कहीं मजाक तो नहीं है यह लोकपाल?

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एक पेड़ है। बहुत मोटा। संयोग या दुर्योग जो कहें कि वह नुकसानदेह है, फायदेमंद नहीं क्योंकि उसके फल जहरीले हैं। जब छोटा था तब सारा खाद-पानी इसी ने ले लिया और मोटा होता गया। और अब बहुत मोटा हो गया है। इस जहरीले फल को खत्म करने के लिए क्या किया जाना चाहिए? आप अलग-अलग समाधान सोच सकते हैं। लेकिन इसके समाधान के कुछ और तरीके हैं। जैसे उसके चारों ओर एक रस्सी बाँध दी गई है ताकि वह पेड़ बँधा रहे। लेकिन सब जानते हैं कि इस पेड़ को बाँधने का सम्बन्ध इसके फल को या इस पेड़ को खत्म करने से बिलकुल नहीं होगा। 

लोकपाल के नहीं रहने पर



















अब एक महाबुद्धिमान समूह अपनी महाबुद्धिमानी से इसे लोहे की जंजीर या और मोटी रस्सी से बाँधना चाहता है और शायद यह समझता है कि इससे पेड़ के फल जहरीले नहीं होंगे या जो (100-65=35 प्रतिशत) फल जहरीले होंगे, वे बाहर नहीं सकेंगे और उससे लोगों को नुकसान नहीं होगा। अब यह समझना तो आसान है कि पेड़ की जड़ पर वार किया जाय और उसे काटने का इन्तजाम किया जाय लेकिन उसको आप 420 की रस्सी से बाँधें या अध्याय 13-14 या भारतीय दंड संहिता के किसी धारा या कानून से बाँधे या जन लोकपाल के तथाकथित कड़े कानून से, यह सब तमाशे हैं। बात साफ हो गयी होगी कि क्या और किसके लिए कहा जा रहा है।
लोकपाल के बनने पर

जन लोकपाल बिल में रेमन मैगसेसे पुरस्कार की बात क्यों ?

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पता नहीं कैसे लोग मीडिया में होते हैं जिनको आंख पर पट्टी बांधकर रहना अच्छा लगता है और वे समझ ही नहीं पाते कि तहरीर चौक एक तमाशा के सिवा कोई क्रान्ति-व्रान्ति नहीं था। जिधर देखो उधर हर जगह यह शोर है कि तहरीर चौक बन जायेगा जंतर-मंतर। इस तहरीर चौक और मिस्र की क्रान्ति की नौटंकी के बारे में पहले भी लिख चुका हूं। जहां तक मैं समझता हूं कि मिस्र हो या लीबिया हो या कोई और हो जहां भी क्रान्ति की सुगबुगाहट सुनाई पड़ रही थी, वह अमेरिका के चालाकी और दुष्टतापूर्ण उपनिवेशवाद का ही दिखावटी चेहरा है। मिस्र में अलबरादेई अमेरिका के चापलूस( भले ही वे नोबेल पुरस्कार विजेता हैं) हैं, अपना कद बढ़ाने में लगे हुए हैं। वही अमेरिका जिसके बहुत से राष्ट्रपतियों को नोबेल का शान्ति पुरस्कार मिल चुका है। लेकिन भारत में कोई इस लायक नोबेल समिति को दिखता ही नहीं। अब अमेरिका जान बूझ कर क्रान्ति के नाम पर लोगों को भड़का कर अपने चापलूसों या नौकरों को इन देशों का प्रमुख बनवा रहा है ताकि अमेरिका का प्रभुत्त्व इन सब पर कायम रह सके। एक बात जरुर याद दिला दूं कि यही अमेरिका क्यूबा की मदद कर रहा था तो वहां की जनता इसकी तारीफ़ कर रही होगी लेकिन यह देश बाद में इन्हीं लोगों पर कब्जा कर बैठा था। ऐसे ही चालबाजी सहायता यह देश दूसरे देश को देता है। फिर भी अमेरिका कुछ गलत नहीं कर रह- ये कहने वाले लोग हैं। सुना है कि यही अमेरिका दूसरे देशों को सिखाता है कि ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए अन्य देश अपनी सुविधाओं में कमी लाएं लेकिन खुद उसके यहां किसी भी मिनट में 7000 हवाई जहाज उड़ते हुए पाए जाते हैं। इसी देश को लोग आदर्श और महान कहने वाले हमारे देश में मौजूद हैं।
           

    कुछ लोगों ने जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति के साथ इस अन्ना हजारे वाले आंदोलन का वर्णन किया है। कुछ लोगों की इसमें  भागीदारी से प्रसन्न दिख रहे हैं। अब मैं कहना चाहता हूं कि नीतीश की रैली में जितने लोग आते हैं वही लोग लालू की रैली में भी नारे लगाते देखे जायं या शामिल हों तो आप कैसे कह सकते हैं कि जनता जागरुक हैपंकज चतुर्वेदी के आलेख में एक बात स्पष्ट होती है जनता अपने काम को जल्दी से करवाने के लिए घूस का खूब प्रयोग करती है फिर भी भ्रष्टाचार के नाम पर उछल-कूद कर के शोर भी क्यों मचा रही है?

      राजीव दीक्षित ने दो कानून सोचे थे राइट टू रिकाल और राइट टू रिजेक्ट। यह दोनों कानून बहुत ही अच्छे थे क्योंकि अगर कोई सांसद या विधायक चुनाव में जीतने के बाद गलत या दोषी पाया जाता है तो जनता को अधिकार हो कि वह उसे वापस जमीन पर पटक दे। अभी तो कोई भी चोर जो इस किस्म का है जीतने के बाद पांच साल के लिए तो मालिक ही हो जाता है संसद या विधानसभा में एक कुर्सी का। अच्छा होता कि अन्ना इस मांग को लेकर यह अनशन करते। वैसे अन्ना चाहे जितने अच्छे रहें हों अभी वो सब कुछ ठीक नहीं कर रहे क्योंकि शायद ही यह कानून कुछ सुधार ला पाएगा। इस जन लोकपाल बिल में रेमन मैगसेसे पुरस्कार की बात कही गयी है आश्चर्य है कि अभी जो इस बिल के तीन प्रमुख कर्ता-धर्ता हैं उनमें किरण बेदी समेत तीनों इस पुरस्कार से सम्मानित हैं। यह सीधे सीधे इन सबकी चाल लगती है। इसलिए कोरी भावुकता से निकल कर सच को जानने की कोशिश होनी चाहिये।