रामशलाका के बाद अब अन्ना शलाका

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तो यह है अन्नाशलाका। तुलसीदास की रामशलाका तो आपने सुनी होगी। अब इस अन्नामय माहौल में जरा अन्नाशलाका भी देख लीजिए।

अन्ना शलाका का हर वर्ग नीचे की नौ चौपाइयों से संबद्ध है, जिसमें आपके लिए एक सुझाव छुपा हुआ है।  अन्ना का स्मरण कर आँखें मूंदकर (खोलकर भी चलेगा) किसी भी ख़ाने पर उंगली रखें। ध्यान रहे अंगूठा नहीं। फिर उस वर्ग यानि खाने से आगे नवें खाने पर जाएँ। उस खाने में लिखे वर्ण या शब्दांश को लिख लें या याद रख लें। मात्रा भी ठीक से ध्यान रखें। जैसे के बाद आए तो इसका अर्थ का होगा। यह नवें खाने तक जाने का क्रम तब तक जारी रखें जब तक आप शुरु के खाने तक (जिसे आपने शुरु में चुना था) वापस आ न जाएँ। यह काम पूरी श्रद्धा के साथ करें वरना फल खट्टा भी हो सकता है
अन्ना शलाका



अब आपने चौपाई तो लिख ली है या याद रख लिया होगा। अब फल भी देख लीजिए।

1) भ्रष्ट जनों की सुनो कहानी । एक दिन सबने मन में ठानी॥
उत्तर: कहानी पूरी सुन लीजिए।
2) लोकपाल  बनवाएंगे  हम । उसे  पकाकर  खाएंगे  हम ॥
उत्तर: जल्द ही बनेगा भाई। देखने को तैयार रहिए।
3) चार जनों ने शोर मचाया । अन्ना  को  सबने  पगलाया।।
उत्तर: बस आप ठीक रहिए। वे चारों बड़े चालाक किस्म के जंतु हैं।
4) अनशन पर बैठे तब अन्ना।  उनकी पूरी हुई तमन्ना॥
उत्तर: अनशन के चित्र और खबर बगल के चाय-बिस्कुट वाले के यहाँ अखबार में देख लीजिए।
5) दिखता चारों ओर तमाशा। कहीं निराशा कहीं हताशा॥
उत्तर: कहानी जारी है। निराश न होइये।
6) आगे तब नेताजी आए। अन्ना मन ही मन मुस्काए॥
उत्तर: जल्द ही अन्ना मुस्काएंगे। बस थोड़ा सा इन्तजार कीजिए।
7) लोकपाल बन जाएगा अब। अब देखेगी जनता करतब॥
उत्तर: लीजिए लोकपाल बन गया। जनता के साथ करतब देखिए।
8) एक शिकायत अब है आई। देखो क्या होता है भाई॥
उत्तर: क्या होगा। अन्दाजा लगाइए।
9) पता चला अब इनका नाता। लोकपाल विधि, वही विधाता॥
उत्तर: लीजिए, यह भी तीर बेकार गया। सारा खर्चा और चिल्लाना बेकार। शोक मनाइए।
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देख तमाशा अनशन का

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अनवरत पर इस लेख को पढ़ा तो टिप्पणी लिखते-लिखते यह लेख लिख दिया।

अन्ना से सरकार की अनबन और अन्ना के अनशन का खेल रोज दिख रहा है। तानाशाही तरीका अपनाना कहीं से न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। अन्ना के साथ जो हुआ, वह निश्चय ही ठीक नहीं लेकिन कुछ सवाल और समस्याएँ तो हैं ही।
मोमबत्ती जलाने से कुछ होगा? यह तो एक नकल मात्र है। दिवाली के दिन दिये कम नहीं जलते। और लोगों को एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि क्या अन्ना इतने प्रसिद्ध नहीं होते तब उनके साथ यही व्यवहार किया जाता? यानि आप किसी बात के लिए अनशन करेंगे तो आपके साथ सरकार और पुलिस इतने आदर से पेश आएंगे। आदर का अर्थ कि सरकार ने अन्ना को परेशान तो बिलकुल नहीं किया। जतिन दास जैसा आदमी मर जाता है लेकिन कुछ लोग अन्ना को न मरने देंगे, न खुद जाएंगे। अन्ना को आगे भेज कर अर्जुन जैसे कायर किस्म के लोग महाभारत का कौन सा हिस्सा लिख रहे हैं? मरें अन्ना, अनशन करें अन्ना और रेमन मैगसेसे किसी और को।

राष्ट्रपति तो इस देश में बनाई गई है सिर्फ़ इसलिए कि दिखाया जा सके कि एक महिला को भारत में राष्ट्रपति बनाया गया है। चुप रहने की कला सिखाने के महान शिक्षक हमारे प्रधानमंत्री और हमारी राष्ट्रपति तो मौन धारण करने वाले लोग हैं।
जितने लोग शोर मचा रहे हैं, उनमें से कितने को पता है कि वे क्यों शोर मचा रहे हैं? यानि शोर मचाने वाले तो लालू, नीतीश से लेकर कुम्भ के मेले तक की सभा में संख्या और शोर दिखा जाते हैं। उनमें से अधिकांश घूस लेते और देते हैं, फिर भी अच्छा है।
अन्ना जो मांग कर रहे हैं, उससे वास्तव में लोगों के बीच एक गलत संदेश जा रहा है। लोकतंत्र के लिए कुछ तो समस्या होगी ही। यद्यपि मैं लोकतंत्र को पसन्द नहीं करता। लेकिन क्या अपनी बात मनवाने के लिए हर किसी को अनशन नामक हथियार इस्तेमाल करने का रास्ता अन्ना ने नहीं दिखा दिया? अब तो जब चाहें लोग हल्ला कर के कानून बनवाना चाहेंगे। दूसरा गाँधी का लेबल चिपका कर घूमने वाले अन्ना का कहना है कि भ्रष्टाचार खत्म कर लेंगे इस कानून से। मूर्खतापूर्ण मांग से हो सकता है यह? मांग में रेमन मैगसेसे की बात क्यों अनिवार्य है या नोबेल की बात भी? और जब देश के प्रमुख को भी किसी कानून के दायरे में लाया जाय, उसे प्रमुख कैसे कहें? और क्या यह एक चक्र नहीं है जिसमें जनता-अधिकारी-नेता-मंत्री-प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति उलझे हुए हैं?

यानि आपको अपने देश के प्रमुख पर इतना संदेह है कि उसके लिए इस तरह की सीमा तय कर रहे हैं। और जब सीमा है तब प्रमुख और प्रथम नागरिक कैसे हुए ये? इन पदों को समाप्त कर दिया जाय।

सरकार की दमनकारी कोशिशें बिलकुल दुखद हैं। लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अन्ना की प्रसिद्धि और इतिहास के साथ अनशन से हिंसा का रास्ता साफ हो रहा है।

और वैसे भी कानून क्या कम हैं पहले से? एक और विभाग खोलने के लिए इतना शोर। और जब अनशन जैसा बड़ा हथियार अपनाया गया है तो कुछ अच्छी और प्रमुख रचनात्मक मांगें रख लेनी चाहिए। लेकिन किसी पार्टी के लोग झगड़े नहीं, इसका ध्यान रखते हुए भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार हो रहा है। भ्रष्टाचार एक समस्या है लेकिन वही एक समस्या नहीं है। यह समस्या पूँजीवाद के रहने तक बरकरार रहेगी ही। क्या कोई कह सकता है कि हत्या के लिए फाँसी और आजीवन कारावस जैसे दंड तय हैं फिर भी आतंकवाद और हत्याएँ बन्द हो गयी आज तक? यह सोचने पर पता चलेगा कि नाव में छेद होगा तब तो डूबना तो है ही चाहे जितना पानी निकालो और जैसे भी निकालो।
अब जरा सरकार की सुनें तो कुछ अलग ही सामने आता है। अनशन की इजाजत देने का अर्थ क्या है? अगर कोई आपको मरने की इजाजत दे तब इसे क्या समझें?
जो लोग मानते हैं कि जन लोकपाल बिल की जीत होगी (जनता की नहीं), उन्हें ध्यान रखना होगा कि सरकार के पास सांसद हैं और कानून बनाते तो वे ही हैं। चाहे कानून कुछ ऐसा बने
सभका  खातिर  एक  बा,  भइया  ई  कानून।
साँझे  छूटल जे  कइल,  भोरे  दस  गो  खून॥
हिन्दी अर्थ:  
    सबके  लिए  समान  है,  भैया  यह  कानून।
रिहा हुआ वह शाम जो, सुबह किया दस खून॥
अगर सरकार अन्ना के बिल को संसद में लाती है, तब क्या होगा? ज्यादा मत तो सरकारी लोगों का ही होगा। और सरकारी लोकपाल बिल ही बनेगा। और अगर सरकार लोगों को देखते हुए सरकारी लोकपाल नहीं बनाती है, तब फिर जनता से यह पूछा जाय कि 120 करोड़ लोगों के एक प्रतिशत एक करोड़ बीस लाख के बीस प्रतिशत चौबीस लाख लोग भी इसके लिए आन्दोलन रत हैं, तब? मतलब देश में जिस बात के लिए एक प्रतिशत लोग भी हल्ला नहीं मचा रहे उस कानून को क्यों बनाया जाय। यहाँ राम मन्दिर के मुद्दे पर 25 लाख तो सक्रिय हो जाते हैं लेकिन दिमाग से किसी आन्दोलन में पच्चीस हजार लोग भी मुश्किल हैं। पिछलग्गू लोगों के शोर में और आन्दोलन में फर्क होता है।
सबसे बड़ा सवाल है कि क्या सोचकर इस देश की जनता ने भले ही वह बीस-तीस या पचास प्रतिशत ही रही हो इन लोगों को संसद में पहुंचाने से बाज न आयी।
वैसे एक सवाल और परेशान करता है कि भारत की यह जनता 65 सालों तक किस गुफ़ा में छिपी हुई थी। अद्भुत क्षमता है सहने की और झेलने की यहाँ की जनता में। भारत में पहले भी गुलामी झेला और फिर 65 साल। तो और झेल ही लेंगे शायद।
यह अन्ना पहले कहाँ थे? जब वे पिछसे 40 सालों से सामाजिक कार्यों में हैं तो बस कांग्रेसी शासन के समय अनशन का क्या अर्थ है? यह कोई जवाब नहीं कि 2010 में बड़े घोटाले हुए इसलिए। इसका मतलब तो इतना ही है कि जब तक कोई बड़ा घोटाला न करे, तब तक झेल सकते हैं यहाँ के लोग।
      अन्त में एक बात। आप कह सकते हैं कि मैं ऐसा बार-बार सोचता हूँ। टीवी पर आप चाहे चिदम्बरम का, चाहे प्रणव का, चाहे कपिल का, चाहे लोकसभा-राज्यसभा में मनमोहन का, अरुण जेटली का, हामिद अंसारी का इन दिनों सुनें तो मालूम हो जाएगा कि देश की जनता के कितने लोग इनकी बातों को समझ पाते हैं!
इससे सम्बन्धित एक लेख  पहले भी लिखा था।

दोलन बन गया बाबा रामदेव का आंदोलन

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पिछले आलेख में मैंने लिखा था कि बाबा रामदेव के साथ क्या-क्या हो सकता है। लेकिन वह आलेख सभी बातों और संभावनाओं को ध्यान में रखकर लिखा गया था। मेरे मन में तो पहले से ही था कि बाबा का यह अनशन बेकार होनेवाला है और आखिरकार पुलिस ने बाबा और उनके साथियों को समझा दिया कि अंग्रेजों से लड़ने का मतलब क्या होता है?

एक बड़ी प्रसिद्ध उक्ति मैंने आज से कई साल पढ़ा था कि एक गुलाम आजादी इसलिए चाहता है ताकि वह भी मालिक बन सके और दूसरों को गुलाम बना सके। यही बात कांग्रेस के साथ भी हो रही है। कांग्रेस ने कभी दूसरों को गुलाम बनाने की छोड़कर कुछ सोची नहीं और भाजपा ने सिर्फ़ ढोल पीटे हैं, कुछ किया नहीं।

      जो पचास-साठ हजार लोग रामलीला मैदान में इकट्ठे हुए थे उनमें से किसी को यह समझ नहीं आया कि अनशन क्या है और यह कब किया जाना चाहिए? मैं अपने आपको बड़ा विद्वान नहीं कह रहा हूँ लेकिन सरकार की चालबाजियों और इतिहास से सीखने की जरूरत तो निश्चय ही सबको होनी चाहिए और इस वक्त कम से कम बाबा को तो होनी ही चाहिए। अब बाबा का ही पता नहीं कि उन्हें कहाँ रख दिया गया है। उनके समर्थकों को चिन्ता ने घेर लिया होगा। मैं यह नहीं कह रहा कि बाबा की मांगें उचित नहीं है लेकिन रणनीति का सर्वथा अभाव है बाबा और उनके साथियों में, यह तो मुझे तभी से लग रहा है जब से बाबा ने घोषणा की थी कि वे अनशन करेंगे। अब आन्दोलन सिर्फ़ दोलन रह गया है और रामलीला मैदान में सब कुछ बिखर गया है।
      तथाकथित आजाद भारत में किसी को इतना भी अधिकार नहीं है कि वह इस तरह के अनशन करे लेकिन यह बात बाबा को समझ आती ही नहीं और दुर्भाग्य ये है कि कोई उन्हें समझाता भी नहीं। भाजपा जैसी पार्टियों को इसी तरह के माहौल की तलाश रहती है। खुद जब छह साल शासन में रहे तो कुछ खयाल नहीं आया लेकिन शासन से बेदखल होते ही नौटंकी शुरु कर दी। संन्यासी होने की वजह से सरकार ने कुछ नरमी भले दिखाई हो लेकिन अब तो बाबा की हालत और समझ दोनों बिगड़ी हुई हैं।
      मैं एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि अंग्रेजों की तरह रहने वाले और अंग्रेजी के चरण चाटुकार ये नेता और मंत्री, प्रधानमंत्री अंग्रेजी और अंग्रेजियत के खिलाफ़ हो जायें यह कैसे संभव है? तो जो लोग दिल्ली चलो की तर्ज पर जाकर भीड़ लगाए हुए थे उन्होंने अपने जीवन से कितनी अंग्रेजी को निकाल दिया था? गाँधी जी ने जिस बहिष्कार का शक्तिशाली हथियार अंग्रेजों के खिलाफ़ इस्तेमाल किया था उसका इस्तेमाल करना आज के समय में संभव नहीं है? मैं कहता हूँ बिलकुल संभव है। लेकिन उसके लिए तरीका बदलना होगा। जो लोग बाबा के समर्थक हैं उनको अपने घर-परिवार, रिश्तेदार, दोस्त सबके सात मिलकर यह ठान लेना होगा कि वे अंग्रेजी के बिना चलेंगे। कम से कम यह तो उनके अपने अधिकार क्षेत्र में है लेकिन अनशन जैसे तरीके से यह संभव नहीं हो सकता। क्योंकि भीख मांगने से अन्तत: भीख और दुत्कार ही मिलना संभव है।
      भारत स्वाभिमान को लगभग डुबा दिया बाबा और उनके साथियों ने। पहले यह मान लेना होगा कि भारत सरकार(अभी कांग्रेस सरकार) हर तरह से अंग्रेजी सरकार है। और अगर इसके खिलाफ़ जाना है तो सही तरीके से चलना होगा न कि आवेश में आकर तमाशे करने से। लोग अपने घरों से अंग्रेजी, अपने मन से अंग्रेजी निकालें, बहिष्कार का महामंत्र हमारे पास है, उसका इस्तेमाल करें न कि भीड़ लगाकर मदारी का खेल दिखाएँ। अभी भारत में अंग्रेजी और अंग्रेजी व्यवस्था के पक्षधर इतने हैं कि आप इन तरीकों से कुछ हासिल नहीं कर सकते। आपको बहिष्कार, बहिष्कार और बहिष्कार ही अपनाना होगा। आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं जो शासक अपना सारा काम अंग्रेजी में करते हैं, दिन भर अंग्रेजी बोलते हैं, रात भर अंग्रेजी बोलते हैं, पचास सालों में जिन्होंने पचास पन्ने भी किसी अन्य भारतीय भाषा में लिखे न होंगे वे दो दिन के अनशन से अंग्रेजी का खात्मा कर देंगे। जर्मनी और तुर्की का उदाहरण देने से पहले आप इतना याद रखें कि दोनों ने शासन में आकर जर्मन और तुर्की को देश की भाषा बनाई थी। अगर आप चाहते हैं कि आप बिस्मार्क बनें, कमाल पाशा बनें तो आपको शासन करना होगा। वैसे भी सुभाष चन्द्र बोस कहा करते थे कि भारत में आजादी के बाद पंद्रह सालों तक तानाशाही की जरूरत है लेकिन वे नहीं जानते थे कि यही पंद्रह साल भारत को कितना नुकसान पहुँचाएंगे। भारतीय इतिहास में जितनी भी गलतियाँ होती रहीं उनसे बाबा और उनके साथियों ने कुछ न सीखा।
      लेकिन बेवकूफों ने यहाँ दुखी दिवस यानि डे मनाया है, कोई अक्लमन्दी नहीं की है। अभी-अभी एक चर्चित वेबसाइट के संपादक द्वारा यह निवेदन पढ़ा कि आप लोग आज काला दिवस यानि ब्लैक डे मनाएँ। मतलब मूर्खता का प्रदर्शन करते रहें। भले वे अपने आपको एक जिम्मेदार नागरिक मानते रहें लेकिन यह सब दिखावे फेसबुक, आर्कुट, ट्वीटर जैसी घटिया साइटों पर होते रहें, यह मांग क्या बता रही है? यहाँ यह डे मनाने की परम्परा जो एकदम फालतू की है अंग्रेजी तरीके से ही आई है। मैं पूछता हूँ कि डे मनाने से, दुख मनाने से क्या होगा? यह नौटंकी होती रहेगी और एकदिन कांग्रेस फिर देश में शासन करेगी। सेना यानि भारतीय सेना भी कम दोषी नहीं है। आप मंगल पांडे का नाम लेते हैं, लेकिन कभी सोचा है क्यों? इसलिए क्योंकि वे खुद सेना में थे और अंग्रेजी सरकार का विरोध किया था। लेकिन भारतीय सेना को भारत में बहुत महान और देशभक्त माना जाता है। लेकिन यह सेना नहीं अंग्रेजों की भारतीय सेना है, गुलाम सेना है। यह वही करती है जो शासक सरकार कहती है। अब यहाँ यह सोचने की फुरसत अभी नहीं है कि अनुशासन का डंका बजाने लगा जाय। भारत में अगर सेना को लगे कि सरकार उसे गलत आदेश दे रही है तो उसे सरकार के खिलाफ़ जाना चाहिए। मरते कौन हैं, सिर्फ़ सिपाही लेकिन हँसता कौन है नेता या सेना का बड़ा अधिकारी। लेकिन ये सेना गुलामी को छोड़ नहीं सकती और अपने आपको बड़ा देशभक्त मानती है। सेना का मतलब होता है देश की रक्षा और भले के लिए लड़नेवाला न कि भ्रष्ट लोगों की रक्षा के लिए जान देनेवाला। यह बात मैं क्यों कह रहा हूँ, इसलिए कि भारत सरकार और अंग्रेज सरकार हमेशा सेना और पुलिस के दम पर हीरो बन जाती है और जनता मुँह ताकती रहती है। बाबा पर पुलिस की सहायता से फिर धावा बोला गया है और इस घटना में और 1947 के पहले की घटना में कोई फर्क नहीं है। इंदिरा गाँधी के घोर अत्याचारों के बावजूद और कांग्रेस के पिछले(2004) कार्यकाल में कुछ नहीं करने के बावजूद फिर से कांग्रेस की सरकार बनाने वाली जनता का भरोसा कहीं से करने लायक नहीं है। कुछ लोग शोर मचाएंगे कि अगली बार सरकार बदलनी होगी। लेकिन जिन लोगों के पास सरकार बदलने की ताकत है वे खुद क्यों नहीं बहिष्कार पर उतर जाते हैं, यहाँ मुँह ताकने का भी रिवाज हो चला है। कोई आन्दोलन करे तो भीड़ होती है लेकिन फायदा कुछ नहीं। अनशन में जिन गाँवों से, शहरों से लोग आए थे वहीं क्यों नहीं बहिष्कार हो रहा है सरकार का। क्रान्ति भीड़ लगाने से नहीं घर-घर में विचारों पर अमल करने से होती है।
      बाबा के शिविर में पैसे भी बहाए गए हैं। गाँधी जी के सिद्धान्तों की दुहाई देनेवाले बाबा का काम करने का तरीका कुछ अजीब हो रहा है। अपने ही हाथों अपने पूरे भारत स्वाभिमान को खत्म कर डालना आत्महत्या से कम नहीं है। नेतृत्व इतना आसान नहीं होता, यह बात बाबा को समझ आएगी या नहीं? नेता बनना आसान है लेकिन जनता का नेता बनना, गाँधी बनना, जयप्रकाश बनना उन्माद नहीं एक कुशल रणनीति है। योग की परिभाषा ही है योग: कर्मसु कौशलम्। लेकिन बाबा में न कुशलता है और सही तरीका(कर्म)  है फिर कैसा योग है ये। अन्त में आप याद रखें कि 1857 की क्रान्ति को किस तरह अंग्रेजों ने कुचला था और फिर 90 साल तक लड़ाई लड़नी पड़ी। और इस हिसाब से यह मत मानिए कि कांग्रेसी(अंग्रेजी) शासन को आप 2014 में ही खत्म कर डालेंगे। जब अंग्रेज सिर्फ़ ढाई लाख सैनिकों के दम पर भारत को 90 साल तक गुलाम बना सकते हैं तो आज तो भारत में सैनिकों और पुलिस की संख्या 40-50 लाख होगी। अनुपात बढ़ चुका है। 1947 में 40 करोड़ लोग थे और आज 121 करोड़ हैं लेकिन सैनिक तीन गुनी नहीं पंद्रह गुनी है। यह सेना कभी भी भोपाल गैस कांड के दोषी पर धावा नहीं बोल सकती, अमेरिका जूते चाटने को कहे तो सरकार वो भी चाट सकती है लेकिन एक अहिंसक आन्दोलन को ऐसी बेरहमी से दबा जरूर सकती है। आपको बता दूँ अभी चार-पाँच दिन पहले कपिल सिब्बल लंदन जानेवाले थे। किसी विश्वविद्यालय से भारत के साथ संबंध को पाँच साल और बढ़ाने के लिए। लंदन और अमेरिका के चमचों से कुछ भी उम्मीद करना बेकार है।
      आप जब क्रान्ति की बात कहते हैं तब लोग कहते हैं कि यह बेवकूफ़ी है। और क्रान्ति और बेवकूफ़ी दोनों में थोड़ा सा ही अन्तर है। क्रान्ति में जब बुद्धि साथ देना छोड़ दे तब बेवकूफ़ी ही होती है।
      

लालू और नीतीश की तरह बेवकूफी कर रहे हैं बाबा रामदेव

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निस्संदेह बाबा रामदेव दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाले लोगों में से एक हैं या संभव हो सबसे तेजी से बढ़ने वाले ही यही हों। कोई आदमी अभी तक इस रफ़्तार से न तो अमीर बन सका है और न ही किसी के आन्दोलन के शुरुआत में ही इतने लोगों ने किसी का साथ दिया है। लेकिन अभी ठीक उसी तरह की बेवकूफी यह कर रहे हैं जैसी बिहार में लालू और नीतीश करते रहे हैं। कहने का मतलब यह कि इन सभी के पास जो जनसमर्थन था या है, वह इन सबको इतिहास के निर्माताओं में जगह दिला सकता था। लेकिन बिहार में लालू और नीतीश दोनों नशे में चूर हो गए और इन्होंने अपने अल्पकालिक लाभ या सनक के लिए अपना सुंदर भविष्य एकदम नष्ट कर डाला। जब तक घटना घट रही होती है या समय गुजर रहा होता है, सभी हल्ला मचाते हैं लेकिन इतिहास उपलब्धियों और हारों का होता है, युग-निर्माताओं का होता है, युद्धों का होता है।


अब बात करते हैं बाबा रामदेव की।

बाबा ने भारत स्वाभिमान नाम से जो संगठन राजनीति में उतरने के लिए शुरु किया उसे अपने इस सत्याग्रह से वे हमेशा के लिए खत्म हो जाने का एक आसान और बेवकूफी भरा रास्ता खुद ही प्रदान कर रहे हैं। बाबा के भारत स्वाभिमान संबंधी घोषणापत्रों को पढ़ने से ऐसा लगता था कि देश में एक अच्छी शुरुआत हो रही है। 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय बाबा ने किया था। उन्होंने खुद चुनाव लड़ने से इनकार किया था और किसी पद पर आसीन होने से भी।

अन्ना हजारे के अनशन ने बाबा का माथा घुमाया और बिना आगा-पीछा देखे इन्होंने भी अनशन की घोषणा कर दी। भले ही वे कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री समेत सभी प्रमुख शासकों से अपनी बात कहने और किसी के द्वारा किसी तरह के कदम नहीं उठाने से नाराज होकर वे अनशन पर बैठ रहे हैं। आज से वे अनशन पर बैठेंगे। जनता की कमी तो नहीं है जो उनका समर्थन करेगी और न ही उनकी माँगों में कोई ऐसी माँग है जो देश का अहित करेगी। लेकिन इस अनशन का समापन समारोह कैसा होगा, इस पर जरा विचार करते हैं।

अनशन के अन्त में तीन चीजें संभव हैं:-
पहला कि अनशन के अन्त में सरकार झुक जाए और बाबा की सभी बातों को मान लेने की बात कह दे। भले ही बाद में आनाकानी करती रहे या सभी मामलों को सरकारी परम्परा के हिसाब से लटकाती रहे।

दूसरा कि अनशन के अन्त में सरकार इनकी बात न माने और जैसा कि बाबा का कहना है वे अनशन जारी रखेंगे और एक दिन मर जाएंगे। यह अनुमान थोड़ा गलत हो सकता है।

तीसरा कि सरकार और बाबा दोनों संसार की सबसे घटिया नीति समझौता का सिद्धान्त अपनाते हुए जनता के साथ धोखा करें।
शायद एक और संभावना है कि जयप्रकाश नारायण के साथ या जतिनदास के साथ जो अन्याय किया गया और गिरफ़्तार कर के यातनाएँ दी जाएँ वही तानाशाही रवैया अपनाया जाए। यह भी संभव है, यह बात जरूर ध्यान देंगे और यह लोकतांत्रिक तानाशाही का अच्छा नमूना हो सकता है जैसा कि इंदिरा गाँधी ने जयप्रकाश के साथ किया था। लोग लाख कह लें कि इंदिरा अच्छी प्रधानमंत्री थीं लेकिन एक अहिंसक आन्दोलनकारी को वह भी उसे, जिसकी तुलना में खुद इंदिरा कुछ नहीं और सबसे बड़ी बात कि तथाकथित आजाद भारत में जो यातनाएँ दी गईं उनमें और हिटलर के यातना शिविर वाली घटना में कोई अन्तर नहीं।
अब पहले अनुमान को ध्यान से देखते हैं, तो लगता है कि यह आसान है और कम-से-कम सरकार के लिए तो है ही। अन्ना का उदाहरण एकदम नया है। बाबा से कहा जाय कि उनकी सभी मांगों को मान लिया जाएगा, वे अनशन समाप्त कर दें। अगर बाबा की बात मान ली गई, तो कांग्रेस को हराने का और भारत स्वाभिमान को अगली बार जिताने का बाबा का सपना एकदम मिट्टी में मिल सकता है।

वैसे भी अगर आप राजनैतिक दृष्टि से देखें तो यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि जिन उद्देश्यों को लेकर आप अगली बार चुनाव लड़ेंगे उन्हीं के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं और वह भी जिस पार्टी के खिलाफ़ शोर मचाते रहे हैं( और मचाने लायक है भी क्योंकि कांग्रेस लगभग 51 सालों तक शासन में रही है), उसी के सामने । कोई बुद्धिमान आदमी यह सोच भी कैसे सकता है! अंग्रेजों के सामने हम मांग करें कि शासन में तुमलोग ही रहो और मेरी मांगें पूरी कर दो, तो इस काम को तो देश के लोग बड़े निंदा की दृष्टि से देखते हैं। पूर्ण स्वराज्य की मांग की जगह यह घटिया मांग और इसके लिए सत्याग्रह, सत्याग्रह का ही अपमान है। तो किस कारण से हम इस अनशन को उचित ठहरा रहे हैं?

सरकार के खाते में यह बात वैसे ही हो जाएगी कि सरकार लोकतांत्रिक है और मांगों को मान लेती है। फिर तो अगली बार बाबा राहुल का राज्याभिषेक करते नजर आ सकते हैं।

यहाँ यह बता दें कि बाबा के भारत स्वाभिमान की योजना के तहत पचास लाख करोड़ रूपये भारत के सभी क्षेत्रों के विकास के लिए पर्याप्त हैं। एक और बात परेशान करती है कि कैसे चार सौ लाख करोड़ रूपये की बात हो रही है जबकि 2011 तक सारी योजनाओं को मिलाकर केंद्र और राज्य दोनों सरकारों का कुल खर्च 3-400,00000,0000000 है ही नहीं तो इतने पैसे की बात कहाँ से आ गई?

अब दूसरा अनुमान मैने किया है कि अनशन के अन्त में जतिनदास(भगतसिंह के साथ जेल में भूख-हड़ताल में शहीद) वाला हाल हो सकता है। बाबा को छोड़कर कोई दूसरा चेहरा ऐसा है ही नहीं जो आन्दोलन को आगे ले जा सके। अगर बाबा को कुछ हो गया या वे चल बसे तो क्या होगा इस आन्दोलन का?

तीसरा अनुमान मैंने लगाया था कि अगर बाबा और सरकार दोनों समझौता कर लें तो? बाबा की जिद्द देखते हुए संभव है कि यह बात घटे नहीं। लेकिन सरकार तो सरकार है भाई।

चौथे अनुमान के बारे में खुद ही अन्दाजा लगा लें।

अब एक बात जो मुझे एकदम अखरती है। जिस बाबा को मालूम भी नहीं था कि स्वदेशी क्या है और काला धन कहाँ है और यह होता क्या है, आज वही बाबा उस आदमी का नाम तक अपनी जबान से न तो लाते हैं और न ही वह आदमी उनके किसी प्रचार सामग्री में दिखता है। राजीव दीक्षित के कैसेटों से सुनकर बाबा ने सब सीखा और समझा था लेकिन पटना में ही बँटने वाले पर्चे को देखिए। कहीं राजीव दीक्षित नहीं हैं। लेकिन बालकृष्ण हर जगह हर पर्चे पर मिलते हैं। बालकृष्ण क्यों बाबा के लिए आवश्यक हैं? सिर्फ़ पतंजलि के आयुर्वेद विभाग को संभालना उनके लिए देश के लिए कौन सी बड़ी उपलब्धि है कि हर जगह नजर आते हैं।

दूसरी बात (हो सकता है कि ऐसा सोचने में मुझे ही दोष दे), पटना में बँटने वाले पर्चे पर रामप्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह, महाराणा प्रताप, चन्द्रशेखर आजाद, नेताजी, शिवाजी, इन सभी लोगों से बड़ी तस्वीर बाबा और अनावश्यक बालकृष्ण की है। शायद इन सभी लोगों से आगे हैं बाबा! अब जरा सोचिए कि सत्याग्रह शब्द ही गाँधी जी का है। अनशन वाला ब्रह्मास्त्र गाँधी जी का ही है, स्वदेशी का विशद चिन्तन भी गाँधी जी का है फिर भी गाँधी जी नदारद हैं।

मेरी समझ से एक अच्छे और बड़े आन्दोलन को घटिया तरीके से बरबाद करने का यह काम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने जैसा है। और अन्त में, मैं भविष्यवक्ता और भगवान नहीं हूँ।