क्या कहूँ उस देश को ( कविता)

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यह संभवतः 30 जनवरी 2008 को लिखी कविता है। समय का जिक्र करना आदत-सी है। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि कोई ऐतिहासिक सामग्री प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसके यह अंश मुझे भाषा की दृष्टि से बहुत पसंद हैं- 

बन रहे हैं शस्त्र ऐसे
नाश का भी नाश कर दें
आदमी की शक्तियों से
जहाँ भय, भयभीत!

अब पूरी कविता:


हो रहा हो रक्तरंजित
पिता भी जिस राष्ट्र का
बोल मेरे मीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

बरसती हैं गोलियाँ
आज पानी की जगह
देखता है नभ कृषक को
जल के लिए, विपरीत !
क्या कहूँ उस देश को ।
बन रहे हैं शस्त्र ऐसे
नाश का भी नाश कर दें
आदमी की शक्तियों से
जहाँ भय, भयभीत !
क्या कहूँ उस देश को ।
जहाँ सपने देखने को
बच्चे नहीं आजाद हैं,
मुस्कुराहट डर रही है
ऐसे रहे दिन, बीत !
क्या कहूँ उस देश को ।
कह रहे पुरखे मनुज के
मेरी नहीं संतान ये ।
पूछा गया मुझसे जहाँ
किसने दिया अधिकार
जो ये गा रहे हो गीत !
बोल मेरे मीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

एक बार फ़िर आ जाओ (गाँधी जी पर एक गीत)

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हमेशा की तरह आज दो अक्तूबर को गाँधी जी अधिक, लाल बहादुर शास्त्री कम ही याद किए जाएंगे। हम भी गँधियाते थे पहले। कई बार गाँधी जी कविताई का विषय बनते रहे थे। लेकिन अब यह सब 2004-05 के बाद बन्द है। विवेकानन्द भी इसी तरह कई बार अपने विषय होते थे। अभी थोड़े दिनों पहले ही आपने गाँधी जी पर जय हे गाँधी! हे करमचंद!! कविता पढ़ी थी यहाँ। आज गाँधी जी के प्रति सम्मान तो है लेकिन पहले जितनी श्रद्धा तो नहीं ही रही। उनपर एक कविता या गीत जो कहें, गाँधी जयंती, 2004 पर गाने के लिए ही मानिए, लिखा था। क्योंकि गाँधी जी लोकप्रिय क्यों विषय पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, तो सोचा कि एक गीत भी हो जाए। हालांकि इसे गाया नहीं जा सका और बाद में 26 जनवरी, 2005 को इसे गाया गया। अब इन दिवसों में रुचि तो है नहीं। …इस रचना में भावनाएँ हैं, अब थोड़ा रूखा हूँ। पहले की अधिकांश मान्यताएँ एकदम बदल गईं है। फिर भी मेरी सबसे प्रिय खुद की रचनाओं में यह रचना आज भी शामिल है। अगर आप मोहम्मद रफ़ी का गाया क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे या इधर चलने वाला गीत कलियुग बैठा मार कुंडली की तर्ज पर इस रचना को गाकर देखें, तो आपको पसन्द जरूर आएगा। मुझे इसकी कुछ पँक्तियाँ बहुत पसन्द हैं, अब यह अपनी प्रशंसा ही सही, लेकिन सच है।
यह रही वह रचना 
             (गीत) एक बार फ़िर आ जाओ
बापू आपसे फ़िर आने का,
विनती करता शरणागत है।
एक बार फ़िर आ जाओ तुम,
आ पड़ी तेरी ज़रूरत है।
छुआछूत को तुमने बापू,
हमसे दूर हटाया था।
सत्य, अहिंसा और प्रेम का,
हमको पाठ पढ़ाया था।
हिंदी को ही तुमने बापू,
राष्ट्रभाषा स्वीकार किया।
थी जन के हृदय की भाषा,
तुमने देशोद्धार किया।
बापू आपसे फ़िर … … … …
दलितों को तुमने समाज में,
उच्च स्थान दिलाया था।
तुमने अपने उत्तम चरित्र से,
पूरा संसार हिलाया था।
ना जाने है कैसी हो गयी,
बापू युग की हालत है।
एक आदमी को दूज़े से,
ना जाने क्यों नफ़रत है।
आवश्यकता आन पड़ी अब,
एक नहीं शत गाँधी की।
जड़ से इस तम की बगिया को,
फेंके ऊँखाड़, उस आँधी की।
बापू आपसे फ़िर … … … …
चारों तरफ़ पश्चिम-पश्चिम की,
लगी ना जाने क्यों रट है।
सूख रहा बूढ़ा बेचारा,
इस भारत का यह वट है।
बढ़ती जाती आज ज़रूरत,
बापू हमको तेरी है।
भारत के इस दीपक गृह में,
छायी आज अँधेरी है।
मुक्त देश को किया तुम्हीं ने,
लोकप्रियता प्राप्त हुई।
हम जिस दिन आज़ाद हुए,
उस दिन उन्नति समाप्त हुई।
बापू आपसे फ़िर … … … …
क्या मुंबई है, क्या काशी है,
होता चारों तरफ़ पतन।
छोड़ के सब भारतीय संस्कृति,
अपनाते केवल फ़ैशन।
दिन प्रतिदिन जाता है भारत,
तीव्र गति से रसातल में।
केवल तुमसे आशा बापू,
इस विनाश के दलदल में।
अंत में कहता तुमसे बापू,
बिलखता ये शरणागत है।
ऐसी हालातों में बापू,
तेरी सिर्फ़ ज़रूरत है।
बापू आपसे फ़िर … … … …

जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)

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गाँधी जी …मैंने 5-6 कविताएँ-गीत उनके ऊपर लिखे हैं। अन्तिम बार आज से पाँच-छह साल पहले। अब कविता लिखना कम हो गया है। पुरानी कविताएँ यहाँ पढ़वाता रहा हूँ। फिर एक पुरानी कविता लेकर हाजिर हूँ। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ हमारी पाठ्यपुस्तक में पढ़ने को मिली थी। उसी तर्ज पर गाँधी जी पर कविता लिखने का खयाल हुआ था। दसवीं कक्षा में था, तब इसका एक-दो अंश लिखा था। बाद में सारी कड़ियाँ पूरी हुई थीं। हालांकि छूटी हुई रचनाएँ शायद ही पूरी हो पाती हैं। गाँधी जी पर लिखी अन्य कविताओं को भी यहाँ रखूंगा। दो अक्तूबर को अपनी प्रिय रचना जो मूलत: गीत है, गाँधी जी के ऊपर लिखी गयी है, वह भी रखूंगा। आइये, देखिए क्या बकवास किया था कभी। प्रवाह कहीं कहीं टूटा भी है। 

कर रहे नमन हम बार-बार
युग करता फिर तेरी पुकार
बापू तेरी महिमा अपार
युग के विकास की गति मंद ।
जय हे गांधी ! हे करमचंद !!

भारत का अधनंगा फ़क़ीर
था कर्मवीर औ महावीर
परवशता की तोड़ी जंजीर
अब परवशता का द्वार बंद ।
जय हे गांधी ! हे करमचंद !!
अब देख देश होता विषाद
आते तुम बापू सदा याद
बढ़ता जाता पाश्चात्यवाद
हैं सब-के-सब पूरे स्वच्छंद ।
जय हे गांधी ! हे करमचंद !!
रोती सब जनता दिग्दिगन्त
समस्याओं का नहीं अन्त
दुर्दशा देश की है अत्यन्त
सद्धर्मी अब हुए चंद ।
जय हे गांधी ! हे करमचंद !!

संस्कृति पर आया संकट
लगती जाती पश्चिम की रट
क्या भरा नहीं अब पापघट
कहीं दिखता क्या अब पाबंद ?
जय हे गांधी ! हे करमचंद !!
है आख़िर वह गोपाल कहां
है पापीजन का काल कहां
अपराधारि नंदलाल कहां
आंखें क्या उसकी हुईं बंद !
जय हे गांधी ! हे करमचंद !!
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(आज 23 सितम्बर है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्मदिन। ‘दिनकर’ ने भी ‘बापू’ लिखी थी। जब मैंने नया-नया लिखना शुरू किया था, तब एक कविता दिनकर पर भी लिख डाली। उल्लेखनीय तो नहीं ही है, लेकिन पढ़वा दे रहा हूँ। इससे कुछ उम्मीद न की जाय। आखिर नवीं-दसवीं का छात्र लिखेगा क्या? ‘कलम आज उनकी जय बोल’ के इस रचनाकार पर यह भी याद आता है कि ‘जब नाश मनुज पर छाता है। पहले विवेक मर जाता है’ और ‘कुरुक्षेत्र’ की बहुत सी पँक्तियाँ लोगों की जबान पर सूक्तियों की तरह बैठ चुकी हैं।)



दिनकर
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माता भारती ने भारत को,
                      साहित्य का वह नवरत्न दिया ।
जिसने भारतीयों की सुप्त,
                      चेतना को जगाने का प्रयत्न किया ।
कविता के माध्यम से जिसने,
                      इस प्रयत्न को सफल बनाया ।
वही इस कविता के क्षेत्र में,
                      वीररस का कवि दिनकर कहलाया ।
=========

नाथूराम ने अंग्रेजी भाषा का राज कायम करने में दिया है बहुत बड़ा सहयोग

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नाथूराम गोडसे। जाने कितने लोगों का आदर्श है ये नाम। अखंड भारत का स्वप्न देखनेवाले अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो नाथूराम को आदर्श माने बैठे हैं। मैं आज नाथूराम की बात किसी विवाद के लिए नहीं कर रहा। आज मेरा विषय कुछ अलग है। 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सभी लोगों में गाँधी जी स्वभाषा के सबसे अधिक पक्षधर थे। इतना तो तय माना जा सकता है कि अगर 1948 के बाद और भारतीय संविधान बनने तक गाँधी जीवित होते तब निश्चित तौर पर हिन्दी और भारतीय भाषा का स्थान आज से बेहतर होता। आज जो अंग्रेजी की स्थिति है, उसमें और 1890 की स्थिति में रत्ती भर का फर्क नहीं है। अंग्रेजी का कोई सुखद प्रभाव हमारे देश पर कभी रहा है, इसपर सोचना व्यर्थ है। यह न सोचें कि अंग्रेजी के माध्यम से बहुत भारी बात हो गई। कुछ लोग यह सोचते हैं कि अंग्रेजी के चलते हमारे देश के लोगों को विश्व का श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने को मिला लेकिन इस बात पर मैं यहाँ अधिक नहीं कहूंगा क्योंकि मैं अपनी किताब में इस पर विस्तार से लिख चुका हूँ।

इस बात की गारंटी तो नहीं ली जा सकती कि नाथूराम अगर गाँधी को नहीं मारता तो गाँधी को और कोई भी नहीं मारता। लेकिन अभी हम यह मानकर चलें कि नाथूराम ने गाँधी की हत्या की। उससे कोई फायदा तो किसी को नहीं मिला। क्योंकि मैंने हमेशा कहा है कि गाँधी सबसे बदनसीब नेता हैं। उन्हें दलितों ने अस्वीकार किया, हिन्दुओं ने अस्वीकार किया और मुस्लिमों ने भी अस्वीकार किया। कुछ अपवाद हो सकते हैं।

मेरा विषय बहुत छोटा है। इसलिए अधिक तो नहीं कहूंगा लेकिन नाथूराम अपने को जितना समझदार माने लेकिन सच तो यही है कि गाँधी को मारकर उसने अंग्रेजी की स्थिति बहुत मजबूत कर दी। इस बात पर कितनों को परेशानी होगी लेकिन सच तो यही लगता है। कारण यह है कि गाँधी जी हिन्दी और भारतीय भाषाओं के सबसे बड़े पक्षधर थे। इस बात के एक नहीं सैकड़ों सबूत हैं। 

गाँधी जी को बहुत से लोगों ने जिद्दी भी कहा है। लेकिन गांधी के असर को देखते हुए इतना तय माना जा सकता है कि अंग्रेजी के खिलाफ़ आजादी के बाद अगर कोई दमदार कदम और आंदोलन उठा सकता था और उसे सफल बना सकता था तो वह एकमात्र गाँधी थे। इसलिए मैं मानता हूँ कि गाँधी की हत्या करके गोडसे ने भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी  का राज एक लम्बे समय के लिए कायम कर दिया और सिवाय गाँधी के दूसरा ऐसा कोई बड़ा नेता था ही नहीं जिसका असर पूरे देश पर हो और भाषा के मामले पर विवाद को सही दिशा देते हुए वह अंग्रेजी का साम्राज्य खत्म कर पाता या इसके लिए कोशिश कर पाता। उनके अलावे लगभग सारे बड़े नेता अंग्रेजी के भक्त बने हुए थे और गाँधी जी के जीवित रहते हिन्दी के समर्थन में शायद मजबूरी में रहते थे।

अन्त में नाथूराम ने अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य कायम किया है अपनी मूर्खतापूर्ण हरकत से। यहाँ ऐसे लोग कृपा करेंगे जो आजादी की लड़ाई, गाँधी, नरम दल, गरम दल, अहिंसा जैसी बात पर बहस करें क्योंकि मेरा मुद्दा यहाँ भाषा है और कुछ नहीं।

मैं मूर्ख हूँ और अपने देश का बुरा चाहता हूँ(परिवर्धित संस्करण )

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साहब ने अपना ज्ञान बघारा है। अभी-अभी देखा। उनके सारे अनुयायी जैसे कि… छोड़िए नाम नहीं लेता हूँ। चला बिहारी ब्लागर बनने (सलिल नाम है जिन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से मुझे कुछ कहा है। इनका नाम लेना पड़ा क्योंकि इन्होंने मुझे संबोधित किया है।) आदि अपने तो भेड़चाल में शामिल हैं लेकिन जरा देखिए कि मुझे क्या कहा है इस सलिल ने जो पटना के ही हैं- जिन महाशय ने कभी आपको भगोड़े भारतीय के खिताब से नवाजा था, उन्हें यह आलेख और ऐसे ही कई आलेख जो आपने पूर्ण शोध के आधार पर लिखे हैं, पढना चाहिए! मगर क्या किया जा सकता है- मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं!!

      साहब भूल गए कि मृतक विचार कर ही नहीं सकता तो चिपकने की बात कहाँ से आ गई?


यानि ये आलेख पूर्ण शोध करके लिखा गया है। यहाँ एक बात बता दूँ कि उनके इस आलेख पर जितने लोगों ने टिप्पणियाँ की हैं उनमें से अधिकांश लोग जिस बात का समर्थन करते हैं उसे भी साहब ने गलत ठहराया है। लेकिन वहाँ किसी की हिम्मत नहीं होती कि पूछे कि वास्तव में उनके पास क्या तर्क हैं या हैं भी कि नहीं? शायद बात समझ में नहीं आ रही। लीजिए साफ-साफ बताता हूँ। कुछ दिनों पहले साहब ने एक लेख लिखा था। उसमें एक बात आई है कि ब्रिटिश संसद में लॉर्ड मैकाले का शिक्षा द्वारा भारत को दास बनाने का ड्राफ्ट के बारे में। इसे गलत बताया गया है। अब मैं कुबताता हूँ, सुनिए। आदरणीय लेकिन दिवंगत राजीव दीक्षित ने यह बात जमकर फैलाई थी। राजीव दीक्षित साफ-साफ कहूँ, तो बाबा रामदेव के गुरु थे। मैं तब एकदम परेशान हो जाता हूँ जब राजीव दीक्षित अपने व्याख्यानों में रामदेव को परमपूज्य कहते हैं। यह एकदम राजनीतिक अंदाज लगता है। फिर भी मैं राजीव दीक्षित का प्रशंसक हूँ। कम से कम उनकी बोलने की कला और उनके ज्ञान का तो हूँ ही। उनके ज्ञान का आधार हैं धर्मपाल जी। उनके बारे में मेरी जितनी जानकारी है उसके अनुसार वे मेरे सम्माननीय हैं। लेकिन राजीव दीक्षित के पीछे कुछ खोजबीन करनी शुरु की तो एक मित्र को बहुत बुरा लगा और वे इसे बरदाश्त नहीं कर सके। लेकिन यहाँ ज्यादा कहने का समय भी नहीं है और अभी ये सब कहना उचित भी नहीं है।

      मेरा सवाल है उन सारे टिप्पणीकारों से जो हिंदुत्व के पुरोधा हैं, रामदेव के अत्यन्त समर्थक हैं और साहब के ब्लाग पर टिप्पणी कर चुके हैं कि इस मैकाले वाली बात पर कितनों ने शोध किया? क्या साहब की हर बात 100 प्रतिशत सही होती है? उनकी बातों पर आँख मूँद कर विश्वास करना ही देशभक्ति और सच्चा होने का सबूत है? उससे अच्छा तो सुरेश चिपलूनकर(अभी तक की मेरी जानकारी से) हैं जो अपनी बात यथासंभव तर्क और सबूत के साथ करते हैं। मैं उनका प्रशंसक नहीं फिर भी उनकी इस बात का समर्थन करता हूँ। या फिर तेजोमहालय वाली बात को ले लें तो पी एन ओक की बात का इन सभी संघी टिप्पणीकारों ने समर्थन किया है। (मैं जिस ब्लाग पर या इंटरनेट पर जहाँ कहीं गया हूँ शायद ही किसी संघी आदमी ने पी एन ओक की बात का विरोध किया है।) क्या ये सारे लोग एक आदमी की हर बात में सिर्फ़ हाँ में हाँ मिलाते हैं? अगर ऐसा है, तो करते रहिए मेरी शिकायत और अपना समय इसमें लगाते रहिए। अब चालाकी से कहना होगा कि आप ऐसा नहीं करते तो अच्छी बात है कि मेरे उपर नहीं सोचते।

मुझे नहीं पता कि भक्तों की इन टिप्पणियों का क्या उद्देश्य है। लेकिन देख लें कि आखिर क्या कहते हैं लोग?
1) ज्ञान की कुछ पोथियाँ चबाते और मुँह से उसका झाग यहाँ वहाँ बिखराते हुये विचरते बछड़ों को पालने वालों के लिये यह जानकारी शायद कुछ काम की हो

(इटालिक अक्षरों में ब्लाग जगत में कौन लिखता है, आप जानते ही होंगे।)

हर आदमी जो लिखता है, बोलता है, सोचता है कहीं न कहीं से वैचारिक खुराक लेता है। और इसमें गलत क्या है? लेकिन जब ये लोग ज्ञान बघारते हैं तो ठीक है, वह प्रमाण है, बुद्धिमत्ता है लेकिन जैसे मैंने कुछ कहा कि झाग हो गया। बार-बार तमाशा वह भी बिना पैसे के देखा जा सकता है यहाँ।
मेरा सवाल है कि कौन सा बन्दा है जो बिना पोथियाँ चबाए यहाँ लिख और बोल रहा है? कहीं कोई अवतार तो नहीं उतर गया आसमान से। निश्चय ही अपनी पोथियों में सोना और दूसरों की पोथियों में मिट्टी वाली मानसिकता होगी। चिकित्सक होने के लिए रोगी होना जरूरी होता है क्या? वैसे शारीरिक चिकित्सकों को मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा की जरूरत सबसे अधिक है।

2) यह नास्तिकों का पुराना शगल है। जैसे ही कोई तथ्यपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है छपाक से कह उठेगें, “क्रान्तिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता। अन्यथा वर्ना गढ गढ के देंगे कि फलां फलां क्रांति कारी नास्तिक थे
जैसे क्रांतिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता ठीक वैसे ही क्रांतिकारी (मां के) कभी भी नास्तिक नहीं होते।यह तो आपकी तरह कोई कोई ही प्रमाण लाता है। अन्यथा इनको तो कुछ और ही सिद्ध करना है।

(ये महात्मा तो बुद्ध के अवतार हैं।)

        आखिर बेचारे क्यों परेशान हैं? एक का कहना है कि तथ्यपूर्ण जानकारी से नास्तिक कतराते हैं। दस हजार शब्द लिख डाले होंगे मैंने इनके लिए तर्क और तथ्य के साथ। लेकिन दूसरी जगह जाकर निंदा-रस का आनंद ही अलग है। यह तो साहब की तरह की ही कोई-कोई प्रमाण लाता है, इस वाक्य की शल्य-क्रिया करते हैं। जब मैं किसी किताब का हवाला दूँ और लेखक का नाम लूँ तो वह प्रमाण नहीं लेकिन अखबारों से उठाकर लानेवाली बात प्रमाण बन जाती है। मुझसे तो भगतसिंह के दस्तावेज के ही प्रमाण माँगे जाते हैं लेकिन ये साहब के अन्धभक्त उनके उपर इतना विश्वास करते हैं कि उनकी कही बातों को कृष्ण की गीता से कम नहीं मानते। इतने अच्छे भक्त तो काल्पनिक कथाओं में भी नहीं मिलते होंगे।
कहते फिरते हैं कि नास्तिकों से कोई दिक्कत नहीं और नास्तिकों का सम्मान करते हैं। लेकिन इनकी हर टिप्पणी बताती है कि ये कितने उन्मादी और अलगाववादी हैं। नास्तिकों के बारे में जितना जहर उगलते हैं उतना भजन ही गाइये, शायद कुछ काल्पनिक खुशी मिल जाय। नास्तिकों के पास इतनी फुरसत नहीं कि वे भजन गा सकें।

     अच्छा है, भाइयों खूब मेहनत करो। बस अपनी एक आदत है कि जवाब दे ही देता हूँ। क्योंकि भागना पसन्द नहीं।

      मतलब ये कि मैंने जो कहा या लिखा उसका जवाब अभी तक किसी ने भी दिया नहीं लेकिन मेरा कहा बेकार और झूठा है लेकिन साहब की चमचागीरी करता हुआ यह आदमी उनके द्वारा लिखे को शोधपूर्ण कहता है। क्या शोध है भाई? जरा शोध देख लेते हैं।

     उनके द्वारा बताए और सुझाए गए लिंक देखिए।

 

1)      जेल में गीता मांगी थी भगत सिंह ने

 

     जागरण की खबर को बनाया भारी शोध और अन्य सभी बातें बन गईं निराधार। मैंने जो लिखा या कहा वह किताबों से नाम और पते के साथ था लेकिन ये जनाब दैनिक जागरण जो आजकल बिहार में नीतीश के गुणगान करने में सारी सीमा को तोड़ता जा रहा है, उसकी बात को सौ साल तक किया गया भारी शोध समझते हैं। यहाँ नीतीश के बारे में यह बात याद रखी जाय कि वे कांग्रेस के नहीं हैं। यानि भाजपा और जदयू के हैं। नीतीश वाली यह बात आवश्यक नहीं लेकिन कह दिया क्योंकि दैनिक जागरण की सच्चाई देख रहा हूँ।


      बीबीसी की साइट से इसका हवाला दिया गया है। इसके लेखक कौन हैं, जरा ध्यान दीजिए –

साम्यवाद से प्रभावित थे भगत सिंह  जो चमनलाल का आलेख है, की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया। जबकि यह आलेख उनके द्वारा सुझाए गए लेख के ही लिंक में है। क्यों? क्योंकि सम्भवत: ये लोग कांग्रेस भगाओ आन्दोलन के पक्षधर हैं न कि पूँजीवाद हटाओ के? ये सारा तामझाम सिर्फ़ कांग्रेस के खिलाफ़ करते हैं। ये भाजपा के खिलाफ़ कब बोलते हैं। मैंने पिछली पोस्ट में भाजपा को लेकर कुछ बातें बताईं थीं। अभी तक उनका जवाब नहीं आया है। आएगा तो बता दूंगा।
कांग्रेस अगर नागनाथ है तो भाजपा भी साँपनाथ तो है ही। मैं इन दोनों का विरोध करता हूँ और साथ में भारत के नकली कम्युनिस्ट लोगों का भी। जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने एकदम निंदनीय कार्य को अंजाम दिया। राहुल सांकृत्यायन जैसे लोग यूँ ही पार्टी से अलग नहीं हुए थे।

3) भगवद्गीता से ली थी भगत सिंह ने प्रेरणा?


     मतलब अखबारों ने जो लिख दिया वह सब शोध और आप लिखें तब इनके लक्ष्य में अवरोध। ये कैसा सत्य-बोध है? जब मैने अपने चिट्ठे पर भगतसिंह के गीता मँगाने के बारे में लिखा तो किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन देखने और सोचने की चीज तो यह है कि सब के सब बन्धु कितनी चाटुकारिता के साथ वन्दना करने में लगे हैं कि वाह क्या शोध है, मुझे पढ़ना चाहिए। यहाँ एक बात बताने का मन हो रहा है कि मेरे ब्लाग पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पोस्ट भगतसिंह की ही है। मैं ब्लागिंग में मात्र 10-15 दिनों से सक्रिय हूँ। अगर आप समझते हैं कि पहले से हूँ तो यह भ्रम है क्योंकि मेरे मई तक के सारे आलेख तेवरआनलाइन डाट काम पर प्रकाशित हैं और मैंने इन्हें अपने ब्लाग पर डाल दिया है। जिस दिन तेवर पर जो भी आलेख छपा उसी दिन की तारीख में अपनी वह पोस्ट मैंने अपने ब्लाग पर डाल दी है।

      गीता और भगतसिंह के संबंध में मैंने अपने तर्क और विचार पिछले दिनों रखे था। और जब तक आपके पास मेरे सवालों या तर्कों के जवाब नहीं हैं, आप कैसे अपनी बात को शोध करार दे सकते हैं।

      गाँधी जी आस्तिक थे(आस्तिक मतलब वह जिसे समाज आस्तिक कहता है)। मैं उनका प्रशंसक हूँ और उनके अधिकतम बातों के समर्थन में हूँ। तो क्या मैं उन्हें आस्तिक-नास्तिक की नजर से देखता हूँ। नहीं, बिलकुल नहीं! लेकिन भगतसिंह पर, उनके विचारों पर कोई अंगुली उठाए तो मैं अपनी बात तो रख ही सकता हूँ। बस वही किया और लोग हैं कि परेशान हो गए हैं। गाँधी जी पर मेरी बात से साफ-साफ पता चलता है कि मैंने सुभाष चन्द्र बोस पर भी सवाल उठाए हैं। जब तक मेरी समझ में सच नहीं आता तब तक मैं सवाल करूँ या छानबीन करूं तो कौन सा गुनाह कर रहा हूँ मैं?

    

लेकिन नहीं। मैं मूर्ख हूँ और देश का बुरा चाहता हूँ!

गाँधी जी पर बहस और मेरी टिप्पणियाँ

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पिछले दिनों महाशक्ति के चिट्ठे यानि ब्लॉग पर चला गया। वहाँ मुख्य पृष्ठ पर अंग्रेजी में नामित एक तरफ़ एक स्तम्भ जैसा है जिसमें गाँधी जी पर छ: आलेखों के लिंक हैं। इन आलेखों में मैंने पाँच आलेखों पर अपनी टिप्पणी की। वहाँ देखा कि महाशक्ति भाई और एक अन्य भाई दोनों बड़े परेशान हैं कि गाँधी जी को राष्ट्रपिता नहीं रहने देना है। यह लिखते वक्त मुझे एक एकांकी याद आ रही है जो कुछ साल पहले सुमन-सौरभ में छपी थी जिसमें गांधी जी कहते हैं कि वे साठ सालों से देश में राष्ट्रपिता का पद संभाल रहे हैं और अब उन्हें आराम चाहिए। किसी भी सेवा में कार्यरत आदमी को भारत में साठ-बासठ या पैंसठ साल की उम्र में सरकार सेवानिवृत्त कर देती है, तो उन्हें क्यों अभी तक सेवा से मुक्त नहीं किया गया। 
अपनी टिप्पणियों को मैं पहले भी आपके सामने रख चुका हूँ और इस बार फिर टिप्पणियों के साथ हाजिर हूँ। इस बार बहस नहीं होती है। बस, मैंने अपने विचार रखे और सिर्फ़ एक आलेख पर दो-चार टिप्पणियाँ हैं जिन्हें मैं आपके सामने रख रहा हूँ। अच्छी से समझ में आए इसके लिए तो मूल आलेखों को पढ़ना ही होगा। 
एक और जगह गाँधी जी पर थोड़ी सी बात हुई। मैंने वहाँ भी अपनी टिप्पणी की। ये सारी टिप्पणियाँ मूल आलेख के पते के साथ यहाँ रख रहा हूँ ताकि गाँधी जी पर मेरे विचार आप जान सकें।
मुझे तो गाँधी जी से बहुत हमदर्दी है, भाई!
आपसे निवेदन है कि भगतसिंह के लिखे 4 अक्टूबर 1930 जो पिता को लिखा गया था, उसे अवश्य पढ़ें।
इस बार मुझे कहना पड़ रहा है कि आपमें कोई सम्मान और निष्पक्षता की भावना है भी या नहीं?
कांग्रेस हो या कोई आपके सोच में तनिक भी तार्किकता नहीं दिख रही है। संसद पर हमले में सब सांसद मर जाते और वह संसद की बिल्डिंग ढह जाती तो ही अच्छा था। 2001 के हमले के बाद 2004 तक भाजपा पर कोई आरोप नहीं कि उसने क्यो नहीं कुछ किया? और कांग्रेस पर अब आरोप बिलकुल भाजपाई सोच है।
यह बहाना नहीं चलेगा कि संसद पर हमले के बाद भाजपा ने यह कदम उठाए और वह कदम उठाए। संसद की बिल्डिंग भी गुलामी का चिन्ह है और ये सांसद भी मारे जाने के लायक थे। हमलावर को पुरस्कार देना चाहिए था, ऐसा भी मुझे लगता है। क्योंकि आज भगतसिंह होते तो इन सांसदों की संसद पर पक्का बम फेंक कर खत्म कर दिया होता लेकिन किसी भारतीय ने यह नहीं किया।
बार बार गाँधीवाद की बात क्यों कर रहे हैं? मैं कह चुका हूँ कोई गाँधीवाद नहीं है। और होगा भी तो वह 1947 तक खत्म हो चुका।
संसद के भक्त कभी देशभक्त नहीं हो सकते। मुझे ऐसा लगता है जैसे कांग्रेसी चोर वैसे भाजपाई भी। उनके समय में हमला हुआ तो चिल्ला रहे हैं।
पार्टी में 75 साल पहले क्या हुआ इसका आज की पार्टी पर कोई असर नहीं हो सकता। क्योंकि उस समय का कोई आदमी या विचार कांग्रेस में हैं ही नहीं। गाँधी ने भी कहा था कि खत्म कर दो कांग्रेस को। ये सब ध्यान में नहीं आता।
भगतसिंह या शहीदों की आड़ में आप भाजपाइयों को महत्व दे रहे हैं। यह गलत है महाशक्ति भाई।
आपके हिन्दी चिट्ठे यानि ब्लाग पर अनावश्यक अंग्रेजी देखकर दुख हुआ।

मतभेद जायज है लेकिन यह वाक्य कि कांग्रेस के चमचे ही जानें कि राष्ट्रपिता गाँधी ही क्यों, तो यह आरोप नेताजी पर लगता है। आखिर क्या वजह है नेताजी अपनी फौल में एक रेजिमेंट का नाम गाँधी रेजिमेंट रखते हैं?
नेताजी पर इस तरह की घटिया टिप्पणी करना निंदनीय है भले ही वह अप्रत्यक्ष है।
मुझे किसी तरह की समस्या नहीं है चाहे राष्ट्रपिता भगतसिंह हों या गाँधी जी। यह आर्कुट और फेसबुक इन कामों के योग्य नहीं कि इनपर चर्चाएँ करके हम इतिहास रच दें या बदल दें।
आप मेरी टिप्पणियों पर कोई भी जवाब मेरे ईमेल पर ही दें क्योंकि बहुत जगह टिप्पणियाँ करता जा रहा हूँ और हर जगह मैं आकर फिर देख नहीं सकता।

मूल आलेख: गांधी का अहं

नेता तो नेता ही हो जाता है। भगतसिंह की हिसप्रस में उनका महत्व, आजाद हिन्द फौज में नेताजी का महत्व और कांग्रेस में गाँधी का महत्व हमेशा रहा है।
आप इस बात को कहकर एकांगी बात कर रहे हैं कि गाँधी ऐसे थे।
गाँधी की सबसे भयंकर गलतियों में नेहरु का पक्षपात और नेताजी के साथ भेद है, मैं इससे इनकार नहीं करता।
लेकिन नेताजी के बारे में आप बहुत जानते हों तो बताइए कि घटनाओं का असर नेताजी और गाँधी जी दोनों पर पड़ा। स्वाभाविक क्रान्तिकारी तो दोनों नहीं रहे इस हिसाब से जैसे आपने सोचा है। एक खुद पर अत्याचार से और एक लोगों के अत्याचार से। लेकिन यहाँ गाँधी ने कपड़े और खाने तथा सभी खर्चों में जमकर कटौती की देश के लिए उसका महत्व आपकी नजरों में नहीं है।
अभी याद आया 22 मार्च 1931 को भगतसिंह का लिखा भी देख लें। कुछ समझ में आ जाएगा।
सुभाष चन्द्र बोस और गाँधी या कोई हर क्रान्तिकारी किसी घटना से ही सोचना शुरु करता है जब वह महसूस करता है। वरना नेताजी ने अंग्रेजी सरकार में नौकरी की क्यों, भले इस्तीफ़ा दिया। लोग कहते हैं कि पिता को दिखाने के लिए। लेकिन आपका लिखा बताता है कि वे नौकरी कर रहे थे। और बाद में आहत होकर त्यागपत्र दिया। सवाल है नेताजी ने नौकरी क्यों की जबकि भगतसिंह ने ऐसा कुछ नहीं किया था।
नेताजी अच्छे और नेहरु से ज्यादा योग्य नेता थे, इसमें किसी को संदेह नहीं है। लेकिन 1939 तक यानि उम्र के 48वें साल तक वे कांग्रेस में क्या कर रहे थे जबकि उन्हें मालूम था कांग्रेस सेना और युद्ध नहीं मानती थी। यह साबित करता है सुभाष और गाँधी सभी किसी घटना के बाद अपनी खास नीति से लड़ते हैं। ध्यान से देखिए।
एक बात याद आई कि भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज देखिए। उसमें नेहरु के प्रति बहुत सम्मान दिखता है भगतसिंह में लेकिन नेताजी के प्रति क्या दिखता है, यह खुद पढ़कर देख लें।
इसलिए बार बार कह रहा हूँ कि आपकी जो इतिहास दृष्टि है उसमें पक्षपात और पूर्वाग्रह हमेशा दिखते हैं। इस बार की टिप्पणी में हर बात के सबूत हैं हमारे पास। अब साबित कीजिए नेताजी 48 साल तक क्या थे? 


आप के मन में यह सवाल उठना गलत नहीं है लेकिन यह किसी काम का नहीं है। जिन लोगों ने गांधी के नाम पर अपनी रोटी सेंकी है उनका संबंध गाँधी से कुछ नहीं है। बस नाम से कोई गाँधी नहीं हो जाता।
वैसे राष्ट्रपिता तो आपमें या मुझमें से किसी ने कहा नहीं था। यह काम नेताजी का है और उन्हीं से पूछते कि क्यों कहते हैं ऐसा?
लेकिन आप गांधी जी पर जो आरोप लगा रहे हैं उनमें उनका हाथ तो है ही नहीं। उनके मरने के बाद किसी ने उनके रास्ते पर चलने की कोशिश की ही नहीं। बस ढोल पीटते रहे। इसमें बेचारे गाँधी का क्या दोष? उन्होंने थोड़े ही कहा था इतिहासकारों से कि मेरा नाम लिखकर और शहीदों का नाम मिटा दो। ये तो कमीनापन है उन चोरों का जिन्होंने यह सब किया। मेरे लिए शहीद और गाँधी दोनों महत्वपूर्ण और सम्माननीय हैं।
पता नहीं किस गाँधीवादी की बात लोग कर रहे हैं? कौन सा गाँधीवादी देखा आपने या लोगों ने? गाँधी पर बहस करनी हो तो चैट पर आइये।
लेकिन आप लोगों में बेवजह यह सब बात उठा रहे हैं।
28 June, 2011 18:03
गांधी जी के कट्टर भक्त , भारत सरकार और कुछ हमारे अपने भारतवासी जो भारत की संस्कृति और इतिहास से अनभिज्ञ हैँ गांधी जो को राष्ट्रपिता कहते हैं । भारत एक सनातन राष्ट्र हैं तथा यहाँ की संस्कृति अरबों वर्ष पुरानी हैं , इससे पुराना राष्ट्र विश्व में कोई दूसरा नहीं हैं तो इसका पिता अट्ठारहवीं – उन्नीसवीं ईसाई सदी में कैसे पैदा हो सकता हैं ? वस्तुतः राष्ट्रपिता की अवधारणा पाश्चात्य मैकालेवाद की देन हैं , भारत की संस्कृति तो माता भूमि पुत्रोहम पृथ्वियां पर विश्वास करती हैं और अपने आप को इसका पुत्र मानती हैं तो फिर गांधी या कोई भी इस राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता हैँ । ज्यादा जानकारी के लिए http://www.satyasamvad.blogspot.com पर लिखा गया लेख ” क्या गांधी जी राष्ट्रपिता हैँ ! ” पढा जा सकता हैं ।
31 March, 2011 15:52”
इतनी घटिया टिप्पणी करने की हिम्मत कैसे की विश्वजीत ने!
यह टिप्पणी नेताजी को मैकालेवादी बताती है। यह बताती है कि टिप्पणीकार निष्पक्ष नहीं किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है।
इतना तो लगने लगा है कि आपको गाँधी जी से नफ़रत सी है और भाजपा या संघी सोच भी है। बुरा मत मानिएगा। मैं कांग्रेस और भाजपा दोनों को महाघटिया मानता हूँ। आप भी गाँधीविरोधी फैशन के शिकार से दिख रहे हैं। 
28 June, 2011 18:14
 vishwajeetsingh said…
श्री चंदन कुमार मिश्र जी गांधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि सर्वप्रथम कवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने दी थी , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने तो केवल उसकी पुनर्नावृत्ति की थी ।
मैं गांधी जी के ग्राम स्वराज का तो समर्थक हूँ , लेकिन गांधी जी द्वारा आधुनिक भारतीय राजनीति में पैदा की गई विभाजनकारी साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की नीतियों का विरोधी हूँ ।
कोई भी सच्चा देशभक्त गांधी तो क्या किसी को भी इस देश का राष्ट्रपिता नहीं मान सकता , क्योंकि भारत एक सनातन राष्ट्र है और सनातन राष्ट्र का कोई पिता नहीं हो सकता ।
मैं संघ , भाजपा अथवा कांग्रेस के मन्तव्य का शिकार नहीं हूँ , यह मेरा निश्पक्ष विचार हो गांधी जी के जीवन – चरित्र व दर्शन के गहन अध्ययन के बाद निकला है । 
29 June, 2011 12:29

गांधी को राष्‍ट्रप‍िता कहा जाये अथवा नही यह आज एक महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है… गांधी को राष्‍ट्रप‍िता उन लोगो ने धोषित किया जो गांधी की चाटुकारिता मे लगे थे और गांधी की कारण उनकी रोजी रोटी चल रही थी। नेहरू को मनमर्जी करनी हुई तो गांधी लाठी का सहारा लिया…कांग्रेस मे लोकतंत्र की रेड़ गांधी ने उस समय ही मार दी जब गांधी ने कहा कि पट्टभिसीता रमैया की हार को अपनी हार घोषित किया था और और गांधी की औकात को तत्‍कालीन काग्रेसी सदस्‍यो ने नेताजी को जीता कर बता दी थी। कहा जाता है कि एक म्‍यान मे दो तलवार नही रह सकती है जबकि एक तरवार बिना काम की सिर्फ बातूनी हो,इसलिये नेताजी ने कांग्रेस को गांधी को सौपकर नया रास्‍ता चुनना उचित समाझा। उस गांधी को राष्‍ट्रपिता की बात किया जाना हस्‍यास्‍पद होगा जिस गाधी का लड़का हरीलाल गांधी अपना पिता न मानते हो।
गांधी क्‍या है और क्‍या थे वह किसी से‍ छिपा नही है..गांधी रहस्‍य के नये नये प‍न्‍ने नित खुल है…जिससे गांधी का नेहरू प्रेम भी उजागर हो रहा है। 
30 June, 2011 08:20


vishwajeetsingh said…
महाशक्ति जी गांधी की ये वैचारिक सन्ताने भारत की सांस्कृतिक अवधारणा को जाने बिना या जानने के बाद भी गांधी को राष्ट्रपिता कहती ही रहेगी और भारत माता का अपमान करती रहेगी ।
वीर गोडसे को पानी पी – पी कर गाली देने वाले मित्रों ने क्या कभी सोचा है कि गोडसे जो की बचपन से ही जाति – पाति , छुत – अछूत आदि कुरूतियों का विरोधी एक सच्चा समाज सुधारक था , हिन्दू राष्ट्र समाचार पत्र का यशस्वी संपादक था , अत्याचारी निजाम हैदराबाद के विरूद्ध आर्य समाज के आन्दोलन में हैदराबाद सत्याग्रह की टोली का नेतृत्वकर्त्ता था , हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का समर्थक था , नेहरू की मैकालेवादी मानसिकता का विरोधी होने पर भी नेहरू की भारत के उद्योगीकरण करने की नीतियों का समर्थन कर्त्ता था और गांधी का सम्मान करने वालों में भी अग्रिम पंक्ति में था । तो क्या कारण रहे की गोडसे जैसे अहिंसक व्यक्ति को कलम छोडकर रिवाल्वर थामनी पडी और गांधी वध का अपयश अपने ऊपर लेना पडा ?
मित्रों हमे अपने विचार किसी संगठन , दल अथवा पार्टी की विचार धारा पर नहीं बल्कि सच्चाई को जानकर तथ्यों के आधार पर रखने चाहिए । आगे आपकी इच्छा ……


एक बात बताएंगे कि गाँधी से ज्यादा उम्र का नेता और कौन है जो इतना समय खर्चता रहा। अगर गाँधी जी कमजोर हो चुके थे,तो इसमें गलत भी ज्यादा नहीं है।
आप एक गलत बात और कर रहे हैं कि 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं तब और 4-5 करोड़ रह लेते, अब ये 17-18 करोड़ हैं। यानि कुल मिलाकर 35-40 करोड़ से अधिक हो जाते अगर बांग्लादेश को मिला दें।
गाँधी जी वाले सभी अलेखों को देखकर टिप्पणियाँ कर रहा हूँ।


आप को यह दिखाई देना चाहिए कि यह कोई इतिहास नहीं एक फिल्म का गीत है। पता नहीं इस बात को इतनी गम्भीरत से लेने की क्या जरूरत थी। मनोज कुमार की फिल्म देखिए, एक जगह वह शहीद में शानदार काम भी करते हैं तो दूसरी जगह उपकार में गाँधी और जवाहरलाल के नाम पर भी गीत गाते हैं।
इस गीत से किसी दूसरे शहीद का अपमान नहीं होता। मैंने खुद गाँधी जी पर गीत और कविताएँ भी लिखी हैं और भगतसिंह पर भी।
सोच का दायरा छोटा है, इसे बड़ा किया जा चाहिए।
एक बात और आपके ब्लाग पर जितने टिप्पणीकार हैं उनमें से किसी ने गाँधीवाद को जाना नहीं है। पहली बात तो यह कि गाँधीवाद कुछ है ही नहीं।
जिस बाबा रामदेव की बात आप यहाँ करते रहते हैं, उनके स्वदेशी के सिद्धान्त और अनशन का श्रेय भी गाँधी को ही जाता है। मैं हिंसा और अहिंसा दोनों को पसन्द करता हूँ लेकिन यह भगतसिंह के अहिंसा वाले तरीके से होगा। लेकिन गाँधी के सामाजिक और आर्थिक सिद्धान्तों को देखें तो मालूम होगा कि गाँधी के विचार कैसे हैं? गाँधी नहीं गाँधी का विचार महत्वपूर्ण है।
यह गीत सिर्फ़ श्रद्धा से गाया है न कि शहीदों से द्वेष रखकर। जैसे आप एक नहीं बहुत से लोगों को प्रणाम करते हैं भले उनके विचार आपसे कितने भी भिन्न हों। 

मैंने लिखा
महाशक्ति और विश्वजीत जी,
मुझे तो किसी ने बताया ही नहीं कि मेरे लिखे पर किसी ने जवाब भी दिया है। यह संयोग है कि मैं खुद यहाँ आ गया।
http://www.hindi.mkgandhi.org/g_hatya.htm पर प्रकाशित तथ्यों का खंडन करें।
http://www.hindi.mkgandhi.org/faqs/faq.htm पर प्रकाशित बातों का भी खंडन करें।
इतना तय है कि गोडसे एक पागल और सनकी था। उसका बयान मैंने पढ़ा है। गाँधी-वध क्यों देखा है। वह किताब बताती है कि गोडसे धार्मिक उन्मादी के सिवाय और कुछ नहीं है भले ही वह देशभक्त हो लेकिन उसकी सनकी को अच्छा नहीं कहा जा सकता।
विश्वजीत जी,
आप पहले उपरोक्त दोनों लिंकों का खंडन करें वह भी तर्कों और तथ्यों के साथ। तब बात आगे बढ़ेगी।
महाशक्ति जी,
यह बिलकुल अनावश्यक प्रश्न है कि कौन राष्ट्रपिता है और कौन नहीं। गाँधी ने कभी अपने नाम में खुद से महात्मा नहीं लगाया था। बस एक बार बैंक से संबन्धित काम में जहाँ अपरिहार्य स्थिति थी वहीं दस्तखत में महात्मा लिखा वरना वे मोहनदास करमचन्द गाँधी ही लिखते थे।
मैं जानना चाहता हूँ कि विश्वजीत जी ने गाँधी पर गहन अध्ययन और चिन्तन कैसे किया और क्या-क्या अध्ययन किया। गाँधी को पूरी तरह पढ़ने के लिए ही कम से कम 3500 से 4000 घंटे चाहिए क्योंकि गाँधी के सम्पूर्ण वांगमय में लगभग 55000 पृष्ठ हैं और फिर उनके उपर जब आप आरोप लगाते हैं और गोडसे को वीर कहते हैं तो गाँधी के उपर कम से कम बीस-तीस किताबें और पढ़नी पड़ेंगी यानि कुल मिलाकर कम से कम 60-70 हजार पृष्ठों आपने पढ़ लिया? ये तो अध्ययन हुआ और फिर चिन्तन का मतलब तो हवाई जहाज चलाना नहीं होता। उसके लिए इससे भी ज्यादा समय लगाना होगा। इसके अलावा भगतसिंह हैं, चंद्रशेखर आजाद हैं , नेताजी हैं और सब ले-देकर आपको कम से कम 10-15000 घंटे तो खर्च करने ही पड़ेंगे। यानि अगर आप रोज पाँच घंटे भी पढ़ते हैं तब 6-7 साल तो सिर्फ़ इन्हीं लोगों को पढ़ने में निकल जाएंगे।
आपके अनुसार गाँधी जी को राष्ट्रपिता टैगोर ने कहा फिर नेताजी ने दुहराया। साल मालूम होगा कस्तूरबा के मरने पर 1944 में नेताजी ने राष्ट्रपिता क्यों कहा? यह साल तो कांग्रेस से मतभेद और आजाद हिन्द फौज के गठन के बाद का है।
क्या आप बता सकते हैं कि नेताजी को अब क्या फायदा होनेवाला गाँधी जी से? या यह बताइए कि बापू नाम की किताब लिखनेवाले दिनकर तो वीर रस के कवि थे, फिर क्यों लिखी बापू?
सुभाष चन्द्र बोस ने खुद को आजाद भारत का राष्ट्रपति घोषित कर रखा था तो वे सत्ता के लालची हो गए? आप सब कुछ नहीं सिर्फ़ गाँधी विरोधी आन्दोलन चलाने की कोशिश कर रहे हैं? पिछली बार मैंने गाँधी जी पर और सुभाष चन्द्र बोस पर जो सवाल उठाए थे, उनका जवाब अभी तक किसी ने नहीं दिया।
वीर गोडसे पर सवाल खड़ा कर लिया आप सबने लेकिन मेरे सवाल जो गाँधी-सुभाष-भगत पर हैं उनके जवाब दीजिए तब आगे बात होगी। भगतसिंह के बारे में मैं कह चुका हूँ वे नेहरु के प्रशंसक हैं और सुभाष के उतने प्रशंसक नहीं हैं। सबूत चाहिए तो मिल जाएगा। सम्पूर्ण दस्तावेज हैं भगतसिंह के, उसमें से दिन भी बता दूंगा।
और भगतसिंह ने जो बम फेंका था वह भी कोई मौलिक सोच नहीं थी। आप खुद पढ़ और जान लें कि फ्रांस में यह घटना हो चुकी थी। उसी से प्रेरणा  लेकर भगतसिंह ने भी बम फेका था।
आप सब एक फालतू सवाल के पीछे पड़े हुए हैं और उसे महत्वपूर्ण बता रहे हैं। उतना शोर मचाइए कि भारत का अंतरराष्ट्रीय नाम भारत हो, अंग्रेजी जड़-मूल से खत्म हो लेकिन आप सब गाँधी-गाँधी कर रहे हैं। वे तो बेचारे मर गए और और आप सब परेशान हैं उनको लेकर। देश के अन्य सवालों को हल करने की बजाय अपना समय मत खराब करिए राष्ट्रपिता में।
मेरे सभी सवालों के जवाब के लिए गाँधी पर जितने आलेख हैं उन्हें देख लें और जवाब दें तब आगे नहीं तो सब बकवास है……

अभी आत्मा की आवाज पर तो नहीं कहूंगा लेकिन गाँधी पर जरूर कुछ कहना चाहूंगा। बेचारे गाँधी जी को न दलितों ने माना, न हिन्दुओं ने और न मुसलमानों ने। फिर भी गाँधी बने हुए हैं और बने रहेंगे।

Bhushan said…
Pallavi Saxena has sent this comment by email:
जैसा की श्री चन्दन कुमार जी ने कहा है। मैं भी कहना चाहूंगी कि आत्मा के विषय में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, हाँ गांधी जी और नथुराम गोडसे के बारे में जरूर इतना कहना है। कि वो भी इंसान बुरा नहीं था। यदि आपने India Today का वह अंक पढ़ा हो जो गोडसे पर ही आधारित था तो आप को जरूर पता चलेगा की वो भी बाकी के देश भक्तों के तरह ही एक देश प्रेमी था ,हाँ उसकी सोच कुछ अलग थी। मगर उसका देश प्रेम कम नहीं था। उस में लिखा था ,उसकी आस्तियां तब ही वेसर्जन की जाएँ जिस दिन सिंधु नदी तिरंगे के नीचे से बहने लगे ,जो आज तक न हो सका, और न ही आगे कभी होने कोई संभवना है ,मैं भी कई बार कई मामलों में गांधी जी को सही नहीं मानती,एक इस गोडसे के case में और दूसरा भगत सिंग के case में यदि उस वक़्त गांधी जी ने हस्ताक्षर नहीं किए होते तो भगत सिंग को फासी नहीं हुई होती। खैर यह मेरा मत है ….मगर सर आपने बहुत कम लिखा मेरी गुजारिश है आप से कि आप इस विषय पर और लिखें।

पल्लवी जी,
आपने इंडिया टुडे का जिक्र किया है वैसी बहुत सारी बातें हैं लेकिन शायद ही भरोसे के काबिल हैं। यहाँ तो गाँधी वध को सही ठहरानेवाले लोगों की भी कमी नहीं है। लेकिन मैं या आप सब जानते हैं कि गाँधी के मर जाने से देश को क्या मिल गया? जब मैं नाथूराम गोडसे का बयान पढ़ रहा था तब मुझे गुस्सा आता था कि नाथूराम एक पागल आदमी है, बार बार धर्म की दुहाई की दी है उसने। अन्तर बस यही हो जाता है कि एक को उन्होंने कहा कहते हैं और दूसरे को उसने कहा कहते हैं।
गाँधी वध पर कई किताबें हैं और सब बकवास किस्म की हैं। गाँधी ने भी अपने जीवन में जो सबसे बड़ी भूलें की हैं उनकी संख्या 4-5 ही है।
लेकिन भगतसिंह की बात हमेशा लोगों को गाँधी के खिलाफ़ भड़काने वालों ने कही है। यह बात तो भगतसिंह के भाई कुलतार सिंह भी कह गए हैं लेकिन किसी को 4अक्टूबर 1930 का पिता को भगतसिंह का लिखा पत्र और 22 मार्च 1931 को साथियों को लिखा पत्र नहीं दिखता। सम्भव हुआ तो इन दोनों को अपने ब्लाग पर कभी लाऊंगा।
और हाँ, इंडिया टुडे या किसी पर भरोसा नहीं करके शोध पर भरोसा किया जाना चाहिए। इस विषय पर जान बूझ कर कुछ लोगों द्वारा घृणा फैलाई जाती है। यह सम्भव है कि गोडसे अच्छा आदमी रहा हो लेकिन सनकी तो था ही।
कुछ युवाओं को गाँधी से नफ़रत सिर्फ़ इस वजह से है कि वे जवान नहीं हैं, अगर वे जवान होते और अंग्रेजी सूट पहनते तो उनकी इतनी आलोचना नहीं की जाती। लेकिन जहाँ गाँधी सोचते हैं, वहाँ कोई पहुँच पाए तब तो।
एक और चीज देखिए कि बेचारे गाँधी ही तो हैं जिनके उपर सारे आरोप लगाए जाते हैं, उनके स्मारकों के उपर कचरा साल भर पड़ा रहता है और सभी देखते रहते हैं- गांधी के पक्षधर भी! इस हिसाब से अच्छा ही है कि भगतसिंह के उतने स्मारक नहीं हैं वरन उनके उपर भी 363 दिनों तक गंदगी, मुरझाए सूखे फूल, पक्षियों की गंदगी ही होते!
गाँधी और भगतसिंह को समग्रता में जोड़कर देखने की जरूरत है।