे धरती पे हम
पर गुलामी की पीड़ा न सहने दिया
अपने मरने का हमको न गम साथियों
कर सफ़र जा रहे दूर हम साथियों।
      अब हमपर निर्भर करता है कि हम शहीदों के सपनों का भारत बनाना चाहते हैं या अहसानफ़रामोशी का सबूत बनना चाहते हैं। इस उम्मीद के साथ कि कोई तो शहीदों और उनके सपनों का खयाल करेगा, मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ। चलते-चलते भगतसिंह के वे दो नारे जो उन्होंने अदालत में लगाए थे-
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!        साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!
      बच्चों के भाषण होने से छोटे और सरल हैं ये सब! वरना आजादी पर पिछले साल साझा किए में आज भी बदलाव नहीं आया है। वन्दे मातरम् का नारा खुद को भी खास पसन्द नहीं। अब इस तरह के भाषण में आजादी का सच कैसे बयान किया जाता?

चलते-चलते

लोहिया जी ने अंग्रेजों के लिए कुछ इस तरह से कविता बनाई थी-

“दगाबाज, मक्कार, सितमगर बेईमान, जालिम हत्यारे
डाकू, चोर, सितमगर, पाजी, चले जा रहे हैं सा……।”

-भाषा के विभिन्न संदर्भ और डा राम मनोहर लोहिया से

आजादी (कविता)

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कुछ लोग कहेंगे, बकवास कविता है। कुछ कहेंगे, जब देखो रोता रहता है। कुछ कहेंगे, क्या घिसी पिटी बात दुहराकर कविता बना रहे हो। कुछ कहेंगे, बहुत कविताएँ देखी हैं ऐसी, कुछ अलग लिखो। कुछ लोग कहेंगे, क्या आजादी के दिन खुशी मनाना छोड़कर यह विलाप शुरु कर दिया। कुछ कहेंगे, चोरी की कविता है। कुछ कहेंगे, रहा नहीं गया तो कुछ छापना आवश्यक था क्या। और कुछ और कुछ-कुछ कहेंगे। फिर भी यह एक कविता है और इसे आज नहीं पाँच साल पहले पंद्रह अगस्त 2006 को लिखा था एक रास्ते से गुजरते एक लड़के ने। पता नहीं क्यों लिखा था? उसे खोजकर पूछना है कि क्यों लिखा था इसे? कोई काम-धाम नहीं था क्या? अब आप बताइए कि क्या पूछें उससे? और क्यों पूछें उससे? क्या आपको या मुझे हक है कि संगणक (कम्प्यूटर) पर चलाती अंगुलियों से और घर में बैठकर खा-पीकर आराम से  उससे यह पूछें कि किसके लिए लिखा था उसने?


अब 15 अगस्त के बहाने कुछ कह ही देता हूँ जो कहीं-कहीं से दिमाग में आ गया। 2004 में अनुमंडलाधिकारी (अंग्रेजी में एस डी एम, क्योंकि हम हर पद को अंग्रेजी नाम से ही जानते हैं) को एक पत्र लिखा था कि कम से कम दो अक्तूबर (अक्टूबर) और 15 अगस्त को किसी भारतीय को अंग्रेजी नहीं बोलना-लिखना-पढ़ना चाहिए। यह पत्र दो अक्तूबर (अक्टूबर) के सन्दर्भ में ही लिखा था, इसलिए दो अक्तूबर(अक्टूबर) कहा। अब इससे गाँधी-विरोधी लोग शत्रुता न पालें। 

सबसे प्रार्थना है कि यहाँ आकर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ मत बाँटा करें। यह स्वतंत्रता दिवस नहीं है, मेरी नजरों में। अब कितने जन सुझा जाएंगे कि मेरे मानने या न मानने से क्या होता है। यह कोई दिवस नहीं है, बस कैलेंडर में 365 दिन का 365वाँ हिस्सा है और अधिक से अधिक कुछ बच्चों को विद्यालय (स्कूल) में मुफ़्त में(लाखों विद्यार्थियों से सौ-दो सौ या इससे भी अधिक वसूले जाते हैं, यह पर्व मनाने के लिए जिसमें खूब जमकर रिमिक्स बजते हैं और फैशन-परेड होते हैं) मिठाइयाँ या कुछ भी मिल जाया करेंगी। एयरटेल-एयरसेल आदि कुछ कम्पनियाँ देशभक्ति रिंगटोन आदि बेच लेंगी और तय है कि मंच से महाप्रपंच वाले लोग खूब बोलेंगे और दावे के साथ कहता हूँ कि शाम होते-होते लाखों-करोड़ों झंडे रास्ते पर नालियों में, कचरे के ढेर में उड़ते मिलेंगे। अखबार अचानक तीन-रंगी हो जाएंगे। और सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा। या अधिक से अधिक कुछ नया हुआ तो इस बार स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन के लिए आवंटित राशि में से सरकार को सर के बल सरकाने वाले सरदार जैसे लोग कुछ अधिक नहीं बस हजार-दो हजार करोड़ का छोटा-सा घोटाला करेंगे और 16-17 अगस्त को हम और आप अखबारी कागज में हाथ पोंछते नजर आएंगे। और हाँ, कुछ लोग अंग्रेजों के शासन को आज से बेहतर बताते भी नजर आएंगे ……और इस तरह हम आज ही क्या क्या नजर आएगा, इस पर नजर डाल रहे हैं। 

बहुत बकवास हुई। अब कविता पढ़वा देते हैं-


राजधानी की सड़कों पे
15 अगस्त को
7-8 बरस के
उन बच्चों के हाथों में
एक रूपये वाले
झंडों को देखकर
समझ जाता है पूरा देश
आजादी क्या होती है ?


जब नहीं खरीदता है कोई
उनके लाख कहने पर भी
भैया ले लीजिये
चाचा ले लीजिये
बाबा ले लीजिये झंडा
तब
उनके कातर नेत्रों में
छिपे हुए खून से आंसू
जो
दिखाई नहीं पड़ते प्रत्यक्ष
कह देते हैं
इस देश का नाम
बिना कहे
और आज का दिन
यानी 15 अगस्त ।

क्या हम आजाद हैं और हैं, तो किस मामले में?

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आज से करीब दो सौ साल पहले जब अंग्रेज भारत पर अपनी शासन व्यवस्था लादना शुरु कर रहे थे तब भारत की जनसंख्या कितनी रही होगी? मुझे लगता है पंद्रह करोड़ के आस-पास जबकि उसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल थे। भारत में तथाकथित आजादी के बाद जो भी व्यवस्थाएं की गईं उनमें कोई भारतीयता नहीं थी। शुरु करते हैं- शिक्षा से। आज शिक्षा व्यवसाय है। लेकिन उस समय शिक्षक समाज का सबसे ज्यादा सम्मानित हिस्सा हुआ करता था। शिक्षा के क्षेत्र में पैसे का प्रचलन नहीं था। गुरुकुल हुआ करते होंगे। इस समय उनकी क्षमता या प्रासंगिकता मेरा आलोच्य विषय नहीं है। राजा या अमीर लोग दान देते होंगे और विद्यालय चलते होंगे। यानि हमारी शिक्षा व्यवस्था को सेवा से पेशा बनाने का काम इन अंग्रेजों ने किया जो आज पूरी तरह पेशे में बदल चुकी है। यहां तक कि सरकार के यहां भी शिक्षक अब सेवा नहीं नौकरी करता है और तनख्वाह सबसे प्रमुख विषय बन गयी।

            क्या आपने कभी सोचा है कि भ्रष्टाचार और कदाचार, परीक्षा में नकल आदि कहां से शुरु हुए हैं? मैं जहां तक समझता हूं सिर्फ़ अंग्रेजी शासन और शिक्षा व्यवस्था से। हमारे यहां पहले इस तरह नम्बरों का महत्व और परीक्षाएं नहीं होती थीं तो फिर न पैरवी, घूस और न ही नकल की कोई सम्भावना थी। घूस या रिश्वत भी भारत के मूल के नहीं हैं। यह सारी करामातें विदेशी शासन और व्यवस्था की देन हैं। एक नहीं बहुत सारे क्षेत्रों में सारी गलत व्यवस्थाएं अंग्रेजों की देन हैं।

      इसी तरह का एक क्षेत्र है चिकित्सा। कोई सोच नहीं सकता कि यह जो भ्रम फैलाया गया है कि पहले हमारी औसत उम्र 30-32 साल होती थी, यह पूरी तरह से एक जालसाजी है। कारण यह है कि पहले के अधिकांश लोगों ने अपने दादा-दादी को देखा है, उनके साथ उनके कई साल गुजरे हैं। फिर ये कैसे सम्भव है कि औसत उम्र 30 या 32 साल ही थी। आप चाहें तो किसी भी राजा या कवि को, जो इतिहास में पढ़ाये जाते हैं, देख सकते हैं। अधिकांश की उम्र ज्यादा है। उदाहरण के लिए- वीर कुंवर सिंह, तुलसीदास, कबीर, शाहजहां, चाणक्य आदि। पहले चिकित्सा क्षेत्र भी सेवा का ही हुआ करता था क्योकि कोई चिकित्सक पैसा कमाने के लिए कभी चिकित्सक नहीं बना। सबूत ये है कि आप किसी शिक्षक या चिकित्सक को नहीं जानते जो आज से दो सौ वर्ष पहले होता था और उसकी दौलत ज्यादा थी या जो अमीर था। यह दुष्टता भी अंग्रेजों के समय से आई। स्वाइन फ्लू, एड्स जैसी एक से एक खतरनाक बीमारी इस देश में कहां से आयी?
      एक क्षेत्र है कानून। जब से ये न्यायालय बने तब से मुकदमों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई और आज तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। एक फालतू पेशा शुरु किया गया था वकीलों या बैरिस्टरों का। यह अंग्रेजो का है या मुगलों का, पता नहीं। लेकिन यह पेशा झूठ के लिए ही शुरु किया गया था। यह मानव और उसकी स्वतंत्रता के अधिकार को खारिज करता है। यह मुझे गलत मालूम होता है। जब ये न्यायालय और वकील नहीं होते थे तब न्याय में बीस साल नहीं लगते थे मान लें कि मेरे और आपके बीच कुछ विवाद हुआ तो हम दोनों जाकर सब कुछ सरकार या राजा को बतायेंगे कि ये वकील? आखिर क्यों इन्हें लाया गया। वैसे भी वकील को कुछ भी बता दें सच्चाई और सबूत तो आप या मैं ही देंगे। और मेरा दावा है कि वकील सारे प्रश्नों का जवाब भी नहीं दे सकता लेकिन वादी और प्रतिवादी अपने मुकदमे या शिकायत से सम्बंन्धित सारे प्रश्नों का जवाब दे सकता है। इसलिए मेरा यह मानना है कि इन वकीलों को जान बूझकर शोषण करने के लिए कानून के नाम तैयार किया गया है। अगर आज से सौ साल पहले शिकायतों की संख्या दस हजार थी तो आज दस लाख है यानि जनसंख्या तो सिर्फ़ तीन या चार गुनी बढ़ी लेकिन शिकायतें सौगुनी या हजार गुनी तक या उससे भी ज्यादा बढ़ीं। फिर हमारे देश में संविधान निर्माताओं ने किस आधार पर इन फालतू व्यवस्थाओं को दूसरे देशों से नकल कर अपनाया?
      एक व्यवस्था है पुलिस। जब से भारत में पुलिस बनी है तब से अपराधों की संख्या में हजारों गुनी वृद्धि हुई है। पुलिस चोरों से ज्यादा अत्याचार करती है। जिस पर मन हो लाठी या गोली चलाने का अधिकार इन लोगों दे दिया गया है। कोई बता सकता है कि आजाद भारत में अभी तक पुलिस ने कितनी बार लाठीचार्ज किया है, कितनी बार अपने अधिकारों या मांगों के लिए आगे आने वाले लोगों के उपर गोली चलाई गयी है? ये संख्या बहुत ज्यादा है। अगर एक वाक्य में कहा जाय तो ऐसा कोई सप्ताह या दिन नहीं है जब इस देश में कहीं न कहीं ये सब नहीं होता। अंग्रेजों ने जो लाठी बरसाने की परम्परा विकसित की उसे इस देश में क्यों स्वीकार किया गया? सुरक्षा के नाम पर क्या दिया है पुलिस ने? अंग्रेजों की यह क्रूर व्यवस्था हमें स्वीकार नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन इसे भी भारत के न्यायविदों ने स्वीकार कर लिया।
      कितने लोग एक बात कहना शुरु करेंगे- समय बदल गया, हालात बदल गये, ये बदल गया वो बदल गया। लेकिन सत्य और न्याय कभी नहीं बदलते, ये उन्हें मालूम नहीं होता।
      एक नियम है- वन संरक्षण का। जब से यह नियम आया है पेड़ों की संख्या में लगातार कमी आयी, जंगल काटे गये। वन उजाड़-उजाड़ कर भारत ने अपने ही जीवन पर कुठाराघात किया है। भूक्षरण, जमीन का बंजर होना, वर्षा की कमी, स्वच्छ हवा की कमी, भीषण गर्मी ये सारी समस्याएं तब से बहुत बढ़ीं जब से यह कानून अंग्रेजों ने बनाया।
      भारत में गणित जिस स्थिति में आज से कुछ सौ साल पहले था या भारत का जो योगदान गणित में हुआ करता था उसकी तुलना में आज यह कितना रह गया है? क्या आप जब गणित पढ़ते हैं तब जार्ज कैंटर, बूली, न्यूटन, लेबनिज, पाइथागोरस, राफ्शन, टेयलर आदि के अलावा कितने भारतीय गणितज्ञों के नाम आपको बताये जाते हैं। और सारे क्षेत्र भले ही विवाद के विषय रहे हों या हैं लेकिन अंतरिक्ष विज्ञान और गणित में भारत की उपलब्धि कौन नहीं जानता। फिर भी क्यों सिर्फ़ यूरोपीय लोगों के नाम हमें बताये जाते हैं? ऐसी विधि भी भारत में मौजूद थी जो बिना घड़ी देखे लगभग सही समय बता सकती थी और यह विधि आज भी मौजूद है, यह तकनीक जिसमें न कोई ऊर्जा, न कोई मशीन, न कोई फैक्ट्री, न एक पैसा खर्च किस देश के पास है? फिर भी हमने अपने देश में आय-व्यय का हिसाब मिलियनों और बिलियनों में क्यों लिखते हैं?
     आयुर्वेद जैसी चिकित्सा जिसमें कोई साइड इफेक्ट नहीं है और एलोपैथी जैसी चिकित्सा जिसमें ऐसी एक भी दवा नहीं है जिसमें साइड इफेक्ट नहीं है, कौन सी बेहतर व्यवस्था है?  
      हमारी डिग्रियां आज भी अंग्रेजी नामों की ही हैं? क्यों भारत के विश्वविद्यालयों ने इन्हें ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया? ऐसा क्यों है कि संसार के किसी देश में कभी ऐसा नहीं होता कि कोई छात्र अपने देश की भाषा बोले तो उसे उसी देश का रहनेवाला शिक्षक उसे दंड दे लेकिन यह रोज भारत में कहीं न कहीं होते रहता है और गैरों की भाषा बोलने पर शाबाशी दी जाती है। हमारे विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोह मनाये जाते हैं तो सारे लोग काले रंग का चोगा पहन कर क्या साबित करते हैं?
      जब हमारी भाषा अपनी नहीं, शिक्षा अपनी नहीं, चिकित्सा अपनी नहीं, शासन अपना नहीं, न्याय अपना नहीं तो आखिर किस मामले में हम आजाद हैं? आजादी सिर्फ़ तन से नहीं होती। गाय का बछड़ा भी जब महसूस करता है तब मोटी से मोटी रस्सी वह एक झटके में तोड़ डालता है लेकिन हाथी जैसा विशालकाय और शक्तिशाली जानवर भी पतली रस्सी को नहीं तोड़ सकता अगर वह इसको समझे नहीं कि वह गुलाम है, वह चुपचाप बैठा रहता है। यही मानसिक गुलामी का उदाहरण है।
            आप गांधी जी के लिखे को पढ़ें या किसी भारतीय ( इंडियनों के नहीं) के लिखे को आप देखेंगे कि आज से सौ-डेढ़ सौ साल पहले जो अंग्रेज करते थे वे ही सारे तौर-तरीके और काम आज भी अपनाये जाते हैं। भारत में लोकतन्त्र के नाम पर क्या थोपा गया? अंग्रेजों की सरकार जिस तरीके से चलती थी एकदम वैसे ही आज भारत की सारी व्यवस्थाएं चलती हैं। उनके बनाये हुए न्यायालय और पुलिस, कलक्टर सब वैसे ही हैं। संसद तो उन्हीं की बनायी हुई है। स्कूल से लेकर अस्पताल, सड़क से लेकर जमीन तक सभी मामलों में हमने उन अंग्रेजों की ही व्यवस्था को अपनाये रखा है, यह कौन सी व्यवस्था है?
हमने विकास और लोकतंत्र के नाम पर नकल और नकल के अलावे कुछ नया नहीं किया। आज भी जो भारतीय दंड संहिता है वह अंग्रेजों द्वारा 1860 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शुरु होने के बाद यानि 1857 के बाद लोगों और क्रान्तिकारियों पर अत्याचार करने के लिए बनायी गयी थी। कितने शर्म की बात है जिस कानून से हमारे क्रान्तिकारी और देशवासी कुचले जाते थे वे सारे कानून हमने अभी लागू कर रखे हैं। कहा जाता है कि हमारे संविधान को बनानेवाले बहुत विद्वान और महान लोग थे, फिर ऐसा क्यों हुआ कि वे कोई मौलिक या उच्च स्तरीय व्यवस्था नहीं दे पाये। नकलची लोगों को न तो महान कहा जा सकता है न कोई क्रान्तिकारी। कुछ डिग्रियां और कागजी प्रमाण-पत्र किसी को विद्वान और महान नहीं बना सकते और यह महान या विद्वान समझने की परम्परा भी अंग्रेजों ने ही दी है। हमने इस कृत्रिमता को क्यों स्वीकार किया? जब व्यक्ति सामने है फिर भी उससे क्यों उसका प्रमाण-पत्र मांगा जाता है। यह तो अंग्रेजों के जमाने में हुआ करता था ताकि किसी तरह से भारत के लोगों को ऊंचे पदों पर न पहुँचने दिया जाय। हमने प्रतियोगिता परीक्षाओं की व्यवस्था भी उन्हीं की अपना रखी है। काम चपरासी का हो तो भी अंग्रेजी में आवेदन मांगे जाते हैं। प्रश्न पूछे जाते हैं भूगोल और भौतिकी के। बहाना सामान्य ज्ञान का। जिन लोगों के पास कोई ज्ञान नहीं वे दूसरों के सामान्य ज्ञान की जांच करते हैं। एक उदाहरण देखिए भारतीय प्रशासनिक सेवा का। यह सेवा अंग्रेजों की बनायी हुई है। भारत में किया क्या गया, बस इतना ही कि परीक्षा का माध्यम कुछ और भाषाओं को बना दिया गया। दो विषयों की परीक्षा होती है औ वे विषय प्रशासन से कोई संबन्ध नहीं भी रख सकते। केवल सैद्धान्तिक सूचना जिन्हें भ्रमवश ज्ञान कहा जाता है, रखने से आप किसी योग्य नहीं बन जाते या दस मिनट के नौटंकी के साक्षात्कार से आपकी जांच दुनिया का कोई इंसान नहीं कर सकता। साक्षात्कार एक ऐसी परीक्षा पद्धति है जिसमें आपकी योग्यता दूसरे की नजर से तय होती है। किसी भी फालतू प्रश्न को आपसे पूछा जा सकता है। और जवाब सही है या नहीं, ये मायने भी नहीं रखता। महत्व इस बात का है कि आप प्रश्न पूछने वाले को पसंद आये या नहीं, उसने आपके उत्तर से सहमति रखी थी या नहीं। अब कोई यह बताये कि इस परीक्षा में अभ्यर्थी की योग्यता की जांच होती है क्या?
और इस परीक्षा में अंग्रेजों के समय में माध्यम ही अंग्रेजी थी और सिर्फ़ शोषक किस्म के लोग इसमें जाते थे, वे अक्सर अंग्रेज ही होते थे। आज भी इस परीक्षा का माध्यम नाम के लिए हिन्दी या अन्य भाषाएं हैं, अंग्रेजी की परीक्षा अनिवार्य है।  
इन सब चीजों को देखकर तो यही कहना है कि कौन सी व्यवस्थाएं हैं ये? क्या हम आजाद हैं और हैं तो किस मामले में?