मुझे इतिहास का ज्यादा पता नहीं, भविष्य में इसपर कुछ अध्ययन और सम्भव हुआ तो शोध का विचार है लेकिन इस बार आपको एक बहुत बड़े विद्वान और आलोचक रामविलास शर्मा की कही बात पढ़वा रहा हूँ, जो निश्चित रुप से सोचने को मजबूर करती है। यह एक साक्षात्कार का अंश है जो आप यहाँ पढ़ सकते हैं। आप यह साक्षात्कार अवश्य पढ़ें क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण है।

एक तो मैंने जब से होश सँभाला, यही सुनता आया हूँ कि एक थे आर्य, एक थे द्रविड़। आर्य अक्रांता थे, द्रविड़ों को खदेड़ा था। आज भी आर्य भारत अलग है, द्रविड़ भारत अलग। तो मैं सोचा करता था, क्या यह वाकई ऐसा है? क्या आर्य सचमुच बाहर से आए थे? दूसरे, यह कहा जाता था कि हिंदी में तो इतनी बोलियाँ हैं और सब एक-दूसरे से जुदा-जुदा तो हिंदी एक भाषा कैसे रही? देश एक कहाँ है…? मुझे लगा कि इन प्रश्‍नों को सुलझाया जाए। हिंदी बोलने वाले हम इतने सारे लोग हैं। भाषा-संबंधी देन भी हमारी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन कुछ गलतफहमियों के सहारे उन्हें नकारा जाता था और हममें हीनता पैदा की जाती है। मैंने पहले तो यही देखा कि क्या आर्य वाकई बाहर से आए थेमैंने पायाऔर इसे सभी भाषाविज्ञानी मानते हैं, कोई विवाद नहीं इसमेंकि सघोष महाप्राण ध्वनियाँ (जैसे घ, भ इत्यादि) केवल हिंदी, संस्कृत में हैं। तो अगर ये आर्य कहीं बाहर से आए होते तो दूसरी भाषाओं में भी ये ध्वनियाँ होनी चाहिए, लेकिन नहीं मिलींसंसार की किसी भी और भाषा में नहीं। अब सवाल यह है कि हमारी भाषा में सुरक्षित कैसे रहीं, कहाँ से आईं? 
इस विषय पर इन दोनों जगहों पर भी कुछ लिखा है।
इस आलेख में अभी ज्यादा तो नहीं लिखूंगा लेकिन इतना कहूंगा कि शर्माजी की बात वाकई सोचने वाली है।
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