वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, तीसरा और अन्तिम भाग)

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तीसरा दृश्य

( मंच पर एक चारपाई है। उसपर महात्माजी आराम कर रहे हैं। )
वाचक: चारपाई में बहुत अधिक खटमल थे। इनके सोते ही खटमलों ने धावा बोल दिया। इतना अधिक भोजन किया कि करवट बदलने में भी तकलीफ होती थी। खटमलों ने काटना शुरु किया। महात्माजी त्राहि-त्राहि करने लगे।) बुद्धूदेव: ब्रह्माजी! मैं अभी आपसे 3 वरदान मांगता हूँ। पहला वरदान मुझे यह दीजिए कि अभी फौरन इन खटमलों को मार डालिए। अभी मेरा पेट दुख रहा है। इसलिए मुझे दूसरा वरदान यह दीजिए कि किसी वैद्य के यहाँ से कोई पाचक की गोली मांग लाइए और तीसरा वरदान मैं यही सोचता हूँ कि जब मैं चाहूं तब आपसे 3 वरदान मांग लूं। ( ब्रह्माजी खटमलों को मारना शुरु करते हैं। फिर मंच से चले जाते हैं )

वाचक: ब्रह्माजी यमलोक पहुँचकर वैद्यजी के यहाँ गए। उनसे पाचक की गोली मांगकर बुद्धूदेव को खिलाई। तब ब्रह्माजी अपने लोक पहुँच सके। ऐसे महात्मा के ऊपर महामूर्ख कवि बकलोलानंद बुद्धू ने एक महाकाव्य की रचना की। ( मंच पर बुद्धूदेव एक धोती पहने ( हजामत बनवा लिया। दाढ़ी नहीं है। ) घूम रहे हैं। तभी राजा का साईस( साईस कहते हैं घोड़े की देखभाल करने वाले को यानि अश्वपालक या अश्वरक्षक) आता है। साईस घसकटे को ढ़ूंढ़ रहा है। अचानक उसकी नजर बुद्धूदेव पर पड़ती है।) साईस: तू घसियारा है? बुद्धूदेव: (क्रोधित होकर) मुझे कौन घसियारा कहता है? देखता नहीं है, मैं महात्मा हूँ? साईस: अच्छा, अगर तू घसियारा नहीं है तो जरा चलकर घोड़े की लीद तो उठा ला। (महात्माजी तिलमिला गये।) वाचक: देखने में इनकी सूरत ही ऐसी थी कि इन्हें महात्मा समझना मुश्किल था। बुद्धूदेव: ब्रह्माजी! अभी तुरत इस पाजी को 3 घूंसा मारिये, फिर इसको पटक कर सिर मूंड दीजिये और तीसरा वरदान यह दीजिये कि मैं जब चाहूँ तब आपसे 3 वरदान मांग लूं। (ब्रह्माजी ने सोचा) ब्रह्माजी: (धीरे से) अजब बुद्धू है। कोई बढ़िया वरदान तो मांगता नहीं, मुफ़्त में हैरान किया करता है। दुनियाँ में यह वरदान का झमेला न रहता तो कितना अच्छा था? ( साईस को 3 घूंसे मारकर उन्होंने सिर मूंड़े) वाचक: आइए अब हम सब महात्माजी कि एक नयी करामात देखें। ( बुद्धूदेव जी खा रहे हैं। एकाएक सोचते हैं)- बुद्धूदेव: आज बैंगन की पकौड़ी और कुछ दही-बड़े होते तो कितना अच्छा था! (फिर दोनों हाथ जोड़ते हैं) हे प्रभो, कृपा करके कहीं से पाव भर बैंगन की पकौड़ियां लेते आइए। मेहरबानी करके 2-4 दही-बड़े भी लेते आइएगा और तीसरा वरदान यह दें कि जब मैं चाहूं 3 वरदान और मांग लूं। वाचक: इस प्रकार बुद्धूदेव को जिस चीज की जरुरत होती ब्रह्माजी को पुकार कर उसी का वरदान मांग लेते। आख़िर एक दिन ब्रह्माजी को चालाकी सूझी। ( मंच पर बुद्धूदेव बैठे हैं। ब्रह्माजी आते हैं। हाथ जोड़कर महात्माजी प्रणाम करते हैं।) ब्रह्माजी: वत्स, क्यों परेशान होते हो इस संसार में? चल आज तुमको मैं स्वर्ग ले चलता हूँ। वहाँ किसी चीज की कमी नहीं होगी। (बुद्धूदेव मान गए। साथ ही मंच पर से चले जाते हैं।) वाचक: स्वर्ग में कुछ दिन रहने के बाद एक दिन ब्रह्माजी से बुद्धूदेव जी ने अपना निर्णय सुनाया। बुद्धूदेवजी:( मंच पर ब्रह्माजी, इंद्र, बुद्धूदेव जी बैठे हैं) अब मैं दुनिया में जाना नहीं चाहता। वाचक: ब्रह्माजी तो यही चाहते थे। इन्हें स्वर्ग में रख दिया। उसी दिन एक कानून बना। ब्रह्माजी: केवल भगवान् के नाम पर तपस्या करनेवालों को उसकी मनचाही चीज वरदान में नहीं मिलेगी। अगर उन्हें शौक हो तो वे उसके लिए परिश्रम करें। ( सब चले जाते हैं)वाचक: तब से देवलोक में यही नियम चलता है, और किसी को भी वरदान नहीं दिया जाता। केवल वास्तविक परिश्रम का पुरस्कार दिया जाता है।
(समाप्त)
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वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, भाग -2)

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वाचक: दोनों जून 1-1 कटोरा साबूदाना उबालकर महात्माजी पीते थे। आइए हम देखते हैं कि वे किस तरह नित्य मूर्खोपनिषद् का पाठ करते हैं। (महात्माजी के हाथ में एक मोटी पुस्तक है। वे पढ़ते हैं।

ॐ नमो मूर्खेश्वराय मूर्खतां देहि मे सदा।
वंदे मूर्खोपनिषदम् ग्रंथम् पठति मूर्खशिरोमणि:॥

श्रृणु जना संसारस्य सर्वश्रेष्ठ: मूर्खो जायते।
य: पठति नित्यम् एतम् अश्रद्धया चाशुद्धिम् सह॥
निश्चय सैव अंतकाले मूर्खलोकम् प्राप्नोति।
भविष्यति महामूर्खश्च मा संशय: कुरु जना:॥
(अर्थ: हे मूर्खों के भगवान मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझे सदा मूर्खता प्रदान करें। मैं मूर्खोपनिषद ग्रंथ की वंदना करता हूँ जिसे पढने से व्यक्ति मूर्खशिरोमणि हो जाता है। हे संसार के लोगों सुनो जो मनुष्य इसे अश्रद्धा और अशुद्धि के साथ प्रतिदिन पढता है वह संसार का सबसे बड़ा मूर्ख हो जाता है। वह अंत में निश्चय ही मूर्खलोक को प्राप्त होता है, लोगों इसमें संदेह न करो।)
(एक भक्त 4 मिठाईयाँ लेकर आता है।) महात्मा: इन चीजों को देखने से लार टपकती है। इन्हें फ़ौरन मेरे सामने से हटाओ। मैं दोनों जून केवल साबूदाना खाया करता हूँ। मेरे व्रत का हाल नहीं जानते? भक्त: वाह! देखो कितने बड़े तपस्वी हैं। केवल साबूदाना खाकर ही जीवन धारण करते हैं। धन्य हैं! ( अचानक महात्मा जी सोचते हैं) महात्मा: ऐं! महात्मा तो हो चुका। अब न जाने किधर से तपस्वी भी हो गया। (लंबी सांस के साथ) अच्छा, जब तपस्वी हो ही गया तो थोड़ी तपस्या भी कर लेनी चाहिए। वाचक: जंगल तो उन्होंने देखा नहीं था। जंगल की खोज में एक शहर में आ निकले। मुश्किल से एक बहुत बड़े बाग में घुस गए। (महात्मा जी मंच छोड़ चुके हैं। वे नेपथ्य से 2 बार ॐ ब्रह्मदेवाय नम: की आवाज करते हैं) वाचक: कभी हड़बड़ी में पानी में घुस गए और सात दिन तक वहीं किसी टीले पर बैठे रहते। कभी उचक कर किसी पेड़ पर चढ़ गए और उसकी डाल पकड़ कर 3-4 दिनों तक लटकते रहे। कभी फल खाते थे कभी कंद-मूल, कभी मौज आ गई तो किसी पेड़ की सारी पत्तियां नोच कर चबा जाते। इसी तरह उन्होंने सात वर्षों तक घोर तपस्या की। (नेपथ्य से आवाज आती है ॐ ब्रह्मदेवाय नम: – 1 बार)
द्वितीय दृश्य
(मंच पर ब्रह्मलोक का दृश्य। एक तरफ़ वाचक बैठा हुआ है। इंद्र घबड़ाकर नेपथ्य से मंच पर आते हैं। ) इंद्र: त्राहिमाम्, त्राहिमाम् परमपिता, अब मैं बिना मारे मरा, यह गिद्धार्थ जरुर मेरी गद्दी लेगा। ब्रह्माजी: ठहरो वत्स, घबड़ाने की कोई जरुरत नहीं। बुद्धूदेव को मैं तुरंत हटा देता हूँ। (मंच पर महात्मा तपस्यारत है। 3 बार आवाज ॐ ब्रह्मदेवाय नम:। ब्रह्माजी प्रकट होते हैं, इंद्र मंच छोड़ जाते हैं) ब्रह्माजी: बेटा, वर मांग। (बुद्धूदेव घबड़ा गए। वे सोचने लगे।) बुद्धूदेव:– अब कौन सा वर मांगूं? (धीरे से) प्रभो जरा ठहर जाइए, मैं सोचकर कहता हूँ।( वे सोचते रहे।) वाचक: यह कहकर बुद्धूदेव ने सोचना शुरु किया, 3 घंटे सोचते ही रह गए। आख़िर ब्रह्माजी कितनी देर खड़े रहते। ब्रह्माजी: (खींझ कर) तुम्हें वरदान लेना है कि नहीं? वाचक: डपट सुनते ही बुद्धूदेव जी का मिजाज सरक गया। जो कुछ सोच-सोचकर मांगना चाहा था, वह भी भूल गए। ब्रह्माजी: (क्रोधित हो कर) जल्दी 3 वरदान मांग ले, नहीं तो मैं जाता हूँ। बुद्धूदेव: (हाथ जोड़कर) हे प्रभो, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दीजिए कि हजाम मुफ्त में ही मेरी हजामत बना दिया करे। ब्रह्मा: तथास्तु, अब जल्दी से दूसरा वरदान मांग। बुद्धूदेव: हे प्रभो यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे दूसरा वरदान यह दें कि जब मैं झोली सीने के लिए किसी दर्जी को कपड़ा दूं तो वह उसमें से एक अंगुल भी न चुरावे। वाचक: बुद्धूदेव जी ने जी-भर कर वरदान मांगा नहीं था। ब्रह्माजी को क्रुद्ध देखते ही इनके हवास गुम हो गए थे) बुद्धूदेव: हे प्रभो तीसरा वरदान यह दें कि जब मैं चाहूँ आप से और 3 वरदान मांग लूं। (ब्रह्माजी चले आते हैं। सेठ मंच पर आता है।) सेठ: ( हाथ जोड़कर) आप मेरे घर पधारिए प्रभो! मैं धन्य हो जाऊंगा। महात्मा जी: हाँ, हाँ, चलो आज ही चलता हूँ।( मंच पर से महात्माजी चले जाते हैं।) वाचक: महात्माजी ने सेठ के घर खूब छक कर खाया।
जारी……

वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, भाग -1)

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यह एक छोटी सी नाटिका है। यह शायद 1978-80 के आसपास बिहार में दसवें वर्ग के हिन्दी की किताब में पहले अध्याय के रूप में पढाई जाती थी लेकिन शायद कहानी के रूप में। जब मैं 15-16 साल का था तब (यानि 2004-2005) में मैंने इसे मंच पर खेलने लायक बनाने के लिए इसे थोड़े से परिवर्तन के साथ नाटिका में बदल दिया था। इसमें संस्कृत के कुछ श्लोक भी जोड़े गये थे। इन श्लोकों की रचना भी मैंने की थी। मैंने श्लोकों का अर्थ नाटिका में तो नहीं दिया था पर यहां दे रहा हूँ। तो पढ़िये और इसका लुत्फ उठाइये। कखग की जगह उस जिले का नाम और अबस की जगह उस अनुमण्डल का नाम दे देना चाहिए जहां यह नाटिका खेली जा रही हो। आगे कपालवस्तु नामक जगह आयी है। यह जगह कोई गांव है ऐसा मान लीजिए।
वरदान का फेर
मूल लेखक राधाकृष्ण
रूपांतरण चंदन कुमार मिश्र
पात्र
1. महात्मा बुद्धूदेव
2. ब्रह्माजी
3. बनिया + सेठ
4. इंद्र + साईस + भक्त
5. वाचक
( बनिये और सेठ का अभिनय एक ही आदमी कर सकता है। उसी तरह इंद्र, साईस या भक्त का अभिनय एक ही आदमी कर सकता है। एक ही आदमी को अभिनय करने के लिए अपने लुक में थोड़ा बदलाव कर लेना चाहिए ताकि दर्शकों को पहचान में ना आए। – चंदन कुमार मिश्र )
प्रथम दृश्य
(मंच पर एक तरफ़ मेज-कुर्सी लगी है। कुर्सी पर वाचक बैठा है। सामने कुछ पुस्तकें पड़ी हुई हैं।)
वाचक: महात्मा बुद्धदेव का नाम तो आपने सुना ही होगा। उनके जन्म के पूर्व ही भारत के एक महान् संत महात्मा बुद्धूदेव का जन्म हुआ था। गर्व की बात है कि हमारे ही जिले कखग के अबस अनुमण्डल में ही होली के दिन महात्मा बुद्धूदेव का जन्म हुआ। महात्मा बुद्धदेव का पहला नाम सिद्धार्थ तो बुद्धूदेव का गिद्धार्थ। बुद्धूदेव का जन्म कपिलवस्तु नहीं कपालवस्तु में हुआ। ये भी बुद्धदेव की भांति राजपरिवार में पैदा हुए लेकिन इनके बाप राज नहीं चाहते थे, राजमिस्त्री का काम किया करते थे। दुनिया में सबके माता-पिता मर जाते हैं, इसलिए एक दिन इनके बाप भी मर गए और इनकी मां भी उन्हीं के साथ जलकर सती हो गई। तो आइए हम देखें कि मां-बाप के मरने के बाद महात्माजी क्या करते हैं? (मंच पर महात्मा जी आकर कुछ खोजते हैं तो पिता की करनी मिलती है। माँ के कमरे से एक खाली हांडी मिलती है। वे एक फटी धोती पहने हुए हैं। एक फटा हुआ लाल गमछा ओढ़े हुए हैं तथा दाढ़ी बढ़ी हुई है।
वाचक: ये जहाँ भी जाते, साधु समझकर लोग इनके चरणों पर लोटते थे। भूख लगने पर किसी से मांगते न थे। मिला तो मिला नहीं तो खाली पेट भी सो जाते। ये किसी से बोलते भी नहीं थे। इसलिए लोगों ने समझा कि ये कोई पहुँचे हुए महात्मा हैं। इसी से कुछ लोग इन्हें महात्मा बुद्धूदेव कहने लगे। बाद में इनका नाम ही यही पड़ गया। (मंच पर एक बनिया बैठा हुआ है। महात्मा जी उसके दरवाजे पर जाते हैं।
बनिया: महात्मा जी……..
बुद्धूदेव: (तड़क कर) ख़बरदार मुझे महात्मा कहोगे तो मैं सिर तोड़ दूंगा। मैं बहुत मामूली आदमी हूँ। (बनिया बहुत मोटा था)
वाचक: जो आदमी साधुओं की सेवा करते हैं, वो अपने मतलब से किया करते हैं। अगर कोई मतलब न हो तो सब साधु-संत भूखों मर जायें। किसी का मतलब रहता है कि मुझे बिना परिश्रम बैकुंठ मिल जाय, कोई धन चाहता है, कोई लड़का चाहता है, कोई नीरोग होना चाहता है। वह बनिया भी अपने मतलब से ही बुद्धूदेव की ख़ातिर कर रहा था। अपनी दुकान पर बैठे-बैठे बेफ़िक़्री के मारे ऐसा हो गया था कि वह भूसे का ढेर हो। यही फिक्र थी कि किसी तरह दुबला हो जाऊं। तो जब उसने देखा कि बुद्धूदेव जी का मिजाज गरम है तो बोला)
बनिया: देखिए महाराज, बिगड़ने का काम नहीं। पहले क्रोध को थूक दीजिए, तब मेरी बात सुनिए।
महात्माजी: (शांत होकर): अच्छा मैं सुनता हूँ। बोलो क्या कहते हो?
बनिया: अगर दुनिया में केवल मैं अकेला आपको महात्माजी कहता तो आप बिगड़ सकते थे बल्कि बिगड़कर मार भी सकते थे, लेकिन आप देखिए दुनिया में हर कोई आपको महात्माजी कहता है। फिर सब कोई आपको महात्माजी कहते ही हैं, तब केवल आपके अकेले विरोध करने से क्या होगा? आप जरुर महात्माजी हैं। भला आपके महात्मा होने में क्या संदेह है? ( तब बुद्धूदेव ने सोचा। मंच पर एक तरफ़ धीरे से कहते हैं) महात्मा: जब लोग मुझे महात्मा जी कहते हैं, तब मैं जरुर महात्मा ही हूँ। लेकिन तारीफ़ तो देखिए, मुझे आज तक इसका पता भी न था कि मैं सचमुच कोई महात्मा हूँ। (महात्माजी ने बनिये से पूछा) खैर, तुम कहते ही हो, तो मैं महात्मा ही मालूम होता हूँ। लेकिन जरा मुझे यह बता कि अब मैं क्या करूं? (बनिया पैरों पर गिर जाता है)
बनिया: (हाथ जोड़कर) महाराज आप मुझे यही वरदान दें कि मैं कुछ दुबला हो जाऊं। वाचक:समें कोई संदेह  नहीं कि बुद्धूदेव जी महात्मा होने के बहुत पहले ही दुबला होने की दवा जानते थे। (वाचक सदा मंच पर एक तरफ़ बैठा रहता है) महात्मा: तुम मन मसोस कर सिर्फ़ 15 दिनों तक उपवास कर जाओ। भगवान् चाहेगा तो तुम इतने में ही ऐसे दुबले हो जाओगे कि चलना-फिरना भी कठिन हो जाएगा। (बनिये ने वरदान पाकर पुन: प्रणाम किया) वाचक: इधर बुद्धूदेव भी खूब प्रसन्न थे। पहली ख़ुशी तो यह थी अनजाने में ही महात्मा हो गये। दूसरी ख़ुशी थी कि अब वे वरदान दे सकते थे। तीसरी और बड़ी खुशी यह थी कि आज खूब छक कर खाना मिलेगा। (मंच पर बुद्धूदेव सोचते हैं) बुद्धूदेव: अब तो महात्मा हो ही गया। इसमें कोई शक-सुबहा नहीं है। ख़ैर कहो कि मुझे पहले ही यह ख़बर लग गई कि मैं महात्मा हो गया हूँ। भगवान् बेचारे बनिये राम को युग-युग जिलावें। हाँ तो मुझे अब क्या करना चाहिए? वाचक: इसी उधेड़-बुन में 3-4 महीने बीत गए। आख़्रिरकार उन्होंने निर्णय ले लिया। महात्मा: महात्माओं को बिल्कुल निराला भोजन करना चाहिए। ऐसा भोजन करूं कि जो देखे दंग हो जाय। हाँ साबूदाना खाना शुरु करता हूँ।
जारी……