अंधी यह सरकार बहुत है (कविता)

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अंधी यह सरकार बहुत है
यह जनता लाचार बहुत है

कहाँ माँगते एसी कमरे चाहे मोटरकारें
फिर भी गोली चलवाती हैं ये अंधी सरकारें
दो रोटी ही मिल जाए बस
इतना ही आधार बहुत है 

करते दौलत की खातिर जो हरदिन मारामारी
हमसे ये सब क्या बोलेंगे मुल्ले और पुजारी
मस्जिद में दीनार बहुत है
मंदिर में व्यभिचार बहुत है

दास बनाया जिसने तुमको खुद को तुलसीदास कहा
छल-प्रपंच से भरा हुआ यह भारत का इतिहास रहा
तुम ताड़न के अधिकारी हो
उसकी जय जयकार बहुत है 

दस करोड़ का तोहफा अगर मित्तल बुलाए घर
रईसों, मंत्रियों के साथ यह सत्ता का आडंबर
चावल, मिट्टी-तेल तनिक-सा
हमपर यह उपकार बहुत है?

क्यों – कमला बक़ाया (कविता)

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यह बच्चों के लिए रची गई एक साधारण-सी कविता है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह एक असाधारण कविता है। कमला बक़ाया की यह कविता इस देश और दुनिया के हर बच्चे तक पहुँचाई जानी चाहिए, ऐसा हमें लगता है। यहाँ प्रस्तुत है-

क्यों – कमला बक़ाया
कहानी बहुत पुरानी है,
पर अब तक याद ज़ुबानी है।
इक छोटा-सा घर कच्चा था,
उसमें माँ थी, इक बच्चा था।
बिन बाप मड़ैया सूनी थी,
माँ पर मेहनत दूनी थी।
यह बच्चा बड़ा हुआ ज्यों-ज्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”


है बाप नहीं मेरा -पर क्यों?
दिन-रात अंधेरा है घर क्यों?
इतनी है हमें ग़रीबी क्यों?
और साथ में मोटी बीबी क्यों?
बहुतेरा माँ समझाती थी,
हर तरह उसे फुसलाती थी,

पर बच्चा हठ्ठी बच्चा था,
और आन का अपनी सच्चा था।

यह आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

माँ ने कुछ काम सँभाला था,
रो-धोकर उसको पाला था।

फिर वह भी उसको छोड़ गई,
दुनिया से नाता तोड़ गई।
बच्चे को अब घर-बार नहीं,
माँ की ममता और प्यार नहीं।
बस रैन-बसेरा सड़कों पे,
और साँझ-सबेरा सड़कों पे।
वह हर दम पूछा करता, “क्यों?”
दुनिया में कोई मरता क्यों?
यूँ फंदे कसे ग़रीबी के,
घर पहुँचा मोटी बीबी के।
घर क्या था बड़ी हवेली थी,
पर बीबी यहाँ अकेली थी।
गो नौकर भी बहुतेरे थे,
घर इनके अलग अंधेरे थे।
बच्चे को बान पुरानी थी,
कुछ बचपन था, नादानी थी।
पूछा- यह बड़ी हवेली क्यों?
बीबी यहाँ अकेली क्यों?

नौकर-चाकर सब हँसते थे,
कुछ तीखे फ़िक़रे कसते थे।

भोले बच्चे! पगलाया क्यों?
हर बात पे करने आया, “क्यों?”
दिन-रात यहाँ हम मरते हैं,
सब काम हम ही तो करते हैं।

रूखा-सूखा जो पाते हैं,
वह खाते, शुकर मनाते हैं।
क़िस्मत में अपनी सैर नहीं,
छुट्टी माँगो तो ख़ैर नहीं।
चलती है कहाँ फ़क़ीरों की?
है दुनिया यहाँ अमीरों की।
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा था नौकर बीबी का,
फिर देखा मज़ा ग़रीबी का।
दिन भर आवाज़ें पड़ती थीं,
हो देर तो बीबी लड़ती थी।
बावर्ची गाली देता था,
कुछ बदले माली लेता था।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

नित पकते हलुवे-मांदे क्यों?
हम रगड़ें जूठे भांडे क्यों?
बीबी है चुपड़ी खाती क्यों?
सूखी हमें चपाती क्यों?

यह बात जो बीबी सुन पाई,
बच्चे की शामत ले आई।
क्यों हरदम पूछा करता, “क्यों?”
हर बात पे आगे धरता, “क्यों?”
यह माया है शुभ कर्मों की,
मेरे ही दान औधर्मों की।
सब पिछला लेना-देना है,
कहीं हलवा कहीं चबेना है।
माँ-बाप को तूने खाया क्यों?
भिखमंगा बनकर आया क्यों?

मुँह छोटा करता बात बड़ी,
सुनती हूँ मैं दिन-रात खड़ी।
इस “क्यों” में आग लगा दूँगी,
फिर पूछा, मार भगा दूँगी।
बच्चा यह सुन चकराया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
माँ-बाप को मैंने खाया क्यों?
भिखमंगा मुझे बनाया क्यों?
फिर बोला! पाजी, हत्यारा!
कह बीबी ने थप्पड़ मारा।
बच्चा रोया, ललकारा- क्यों?
तुमने हमको मारा क्यों?
दिल बात ने इतना तोड़ दिया,
बच्चे ने वह घर छोड़ दिया।
वह फिरा किया मारा-मारा
लावारिस, बेघर, बेचारा।
न खाने का, न पानी का,
यह बदला था नादानी का।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”
इक ग्वाला दूध लिए जाता,
भर गागर मुँह तक छलकाता।
बच्चे का मन जो ललचाया,
भूखा था, पास चला आया।
यह दूध कहाँ ले जाते हो?
इतना सब किसे पिलाते हो?

थोड़ा हमको दे जाओ ना!

लो दाम निकालो, आओ ना।
पैसे तो मेरे पास नहीं।
तो दूध की रखो आस नहीं।
जो बच्चा पैसा लाएगा,
वह दूध-दही सब खाएगा।

यह सुन वह सटपटाया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
दुनिया सब दूध उड़ाए क्यों?
भूखा ग़रीब मर जाए क्यों?

ग्वाला बोला- दीवाना है,
कुछ दुनिया को पहचाना है?
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चे ने मुँह की खाई तो,
पर भूख न मिटने पाई यों।
गो थककर बच्चा चूर हुआ,
पर भूख से फिर मजबूर हुआ
थी पास दुकान मिठाई की,
लोगों ने भीड़ लगाई थी।
कोई लड्डू लेकर जाता था,
कोई रबड़ी बैठा खाता था।
क्या सुर्ख़-सुर्ख़ कचौरी थी,
कूंडे में दही फुलौरी थी।
थी भुजिया मेथी आलू की,
और चटनी साथ कचालू की।

बच्चा कुछ पास सरक आया,
न झिझका और न शर्माया।
भइया हलवाई सुनना तो,
पूरी-मिठाई हमें भी दो।
कुछ पैसा-धेला लाए हो?
यूँ हाथ पसारे आए हो?
पैसे तो अपने पास नहीं।
बिन पैसे मिलती घास नहीं।
हम देते हैं ख़ैरात नहीं,
पैसे बिन करते बात नहीं।

दमड़ी औक़ात कमीने* की,

यह सूरत खाने-पीने की!
अब रस्ता अपना नापो ना,
क़िस्मत को खड़े सरापो ना।
हलवाई ने धमकाया ज्यों,
फिर उसके मुँह पर आया, क्यों?
कहते हो मुझे कमीना* क्यों?
मेरा ही मुश्किल जीना क्यों?
बच्चा हूँ, मैं बेजान नहीं,
बिन पैसे क्या इंसान नहीं?
हट, हट! क्यों शोर मचाया है,
क्या धरना देने आया है?
नहीं देते, तेरा इजारा है?
क्या माल किसी का मारा है?
अब चटपट चलता बन ज्यों-त्यों,
नहीं रस्ते नाप निकलता क्यों?
जो बच्चा पैसे लाएगा,
लड्डू-पेड़ा सब पाएगा।

यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा थककर बेहाल हुआ,
भूखा, बेचैन, निढाल हुआ।
आगे को क़दम बढ़ाता था,
तो सिर चकराया जाता था।
तरसा था दाने-दाने को,
कुछ बैठ गया सुस्ताने को।
हिस था ठंडे-पाले का,
न होश उस गंदे नाले का।

थी सरदी खूब कड़ाके की
तपन पेट में फ़ाक़े की।
कुछ दूर को कुत्ता रोता था,
न जाने क्या-कुछ होता था।

दिखता हर तरफ़ अंधेरा था,
कमज़ोरी ने कुछ घेरा था।
आँखें उसकी पथराई थीं,
बेबस बाँहें फैलाई थीं।

वह ऐसे डूब रहा था ज्यों,

फिर मुँह पर उसके आया, क्यों?”
आराम से कोई सोता क्यों?
कोई भूखा-नंगा रोता क्यों?
फिर जान पड़ी बेहोशी-सी,
एकदम गुमसुम ख़ामोशी-सी।
देखा कोई बूढ़ा आता है,
इक टाँग से कुछ लँगड़ाता है।
वह पास को आया बच्चे के,
सिर को सहलाया बच्चे के।
क्यों बच्चे सरदी खाता है,
यूँ बैठा ऐंठा जाता है?

बाबा मेरा घर-बार नहीं,
करने वाला कोई प्यार नहीं।
मैं ये ही पूछा करता- क्यों?
मुझ जैसा भूखा मरता क्यों?
कहते हैं रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।

पर ऐसी रीत पुरानी क्यों?
मैं पूछूँ- यह नादानी क्यों?

यह तो कुछ नहीं बताते हैं,
उलटे मुझको धमकाते हैं।
बुड्ढे ने उसको पुचकारा,
यूँ अपना हाल कहा सारा।
हाँ, है तो रीत पुरानी यह,
पर अपनी ही नादानी यह।
गर सब ही पूछा करते यों,
जैसे तुम, पूछ रहे हो, “क्यों?
तो अब तक रंग बदल जाता,
दुनिया का ढंग बदल जाता।
है समझ नहीं इन बातों की,
है करामात किन हाथों की।

हम ही तो महल उठाते हैं,

हम ही तो अन्न उगाते हैं।
सब काम हम ही तो करते हैं,
फिर उलटे भूखों मरते हैं।
बूढ़ा तो हूँ, बेजान नहीं,
क्या मन में कुछ अरमान नहीं?

मैंने भी कुनबा पाला था,
बरसों तक काम सँभाला था।
जब तक था ज़ोर जवानी का,
मुँह देखा रोटी-पानी का।
यह टाँग जो अपनी टूट गई,
रोटी भी हम से रूठ गई।
कुछ काम नहीं कर पाता हूँ,
यूँ दर-दर ठोकर खाता हूँ।
जोड़ों में होता दर्द बड़ा,
गिर जाता हूँ मैं खड़ा-खड़ा।
न बीबी है, न बच्चा है,
इक सूना-सा घर कच्चा है।
मैं भी सोचा करता हूँ यों,
आहे ग़रीब है भरता क्यों?

कहानी यहाँ अधूरी है,
इसकी हमको मजबूरी है।
कुछ लोग यह अब भी कहते हैं,
जो दूर कहीं पर रहते हैं,
उनको था दिया सुनाई यों,
इक बच्चा पूछ रहा था, क्यों?
वह सड़क किनारे बैठा था,
नीला, सरदी से ऐंठा था।
पर दोनों होंठ खुले थे यों
जैसे वह पूछ रहा था, क्यों?
फुलौरी- पकौड़ापकौड़ीफुलौरा, पकोड़ा, पकोड़ीघी या तेल में पकी हुई बेसन या पीठी की बरी या बट्टी
कचालू-  एक प्रकार की अरवी।
दमड़ी- पैसे का आठवाँ भाग।
इजारा- अधिकार, हक़, स्वत्व, दावा, दख़ल, अधिकृति, इख्तियार, अख़्तियार;  वह अधिकार जिसके आधार पर कोई वस्तु अपने पास रखी अथवा किसी से ली या माँगी जा सकती हो
* ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। समाज के यथार्थ प्रतिबिंबन के लिए लेखक कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं, किंतु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए।

कवि भाषाविद् कितने आये । अंश अरब भी कह क्या पाये ॥(?)

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हाल में फेसबुक पर लिखा था….

फेसबुक पर निजी बातें नहीं लिखता रहा हूँ। समाज से बातों का जुड़ाव रहे, ऐसी कोशिश रही है। लेकिन आज एक निजी बात……


मई, 2006 में मुझे कृष्ण पर कुछ लिखने का (सच कहूँ तो महाकाव्य लिखने का, भले ई बुझाय चाहे नहीं बुझाय कि महाकाव्य क्या है 🙂 ) मन हुआ। जमकर भक्तिभाव से चौपाइयाँ, दोहे लिखा। पहला दोहा था।


अतिप्रिय राधाकृष्ण को करूँ नमन कत बार।

कौन पूछता है मुझे थक गये जब कर्तार॥

फिर उसी साल दो-चार पन्ने लिखे तब तक धर्म और भगवान से विश्वास उठ गया और फ़िर आज मैं वह नहीं हूँ, जो पहले था।

कैसे भक्ति के ‘महान’ गाने रवीन्द्र की गीतांजलि बन जाते हैं, या विनय पत्रिका, इसका गवाह मैं स्वयं हूँ! सब बस एक पागलपन है, कोरी कल्पना है। भक्ति गीत गाने से कैसे आँसू बहने लग सकते हैं, यह भी आस्तिकता के समय मैंने महसूस किया।

चलिए वह रचना यहाँ रख देते हैं। आस्तिकता के लगभग सभी चरणों या कुछ अनुभवों से गुजरने के बाद यह रचना हुई थी। आज की बात साफ़ अलग है। खैर, छोड़िए। “श्रीकृष्ण दर्शन” नाम से लिखने का इरादा किया था इसे। तीन दिन लिखने के बाद काम बंद! सो उतना ही है।

श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:
दोहा अतिप्रिय राधा कृष्ण को, करूं नमन कत बार । (?)
      कौन पूछता है मुझे , थक गये जब कर्त्तार ॥
चौपाई:

कोटि-कोटि वंदन महेश की । और साथ नंदन गणेश की ॥
देवराज औ पावक अक्षर । जन्मभूमि औ जननी भाष्कर ॥     
पवन पवनसुत श्रीहनुमत की । वसुंधरा गोकुल भारत की ॥
वेद पुराण ग्रंथ गीता की । वृंदावन औ मां सीता की ॥
छंद : भारती तुलसी गुरु से, विनती अब चंदन करे ।
    वाल्मीकि धनदेव की , भाँति विविध वंदन करे ॥
    भूधर नदी पंकज सुमन, जो सृष्टि का श्रृंगार है ।
    और जलधि जल जलद को, नमन शत-शत बार है ॥
चौपाई:

सूर मनोज अन्न अंबर की ।  संत सकल तरुवर हिमकर की ॥
दुर्गा मीरा गोपी सब की । मारे कृष्ण नदी में डुबकी ॥
वास करो मन में नारायण । लगे कृष्णमय हर क्षण हर कण ॥
दोहा: रा निकले ज्योहिं मुख से, त्योहिं मिले आनंद ।
      कहते मुख बंद हुआ, राम नाम सुख कंद ॥ (i)
      यमुना को मैं कर रहा, अगणित बार प्रणाम ।
      गंगा को सुमिरण करूं, जो है श्रीसुख धाम ॥
-04.05.06
______________________________________________________
चौपाई:

कलि सत त्रेता युग द्वापर औ । नवरस नभचर छंद अमर औ
जीव जगत सब गौरी कमला । पशु गौ नर नारी अतिविमला ॥
मीन कमठ शूकर वामन की । दसावतार विष्णु भगवन की ॥
परशुराम राघव हलधर की । कृष्ण बुद्ध कल्कि नरवर की ॥
छंद: वंदना मेरी सुनो हे, ध्यान दे केशव जरा ।
    है ये मस्तक क्या करूं, अज्ञान सागर से भरा ॥
कर सकूं वर्णन भला जो, इतनी क्षमता है कहाँ ?
    तेरे बिना इस मूढ़ का, क्यों चित्त रमता है यहाँ ॥
चौ.

चरण आपके सीस विधाता । महिमा सबकी बालक गाता ।
कवि भाषाविद् कितने आये । अंश अरब भी कह क्या पाये ॥(?)
कृष्ण कन्हैया अंतरयामी । क्षमा चाहता नीचा कामी ॥
दो.
    इसने दु:साहस किया, क्षमा करो घनश्याम ।
    लीला तव गाने चला, जिसका चंदन नाम ॥(2)
    तुम ही मेरे इष्ट हो, तुम ही मेरे तात ।
    तुम ही मेरे हो सभी, पिता प्रभु भी मात ॥
-05.05.06
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चौ.
    धन्य धन्य मेरा विद्यालय । शिक्षादाताओं की जय-जय ॥
    मिले जहाँ चिंतन के डैने । भाषा सीखी जिनसे मैंने ॥
    हे हिंदी भाषानिर्माता ! औ संस्कृत हे भाषामाता ॥
    नमस्कार सब भाषाओं की । सभी ज्ञान के दाताओं की ॥
छं.   यंत्र के निर्माणकर्त्ता, और सभी वैज्ञानिकों ।
    इस जगत के रत्नगृह के, हे अमूल्य श्रीमाणिकों ॥
    कविता जगत के नरवरों, रचना तुम्हारी अमर हो ।
    देवगुरु वाचस्पति के, श्रीचरणों में ये सर हो ॥
चौ.
    सृष्टिसहायक जन्म मरण की । दुराचार औ सदाचरण की ॥
    दुराचार अगर नहीं रहते । प्रभु-महिमा सब कैसे कहते ॥
  धरती पालक सब किसान की । रसना, मानव तन महान की ॥
दो. दिशा अंक दस देश सब, धर्म अर्थ औ काम ।
    चंदन सबको नमन है, मोक्ष सहित तव नाम ॥(3)
-08.05.06

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मनोहर पोथी बेचते बच्चे (कविता)

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हाल की एक कविता जिसके कुछ भाव आजादी कविता से मिलते हैं… 
दस रुपये में चार किताबें
बेच रहे थे बच्चे
उस दिन
रेलगाड़ी में
जिनकी उम्र दस साल भी नहीं थी।

मनोहर पोथी भी थी उसमें
जिसमें
गाँधी की जीवनी
अनिवार्य होती है।
मुझे याद है
मनोहर पोथी का पहला रंगीन आवरण
जिसमें बच्चे खेलते-कूदते-हँसते-गाते
उछलते हुए दिखते थे।
संसद की अलमारी में
किसी मोटी-सी फ़ाइल में
पड़ा है निः शुल्क शिक्षा का अधिकार
और यहाँ गली में
हर रोज दिखते हैं
मनोहर पोथी बेचते बच्चे।
जिन्हें मालूम नहीं
कि
मनोहर पोथी का ज़माना
अब लद चुका है
अब स्टीकरों वाली
100-100 रुपये की किताबें
नर्सरी के बच्चों को दी जाती हैं
जो दुकानों पर नहीं
विद्यालयों में ही मिल जाती हैं,
जो विद्यालय कम
दुकान ज़्यादा है
क्योंकि वहाँ
किताबें, कॉपियाँ
जूते-मोजे
टाई-बेल्ट
बैच-बैग
सब कुछ मिलते हैं अब।
उन बेवकूफ़ों को
यह पता नहीं
कि
हर वह चीज़ जो
बीते ज़माने की हो चुकी है
उन्हें ही मिलती है।
मनोहर पोथी के
का भी अता-पता नहीं है उन्हें
हाँ, वे दस रुपये का नोट
ज़रूर पहचानते हैं।
मैं यही देखता रहा
कि
नहीं खरीद सकता मैं
दस रुपये देकर
मनोहर पोथी की किताब
मैं बड़ा हो गया हूँ अब।
… और वे रेल के डिब्बे बदलकर
फिर चिल्लाते हैं
दस रुपये में चार किताबें
मनोहर पोथी… मनोहर पोथी।
कभी-कभी दिखता है मुझे
कि
कल के हिंदुस्तान हैं यही
मनोहर पोथी बेचते बच्चे

अक्षरों की चोरी (कविता)

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वे
बोरियों में भरकर
ले जा रहे हैं
हमारे अक्षरों को। 


क्या तुम सुन रहे हो
उनका चिल्लाना ? 
उनका रोना ? 
उनका गिड़गिड़ाना ? 

ओह! तुम सुनोगे कैसे
जब अक्षर चोरी जा रहे हैं
तुम्हारी ही मर्जी से। 


तुम्हारी ही बंदूक
किसी बच्चे की तरह
डराकर, धमकाकर
अक्षरों को चुप कराये हुए है। 
और किसी जमींदार या ठाकुर की तरह
मूँछों पर ताव देते
हाथों में छड़ी लिए
तुम खुद ही खड़े हो
गाड़ी के पास
ताकि वे
किसी ईस्ट इण्डिया कंपनी की तरह
आराम से
हमारे अक्षरों को
बोरियों में कसकर लेते जायें! 


जैसे घड़ी के पीछे
भागता है समय
वैसे ही एक दिन
इन चोरी जा रहे 
अक्षरों के पीछे
भागते जायेंगे सारे शब्द
फिर वाक्य भी चले जायेंगे
शब्दों के पीछे-पीछे। 
व्याकरण… भी जायेगा
और एक दिन जब
तुम आईना देख रहे होगे
जो वे तुम्हें बेच गये होंगे
तुम देखोगे
जा चुकी है तुम्हारी भाषा
तुम बेज़ुबान हो गये हो
और तुम
भले ही बंदर से आदमी हुए हो
फिर हो जाओगे
आदमी से बंदर
क्योंकि बंदर के पास भाषा नहीं होती। 

यह कविता एक-डेढ महीने से दिमाग में घूम रही थी। सोचा कुछ था, लेकिन जब लिखना शुरू किया तब कुछ और बन गयी। 

स्त्री और शब्द-2 (कविता)

6 टिप्पणियाँ

स्त्री और शब्द कविता का पहला भाग यहाँ है। 



लुट जाती है इज्जत
होता है बलात्कार
होती है बीमारी
होता है इलाज

लड़ी जाती है लड़ाई

पर बनते हैं हथियार
किसान करता है खेती
तपती धूप और गर्मी में
दिन रात मेहनत कर
लेकिन खेती के बाद
पैदा होता है अन्न
हँसता रहता है महल
बेचारी रोती है झोंपड़ी
दिन रात एक करती है मशीनें
पर पैदा होता है सामान
जलती है आग
बनता है खाना
रोटी और सब्जी
बन जाते हैं भोजन
बड़ा होता है खाट
पर छोटा होते ही
बन जाता है खटिया
लड़ती है सेना
मरती है सेना
जीतते हैं राजा, प्रधानमंत्री आदि
हम कहते हैं
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवता:
प्राचीन काल में
ग्रंथ, उपनिषद, वेद
सूक्त, पुराण, शास्त्र
ईश्वर, विधाता
भाग्य, वरदान
सब तो थे पुल्लिंग।
रात दिन होती थी तपस्या
पर मिलता था वरदान।
सब मूल शब्द
क्यों होते हैं पुल्लिंग
ब्राह्मण से ब्राह्मणी
सुना है सब ने
लेकिन कभी सुना है
खेती से खेत
मास्टराइन से मास्टर?
संगीत में
गीत, नृत्य
गायन, वादन
सब के सब पुल्लिंग हैं।
सारी छोटी और कमजोर चीजें
स्त्रियों के लिए हैं
क्योंकि उन्हें नहीं गढ़ा है किसी स्त्री ने
उसे गढ़ा है पुरुष ने
पुल्लिंग शब्द ने।

इसपर ‘नेता’ शब्द इतना नाराज हुआ कि भाग गया शब्दकोश से (कविता)

5 टिप्पणियाँ

शीर्षकहीन कविताः 
नेता… 

इतनी बार गाली दी गयी इसे
कि शब्दकोश ने भी गालियाँ देते देते
एक परिशिष्ट जोड़ डाला शब्दकोश में। 


इसपरनेताशब्द

इतना नाराज हुआ
कि भाग गया शब्दकोश से
और
जेट विमान की रफ्तार से
सीधे समुद्र में
जाकर डूब मरा… 
और अबनेताशब्द ही नहीं है जीवित। 
इतिहास की किताबों में
कहीं कहीं मिल जाता है यहशब्द‘… 
तुरत फुरत की कविता, जो कल किसी बात पर प्रतिक्रिया स्वरूप बन गयी… 

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