नन्दी की पीठ का कूबड़ (बाल कहानी)- दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी

3 टिप्पणियाँ

नन्दी की पीठ का कूबड़

दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी
हिन्दी अनुवाद: अरविन्द गुप्ता
(प्रोफेसर कोसम्बी द्वारा रचित बच्चों के लिए शायद यह एक मात्र कहानी है। यह कहानी उन्होंने अपने सहयोगी दिव्यभानुसिंह चावडा को, 1966 में, अपनी असामयिक मृत्यु से कुछ दिन पहले ही भेजी थी। यह कहानी किसी भी भाषा में पहली बार प्रकाशित हो रही है।)
(गाँव के वार्षिक मेले का अवसर है। उसमें जानवरों की खरीद-फरोख्त का अच्छा कारोबार होगा। गाँव के मुखिया का बेटा राम, सुबह-सुबह अपने नन्दी बैल को चराने ले जाता है। शाम को नन्दी जानवरों की जलूस की अगुवाई करेगा। जंगल के एक छोर पर तालाब है। धीरे-धीरे वहाँ बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे राम के बहुत से मित्र इकट्ठे हो जाते हैं। वे सभी एक सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करते हैं – भारतीय बैलों के पीठ पर कूबड़ क्यों होता है?)

रामः नन्दी! यह बताओ कि बैलों की पीठ पर ही कूबड़ क्यों होता है? जरा भैंस को देखो। और उधर घोड़े को देखो। उनकी पीठ तो एकदम चपटी है।
तभी राम का कुत्ता मोती दौड़ता और हाँफता हुआ आया। मोती ने कहा, ‘भौं, भौं! क्या तुम्हें पता है – जब मैं बिल्ली को पकड़ने दौड़ता हूँ तो वो अपनी पीठ मेहराब जैसे ऊपर उठाती है। नन्दी की पीठ के साथ भी शायद यही हुआ होगा। उसे किसी ने डराया होगा।उसके बाद मोती और नन्दी पानी पीने चले गए।
टर! टर! टर!मेंढक पानी से कूदते हुए टर्राया। हमारे बहादुर नन्दी को डराना काफी मुश्किल काम है। कुछ दिन पहले शेर ने पूरा दम लगाया फिर भी उसे भगा नहीं पाया। अब सब देखो – मैं कैसे फूलकर कुप्पा होता हूँ। मुझे लगता है कि नन्दी ने मेरी तरह ही अपने कूबड़ में हवा भर ली होगी।
यह सुनकर बूढ़ा नाग, पीपल के पेड़ की जड़ के बिल में से बाहर निकला। हिस! हिस! उसने फुँफकारते हुए कहा, हवा से सिर्फ छाती भरती है, पीठ नहीं। मैंने एक बार मोटा चूहा निगला और फिर मैं पूरे हफ्ते सोता रहा। तब मेरा शरीर भी बीच में फूल गया था। नन्दी ने भी जरूर कोई मोटी चीज निगली होगी।
हा! हा! हा!भालू चीखते हुए जंगल में से बाहर आया। नन्दी हमेशा छोटी-छोटी चीजें ही खाता है। तुम्हें क्या लगता है  उसने एक बड़ा कद्दू निगला है? पिछले साल मैंने मधुमक्खियों के छत्ते से शहद चुराया था। उसके बाद मधुमक्खियों ने मुझे जम कर काटा। उससे मेरा चेहरा एक तरफ बुरी तरह से फूल गया। मुझे लगता है कि हमारे नन्दी को भी किसी ने काटा होगा।
इसी बीच बंदर भी पीपल के पेड़ से कूदता हुआ नीचे आया। खों! खों! खों! देखो इस पेड़ के फल खाने के बाद मेरे नीचे के गाल किस तरह फूल जाते हैं। नन्दी घास चरता है। उसने जरूर उस घास को अपने कूबड़ में उसे छिपाया होगा। छिपी घास को ही वो बाद में धीरे-धीरे करके चबायेगा। देखो वो कैसे घास की जुगाली कर रहा है?’
तुम आखिर एक लालची बंदर की तरह ही बोले,’ राम ने कहा। देखो, नन्दी का कूबड़ हमेशा एक-जैसा ही रहता है। फल खाने के बाद तुम्हारे गाल एकदम पिचक जाते हैं। पर नन्दी का कूबड़ बिल्कुल एक-समान ही रहता है।
नन्दी ने कहा, ‘मुझे लगता था कि जिस प्रकार सभी बैलों के सींग होते हैं वैसे ही सभी बैलों का कूबड़ भी होता होगा। कल मुझे जिला स्तरीय प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार मिला। वहाँ पर यूरोप से लाये कुछ बैल भी थे। मुझे वो बैल कुछ अजीब लगे! उनके न तो सींग थे और उनकी पीठ भी एकदम चपटी, सपाट थी। यूरोप के बैल एक-दूसरे से फुसफुसाकर कह रहे थे, ‘जरा देखो उस कुबड़े बैल को, जिसे पहला ईनाम मिला है! मुझे इस सबके पीछे मनुष्य की ही कारिस्तानी नजर आती है। पीठ में कूबड़ के कारण बैल पर हल का जुआ अच्छी तरह बैठता है। कूबड़ के कारण ही मैं हल और बैलगाड़ी को बेहतर तरीके से खींच पाता हूँ। यूरोप के बैलों ने मुझे बताया – उनके देशों में जुताई के लिए पहले घोड़ों का उपयोग होता था। अब खेतों की जुताई मशीनों द्वारा की जाती है।
राम ने इससे असहमति जतायीः इस पुस्तक के अनुसार भगवान शिव नन्दी की सवारी करते हैं। भगवान ने नन्दी की पीठ पर कूबड़ इस लिए बनाया जिससे वो उसपर झुककर कुछ आराम कर सकें। देखो, इस चित्र में भगवान कितनी आसानी से नन्दी पर सवारी कर रहे हैं। हमारे गाँव का कुलदेवता तो स्वयं यह पीपल का पेड़ है। चलो, अब पीपल के पेड़ से ही नन्दी के कूबड़ का कारण पूछते हैं।
बूढ़े पीपल के पेड़ ने उत्तर दियाः नन्दी ने सही ही कहा। मनुष्य ने बैलों को अपने लिए बनाया है। इंसानों ने ही मोती जैसे कुत्ते बनाए हैं। इंसानों ने ही धान और गेहूँ बनाया है। साथ-साथ, मनुष्य ने खुद को भी बनाया है।
रामः यह कैसे सम्भव है? हमारा नया घर पिछले वर्ष बना था। कई लोगों ने उसे मिलकर बनाया था। उसके लिए पेड़ों को काटा गया। फिर लट्ठों और तख्तों को लम्बाई में काटा गया। इसके लिए कई लोगों को मेहनत करनी पड़ी। उसके बाद पूरे फ्रेम को कीलें ठोक कर जोड़ा गया। मैंने छत पर फूस बिछाने में अपने पिताजी की मदद की। परंतु हमने नन्दी को कैसे बनाया? वो छोटे बछड़े जैसा पैदा हुआ था और तभी से उसके पीठ पर कूबड़ है। दो साल पहले मोती एकदम छोटा पिल्ला था। मैंने बस इतना ही किया। माँ से निगाह बचाकर अपनी थाली में से मोती को कुछ अपना खाना खिलाया। हमने तो मोती को कुत्ता नहीं बनाया। अनाज पैदा करने के लिए हमने खेत में सिर्फ बीज बोए। इससे, बस चार महीने में हमें उसी प्रकार का बहुत सारा और अनाज मिला। हमने तो वो अनाज नहीं बनाया।
पीपल का पेड़ः राम तुम एक बहुत होशियार लड़के हो। यही सीखने का अच्छा तरीका है – बस प्रश्न पूछते रहो। तब तक प्रश्न पूछो जब तक तुम सच की जड़ तक नहीं पहुँचो। अब ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें वही बताने जा रहा हूँ जिसे मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। आज से हजारों साल पहले मनुष्य लगभग उसी तरह रहते थे जैसे आज तुम्हारा मित्र बंदर रहता है। वे भोजन और फलों के लिए पेड़ों पर चढ़ते। वो बेर और कुकुरमुत्ते तोड़ते। वे जमीन के अंदर से कंद खोदकर निकालते। मनुष्य बिल्कुल भालू की तरह ही शहद इकट्ठा करते। वे कभी-कभी भालू की तरह ही अपने पंजों से मछलियों का शिकार करते। वे मांस के लिए अन्य जानवरों का शिकार करते। तब न तो आग थी, न हल और न ही घर और झोपडि़याँ। तब गाँव भी नहीं थे। फिर ग्राम देवता का सवाल ही पैदा नहीं होता है। लोग इधर-उधर से भोजन एकत्र कर अपना जीवन चलाते थे। परंतु अब लोग अपना भोजन उगाते हैं।
रामः पर अगर हम इस प्रकार जी सकते थे तो फिर हमने क्यों भोजन उगाया? देखो मेरे पिता और बड़ा भाई खेतों पर कितनी मेहनत करते हैं। क्या हम इतनी मेहनत किए बिना जिन्दा नहीं रह सकते?’
पीपल का पेड़ः हर समय पर्याप्त मात्रा में भोजन इकट्ठा करना सम्भव नहीं होता है। कभी-कभी सूखा पड़ता है जिससे नदी-नाले सूख जाते हैं। मछलियाँ मर जाती हैं। शिकारी जानवर दूर-दराज चले जाते हैं। फल भी नहीं मिलते हैं। एक बात और है – पूरे साल भर चीजें इकट्ठी करना सम्भव नहीं होता है। इंसान को भोजन इकट्ठा करके उसे संभाल-संजोकर रखना सीखना पड़ा। बारिश के बाद की फसल अक्सर बहुत अच्छी होती है। आप पूरे साल उस फसल का अनाज खा सकते हैं। अगर अधिक उपज होगी तो उससे ज्यादा लोग जीवित रह पायेंगे। मैं अपनी सबसे ऊपर की टहनी से पाँच बड़े गाँवों को देख सकता हूँ। पुराने जमाने में इस पूरे इलाके में मुझे पाँच लोग भी नजर नहीं आते थे।
रामः ठीक है। पर लोगों ने मेरे मोती जैसे कुत्ते क्यों बनाए?’
पीपल का पेड़ः पुराने जमाने में शिकार के समय भेड़िये भी आदमियों की तरह शिकार का पीछा करते थे। यह देख मनुष्यों ने कुछ भेडि़यों के बच्चों को पाला। इनमें से अधिकतर बड़े होकर दुबारा जंगली भेड़िये बने और चले गए। परंतु उनमें से कुछ मनुष्यों के साथ रहने लगे। वे लोगों के लिए शिकार का पीछा करने लगे। इसके बदले में लोग उन्हें बचा हुआ मांस और हड्डियाँ खाने को देते। इस प्रकार जंगली भेड़िये पालतू बने। अब हम उन्हें कुत्ते के नाम से जानते हैं।
रामः मुझे खुशी है कि लोगों ने ऐसा किया। अगर मोती नहीं होता तो मैं भला क्या करता? परंतु नन्दी की पीठ पर कूबड़ किस तरह आया? शायद वो शुरू से ही था। मुझे अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला।
पीपल का पेड़ः मनुष्यों के लिए जंगली हिरणों का लगातार पीछा करना काफी कठिन काम था। गाय-बैल भी जंगली जीव थे। परंतु वो धीमी गति से चलते थे। मनुष्य मांस के लिए उनका पीछा करते। कुछ समय बाद उन्होंने मोती की तरह ही कुछ गाय-बैल के बछड़ों को भी पालतू बनाया। इसके लिए उन्होंने सबसे तगड़े बछड़ों को चुना। उनमें से कुछ की पीठ पर छोटा कूबड़ था। कूबड़ के कारण लोगों को अधिक मांस मिलता था। इसके लिए वो लगातार कूबड़ वाले बछड़ों को चुनते रहे और उन्हें भरपेट खाने को देते रहे। इससे धीरे-धीरे कूबड़ बड़ा होने लगा। मनुष्यों को कूबड़ वाले गाय-बैलों को पालतू बनाना ज्यादा आसान लगा। गायें दूध देतीं। अब धीरे-धीरे लोग शिकार करने की बजाए गाय-बैल पालने लगे। इस तरह धीरे-धीरे नन्दी जैसे, बड़े कूबड़ वाले बैल विकसित हुए।
रामः यह तो बहुत होशियारी की बात है। पर यह अनाज कैसे विकसित हुए?’
पीपल का पेड़ः सदियों पहले मैंने लोगों को भूख मिटाने के लिए पत्ते और घास के बीज खाते हुए देखा था। इसके अलावा खाने को कुछ और नहीं था। धीरे-धीरे उन्होंने सबसे मोटे बीजों को छाँट कर अलग किया। सभी घासें एक-जैसी नहीं होती हैं। लोगों ने पाया कि अच्छी घासें सबसे मुलायम और नर्म मिट्टी में ही अच्छी उगती हैं। मुलायम मिट्टी सभी जगह नहीं मिलती है। परंतु अगर कंद को एक नुकीली छड़ से खोदकर निकाला जाए तो अगले साल उस जगह पर अच्छी घास उगेगी। इसी कारण लोगों ने मोटी घास के बीजों को बोने के लिए जमीन में गड्ढे खोदने शुरू किए। लोग अगली फसल के लिए हमेशा सबसे मोटे बीज ही बोते।
रामः हम अनाज के बीजों को तो इस तरह नहीं बोते हैं। हम हल से खेत जोतते हैं। लोगों ने हल का उपयोग करना कैसे सीखा?’
पीपल का पेड़ः इसे सीखने में उन्हें बहुत समय लगा। पहले उन्होंने नुकीली छड़ से जमीन की सतह को खुरचा। परंतु उससे कोई खास फायदा नहीं हुआ। वैसे, कच्चा अनाज खाने में बहुत अच्छा नहीं होता। इसके लिए इंसान ने आग की जानकारी हासिल की। शुरू में उन्हें जंगल की भीषण आग से डर लगता था। वे आग और जंगली जीवों को देखकर डर से भागते थे। फिर उन्होंने खाना पकाना सीखा। वे आग से मिट्टी के बर्तन पका पाये। जमीन की गहरी जुताई के लिए उन्हें ऐसी चीज की जरूरत थी जो अधिक ताकत से खींच सके। तब उन्होंने हल के टेढ़े फल को खींचने के लिए बैलों का इस्तेमाल करना शुरू किया। हल को खींचने के लिए मनुष्य को बड़े जानवरों की जरूरत थी। इसलिए उन्होंने जानवरों को मांस के लिए मारना बंद किया। इस प्रकार उन्हें नन्दी जैसे बढि़या और ताकतवर बैल मिले।
रामः जरा कल्पना करो मेरे नन्दी को मारने की! कितनी बेवकूफी की बात है। पर अभी आपने मनुष्य द्वारा खुद अपने निर्माण का जिक्र किया था।
पीपल का पेड़ः मैंने अभी तुम्हें बताया कि किस प्रकार मनुष्य को आग ने भयभीत करना बंद किया। शुरू में लोग आग को भगवान के रूप में पूजते थे। धीरे-धीरे इंसानों ने आग बनाना सीखी। इसके लिए उन्होंने दो सूखी लकडि़यों को आपस में रगड़ा। फिर उन्होंने मुझे और नन्दी को पूजना शुरू किया। हमने मनुष्य को भोजन दिया। मेरे फल अभी भी खाने योग्य हैं। परंतु अब लोगों को मेरे छोटे भाई अंजीर के फल ज्यादा स्वादिष्ट लगते हैं। अंजीर आकार में बड़ी और मीठी होती हैं। वैसे अंजीर का पेड़ छोटा और कमजोर होता है। उसे अच्छी मिट्टी की जरूरत होती है। और साथ में ढेर पानी की भी। जंगल की सफाई, कटाई हुई। लेकिन मैं भाग्यवश बच गया। कई बार जंगल में आग लगी और मेरे परिवार के तमाम सदस्य मारे गए। मैं कई बार बाल-बाल बचा। लोग आज भी आग, नन्दी और मेरी पूजा करते हैं। पर अब यह पूजा-उपासना कम हो रही है। हमने मनुष्य को नहीं बनाया। मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ।
रामः फिर किसने बनाया?’
पीपल का पेड़ः वर्तमान मनुष्य को खुद उसने ही बनाया है। शुरू में वो छोटा और बंदर जैसा अच्छा दोस्त था। परंतु वो निस्सहाय था। आग के बाद उसने धातुओं को खोजा। पहले तांबा। फिर लोहा। उससे पहले मनुष्य ने पत्थरों के औजार बनाए। लोगों ने शिकार के लिए तीर-कमान बनाए। उन्होंने भोजन को संचित कर सुरक्षित रखने के लिए टोकरियाँ और चमड़े के थैले बनाए। मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल बनाए। इस प्रकार लोगों को अधिक भोजन मिल पाया। खेती-बाड़ी की कठिन मेहनत ने मनुष्य को बलवान बनाया। लोग अपने सिर पर भारी बोझ ढोने लगे। इस कारण लोग सीधे खड़े होकर चलने लगे। लोगों ने झोपडि़याँ और घर बनाये। वे कपड़े पहनने लगे। पुराने जमाने में कई बड़े-बूढ़े मनुष्य भी मेरी छाँव तले नंगे रहते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम बचपन में नंग-धड़ंग घूमते थे।
रामः गर्मी के दिनों में मुझे अभी भी कपड़े बिल्कुल नहीं सुहाते हैं। परंतु मेरी माँ मुझे नंग-धड़ंग दौड़ने से मना करती हैं। अब मुझे आप एक बात और बतायें। यह भगवान कब आये?’
पीपल का पेड़ः पहले लोगों ने चीजों के उगने के बारे में जाना। उन्होंने उगती चीजों को अपने उपयोग के लिए इकट्ठा किया। इससे लोगों को लगा कि सभी चीजों को कोई महान माता जन्म देती है। हम अभी भी कहते हैं, ‘पृथ्वी हमारी माता है।फिर इंसान ने इकट्ठी की गई चीजों से कहीं ज्यादा चीजें खुद बनाना सीखीं। तब उसने सोचा, ‘मुझे भी किसी ने बनाया होगा?’ तब इंसानों ने भगवान को जन्म दिया। लोगों ने कहा, ‘भगवान ने हर चीज बनायी है।परंतु मुझे असली सच पता है। मैं मनुष्य के सभी भगवानों से अधिक बूढ़ा हूँ। मैंने मनुष्य को स्वयं खुद का निर्माण करते हुए देखा है। उसे अभी इस काम को और आगे बढ़ाना है। वो कभी-कभी मनुष्य जाति के अन्य लोगों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार करता है।
अब शाम ढलने लगी थी। राम की माँ एक टोकरी में लाल फूल लेकर आयीं। उन्होंने टोकरी को तालाब के किनारे रखा। फिर उन्होंने बूढ़े पीपल के पेड़ के सामने झुक कर उसका नमन किया। राम की मित्र मंडली वहाँ से खिसक ली। माँ ने कहा, राम, इधर आओ। जल्दी तैयार हो। आज रात को नन्दी को जलूस में सबसे आगे रहना है। तुम्हें पता है कि नन्दी अन्य गाय-बैलों से पहले पैदा हुआ था। चलो, नन्दी को घर ले चलकर उसे सजायें।

कवि भाषाविद् कितने आये । अंश अरब भी कह क्या पाये ॥(?)

3 टिप्पणियाँ

हाल में फेसबुक पर लिखा था….

फेसबुक पर निजी बातें नहीं लिखता रहा हूँ। समाज से बातों का जुड़ाव रहे, ऐसी कोशिश रही है। लेकिन आज एक निजी बात……


मई, 2006 में मुझे कृष्ण पर कुछ लिखने का (सच कहूँ तो महाकाव्य लिखने का, भले ई बुझाय चाहे नहीं बुझाय कि महाकाव्य क्या है 🙂 ) मन हुआ। जमकर भक्तिभाव से चौपाइयाँ, दोहे लिखा। पहला दोहा था।


अतिप्रिय राधाकृष्ण को करूँ नमन कत बार।

कौन पूछता है मुझे थक गये जब कर्तार॥

फिर उसी साल दो-चार पन्ने लिखे तब तक धर्म और भगवान से विश्वास उठ गया और फ़िर आज मैं वह नहीं हूँ, जो पहले था।

कैसे भक्ति के ‘महान’ गाने रवीन्द्र की गीतांजलि बन जाते हैं, या विनय पत्रिका, इसका गवाह मैं स्वयं हूँ! सब बस एक पागलपन है, कोरी कल्पना है। भक्ति गीत गाने से कैसे आँसू बहने लग सकते हैं, यह भी आस्तिकता के समय मैंने महसूस किया।

चलिए वह रचना यहाँ रख देते हैं। आस्तिकता के लगभग सभी चरणों या कुछ अनुभवों से गुजरने के बाद यह रचना हुई थी। आज की बात साफ़ अलग है। खैर, छोड़िए। “श्रीकृष्ण दर्शन” नाम से लिखने का इरादा किया था इसे। तीन दिन लिखने के बाद काम बंद! सो उतना ही है।

श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:
दोहा अतिप्रिय राधा कृष्ण को, करूं नमन कत बार । (?)
      कौन पूछता है मुझे , थक गये जब कर्त्तार ॥
चौपाई:

कोटि-कोटि वंदन महेश की । और साथ नंदन गणेश की ॥
देवराज औ पावक अक्षर । जन्मभूमि औ जननी भाष्कर ॥     
पवन पवनसुत श्रीहनुमत की । वसुंधरा गोकुल भारत की ॥
वेद पुराण ग्रंथ गीता की । वृंदावन औ मां सीता की ॥
छंद : भारती तुलसी गुरु से, विनती अब चंदन करे ।
    वाल्मीकि धनदेव की , भाँति विविध वंदन करे ॥
    भूधर नदी पंकज सुमन, जो सृष्टि का श्रृंगार है ।
    और जलधि जल जलद को, नमन शत-शत बार है ॥
चौपाई:

सूर मनोज अन्न अंबर की ।  संत सकल तरुवर हिमकर की ॥
दुर्गा मीरा गोपी सब की । मारे कृष्ण नदी में डुबकी ॥
वास करो मन में नारायण । लगे कृष्णमय हर क्षण हर कण ॥
दोहा: रा निकले ज्योहिं मुख से, त्योहिं मिले आनंद ।
      कहते मुख बंद हुआ, राम नाम सुख कंद ॥ (i)
      यमुना को मैं कर रहा, अगणित बार प्रणाम ।
      गंगा को सुमिरण करूं, जो है श्रीसुख धाम ॥
-04.05.06
______________________________________________________
चौपाई:

कलि सत त्रेता युग द्वापर औ । नवरस नभचर छंद अमर औ
जीव जगत सब गौरी कमला । पशु गौ नर नारी अतिविमला ॥
मीन कमठ शूकर वामन की । दसावतार विष्णु भगवन की ॥
परशुराम राघव हलधर की । कृष्ण बुद्ध कल्कि नरवर की ॥
छंद: वंदना मेरी सुनो हे, ध्यान दे केशव जरा ।
    है ये मस्तक क्या करूं, अज्ञान सागर से भरा ॥
कर सकूं वर्णन भला जो, इतनी क्षमता है कहाँ ?
    तेरे बिना इस मूढ़ का, क्यों चित्त रमता है यहाँ ॥
चौ.

चरण आपके सीस विधाता । महिमा सबकी बालक गाता ।
कवि भाषाविद् कितने आये । अंश अरब भी कह क्या पाये ॥(?)
कृष्ण कन्हैया अंतरयामी । क्षमा चाहता नीचा कामी ॥
दो.
    इसने दु:साहस किया, क्षमा करो घनश्याम ।
    लीला तव गाने चला, जिसका चंदन नाम ॥(2)
    तुम ही मेरे इष्ट हो, तुम ही मेरे तात ।
    तुम ही मेरे हो सभी, पिता प्रभु भी मात ॥
-05.05.06
______________________________________________________
   
चौ.
    धन्य धन्य मेरा विद्यालय । शिक्षादाताओं की जय-जय ॥
    मिले जहाँ चिंतन के डैने । भाषा सीखी जिनसे मैंने ॥
    हे हिंदी भाषानिर्माता ! औ संस्कृत हे भाषामाता ॥
    नमस्कार सब भाषाओं की । सभी ज्ञान के दाताओं की ॥
छं.   यंत्र के निर्माणकर्त्ता, और सभी वैज्ञानिकों ।
    इस जगत के रत्नगृह के, हे अमूल्य श्रीमाणिकों ॥
    कविता जगत के नरवरों, रचना तुम्हारी अमर हो ।
    देवगुरु वाचस्पति के, श्रीचरणों में ये सर हो ॥
चौ.
    सृष्टिसहायक जन्म मरण की । दुराचार औ सदाचरण की ॥
    दुराचार अगर नहीं रहते । प्रभु-महिमा सब कैसे कहते ॥
  धरती पालक सब किसान की । रसना, मानव तन महान की ॥
दो. दिशा अंक दस देश सब, धर्म अर्थ औ काम ।
    चंदन सबको नमन है, मोक्ष सहित तव नाम ॥(3)
-08.05.06

_______________

सिर्फ सॉरी शब्द कहना सही है ? ( फेसबुक से, भाग- 1)

3 टिप्पणियाँ

बहुत सारे विचार दिमाग में लिखने को उकसाते हैं, लेकिन इधर नहीं लिखा कुछ। सोचा कि फेसबुक पर कई बार कुछ अच्छे विचार तो उतर जाते हैं ही या कई बार कुछ काम का भी लिख दिया जाता है, तो उसे सँजोकर यहाँ प्रस्तुत करने का खयाल आया। पहला भाग प्रस्तुत हैः

31 जनवरी 2012
2012 को रामानुजन की याद में भारत में राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया गया है।

इस अत्यंत प्रतिभाशाली और महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन, जिन्हें दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शुमार किया जाता है, पर एक किताब आई, नाम था मैन हू नेव(या न्यू) इनफिनिटी किताब के लेखक थे राबर्ट कैनिगेल। कैनिगेल ने इस बहुप्रशंसित ग्रंथ को लिखने के लिए कुछ सप्ताह रामानुजन के जन्मस्थान में भी बिताये थे। यह किताब 1991 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। 


अब ज़रा ध्यान देनेवाली बात सुनें 
इस किताब का जर्मन अनुवाद 1993 में, जापानी अनुवाद 1994 में, कोरियाई संस्करण 2000 में, चीनी संस्करण 2002 में, इतालवी अनुवाद 2003 में, थाई अनुवाद 2007 में, यूनानी संस्करण 2008 में प्रकाशित हुआ। लेकिन तय है कि भारतीय भाषाओं के संस्करण अब तक नहीं आये हैं। किताब लिखे जाने को 20 साल बीत चुके हैं। किताब बहुत आवश्यक और बेहतरीन मानी गयी है। पृष्ठ 400 से ज्यादा हैं। 
क्या आपको इन भाषाओं में इस महान किताब के अनुवाद होने के वर्ष से उस भाषा के लोगों और उस भाषा के देश को लेकर कुछ पता चलता है! 
मुझे सबसे ज्यादा हिन्दी विरोधी लोगों के राज्य तमिल को लेकर अफसोस होता है क्योंकि इन्होंने अंग्रेजी के तलवे चाटने में कोई कसर छोड़ी और खुद तमिल का भला भी करते हैं, करनेवाले लगते हैं। उनके नाम पर हर साल एक दिवस मनानेवाले राज्य ने तमिल अनुवाद भी पेश नहीं किया है, जहाँ तक मेरी जानकारी है।
भारत जिनपर गर्व कर सकता है, ऐसे एकदम गिने चुने लोगों में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बचपन से उनको थोड़ा जाना हैएक आकर्षण पैदा होता हैमेरे सबसे प्रिय लोगों मे हैं रामानुजनहाँ 32 साल की उम्र में चल बसे थे वे
विशेष: रामानुजन के सामने विवेकानंद की देन का कोई महत्व नहीं है।
पढना चाहते हैं तो 
www.4shared.com/get/mABclt8P/The_Man_Who_Knew_Infinity_-_A_.html पर जाएँ…


30 जनवरी 2012
क्या अफसोस व्यक्त करने के लिए सिर्फ सॉरी शब्द कहना सही है ? सॉरी का अर्थ जितना होता है, उतना ही माफी माँगने के लिए प्रयोग करना ठीक वैसे ही है जैसे एक छोटा बच्चा जिसकी भाषा अभी अच्छी नहीं है, वह मुझे भूख लगी है कि जगह सिर्फ रोना शुरू कर दे या नानी की जगह सिर्फ नीकहे। सॉरी का अर्थ एक वाक्य कैसे हो सकता है। इसे कूटशब्द या कोड की तरह इस्तेमाल करना ऐसे लगता है जैसे भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कोई आतंकवादी अपने मित्र को संदेश भेज रहा हो। … … … असहमतियाँ विशेष रूप से आमंत्रित हैं।
×  ×  ×
गोपाल गोडसे की किताब गाँधी वध क्यों पढते वक्त एक बात हमेशा दिखती है कि वह कोई सनकी आदमी लिख रहा है, बोल रहा हैअदालत में नाथूराम का बयान देखने पर कितनों को महानता के दर्शन होते हैं लेकिन उस बयान मे सिवाय इस बात के कि गोडसे हिन्दू है, एक ब्राह्मण हैकोई बात महत्वपूर्ण नहीं होती… … कोई वैज्ञानिकता नहीं, कोई समझ नहीं लेकिन फिर भी गोडसे के भक्तों की कमी भी नहीं हमारे देश में।
26 जनवरी 2012
भारत में संविधान चुटकुले की किताब है!
×  ×  ×
प्रतियोगिता नहीं सहयोगिता… … यह होना चाहिए… … वरना हमारे देश में समस्याएँ खासकर बेरोजगारी बरकरार रहेगी ही। सही हूँ मैं ? … … और हमारे आधुनिक नौटंकीबाज विचारक मैनेजमेंटियाते हैं पटक पटक कर, लोगों को पीछे धकेल कर जीना सिखाते हैं… … वैसे ये क्या खाक़ सिखायेंगे!
25 जनवरी 2012
फिल्मों में नौकरों से, गँवारों से हिन्दी, क्षेत्रीय भाषाएँ बोलवाई जाती हैं, लेकिन साहब या मेमसाहब मालिक या अंग्रेजी बोलते हैं। स्कूल देखिएगा तो अंग्रेजी में पढ़ाई हो रही है। इसका सीधा सा अर्थ तो इतना ही है कि हिन्दी नौकरों की भाषा है, दाइयों की भाषा है?

170 देशों में नोटों पर अंग्रेजी का हाल

9 टिप्पणियाँ

इस साल का पहला लेख हाजिर है। व्यस्तताओं और स्वास्थ्य कारणों से इस महीने सक्रियता लगभग शून्य रही है। 
हाल ही में सोचा कि दुनिया के देशों में नोटों पर अंग्रेजी का कितना कब्जा है ? इसलिए लगभग 170 देशों के नोटों पर एक अध्ययन किया। निष्कर्ष वही सामने आया जो आता लेकिन अँखमुँदे विद्वानों से कुछ भी कहना बेकार सा लगता है। अंग्रेजी वाले देश जैसे कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, जमैका, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रिका आदि की बात तो करनी ही नहीं क्योंकि इन देशों मे तो अंग्रेजी ही चलती है। आइए एक नजर डाल लेते हैं इस अध्ययन पर। लगभग 170 देशों के नोटों को देखने के लिए अन्तर्जाल और कुछ वेबसाइटों का सहयोग मिला, यह एक बड़ी बात थी। नोटों के नंबर तक कई देशों में अरबी आदि भाषाओं में देखने को मिले। उदाहरण के लिए यमन, इराक आदि देखे जा सकते हैं। कुछ देशों में मात्र बैंक के नाम अंग्रेजी में मिले तो कुछ में सिर्फ मुद्रा या राशि अंग्रेजी में लिखी मिली और सब कुछ गैर- अंग्रेजी में। वहीं सबसे ज्यादा देश ऐसे थे, जहाँ अंग्रेजी की आवश्यकता नोट पर बिलकुल महसूस नहीं की गई और जैसा सोचता था, वैसा ही हुआ और ऐसे देश सबसे ज्यादा रहे। इनमें से 101 देश ऐसे हैं, जिनके नोटों पर अंग्रेजी बिलकुल ही इस्तेमाल नहीं की गयी थी यानी एक वाक्य तक अंग्रेजी का नहीं था। इनमें दुनिया के विकसित माने जाने वाले देशों में सबसे अधिक देश थे। उदाहरण के लिए जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्वीडेन, स्विटजरलैंड आदि।


मारीशस- 1000 रु० – 2001

      वर्तमान जानकारी के अनुसार 42 विकसित देश अभी हैं, जिनमें गैर-अंग्रेजी वाले देशों की संख्या 30 से अधिक है और उनमें से 20 से अधिक देश अपने नोटों पर अंग्रेजी का इस्तेमाल किसी भी रूप में नहीं करते।
रूस- 5000 रूबल- 2010- नोट का अगला भाग

रूस- 5000 रूबल- 2010- नोट का पिछला भाग

      फिलीपिन्स और डेनमार्क अपने नोटों पर सिर्फ बैंक का नाम अंग्रेजी में लिखते हैं और सब बातें गैर- अंग्रेजी में। इसी तरह नेपाल और जार्जिया राशि अंग्रेजी मे भी लिखते हैं और शेष बातें क्रमशः  नेपाली और जार्जियाई में। इस तरह इन चार देशों को भी गैर-अंग्रेजी का इस्तेमाल करनेवाला माना जा सकता है। फिर 105 देश ऐसे हो जायेंगे जो अंग्रेजी से मुक्त नजर आ सकते हैं।
      दुनिया के 170 में से भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान को लेकर 32 देश ऐसे थे जिनके नोटों पर अंग्रेजी मे बैंक के नाम और राशि लिखी मिली। कुछ देश बहुत छोटे भी थे। जिन 101 देशों के नोटों पर किसी भी रूप मे अंग्रेजी नहीं थी, उनकी कुल जनसंख्या 224 करोड़ से अधिक है। चीन को लेकर स्पष्टता कुछ कम ही हुई। वरना देशों की संख्या 102 और कुल जनसंख्या 359 करोड़ होती।
फिर भी यदि देशों की संख्या को आधार बनायें तब दुनिया के लगभग आधे देश अंग्रेजी के दास कम से कम नोटों पर नजर नहीं आये। कुछ लोग ज्यादा काबिल बनते हुए अपना फैसला अंग्रेजी के पक्ष में सुनाएँ, इससे बेहतर होगा कि 100 से अधिक देशों का खयाल जरूर कर लें। वरना ऐसे लोगों से भी पाला पड़ा है जो संसार के 4-5 देशों के, जिनमें अंग्रेजी चलती है, लोगों से बात करके अंग्रेजी को सारे संसार की भाषा घोषित किए देते हैं।
अगर भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़कर बात करें तो 288 करोड़ लोगों के ये चार देश बाहर निकल जाते है। फिर अंग्रेजी में राशि और बैंक के नाम लिखने वाले देशों की संख्या 32 से घटकर 28 और ऐसा करने वाले देशों की कुल जनसंख्या सिर्फ 73 करोड़ रह जाती है जो दुनिया की कुल जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत है। इस तरह दुनिया में देशों की संख्या के हिसाब से 20 प्रतिशत भी नहीं और जनसंख्या के हिसाब से 15 प्रतिशत भी नहीं हैं अंग्रेजी के भक्तजन! (जिन 170 देशों पर मैंने काम किया उनमें से 140 देशों की कुल जनसंख्या ही लगभग 600 करोड़ है और 600 करोड़ संसार की कुल जनसंख्या का 86 प्रतिशत है।) अब आप स्वयं तय करें कि आपके देश के रूपये पर क्या होना चाहिए ? वैसे तो अपने यहाँ व्यक्तिवाचक संज्ञाओं का अनुवाद भी होता है। सदाबहार उदाहरण भारत का इंडिया के रूप में मौजूद है! (वे लोग यहाँ लिखने से बचें जो आकर कहना चाहते हों कि हमारे सोचने- लिखने- कहने से क्या होगा ?) 

हिन्दी.blogspot.com या हिन्दी.tk लिखिए जनाब न कि hindi.blogspot.com या hindi.tk

14 टिप्पणियाँ

हाल ही में अनिल.blogspot.com से गुजरा। अचंभित था कि ब्लॉग का नाम तो हिन्दी में दिखता है, लेकिन ब्लॉग का पता जिसे यू आर एल कहते है, वह हिन्दी में, अपनी लिपि नागरी में! फिर वहाँ अपनी प्रतिक्रिया में भी यह पूछ बैठा कि यह कैसे होगा? अगले दिन अपने फुरसतिया जी फेसबुक पर फुरसत में मिल गये। उनसे पूछा और बस धीरे-धीरे काम हो गया। अब आप भी देख लीजिए कि कैसे होता है ये सब! उम्मीद है कि बहुत कम लोग जानते होंगे। तो क्यों न हिन्दी ब्लॉगों के आधे पते, जिनपर हमारा बस चलता है (क्योंकि ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम तो रहेगा ही। मालिक हम नहीं, ब्लॉगर है, गूगल है), उनको अपनी भाषा हिन्दी के साथ-साथ अपनी लिपि नागरी में कर दिया जाय। लेकिन लफड़ा यह है कि ब्लॉग तो बन चुका है। फिर तरीका तो एक ही है कि नया ब्लॉग बनाया जाय। कौन-सा पैसा लगता है! और फिर उस ब्लॉग के साथ अपने वर्तमान ब्लॉग को ऐसे बाँध दिया जाय कि नये ब्लॉग पते पर जाते ही वर्तमान ब्लॉग खुल जाय। इसे तकनीकी भाषा में रिडायरेक्ट करना कहते हैं। चलिए, यही सब यहाँ देखते-करते हैं।

     आपके पास अपना ब्लॉग है ही। आपको सबसे पहले एक नया ब्लॉग बनाना होगा जिसके पते में आप नागरी लिपि का इस्तेमाल चाहते हैं। जैसे एक ब्लॉग जिसका यू आर एल ( पता या वेब एड्रेस ) हो – हिन्दी.blogspot.com , यह हमें बनाना है। सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि ब्लॉगस्पॉट पर हिन्दी नाम से हम ब्लॉग बना पाएंगे या नहीं? आप पहले भी ब्लॉग बनाते समय इस प्रक्रिया से गुजर चुके हैं। ब्लॉगर ब्लॉग बनाते वक्त हमसे हमारा अभीष्ट या मनोवांछित ब्लॉग पता ( या यू आर एल) पूछता है, फिर उसकी उपलब्धता जाँचकर बताता है कि हमारे द्वारा दिया गया पता हमें मिल सकता है या नहीं? फिलहाल हमें नागरी लिपि में पता चाहिए, इसलिए हमें यह जान लेना चाहिए कि वास्तव में हमारा पता दिखेगा हिन्दी.blogspot.com की तरह लेकिन यह बाह्य दृश्य होगा, न कि मूल रूप से ऐसा होगा। 
     सबसे पहले आपको यहाँ जाना है। यहाँ जानेपर आप यूनिकोड से पनीकोड में किसी वेब पते का या शब्द का परिवर्तित रूप देख सकते हैं। आप जिस पते को प्राप्त करना चाहते हैं, उसको हिन्दी में यानी नागरी लिपि में लिख कर नीचे नार्मल टेक्स्ट टू पनीकोड बटन दबायें। अब आपको अगले बॉक्स में xn-- से शुरू होने वाला एक कोड मिलेगा। नीचे चित्र में देखें।

यहाँ सिर्फ हिन्दी लिखकर भी पनीकोड में बदला जा सकता था। आप देख रहे हैं कि हिन्दी की जगह j2bd4cyah0f मिला। xn-- सबमें मिलेगा। यानी हिन्दी का पनीकोड रूप j2bd4cyah0f मिला। बस हो गया आधा काम। अब आप अपने ब्लॉगर के डैशबोर्ड में जाकर नया ब्लॉग बनाने का विकल्प चुनें। नया ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया से आप परिचित होंगे ही। नये ब्लॉग के लिए जब ब्लॉगर आपसे ब्लॉग पता माँगे, तब आप पनीकोड वाले शब्द को रखे। ध्यान रहे यहाँ पनीकोड को लिखते समय में xn— छूट न जाय। पनीकोड बहुत महत्वपूर्ण है। चित्र में आप देख सकते हैं।

इस तरह आप नया ब्लॉग तो बना चुके। अब आप ब्राउजर में पता हिन्दी.blogspot.com भरेंगे और आपका ब्लॉग खुल जाएगा।
अब अगर आप पहले से ब्लॉग के स्वामी हैं, तो आप भला क्यों सारे लेखों को इस नये ब्लॉग पर डालना चाहेंगे? वैसे यह भी आसान है और ब्लॉगर इसकी सुविधा देता है। लेकिन हम यहाँ यह चाहते है कि नये पते को ब्राउजर में भरते ही आपका वर्तमान ब्लॉग खुल जाय, तब? अब देखिए कि यह कैसे किया जा सकता है।
आप पहले अपने डैशबोर्ड में जाकर नये ब्लॉग के (जैसे यहाँ हिन्दी.blogspot.com) डिज़ाइन में जाकर HTML मे संपादित करें चुनें। फिर <b:include data=’blog’ name=’all-head-content’/> को खोजिए। कंट्रोल के साथ एफ दबाकर भी खोज सकते हैं। यह अंश मिल जाने पर ठीक इसके बाद <meta content=’0;url=http://hindibhojpuri.blogspot.com‘ http-equiv=’refresh’/> चिपका देना है। यहाँ url= के बाद आप उस ब्लॉग का पता भरें जिससे हिन्दी.blogspot.com पर जाते ही वह ब्लॉग खुल सके। जैसे यहाँ तिरछे अक्षरो में मेरे ब्लॉग का पता url= के बाद रखा गया है, वैसे आप भी कर सकते हैं।
चित्र में देखिए।

डॉट टीके से

अगर आपके ब्लॉग का नाम बड़ा है और आप चाहते हैं कि यह छोटा हो सके ताकि दूसरों को बताते समय, उन्हें छोटा नाम याद रखना पड़े, तो डॉट टीके की सहायता ली जा सकती है। यानी आप ब्लॉग के पता में अब सिर्फ .tk लिखकर काम चला सकते हैं। इस तरह अब हिन्दी.blogspot.com की जगह सिर्फ हिन्दी.tk से काम चला सकते हैं। डॉट टीके पर पता पाने के लिए आपको पनीकोड में बदले बिना अपने ब्लॉग का पता सीधे नागरी-यूनिकोड में भरना होता है। आप जैसे ही डॉट टीके खोलेंगे, आपके सामने यह होगाः

आप यहाँ सीधे इच्छित डोमेन नाम भरें, फिर गो बटन दबाएँ। उपलब्धता के आधार पर आपको आगे बढना होगा। यह बहुत आसान है। जैसे मैंने हिंदी भरा (यहाँ आपको पनीकोड में बदलने की जरूरत नहीं है) ताकि हिंदी.tk नाम मुझे मिल सके। यह नाम उपलब्ध था। फिर अगले चरण में आप उस ब्लॉग या साइट पते को भर सकते हैं, जिसे आप अपने .tk डोमेन पर जाते ही खोलना चाहते हैं। नीचे चित्र देखें-


फारवर्ड दिस डोमेन टू चुनते हुए यूज योर न्यू डोमेन के बॉक्स में उस ब्लॉग का पता भरें, जिसे आप अपने .tk डोमेन पर जाते ही खोलना चाहते हैं। जैसे मैंने अपने ब्लॉग का पता भर दिया। रजिस्ट्रेशन लेंथ में 12 महीने चुन लें। अभी जैसी कि मेरी जानकारी है, मुफ्त में नवीकरण या रिन्यूअल कराते हुए हम इस समय अवधि को फिर से विस्तार दे सकते है।
.tk के नियम-कानून आप यहाँ पढ सकते हैं। फिलहाल इतना ही ध्यान देना है कि सिर्फ तीन डॉट टीके नाम आप इस्तेमाल कर सकते हैं। (हम कितने शरीफ़ हैं, आप जानते ही है) याद रहे कि मुफ़्त सेवा में कोई गारंटी नहीं होती। बस यही नियम हैं। एक और नियम कि आपकी उम्र 18 साल से ज्यादा हो, यह कोई बात हुई?
हाँ, तो हो गया काम। अब जब कोई हिंदी.tk खोलेगा तब, मेरा ब्लॉग खुल जायेगा। ज्यादा माथापच्ची नहीं करके आजमाइए इसे।
एक और लाभ है अपनी लिपि मे ब्लॉग पता रखने का
       
    हिन्दी या हिंदी का लफड़ा स्वाभाविक है। क्योंकि हमारे लिए भले ही यह एक ही शब्द है लेकिन मशीन के लिए ये दो अलग-अलग शब्द हैं। इस अनुस्वार की समस्या से बचने के लिए मैंने हिन्दी और हिंदी दोनों नामों से ब्लॉस्पॉट और टीके, दोनो जगह सारी सेटिंग एक ही रख दी ताकि दोनों में से किसी एक के लिखने पर ब्लॉग खुले। लेकिन इस अनुस्वार को छोड़ दें तो अपनी लिपि में पता रखने के बड़े फायदे हैं। मान लीजिए अंग्रेजी में एक ब्लॉग हैं kamal या bharadwaj, अब पढनेवाला इसे क्या पढे? कमल या कमाल या कामल, भरद्वाज या भारद्वाज या भारद्वज या भाराद्वाज या भारदवज या भरदवज? हिन्दी या संस्कृत में भरद्वाज और भारद्वाज दो अलग शब्द हैं और इनके अर्थ भी अलग हैं। एक पिता है और दूसरा पुत्र। यह रोमन लिपि के कारण स्पष्ट नहीं हो सकता। इसका समाधान है नागरी लिपि। तो अपनी लिपि का फायदा उठाने में पीछे क्यों रहें, जबकि यह शुद्धता और स्पष्टता की ओर ले जाती है।
परदे के पीछे
वास्तव में हिन्दी.blogspot.com ब्लॉग का पता होगा यह http://xn--j2bd4cyah0f.blogspot.com लेकिन यह अब मशीन की जिम्मेदारी है कि वह हिन्दी.blogspot.com को http://xn--j2bd4cyah0f.blogspot.com में बदलकर तब खोले। पनीकोड का सारा खेल नये ब्राउजरों में होता है जैसे मोज़िला, गूगल क्रोम आदि में। इंटरनेट एक्सप्लोरर के नये संस्करणों में भी होना चाहिए। इंटरनेट एक्सप्लोरर के बारे में नहीं कह सकता क्योंकि इसपर मैंने देखा नहीं। सम्भवतः इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 या उसके बाद के संस्करणों में पनीकोड सहायता मौजूद होनी चाहिए।
पनीकोड क्या है, इस लफड़े में पड़ने की जरूरत नहीं। बस अपनी लिपि में ब्लॉग पता बन गया, बात खतम!
तो क्यों नहीं आज से सब अपने ब्लॉग का पता अपनी लिपि में कर दें। आपका क्या खयाल है? इसे अधिक से अधिक ब्लॉगरों तक पहुँचाइये। एक आन्दोलन बना दें इसको… 



12:14 / 23 दिसम्बर 2011- 

रिडायरेक्ट करते वक्त <b:include data=’blog’ name=’all-head-content’/> खोजने में जिन्हें परेशानी या मुश्किल मालूम पड़ती हो, वे 15वीं पँक्ति में देखें (डिजाइन के एचटीएमएल संपादित / एडिट वाले विकल्प में)  <b:include data=’blog’ name=’all-head-content’/> अंश मिलेगा। बस इसके बाद <title><data:blog.pageTitle/></title> मिलेगा। आपको इन दोनों के बीच  <meta content=’0;url=http://hindibhojpuri.blogspot.com’ http-equiv=’refresh’/> वाला अंश रख देना है, जिसमें ब्लॉग का पता होना चाहिये। यानी आपको 15वीं और 16 पँक्ति के बीच <meta content=’0;url=http://hindibhojpuri.blogspot.com’ http-equiv=’refresh’/>, ऐसा अंश  रख देना है। इस तरह  पहले की 16वीं पँक्ति अब 17वीं पँक्ति हो जाएगी।


हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में हाथ से लिखते समय झ एक जैसे…

2 टिप्पणियाँ

आज बस एक इतना ही…

ग्यान और भाखा – राहुल सांकिर्ताएन

3 टिप्पणियाँ

भाषा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस चिट्ठे का नाम भी हिन्दीभोजपुरी है। तो जाहिर है कि भाषा सम्बन्धी लेख यहाँ अक्सर पढने को मिलेंगे ही। राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ या ‘भागो नहीं बदलो’ से एक अध्याय यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। इस किताब पर एक विस्तृत लेख इसी महीने पढने को मिलेगा। फिलहाल यह अध्यायजो किताब का सत्रहवाँ अध्याय हैयहाँ प्रस्तुत है। इस किताब की भाषा बड़ी लचकदार है। शुद्धतावाद के पक्षधरों के लिए यह भाषा एक चुनौती है। राहुल जी ने इस किताब की भूमिका में ही लिखा है कि यह किताब छपराबलिया इलाके की भाषा के असर के साथ हिन्दी में लिखी जा रही है। इस किताब में ‘’ के लिए ‘’, ‘’ के लिए ‘’, ‘ज्ञ’ के लिए ‘ग्य’ जैसे कई प्रयोग थे। हमारे इलाके में ऐसी ही भाषा बोली जाती है। किताब में कुछ पात्र हैं और पूरी किताब संवादात्मक शैली में लिखी गयी है। ‘भैया’ कोई गप्पी नहीं बल्कि एक प्रबुद्ध चिन्तक और विद्वान है। ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ सामान्य किसान हैं और ‘सोहनलाल’ एक पढ़ा-लिखा और शहर में रहनेवाला युवक है। किताब की भूमिका से लगता है कि ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ नाम के दो व्यक्ति थेऔर एक साधारण पढा-लिखा व्यक्ति जो मात्र  6-7 तक पढ़ पाया होवह भी समझ सकेराहुल जी के लिए इस किताब की भाषा को इस लायक मानने के आधार भी थे।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि यह किताब 1945-46 के आस-पास की हैतो जाहिर हैकिताब पर उस समय का असर कई जगह दिखता है। बँगला और उर्दू को लेकर बंग्लादेश में चले लफड़े का पूर्वानुमान भी राहुल जी ने लगाया थाइसका अन्दाजा इस अध्याय के आखिरी वाक्य से लगता हैजो इंदिरा गाँधी के समय सच भी साबित हो गया।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है इस अध्याय को पूरी तरह टंकित भी मैंने नहीं किया है। इसे ओसीआर साफ्टवेयर की सहायता से यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
राहुल जी ने इस किताब में अपना नाम ‘राहुल सांकिर्ताएन’ लिखा है। इसे अलग-अलग टुकड़ो में देना उचित नहीं लगाइसलिए पूरे अध्याय को एक ही बार में यहाँ रखा जा रहा है। थोड़ा अधिक समय लगेगा पढने में। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

 अध्याय 17
ग्यान और भाखा
सोहनलालदुक्खू मामाअभी तक हमने भैया से बहुत सँभलसँभल के सवाल पूछा हैअब एकाध अपने मन का भी सवाल पूछ लेने दो।
दुखराम: पूछो भैनेहम भी सुनेंगेलेकिन दो चार आना हम भी समझें ऐसा पूछना।
सोहनलाल: नहीं समझ पाओगे दुक्खूमामातो दो ही चार आना भरनही तो सभी समझोगे। अच्छा तो भैयाजोकें जो कहती हैंकि जितना ग्यानविग्यान दुनिया में हैवह सब हमने ही पैदा किया हैहम  रहेंगे तो दिया बुझ जायगा।
भैया: हम कब कहते हैं जोंको ने कभी अच्छा काम किया ही नहीं लेकिन जो दिया बुझ जाने की बात कहते हैंवह गलत है। हम दिया बुझने नहीं देंगे। हमारे कमेरों के राज में ग्यानविग्यान बहुत चमकेगा। वहाँ ग्यान के विना कुछ हो भी नहीं सकता। जोंको के राज में आज अपढ़अबूझ हलवाहे से भी काम चल सकता है लेकिन हमारे लिए तो मोटरहल चलानेवाले हलवाहे चाहिए। राज सँभालते ही पहला काम हमें यह करना पड़ेगा कि देसभर में कोई बेपढ़ नहीं रहे।
दुखराम: लेकिन भैयाकितने लोगो में तो जेहन ही नहीं होतीवह कैसे पढ़ेंगे ?
भैया: जोंकों की जैसी पढ़ाई होगीतब तो सबको पढ़ नहीं बना सकते। जोंकें बिद्दा पढ़ाने के लिए भाखा पढ़ाती हैंअपनी भाखा पढ़ावे तो कोई उतनी मेहनत नहीं लेकिन वह पढ़ाती हैं अंगरेजीफारसीअरबीसंसकीरत। जो हम देस भर को अंगरेजी पढ़ा देने की परतिग्या करेंगे तो वह सात जनम का काम है दुक्खू भाईहम तो बल्कि भाखा पढ़ायेंगे ही नहीं। क्या कोई आदमी गूँगा है कि भाखा पढ़ायें। लोग कथाकहानी कहते हैंहँसीमजाक करते हैंदेसबिदेस की बात बतलाते हैंसब अपनी ही भाखा में कहते हैं बस हम पहले तो यही कहेंगे कि दोतीन दिन में अच्छर सिखला देंगे। अड़तालिस अच्छर तो कुल हई हैं। दोतीन नहीं तो पाँचछः दिन लग जायेंगेफिर आदमी जो भाखा बोलता हैउसी में छपी किताब हाथ में थमा देंगे।
दुखराम: ऐसा हो भैयातब पढ़ना काहे का मुस्किल हो।
भैया: ढोलामारुसारंगासदाव्रिच्छलोरिकीसोरठीनैकाकुँअरि विजयमलबेहुला के कितने सुन्दरसुन्दर खिस्से और गाने हैं। इन्हीं को छाप के दे दिया जायतब कहो दुक्खू भाई!
दुखराम: तो बूढ़े सुग्गे भी रामराम करने लगेंगे क्या किसी को पढ़ने में परिस्त्रम मालूम होगा।
भैया: बिद्दा अलग चीज है दुक्खू भाईभाखा अलग चीज है। लेकिन जोंकें हमको सिखलाती हैं कि भाखा पढ़ लेना ही ग्यान है। यह ठीक है कि ग्यान सिखाते बखत उसे किसी भाखा में बोला जाता है। लेकिन अँगरेजी में काहे बोला जायअरबीसंसकीरत में काहे बोला जायउसे अपनी बोली में काहे  बोला जाय।
सोहनलाल: लेकिन बोली तो पांच कोस पर बदल जाती है। ऐसा करने से तो हजारों भाखा बन जायेगीऔर कौनकौन में किताब छापते फिरेंगे?
भैया: पाँच को नहीं जो 5 अंगुल पर ही भाखा बदल जायतो भी हमको उसी में किताब छापनी पड़ेगी। तभी हम दस बरिस के भीतर अपने यहाँ किसी को बेपढ़ नहीं रहने देंगे।
सोहनलाल: लेकिन हिन्दी भी तो अपनी भाखा है।
भैया: जिसकी अपनी भाखा होउसे हिन्दी ही में पढ़ाना चाहिएतुम्हारे बनारस में सब लोग घर में हिन्दी ही बोलते हैं?
सोहनलाल: किताब वाली भाखा तो नहीं बोलते भैयाबोलते तो हैं वही बोली जो बनारस जिला के गाँव में बोली जाती है।
भैया: जो   अच्छी तरह सिखा दिया जाय तो अपनी बोली में आदमी कितने दिनो में सुद्धसुद्ध लिखने लगेगा?
सोहनलाल: अपनी बोली को तो भैयाअसुद्ध कोई बोल ही नहीं सकता। अच्छर में चाहे भले ही एकाध गलती हो जायलेकिन व्याकरन की गलती कभी नहीं होगी।
भैया: और हिन्दी कितना दिन पढ़ने पर व्याकरन की गलती नहीं करेगा।
सोहनलाल: कोईकोई आदमी तो भैया जिन्दगी भर पढ़ने पर भी  सुद्ध बोल सकते हैं  लिख सकते हैं।
भैया: लेकि अपनी बोली को तो आदमी चाहे भी तो असुद्ध नहीं बोल सकतायह तो मानते ही हो। अच्छा जिनगी भर हिन्दी  बोलनेवालों की बात छोड़ो। मामूली तौर से सुद्ध हिन्दी लिखनेबोलने में कितना समय लगेगा। हमारे गाँव के एक लड़के को ले लोजिसकी भाखा हिन्दी नहीं बल्कि भोजपुरी या बनारसी है।
सन्तोखी: मैं कहूँ भैयाहमारे यहाँ लड़के आठ बरस पढ़ के हिन्दी मिडिल पास करते हैंलेकिन तो भी  सुद्ध हिन्दी बोल सकते हैं लिख सकते  हैं।
भैया: सोहन भाईतुम इन्ट्रेन्स पास वालों की बात कहो।
सोहनलाल: जब पूछते ही होतो मैं बतलाता हूँ कि कितने तो बीपास कर के भी सुद्ध हिन्दी लिखबोल नहीं सकते।
भैया:  मैं आठ साल पढ़े मिडिल वाले को लेता हूँ  बीकी चौदह साल की पढ़ाई। मैं इतना समझता हूँ कि आदमी की जेहन बहुत खराब  हो और भाखा ही भाखा पढ़ता रहे तो पाँच बरस तो जरूर ही लगेंगे। लेकिन हिसाब और दूसरी चीज साथ ही साथ पढ़नी होतब काम नहीं बनेगा। हमारे मदरसों में जो हिसाबजुगराफिया सब कुछ अपनी ही भाखा में पढ़ना होतो पाँच बरस क्या भाखा सीखने में एक दिन भी नहीं देना होगा। ग्यान है हिसाबजुगराफियाइतिहासखेती की बिद्दाइंजन की बिद्दासड़कपुल मकान बनाने की बिद्दा और पचीसो तरह की बिद्दा। ग्यान पढ़ाने के लिए जब हम यह सरत रख देते हैं कि जब तक तुम पराई भाखा  पढ़ोगेतब तक ग्यान में हाथ नहीं लगा सकतेतब वह बहुत मुस्किल हो जाता है।
सन्तोखी: हम लोगों की भाखा को तो भैयालोग गँवारू कहते हैं।
भैया: आइलगइल”, “आयन गयन”, “आयोगयो”, “एलगेल” बोलने से तो गँवारु भाखा हो गईऔर आयेगये” कहने से वह अच्छी भाखा होगी। और कम् वेन्ट” कहने से वह बहुत अच्छी भाखा हो गई। काहेसे वह साहेब लोगों की भाखा है। साहेब लोगों का डंडा  सिर पर हैउनका राज हैइसलिए अँगरेजी बोली बहुत अच्छी भाखा हैवह देवताओं की भाखा से भी बढ़कर हैलेकिन जब साहब लोगों का राज  रहेऔर गँवार यही किसानमजूर अपना पंचायतीराज काय कर लेंतो क्या तब भी उनकी भाखा गँवारू रहेगीयह तो जिसकी लाठी उसकी भेंस” वाली बात हुई। गँवारू कह देने से काम नहीं चलेगा। जिस बखत इसी गँवारु भाखा में इसकूलकालेज सब जगह चौदह बरस तक पढ़ी जानेवाली बिद्दा पढ़ाई जायगी उसी में हजारों किताबें छपेंगी। उपन्यासकविताकहानी सब कुछ गँवारू भाखा में मिलने लगेगा। रोजानाहफ्तावारमाहवारीअखबार निकलने लगेंगेतब इस भाखा को कोई गँवारू नहीं कहेगा।
दुखराम: क्या ऐसा होगा भैया?
भैया: जो तुम लोग हमेसा गँवार बने रहना चाहोगेतो नहीं होगाजो तुम हमेसा गुलाम बने रहोगेतो भी नहीं होगाजो हिन्दुस्तान के आधे आदमियों को बेपढ़ बनाये रखना हैतो नहीं होगानहीं तो इसमें  अनहोनी कौनसी बात हैबल्कि अपनी बोली पकड़ने से तो छः बरस का रस्ता एक दिन में पूरा हो जाता है।
सोहनलाल: लेकिन अपनीअपनी बोली पढ़ाई जाने लगीतो दरभंगाबनारसमेरठ और उज्जैन के आदमी एक जगह होने पर कौनसी भासा बोलेंगे?
भैया: आज भी गौहाटीढाकाकटकपूनासूरतपेसावर के आदमी एकट्ठा होने पर क्या बोलते हैं।
सोहनलाल: हिन्दी बोलते हैंटूटीफूटी हिन्दी से काम चला लेते हैं।
भैया: लेकिन इकट्ठा होने का ख्याल करके उनसे यह नहीं  कहा जाता कि तुम असामीबँगलाउड़ियामराठीगुजरातीपस्तो छोड़ के हिन्दीसिरिफ हिन्दी पढ़ोनहीं तो कभी जो इकट्ठे होओगे तो बात करने में मुस्किल पड़ेगा। जैसे उन लोगों को अपनी भाखा में सब कुछ पढ़ाया जाता हैउसी तरह दरभंगा वालों को मैथिलीभागलपुर वालों को भगलपुरिया ( अंगिका )गया वालों को मगही,  छपरा वालों को छपरही ( मल्ली )लखनऊ वालों को अवधीबरैली वालों को बरैलवी ( पंचाली ),  गढ़वाल वालों को गढ़वालीमेरठ वालों को मेरठी ( खड़ी बोली या कौरवी )रोहतक वालों को हरियानवी ( यौधेयी  )जोधपुर वालों को मारवाड़ीमथुरा वालों को ब्रजभाखा,  झाँसी वालों को बुन्देलखंडीउज्जैन वालों को मालवीउदयपुर वालों को मेवाड़ीझालावाड़ वालों को बागड़ीखँड़ुआ वालों को नीमाड़ीछतीसगढ़ वालों को छतीसगढ़ी सबको अपनीअपनी भाखा में पढ़ाया जाय।
सोहनलाल: पढ़ाने में तो सुभीता होगा भैयाहर आदमी का पाँचपाँच साल बच जायेगा और डर के मारे जो बीच ही में पढ़ाई छोड़ बैठते हैंवह भी बात नहीं होगी लेकिन हिन्दी भाखावालों का एका टूट जायगा।
भैया: एका टूटने की बात तो इस बखत नहीं कह सकते हो सोहन भाईइस बखत तो एका सिर्फ दिमाग में है। मध्य प्रान्त अलग हैयुक्त प्रांत और बिहार भी अलग हैहरियाना भी पंजाब में है ओर रियासतों ने छप्पन टुकड़े कर डाले हैंइसे आप देखते ही हैं।
सोहनलाल: लेकिन हम तो चाहते हैं कि सबको मिलाकर हिन्द का एक बड़ा सूबा बना दिया जाय।
भैया: सूबा नहींपंचायती राजप्रजातंत्र। सूबा क्या हम हमेसा विदेसी जोंकों के गुलाम बने रहेंगेऔर अपना राज होने पर किसी सुरुजबंसी को दिल्ली के तख्त पर बैठायेंगेहमारा पंचायती राज रहेगाजो एक नहीं बहुत से पंचायतीराजों का संघ होगा। जो लोग चाहेंगे तो दरभंगा से बीकानेरऔर गंगोत्तरी से खँडवा तक का एक बड़ा प्रजातंत्रसंघ काय कर लेंगे जिसके भीतर पचीसों प्रजातंत्र रहेंगे।
सोहनलाल: तो भैयामल्ल प्रजातंत्र की बोली मल्लिका रहेगी और मालव प्रजातंत्र की मालवीयौधेय (अंबाला कभिश्नरीप्रजातंत्र की हरियानवीफिर जब वह हिन्द प्रजातंत्र संघ की बड़ी पंचायत (पार्लामेण्ट)  में बैठेंगेतो किस भाखा में बोलेंगे?
भैया: हिन्दी में बोलेंगे और किसमें बोलेंगे ? इन्हीं की बात क्यों पूछ रहे होमदरासकालीकटबेजवाड़ा,  पूनासूरतकटककलकत्ता और गोहाटी के मेम्बर भी जब सारे हिन्दुस्तान के प्रजातंत्र संघ की बड़ी पंचायत में इकट्ठा होंगेतो क्या वह अंगरेजी में लेच्चर देंगे। अंगरेज जोंको के जुवा के उतार फेंकने के साथ ही अंगरेजी भाखा का जोर हिन्दुस्तान में खतम हो जायगा तब हिन्दुस्तान में एक दूसरे के साथ बोलनेचालने और सारे देस की सरकार के कामकाज के लिये एक भाखा की जरूरत होगीतो वह भाखा हिन्दी ही होगी!
सोहनलाल: तो भैयाहिन्दी भाखा को तो तुम उजाड़ना नहीं चाहते हो ?
भैया: हम उजाड़ेंगे कि उसे और मजबूती से बसावेंगे। सारे हिन्द प्रजातंत्र संघ की वह संघ भाखा होगी। मदरसों में जैसे अंगरेजी के साथ दूसरी भाखा पढ़ाई जाती हैवैसे ही बारह बरस की उमर से 3-4 साल तक लड़कों को हर रोज एक घंटा हिन्दी पढ़नेका कायदा बना देंगे। उस बखत हिन्दी का जोर और बढ़ेगा कि घटेगा?
सोहनलाल: आज तो हिन्दी ही हिन्दी सब कुछ हैफिर तो ब्रिजमालवीमैथिली  अपने घर की मालकिन बन जाऐंगीफिरर बेचारी हिन्दी को जब कोई बुलायेगा तभी  चौखट के भीतर आयेगी।
भैया: आजकल यह कहना तो गलत है कि हिन्दी सब कुछ हैकाहेसे कि सब कुछ तो अंगरेजी है। दूसरे हिन्दी के चौखट के भीतर बैठाने की बात भी ठीक नहीं है। मेरठ कमिश्नरी के साढ़ेतीन जिले, ( मेरठमुजफ्फरनगरसहारनपुर,  देहरादून .5, बुलंद सहर 1/4 की भी तो जनम भाखा वही है। उसके बाद सारे हिन्दुस्तान में घरघर मे उसकी आव भगत रहेगी।
सोहनलाल: तो लोग अपनीअपनी भाखा का प्रजातंत्र बना लेंगेफिर तो हिन्दुस्तान सौ टुकड़ों में बँट जायेगा।
भैया: सोवियत की आबादी हम लोगों से आधी है20 करोड़ ही हैलेकिन वहाँ तो 182 भाखा बोली जाती है और सबका अपना छोटाबड़ा पंचायतीराज है। तुम चाहते हो कि पाँचों उगुँलियों को खुला नहीं रखा जाय बल्कि मिलाके सी दिया जायलेकिन इससे हाथ मजबूत नहीं होगा सोहन भाईसोवियत 182 प्रजातंत्र वाला होने पर भी एक बड़ा प्रजातंत्र है। हिन्दुस्तान भी 100 प्रजातंत्रों वालाएक बड़ा प्रजातंत्र हो तो कौनसी बुरी बात है?
सोहनलाल: अच्छा तो यही होता कि सारे हिन्दुस्तान का एक ही प्रजातंत्र होता?
भैया: अच्छा तो होता जो हिन्दुस्तान के लेग एक ही बोली बोलते होतेलेकिन वह तो अब हमारे हाथ में नहीं है। क्या सारे हिन्दुस्तान का तुम एक सूबा बनाना चाहते हो?
सोहनलाल: नहीं सूबा तो हम अलगअलग चाहते हैं। बंगालउड़ीसासिन्ध सबको मिटाकर एक सूबा तो बनाया नहीं जा सकता।
भैया: अंगरेजी राज में जो आज सूबा है और 12 लाख सालाना खरच पर वहाँ लाट साहब लाके बैठाये जाते हैंवही तब प्रजातंत्र कहा जायगाजिसका राजकाज पंचायत के हाथ में होगाअनेक सूबा को तो तुम मानते ही होउसका मतलब ही है कि अनेक प्रजातंत्र हिन्दुस्तान में रहेंगे और हिन्दुस्तान प्रजातंत्रों का संघ रहेगा। अब झगड़ा यही है  कि 14 प्रजातंत्र रहे या सौ ? मैं कहता हूँ कि उतने ही प्रजातंत्र हों जितनी भाखा लोग बोलते हों और अपनेअपने प्रजातंत्र में पढ़ाईलिखाईकचहरीपंचायत का सब कारबार अपनी भाखा में हो लेकिन सौ प्रजातंत्र होने का मतलब यह तो नहीं है कि अब वह एकदूसरे से कोई वास्ता नही रखेंगेऔर कछुए की तरह मूँड़ी समेटकर अपनी खोपड़ी में घुस जाएँगे। हमारे महा– प्रजातंत्र के ये सभी प्रजातंत्र हाथपैरनाककान की तरह अंग होंगे। सबमें एक  खून बहेगा। सब एकदूसरे की मदद करेंगे। उस बखत रेल की लाइनें आज से भी ज्यादा बढ़ जायेंगीपक्की सड़कें गाँवगाँव में पहुँच जायँगी। हर प्रजातंत्र में हवाई जहाज के अड्डे होंगे। लोगों की जेब में पैसा रहेगासाल में महीने डेढ़ महीने की सबको छुट्टी मिलेगी। तो बताओ लोग कूएँ के मेढक बनकर बैठे रहेंगे या अपने महादेस में घूमनेफिरने जायेंगे?
दुखराम: घूमनेफिरने जायँगे भैयादेस परदेस देखने का किसका मन नहीं कहतानातेदारोंरिस्तेदारों से मिलने की किसकी तबियत हीं होती।
भैया: जनमभाखा को कबूल करने से हिन्दी को नुकसान होगा यह ख्याल गलत है सोहन भाईउस बखत बनारस वाले कानपुर वालों से बहुत नगीच रहेंगे, टेलीफून भी नगीच कर देगाहवाई जहाज भी और जेब का पैसा भी। हिन्दी सीखना लोग बहुत पसन्द करेंगे, क्योंकि सारे देस की साझे की भाखा वही है,  फिर हिन्दी में पोथियाँ सबसे अधिक निकलेगी। आजकल देखते हैं  हिन्दी के सिनेमाफिल्म जितने निकलते हैंउतने बँगलामराठीतमिलतेलगू सारी भाखाओं के मिल के भी नहीं निकलते। हिन्दी भाखा की किताबों की भी वही हालत होगीउसके पढ़नेवाले देश भर में मिलेंगे। मुझे उमेद हैकि जैसे चौपटाध्याय फिल्म हिन्दी में निकल रहे हैंवह किताबें वैसी नहीं होंगी।
सोहनलाल: चौपटाध्याय फिल्म क्या कह रहे हो भैयाजो चौपटाध्याय होते तो इतने लोग देखने क्यों जाते और फिल्म वालों को लाखों रुपये का नफा कैसे मिलता?
भैया: देखनेवाले तो इसलिए जाते है कि दूसरा अच्छा फिल्म है कहाँदूसरे नाचगाना और सुन्दर मुँह के देखने की आदत लोगों की पहिले ही से हैबस वह समझते हैं कि चलो दो आना में तवायफ का नाच ही देख आएँलेकिन सिरिफ सुन्दर मुँह और सुरीले कंठ तक में ही फिल्म को खतम कर देना अच्छी बात नहीं है सोहन भाई। उसमें बातचीतहावभाव और तसवीरों से दुनिया का असली रूप दिखलाना होता हैसाथ ही साथ लोगों को रस्ता भी दिखलाना होता है। लेकिन रस्ता दिखलाने की बात छोड़ दोकाहेसे कि जोंकों के राज में वह अनहोनी बात है। लेकिन हिन्दी फिल्मों में सब चीजों में बेपरवाही देखी जाती है। फिल्म बनानेवाले तो जानते हैं कि उनके पास रुपया चला ही आयेगाफिर क्यों परवाह करें?
सोहनलाल: हिन्दी फिल्मों मे आपको क्या दोस मालूम होता है भैया?
भैया: पहिले गुन बताता हूँ तब दोस बताऊँगा। गुन तो यह है कि हमारे फिल्म के खिलाड़ी (अभिनेता ) और खिलाड़िनें (अभिनेत्रियाँअपना करतब दिखलाने में दुनिया के किसी भी खेलाड़ीखेलाड़िनी से कम नहीं हैं। और अच्छे फिल्म के लिए यह बहुत अच्छी चीज है। वह अपनी बातचीतहावभाव गीतनाच  सब में अच्छे हैंमैं सभी खेलाड़ीखेलाड़िनों के बारे में नहीं कहता लेकिन अच्छे खेलाड़ीखेलाड़िनों में यह सब गुन हैं। और इन्हीं गुनों का परताप है कि मदरासकालीकट और बेजवाड़ा में भी लोग अपनी भाखा के फिल्मों को छोड़कर हिन्दी फिल्मों को देखने आते हैंचाहे बेचारे फिल्म की भाखा को नहीं समझ पायें। मैं समझता हूँ कि ये हमारे खेलाड़ीखेलाड़िनों के गुन का ही परताप है। पैसा बनानेवाले फिल्म मलिकों की चले तो सायद उसमें भी कुछ खराबी कर दें।
सोहनलाल: और दोस क्या है भैया!
भैया: भाखा तीन कौड़ी की होती है उसमें लचक कहावत और  गहराई होती है। यह क्यों होता हैबहुत से फिल्म मालिक भाखा जानते ही नहींलेकिन तो भी अपने को महाविद्वान समझते हैं। एक तो उनके भाखा लिखनेवाले भी बहुत से उन्हीं की तरह हैं और जो कोई अच्छा भी लिखता होतो अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा कहने का अख्तियार फिल्म तैयार करनेवाले अपने हाथ में रखते हैं। समझ लो पूरी दमदसोधन हो जाती है।
सोहनलाल: दमदसोधन क्या है भैया?
भैया: किसी पंडित ने एक मुरुख से अपनी लड़की ब्याह दी। दामाद एक दिन ससुरार आया। छापाखाने से पहिले की बात हैउस वक्त किताबों को उतारनेवाले मामूली पढ़ेलिखे लेखक हुआ करते थे वह मजूरी लेक किताब उतार दिया करते थे। पंडित लोग किताब लेके फिर पढ़ते और जो असुद्ध होता उसपर पीला हड़ताल फेरते और जिसको ज्यादा ध्यान में रखना होता उसे गेरू से लाल कर देते। पंडित के दामाद ने पोथी, हड़ताल और गेरू को देखा। उन्होंने पोथी को हाथ में ले लिया। पंडिताइन को अपने दामाद पर बहुत गरव थाउन्होंने समझा कि दामाद भी बड़ा पंडित है और उससे कहा—“पंडित गेरू और हड़ताल से किताब को शोध रहे हैं तुम भी तो सोधते होगे बाबू!” दामाद कब पीछे रहनेवाले थे। उन्होंने कहा—“हाँ अइयामैं अच्छी तरह जानता हूँ।“ फिर जहाँ मन आया हड़ताल लगायाजहां मन या गेरू पोथी की दमदसोधन हो गई।
सोहनलाल: तो इसमें फिल्म पैदा करनेवालों का ज्यादा दोस है या भाखा लिखनेवालों का।
भैया: फिल्म पैदा करनेवालों का बहुत बड़ा दोस हैउनमें ख़ुद लियाकत नहीं है और  लायक आदमियों को चुन सकते हैं। भाखा लिखनेवालों में जो थोड़े से अच्छे भी हैंउनमें भी एक बड़ा दोस है। वह हिन्दी या उर्दू की किताबी भाखा लिखते हैं। किताब से पढ़के सीखनेवाले की भाखा में जीवट नहीं होता और सहरों मे जो थोड़ेबहुत बाबू लोग अपने घरों में हिन्दी भाखा बोलते हैंवह भी किताबी भाखा जैसी ही होती है।
सोहनलाल: तो जीवट वाली भाखा कौन बोलते हैं भैया?
भैया: मेरठमुजफ्फरनगरसहारनपुर के जिलों के गँवार।
सोहनलाल: तब तो  फिल्म की भाखा सीखने लिए इन गँवारों के पास जाना पड़ेगा?
भैया: उनके चरन में जाकर बैठना पड़ेगा। हिन्दी भाखा को किताब वालों ने नहीं पैदा कियाबल्कि इन्हीं गँवारों ने पैदा किया। हिन्दी पढ़नेवालों ने सैकड़ों बरस पहले उन गँवारों से भाखा तो ले लीलेकि भाखा में जीवट आने के मुहाविरेकहावतेंसबदों का तोड़नामरोड़ना और उन्हें मनमाने तौर से रखना इत्तादि बातें नहीं सीखींइसलिए हिन्दी भाखा में वह चमतकार नहीं  सका। किताब पढ़ने में तो किसी तरह आदमी बरदास भी कर लेगा लेकिन नाटक की बातचीत में इससे काम नहीं चल सकता।
सोहनलाल: तो भैयातुमने कोई फिल्म ऐसा नहीं पायाजिसमे कुछ जीवट वाली भाखा दिखाई दे।
भैया: मैंने सिर्फ एक फिल्म ऐसा देखा है जिसकी भाखा मुझे पसंद आईवह था –“जमीन।” मैं समझता हूँ जब तक फिल्म पैदा करनेवाले अपने को सब कुछ जाननेवाला मानना नहीं छोड़ेंगे और जब तक भाखा लिखनेवाले मेरठ के उन गँवारों के चरनों में नहीं बैठेंगेतब तक यह दोस नहीं जायेगा।
सोहनलाल: और दूसरे दोस क्या हैं भैया?
भैया: दूसरे दोस फिल्म पैदा करनेवालों को है चाहे उन्हें उनका अंधापन कह लो चाहेचाहे कम दाम ज्यादा नफा” का ख्याल समझ लोचाहे फिल्म मालिकों का अपने घर के पास ही फिल्म बनाने का हठ समझ लो। हिन्दी के फिल्म बम्बई या कलकत्ता में ही तैयार किये जाते हैं। वहीं के आसपास के गाँवोपहाड़ोंनदियों का फोटो खींचा जाता है। वहाँ  हिन्दी बोलने वाले  गाँव हैं  हिन्दी वालों के रीतिरवाज कपड़ेलत्ते। इसका फल यह होता है कि सब चीजें बनावटी दीख पड़ती हैं। बहुतसी चीजों को तो वह आने नहीं देते। जमीन” की तसवीरों में भी यह दोस मौजूद है। यह दोस बँगलामरहठी या तमिल फिल्मों में नहीं पाया जाताकाहेसे कि उनमें उन्हीं गाँवोंनदियोंपहाड़ों और लोगों की तसवीरें ली जाती हैंजो उस भाखा को बोलते हैं। हिन्दीफिल्मों का यह दोस तब तक दूर नहीं होगाजब तक देहरादून,  कालसी जैसी जगहों में फिल्म वाले अपने डंडाकुंडा उठाके नहीं  जाते।
सोहनलाल: और कौन दोस है भैया?
भैया: हिन्दी फिल्मों की सारी तसवीरें दोएक मील के छोटे से घेरे में घूमती रहती हैंवह विसाल नहीं होतीं। नदियोंपहाड़ोंखेतोंगाँवों का जो विसाल रूप हमें मिलना चाहिए उसे हम नहीं पाते। क्या जाने यह पैसा बचाने के ख्याल से होता होगा।
सोहनलाल: और कोई दोस है भैया?
भैया: हस्तिनापुर के पास गंगा का विसाल कछार हैवहाँ सैकैड़ों गाएँभैंसे चरती हैंचरवाहे मस्त होकर गाना गाते हैंगंगा में मलाह नाव खेता है और अपनी तान में सारी मेहनत भूल जाता है। धोबीकुम्हार सबके अपनेअपने गीतअपनेअपने बाजेचित्र विचित्र नाच हैं। सहरों में भी औरतों के ब्याह और दूसरे वक्त के अपनी खासखास नाच और नाटक हैं। इस तरह की सैकड़ों चीजें हैंजिनका बम्बई और कलकत्ता के फिल्मों में कहीं पता नहीं है।
सोहनलाल: और कोई दोस है भैया?
भैया: मैं अब एक ही दोस और कहूँगा। हिन्दी भाखा हिमालय की गोद में बोली जाती है। दुनिया के फिल्म वाले हिमालय के सुन्दर पहाड़ोंनदियोंझरनोंदेवदार वनों और बरफीली चोटियों को पा के निहाल हो जातेलेकिन हिन्दी फिल्म वालों के लिए वह कोई चीज नहीं। जापान के राज्य की राजधानी तोकियो हैलेकिन फिल्मों की राजधानी क्योतो हैकाहेसे कि क्योतो को थोड़ासा हिमालय का रूप मिला है। लेकिन हमारे आज के फिल्मवालों को इसका कभी ख्याल आयेगाइसमें सक है।
सोहनलाल: तो भैयाजो फिल्म बनानेवाले मेरठ कमिसनरी के हिमालय वाले टुकड़े में  जायँतो उनके बहुत से दोस हट जायँगे?
भैया: यह मैं मानता हूँलेकिन यह भी समझता हूँकि सेठ अपना घर छोड़ तपोबन में थोड़े जाना चाहेंगेवह पचास तरह का बहाना कर सकते हैं। और सबसे बड़ी बात यह हैकि नफा तो उन्हें खूब हो ही रहा है और थोड़े ही खर्च में। लेकिन हम फिल्म की बात करतेकरते बहुत दूर चले गये सोहन भाईमैं कह रहा था हिन्दी भाखा के बारे में
सोहनलाल: हाँतो तुम समझते हो कि अपनीअपनी भाखा को पढ़ाई की भाखा मान लेने पर हिन्दी को नुकसान नहीं होगालेकिन भैयादुनिया को हमें और एक दूसरे के नगीच लाना है। मरकस बाबा तो सारी मानुख जाति को एक बिरादरी देखना चाहते थेफिर किसी संजोग से जो हिन्दी के नाते हिन्दुस्तान के आधे लोग एक भाखा से बँध गये हैंउनको फिर तोड़फोड़ के अलग करनायह तो पैर पकड़ के पीछे खींचना है।
भैया: पैर पकड़कर पीछे खींचना नहीं है सोहन भाईयह हाथ पकड़ कर आगे बढ़ाना है। जनमभाखा से पढ़ाई करने पर दस बरस के भीतर ही हमारे यहाँ को अपढ़ नहीं रह जायगा। और एकदूसरी जगह जानेआपस में मिलने से हिन्दी भाखा सभी लोग थोड़ाबहुत बोल लेंगे। और समझने में तो किसी को मुसकिल नहीं होगाकाहेसे कि इन सब भाखाओ में बहुत से सबद एक ही से हैं। कविताकहानीउपन्यास का ढंग भी एकसा ही रहेगा। हिन्दी पोथियों की उतनी ही ज्यादा माँग होगीजितनी ही अधिक इन भाखाओं के पढ़नेलिखने वाले बढ़ेंगे। कमी इतनी होगीकि आज जो हमारे कितने ही भाई यह समझते हैंकि अवधीब्रजमालवीबनारसीमैथिली इत्तादि भाखायें कुछ दिनों में मर जायेंगीउनको जरूर निरास होना पड़ेगा। निरास वैसे भी होना पड़ेगाक्योंकि जो जनमभाखाओं को किताब की भाखा  भी बनाया जायतो भी सौपचास सालो में उन भाखाओं के मरते देखने की खुसी हमारे भाइयों को नहीं मिलेगी। अभी उन्हें मरना भी नहीं चाहिएक्योंकि उन्होंने अपने भीतर अपनी जाति की भाखासमाज,  विचारविकास ओगरह के इतिहास की बहुत सी अनमोल सामिगरी रखी है। मैं जानता हूँ जो दुनिया से जोंके उठ जायँगीतो मानुख जाति जरूर एक होगी और फिर सबकी एक साझी भाखा भी होगी। हो सकता है कि एक साझी और एक अपनी जनमभाखा दो भाखाओं का रहना मुसकिल हो जाय। लेकिन वह अभी सैकड़ों बरसों की बात है। उस बखत तक हरेक भाखा के भीतर जितने रतन छिपे हुए हैंसब जमा करके अच्छी तरह रख लिए गये रहेंगे। इसलिए किसी भाखा के नास होने से उतना नुकसान नहीं होगा।
सोहनलाल: लेकिन भैयायह बोलियाँ अभी ऐसी नहीं हैं कि इनमें साइन्सविग्यान पर किताबें लिखीं जायँ। हिन्दी ने बड़ी मुसकिल से यह कर पाया है।
भैया: जो मान लें कि बनारसी बोली में साइन्स की किताब नहीं लिखी जा सकतीतो कितने ही दिनों तक हिन्दी में किताबें पढ़ेंगेजब तक कि हिन्दी बोली नाबालिग से बालिग  हो जायगी। हिन्दी जैसी किसी भाखा की किताब पढ़ना और उसमें लिखनाबोलना दोनों में बहुत फरक है । समझ लेना बहुत सहज है। अपनी बोली के पढ़ाने का मतलब यह नहीं हैकि हिन्दी को लोग छुयेंगे नहीं। दूसरी बात यह है कि बनारसीमालवी किसी भी भाखा में साइन्सइन्जीरिंग की किताबों के लिखने में उतनी ही दिक्कत होगी,  जितनी हिन्दी में। आखिर हिन्दी ने भी साइन्स के सबदों को संसकीरत से लिया हैबँगलागुजराती , मराठी भी संसकीरत से ही सबदों को लेती हैं फिर बनारसीमैथिलीब्रिजमालवी ने क्या कसूर किया है?
सोहनलाल: हिन्दीउर्दू के बारे में तुम्हारी क्या राय है भैया?
भैया: मेरी राय क्या पूछ रहे होमैंने तो पहिले ही कह दिया है कि जिसकी जो जनमभाखा हो उसको उसी भाखा में पढ़ाना चाहिए। बनारस में बहुत से बंगाली भी रहते हैंउन्हें बँगला में पढ़ाना होगा। मराठे भी हैंउनको मराठी में पढ़ाना होगा। हाँकोई दो भाखा बोलनेवाला हो तो वह चाहे जिस पाठसाला में जाय। इसी तरह बनारस में जिस लड़के की जनमभाखा हिन्दी हैउसके लिए हिन्दी की पाठसाला काय करनी होगीजिसकी जनम भाखा उर्दू है उसके लिए उर्दू का मदरसा कायम करना होगा।
सोहनलाल: तो भैयातुम हिन्दीउर्दू को मिलाके एक भाखा नहीं करना चाहते।
भैया: मिलाना हमारे बस की बात नहीं हैदस पाँच आदमी बैठकर भाखा नहीं गढ़ा करते। हिन्दीउर्दू के बनने में सैकड़ों बरस  जाने कितनी पीढ़ियों ने काम किया है। मैं मानता हूँ कि हिन्दी और उर्दू भाखा मूल में एक ही भाखा है। कामेंपरसेइसउसजिसतिसनातागा” दोनों ही में एकसे हैंखाली झगड़ा है उधार लिए सबदों का। हिन्दी ने संसकरित से सबदों को उधार लिया है  और उर्दू ने अरबी और कुछकुछ पारसी से भीलेकिन दोनों ने इतना अधिक उधार लिया हैकि अकबाल की कविता को समझनेवाला सुमित्रानन्दन पन्त की कविता को बिलकुल नहीं समझ सकता और सुमित्रानन्दन पन्त की कविता जाननेवाला अकबाल को बिलकुल नहीं समझ सकता। इसलिए मूल में दोनों एक हैंकहने से काम नहीं चलेगा। अकबाल और पन्त दोनों के समझने के लिए दोनों भाखाओं को अच्छी तरह पढ़ना होगा।
सोहनलाल: तो हिन्दूमुसल्मानों की भाखाओं के मिलने का कोई रस्ता है?
भैया: चोटियों पर तो नहीं मालूम होतालेकिन जड़ में उसका झगड़ा ही नहीं है,
सोहनलाल: जड़ क्या है भैया?
भैया: जड़ यही है किजिसे जनमभाखा कहते हैंअवधी बोलनेवाले गाँव में चले जाइयेवहाँ चाहे बाभन देवता हो चाहेमोमिन जोलाहादोनों एक ही बोली बोलते हैं। बनारसछपरागुड़गाँवाथानाभवन के पास किसी गाँव में चले जाइयेकिसानोंमजूरों की भाखा एक हैचाहे वह हिन्दू हो या मुसल्मान।
दुखराम: वही जोंकों से जिनका बेसी रिसतानाता नहीं है।
भैया: देखा  सोहन भाईजड़ में अपनी एक भाखा तैयार हैहिन्दूमुसल्मान दोनों कमेरे उसी भाखा को बोलते हैं और फिर उनका  संसकीरत के साथ पच्छपात है  अरबी फारसी के साथ। यही दुक्खू भाई ने जो अभी कहा, “बेसी रिसतानाता” इसमें बेसी और रिसता पारसी भाखा से आया है और नाता अरबी भाखा से। रिसतानाता कहने से बिलकुल निपढ़गँवार बुढ़िया भी समझ लेगीलेकिन सम्बन्ध” कहने से उतना नहीं समझ पायेगी। हमने भी अपने इतने दिनों के सत्संग में पाँच सौ अरबीफारसी सबदों को लिया है, और हिन्दी में उनकी जगह अब सिरिफ संसकीरत के सबद ही लिखे जाते हैं। मै समझता हूँ कि कोई अदमी समरकन्द बुखारा से सात पीढ़ी पहिले आया होलेकिन अब उसकी भेखभाखा सब हिन्दुस्तान की हैतो वह हिन्दुस्तानी है। वह अपने पुरखा के सहर समरकन्दबुखारा में जायगातो वहाँ भी उसे लोग हिन्दुस्तानी कहेंगे आजकल समरकन्दबुखाराउजबेकिस्तान सोवियत प्रजातन्त्र के अच्छे सहर हैं। उसी तरह जिन अरबीपारसी सबदों को निपढ़ गँवारों ने अपना लिया है और उसको वह अपने ढंग से तोड़मरोड़ के बोलते हैंवे सबद अब बिदेसी नहींसुदेसी हैं। जिन संसकीरत सबदों को हमारे गँवार” छोड़ चुके हैंउनको फिर से लादना भी ठीक नहीं।
सोहनलाल: लेकिन भैयाइन गँवारों ने तो हजार बारह सौ संसकीरत के सबदों को निकाल कर अरबी के सबद लिए है। हमेसा’, ‘दिक्कत’, ‘मुसकिल’, ‘मवस्सर’, ‘अरज’, ‘गरज’, ‘लेकिन’, ‘बेसी’, ‘अमहक’ ( अहमक ), ‘इफरात’, ‘जमीन’, ‘हवा’, ‘तुफान’, ‘सहर’, ‘नौबत’, ‘जुलुम’, ‘परेसानी’, ‘मेहरबानी’, ‘वगैरह’  सबदों को उन्होंने लेकर संसकीरत के सबदों को छोड़ दिया है। जो संसकीरत के सबद रखे हैंउनके बोलने में भी लाठी से पीट के ठीकठाक कर डालते हैं। और आप इसी भाखा को अपनाने को कहते हैं?
भैया: दोनों बातों को एक में  मिलाओ सोहन भाईजहाँ तक जनमभाखा की बात, है उसके लिए  रामसरूप पंडित की बात मानी जायगी  कुतुबुद्दीन मोलबी कीउसके लिए तो धनिया भौजीगाँव की बेपढ़ अहिरिन को ही परमान माना जायगा। दोनों सबदों को उसके सामने रखा जायगाजो अरबी वाले सबद को वह समझेगी तो उसे ले लिया जायगासंसकीरत वाले को समझेगी तो उसको। बोलने में कठिन सबदों की धनिया भौजी कपालकीरिया करे हीगीऔर उसकी कपाल किरिया को भी मानना पड़ेगा। हिन्दीउर्दू को मिलाने का काम भी यही जनमभाखायें करेंगीक्योंकि जनमभाखाओं में हिन्दूमुसल्मान का झगड़ा नहीं है। जड़ वालों का रस्ता साफ हैचोटी वालों का झगड़ा है। उनमें जो अपनी जनमभाखा उरदू मानता हैवह उरदू में लिखेपढ़ेगा जो हिन्दी मानता है वह हिन्दी में। मेरठ कमिसनरी के साढ़े तीन जिले में भी कौन भाखा माननी चाहिए। इसका फैसला वहाँ कोई जाट की धनिया भाभी के हाथ में होगा।
सोहनलाल: और जो हिन्दुस्तान के संघ की भाखा हिन्दी होगीउसमें हिन्दीउर्दू का झगड़ा कैसे मिटेगा ?
भैया: पहिले तो हिन्दी के अपने साढ़े तीन जनम जिलों की भाखा के मुताबिक उसको मानना पड़ेगा। जिसके कारन बहुत से संसकीरत के सबद छूट जायँगेऔर बहुत से अरबी फारसी के भी। फिर यह प्रजातन्त्रों के ऊपर छोड़ दिया जायगा कि वह कौन भाखा पसन्द करेंगे। जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दो तरह के प्रजातंत्र हमारे देस में बनेंगेतो हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ में हिन्दी संघ भाखा होगी और पाकिस्तान में उरदू। मैं यह भी जानता हूँ कि आज की उरदू को जो बंगाल वाले पाकिस्तान पर लादा जायगातो बहुत मुसकिल होगी।
*     *     *

Older Entries