नाथूराम गोडसे। जाने कितने लोगों का आदर्श है ये नाम। अखंड भारत का स्वप्न देखनेवाले अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो नाथूराम को आदर्श माने बैठे हैं। मैं आज नाथूराम की बात किसी विवाद के लिए नहीं कर रहा। आज मेरा विषय कुछ अलग है। 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सभी लोगों में गाँधी जी स्वभाषा के सबसे अधिक पक्षधर थे। इतना तो तय माना जा सकता है कि अगर 1948 के बाद और भारतीय संविधान बनने तक गाँधी जीवित होते तब निश्चित तौर पर हिन्दी और भारतीय भाषा का स्थान आज से बेहतर होता। आज जो अंग्रेजी की स्थिति है, उसमें और 1890 की स्थिति में रत्ती भर का फर्क नहीं है। अंग्रेजी का कोई सुखद प्रभाव हमारे देश पर कभी रहा है, इसपर सोचना व्यर्थ है। यह न सोचें कि अंग्रेजी के माध्यम से बहुत भारी बात हो गई। कुछ लोग यह सोचते हैं कि अंग्रेजी के चलते हमारे देश के लोगों को विश्व का श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने को मिला लेकिन इस बात पर मैं यहाँ अधिक नहीं कहूंगा क्योंकि मैं अपनी किताब में इस पर विस्तार से लिख चुका हूँ।

इस बात की गारंटी तो नहीं ली जा सकती कि नाथूराम अगर गाँधी को नहीं मारता तो गाँधी को और कोई भी नहीं मारता। लेकिन अभी हम यह मानकर चलें कि नाथूराम ने गाँधी की हत्या की। उससे कोई फायदा तो किसी को नहीं मिला। क्योंकि मैंने हमेशा कहा है कि गाँधी सबसे बदनसीब नेता हैं। उन्हें दलितों ने अस्वीकार किया, हिन्दुओं ने अस्वीकार किया और मुस्लिमों ने भी अस्वीकार किया। कुछ अपवाद हो सकते हैं।

मेरा विषय बहुत छोटा है। इसलिए अधिक तो नहीं कहूंगा लेकिन नाथूराम अपने को जितना समझदार माने लेकिन सच तो यही है कि गाँधी को मारकर उसने अंग्रेजी की स्थिति बहुत मजबूत कर दी। इस बात पर कितनों को परेशानी होगी लेकिन सच तो यही लगता है। कारण यह है कि गाँधी जी हिन्दी और भारतीय भाषाओं के सबसे बड़े पक्षधर थे। इस बात के एक नहीं सैकड़ों सबूत हैं। 

गाँधी जी को बहुत से लोगों ने जिद्दी भी कहा है। लेकिन गांधी के असर को देखते हुए इतना तय माना जा सकता है कि अंग्रेजी के खिलाफ़ आजादी के बाद अगर कोई दमदार कदम और आंदोलन उठा सकता था और उसे सफल बना सकता था तो वह एकमात्र गाँधी थे। इसलिए मैं मानता हूँ कि गाँधी की हत्या करके गोडसे ने भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी  का राज एक लम्बे समय के लिए कायम कर दिया और सिवाय गाँधी के दूसरा ऐसा कोई बड़ा नेता था ही नहीं जिसका असर पूरे देश पर हो और भाषा के मामले पर विवाद को सही दिशा देते हुए वह अंग्रेजी का साम्राज्य खत्म कर पाता या इसके लिए कोशिश कर पाता। उनके अलावे लगभग सारे बड़े नेता अंग्रेजी के भक्त बने हुए थे और गाँधी जी के जीवित रहते हिन्दी के समर्थन में शायद मजबूरी में रहते थे।

अन्त में नाथूराम ने अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य कायम किया है अपनी मूर्खतापूर्ण हरकत से। यहाँ ऐसे लोग कृपा करेंगे जो आजादी की लड़ाई, गाँधी, नरम दल, गरम दल, अहिंसा जैसी बात पर बहस करें क्योंकि मेरा मुद्दा यहाँ भाषा है और कुछ नहीं।
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