आदरणीय कहकर भी हो सकता है अपमान

6 टिप्पणियाँ

इस बार अधिक कहना नहीं है। बस एक बात कहना चाहता हूँ और वह भी एक वाक्य में। अभी ब्लॉग-लोक का  भ्रमण करते हुए कुछ पढ़ लिया। लेकिन नीचे का वाक्य खुद से बनाया है। बिना साफ-साफ बताए अब सुनिए क्या कहना चाहता हूँ।
 आदरणीय कहकर भी किसी का अपमान किया जा सकता है। 
इस सत्य का ज्ञान किन-किन पाठकों को है?

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कल के सवालों के जवाब और जेनो की बात…

4 टिप्पणियाँ

कल मैंने तीन सवाल पूछे थे। उनके जवाब आज दे रहा हूँ। आप स्वयं जाँच लें कि आप कितने सही हैं।
1) चार बाट होंगे 1, 3, 9 और 27 किलोग्राम के जिनकी सहायता से हम एक से चालीस किलोग्राम तक तौल सकते हैं। यह सवाल मैंने अपने शिक्षक से सुना था और जवाब भी यानि मुझे इसके जवाब के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ी थी।
2) सवाल के लिए चित्रों की जरूरत है। नीचे जवाब है। इसके लिए दो जवाब और आज तीसरा जवाब भी मिल गया। चित्र में पहला जवाब तो बिना मेहनत के सोचा जा सकता है लेकिन दूसरा जवाब मैंने अपने कई घंटे (शायदएक-दो दिन) लगाकर पाए थे। हुआ ये था कि एक पुरानी पत्रिका में ये सवाल दिख गया और जवाब वाला अंक था ही नहीं। अब तो जवाब के पीछे मैंने वृत्त से लेकर सभी ज्यामितीय आकृतियों पर खूब मेहनत की और आखिर में चित्र में दाएँ वाला जवाब मिला। अगर ध्यान से सोचा जाय तो यही सही है क्योंकि बगीचे की जमीन पहले चित्र की तरह हो इसकी संभावना नगण्य है लेकिन दूसरे चित्र की तरह जमीन हर जगह देखने को मिल सकती है। थोड़ी कम ही सही लेकिन मिल सकती है।

आज एक नया उत्तर प्रतुल जी ने सुझाया है। उनका जवाब है-
0………………………0
0……..0……..0…….0
0……..0……..0…….0
0………………………0
      लेकिन इसमें पँक्तियाँ थोड़ी इधर-उधर भी लग रही हैं। पँक्तियों को क्यारी कह सकते हैं। और सवाल के अनुसार पँक्तियाँ सिर्फ़ छह ही चाहिए लेकिन यहाँ पहली और चौथी पँक्ति में दो ही पेड़ हैं। प्रतुल जी के जवाब के आधार पर जमीन या बाग का चित्र है-

यानि सभी बिंदुओं को मिलाकर देखने पर यहाँ पर आठ पँक्तियाँ हैं। इसलिए इस जवाब से मैं सहमत नहीं हूँ। लेकिन प्रयास अच्छा रहा।
3) इसमें द्विवेदी जी ने व्यापारिक कुशलता दिखाई है। सिर्फ़ अन्तिम छह दिनों में आप मुझे इतने रुपये देंगे।
536870912 + 268435456 + 134217728 + 67108864 + 33554432 + 16777216 लगभग 106 करोड़ । और मैं आपको एक महीने में मात्र तीस करोड़ रुपये ही देनेवाला था। इस सौदे को मंजूर करना आपके लिए बहुत ही नुकसानदेह था।
एक अफ़सोस है
कोई जेनो नाम का गणितज्ञ था। कहाँ का था, यह भी याद नहीं। जिस किताब में पढ़ी थी वह मिल नहीं पाई। खोजा लेकिन बेकार क्योंकि मिली ही नहीं। उसमें एक जबरदस्त प्रश्न है जो जेनो ने उठाई थी। जेनो ने साबित किया कि संसार में कुछ भी गतिशील नहीं हो सकता। बात तो बेवकूफ़ी वाली लग रही होगी। लेकिन किताब मिले तो थोड़ा विस्तार से बताऊंगा। अभी थोड़ा सा याद है वह बता रहा हूँ।
      कोई बिन्दु है और दूसरा बिन्दु है । जैसे क पटना के लिए और ख दिल्ली के लिए मान लेते हैं। जेनो का कहना है कि क से ख तक जाने के पहले उनके बीच के ग बिन्दु पर जाना होगा। फिर क से ग तक जाने के लिए घ बिन्दु जो क और ग के बीच में है, वहाँ पहुँचना होगा। फिर यही क्रम आगे जारी रहेगा। चूँकि दो बिन्दुओं के बीच अनंत बिन्दु हो सकते हैं, इसलिए हमेशा हम एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु पर जाने के पहले उनके बीच के बिन्दु से गुजरते रहेंगे। और यह अनंत बिन्दुओं का खेल है, इसलिए हम कभी भी क से ख यानि पटना से दिल्ली पहुँच ही नहीं पाएंगे। आश्चर्य तो यह है कि हम सभी समझते हैं कि यह गलत है लेकिन सैद्धान्तिक रुप से जेनो ने जो बात कही वह सैद्धान्तिक रुप से गलत साबित नहीं हो पाती है। इस पर ज्यादा कहता लेकिन वह किताब मिले तब तो। उम्मीद है एक-दो दिन में खोज निकालूंगा और यह बात विस्तार से बताऊंगा।
      इस सवाल पर या कहिए पहेली पर अधिकांश लोग खुद को गणितज्ञ मानते हुए हँसना शुरु कर देते हैं या बेवकूफ़ी करार देते हैं। लेकिन ध्यान से सोचने पर मजाक नहीं है। यहाँ यह ध्यान रह कि अनंत जैसे ही घुसा कि सारा गणित गोल। आप अनंत को कितनी भी तेज गति से विभाजित नहीं कर सकते। इसलिए तेज गति या कम दूरी वाली बात यहाँ नहीं की जा सकती।

मैं मूर्ख हूँ और अपने देश का बुरा चाहता हूँ(परिवर्धित संस्करण )

11 टिप्पणियाँ

साहब ने अपना ज्ञान बघारा है। अभी-अभी देखा। उनके सारे अनुयायी जैसे कि… छोड़िए नाम नहीं लेता हूँ। चला बिहारी ब्लागर बनने (सलिल नाम है जिन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से मुझे कुछ कहा है। इनका नाम लेना पड़ा क्योंकि इन्होंने मुझे संबोधित किया है।) आदि अपने तो भेड़चाल में शामिल हैं लेकिन जरा देखिए कि मुझे क्या कहा है इस सलिल ने जो पटना के ही हैं- जिन महाशय ने कभी आपको भगोड़े भारतीय के खिताब से नवाजा था, उन्हें यह आलेख और ऐसे ही कई आलेख जो आपने पूर्ण शोध के आधार पर लिखे हैं, पढना चाहिए! मगर क्या किया जा सकता है- मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं!!

      साहब भूल गए कि मृतक विचार कर ही नहीं सकता तो चिपकने की बात कहाँ से आ गई?


यानि ये आलेख पूर्ण शोध करके लिखा गया है। यहाँ एक बात बता दूँ कि उनके इस आलेख पर जितने लोगों ने टिप्पणियाँ की हैं उनमें से अधिकांश लोग जिस बात का समर्थन करते हैं उसे भी साहब ने गलत ठहराया है। लेकिन वहाँ किसी की हिम्मत नहीं होती कि पूछे कि वास्तव में उनके पास क्या तर्क हैं या हैं भी कि नहीं? शायद बात समझ में नहीं आ रही। लीजिए साफ-साफ बताता हूँ। कुछ दिनों पहले साहब ने एक लेख लिखा था। उसमें एक बात आई है कि ब्रिटिश संसद में लॉर्ड मैकाले का शिक्षा द्वारा भारत को दास बनाने का ड्राफ्ट के बारे में। इसे गलत बताया गया है। अब मैं कुबताता हूँ, सुनिए। आदरणीय लेकिन दिवंगत राजीव दीक्षित ने यह बात जमकर फैलाई थी। राजीव दीक्षित साफ-साफ कहूँ, तो बाबा रामदेव के गुरु थे। मैं तब एकदम परेशान हो जाता हूँ जब राजीव दीक्षित अपने व्याख्यानों में रामदेव को परमपूज्य कहते हैं। यह एकदम राजनीतिक अंदाज लगता है। फिर भी मैं राजीव दीक्षित का प्रशंसक हूँ। कम से कम उनकी बोलने की कला और उनके ज्ञान का तो हूँ ही। उनके ज्ञान का आधार हैं धर्मपाल जी। उनके बारे में मेरी जितनी जानकारी है उसके अनुसार वे मेरे सम्माननीय हैं। लेकिन राजीव दीक्षित के पीछे कुछ खोजबीन करनी शुरु की तो एक मित्र को बहुत बुरा लगा और वे इसे बरदाश्त नहीं कर सके। लेकिन यहाँ ज्यादा कहने का समय भी नहीं है और अभी ये सब कहना उचित भी नहीं है।

      मेरा सवाल है उन सारे टिप्पणीकारों से जो हिंदुत्व के पुरोधा हैं, रामदेव के अत्यन्त समर्थक हैं और साहब के ब्लाग पर टिप्पणी कर चुके हैं कि इस मैकाले वाली बात पर कितनों ने शोध किया? क्या साहब की हर बात 100 प्रतिशत सही होती है? उनकी बातों पर आँख मूँद कर विश्वास करना ही देशभक्ति और सच्चा होने का सबूत है? उससे अच्छा तो सुरेश चिपलूनकर(अभी तक की मेरी जानकारी से) हैं जो अपनी बात यथासंभव तर्क और सबूत के साथ करते हैं। मैं उनका प्रशंसक नहीं फिर भी उनकी इस बात का समर्थन करता हूँ। या फिर तेजोमहालय वाली बात को ले लें तो पी एन ओक की बात का इन सभी संघी टिप्पणीकारों ने समर्थन किया है। (मैं जिस ब्लाग पर या इंटरनेट पर जहाँ कहीं गया हूँ शायद ही किसी संघी आदमी ने पी एन ओक की बात का विरोध किया है।) क्या ये सारे लोग एक आदमी की हर बात में सिर्फ़ हाँ में हाँ मिलाते हैं? अगर ऐसा है, तो करते रहिए मेरी शिकायत और अपना समय इसमें लगाते रहिए। अब चालाकी से कहना होगा कि आप ऐसा नहीं करते तो अच्छी बात है कि मेरे उपर नहीं सोचते।

मुझे नहीं पता कि भक्तों की इन टिप्पणियों का क्या उद्देश्य है। लेकिन देख लें कि आखिर क्या कहते हैं लोग?
1) ज्ञान की कुछ पोथियाँ चबाते और मुँह से उसका झाग यहाँ वहाँ बिखराते हुये विचरते बछड़ों को पालने वालों के लिये यह जानकारी शायद कुछ काम की हो

(इटालिक अक्षरों में ब्लाग जगत में कौन लिखता है, आप जानते ही होंगे।)

हर आदमी जो लिखता है, बोलता है, सोचता है कहीं न कहीं से वैचारिक खुराक लेता है। और इसमें गलत क्या है? लेकिन जब ये लोग ज्ञान बघारते हैं तो ठीक है, वह प्रमाण है, बुद्धिमत्ता है लेकिन जैसे मैंने कुछ कहा कि झाग हो गया। बार-बार तमाशा वह भी बिना पैसे के देखा जा सकता है यहाँ।
मेरा सवाल है कि कौन सा बन्दा है जो बिना पोथियाँ चबाए यहाँ लिख और बोल रहा है? कहीं कोई अवतार तो नहीं उतर गया आसमान से। निश्चय ही अपनी पोथियों में सोना और दूसरों की पोथियों में मिट्टी वाली मानसिकता होगी। चिकित्सक होने के लिए रोगी होना जरूरी होता है क्या? वैसे शारीरिक चिकित्सकों को मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा की जरूरत सबसे अधिक है।

2) यह नास्तिकों का पुराना शगल है। जैसे ही कोई तथ्यपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है छपाक से कह उठेगें, “क्रान्तिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता। अन्यथा वर्ना गढ गढ के देंगे कि फलां फलां क्रांति कारी नास्तिक थे
जैसे क्रांतिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता ठीक वैसे ही क्रांतिकारी (मां के) कभी भी नास्तिक नहीं होते।यह तो आपकी तरह कोई कोई ही प्रमाण लाता है। अन्यथा इनको तो कुछ और ही सिद्ध करना है।

(ये महात्मा तो बुद्ध के अवतार हैं।)

        आखिर बेचारे क्यों परेशान हैं? एक का कहना है कि तथ्यपूर्ण जानकारी से नास्तिक कतराते हैं। दस हजार शब्द लिख डाले होंगे मैंने इनके लिए तर्क और तथ्य के साथ। लेकिन दूसरी जगह जाकर निंदा-रस का आनंद ही अलग है। यह तो साहब की तरह की ही कोई-कोई प्रमाण लाता है, इस वाक्य की शल्य-क्रिया करते हैं। जब मैं किसी किताब का हवाला दूँ और लेखक का नाम लूँ तो वह प्रमाण नहीं लेकिन अखबारों से उठाकर लानेवाली बात प्रमाण बन जाती है। मुझसे तो भगतसिंह के दस्तावेज के ही प्रमाण माँगे जाते हैं लेकिन ये साहब के अन्धभक्त उनके उपर इतना विश्वास करते हैं कि उनकी कही बातों को कृष्ण की गीता से कम नहीं मानते। इतने अच्छे भक्त तो काल्पनिक कथाओं में भी नहीं मिलते होंगे।
कहते फिरते हैं कि नास्तिकों से कोई दिक्कत नहीं और नास्तिकों का सम्मान करते हैं। लेकिन इनकी हर टिप्पणी बताती है कि ये कितने उन्मादी और अलगाववादी हैं। नास्तिकों के बारे में जितना जहर उगलते हैं उतना भजन ही गाइये, शायद कुछ काल्पनिक खुशी मिल जाय। नास्तिकों के पास इतनी फुरसत नहीं कि वे भजन गा सकें।

     अच्छा है, भाइयों खूब मेहनत करो। बस अपनी एक आदत है कि जवाब दे ही देता हूँ। क्योंकि भागना पसन्द नहीं।

      मतलब ये कि मैंने जो कहा या लिखा उसका जवाब अभी तक किसी ने भी दिया नहीं लेकिन मेरा कहा बेकार और झूठा है लेकिन साहब की चमचागीरी करता हुआ यह आदमी उनके द्वारा लिखे को शोधपूर्ण कहता है। क्या शोध है भाई? जरा शोध देख लेते हैं।

     उनके द्वारा बताए और सुझाए गए लिंक देखिए।

 

1)      जेल में गीता मांगी थी भगत सिंह ने

 

     जागरण की खबर को बनाया भारी शोध और अन्य सभी बातें बन गईं निराधार। मैंने जो लिखा या कहा वह किताबों से नाम और पते के साथ था लेकिन ये जनाब दैनिक जागरण जो आजकल बिहार में नीतीश के गुणगान करने में सारी सीमा को तोड़ता जा रहा है, उसकी बात को सौ साल तक किया गया भारी शोध समझते हैं। यहाँ नीतीश के बारे में यह बात याद रखी जाय कि वे कांग्रेस के नहीं हैं। यानि भाजपा और जदयू के हैं। नीतीश वाली यह बात आवश्यक नहीं लेकिन कह दिया क्योंकि दैनिक जागरण की सच्चाई देख रहा हूँ।


      बीबीसी की साइट से इसका हवाला दिया गया है। इसके लेखक कौन हैं, जरा ध्यान दीजिए –

साम्यवाद से प्रभावित थे भगत सिंह  जो चमनलाल का आलेख है, की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया। जबकि यह आलेख उनके द्वारा सुझाए गए लेख के ही लिंक में है। क्यों? क्योंकि सम्भवत: ये लोग कांग्रेस भगाओ आन्दोलन के पक्षधर हैं न कि पूँजीवाद हटाओ के? ये सारा तामझाम सिर्फ़ कांग्रेस के खिलाफ़ करते हैं। ये भाजपा के खिलाफ़ कब बोलते हैं। मैंने पिछली पोस्ट में भाजपा को लेकर कुछ बातें बताईं थीं। अभी तक उनका जवाब नहीं आया है। आएगा तो बता दूंगा।
कांग्रेस अगर नागनाथ है तो भाजपा भी साँपनाथ तो है ही। मैं इन दोनों का विरोध करता हूँ और साथ में भारत के नकली कम्युनिस्ट लोगों का भी। जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने एकदम निंदनीय कार्य को अंजाम दिया। राहुल सांकृत्यायन जैसे लोग यूँ ही पार्टी से अलग नहीं हुए थे।

3) भगवद्गीता से ली थी भगत सिंह ने प्रेरणा?


     मतलब अखबारों ने जो लिख दिया वह सब शोध और आप लिखें तब इनके लक्ष्य में अवरोध। ये कैसा सत्य-बोध है? जब मैने अपने चिट्ठे पर भगतसिंह के गीता मँगाने के बारे में लिखा तो किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन देखने और सोचने की चीज तो यह है कि सब के सब बन्धु कितनी चाटुकारिता के साथ वन्दना करने में लगे हैं कि वाह क्या शोध है, मुझे पढ़ना चाहिए। यहाँ एक बात बताने का मन हो रहा है कि मेरे ब्लाग पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पोस्ट भगतसिंह की ही है। मैं ब्लागिंग में मात्र 10-15 दिनों से सक्रिय हूँ। अगर आप समझते हैं कि पहले से हूँ तो यह भ्रम है क्योंकि मेरे मई तक के सारे आलेख तेवरआनलाइन डाट काम पर प्रकाशित हैं और मैंने इन्हें अपने ब्लाग पर डाल दिया है। जिस दिन तेवर पर जो भी आलेख छपा उसी दिन की तारीख में अपनी वह पोस्ट मैंने अपने ब्लाग पर डाल दी है।

      गीता और भगतसिंह के संबंध में मैंने अपने तर्क और विचार पिछले दिनों रखे था। और जब तक आपके पास मेरे सवालों या तर्कों के जवाब नहीं हैं, आप कैसे अपनी बात को शोध करार दे सकते हैं।

      गाँधी जी आस्तिक थे(आस्तिक मतलब वह जिसे समाज आस्तिक कहता है)। मैं उनका प्रशंसक हूँ और उनके अधिकतम बातों के समर्थन में हूँ। तो क्या मैं उन्हें आस्तिक-नास्तिक की नजर से देखता हूँ। नहीं, बिलकुल नहीं! लेकिन भगतसिंह पर, उनके विचारों पर कोई अंगुली उठाए तो मैं अपनी बात तो रख ही सकता हूँ। बस वही किया और लोग हैं कि परेशान हो गए हैं। गाँधी जी पर मेरी बात से साफ-साफ पता चलता है कि मैंने सुभाष चन्द्र बोस पर भी सवाल उठाए हैं। जब तक मेरी समझ में सच नहीं आता तब तक मैं सवाल करूँ या छानबीन करूं तो कौन सा गुनाह कर रहा हूँ मैं?

    

लेकिन नहीं। मैं मूर्ख हूँ और देश का बुरा चाहता हूँ!

गाँधी जी पर बहस और मेरी टिप्पणियाँ

3 टिप्पणियाँ

पिछले दिनों महाशक्ति के चिट्ठे यानि ब्लॉग पर चला गया। वहाँ मुख्य पृष्ठ पर अंग्रेजी में नामित एक तरफ़ एक स्तम्भ जैसा है जिसमें गाँधी जी पर छ: आलेखों के लिंक हैं। इन आलेखों में मैंने पाँच आलेखों पर अपनी टिप्पणी की। वहाँ देखा कि महाशक्ति भाई और एक अन्य भाई दोनों बड़े परेशान हैं कि गाँधी जी को राष्ट्रपिता नहीं रहने देना है। यह लिखते वक्त मुझे एक एकांकी याद आ रही है जो कुछ साल पहले सुमन-सौरभ में छपी थी जिसमें गांधी जी कहते हैं कि वे साठ सालों से देश में राष्ट्रपिता का पद संभाल रहे हैं और अब उन्हें आराम चाहिए। किसी भी सेवा में कार्यरत आदमी को भारत में साठ-बासठ या पैंसठ साल की उम्र में सरकार सेवानिवृत्त कर देती है, तो उन्हें क्यों अभी तक सेवा से मुक्त नहीं किया गया। 
अपनी टिप्पणियों को मैं पहले भी आपके सामने रख चुका हूँ और इस बार फिर टिप्पणियों के साथ हाजिर हूँ। इस बार बहस नहीं होती है। बस, मैंने अपने विचार रखे और सिर्फ़ एक आलेख पर दो-चार टिप्पणियाँ हैं जिन्हें मैं आपके सामने रख रहा हूँ। अच्छी से समझ में आए इसके लिए तो मूल आलेखों को पढ़ना ही होगा। 
एक और जगह गाँधी जी पर थोड़ी सी बात हुई। मैंने वहाँ भी अपनी टिप्पणी की। ये सारी टिप्पणियाँ मूल आलेख के पते के साथ यहाँ रख रहा हूँ ताकि गाँधी जी पर मेरे विचार आप जान सकें।
मुझे तो गाँधी जी से बहुत हमदर्दी है, भाई!
आपसे निवेदन है कि भगतसिंह के लिखे 4 अक्टूबर 1930 जो पिता को लिखा गया था, उसे अवश्य पढ़ें।
इस बार मुझे कहना पड़ रहा है कि आपमें कोई सम्मान और निष्पक्षता की भावना है भी या नहीं?
कांग्रेस हो या कोई आपके सोच में तनिक भी तार्किकता नहीं दिख रही है। संसद पर हमले में सब सांसद मर जाते और वह संसद की बिल्डिंग ढह जाती तो ही अच्छा था। 2001 के हमले के बाद 2004 तक भाजपा पर कोई आरोप नहीं कि उसने क्यो नहीं कुछ किया? और कांग्रेस पर अब आरोप बिलकुल भाजपाई सोच है।
यह बहाना नहीं चलेगा कि संसद पर हमले के बाद भाजपा ने यह कदम उठाए और वह कदम उठाए। संसद की बिल्डिंग भी गुलामी का चिन्ह है और ये सांसद भी मारे जाने के लायक थे। हमलावर को पुरस्कार देना चाहिए था, ऐसा भी मुझे लगता है। क्योंकि आज भगतसिंह होते तो इन सांसदों की संसद पर पक्का बम फेंक कर खत्म कर दिया होता लेकिन किसी भारतीय ने यह नहीं किया।
बार बार गाँधीवाद की बात क्यों कर रहे हैं? मैं कह चुका हूँ कोई गाँधीवाद नहीं है। और होगा भी तो वह 1947 तक खत्म हो चुका।
संसद के भक्त कभी देशभक्त नहीं हो सकते। मुझे ऐसा लगता है जैसे कांग्रेसी चोर वैसे भाजपाई भी। उनके समय में हमला हुआ तो चिल्ला रहे हैं।
पार्टी में 75 साल पहले क्या हुआ इसका आज की पार्टी पर कोई असर नहीं हो सकता। क्योंकि उस समय का कोई आदमी या विचार कांग्रेस में हैं ही नहीं। गाँधी ने भी कहा था कि खत्म कर दो कांग्रेस को। ये सब ध्यान में नहीं आता।
भगतसिंह या शहीदों की आड़ में आप भाजपाइयों को महत्व दे रहे हैं। यह गलत है महाशक्ति भाई।
आपके हिन्दी चिट्ठे यानि ब्लाग पर अनावश्यक अंग्रेजी देखकर दुख हुआ।

मतभेद जायज है लेकिन यह वाक्य कि कांग्रेस के चमचे ही जानें कि राष्ट्रपिता गाँधी ही क्यों, तो यह आरोप नेताजी पर लगता है। आखिर क्या वजह है नेताजी अपनी फौल में एक रेजिमेंट का नाम गाँधी रेजिमेंट रखते हैं?
नेताजी पर इस तरह की घटिया टिप्पणी करना निंदनीय है भले ही वह अप्रत्यक्ष है।
मुझे किसी तरह की समस्या नहीं है चाहे राष्ट्रपिता भगतसिंह हों या गाँधी जी। यह आर्कुट और फेसबुक इन कामों के योग्य नहीं कि इनपर चर्चाएँ करके हम इतिहास रच दें या बदल दें।
आप मेरी टिप्पणियों पर कोई भी जवाब मेरे ईमेल पर ही दें क्योंकि बहुत जगह टिप्पणियाँ करता जा रहा हूँ और हर जगह मैं आकर फिर देख नहीं सकता।

मूल आलेख: गांधी का अहं

नेता तो नेता ही हो जाता है। भगतसिंह की हिसप्रस में उनका महत्व, आजाद हिन्द फौज में नेताजी का महत्व और कांग्रेस में गाँधी का महत्व हमेशा रहा है।
आप इस बात को कहकर एकांगी बात कर रहे हैं कि गाँधी ऐसे थे।
गाँधी की सबसे भयंकर गलतियों में नेहरु का पक्षपात और नेताजी के साथ भेद है, मैं इससे इनकार नहीं करता।
लेकिन नेताजी के बारे में आप बहुत जानते हों तो बताइए कि घटनाओं का असर नेताजी और गाँधी जी दोनों पर पड़ा। स्वाभाविक क्रान्तिकारी तो दोनों नहीं रहे इस हिसाब से जैसे आपने सोचा है। एक खुद पर अत्याचार से और एक लोगों के अत्याचार से। लेकिन यहाँ गाँधी ने कपड़े और खाने तथा सभी खर्चों में जमकर कटौती की देश के लिए उसका महत्व आपकी नजरों में नहीं है।
अभी याद आया 22 मार्च 1931 को भगतसिंह का लिखा भी देख लें। कुछ समझ में आ जाएगा।
सुभाष चन्द्र बोस और गाँधी या कोई हर क्रान्तिकारी किसी घटना से ही सोचना शुरु करता है जब वह महसूस करता है। वरना नेताजी ने अंग्रेजी सरकार में नौकरी की क्यों, भले इस्तीफ़ा दिया। लोग कहते हैं कि पिता को दिखाने के लिए। लेकिन आपका लिखा बताता है कि वे नौकरी कर रहे थे। और बाद में आहत होकर त्यागपत्र दिया। सवाल है नेताजी ने नौकरी क्यों की जबकि भगतसिंह ने ऐसा कुछ नहीं किया था।
नेताजी अच्छे और नेहरु से ज्यादा योग्य नेता थे, इसमें किसी को संदेह नहीं है। लेकिन 1939 तक यानि उम्र के 48वें साल तक वे कांग्रेस में क्या कर रहे थे जबकि उन्हें मालूम था कांग्रेस सेना और युद्ध नहीं मानती थी। यह साबित करता है सुभाष और गाँधी सभी किसी घटना के बाद अपनी खास नीति से लड़ते हैं। ध्यान से देखिए।
एक बात याद आई कि भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज देखिए। उसमें नेहरु के प्रति बहुत सम्मान दिखता है भगतसिंह में लेकिन नेताजी के प्रति क्या दिखता है, यह खुद पढ़कर देख लें।
इसलिए बार बार कह रहा हूँ कि आपकी जो इतिहास दृष्टि है उसमें पक्षपात और पूर्वाग्रह हमेशा दिखते हैं। इस बार की टिप्पणी में हर बात के सबूत हैं हमारे पास। अब साबित कीजिए नेताजी 48 साल तक क्या थे? 


आप के मन में यह सवाल उठना गलत नहीं है लेकिन यह किसी काम का नहीं है। जिन लोगों ने गांधी के नाम पर अपनी रोटी सेंकी है उनका संबंध गाँधी से कुछ नहीं है। बस नाम से कोई गाँधी नहीं हो जाता।
वैसे राष्ट्रपिता तो आपमें या मुझमें से किसी ने कहा नहीं था। यह काम नेताजी का है और उन्हीं से पूछते कि क्यों कहते हैं ऐसा?
लेकिन आप गांधी जी पर जो आरोप लगा रहे हैं उनमें उनका हाथ तो है ही नहीं। उनके मरने के बाद किसी ने उनके रास्ते पर चलने की कोशिश की ही नहीं। बस ढोल पीटते रहे। इसमें बेचारे गाँधी का क्या दोष? उन्होंने थोड़े ही कहा था इतिहासकारों से कि मेरा नाम लिखकर और शहीदों का नाम मिटा दो। ये तो कमीनापन है उन चोरों का जिन्होंने यह सब किया। मेरे लिए शहीद और गाँधी दोनों महत्वपूर्ण और सम्माननीय हैं।
पता नहीं किस गाँधीवादी की बात लोग कर रहे हैं? कौन सा गाँधीवादी देखा आपने या लोगों ने? गाँधी पर बहस करनी हो तो चैट पर आइये।
लेकिन आप लोगों में बेवजह यह सब बात उठा रहे हैं।
28 June, 2011 18:03
गांधी जी के कट्टर भक्त , भारत सरकार और कुछ हमारे अपने भारतवासी जो भारत की संस्कृति और इतिहास से अनभिज्ञ हैँ गांधी जो को राष्ट्रपिता कहते हैं । भारत एक सनातन राष्ट्र हैं तथा यहाँ की संस्कृति अरबों वर्ष पुरानी हैं , इससे पुराना राष्ट्र विश्व में कोई दूसरा नहीं हैं तो इसका पिता अट्ठारहवीं – उन्नीसवीं ईसाई सदी में कैसे पैदा हो सकता हैं ? वस्तुतः राष्ट्रपिता की अवधारणा पाश्चात्य मैकालेवाद की देन हैं , भारत की संस्कृति तो माता भूमि पुत्रोहम पृथ्वियां पर विश्वास करती हैं और अपने आप को इसका पुत्र मानती हैं तो फिर गांधी या कोई भी इस राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता हैँ । ज्यादा जानकारी के लिए http://www.satyasamvad.blogspot.com पर लिखा गया लेख ” क्या गांधी जी राष्ट्रपिता हैँ ! ” पढा जा सकता हैं ।
31 March, 2011 15:52”
इतनी घटिया टिप्पणी करने की हिम्मत कैसे की विश्वजीत ने!
यह टिप्पणी नेताजी को मैकालेवादी बताती है। यह बताती है कि टिप्पणीकार निष्पक्ष नहीं किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है।
इतना तो लगने लगा है कि आपको गाँधी जी से नफ़रत सी है और भाजपा या संघी सोच भी है। बुरा मत मानिएगा। मैं कांग्रेस और भाजपा दोनों को महाघटिया मानता हूँ। आप भी गाँधीविरोधी फैशन के शिकार से दिख रहे हैं। 
28 June, 2011 18:14
 vishwajeetsingh said…
श्री चंदन कुमार मिश्र जी गांधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि सर्वप्रथम कवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने दी थी , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने तो केवल उसकी पुनर्नावृत्ति की थी ।
मैं गांधी जी के ग्राम स्वराज का तो समर्थक हूँ , लेकिन गांधी जी द्वारा आधुनिक भारतीय राजनीति में पैदा की गई विभाजनकारी साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की नीतियों का विरोधी हूँ ।
कोई भी सच्चा देशभक्त गांधी तो क्या किसी को भी इस देश का राष्ट्रपिता नहीं मान सकता , क्योंकि भारत एक सनातन राष्ट्र है और सनातन राष्ट्र का कोई पिता नहीं हो सकता ।
मैं संघ , भाजपा अथवा कांग्रेस के मन्तव्य का शिकार नहीं हूँ , यह मेरा निश्पक्ष विचार हो गांधी जी के जीवन – चरित्र व दर्शन के गहन अध्ययन के बाद निकला है । 
29 June, 2011 12:29

गांधी को राष्‍ट्रप‍िता कहा जाये अथवा नही यह आज एक महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है… गांधी को राष्‍ट्रप‍िता उन लोगो ने धोषित किया जो गांधी की चाटुकारिता मे लगे थे और गांधी की कारण उनकी रोजी रोटी चल रही थी। नेहरू को मनमर्जी करनी हुई तो गांधी लाठी का सहारा लिया…कांग्रेस मे लोकतंत्र की रेड़ गांधी ने उस समय ही मार दी जब गांधी ने कहा कि पट्टभिसीता रमैया की हार को अपनी हार घोषित किया था और और गांधी की औकात को तत्‍कालीन काग्रेसी सदस्‍यो ने नेताजी को जीता कर बता दी थी। कहा जाता है कि एक म्‍यान मे दो तलवार नही रह सकती है जबकि एक तरवार बिना काम की सिर्फ बातूनी हो,इसलिये नेताजी ने कांग्रेस को गांधी को सौपकर नया रास्‍ता चुनना उचित समाझा। उस गांधी को राष्‍ट्रपिता की बात किया जाना हस्‍यास्‍पद होगा जिस गाधी का लड़का हरीलाल गांधी अपना पिता न मानते हो।
गांधी क्‍या है और क्‍या थे वह किसी से‍ छिपा नही है..गांधी रहस्‍य के नये नये प‍न्‍ने नित खुल है…जिससे गांधी का नेहरू प्रेम भी उजागर हो रहा है। 
30 June, 2011 08:20


vishwajeetsingh said…
महाशक्ति जी गांधी की ये वैचारिक सन्ताने भारत की सांस्कृतिक अवधारणा को जाने बिना या जानने के बाद भी गांधी को राष्ट्रपिता कहती ही रहेगी और भारत माता का अपमान करती रहेगी ।
वीर गोडसे को पानी पी – पी कर गाली देने वाले मित्रों ने क्या कभी सोचा है कि गोडसे जो की बचपन से ही जाति – पाति , छुत – अछूत आदि कुरूतियों का विरोधी एक सच्चा समाज सुधारक था , हिन्दू राष्ट्र समाचार पत्र का यशस्वी संपादक था , अत्याचारी निजाम हैदराबाद के विरूद्ध आर्य समाज के आन्दोलन में हैदराबाद सत्याग्रह की टोली का नेतृत्वकर्त्ता था , हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का समर्थक था , नेहरू की मैकालेवादी मानसिकता का विरोधी होने पर भी नेहरू की भारत के उद्योगीकरण करने की नीतियों का समर्थन कर्त्ता था और गांधी का सम्मान करने वालों में भी अग्रिम पंक्ति में था । तो क्या कारण रहे की गोडसे जैसे अहिंसक व्यक्ति को कलम छोडकर रिवाल्वर थामनी पडी और गांधी वध का अपयश अपने ऊपर लेना पडा ?
मित्रों हमे अपने विचार किसी संगठन , दल अथवा पार्टी की विचार धारा पर नहीं बल्कि सच्चाई को जानकर तथ्यों के आधार पर रखने चाहिए । आगे आपकी इच्छा ……


एक बात बताएंगे कि गाँधी से ज्यादा उम्र का नेता और कौन है जो इतना समय खर्चता रहा। अगर गाँधी जी कमजोर हो चुके थे,तो इसमें गलत भी ज्यादा नहीं है।
आप एक गलत बात और कर रहे हैं कि 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं तब और 4-5 करोड़ रह लेते, अब ये 17-18 करोड़ हैं। यानि कुल मिलाकर 35-40 करोड़ से अधिक हो जाते अगर बांग्लादेश को मिला दें।
गाँधी जी वाले सभी अलेखों को देखकर टिप्पणियाँ कर रहा हूँ।


आप को यह दिखाई देना चाहिए कि यह कोई इतिहास नहीं एक फिल्म का गीत है। पता नहीं इस बात को इतनी गम्भीरत से लेने की क्या जरूरत थी। मनोज कुमार की फिल्म देखिए, एक जगह वह शहीद में शानदार काम भी करते हैं तो दूसरी जगह उपकार में गाँधी और जवाहरलाल के नाम पर भी गीत गाते हैं।
इस गीत से किसी दूसरे शहीद का अपमान नहीं होता। मैंने खुद गाँधी जी पर गीत और कविताएँ भी लिखी हैं और भगतसिंह पर भी।
सोच का दायरा छोटा है, इसे बड़ा किया जा चाहिए।
एक बात और आपके ब्लाग पर जितने टिप्पणीकार हैं उनमें से किसी ने गाँधीवाद को जाना नहीं है। पहली बात तो यह कि गाँधीवाद कुछ है ही नहीं।
जिस बाबा रामदेव की बात आप यहाँ करते रहते हैं, उनके स्वदेशी के सिद्धान्त और अनशन का श्रेय भी गाँधी को ही जाता है। मैं हिंसा और अहिंसा दोनों को पसन्द करता हूँ लेकिन यह भगतसिंह के अहिंसा वाले तरीके से होगा। लेकिन गाँधी के सामाजिक और आर्थिक सिद्धान्तों को देखें तो मालूम होगा कि गाँधी के विचार कैसे हैं? गाँधी नहीं गाँधी का विचार महत्वपूर्ण है।
यह गीत सिर्फ़ श्रद्धा से गाया है न कि शहीदों से द्वेष रखकर। जैसे आप एक नहीं बहुत से लोगों को प्रणाम करते हैं भले उनके विचार आपसे कितने भी भिन्न हों। 

मैंने लिखा
महाशक्ति और विश्वजीत जी,
मुझे तो किसी ने बताया ही नहीं कि मेरे लिखे पर किसी ने जवाब भी दिया है। यह संयोग है कि मैं खुद यहाँ आ गया।
http://www.hindi.mkgandhi.org/g_hatya.htm पर प्रकाशित तथ्यों का खंडन करें।
http://www.hindi.mkgandhi.org/faqs/faq.htm पर प्रकाशित बातों का भी खंडन करें।
इतना तय है कि गोडसे एक पागल और सनकी था। उसका बयान मैंने पढ़ा है। गाँधी-वध क्यों देखा है। वह किताब बताती है कि गोडसे धार्मिक उन्मादी के सिवाय और कुछ नहीं है भले ही वह देशभक्त हो लेकिन उसकी सनकी को अच्छा नहीं कहा जा सकता।
विश्वजीत जी,
आप पहले उपरोक्त दोनों लिंकों का खंडन करें वह भी तर्कों और तथ्यों के साथ। तब बात आगे बढ़ेगी।
महाशक्ति जी,
यह बिलकुल अनावश्यक प्रश्न है कि कौन राष्ट्रपिता है और कौन नहीं। गाँधी ने कभी अपने नाम में खुद से महात्मा नहीं लगाया था। बस एक बार बैंक से संबन्धित काम में जहाँ अपरिहार्य स्थिति थी वहीं दस्तखत में महात्मा लिखा वरना वे मोहनदास करमचन्द गाँधी ही लिखते थे।
मैं जानना चाहता हूँ कि विश्वजीत जी ने गाँधी पर गहन अध्ययन और चिन्तन कैसे किया और क्या-क्या अध्ययन किया। गाँधी को पूरी तरह पढ़ने के लिए ही कम से कम 3500 से 4000 घंटे चाहिए क्योंकि गाँधी के सम्पूर्ण वांगमय में लगभग 55000 पृष्ठ हैं और फिर उनके उपर जब आप आरोप लगाते हैं और गोडसे को वीर कहते हैं तो गाँधी के उपर कम से कम बीस-तीस किताबें और पढ़नी पड़ेंगी यानि कुल मिलाकर कम से कम 60-70 हजार पृष्ठों आपने पढ़ लिया? ये तो अध्ययन हुआ और फिर चिन्तन का मतलब तो हवाई जहाज चलाना नहीं होता। उसके लिए इससे भी ज्यादा समय लगाना होगा। इसके अलावा भगतसिंह हैं, चंद्रशेखर आजाद हैं , नेताजी हैं और सब ले-देकर आपको कम से कम 10-15000 घंटे तो खर्च करने ही पड़ेंगे। यानि अगर आप रोज पाँच घंटे भी पढ़ते हैं तब 6-7 साल तो सिर्फ़ इन्हीं लोगों को पढ़ने में निकल जाएंगे।
आपके अनुसार गाँधी जी को राष्ट्रपिता टैगोर ने कहा फिर नेताजी ने दुहराया। साल मालूम होगा कस्तूरबा के मरने पर 1944 में नेताजी ने राष्ट्रपिता क्यों कहा? यह साल तो कांग्रेस से मतभेद और आजाद हिन्द फौज के गठन के बाद का है।
क्या आप बता सकते हैं कि नेताजी को अब क्या फायदा होनेवाला गाँधी जी से? या यह बताइए कि बापू नाम की किताब लिखनेवाले दिनकर तो वीर रस के कवि थे, फिर क्यों लिखी बापू?
सुभाष चन्द्र बोस ने खुद को आजाद भारत का राष्ट्रपति घोषित कर रखा था तो वे सत्ता के लालची हो गए? आप सब कुछ नहीं सिर्फ़ गाँधी विरोधी आन्दोलन चलाने की कोशिश कर रहे हैं? पिछली बार मैंने गाँधी जी पर और सुभाष चन्द्र बोस पर जो सवाल उठाए थे, उनका जवाब अभी तक किसी ने नहीं दिया।
वीर गोडसे पर सवाल खड़ा कर लिया आप सबने लेकिन मेरे सवाल जो गाँधी-सुभाष-भगत पर हैं उनके जवाब दीजिए तब आगे बात होगी। भगतसिंह के बारे में मैं कह चुका हूँ वे नेहरु के प्रशंसक हैं और सुभाष के उतने प्रशंसक नहीं हैं। सबूत चाहिए तो मिल जाएगा। सम्पूर्ण दस्तावेज हैं भगतसिंह के, उसमें से दिन भी बता दूंगा।
और भगतसिंह ने जो बम फेंका था वह भी कोई मौलिक सोच नहीं थी। आप खुद पढ़ और जान लें कि फ्रांस में यह घटना हो चुकी थी। उसी से प्रेरणा  लेकर भगतसिंह ने भी बम फेका था।
आप सब एक फालतू सवाल के पीछे पड़े हुए हैं और उसे महत्वपूर्ण बता रहे हैं। उतना शोर मचाइए कि भारत का अंतरराष्ट्रीय नाम भारत हो, अंग्रेजी जड़-मूल से खत्म हो लेकिन आप सब गाँधी-गाँधी कर रहे हैं। वे तो बेचारे मर गए और और आप सब परेशान हैं उनको लेकर। देश के अन्य सवालों को हल करने की बजाय अपना समय मत खराब करिए राष्ट्रपिता में।
मेरे सभी सवालों के जवाब के लिए गाँधी पर जितने आलेख हैं उन्हें देख लें और जवाब दें तब आगे नहीं तो सब बकवास है……

अभी आत्मा की आवाज पर तो नहीं कहूंगा लेकिन गाँधी पर जरूर कुछ कहना चाहूंगा। बेचारे गाँधी जी को न दलितों ने माना, न हिन्दुओं ने और न मुसलमानों ने। फिर भी गाँधी बने हुए हैं और बने रहेंगे।

Bhushan said…
Pallavi Saxena has sent this comment by email:
जैसा की श्री चन्दन कुमार जी ने कहा है। मैं भी कहना चाहूंगी कि आत्मा के विषय में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, हाँ गांधी जी और नथुराम गोडसे के बारे में जरूर इतना कहना है। कि वो भी इंसान बुरा नहीं था। यदि आपने India Today का वह अंक पढ़ा हो जो गोडसे पर ही आधारित था तो आप को जरूर पता चलेगा की वो भी बाकी के देश भक्तों के तरह ही एक देश प्रेमी था ,हाँ उसकी सोच कुछ अलग थी। मगर उसका देश प्रेम कम नहीं था। उस में लिखा था ,उसकी आस्तियां तब ही वेसर्जन की जाएँ जिस दिन सिंधु नदी तिरंगे के नीचे से बहने लगे ,जो आज तक न हो सका, और न ही आगे कभी होने कोई संभवना है ,मैं भी कई बार कई मामलों में गांधी जी को सही नहीं मानती,एक इस गोडसे के case में और दूसरा भगत सिंग के case में यदि उस वक़्त गांधी जी ने हस्ताक्षर नहीं किए होते तो भगत सिंग को फासी नहीं हुई होती। खैर यह मेरा मत है ….मगर सर आपने बहुत कम लिखा मेरी गुजारिश है आप से कि आप इस विषय पर और लिखें।

पल्लवी जी,
आपने इंडिया टुडे का जिक्र किया है वैसी बहुत सारी बातें हैं लेकिन शायद ही भरोसे के काबिल हैं। यहाँ तो गाँधी वध को सही ठहरानेवाले लोगों की भी कमी नहीं है। लेकिन मैं या आप सब जानते हैं कि गाँधी के मर जाने से देश को क्या मिल गया? जब मैं नाथूराम गोडसे का बयान पढ़ रहा था तब मुझे गुस्सा आता था कि नाथूराम एक पागल आदमी है, बार बार धर्म की दुहाई की दी है उसने। अन्तर बस यही हो जाता है कि एक को उन्होंने कहा कहते हैं और दूसरे को उसने कहा कहते हैं।
गाँधी वध पर कई किताबें हैं और सब बकवास किस्म की हैं। गाँधी ने भी अपने जीवन में जो सबसे बड़ी भूलें की हैं उनकी संख्या 4-5 ही है।
लेकिन भगतसिंह की बात हमेशा लोगों को गाँधी के खिलाफ़ भड़काने वालों ने कही है। यह बात तो भगतसिंह के भाई कुलतार सिंह भी कह गए हैं लेकिन किसी को 4अक्टूबर 1930 का पिता को भगतसिंह का लिखा पत्र और 22 मार्च 1931 को साथियों को लिखा पत्र नहीं दिखता। सम्भव हुआ तो इन दोनों को अपने ब्लाग पर कभी लाऊंगा।
और हाँ, इंडिया टुडे या किसी पर भरोसा नहीं करके शोध पर भरोसा किया जाना चाहिए। इस विषय पर जान बूझ कर कुछ लोगों द्वारा घृणा फैलाई जाती है। यह सम्भव है कि गोडसे अच्छा आदमी रहा हो लेकिन सनकी तो था ही।
कुछ युवाओं को गाँधी से नफ़रत सिर्फ़ इस वजह से है कि वे जवान नहीं हैं, अगर वे जवान होते और अंग्रेजी सूट पहनते तो उनकी इतनी आलोचना नहीं की जाती। लेकिन जहाँ गाँधी सोचते हैं, वहाँ कोई पहुँच पाए तब तो।
एक और चीज देखिए कि बेचारे गाँधी ही तो हैं जिनके उपर सारे आरोप लगाए जाते हैं, उनके स्मारकों के उपर कचरा साल भर पड़ा रहता है और सभी देखते रहते हैं- गांधी के पक्षधर भी! इस हिसाब से अच्छा ही है कि भगतसिंह के उतने स्मारक नहीं हैं वरन उनके उपर भी 363 दिनों तक गंदगी, मुरझाए सूखे फूल, पक्षियों की गंदगी ही होते!
गाँधी और भगतसिंह को समग्रता में जोड़कर देखने की जरूरत है।

भगतसिंह के नास्तिक होने की बात को ही झुठलाने की कोशिश

5 टिप्पणियाँ

भगतसिंह और नास्तिकता का मुद्दा अभी भी जोरों पर है। कल वाली पोस्ट के बाद भी टिप्पणियों का शोर थमा नहीं है। मैं खुद चकित हूँ कि इस तरह टिप्पणियाँ होती रहीं, तो कुछ ही दिनों में किताब का रुप अख्तियार कर लेंगी। फिर मैं आपके सामने आगे की टिप्पणियाँ दे रहा हूँ। कुछ चीजें जो व्यक्तिगत हैं, उन्हें देने की कोई जरूरत तो नहीं है लेकिन उन्हें हटाने से कुछ बातें स्पष्ट नहीं हो पाएंगी और वैसे भी चिट्ठा यानि ब्लॉग है तो कुछ कुछ डायरी जैसा भी। 
पहले की टिप्पणियों के लिए पिछली पोस्ट देखें। इस बार दो नए लोग बहस में शामिल हुए हैं। पहले आते हैं अमर कुमार जो कुछ देर के लिए अपनी बात या कहिए आपत्ति रखते हैं और बाद में स्मार्ट साहब अपनी बात कह जाते हैं। थोड़े गुस्से में हैं। तभी आगमन होता है इस नाटक के एक नए पात्र ग्लोबल अग्रवाल का जो भगतसिंह के नास्तिक होने पर ही सवाल खड़ा करता आलेख थमा जाते हैं। मैंने उनकी हर बात का जवाब अपनी समझ से देने की कोशिश की है। यह बहस अभी चलती रहेगी या समाप्त भी होगी, यह नहीं कहा जा सकता। 
इस पोस्ट में अमर कुमार जी और दिनेशराय द्विवेदी जी की कुछ बातें इस पोस्ट के लिए आवश्यक नहीं हैं लेकिन इतनी टिप्पणियों में हर बार काट-छाँट आसान नहीं हो पाया है। पहले की तरह यह पोस्ट फिर लम्बी ही होगी। पढ़ने में समय भी ज्यादा लगेगा। तो  शुरु करते हैं अमर कुमार जी की टिप्पणी से। 
डा० अमर कुमार,  27 June 2011 4:37 AM

आदरणीय पँडित जी..
लीजिये 108वीं हमारी भी… पर मुझे आश्चर्य तब होता है, जब बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग एक सामान्य तर्क को अपने विपरीत पाकर व्यक्तिगत आक्षेप समझ बैठते हैं और फिर मूल प्रश्न को दरकिनार कर तर्क की गोल-गोल गलियों में घूमते आरोप-प्रत्यारोप का चक्र चलाने लगते हैं ।
( यहाँ यह बात दीगर है कि इस प्रकार टिप्पणियों की सँख्या बढ़ने पर बधाईयों का आदान-प्रदान भी होता है !? )
बिना वकालतनामा के मैं यह कहना चाहूँगा कि अनुराग शर्मा ने मूल प्रति की जानकारी ही मांगी थी और बाद में गोलमोल जवाब मिलने पर इतना ज़रूर कहा कि बिना देखे किसी बात का प्रचार भी एक किस्म की आस्तिकता ही हुई तो चन्दन कहते हैं: 
“यह एक छोटा सा पत्र है कोई चंद्रमा को दो टुकड़े करने की बात तो नहीं थी कि इसपर इतना शक हो गया। हम भला चमत्कार की बात करते तो कुछ सही भी था लेकिन यह क्या ?”
यह क्या है… क्या इसे टिप्पणीकार की आवेशित प्रतिक्रिया का सहज लड़कपन ही मान लिया जाये ? यहाँ तक भी बात बन सकती थी, पर आपका यह कथन कि “भगतसिंह के जिस लेख को सारी दुनिया प्रामाणिक मानती है । आप उसे गलत सिद्ध करना चाहते हैं तो इस खोज में जुट जाइए । आप घर बैठे उसे गलत मानते हैं तो मानते रहिए ।”.. कम से कम मुझे बुरी तरह आहत कर रहा है ( व्यथित मन लेकर सोने गया पर आखिर किसी वजह से ही.. सुबह चार बजे बिस्तर से उठ यहाँ अरदास लगा रहा हूँ )
मैं मानता हूँ कि एक नामधारी और एक बेनामी, यह दोनों लड़के अपने ज्ञान के जोश से अभद्रता की हद तक उबलने लगते हैं.. यह उनका व्यक्तित्वदोष हो सकता है… पर आपका यह कथन कि, “हमारी भी इस मामले में आप से बहस करने में कोई रुचि नहीं है । हम यह बहस करने गए भी नहीं थे । आप ही यहाँ पहुँचे हुए थे ।” प्रश्नकर्ता के क्षोभ को किस कदर बढ़ा सकता है.. यह आप स्वयँ ही विचार करें । एक तर्कजीवी से साक्ष्य को लेकर उठाये गये बिन्दु पर ऎसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं की जा सकती ।
पिछले चार वर्षों के मेरी जानकारी के आधार पर आपका व्यक्तिगत द्वेष किसी से भी नहीं रहा है, और फिर व्यक्तिगत द्वेष तो व्यक्तिगत ही होता है अतः किसी सार्वजनिक मँच पर सामाजिक महत्व के प्रश्न यथा आस्तिकता, नास्तिकता, प्रोपेगेंडा, राजनैतिक मिशन आदि पर विचार विनिमय एवँ जानकारियों के स्रोत के आदान प्रदान की सँभावनाओं को व्यक्तिगत परिप्रेक्ष्य से परे होना चाहिये । लगता है, टिप्पणी अनधिकृत रूप से लम्बी हो चली है.. इससे पहले कि आप मुझे दौड़ायें, मैं स्वयँ ही निकलता लेता हूँ 🙂
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 5:25 AM

माननीय श्री अमर कुमार जी,

आपने अपने विचार रखे। अति उत्तम।(इसे भी व्यक्तिगत आक्षेप मत मान लीजिएगा)

सवाल के अनुसार मैंने कोई गोलमोल जवाब नहीं दिया था। यह आपको लगता है, कोई बात नहीं। बेनामी लड़के, जी हाँ। उम्र बताऊँ 22 साल से कम। टिप्पणियों की संख्या यहाँ किसी महाभारत रचाने के लिए नहीं लिखी थी। मैंने यूँ ही कहा कि 100 हो गईं। लेकिन फिर भी आपको इससे दुख पहुँचा तो मैं माफ़ी चाहता हूँ(वैसे यह बोलने से क्या होता है?।

मैं हमेशा वही बोलता हूँ जो मुझे लगता है लेकिन मुझमें व्यक्तिगत दोष हैं तो शायद समय के साथ-साथ दूर हो जाय।

आप कहते हैं- ‘क्या इसे टिप्पणीकार की आवेशित प्रतिक्रिया का सहज लड़कपन ही मान लिया जाये ?’ बोलिए इसे क्या मानूँ? आप जो कहें मैं मान लूंगा।

http://shrut-sugya.blogspot.com/2011/06/blog-post.html
देख लेते तो बेहतर होता। आक्षेपों का क्रम वहीं से जारी है। मैं अपनी समझ से जवाब देता गया। 

एक बार फिर से देख लें महाशय, द्विवेदी जी ने टिप्पणी संख्या 101 में क्या कहा है, उन्होंने टिप्पणियों पर कोई टिप्पणी नहीं की है। यह आपका खुद से निकाला हुआ अर्थ है। इसलिए आपके इस आरोप को मैं सिरे से खारिज करता हूँ क्योंकि 100वीं टिप्पणी लिखनेवाला व्यक्ति मैं ही हूँ।

आपसे जब अगर आपके घर का छोटा सदस्य पैसे मांगे जैसे दस साल का बच्चा 100 रु मांगे, तो आप उसका उद्देश्य पूछते हैं। मैंने भी उद्देश्य पूछा है और मैं शायद जानता भी हूँ, इसलिए आप उपरोक्त लिंक देखते तो समझ पाते कि माजरा क्या है।

और अन्त में एक परम सत्य।


अगर आपमें किसी के प्रति व्यक्तिगत द्वेष अल्पमात्रा में भी नहीं है तो आप बुद्ध हैं और हम बुद्धू। साधारण आदमी में ये गुण अगर नहीं हैं(भले ही ये दुर्गुण हैं)तो वह मिलावटी आदमी है, ऐसा मेरा अभी तक का(शायद आपके अनुसार बहुत कम)अनुभव और समझ दोनों है।

जवाब में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण वाक्य था-

एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि वह आलेख उन्होंने नहीं लिखा तब भी क्या फर्क पड़ जाता है? उसमें ऐसा क्या लिखा है? उसके सवालों के जवाब हैं?’

और चमनलाल जी के मेल को देने का उद्देश्य था कि यह जान लिया जाय कि चमनलाल झोला छाप लेखक नहीं हैं बल्कि योग्य और भगतसिंह के अधिकृत लेखकों में हैं।

चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 6:45 AM

आदरणीय डॉ अमर कुमार जी,
भगतसिंह के पत्र के बारे में एक बात और कहना चाहता हूँ कि दिल्ली कहीं मंगल ग्रह पर भी नहीं है। वहाँ जाकर चमनलाल जी ने जो पता दिया है वहाँ पर देखा जा सकता है। और इसमें कुछ गलत हो तो चमनलाल सहित आधार प्रकाशन या सभी वेबसाइटों पर मुकद्दमा चलाया जा सकता है कि हर जगह झूठ प्रचारित किया जा रहा है। सब के परिचित दिल्ली में होंगे ही। इतनी जिज्ञासा हो तो उन्हीं से दिखवा लें। इसमें आपको क्या गलती नजर आती है? हम किसी अदृश्य शक्ति की तो बात नहीं कर रहे थे। पूरा पता और विवरण भी मैंने पता लगाकर दिया था।

दूसरी बात, हो सकता है इससे द्विवेदी जी मुझसे भी नाराज हों जाय लेकिन मैं फिर भी कहूंगा।

मैंने किसी ऐसे ब्लागर को नहीं देखा जो दूसरों को व्यक्तिगत आक्षेप से बचने की सलाह देता हो और खुद कई जगहों पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करता रहा हो। इसी पोस्ट से, आप खुद देखें- रोहित को आपने क्या कहा? गिनिए पहला टुच्चेपन करनेवाला, दूसरा शिखंडी जैसा व्यवहार, तीसरा उनकी टिप्पणियों को पकाऊ, चौथा अधजल गगरी, पाँचवा हिज मिस्ट्रेस वाइस, छठा अंग्रेजी में साफ शब्दों में वेस्ट,सातवाँ बघारने वाला और आठवाँ टट्टी की आड़ में जवाब देने वाला। 

बस यही बात खटकती है सबको जब मैं उनकी कमियाँ गिनाता हूँ। इंटरनेट से यह सुविधा भी है कि आपको या मुझको जल्दी ही खोज सकता है कि कैसी जगह क्या लिख कर आते हैं?

अब आप ही बताइए कि आप आठ गलत संबोधन या शब्द इस्तेमाल करते हैं और व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करने की भी बात करते हैं। मैं मानता हूँ कि बहुत जगह आपकी टिप्पणी सही भी हो सकती है लेकिन यह मैं जानता हूँ कि हर आदमी कहीं न कहीं आक्षेप लगा डालता है, कम से कम ब्लाग जगत में।

इसलिए इस व्यक्तिगत आक्षेप के प्रवचन को सभी साइटों से विदा हो जाना चाहिए। मैं पिछले 5-6 दिनों से ब्लाग जगत में सक्रिय हूँ और सिर्फ़ तीन पोस्टों पर 400 टिप्पणियों में लगभग 170-80 में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से शामिल हूँ। और यह बात मुझे लगने लगी है कि गुटबाजी हो रही है। और होना बुरी बात भी नहीं क्योंकि एक समान विचार के लोगों का ही समूह गुट है।

फिर मैं कहूंगा कि इस व्यक्तिगत आक्षेप के प्रवचन को बन्द किया जाय। मैं हर जगह यह प्रवचन सुन चुका और सारे प्रवचनकर्ता खुद यही करते हैं और दूसरों से उम्मीद करते है कि धैर्यवान बने रहो। यह बनावटीपन अच्छा नहीं। 

मैं कह सकता हूँ ब्लाग जगत में बहुत और बहुत कम लोगों में इतना धैर्य है कि वे सब तटस्थ भाव से सुन लें या कहें। गाँधी या बुद्ध बनने की कोशिश नहीं करें।

( इसी बीच एक और टिप्पणीकार अपना सवाल रख जाते हैं। )
संजय @ मो सम कौन ?,  27 June 2011 8:09 AM

एक छोटा सा सवाल है अगर किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचे तो – 
“बिना नास्तिक हुये भी कोई भगत सिंह(और उन जैसों पर) श्रद्धा रख सकता है या इसके लिये भी किसी नास्तिक आचार्य से ..?”
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi,  27 June 2011 8:18 AM

@डा० अमर कुमार
आदरणीय,
तर्क तक तो ठीक था। लेकिन प्रमाणों की तीन खेप के बाद भी यह कहा जाए कि ‘आप ने जिस चिट्ठी को देखा नहीं है उसे प्रचारित करना आस्तिकता ही है,’ फिर यह कह देना कि उन की लंबी बहस में कोई रुचि नहीं है, का क्या अर्थ है? यह उन की निकल लेने की घोषणा है। उन्हें शायद आशा नहीं थी कि चंदन या मैं प्रमाण प्रस्तुत कर सकेंगे। उन का सोचना रहा होगा कि अब हम यहाँ से निकल लेंगे। उन के पास भी प्रमाण पा कर इस तरह निकल लेने के सिवा कोई चारा नहीं रहा था। 
ऐसे में मेरा उन्हें यह कहना कि बहस के लिए तो वे स्वयं ही पहुंचे हुए थे, अनुचित व्यहार नहीं है। हाँ, उसे कुछ रूखा अवश्य कहा जा सकता है। पर क्या करूँ बड़े भाई! बिना किसी चिकित्सक के बोले ही पिछले आठ-दस वर्षों से बिना चिकनाई की रोटियाँ खा रहा हूँ, शायद उसी का असर हो। स्मार्ट जी ने बोल्ड अक्षरों वाली अतिरिक्त टिप्पणी वहाँ चिपकाई न होती तो शायद मुझ से यह धृष्टता भी न होती। 
चंदन मिश्र की ऊर्जा दाद देने लायक है। मुझे तो उन्हों ने स्मार्ट जी के निकल लेने के बाद भी अपनी बात को पूरा किया और प्रमाण प्रस्तुत किए। यदि इस ऊर्जा के साथ कोई आस्तिकता को प्रमाणित कर रहा होता तो भी मैं दाद दिए बिना नहीं रहता। 

हाँ स्मार्ट जी भी इस के लिए दाद के काबिल तो हैं ही कि वे ही अंत तक टिके रहे।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi,  27 June 2011 8:47 AM

@संजय @ मो सम कौन ? 
संजय भाई, 
क्यों नहीं। किसी व्यक्ति का आदर उस के कार्यों से होता है, न कि उस की विचारधारा के कारण। नास्तिक और आस्तिक दोनों ही प्रकार के लोगों में निंदनीय और आदरणीय लोगों की संख्या कम नहीं है। 
इस पोस्ट में प्रश्न सिर्फ इतना था कि ईश्वर को न मानने पर दोजख़ (नर्क) में जाना पड़ेगा तो शायद भगतसिंह भी वहीं होंगे। 
यदि वास्तव में कोई नर्क स्वर्ग हुए तो क्या उस का पैमाना ईश्वर को मानने और न मानने का विचार रखना होगा या उस के वे कर्म जो वह अपने जीवन में करता है। 
वैसे आज जीवित लोगों में नर्क और स्वर्ग को मानने वालों और उसकी परवाह करने वालों की संख्या कितनी है यह सब जानते हैं।
(इसके बाद एक अन्य टिप्पणीकार आते हैं और अपनी बात कह जाते हैं लेकिन इस पोस्ट से उसका कोई खास संबंध नहीं है। इसलिए उसे यहाँ नहीं दिया जा रहा है। तभी आते हैं मेरे जवाबों के केंद्रीय पात्र स्मार्ट इंडियन।)
Smart Indian – स्मार्ट इंडियन,  27 June 2011 8:55 AM

अपने वादे के अनुसार यहाँ हाज़िर हूँ। अब तक जो दिखा और समझ आया और जो बहस के जाल में उलझने से पहले फिर से स्पष्ट करना ज़रूरी है:


1. मैने उस पत्र को कहीं भी झूठा नहीं कहा। मैंने तो यह भी नहीं कहा कि भारत माता ने भगत सिंह जैसी बहुत सी आस्तिक संताने भी जन्मी हैं । मैंने तो यह भी नहीं याद दिलाया कि भगत सिंह नास्तिक होने के अलावा भी बहुत कुछ थे। मैने तो सिर्फ उस पत्र की मूल प्रति की जानकारी मांगी थी। फिर भी आपने ऐसे आरोप लगाये जैसे कि मूल प्रति की जानकारी मांगना पत्र को झूठा कहना हो। एक वकील यदि इन दो बातों का अंतर स्पष्ट न देख सके (या ऐसा जताये) तो उसका मतलब क्या होता है आप अच्छी प्रकार समझते होंगे। 

2. अशफाक़ उल्लाह खाँ, सरदार भगत सिंह, पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्र शेखर आज़ाद, नेताजी बोस, तात्या टोपे, मंगल पाण्डे जैसे शहीद हम भारतीयों के दिल में सदा ही रहेंगे, उनके व्यक्तिगत या धार्मिक विश्वासों से उनकी महानता में कोई कमी नहीं आने वाली है। वे अपने धार्मिक विश्वास के कारण श्रद्धेय नहीं है बल्कि अपने कर्मों के कारण हैं । उनके व्यक्तित्व को छांटकर उन्हें एक देशभक्त हुतात्मा मानने के बजाय बार बार उन्हें सिर्फ़ एक नास्तिक बताकर या उनके श्वेत-श्याम चित्र में उनके साफ़े को लाल रंगकर उनके क़द को कम करने की आदत बुरी बात है। वे अविवाहित भी थे, सिर्फ़ इतने भर से दुनिया भर के अविवाहित श्रद्धेय नहीं हो जायेंगे। 

3. भगत सिंह जीवन भर आस्तिक रहे हों या बाद अपने अंतिम दिनों में नास्तिक हो भी गये हों इससे यह बात झुठलाई नहीं जा सकती कि उन्होंने जीवनभर अनेकों आस्तिक क्रांतिकारियों के साथ मिलकर काम किया है, उनसे निर्देश लिये हैं और उनके साथ प्रार्थनायें गायी हैं। उनका आस्तिकों से कोई झगडा नहीं रहा। आस्था उनके लिये एक व्यक्तिगत विषय थी जैसे कि किसी भी समझदार व्यक्ति के लिये है। उसकी नास्तिकता का अर्थ न तो आस्तिकों का मुखर विरोध था न उनकी आस्था की खिल्ली उडाना और न ही उन्हें अपना विरोधी साबित करना। पुनः, उनके व्यक्तिगत विश्वास उनके नितांत अपने थे। 

5. मूल पत्र या उसकी प्रति आप लोगों ने नहीं देखी है, आपके प्रचार का काम केवल इस आस्था/श्रद्धा पर टिका है कि ऐसा पत्र कभी कहीं था ज़रूर। मेरे प्रश्न के बाद अब आप लोगों के देखने का काम शुरू हुआ है तो शायद एक दिन हम लोग मूल पत्र तक पहुँच ही जायें। जब भी वह शुभ दिन आये कृपया मुझे भी ईमेल करने की कृपा करें। मुझे आशा है कि आयन्दा से यह तथाकथित नास्तिक अन्ध-आस्था के बन्धन से मुक्त होने का प्रयास करके साक्ष्य देखकर ही प्रचार कार्य में लगेंगे। अगर ऐसा हो तो हिन्दी ब्लॉगिंग की विश्वसनीयता ही बढेगी। 

6. @ हमारी भी इस मामले में आप से बहस करने में कोई रुचि नहीं है। हम यह बहस करने गए भी नहीं थे। आप ही यहाँ पहुँचे हुए थे।
आप बडे हैं, विद्वान हैं, शायद राजनीतिज्ञ भी हैं। आपकी आज्ञा सिर माथे। अगर आपको दुख हुआ तो अब नहीं आयेंगे। जो कहना होगा अपने ब्लॉग पर कह लेंगे।

शुभकामनायें!


(यहाँ स्मार्ट जी चौथे बिंदु को भूल गए से लगते हैं या भूलवश तीन के बाद पाँच हो गया है।)
@स्मार्ट इंडियन
आप का यहाँ सदैव स्वागत है। 
यदि विरोधी विचार न टकराएँ तो संवाद का कोई अर्थ नहीं। पर यह कह कर निकल लेना कहाँ तक उचित है कि मुझे लंबी बहस में रुचि नहीं? 

इतनी देर तक टिके रहने के बाद कोई अरुचि प्रकट करे तो उसे क्या कहा जाए?
पर मेरा प्रश्न तो अनुत्तरित ही रह गया। उस का उत्तर तो दे दें।
यदि यह मान लिया जाए कि नर्क और स्वर्ग हैं, तो क्या नास्तिक होने से भगतसिंह नर्क में होंगे?

चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 9:56 AM

आदरणीय स्मार्ट जी,

‘कुछ लोग तो इतने से जोर ईश्वर का खूँटा गाड़ देते हैं कि बेचारा ईश्वर होता तो एक ही बार में चिपटा हो जाता। ‘

खैर हम तो अपने को गलत ही समझ रहे हैं(कम से कम आप लोगों की बयानबाजी के बाद से) लेकिन आप सही होते हुए बार-बार वही कर रहे हैं जैसे ‘हम इस खुशी में पिएंगे शराब छूट गई’।

आपने स्टालिन। माओ का उदाहरण मेरे लिए दिया था वह भी नास्तिकता के सवाल पर। क्या आप खुद बार-बार इस डाल से उस डाल पर नहीं जा रहे।

nationalarchives.nic.in/writereaddata/html_en_files/pdf/Microfilms_Web.pdf

http://www.nehrumemorial.com/catalog.php

http://59.180.241.203/NMML/NMMLSearch/ClassificationSearch.aspx

आप यहाँ भी जा सकते हैं। कम से कम भारतीय अभिलेखागार वाली किताब से पृष्ठ 16 पर ऐसी बात जरूर पढ़ेंगे जिससे कुछ मिल पाएगा। कुछ ज्यादा नहीं।

आप बार-बार मेरे सवालों का जवाब नहीं देते और अपनी बात कह देना चाहते हैं।

मैंने अमर कुमार जी से कहा कि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण वाक्य क्या था? 

हम सब ही कौन सा बरछी-भाला या लाठी-डंडा या मिसाइलें लेकर पहुँच गए थे मार-पीट करने के लिए।

‘जहां सभी लोग एक तरह से सोचते हों, वहां समझना चाहिए कि दरअसल कोई भी सोचने का कष्ट नहीं करता । – वाल्टर लिपमैन’

सीमोन द बोउवार, कार्ल मार्क्स. जॉन स्टुअर्ट मिल, नागार्जुन, फ्रेडरिख नीत्शे, बर्ट्रेंड रसेल, ज्याँ पाल सार्त्र, जावेद अख्तर, चार्ली चैपलीन, जेम्स रैंडी, सावरकर, बाबा आम्टे, तसलीमा नसरीन, एच जी वेल्स, माओत्से तुंग, सुभाषिणी अली, करुणानिधि, जवाहर लाल नेहरु, पेरियार, प्रकाश करात, लेनिन, स्टालिन, ट्राटस्की, गोर्बाचोव, लक्ष्मी सहगल आदि लोग आस्तिक नहीं हैं। भले इनमें से कुछ विवादास्पद हैं। लेकिन आस्तिकों की संख्या कम नहीं ज्यादा ही है।

लेकिन बार-बार नास्तिकों को नीचा दिखाने में कुछ बोल जाते हैं। इसलिए नास्तिक और आस्तिक की बात को ध्यान देकर लिखा गया है। 

आप हों या मैं हम रोज नई नई पोस्ट बना सकते हैं और लिख सकते हैं। मुल्ला नसरुद्दीन वाली कहानी जिसमें कपड़े के बारे में अपने मित्र के साथ घूमने निकलता है, जैसी हालत में क्यों आ जाते हैं आप बार-बार। कहते हैं कि नास्तिक से मतलब नहीं लेकिन उद्देश्य बार-बार वही नजर आ जाता है। लेकिन अगर आप सच में इस ब्लाग पर नहीं आना चाहते तो यह आपकी इच्छा है। वैसे तीखी बहस के बाद मित्रता और अच्छी हो सकती है।

आपने फिर बिन्दुवार जवाब दिया है। लेकिन मैंने भी जवाब दिया तो आप देख चुके हैं मेरे पास आपके जवाबों की किताब ही एक-दो दिन में बन जाएगी। 

संजय जी,

आपको नास्तिक आचार्यों से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है क्योंकि भगतसिंह हमारे ब्रांड नेता नहीं और हमने पार्टी नहीं बनाई है कि अपना अधिकार उनपर इस तरह दिखाएँ कि आपको श्रद्धा भी पूछकर करनी पड़े। और किसी के कहने से श्रद्धा उत्पन्न की जा सकती है, यह सौ प्रतिशत सफ़ेद झूठ है। 

आप अगर मेरे नास्तिक शब्द का अर्थ जानना चाहें तो पूरी बहस में मेरे शुरु के टिप्पणियों को पढ़ें।

कोई यहाँ लड़ने नहीं आए हैं।

वैसे भी इस तरह का सर्वाधिकार मठाधीशों आदि के पास होता है हमारे पास तो अपना मठ भी नहीं है।

(यहाँ से कुछ अंश मैं हटा रहा हूँ क्योंकि यहाँ इनकी कोई जरूरत नहीं है।)

…लेकिन मैं इतनी बात तो फिर कहूंगा कि मेरे किसी सवाल का कोई जवाब दिया नहीं गया है। बस घसीटने की कोशिश हो रही है।

… आज भी उस पत्र के लिए नेहरु मेमोरीयल को मेल भेज रहा हूँ।


लेकिन अब भगतसिंह की एक एक चिट्ठी की खोजबीन शुरु करें तो सिर्फ़ अविश्वास ही दिखता है जो आस्तिकों में इस कदर तो नहीं होना चाहिए।

आप किसी को कहें सिगरेट पीना अच्छी बात नहीं और बार-बार कहें। और यह भी कहें मैं उस आदमी के सिगरेट पीने से कोई मतलब नहीं रखता, यह कैसे सम्भव है। अभी आपके हर वाक्य पर जवाब देने की इच्छा है भी और नहीं भी। लेकिन जाने दें।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 10:08 AM

पहली बात मेरे ही लिखे से है।
भगतसिंह के आस्तिक होने के आधार पर या नास्तिक होने के आधार पर हमने कोई निष्कर्ष नहीं निकाले हैं। 

लेकिन आपके इस वाक्य ने फिर ठेस पहुँचाया कि हम भगतसिंह के व्यक्तित्व को छाँटकर लाल साफा पहना रहे हैं। यह बात इतनी गंदी है कि आप खुद समझिए कि आप कैसा सोचते हैं। अब मुझे इसका कोई दुख भी नहीं है कि कुछ कड़े शब्द निकलें। इसका मतलब क्या है जनाब! आप कुछ भी लिखें तो भजन हो जाता है क्या? सारा संसार अपने उपर लादने की कोशिश मत करिए। अब मैं पूरे मूड में हूँ। अजीब सोचते हैं और बहाना बना रहे हैं या बना लेंगे कि ऐसे देखते हैं, वैसे देखते हैं।

सारे अविवाहितों के बारे में आप चाहे जो सोचें लेकिन सूरदास के बाद सभी अन्धे लोगों को सम्मान से सूरदास ही कहा जाता है। 

अब आपको जवाब तो देने का मन अच्छा से कर रहा है लेकिन द्विवेदी जी का ब्लाग है, वे आज्ञा दें तब। मैं एक भी वाक्य छोड़नेवाला नहीं। ये पहली कक्षा नहीं है कि आप जो चाहें कहते रहें, बच्चा परम सत्य समझकर सीखता रहे।

इतना ध्यान रखिए। आपके हर बिन्दु को सागर बना देन कहीं से बुरा नहीं है। क्योंकि आप बार बार घूम कर आते हैं नास्तिक को बुरा साबित कर देन पर लेकिन कोई फायदा नहीं क्योंकि आपले सारे सवालों के जवाब हम देते गए हैं और आपने मेरे एक भी सवाल का जवाब दिया नहीं है अभी तक ठीक से।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 10:22 AM

मुझे अपनी टिप्पणी को बोल्ड करने नहीं आता और करने से मिलेगा क्या? वही लोग किताबों में रेखांकित करतते हैं जिन्हें कुछ काम का और कुछ बेकार लगे। बोल्ड करना कुछ वैसा ही है। हमें हमारी बात इस तरह की नहीं लगती रेखांकित किया जाए। अब हम का अर्थ भी नया नया नहीं निकालिएगा क्योंकि मैं बिहार का हूँ और मैं की जगह हम ज्यादा चलता है। भोजपुरी भाषी भी हूँ जिसमें एकवचन भी हम ही होता है।

इन्तजार है बस आज्ञा का। लेकिन फायदा भी तो नहीं है क्योंकि आपके जैसे दस आदमी फिर कल मिलेंगे । वही कहेंगे। आस्तिक और नास्तिक की समझ आपको अभी तक नहीं हुई जैसा कि तीन दिन पहले आपको कह चुका हूँ। 

हर बार आपकी जयकार करें, हम कोई ठेके के आदमी नहीं हैं। पत्र का बहाना लेकर आपने नास्तिकों पर अपने बयान देने शुरु कर दिए हैं। 
आपके पाँचवीं बिन्दु को क्या कहें? आप चाहे सैकड़ों टिप्पणी करें, कहीं अलग कुछ दिखता नहीं। बार-बार आपको कुछ भी कहा जाय लेकिन आप वस्तुनिष्ठ नहीं व्यक्तिनिष्ठ तरीके से ही देखते आ रहे हैं। बिन्दु संख्या पाँच पर तो एक एक शब्द का जवाब देने का मन है। 

आपके सवाल उठाने पर हम तो पत्र के पीछे पड़ गए लेकिन आप हमारे सवाल उठाने पर किसी भी चीज के पीछे नहीं पड़िएगा, यह तय ही लग रहा है। तीसरे बिन्दु के जवाब के पहले लाला लाजपत राय के लिए भगतसिंह ने लड़ाई लड़ी। इसका अध्ययन जरूर कर लें कि लालाजी और भगतसिंह क्या और कैसे विचार रखते थे। अब इतना आलसी मत बनिएगा कि बार बार हमीं आपको सब कुछ खोजकर भेजते रहें। अन्तिम बात ध्यान रखिए।
(तभी आते हैं हमारे आज के केंद्रीय पात्र ग्लोबल अग्रवाल यानि गौरव अग्रवाल। अब देखिए वे क्या कहते हैं?)
Global Agrawal,  27 June 2011 11:58 AM

सच बोलूं इस चर्चा को पढ़ नहीं पाया हूँ फिर भी ये लेख आपको पेश करना चाहूँगा

http://my2010ideas.blogspot.com/2010/12/blog-post_15.html 

अगर इससे किसी प्रकार विषयांतर होता है तो क्षमा चाहता हूँ …
Global Agrawal,  27 June 2011 12:31 PM

हम कल भी आदरणीय अमर कुमार जी की टिप्पणियों के कायल थे…. हैं …..आगे भी रहेंगे , उनकी टिप्पणियाँ पढ़ कर जा रहा हूँ , बाकी चर्चा समय मिलने पर पढूंगा 🙂
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 1:42 PM

ग्लोबल अग्रवाल यानि गौरव अग्रवाल,

आप यहाँ आए। आते ही अपना अच्छा-सा संदेश हमें सुनाया। इसके लिए धन्यवाद दूँ?

इसे कहते हैं आदमी के पेट से पीपल का पेड़ पैदा होना। क्यो?

प्रोफ़ेसर चमनलाल की बात http://hindi.webdunia.com/news/news/national/0803/23/1080323063_1.htm पर एक जगह तो पूरी तरह स्वीकार है क्योंकि यह आपके या आपके मित्रों के विचारों के अनुकूल है लेकिन उसी चमनलाल जी की अन्य कोई बातें आपको नहीं माननी।

अप यह न समझिएगा कि मैं इतनी आसानी से भाग जाऊंगा। वैसे भागूंगा ही नहीं आसानी और मुश्किल का सवाल बाद में।

पहले तो तो यह बताइए कि आप कहते हैं आपने पूरी चर्चा पढ़ी भी नहीं और लिंक दे गए। माफ़ी के साथ दी या नहीं, इसे मैं ध्यान देने लायक नहीं मानता। आपने शुरुआत ही की इस गलती से कि आपने बिना पढ़े हमें अपना लिंक दिया। अगर आप पूरी चर्चा को पढ़ें और मेरे लिखे को समझें तो आप समझ जाएंगे कि भगतसिंह को मैं क्या मानता हूँ और क्यों उन्हें नास्तिक बताने पर सहमति जता रहा हूँ। मैं कोई चापलूस नहीं कि किसी भी बात तब तक प्रसन्नता जताऊँ जब तक फायदा या वाहवाही मिलती रहे।

नास्तिक लोगों पर क्या-क्या किसने कहा ह, सब देख लिया। आप लोगों ने विदूषक और जोकर किसे कहा है और क्यों कहा है, यह भी मैं समझ सकता हूँ। क्योंकि किसी के नहीं रहने पर उसके बारे में टिप्पणी करने में दोनों जगह कमी नहीं देखी मैंने। आपसे निजी तौर पर कहना चाहता हूँ कि आपकी हर बात का मेरे पास जवाब है और विस्तार से दे भी सकता हूँ। आपने पुनर्जन्म वाले आलेख पर भी अपना बयान दर्ज करा दिया है। कराते रहिए।

मेरे कहे में कुछ व्यक्तिगत टिप्पणियाँ होंगी, यह तय है क्योंकि किताब और लेखक दो वस्तु नहीं हैं।

आपके आलेख में या कहीं भी हमेशा इतना दिख ही जाता है कि बेचारे आस्तिक लोग(जिन्हें आप आस्तिक कहते हैं और समाज आस्तिक कहता है) पता नहीं किस डर से नास्तिक लोगों पर अपनी बयानबाजी ज्यादा करते हैं। यहाँ अनुरोध है कि आप मेरी सभी टिप्पणियों को पढ़ें।

आपके सभी शुभचिन्तकों और आपसे भी यह कहना है कि जिन चार-पांच बिन्दुओं को आपने परोसा है उनमें कोई जान नहीं है। 

अब लीजिए विस्तार से सुन लीजिए जवाब:

1) ‘शहीद भगत सिंह का परिवार उन्हें नास्तिक नहीं मानता। ….’

पहली बात उनके परिवार के लोगों में मेरी दिलचस्पी नहीं है क्योंकि वे सब भगतसिंह नहीं हैं।
भगतसिंह की भतीजी वीरेन्द्र संधू जिन्होंने भगतसिंह के मृत्युंजय पुरखे नाम की किताब लिखी है और शायद लंदन में रहती हैं(अगर यह सही है कि वे लंदन में स्थाई तौर पर रहती हैं, तो उनके लिए मेरे मन में कोई सम्मान नहीं है, वजह आप खुद सोचें या न समझ आए तो बाद में), उनके भाई कुलतार सिंह जो उनकी शहादत के समय 12 साल के थे और चमनलाल की किताब का प्राक्कथन लिखा है उन्होंने कोई ऐतराज नहीं किया और आप और आपके मित्र इस पर सवाल खड़ा कर देते हैं, रणधीर सिंह जिन्होंने भगतसिंह से मिलने से एक बार इनकार किया था जिसके बाद भगतसिंह ने वह आलेख लिखा, इन सबोंने और सम्भवत: मन्मथनाथ गुप्त ने, शिव वर्मा ने, भूपेंद्र हूजा ने (इन सबका परिचय यहाँ देना सम्भव नहीं है), इनमें से किसी ने ऐसा नहीं कहा कि भगतसिंह 1928 के बाद आस्तिक थे या किसी काल्पनिक ईश्वरीय सत्ता में उनका विश्वास था। आप बहुत ज्यादा सबूत पर विश्वास रखते हैं तो इतना कह देना चाहता हूँ कि आपनए किसी भी धर्मग्रन्थ का कोई सबूत नहीं देखा होगा। वहाँ तो यह भी स्पष्ट नहीं है गीता की रचना किसने की? 

इसलिए अपना चश्मा उतारकर सच देखने की कोशिश करें और चमनलाल के एक शोध को मानने और दूसरे शोध को न मानने का महान कार्य अंजाम न दें।

आप ज्यादा जिज्ञासु हैं और शोध के इच्छुक हैं तो मैं आपके साथ हूँ। क्योंकि शोध में मुझे मजा भी आता है। आपमें से यानि आपमें या आपके किसी मित्र में चमनलाल को गलत साबित करने की क्षमता हो तो अदालत का दरवाजा खुला है। अखबात पढ़कर शोध नहीं किया जाता। और हाँ विष्णु प्रभाकर को भी देख लें(वे गाँधीवादी होते हुए भी नास्तिक थे और राममनोहर लोहिया भी वैसे ही थे, कुछ कुछ जयप्रकाश नारायण भी वैसे ही थे, चन्द्रशेखर आजाद भी कुछ कुछ वैसे ही रहे होंगे जैसा कि संगठन के नाम से लगता है।)

इसलिए चमनलाल का इस्तेमाल नहीं करें। मैं भगतसिंह या किसी की खोजबीन में पीछे नहीं हटनेवाला।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:20 PM

उम्मीद करता हूँ आपके पहले बिन्दु का जवाब मैंने दे दिया। अब दूसरे बिन्दु को उठाते हैं।

2) ‘भगतसिंह द्वारा लाहौर सेंट्रल जेल में लिखी गई डायरी में उर्दू में लिखी कुछ पंक्तियों से भी इस बात का अहसास होता है | डायरी के पेज नंबर 124 पर भगतसिंह ने लिखा है- दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे, जो गम की घड़ी को भी खुशी से गुलजार कर दे। इसी पेज पर उन्होंने यह भी लिखा है- छेड़ ना फरिश्ते तू जिक्र-ए-गम, क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसाना।’

ओह क्या सोचते हैं और लिख देते हैं? यह बात चमनलाल ने छुपाई है क्या? उनकी किताब के 2009 संस्करण में चमनलाल स्पष्ट लिखते हैं कि शेर किसके हैं यह पता नहीं चल है। पृष्ठ 379 पर देखें। भगतसिंह की जेल डायरी के 124वें नहीं 24वें (वास्तव में पृष्ट 27) पर है यह अंश।

चमनलाल ने इसे तोड़-मरोड़कर तो लिखा नहीं है। जब वे इसे देने से नहीं डरते तो आस्तिकों को डर हो जाता है, अजीब बात है!

अब देखिए घटिया शोध की बात। जिन महानुभाव ने यह शोध किया है उनसे पूछिए कि भगतसिंह की डायरी में सिर्फ़ यही छ: पंक्तियाँ हैं या और कुछ है। आप जान लें उनकी डायरी में 90 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ़ अनीश्वरवादी दार्शनिकों, लेखकों का है और बहुत कुछ पूँजीवाद के विरुद्ध है। इतना ही नहीं साम्यवाद के पक्ष में भी बहुत कुछ है और इतना है कि किसी एक पन्ने के फुटनोट जितना भी आपके द्वारा बताए शोध का छ: वाक्य नहीं है। इसलिए सनसनी फैलाकर पचासों साल से चल रही विचारधारा पर अपना हाथ-पाँव मारने से पहले सोचना चाहिए कि आप आवारा मसीहा के लेखक नहीं हैं।

कुछ बात आपके मित्रों के लिए।

संयोगवश वहाँ भी स्मार्ट इंडियन साहब हैं। लेकिन मैं यह नहीं समझा कि अगर वे सचमुच निष्पक्षता वाले और जिज्ञासु आदमी हैं तो 2010 में 15 दिसम्बर को लिखे आपके आलेख के बाद 16+31+28+31+30+31+26= 193 दिनों तक कहाँ थे? भगतसिंह के लिखे पर उन्होंने पहले क्यों नहीं संदेह किया? आप खुद उन्हें और अपने को फँसा रहे हैं यह लिंक देकर। आखिर आपलोग कहाँ थे इतने दिन तक। नाम लेकर बोलता हूँ – हंसराज कहाँ थे? यह इसलिए पूछा गया कि आप सच यानि सत्य के अन्वेषी नहीं बल्कि हमारे जैसे नास्तिकता के पक्षधर लोगों से द्वेष भावना रखने वाले लोग हैं। बहाना बनाते हैं कि नास्तिक आस्तिक में क्या रखा है, भगतसिंह को मत बाँटो लेकिन आप सब क्या कर रहे हैं? आपका लेख क्या दिखाना चाहता है? यही तो कि आप सब भले, देशप्रेमी और अच्छे लोग हैं और नास्तिक बुरे हैं। कभी कभार कुछ अच्छी बातें तो कोई भी कर देता है, आपने भी की है टिप्पणियों में।

सिर्फ़ नास्तिकों को परेशान करने में और उन्हें जैसे मौका मिले गलत साबित करने में ही आपसब अपनी ऊर्जा खर्च कर जाते हैं।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:21 PM

और एक बात सभी मित्रों तक पहुँचाइये कि विपत्ति में सही चरित्र का पता चलता है। तो आप सब जो शीलवान और सदाचारी होने का अभिनय करते फिर रहे हैं, मेरी कुछ टिप्पणियों से घबड़ा क्यों गए? क्यों अपशब्दों की बरसात करनी शुरु की? क्यों व्यक्तिगत आक्षेप को आगे बढ़ाया? धैर्य था तो बुद्ध की तरह गालियाँ भी सुन सकते थे। सच तो यह है कि आप सब नकाब पहन कर देश का, सदाचार का बस नास्तिकों के पीछे हाथ-धोकर पड़े हैं लेकिन याद रखिए नास्तिक खासकर भारतीय नास्तिक कभी भी इतना बेवकूफ़ नहीं होता जनाब। 

अनुपस्थिति में बीसियों विशेषण कह डालते हैं आप सब। जी हाँ आप क्योंकि बचकानी कहानियों पर आनन्द तो आपको भी आता है। आपको भी मैं तीनों पोस्ट पर देख रहा हूँ। मैं हट क्या गया सब बहादुर और ज्ञानी लोग वहाँ आ पहुँचे। 

स्मार्ट इंडियन की छ: महीने पहले की टिप्पणी यही है न!

“उनके लिये एक छोटे से जीवनकाल में नास्तिकता, गीतापाठ, देशभक्ति और शहादत सभी कर पाना सम्भव था। मगर याद रहे कि वे नास्तिक थे धर्मविरोधी नहीं। हंसी तो तब आती है जब धर्म-विरोधी विचारधारा (यथा कम्युनिस्ट, मार्क्सवादी, माओवादी, हिरण्यकश्यपवादी आदि) नास्तिकता का मुखौटा लगाकर घूमते हैं। 

भगत सिंह की बात समझने के लिये आस्तिक, नास्तिक और धर्मविरोधी का अंतर समझना ज़रूरी है।

एक बार फिर आभार!”

मैं कम्युनिस्ट नहीं लेकिन इतना दावा करता हूँ कि आपमें से कोई मार्क्स के सिद्धान्त तक कभी वैचारिक रुप से पहुँच ही नहीं पाया और शायद पाएंगे भी नहीं।

यहाँ बार बार आपसब मिलकर नास्तिक-नास्तिक-नास्तिक-नास्तिक और सिर्फ़ नास्तिक शब्द को पीस रहे हैं, चबा रहे हैं और घोल कर पी रहे हैं। जितनी फुरसत किसी नास्तिक को यह सोचने की नहीं है कि वह नास्तिक नहीं है उससे कई गुनी ऊर्जा और फुरसत आप जैसे लोगों को है। तो कीजिए यही दिनभर।

इस बिन्दु के लिए इतना तो बहुत है। लेकिन एक बार कह देता हूँ कि भगतसिंह की डायरी के आधे पन्ने को आधार बनाकर शोध कर डालनेवाले लोगों से कहिए कि बाकी के 145 पन्नों पर जिनपर भगतसिंह ने लिखे हैं(कुल पन्ने 404 थे जिनमें से अलग-अलग 145 पन्नों पर भगतसिंह ने लिखा है लेकिन 100 पन्ने कहाँ हैं, इसका पता नहीं चला है क्योंकि 305 से लेकर 404 तक डायरी में नहीं हैं) उसके एक प्रतिशत के आधे का आधे से भी कम सिर्फ़ छ: पँक्तियाँ ज्यादा महत्व की कैसे हो जाती हैं। उनमें न कोई विचार है न कोई तथ्य है यानि चिन्तन और अध्ययन से नोट की हुई हैं वे।

ऐसे अगर मैं आपके प्रोफ़ाइल को देखकर आपकी जीवनी लिख डालूँ तो कैसा होगा? समझिए, उन्मादी लोगों को समझाइए।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:40 PM

अब तीसरे बिन्दु को लेते हैं।
अब देखिए जब भगतसिंह को फाँसी हुई तब उनके पौत्र की कल्पना तो हम कर ही नहीं सकते। उनकी बातों को कोई महत्व देना बेकार है। लेकिन देखने की बात तो यह है कि कुलतार सिंह को ऐतराज नहीं है वरना वे चमनलाल से कुछ कहते जरूर लेकिन यह बच्चा अब जवाब उनके बारे में उनसे ज्यादा जानता है। उस बच्चे यानि पौत्र में और हममें कोई फर्क नहीं है। क्योंकि हमने भी भगतसिंह की तस्वीरों से उनको देखा है और उनके पौत्र ने भी। और उनके परिवार के लोगों में कौन इतना महान था जितना भगतसिंह, ध्यान रहे बात भगतसिंह के बाद की कर रहा हूँ। 

भगतसिंह के पिता 1937 से 44 तक पंजाब में एम एल ए रहे(यह बात कुलतार सिंह कह रहे हैं)।

उनके यहाँ आर्यसमाज का महत्व ज्यादा रहा।

परिवारवाद को मैं ज्यादा महत्व नहीं देता। उदाहरण चाहिए तो देता हूँ। आप नहीं सोच सकते लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान आदमी के पुत्र आज भी कांग्रेस की मुख्य पत्रिका में हैं और पार्टी से जुड़े हैं। या गाँधी जी के खानदान के बहुत से लोग विदेशों में रह रहे हैं और भारत के लिए गाँधी का सपना कुछ हद तक भी पूरा नहीं हुआ। इसलिए कहा कि परिवार के लोग हमेशा महान नहीं रहे। आप देख सकते हैं पूरे इतिहास में कि कितने महान लोगों के माँ-बाप-भाई-बहन-रिश्तेदार के नाम लोग जानते हैं। ऐसे उदाहरण एकदम शून्य जितने हैं।

एक और बात जान लीजिए कि मैं गाँधी के सिद्धान्तों को भगतसिंह से ज्यादा महत्व देता हूँ और वे आस्तिक हैं। मैंने नास्तिक होने के बाद जाना कि भगतसिंह नास्तिक थे।

इसलिए अपने लोगों से कहिए कि बेकार में अपना खून न जलाएँ। कम्युनिस्ट भारत में तो बिल्कुल नकली जैसे हैं। मार्क्सवादी चिन्तन की आप आलोचना करते करते दस टन कागज पर स्याही उड़ेल लीजिए लेकिन यह परम सत्य है कि कार्ल मार्क्स ने एक मौलिक और उच्च सिद्धान्त प्रस्तुत किया। यह संभव है कि वह भारत के लायक उसी रुप में नहीं हो लेकिन उसकी मौलिकता और सुन्दरता पर आप जैसे सोच सकते हैं, इसमें मुझे सन्देह है। मैं धार्मिक ग्रन्थों को आदर दे सकता हूँ लेकिन आस्तिक लोग नास्तिक दर्शन को नहीं दे सकते।
इसका सबूत जल्दी मिलेगा कि मैं पुराणों पर एक आलेख लिखने वाला हूँ जिससे पता चलेगा कि मेरे जैसा नास्तिक क्या सोचता है इन ग्रन्थों के बारे में।
Global Agrawal,  27 June 2011 2:56 PM

शायद आप यकीन ना करें ….. ऐसी चर्चा में ही मुझे भी आनंद आता है , लेकिन अभी जितना कह सकता था उतना ही कह कर जा रहा हूँ ….आपने लेख पर विचार व्यक्त करने के लिए जो समय निकाला उसके लिए आभारी हूँ आपका ..दिल से आभारी हूँ …ये लिंक भी शायद इसलिए दिया हो ? है ना ?:)
Global Agrawal,  27 June 2011 2:57 PM

अपने मित्रों का झुण्ड बना कर चर्चाएँ की आदत अपनी भी नहीं है दोस्त , बस ये बात है की कभी कभी वक्त से मित्रता नहीं रहा पाती 🙂
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:58 PM

आपके धार्मिक वचन हैं- समत्वं योग: उच्यते। लेकिन मार्क्स ने बताया कि कैसे?
सर्वभूतहितेरता:, समानता चिल्लाते रहे धर्म और समता की बात बताई मार्क्स ने। यह अलग बात है कि उसे भारत में उस रुप में लागू नहीं किया जा सका। और वह कुछ असफल भी है। लेकिन इलेक्ट्रान के बारे में बताने वाले से पहले के वैज्ञानिक का महत्व इससे घट नहीं जाता।

अब 4)’उनके दादा भगतसिंह भगवान, किस्मत तथा कर्मों के फल के नाम पर लोगों के अकर्मण्य बन जाने के खिलाफ थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह नास्तिक थे।

मतलब कुछ भी कहो, कहते और तर्क-प्रमाण देते देते मर जाओ लेकिन वे आस्तिक ही थे। नहीं?
उनके दादा यह बात कितनी बेवकूफी वाली है।
बुद्ध के दादा हिन्दू थे, ईसाई यहूदी थे, मेरे पिता घोर आस्तिक हैं तो क्या मैं उनका सम्मान नहीं करता? दादा और पोते की बात कहते समय यह सोचने में कटौती क्यों कि उनके दादा भगतसिंह क्यों नहीं बन गए?

मेरा कहने का मतलब कहीं से यह नहीं है कि आस्तिक होना या नास्तिक होना देशभक्त के लिए अनिवार्य है। सबूत खुदीराम बोस जो भगतसिंह के जन्म के अगले साल 19 साल की उम्र में फाँसी चढ़े और भारत में उन्होंने जिस तरह के काम किए वही काम भगतसिंह ने भारत में और ऊधम सिंह ने इंग्लैंड में किया।

मैं बहुत से आस्तिक लोगों के विचारों को मानता हूँ, सम्मान देता हूँ लेकिन आपलोग खूँटा वहीं गाड़े रहेंगे कि नास्तिक पापी है। 

यह किसने कहा कि नास्तिक होना भगतसिंह के देशभक्ति का प्रमाण है? कैसी उलूल-जलूल बातें कह देत हैं आप सब बिना जाने समझे? 

भगतसिंह की पहली गिरफ़्तारी मई 1927 में हुई, जिसका संबन्ध 1926 के दशहरे के मेले में हुए बम विस्फ़ोट से था। आप सब भगतसिंह की जो फोटो देखते हैं जिनमें उनके केश हैं लेकिन खुले यानि पगड़ी नहीं है और बगल में डीएसपी गोपाल सिंह उनसे पूछताछ कर रहा है। इस समय उनकी उम्र 20 साल भी नहीं थी। और उस समय तो उन्होंने नास्तिक वाला आलेख भी नहीं लिखा था। कहने का अर्थ यह है कि नास्तिकता से देश का की ऐसा सम्बन्ध तो है ही नहीं लेकिन आप सब अपने को श्रेष्ठ साबित करने पे तुले हुए लोग हैं जिनके पास सिवाय गुस्सा और ऊटपटांग शोध के कुछ नहीं है।

आपसब बार-बार नारा लगाते हैं कि देश का संबन्ध नास्तिकता से नहीं है लेकिन यह लेख क्यों लिखा? यही बताने के लिए या कहिए भगतसिंह पर संदेह पैदा करने के लिए या अपने को महान सत्यान्वेषी बनाने के लिए।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 3:32 PM

आप भूल कर भी ऐसा नहीं करें कि कहीं कुछ देखा और लिख डाला बड़ा सा लेख। खासकर तब जब वह देश और महान लोगों से जुड़ा है।

आखिर वजह क्या है कि आप सब भगतसिंह के उस बयान के खिलाफ़ उठ खड़े हुए हैं? हमने आपके गप्पों का प्रमाण इस तरह से नहीं मांगा। लेकिन इतना तय मान लीजिए कि शोध में हम भी किसी हद तक जाने को तैयार हैं। लिखने से पहले कुछ तो सोच ही लेते।

मुझे लगता है कि बहुत से लोग मेरी इस टिप्पणी में फिर आक्षेप निकालेंगे, उनको मैंने पहले ही जवाब दे दिया है। मैं बुद्ध नहीं हूँ। 

आपने शीर्षक रखा है
‘भगत सिंह नास्तिक थे या आस्तिक ? चर्चा और आज का युवा’

आपका अगर यही मानना है कि सारे नास्तिक मूर्ख होते हैं तब क्या जरूरत है नास्तिकों पर समय और मेहनत खर्च करने की।

अगर किसी का नास्तिक होना इतना खटकता है तो जाइए भारत में इसके खिलाफ़ कानून बनवा लीजिए, मुकद्दमा हम जीतेंगे, दावा है।

अब कहिए चारों बिन्दुओं का जवाब मिल गया या नहीं? और कुछ सवाल हैं तो अब इस तरह मुझे लगने लगा है कि आप लोगों के किताब लिखनी पड़ेगी या अपने ब्लाग पर एक अलग सवाल खंड बनाना पड़ेगा ताकि आप आएँ, अपने सवाल पूछें और मैं जवाब दूँ।

अभी इतना काफ़ी है। काम नहीं चल पाए तो मैं भागने वाला नहीं हूँ कम से कम इस बार तो जरूर। दो ब्लागों पर सीधे लिखा कि अब टिप्पणी नहीं करूंगा लेकिन वे दोनों ब्लाग मेरे खिलाफ़ नोटिस जारी करें तो मैं हट गया। और कोई कुछ भी कह ले मेरा अपना ब्लाग तो है ही इनसब कामों के लिए।

मुझे भी लगता है कि इस टिप्पणी में मैंने विषय से हटकर जमकर व्यक्तिगत बातें की। आखिर मैं कब तक झेलता। आप लोगों के भगवान शिशुपाल की 100 गाली तक जा सकते हैं तो मैं भी 200 तक पहुँच गया हूँ। 

मन हल्का करना हो तो http://hindibhojpuri.blogspot.com/2011/06/blog-post_17.html पढ़ लें।

अब आगे आप कहिए, क्या हाल है?

चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 3:33 PM

अब एक बात राहुल सांकृत्यायन की और भगतसिंह के गीता मांगने की।
पहली बात आस्तिक उधार के ज्ञान पर ज्यादा चलता है।(कुछ अपवाद सम्भव हैं)नास्तिक स्वयं हासिल करता है। कौन बड़ा वैज्ञानिक है, स्वयं तय कर लें। भगतसिंह ने गीता क्या मांग ली, आप तो उन्हें महा आस्तिक साबित कर लेंगे इतने भर से?
अब मैं छठ में घर जाता हूँ तो घाट पर सूप या अर्घ्य देने वाले पात्र को लेकर जाता हूँ, तो क्या इससे मैंने छ्ठी मैया जैसे काल्पनिक शक्ति को स्वीकार कर लिया? घर पर घर के सदस्यों की सहायता करना जब वे नास्तिक नहीं हैं, ये भी आपकी समझ में आस्तिकता है ही? आप तो मेरे एक साल में सिर्फ़ दो समय कुछ सौ मीटर घाट पर जाने को लेकर आस्तिक साबिर कर लेंगे, क्यों? मूर्खतापूर्ण कु-शोध से बचिए।

आप जानते हों तो ठीक नहीं तो बता दूँ कि रामप्रसाद बिस्मिल और खुदीराम बोस(सम्भवत:)गीता लेकर फाँसी चढ़े। हो सकता है कि गीता के जोर शोर को देखकर भगतसिंह ने गीता मांगी हो। मैं स्वयं अपने कम्प्यूटर में बहुत सारे धर्मग्रन्थों को रखे हुए हूँ लेकिन पढ़ने के लिए।

अब एक ऐसे शख्स के बारे में जिसे आप जानते ही होंगे।

नाम राहुल सांकृत्यायन, किताबें लिखीं 110 से ज्यादा, 24 या 36 भाषाओं के विद्वान माने जाते हैं और जानकारी यानी बोलने-लिखने-पढ़ने भर 100 से अधिक भाषाओं की, वस्त्र-लगभग धोती-कुर्ता, काम- भारत के सबसे विद्वान लेखकों में से अन्यतम।

सबसे पहले युवा हिन्दू संन्यासी थे। बाद में आर्य समाजी, फिर बौद्ध और अन्त में पुनर्जन्म को नहीं मानने से मार्क्सवादी। कम्युनिस्ट लेकिन भाषा के इतने आग्रही कि हिन्दी को लेकर पार्टी से अलग हो गए। हिन्दी में 80-90 से अधिक किताबें। दर्शन-इतिहास-धर्म-नाटक-कहानी-विज्ञान-समाजशास्त्र आदि पर शानदार रचनाएँ। 

धर्मग्रन्थों और धर्म पर भी कई किताबें। उदाहर्ण के लिए अभी इसी वक्त मेरे पास है इस्लाम धर्म पर उनकी किताब।

तो क्या वे धर्मों पर किताब लिखने और पढ़ने से आस्तिक हो गए? संयोगवश मेरे जिले से उनका अत्यन्त निकट और अपरिहार्य संबन्ध।

उनकी जीवनी पढ़ें। अब देखिए शोध किसे कहते हैं। पटना संग्रहालय में एक विशेष भाग है जिसे उनके नाम पर राहुल सांकृत्यायन दीर्घा कहते हैं। खच्चरों पर लाद कर छ: सौ से ज्यादा पांडुलिपियाँ आदि तिब्बत आदि जगहों से लाए। वैसे वैसे ग्रन्थों की प्रति जो भारत में नष्ट हो चुके थे लेकिन कहीं बचे हुए थे उसे भी खोजकर लाए।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 3:55 PM

और हाँ, यह तो हमेशा याद रखिए कि हमें नास्तिक होने के लिए भगतसिंह की जरूरत भी नहीं है क्योंकि भगतसिंह के जन्म के पहले भी हजारों नास्तिक रहे हैं।

मैंने उपर कहा है कि नास्तिक होने के बावजूद भगतसिंह का उदाहरण हम क्यों देते हैं? यह पढ़े और समझे बिना अपने सवाल मत किया करें। लिखने में भी समय लगता है। आप खुद समझ रहे होंगे कि इतने लम्बे जवाब में समय कितना लगता है। वैसे आप सबों ने धर्मशाला समझ रखा है या कम्प्यूटर का सर्च इंजन? इतनी बातों का जवाब किसी को ऐसे नहीं देता, लेकिन नहीं देना पसन्द नहीं था इसलिए दिया। 

गीता क्या मांग दी, मानो पहाड़ टूट गया। यानि इस हिसाब से कामसूत्र पढ़नेवाली हर स्त्री वेश्या या सिर्फ़ कामाचारिणी हो गई? देखिए बन्धु तर्क और शोध समोसे नहीं हैं जो दुकान पर गए, जेब से पैसे निकाले और खा कर चल दिए। शोध अगर किया भी तो इतनी जल्दी तो नहीं कर डालना चाहिए कि एक आलेख(नवभारत टाइम्स या कोई अखबार कुछ लिखे और शुरु हो गए!)देखा और भगतसिंह पर 70 टिप्पणियों वाला विद्वत्तापूर्ण आलेख छाप दिया। 

हम कोई नास्तिकता की पार्टी नहीं खड़ी कर दें तो आप सब पता नहीं किस किस रुप में हमले कर डालेंगे? अभी तो सिर्फ़ विचार व्यक्त किया और आपके विचार सुने भी, तो इतनी परेशानी में हैं।

एक कहानी सुनिए और अपना नजरिया बदलिए। हम आपको आस्तिक से नास्तिक नहीं बना रहे हैं। अब आपके सभी बिन्दुओं पर विस्तार चर्चा कर ली है।

कहानी सुनिए।

एक आदमी सड़क से गुजर रहा था। रास्ते के बगल में उसने देखा बहुत से लोग एक घर बनाने के लिए पत्थर तोड़ रहे थे। वह वहाँ गया और पहले मजदूर से पूछा-‘ क्या हो रहा है?’ मजदूर ने जवाब दिया- ‘देख नहीं रह हो? पत्थर तोड़ रहा हूँ।’

आगे बढ़कर दूसरे मजदूर से वही सवाल। इस बार जवाब मिला-‘रोजी-रोटी के लिए काम कर रहे हैं’

फिर आगे जाकर तीसरे मजदूर से वही सवाल और जवाब मिल-‘घर बना रहे हैं।’

बस समझिए कहानी और मेरी टिप्पणियों पर सवाल खड़ा करने से पहले मेरी सभी टिप्पणियों को पढ़ और समझ डालिए। तब जाकर कोई सवाल कीजिए। क्योंकि जवाब देना आसान नहीं है सवाल कर देना बहुत आसान है।
(इसी बीच अभिषेक ओझा नाम के एक पाठक आते हैं और अपनी टिप्पणी कर जाते हैं, उसे मैं यहाँ नहीं दे रहा हूँ।)
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 8:52 PM

जरा ध्यान दीजिए चमनलाल क्या लिखते हैं:
भगतसिंह के संबंध में उनके चिंतन के संबंध में पंजाब में शायद कुछ अन्य स्थानों पर भी काफी भ्रामक बातें फैलाई गईं। भगतसिंह के जीवन व कार्यकलापों पर बनी आठ फिल्मों द्वारा भी भगतसिंह की छवि काफी विकृत की गई। पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दिनों के बाद भी कुछ धार्मिक अंधविश्वासियों द्वारा भगतसिंह को शहादत के निचले स्तर का शहीद बता कर या अपने नास्तिक विश्वासों को छोड़कर धर्म में पुन: आस्थावान होने संबंधी बातें बहुत ओछे स्तर पर कही गई हैं।(20 मार्च 2003) 

यहाँ एक बात याद आई कि लेनिन की जीवनी अपनी फाँसी के दिन पढ़ना मार्क्स या नास्तिकता की तरफ़ झुकाव नहीं है? 

उनके विचारों को तोड़ने-मरोड़ने का सबसे अच्छा का इस पोस्ट पर श्याम गुप्त द्वारा की गई है।

एक बात ध्यान दीजिए कि 1908 में खुदीराम बोस की फाँसी के पहले की तस्वीर है लेकिन भगतसिंह की बम फेंकने बाद 1929 से 1931 तक कोई तस्वीर क्यों नहीं है? या तो तस्वीर ली नहीं गई या नष्ट कर दी गई। उनके जेल में चार किताबों के लिखने की बात भी आती है, शायद उन्हें भी इधर-उधर कर दिया।

और मैंने एक जगह लिख दिया है कि अंधविश्वास कुछ नहीं होता। विश्वास होता ही अंधा है तो ये अंधविश्वास क्या चीज है? इसलिए भगतसिंह पर विश्वास करनेवाले को अंध-श्रद्धा करनेवाला कोई न कहे। क्योंकि मानव के व्यवहार में या भगतसिंह के व्यवहार में कोई चमत्कार नहीं है।
_________________________________________________
गौरव ने जो लिंक भेजा था उसमें आँकँड़ों को बिगाड़कर अपनी मर्जी से निष्कर्ष निकाला गया है कि भगतसिंह नास्तिक नहीं थे। 
फिर भी सभी बहस करनेवाले लोगों का धन्यवाद जिनकी वजह से भगतसिंह और अन्य विषयों पर इतना सोचने और कहने का अवसर प्राप्त हुआ।

अब भगतसिंह के ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ पर ही उठा दी गई अंगुली

2 टिप्पणियाँ

जी हाँ। अब भगतसिंह के लिखे आलेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ‘ पर ही अंगुली उठाते हुए पिछली पोस्ट वाले स्मार्ट इंडियन अपने शक की सूई चुभोना चाह रहे हैं। इस आलेख में मैं अनवरत पर हुई चर्चा के उन अंशों को दे रहा हूँ जिनमें भगतसिंह के आलेख पर संदेह किया गया है।
मैं अक्सर अपनी टिप्पणियाँ दूसरे चिट्ठों पर करता हूँ और वह इस लायक हो जाते हैं कि उन्हें पूरे आलेख में आपके सामने रखा जा सकता है। मेरा मानना है कि इस तरह की टिप्पणियों वाले आलेखों में अच्छी बातें सामने आती हैं। अब अफसोस इस बात का है कि ऐसा करते समय किसी खास आदमी को केंद्र में रखना पड़ जाता है। और यह अच्छा नहीं लगने पर भी करना आवश्यक लगता है क्योंकि बहुत सारे सवाल-जवाब के क्रम में बहुत सी नई बातें और विचार सामने आते हैं। इसलिए आज पढ़िए यह आलेख।
पिछली पोस्ट को ध्यान में रखते हुए आप इसे पढ़ें। शायद मेरे सुझाव के चलते स्मार्ट इंडियन साहब अनवरत पर गए और वहाँ से भगतसिंह वाले आलेख तक। उसके बाद उन्होंने अपनी टिप्पणी अनवरत पर की। देखिए उनकी टिप्पणी और यहीं से शुरु हुआ भगतसिंह के आलेख पर बातों का सिलसिला।)

भगत सिंह के इस पत्र की मूल प्रति के बारे में कुछ जानकारी मिलेगी क्या?


भगतसिंह के पत्र की मूल प्रति के बारे में।

जी हाँआप भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज खरीद लेंउसमें 250वे पृष्ठ पर यह पत्र हैचमनलाल वाली किताब में। भगतसिंह के इस पत्र का हिन्दी अनुवाद किया था शिव वर्मा ने। और भगतसिंह की इस रचना को उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचना माना जाता है। अपने भाई रणधीर सिंह से सिख धर्मकेश कटवाने और मिलने के सन्दर्भ में उन्होंने कुछ कहा थाजब भगतसिंह लाहौर जेल में थे।


यह रचना 5-6 अक्टूबर 1930 को हुई होगीऐसा कहा गया है।



मेरा आशय था कि भगत सिंह का मूल पत्र किस संग्रहालय में रखा है?


मैंने चमनलाल जी से पूछा है। अब देखिए कब तक जवाब देते हैं। फिर आपको बता दूंगा।

http://www.shahidbhagatsingh.org

http://www.shahidbhagatsingh.org/index.asp?link=atheist

http://drchaman.wordpress.com/page/17/

http://www.sikhcybermuseum.org.uk/People/randhirsingh.htm

http://chamanlal-jnu.blogspot.com/
इन लिंकों को देख सकते हैं।



श्री स्मार्ट इंडियन जी,

लीजिए जवाब भेज दिया है चमनलाल जी ने।


” ये लेख मूलत अँग्रेजी मे लिखा गया और लाला लाजपत राय की अँग्रेजी पत्रिका the people के 27 सितंबर 1931 के अंक मे छपातीन मूर्ति दिल्ली मे उपलबद्ध है।


चमन लाल “


@चंदन कुमार मिश्र,

भगत सिंह के जिस पत्र की बात आप लोगकर रहे हैक्या (प्रोफेसर चमन लाल के अलावा) आप में से किसी ने कभी वह मूल पत्र या उसका पठनीय चित्र देखा हैक्या वह पत्र (टेक्स्ट या अनुवाद नहीं) इंटरनैट पर देखा जा सकता है? 


बिना पत्र देखे उसका प्रचार-प्रसार करना अपने आप में अन्ध-श्रद्धा या अन्ध आस्तिकता (blind faith) ही कहलायेगी। नास्तिकता की बात करने वालों को दूसरों से अपनी बात पर साक्ष्यहीन आस्था करने की आशा करने के बजाय बात कहने से पहले सबूत रखना अपेक्षित ही है।


पुनःलम्बी-लम्बी टैंजेंशियल बहस में मेरी कोई रुचि नहीं हैयदि किसी के पास मूल पत्र का पठनीय चित्र या उसका लिंक होतो कृपया बताने की कृपा करें। अगले दो-एक दिन तक मैं अधिक जानकारी की आशा में यहाँ फिर आउंगा।



स्मार्ट इंडियन जी,

भगतसिंह के जिस लेख को सारी दुनिया प्रामाणिक मानती है। आप उसे गलत सिद्ध करना चाहते हैं तो इस खोज में जुट जाइए। आप घर बैठे उसे गलत मानते हैं तो मानते रहिए। इस से किसी को क्या फर्क पड़ता हैजो सच है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। फिर भी आप चाहते हैं कि उसे चुनौती दी जाए तो भारत की अदालतें इस मुकदमे को सुनने को तैयार हैं। भारत आइए और एक मुकदमा अदालत में मेरे और चंदन जी और उन तमाम लाखों लोगों के विरुद्ध पेश कीजिए जो इस आलेख को प्रामाणिक मानते हैं। अदालत दूध का दूध पानी का पानी कर देगी। बिना किसी सबूत के एक काल्पनिक ईश्वर पर विश्वास करने वाले से इस से अधिक क्या कहा जा सकता है।



स्मार्ट इंडियन जी,

हमारी भी इस मामले में आप से बहस करने में कोई रुचि नहीं है। हम यह बहस करने गए भी नहीं थे। आप ही यहाँ पहुँचे हुए थे।



श्रीमान स्मार्ट इंडियन जी,

अब तो हँसी आ रही है। क्योंकि चमनलाल जिंदा हैं और भगतसिंह पर सबसे ज्यादा अधिकृत लेखक हैं। आप कुलतार सिंह भगतसिंह के भाई हैंजीवित हैंउनसे मिल सकते हैं या वीरेन्द्र संधू उनकी भतीजी हैंअभी बूढ़ी भी नहीं हैंउनसे मिल सकते हैं और तो और छोड़िए मनोज कुमार की शहीद 1965 में आई थीउस समय भगतसिंह की माँ भी जिंदा थीं।


सब लोग गलत हैं और रामायण आदि सारे ग्रंथ जिनका समय भी पता नहीं तो लेखक की बात कौन करे कि जो माने जाते हैं वही हैं। लेकिन अब आपसे जवाब-सवाल मैं भी नहीं करना चाहताआप द्विवेदी के सुझाव से अदालत में मुकद्दमा ठोकिए। तुरन्त और कुछ लिख देता हूँ।



आदरणीय द्विवेदी जी,

पहले आपसे कुछ कहूंगा। आप बुरा मत मानिएगा कि किसी पर कुछ आरोप लगा रहा हूँ। सुज्ञ जी यानि हंसराज जी का जवाब आपने देख लिया है और फिर आपके जवाब पर उनका जवाब भी देख लीजिए। ये लोग कहते हैं कि ये नास्तिकों का सम्मान करते हैं लेकिन बार-बार अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष करते वही हैं जिससे ये इनकार करते हैं। सबूत के लिए आप सुज्ञ का नवीनतम जवाब देख लें।


इन स्मार्ट इंडियन को मैंने ही लिंक दिया था भगतसिंह के आलेख के लिए। लेकिन ये यहीं युद्ध नहीं ज्ञान-युद्ध शुरु कर देंगेमैं नहीं जानता था। फिर भी मैं वीरेन्द्र संधू का पता लगाकर और कुछ चीजें इन्हें अभी बताऊंगा ही।


इससे अब वाद-विवाद मैं भी नहीं करना चाहता लेकिन इनको वह सब तो बताना ही होगा। 


अब बता रहा हूँ।



स्मार्ट इंडियन जी,

पहले तो यह बताऊँ कि कांग्रेस सरकार ने भगतसिंह के दस्तावेजों को सामने आने नहीं दिया 1972-73 तक। यही कारण है कि शहीद(1965 में बनीइसे देख लीजिए या देखे होंगे) में भगतसिंह के इस वैचारिक पक्ष का अच्छा से दर्शन नहीं हो पाता वरना जरूर दिखाया जाता। लेकिन एक चीज तो आपको मालूम है कि 1928 से 1931 तक भगतसिंह-चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ(हिसप्रस) नाम से आन्दोलन चला। लेकिन इस आन्दोलन के पहले नौजवान भारत सभा नाम से 1926 में भगतसिंह के नेतृत्त्व में पंजाब में आन्दोलन शुरु किया जा चुका था।


8-9 सितम्बर को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में बैठक हुई और भगतसिंह के पहले से चल रहे हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक संघ‘ का नाम मार्क्स और एंजेल्स से प्रभावित होने के कारण बदल कर समाजवादी शब्द जोड़ लिया गया। इसमें मार्क्सवादी चिंतन को मानने में सुखदेवभगवतीचरण वोहरा और भगतसिंह शामिल थे।1925 काकोरी बम कांड के बाद प्रजातांत्रिक संघ बिखरा हुआ था। 8-9 सितम्बर 1928 को चार प्रांतों के दस क्रान्तिकारी शामिल हुए। मेरे समझ से शहीद में इसी दृश्य के लिए गाना है कोई पंजाब से कोई यूपी से है कोई बंगाल से। याद रखिए भगतसिंह पर मनोज कुमार की शहीद ही सबसे अच्छी फिल्म हैबाद की फिल्में तमाशा ज्यादा हैं। हाँ तो इस बैठक में चन्द्रशेखर आजाद शामिल नहीं हुए(सुरक्षा की दृष्टि से)। इसमें पंजाब और बिहार से दो-दो और एक राजस्थान के साथी शामिल हुए। अफसोस है कि बिहार के दोनों साथियों नेजिन्होंने समाजवाद शब्द का विरोध किया थाबाद में पुलिस के लिए लाहौर केस में गवाही दी।समाजवाद शब्द शामिल करने में भगतसिंह का साथ दिया विजयकुमार सिन्हाशिव वर्मा(जिन्होंने मैं नास्तिक क्यों हूँ का अनुवाद किया है)सुखदेवजयदेव कपूर और सुरेन्द्र पांडे ने किया।


यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि शहीद में नौजवान भारत सभा लिखित रुप में दिखाया गया हैफिल्म की शुरुआत में ही। और सबसे जरूरी बात कि समाजवाद शब्द जुड़ा क्योंयह सोचिए। और यही नहीं शहीद के एक गाने में संगठन का नाम भी दिखाया गया हैएकदम साफ साफ लेकिन संक्षिप्त अंग्रेजी में।

यानि जब सरकार ने भगतसिंह के दस्तावेजों के साथ आना-कानी की तब भी शहीद-1965 तक समाजवाद जैसी बात सामने है।


भगतसिंह की जेल नोटबुक भी उपलब्ध है जो जेल में लिखी गई है। उसे देखकर जो बातें उसमें नोट की गई हैंकोई भी समझ सकता है कि यह आस्तिकों द्वारा नहीं की गई है। और समाजवाद या मार्क्सवाद हर जगह छाया हुआ है। 

भगतसिंह पर मन्मथनाथ गुप्त और विष्णु प्रभाकर जैसे लोगों ने भी लिखा है। और ये दोनों आपके तुलसी से ज्यादा विश्वसनीय हैंइतना तय है क्योंकि प्रभाकर ने 14 साल लगाकर आवारा मसीहा लिखी थीजितनी मेहनत शायद ही कोई कर सकता है। हाँ प्रभाकर गाँधीवादी थे और उनके मित्रों ने उनकी आलोचना भी की जब भगतसिंह की जीवनी उन्होंने लिखी। राजपाल एंड सन्स से छपी है। अब पूछिएगा यह श्रद्धा क्योंमन्मथनाथ गुप्तप्रभाकरशिव वर्मा सब क्रान्तिकारी रहे हैं। और मन्मथ जी दो दिन जेल जाकर पेंशन लेनेवाले क्रान्तिकारी नहीं हैंयह ध्यान रखिएइन्होंने विदेशी सुख नहीं भोगे हैं।



मन्मथनाथ गुप्त को काकोरी ट्रेन डकैती यानि 1925 से लेकर 1947 तक जेल में रहना पड़ा।
http://en.wikipedia.org/wiki/Hindustan_Socialist_Republican_Associationजितनी खोज आप इस सच्चाई की कर रहे हैं उतनी खोज तो रामायण और गीता की कभी नहीं की होगी।यहाँ समाजवादी शब्द आपको नास्तिकता के लिए काफी नहीं लगता। एक सिख होने पर भी पगड़ी नहीं रखना(बाद में भी नहीं रखा) जिस वजह से रणधीर सिंह ने एक बार मिलने से ही इनकार कर दिया था। अच्छा होता आप एकबार सम्पूर्ण दस्तावेज को पढ़ लेते
और http://samajvad.wordpress.com/2009/09/ देखिए। लेकिन जो भगतसिंह की किताब है वह अच्छी नहीं है इस साइट पर। हो सकता है कि आप डाउनलोड कर भी लें तो पढ़ नहीं पाएँ। ढंग से नहीं है। अब बाकी बाद में। वैसे आपको अगर इतना शोध करना है तो आइएहम भी साथ देंगे।लेकिन इस जाँच का मकसद और मतलब आखिर है क्या? मैं नास्तिक क्यों हूँ कि एक भी बात ऐसी नहीं थी जो मैं नास्तिक होने के पहले जानता न था। मैंने वह आलेख ही नास्तिक होने के बाद पढ़ी। और उसका उदाहरण इसलिए देना पड़ता है कि लोग कुछ समझें वरना हमारे जैसे आदमी की बात को गम्भीरता से लेने में उन्हें शर्म और पता नहीं क्या क्या हो जाती है?


यह एक छोटा सा पत्र है कोई चंद्रमा को दो टुकड़े करने की बात तो नहीं थी कि इसपर इतना शक हो गया। हम भला चमत्कार की बात करते तो कुछ सही भी था लेकिन यह क्या?

http://en.wikipedia.org/wiki/Talk%3ABhagat_Singh और हाँ 2009 के दस्तावेज में कुलतार सिंह के हस्ताक्षर भी हैं और प्राक्कथन भी उन्हीं का हैये सब भी जाँच कर सकते हैं । http://www.scribd.com/doc/9728510/Jail-Note-Book-of-Shahid-Bhagat-Singh भी देख सकते हैं।

लेकिन वही सवाल कि आखिर इस बात की जाँच क्यों हो रही हैइसका उद्देश्य तो हम भी खूब समझते हैं।वैसे खोजबीन बुरी बात नहीं। लेकिन विवेकानद के हस्ताक्षर और उनके हाथ की छाप भी मैंने युगनायक विवेकानन्द में देखी है जो उनकी सबसे बड़ी जीवनी है। अब मैं भी उसकी सत्यता पर संदेह करके जाँच शुरु कर दूँ?और सब छोड़िएइतना तो लग ही रहा है कि भगतसिंह की बात से चोट पहुंच रही है। एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि वह आलेख उन्होंने नहीं लिखा तब भी क्या फर्क पड़ जाता हैउसमें ऐसा क्या लिखा हैउसके सवालों के जवाब हैं?

सारा खेल समझ में तो आ ही रहा है। अन्त में आप मुकद्दमा ठोंकिएहम मुफ़्त में मशहूर हो जाएंगे। क्यों?



चंदन जी,

किसी भी सत्य को सामने लाना एक फर्ज है। उसे करने पर न कभी पाबंदी लगी है और न लगेगी। मेरा मानना है कि फिजूल की बहस के बजाए हमें जो भी जानकारी मिलती है उसे लोगों के सामने रखना चाहिए। हम रखते हैं और रखते रहेंगे। भौतिकवादियों का संघर्ष चार्वाकों के पहले से ले कर कपिल (सांख्य)से गुजरते हुए आज तक जारी है। सांख्य की मूल अवधारणा को विज्ञान ने साबित किया है। हमारी अपनी एक परंपरा है हमे उस का निर्वाह करते रहना चाहिए। भाववादियों के पास बहस करने के लिए कल्पना के सिवा कुछ नहीं है। वे पाँचों इंद्रियों से जाने जा सकने वाले जगत को मिथ्या और स्वप्न समझते हैंजब कि काल्पनिक ब्रह्म को सत्य। वे तो उस अर्थ में भी ब्रह्म को नहीं जान पाते जिस अर्थ में शंकर समझते हैं। सोते हुए को आप जगा सकते हैं लेकिन जो जाग कर भी सोने का अभिनय करे उस का क्या? हम अपना काम कर रहे हैंहमें यह काम संयम के साथ करते रहना चाहिए। हम वैसा करते भी हैं। पर कुतर्क का तो कोई उत्तर नहीं हो सकता न?


आदरणीय द्विवेदी जी,
आपसे सहमत लेकिन कुछ कुछ जोश या आदत से मजबूर हूँ। आपने सही कहा है। वैसे मैंने चमनलाल जी को इनकी बात भेज दी है। फिर भी कोई भगतसिंह या किसी आदर्श व्यक्ति पर उंगली उठाए तो हमें जवाब तो देना ही होगा।


लीजिए मेरा मेल और चमनलाल जी का जवाब देखिए जो पहले आया।
” 
ये लेख मूलत अँग्रेजी मे लिखा गया और लाला लाजपत राय की अँग्रेजी पत्रिका the people के 27 सितंबर 1931 के अंक मे छपातीन मूर्ति दिल्ली मे उपलबद्ध है।
चमन लाल 

Visiting Professor on Hindi Chair
The University of the West Indies,St Augustine campus,Trinidad
Professor Chaman Lal, Former Chairperson
Centre of Indian Languages
Former President,JNU Teachers Association(JNUTA)
Jawaharlal Nehru University
New Delhi-110067, India
Former President,JNUTA(2006-07
http://www.bhagatsinghstudy.blogspot.com
http://www.chamanlal-jnu.blogspot.com
http://www.drchaman.wordpress.com
http://www.twitter.com/DrChaman
http://www.facebook.com/Dr.Chaman.JNU
http://in.linkedin.com/in/chamanlaljnu

From: चंदन कुमार मिश्र
To: chamanlal1947@yahoo.co.in
Sent: Sunday, 26 June 2011 2:18 AM
Subject: Bhagat singh
आदरणीय प्रोफ़ेसर साहब,

फिलहाल एक सवाल है कि भगतसिंह ने मैं नास्तिक क्यों हूँ मूलत: किस भाषा में लिखा थायह कहाँ रखी हुई है। अभी हम इसकी प्रति देख सकते हैं या नहीं। यानि भगतसिंह का यह दस्तावेज या पत्र किसी संग्रहालय में रखा है या नहीं?


अभी इतना ही।



जवाब के इन्तजार में
,


चंदन कुमार मिश्र

(इस मेल को यहाँ दिखाने का उद्देश्य यह बताना था कि चमनलाल जी कौन हैं ताकि उन्हें आप कोई झोला छाप लेखक मत समझ लें)


चंदन जी,बहुत बहुत धन्यवाद!


स्मार्ट इंडियन और द्विवेदी जी,

एक और प्रमाण देता हूँ। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग जिसने नेताजी और गाँधी जी दोनों के सम्पूर्ण वांगमय छापे हैंउसकी एक किताब है शहीदों के खत। 1990 में जब पद्मश्री डॉ श्याम सिंह शशि प्रकाशन विभाग के निदेशक थे तब यह किताब विनोद मिश्र ने संकलित करके छपाई। कीमत बहुत कम हैसिर्फ़ पांच रू। उसमें पृष्ठ 11 -12-13 देखिए। उससे भी वही साबित होता है कि भगतसिंह समाजवाद को मानने वाले हैं। और इसका सीधा सा मतलब है कि वे आस्तिक नहीं हैं।


कहिए तो इसकी फोटो लेकर अपने ब्लाग पर अपने पूरे जवाब के साथ लगा दूँ। 
स्मार्ट इंडियन जीआप कम से कम भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की वेबसाइट पर जाकर इस किताब की जाँच कर सकते हैं कि मैंने जिस किताब की बात कही हैवह वाकई है भी या नहीं।
http://publicationsdivision.nic.in/
लीजिए सबूत भी 

http://publicationsdivision.nic.in/b_lang_index.asp#83
इस वेबपृष्ठ पर एस अक्षर से 19वें स्थान पर लिखा है।



http://publicationsdivision.nic.in/b_show.asp?id=426
उस किताब का पूरा पता भी ले लीजिए।

Shahidon Ke Khat
Author Binod Mishra
Subject Art, Culture and History
Language Hindi
Paper Binding (Rs.) 5 

Description
The booklet contains some heartstirring letters from the great martyrs Bhagat Singh, Sukhdev and others, who sacrificed their lives in our national struggle for independence. These letters were written to kith and kin and also to the British authorities. The reader will have an inspiring feeling of the patriotism, courage and conviction of these great martyrs by going through these letters. The compiler, Binod Mishra is a noted journalist.


http://publicationsdivision.nic.in/Hindi/380HindiBooks.pdf
पर हिन्दी विवरण भी देख लीजिए।
(यहाँ सवाल यह है कि अगर आपको मैं भगतसिंह का लिखा दिखा भी देता हूँ तो कल फिर लोग कहेंगे कि हम कैसे मानें इसे कि यह भगतसिंह का लिखा है? यानि अब हर घर में भगतसिंह का लिखा वह भी असली प्रति मोबाइल के एसएमएस की तरह भेजना होगा। कहिए आपका क्या खयाल है?)

लीजिए सुन लीजिए मेरे जवाब

5 टिप्पणियाँ

(http://shrut-sugya.blogspot.com/2011/06/blog-post.html पर स्मार्ट इंडियन के सवालों और हंसराज यानि सुज्ञ की बातों के जवाब जो मैंने सुज्ञ के चिट्ठे पर दिया है, यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ। माफ़ी चाहता हूँ कि ऐसी चीज डालनी पड़ी लेकिन जवाब देना मेरे खयाल से आवश्यक था। यह जवाब इतना लम्बा हो गया कि इसमें 6000 शब्द लग गए।  इतने लम्बे आलेख या जवाब को पढ़ने के लिए समय तो ज्यादा लगेगा लेकिन उम्मीद करता हूं कि आप भी कुछ समझ पाएंगे इससे।)

यह जवाब मैंने जे सी जी कोविचार शून्य जी कोस्मार्ट इंडियन जी को(जो अपना नाम तक विदेशी रखते हैं लेकिन भारतीयता के पुरोधा हैं) और सुज्ञ जी को ईमेल से भेज रहा हूँ। अपने ब्लाग पर भी डाल रहा हूँ। और हंसराज जीअन्तिम बार दुस्साहस करते हुए आपके ब्लाग पर सम्भवत: आज तक की सबसे लम्बी टिप्पणी करके जा रहा हूँ।
मैंने अपने ब्लाग पर जो लिखा हैआपने उसे गलत समझा।  ये रही मेरी गलती कि अपने ब्लाग पे मजाक-मजाक में कुछ लिखा और आप उससे इतने परेशान हो गए। मुझे यह तो अधिकार है ही कि मैं अपने ब्लाग पर शीर्षक क्या दूँमहाशक्ति हो या आशा की परतें हर ब्लागर को इतना तो अधिकार है कि वह अपने ब्लाग का नाम क्या रखे। आप स्वयं का उदाहरण लें तो स्मार्ट इंडियन नाम रखने के लिए आपने किसी से नहीं पूछा।
अब सुनिए एक कहानी तब आगे बढ़ता हूँ।
सम्भवत: दादू की कहानी है यह। एक राजा था जिसे दादू से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई और वह दादू का शिष्य बनना चाहता था। घोड़े से गया दादू के इलाके में। उनकी कुटिया के पास एक बूढ़ा आदमी घास काट रहा था(घास काटना हमारी भाषा में घास गढ़ना कहा जाता है)। राजा ने उस आदमी से पूछा- दादू कहाँ हैंउस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। राजा ने फिर पूछा और इस बार भी आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। अब राजा गुस्सा गया। उसने तीसरी बार पूछा- दादू कहाँ हैंइस बार भी जवाब नहीं देने पर राजा ने जोर से कहा- गूंगे हो क्याऔर दो कोड़े बरसा दिए। तमतमाया हुआ कुटिया के अन्दर गया। वहाँ उसने दादू के बारे में पूछा तो किसी ने बताया कि बाहर घास काट रहे हैं। राजा बहुत पछताया और जाकर दादू के पैरों पर गिर पड़ा। माफी मांगते हुए उसने एक सवाल पूछा- दादूआपने बताया क्यों नहीं कि आप ही दादू हैंदादू ने जवाब दिया- जिस तरह शिष्य की परीक्षा होती है उस तरह गुरु को भी परीक्षा देनी चाहिए कि वह इस काबिल है कि नहीं?
अब आपकी बात पर आते हैं। यह कहानी क्यों कहायह सोचने की चीज है।
anvarat.blogspot.com/2011/06/blog-post_19.html
इन दोनों लिंकों पर मैंने बहस में भाग लिया था और वहीं की एक बात लेकर सुज्ञ जी ने लिखा है।
सबसे पहले बात करेंगे सुज्ञ जी द्वारा मुझे कुछ बताए जाने की। उनका कहना है कि मैंने विचार शून्य और स्मार्ट इंडियन का अपमान किया है। नाम में आदर इसलिए क्योंकि दोनों के नाम ये नहीं हैं।
हंसराज(अब बार बार जी नहीं लगा सकता) जी को किसने यह अधिकार दिया है कि वे सदाचार को बाँटे और वे भी महान ग्रन्थकार बनते हुए- आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार। सदाचार पर बहस चल चुकी थी और उसमें दिनेशराय द्विवेदी जी से मैंने अपनी सहमति अपने तर्कों से जताई थी। वहाँ कोई व्यक्तिगत आलोचना नहीं हुई थी इस बात को लेकर।
सबसे पहले विचार शून्य ने लिखा
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23 June, 2011 20:24
 VICHAAR SHOONYA ने कहा
आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार के बीच का फर्क. कौन सा वाला बेहतर है यहाँ मैं उन लोगों का पक्ष भी जानना चाहूँगा जो नास्तिक सदाचार के पालनकर्ता हैं.
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मैं हर बात का गरम और नरम जवाब देने की कोशिश करूंगा।
यहाँ विचार शून्य के इस टिप्पणी का जिक्र इस लिया किया गया कि इस पूरे मुद्दे में आपमैंविचार शून्य और हंसराज सब शामिल हैं।
तो यहाँ उस टिप्पणी से बात शुरु होती है लेकिन मुझे इससे कोई मतलब नहीं था।
उसके बाद एक और टिप्पणी आई
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Er. Diwas Dinesh Gaur ने कहा
हंसराज भाई साधुवाद…कल की बहस के परिणामस्वरुप बहुत कुछ आपसे सीखाएक अम्न्थान हो गयाआस्तिक व नास्तिक के बीच के अंतर को आपने बखूबी समझाया हैआस्तिक की श्रेष्ठता निसंदेह नास्तिक से अधिक है|
आभार…
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अब अगर आप शिक्षक हैं और शिक्षक के उपर बहस चले तो आपको अधिकार है कि आप इस बहस का हिस्सा बनें। ठीक उसी प्रकार मैं इस बहस का हिस्सा बना क्योंकि दिवस से मेरी बहस पहले भी हो चुकी थी।
यह वाक्य इनका अहंकार दिखाता है कि आस्तिक की श्रेष्ठता निस्सन्देह नास्तिक से अधिक है। यह अहंकारी भाव है। यहाँ याद रहे कि राहुल सांकृत्यायन और भगतसिंह भी नास्तिक थे। मैंने जो बहस की है उसी तरह उन्होंने अपनी किताबों में की है। आप चाहें तो उपर वाले लिंक से भगतसिंह का प्रसिद्ध आलेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ पढ़ सकते हैं या आप पढ़ चुके होंगे।
लेकिन मैंने दिवस की बात पर ध्यान नहीं दिया।
तभी मैं इस ब्लाग पर आता हूँ। और टिप्पणी करता हूँ।
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चंदन कुमार मिश्र ने कहा
अच्छा तो आप फिर उसी मुद्दे पर हैं! अभी अभी पता चला। लेकिन मेरी बात का जवाब तो किसी ने दिया नहीं कि अपराधियों में से कितने नास्तिक हैं और कितने आस्तिक।
दूसरी बात किसी नास्तिक की तुलना में हमेशा आस्तिकों के शत्रु कम होते हैं। क्योंकि वह वर्तमान व्यवस्था को स्वीकारता है लेकिन नास्तिक विद्रोह करता है। स्वयं के विवेक से चलता है दूसरों के विवेक के पास अपने विवेक को गिरवी नहीं रखता। आप अच्छे से जानते हैं कि राहुल सांकृत्यायन के शत्रु ज्यादा थे या विवेकानन्द के। आपकी दोनों बातों का कोई आधार है ही नहींकम से कम मैं जहाँ तक समझता हूँ। मैं औरों की तरह हाँ में हाँ मिलाता रहूँ तो सब ठीक होगातो यह मुझे मंजूर नहीं है।
और यह भी जान लीजिए कि मैंने अपने चिट्ठे पर ईश्वर और धर्म को लेकर बहुत सारे आलेखों को लिखने की ठान ली है और आज शुरु कर चुका हूँ।
24 June, 2011 20:42
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यह मेरा अपना मत है। इससे किसी को सहमति या असहमति हो सकती है। निश्चित तौर पर कुछ हाथ की अंगुलियों पर गिने जाने लायक नास्तिक हैं जो हिंसा का बहुत क्रूर खेल खेल चुके जैसे स्टालिनमाओ(जैसा कि आपने कहा) लेकिन दुनिया में यातना शिविरों के लिए जाना जाने वाला हिटलर तो अपने को आर्य यानि श्रेष्ट कहता थाऔर ईश्वर की सत्ता में विश्वास भी करता था।
यहाँ हंसराज ने कहा कि आस्तिकों के दुश्मन ज्यादा होते हैं लेकिन यह बात कितनी सही हैआप भी जानते हैं। दुश्मन तो परम्परा को तोड़नेवालों के होते हैं अधिक संख्या में न कि परम्परा में जीने वालों के। भारत में ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं। जैसे तुलसीदास को ही देखें तो उन्होंने परम्परा से हटकर किताब क्या लिख दी सारे पंडित उनके शत्रु बन गए। वैसे भी नास्तिकों की संख्या आप अच्छी तरह जानते हैं कि कितनी हैमैं जब भी बोलता हूँ तब भारत के संदर्भ में। इसलिए किसी अन्य देश से मेरे कहे का अर्थ नहीं जोड़ा जाय। मैं भारत से बाहर की बात करते समय बता दूंगा कि भारत से बाहर किसी दूसरे देश की बात कर रहा हूँ।
अब वापस आते हैं अपनी बहस की कहानी पर।
उसके बाद आप आते हैं इस टिप्पणी के साथ।
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Smart Indian – स्मार्ट इंडियन ने कहा
@आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार के बीच का फर्क. कौन सा वाला बेहतर है?
ज़ाहिर है कि सदाचार सदाचार ही है आधार कुछ भी हो।
@अपराधियों में से कितने नास्तिक हैं और कितने आस्तिक।
मुझे नहीं लगता कि ऐसी फ़िज़ूल स्टडी में कभी कोई संसाधन लगाये गये होन्गे। कॉमन सैंस से कहूँ तो नास्तिकों का प्रतिशत अपराधियों में भी कमोबेश उतना ही होगा जितना सदाचारियों में
@भय से धार्मिक दुकानदारी खूब चमकाई जाती है।
भय से सांसारिक दुकानदारी भी खूब चमकाई जाती हैये अस्पतालबीमा आदि क्या हैं?
@निशांत,
तुम्हारी बात सबसे अच्छी लगी। तुम जैसे लोग धार्मिक आचरण वाले नास्तिक कहे जायेंगे। भारतीय परम्परा में आस्तिक-नास्तिक की कोई समस्या नहीं है। समस्या तब आती है जब दो क्रूर और अति-असहिष्णु वर्ग (धर्मान्ध और धर्महंता) सात्विक (आस्तिक और नास्तिक) वर्गों की आड में अपना उल्लू सीधा करते हैं। इन मौकापरस्तों को अपनी असलियत ज़ाहिर करने का साहस नहीं होता है इसलिये नास्तिक/आस्तिक की आड लिये रहते हैं मगर सच्चाई कब तक छिप सकती है?
25 June, 2011 05:55
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यह आपकी सोच है। मुझे इसमें कुछ मतभेद दिखाई पड़े तो टिप्पणी करना मैंने आवश्यक समझा। आपकी पहली बात का मुझसे कोई संबंध नहीं है।
दूसरी बात आपने मेरे सवाल को फालतू स्टडी करार दिया। और कामन सैंस से आपने जो कहा वह गलत है क्योंकि अपराधियों या कैदियों की गिनती कर लें तो पता चल जाएगा कि ज्यादा अपराधी कौन होता हैलेकिन आपको अपनी बात रखने का पूरा पूरा अधिकार था। यह भी ठीक था। मैं कहूँ तो आप बुरा मानेंगे जैसे मैंने किसी काम को मूर्खता करार् दिया उसी तरह आपने मेरे सवाल पर फालतू स्टडी का विचार रखा। किसी के विचारों के अपमान का(अगर इससे अपमान होता है तब) पहला काम आपने शुरु किया। लेकिन फिर भी सुज्ञ को आप सही लगे। उनके विचार से निश्चय ही मैं गलत रुख अपनाता हूँ जब किसी को मूर्खता वाली बात करने वाला कह देता हूँ(जिसे सीधे-सीधे मूर्ख भी कह सकते हैं लेकिन शब्दों की चालाकी से हँसने या मूर्खता की बात कह दिया जाता है) और इस हिसाब से आप मेरे प्रति बुरा शब्द इस्तेमाल करनेवाले पहले आदमी हुए(हम दोनों के बीच में)। आप कल्पना कीजिए कि कोई वैज्ञानिक जोंक पर शोध कर रहा है और उसे कहें कि आप फालतू स्टडी कर रहा हैबस समझ में आ जाएगा कि अच्छा लगेगा। अगर आप उसकी जगह हों और आपको यह अच्छा लगे तो आप महान हैं और मैं इतना महान नहीं। अगर मैं पूछूँ कि आप होते कौन हैं यह कहने वाले की मेरी बात या मेरे विचार या तर्क फालतू स्टडी से संबन्धित हैंतो कैसा लगेगा?
अब आपकी दूसरी बात आती है कि भय से सांसारिक दुकानदारी भी खूब चमकाई जाती है। मै जानना चाहता हूँ( और यही मान कर चलता हूँ कि भारत के ही बारे में ही बात की जा रही है क्योंकि सभी ब्लागर भारत के हैं) कि बीमा और अस्पताल  में कितने नास्तिक लोग काम करते हैं। इन सबको या नास्तिक शब्द के मेरे लिए क्या अर्थ हैंयह जानने के लिए आप अनवरत ब्लाग को पढ़ लें(अगर चाहें तो)। भारत के कितने प्रतिशत अमीर लोगबीमा से सम्बन्धित लोग, अस्पताल से संबन्धित लोग ईश्वर पर यकीन नहीं करते हैं। बजाज से लेकर गाँ व के भारतीय जीवन बीमा निगम के अभिकर्ता तकसभी लगभग सभी आस्तिक हैं। आप याद रखें कि भारत में नास्तिक दर्शन से संबन्धित लोगों ने भी कोई गलत काम नहीं किया जैसे चार्वाकबहुत हद तक बुद्ध और महावीर या आधुनिक काल के राहुल जी या शहीद-ए-आजम भगतसिंह आदि। अब आप लेनिन का उदाहरण नहीं चिपकाएँ क्योंकि भारत के संबंध में बात हो रही है और अगर यह बात पहले नहीं समझ सके तो आपने पूछा नहीं और मैंने बताया नहीं।(आपकी भूल कि आपने अपने से अर्थ निकाला और मेरी भूल कि इस ओर मैंने ध्यान नहीं दिलाया) आपसे आग्रह है कि अगर आप मेरे लिए नास्तिकता आदि का अर्थ जानना चाहते हैं तो आपको अनवरत पढ़ना ही होगा।
अब अगली टिप्पणी जब आपने निशान्त के लिए की। तो मैं खुश हुआ आपके विचारों में मानव का उज्जवल पक्ष देखकर लेकिन आपकी भाषा और संकेत(जैसा कि मैं समझा) मुझे अच्छे नहीं लगे। धर्मान्ध और धर्महन्ता कहकर आपने अपने शब्दों का कैसा प्रयोग किया यह तो आप ही जानते हैं लेकिन मैं इसे आपकी सोच से समझ नहीं सकता था क्योंकि आप मेरी भावनाओं को नहीं समझ सकते थे।
भारतीय परम्परा में आस्तिक-नास्तिक की कोई समस्या नहीं है। यह वाक्य क्या हैआप इसे क्या कहेंगे। ग्रन्थों में जो लिखा है उससे हटकर आपने खुद ही विचारधारा स्थापित कर ली है। जबकि भारत वह पहला देश है जहाँ चार्वाक नास्तिकता का दर्शन उठाते हैं। वेदोंस्वर्गईश्वर और आत्मा आदि की निंदा करते हैं। भारतीय परंपरा पर अपने आपको या अपनी बात को ब्रह्मवाक्य मानना मुझे बुद्धिमानी नहीं लगी।
धर्महन्ताअति-असहिष्णुउल्लू सीधा करनामौकापरस्तआड़ लेना ये सारे शब्द आपकी सभ्य शब्दावली के नमूने थे। भगतसिंह का लिखा मैं नास्तिक क्यों हूँपढ़ें। मैं आपको भगतसिंह से ज्यादा महत्व नहीं दे सकता। उन्होंने जब लिखा तब वे किस मौके की तलाश में थेकहाँ से वे उल्लू सीधा कर रहे थेवे अति-असहिष्णु थे , मैंने तो आपके शब्दों का यही अर्थ लगाया। और यह कहीं से कोई अपराध नहीं है क्योंकि हरि का अर्थ एक जगह बन्दर और दूसरे स्थान पर साँप लगाना कहीं से गलत नहीं हैं
मैं शहीदों कासच्चे लोगों का अपमान नहीं सहते हुए आपके उपर कड़ी टिप्पणियाँ कर गया। अब इसकी वजह देखिए।
अपमान क्यों सहूँ जब आप भगतसिंह और राहुल सांकृत्यायन से न तो बुद्धिमान हैं और देश सेवी हैं। जाहिर है आप गदर पार्टी की स्थापना के लिए अमेरिका में नहीं रह रहे हैं कि आपकी तरफ़दारी करता।
न उनके इतनी आपकी हैसियत है। आप होंगे बड़े ब्लागर या चिन्तक देश को फर्क क्या पड़ता है इससे। यहाँ याद रखा जाय कि मेरे लिए भारत का अर्थ 90 करोड़ लोग हैं और बहुत बाद में किनारे पर 30 करोड़(ये सब घोर आस्तिक होते हैं और बेचारे 90 करोड़ लोग इन सबके जाल में फँसे हुए हैं)।
अब मैं इतनी कड़ी(मैं तो नहीं मानता कि इतनी कड़ी) टिप्पणियाँ कर गया तो इसके पीछे वजह एक नहीं है। आप देख रहे हैं आपने भारतीय परम्परा का उत्तराधिकारी समझना बिलकुल ठीक नहींचाहे आपके साथ पूरा संसार खड़ा हो जायहिन्दी ब्लाग-जगत तो बहुत छोटा है।
अब सोचते हैं कि कब कोई कड़ी टिप्पणी करता हैशायद आप समझ सकते हैं क्योंकि आप मुझसे बड़े हैं(उम्र में इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं आँख मूँद कर आपके चरणस्पर्श करता रहूँ)। या लीजिए यह भी अपनी समझ से रख देता हूँ। अगर आपको कोई बार-बार आपका नाम पूछेतो कैसा महसूस करेंगेझल्लाना कही से जायज नहीं। यानि जब आपकी विचारधारा का कहीं टकराव होता है और वह भी पुनरावर्ती बातों से तो आपमें क्रोध पैदा होना चाहिए नहीं तो या तो आप गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ हैं या स्वयं समझ लें। यही बात मेरे उपर भी लागू होती है। आपके विचारों में टकराव हो तो यह अच्छा भी है क्योंकि इससे मालूम होता है कि आप सोच रहे हैं और चेतन हैं वरना जड़ की स्थिति हो जाएगी।
या दूसरी स्थिति है कि आप थोड़े कड़े शब्द बोलने के आदी हैं। मैं किसी को कोई गाली कभी नहीं देता। यहाँ तक सर्वव्यापी साला शब्द भी मेरे मुँह से नहीं निकलता। इसलिए मैं कम से कम इतना तो कह ही सकता हूँ कि मैंने आपको गाली नहीं दी। लेकिन जैसा कि आपने इस्तेमाल किए हुए पाँच-छ: शब्द देखाआप समझते होंगे कड़ी टिप्पणी या कटु शब्द किसने शुरु किया। तो इससे इतना तो मुझे भी अधिकार मिलता है कि थोड़े से कटु शब्द मैं भी इस्तेमाल कर सकूँ(अगर लगे)। लेकिन हंसराज को इन शब्दों में कुछ कुटिलता नहीं दिखाई देती लेकिन मेरे शब्दों में दिखाई देती है तो मुझे नहीं लगता कि हंसराज की सोच पर मैं अपना माथा पीटूँ!
अब आगे बढ़ते हैं।
फिर मैंने टिप्पणी की
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 चंदन कुमार मिश्र ने कहा
श्रीमान स्मार्ट इंडियन,
असहिष्णुता का अर्थ मालूम हैवैसे भी विदेश में रहनेवालों को कोई महत्व नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि यहाँ से भागकर अपने देश को अंगूठा दिखाकर झूठ-मूठ काबिल बनने से क्या होता है जनाब?
कितने अस्पताल और बीमा में नास्तिक लोग हैंकामन सैंस लगाते हैं। आपने दूसरे देशों को छोड़िए भारत में ही कितने नास्तिकों को देखा हैभारत में एक करोड़ लोग भी नास्तिक नहीं है। यानि अपराधी अक्सर क्या होते हैंखुद समझ लीजिए।
आपको नास्तिकता और आस्तिकता की समझ नहीं हैऐसा मुझे लगता है,
आप मुझे ऐसे नास्तिकों की गिनती बताइए जिन्होंने संसार को खराब किया और ऐसे आस्तिकों की गिनती खुद कर लें जिन्होंने देश और संसार को क्या दिया?
25 June, 2011 06:49 
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मैं कह चुका हूँ कि इन मौकापरस्तों को अपनी असलियत ज़ाहिर करने का साहस नहीं होता है इसलिये नास्तिक/आस्तिक की आड लिये रहते हैं मगर सच्चाई कब तक छिप सकती है?’ इस वाक्य ने मेरे जैसे विचार वाले को क्या माना हैआप खुद जानते हैं(भले ही आस्तिक शामिल हैं लेकिन अगर कोई कहे कि हर भारतीय चोर होता है तो आपको बुरा नहीं लगेगा क्या?, कम से कम जो चोर नहीं हैं उनका तो फर्ज बनता है कि वे बताएँ और जवाब दें)। यह कहाँ से गलत हो गयामेरी नजर में इसमें रत्ती भर गलती नहीं है।
अब विचार करते हैं आपकी बात पर बिंदुवार।
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श्रीमान चंदन कुमार मिश्र
आपने जो प्रश्न पूछेमैंने सदाशयता से उनका उत्तर देने का प्रयास यह सोचकर किया कि आप वाकई उत्तर जानने में उत्सुक हैं। मगर आपके जवाबों की तिलमिलाहट और व्यक्तिगत आक्षेप एक दूसरी ही कहानी कह रहे हैं। आपके ऐटिट्यूड ने काफ़ी निराश किया। मेरे पास फ़िज़ूल बातों के जवाब देते रहने का समय नहीं है फिर भी एक बार हर किसी को अवसर देने का प्रयास अवश्य करता हूँ इसलिये इस बार के सवालों के उत्तर अवश्य दे रहा हूँआगे की कोई गारंटी नहीं है।
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चलिए अपने को सदाशयी माना। मेरी बातें फिजूल हैं। आप किसी को अवसर भी दे सकते हैं यानि आप इस लायक अपने को मानते हैं कि आप लोगों से हटकर कोई महान व्यक्तित्व हैं।
आत्मप्रशंसा और दूसरे की बातें फिजूल! अच्छा विचार है। विद्वान होंगे आप। किताबेंकविताएँ सब लिखी होंगी आपने लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि गाँधी के निर्मल चरित्र वाले हैं। मैकाले भी कम विद्वान नहीं था। उसकी किताबें इंग्लैंड में इतिहास पर बहुत महत्व की मानी जाती हैं। लेकिन भारत उसके द्वारा किए घृणित कार्यों(शायद महान लोगों की नजर में प्रशंसनीय और महान कार्य) सेउसके द्वारा उठाए गए कदमों से जानता है कि मैकाले कितना दयावान और महान था। मेरे नजरिये ने नहीं ऐट्टिट्यूड ने आपको निराश ही नहीं कियाकाफी निराश किया और आपके द्वारा दिए गए पाँच विशेषणों ने मुझे काफी खुशी प्रदान की!
अब आगे
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@असहिष्णुता का अर्थ मालूम है?
नहीं जीक्षमा कीजिये। इस सभा में एक आप ही महापण्डित हैंविस्तार से समझाइयेजिन पर समय होगा वे सुन लेंगे। वैसे निष्पक्ष होकर देखने वालों को “असहिष्णुता” का अर्थ आपके उपरोक्त सवाल में ही मिल जायेगा।
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अब मैंने कहा कि असहिष्णु का अर्थ मालूम हैक्यों कहाक्या आप यह सोच भी नहीं सकते थेबस बौखलाहट में आप भी जवाब दे गए(कम से कम आप तो हंसराज और अन्य लोगों की नजरों में तो विद्वान और अग्रिम पंक्ति के ब्लागर हैंमैं तो मूर्ख और दुष्टात्मा हूँ)? क्या आपने यह कहकर समूचे अनीश्वरवादियों को कायरछिपने वाला और असहिष्णु नहीं कहाऔर अगर कहा तो मेरा प्रश्न किस हिसाब से गलत हैमुझे महापंडित करार देकर आपने यह तो बता ही दिया कि आप भी टेढ़ी बात करते हैं और जब ऐसा है तब अपने को किसी से महान और सदाशयी कैसे कह सकते हैंवैसे यह मामला निजी है। कितने लोग मैकाले को भी महान कहते हैं। यहीं नहीं आपने मुझे अप्रत्यक्षत: पक्षपाती भी कहा। (अब कह दीजिए कि मैं बाल की खाल निकाल रहा हूँ क्योंकि प्रथम पंक्ति के विद्वान ब्लागर हैं और सारे लोग या मैं निम्न पंक्ति का)। यानि आपने एक और विशेषण प्रदान किया।
कोई यह नहीं मानेगा कि व्यंग्यात्मक लहजे में कही गई बात आपको निष्कपट साबित करती है। मैं तो हूँ कपटी और अहंकारीआप सबों की दृष्टि में। जब आदमी टेढ़ी बात बोले तो वह निर्मल ह्रदय वाला हो ही नहीं सकताकम से कम उस वक्त जिस वक्त वो तीखी बात बोल रहा है।
अगर आपने असहिष्णु कहा और मैंने आपसे इतना ही पूछा कि इसका अर्थ मालूम हैवह भी प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ यानि सवाल पूछा जा रहा है। लेकिन यह बात आपको इतनी खली आपने अपने अहं की पुष्टि के लिए मुझे महापंडित कह दिया।
अब आगे
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वैसे भी विदेश में रहनेवालों को कोई महत्व नहीं दिया जाना चाहिए
आप वाकई गम्भीर हैंजब आप प्रधानमंत्री बन जायें तब सम्विधान में ऐसा लिखा दें। अगर अंग्रेज़ों की जगह आपका राज होता तो शायद गान्धीजी जैसों के बारे में यही प्रचारित कर रहे होते। BTW, Who are you to decide it? A self-proclaimed arrogant future PM? The world has already seen many dictators, can’t tolerate anymore.
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अब दूसरी बात कि मैंने विदेश की बात की तो खुद गाँधीजी से तुलना(अप्रत्यक्ष ही सही) कर ली। अच्छा है तुलना घटिया लोगों से नहीं ही करनी चाहिए। जब आपने सवाल पूछा कि क्या मैं वाकई गम्भीर हूँ तो आपने जवाब का इन्तजार कियालेकिन यहाँ भी आपने द्वेषपूर्ण रवैया अपनाते हुए फिर सुझाव के साथ व्यंग्य कसा। एक बात कहूँ तो बुरा लगेगा और लगना ही चाहिए। जब हिन्दी प्रदेश में शराबी शराब पी लेता है तब वह अंग्रेजी झाड़ना शुरु कर देता है।
जब आप यह फैसला कर सकते हैं कि कौन असहिष्णु है और कौन दयालुकौन मौकापरस्त है और कौन नहींकौन क्रूर है और धर्महन्ता तो मुझे यह अधिकार कैसे नहीं है कि विदेशी भारतीय(मतलब विदेशों में रहनेवाले भारतीय- आप चाहें तो नाराज हो सकते हैं क्योंकि मैं कुटिलता से अपनी बात कहता हूँयह आपके शुभचिन्तक हंसराज ऐलान कर चुके हैं और इसलिए मैं कितनी भी टेढ़ी बात करूंइसमें कुछ बुरा नहीं क्योंकि बुरा आदमी तो बुरा ही कहेगा) के उपर अपने विचार रखूँहै कोई जवाबक्या आप तय करेंगे कि मैं क्या सोचूँ और क्या नहींजब आप इसके लिए स्वतंत्र हैं कि किसी को साहस नहीं करने वाला करार दें(चाहे वह जिस तरह कहा गया है। कहा तो किसी आदमी के लिए ही है) तो मैं क्यों नहीं?
यह तो वैसी ही बात हुई कि आप जो कहें वह सही और मै जो कहूँ वह गलत। यह एकांगी सोच कौन रखता है- मैं या आप?
यहीं नहीं रुके आप। अभी और कहते जा रहे हैं कि मैं तानाशाह हूँ(या बनना चाहता हूँ)। इतना ही नहीं आप मुझे मेरी इच्छाओं पर रोक लगाने जैसी बात सोच रहे हैं। एक स्वघोषित अहंकारी भावी प्रधानमंत्री – यही कहा है न आपने। जब आप व्यक्तिगत टिप्पणी कर सकते हैं तो और कोई क्यों नहीं। क्या आप अपने को बादशाह समझते हैं। यह भ्रम छोड़ दीजिए जनाब। आपको झेलने को कौन कहता हैआप इतने परेशान दिखते हैं सिर्फ़ मेरे ब्लाग के एक छोटे से शब्द-समूह से। आपमें कितना धैर्य हैइसका अन्दाजा है आपको(मैं अवगुणी हूँयह याद रखें इसलिए यह अपेक्षा आपसे और सिर्फ़ आपसे कर रहा हूँ)गाँधी वहाँ गए थे गुलामी के दौर में अपने पिता के भेजने के कारण और आप भूल रहे हैं कि वकालत के पढ़ाई की तत्कालीन राजधानी भारत न होकर इंग्लैंड थी। वह पैसे कमाकर इंग्लैंड को देने नहीं गए थे। यह बात भी मालूम होनी चाहिए। उस समय भारत की असली राजधानी यानि केंद्र दिल्ली नहीं इंग्लैंड हैक्या यह याद नहीं आपकोनिश्चित रुप से मैं नहीं जानता कि आप वहाँ क्या करते हैंलेकिन इतना मालूम है भारत को कोई लाभ नहीं पहुँचाते हैं। अगर मेरी बात झूठ साबित करनी हो तो बताइए कि देश को क्या क्या दिया है आपनेमुझसे यह सवाल पूछने के पहले बता दूँ कि अभी मैं छात्र हूँ और जीवन का छात्र हमेशा रहूंगाविद्वानों का कभी नहीं। जब लोग अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं कि भारत-अमेरिका परमाणु करार सही है या गलत तो आप कौन होते हैं मुझे इस बात पर सोचने से रोकने वाले कि विदेशों में जाना भारत के लिए फायदेमंद है या नहीं?
यह आपकी तानाशाही सोच को दर्शाता है मेरी नहीं।
इतना काफी होगा। आगे देखते हैं
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@क्योंकि यहाँ से भागकर अपने देश को अंगूठा दिखाकर झूठ-मूठ काबिल बनने से क्या होता है जनाब?
आप मुझे जाने बिना मेरे बारे में इतनी बडी बात कह रहे हैं कि यदि आप कभी अपनी बात के खोखलेपन को जानने लायक परिपक्व हुए तो अपनी उद्दंडता पर शर्म करेंगे। और अगर मुझे जाने बिना ही आपको यक़ीन है कि मैं किसे अंगूठा दिखाकर कैसे भागा हूँ तो फिर आप जैसे आदमी से बात करके मैं ही नहीं शायद बहुत से अन्य लोग अपना वक़्त बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि वार्ता की भी एक मर्यादा होती है। “झूठ-मूठ काबिल बनने” और “सचमुच काबिल बनने” का परीक्षण कहाँ होता है और उसके प्रमाणपत्र कहाँ मिलते हैंयह भी बताते जाते तो शायद आगे से लोग आपकी बहस में प्रमाणपत्र लेकर ही घुसेंगे।
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इस सवाल का जवाब तो देना अभी भी आसान है लेकिन आपकी बात रह जाय इसलिए आप अपना विस्तृत परिचय बता दें। अब कहिएगा कि क्यों बताऊँतो मत बताइए। देश के सुधार के लिए आपने क्या किया हैअंगूठा दिखाकर भागने का मतलब यह था कि भारत में पढ़ लिखकर विदेशों में भागने का कोई आवश्यक कारण आपके लिए नहीं दिखा। आप ऐसे वैज्ञानिक भी नहीं कि अमेरिका में ही शोध कर सकें और उस शोध के लिए भारत में कोई व्यवस्था नहीं है।
जब भारत का एक आदमी विदेश भाग जाता है(जी हाँभाग जाता है) तब इस देश के पास एक दिमाग और दो हाथ कम हो जाते हैं। यह परम सत्य याद रखें जनाब।
अगर आपको इन जवाबों से फिर भी इस सवाल के जवाब से संतुष्टि नहीं मिले तो (जी हाँ सिर्फ़ इस सवाल के लिए) मैं आपसे माफ़ी मांगता हूँ। मैं माफ़ी चाहता हूँ कि मैं एक नहीं सौ भगतसिंह के बराबर एक आदमी से बात कर रहा हूँ और मैं खुद एक भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आता।
झूठ-मूठ काबिल बनने का अर्थ अब साफ हो गया होगा, जहाँ तक मैं समझता हूँ।
इस सवाल का जवाब ज्यादा नहीं।
अब अगले सवाल पर
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@आपको नास्तिकता और आस्तिकता की समझ नहीं हैऐसा मुझे लगता है
आपके लगने से इस ब्रह्माण्ड को कोई फर्क पडने वाला है क्याब्रह्माण्ड के अनंत काल में आपका यहाँ अस्तित्व है ही कितनी देर काआपकी सारी बहस कुछ एक दशकों में मिट्टी होने वाली है। याद रखिये एक शताब्दी के अन्दर न आप यहाँ होंगे न ऐसा एक भी व्यक्ति जिससे बहस करके आप अपने अहम को पोषित कर रहे हैं। आप नास्तिक हैं तो रहिये। Who cares! लेकिन अगर स्टालिनमाओ जैसे तथाकथित नास्तिक तानाशाहों की तरह सारी दुनिया को ज़बर्दस्ती धर्मविरोधी बनाना चाहेंगे तो याद रहे कि उनके सपने भी उन्हीं के साथ दफन हो गये।
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आप कैसे कह सकते हैं कि मैं सारी दुनिया को धर्मविरोधीवह भी जबरदस्ती बनाना चाहता हूँहर बार ऐसा लगता है कि आपके अहंकार को जबरदस्त ठेस पहुँचने से बौखलाए हुए हैं। इस बार के सवाल में आप प्रवचन करते नजर आ रहे हैं। आपको मेरे नास्तिक होने की चिन्ता करने की क्या जरूरत आन पड़ी कि हू केयर्स का अंग्रेजी वाक्य चिपका गए। आप अंग्रेजी का प्रकोप बार-बार झेलते हुए नजर आते हैं। मैं भी झेलते हुए नजर आता हूँ लेकिन अपनी जिंदगी में अंग्रेजी को घटाने पर लगा हुआ हूँ।
माओ के सपने को छोड़िए लेकिन चीन याद रहे और आप इतने महान हैं तो चीन से अपनी जमीन(गलती हो गईअपनी नहीं भारत देश की)छीन कर या मांगकर ला देते हैं?
माओ की बदौलत ही आज चीन आज का चीन है। स्टालिन मरा तो क्या हुआआपको कौन याद रखेगास्टालिन आपसे ज्यादा मायने रखता है। ब्रह्मांड में न तो मैं ज्यादा दिनों का मेहमान हूँ और न आप लेकिन आप मुझपर ही वाक्य झाड़ रहे हैंझाड़ लीजिएजितना मन हो क्योंकि मन का गुबार निकाल ही लेना चाहिए। क्यों?
और मेरे इस बात का कि मुझे लगता है कि आस्तिकता और नास्तिकता की समझ आपको नहीं हैयह जवाब भी नहीं है जो आपने दिया है। कहीं से नहीं एक प्रतिशत  भी नहीं।
जब मैंने अपनी क्षमता स्वीकार करते हुए कहा कि मुझे लगता है  और आपने कहीं अपने को ज्ञानी समझने से ऐतराज नहीं कियातो खुद सोच लें कि अहंकारी कौन है?
हाँ आपने कहा कि स्टालिनमाओ की तरह यानि आप फिर अपनी मशीन से मेरे वाक्य और मेरे दिमाग का हिसाब-किताब कर रहे हैं। यह आप कैसे सोच सकते हैं जबकि  मैंने स्टालिन और माओ का नाम तक नहीं लिया।
आपको नास्तिकता से और आस्तिकता से कोई झगड़ा तो है नहीं और अन्त में कह  क्यों डालते हैं आप नास्तिक हैं तो रहिये। Who cares!
यहीं आपकी पोल पट्टी और असलियत सामने आ जाती है कि आप सारे बहस करने वालों के प्रतिनिधि जैसे स्वर में अपना निर्णय सुना डालते हैं। जिस बहस में नास्तिक आस्तिक अपनी अपनी बात कह रहे थे(भले ही कुछ तीखे स्वर में वह भी हमेशा नहीं) उसका नेता बनकर अपना यह फैसला सुनाया क्यों आपने जब आपको कोई चिन्ता नहीं है?
और जहाँ तक लगने की बात है शायद आपके लगने से कुछ फर्क पड़ जाता है या कुछ भविष्य में हो जायेक्यों?
अब आगे बढ़ते हैं
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@ऐसे नास्तिकों की गिनती बताइए जिन्होंने संसार को खराब किया और ऐसे आस्तिकों की गिनती खुद कर लें जिन्होंने देश और संसार को क्या दिया?
अगर अभी तक आपने खुद ही इस सवाल का उत्तर नहीं ढूंढातो अभी बहसों में पडने से पहले थोडा होमवर्क कीजिये। फिर भी एक क्लू देता हूँ कि हिंसक कम्म्युनिस्ट तानाशाहविचारक और उनके रक्त-पिपासु चमचे अपने को नास्तिक ही कहते रहे हैं। गिनना शुरू कर दीजिये।
जय राम जी की! खुदा हाफिज़। गुड बाय (यह गुड भी गॉडली ही है)
25 June, 2011 08:55
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दुनिया के 50 से ज्यादा देशों पर राज करने वालेभारत के दस लाख से ज्यादा क्रांतिकारियों को जान से मारने वालेभारत से खरबों लूट ले जाने वाले आस्तिक थे और वे थे अंग्रेजभारत पत आज तक जितने आक्रमण हुए हैं उनमें 1962 के चीनी आक्रमण के अलावे कोई आक्रमण शायद ही ऐसा रहा है जब आक्रमणकारी आस्तिक न हो।
बलात्कार को मैं हत्या से बड़ा जुर्म मानता हूँ। और संसार के सारे बलात्कारी में से कितने नास्तिक हैंयह बताइए?
वैसे मैं साफ कहना चाहता हूँ कि नास्तिक का मतलब भले ही ईश्वर से है लेकिन मानवता नास्तिकों में ज्यादा है। इस बात का प्रमाण चाहिए तो बताऊँ कि आपने कितने लोगों के नाम लिए स्टालिनलेनिनमाओ जैसे कितने नाम हैं इतिहास में।
लेकिन ईसाई अंग्रेजआतंकवादी के लिए मशहूर(मेरा मतलब सिर्फ़ आतंकवादी से है) धर्मपरमाणु बम बनानेवाले और गिरानेवाले सब आस्तिक ही तो थे या हैं।
फिर भी एक क्लू देता हूँ कि हिंसक कम्म्युनिस्ट तानाशाहविचारक और उनके रक्त-पिपासु चमचे अपने को नास्तिक ही कहते रहे हैं। गिनना शुरू कर दीजिये।
यह वाक्य आपकी मानसिकता और निशान्त की मानसिकता को साफ करती है। निशान्त ने कहा था कि नास्तिक को पापी और दुष्ट ही माना जाता है और वहाँ तो भाषण दे रहे थे आप और यहाँ वही बात दुहरा बैठे। कब तक छलिए खुद को।
और हाँ विश्वविजेता बनने का ख्वाब देखने वाले – सिकन्दरहिटलरअंग्रेजचंगेज खाँनेपोलियन सब आस्तिक थे। इससे तो पता चलता ही है कि साम्राज्यवाद कौन चाहता हैपूँज़ीवादलूटशोषण कौन चाहता हैकम्युनिस्ट बेशक हिंसक रहे हैं (हालांकि 100 प्रतिशत सही नहीं कह सकते) लेकिन कितने नास्तिक को आप जानते हैं जिसने दुनिया में खुद को तानाशाह या साम्राज्य का सम्राट बनाने की कोशिश की। सबसे सफल और भारत से जुड़ा मामला अंग्रेजों का हैं। वे ईसाई धर्म को मानते हैं और आस्तिक हैं।
निस्संदेह हिंसा का निंदक हूँ मैं लेकिन उसी रुप में जैसे भगतसिंह ने हिंसा की निंदा की है।
यह भी बता दूँ शाकाहारी हूँ जिससे मालूम हो जाय कि हिंसा का मेरे जीवन में क्या स्थान है?
अब आगे और तमाशा देखिए।
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VICHAAR SHOONYA ने कहा
सुज्ञ जीचन्दन कुमार मिश्र जी किस बहस की बात कर रहे हैं , क्या कुछ लिंक मिलेगा.
@चन्दन जी अपने नाम के विपरीत आप गरम दल के मालूम होते हैं. आपको मुफ्त में एक सलाह दूंगा (वैसे मुफ्त में भी दो की चाह रखेंगे तो दो सलाहें भी दे दूंगा). किसी भी विषय में वाद विवाद करते वक्त किसी पर भी व्यक्तिगत आक्षेप करने से पहले कम से कम दस दुसरे ब्लोग्स पर जाकर टिप्पणियां कर लिया करें. आपका क्रोध शांत हो जाया करेगा.
25 June, 2011 10:18
 चंदन कुमार मिश्र ने कहा
नाटक में एक और पात्र! विचार शून्य जी। अहा!
25 June, 2011 10:24 
 चंदन कुमार मिश्र ने कहा
anvarat.blogspot.com/2011/06/blog-post_19.html
वैसे नाम बड़ा अच्छा रखा है विचार शून्य जी। लीजिए लिंक और तमाशा देखिए।
25 June, 2011 10:33
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विचार शून्य का नाम और तस्वीर बहुत अच्छी लगी। इसलिए बोला कि नाम बड़ा अच्छा रखा है लेकिन इस हंसराज महाराज को इसमें अपनी नजर के चलते अपमान दिख गया।
विचार शून्य को मैंने कहीं से एक भी बुरी बात नहीं कही न ही किसी किस्म का अपमान किया है। मैंने यह कहा कि नाटक में एक और पात्र तो उसके पीछे मेरा कोई गुप मतलब नहीं था। लेकिन हंसराज जी हंस हैं नीर क्षीर विवेक तो है हीपहचान लेंगे।
विचार शून्य को मैंने लिंक दे दियाउन्होंने कहा था कि किस बात की बहस हो रही हैबस इस बात से भी हंसराज जी पर पहाड़ टूट पड़ा।
मैंने कभी किसी एक आदमी के लिए इतना लम्बा जवाब नहीं लिखा।
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सुज्ञ ने कहा
चंदन कुमार मिश्र जी,
आप विद्वानों की सभा में अभिव्यक्ति के योग्य ही नहीं है।
आपको यह भी नहीं पता चर्चा कैसे की जाती है।
श्रीमान अनुराग शर्मा जी(स्मार्ट इन्डियन)प्रथम पंक्ति के विद्वान ब्लॉगर है। वे विदेश में होकर भी भारतीय संस्कृति के पुरोधा है। पहले उनके ब्लॉग पर जाकर उनके व्यक्तिव को देखोंउनके सामनें खुद बौने नजर आओगे। आपका दुस्साहस कैसे होता है वैचारिक चर्चा में व्यक्तिगत मिथ्या प्रलाप करने का।
और दीप पाण्डेय जी (विचार शून्य) भी एक विशिष्ठ चिंतक है। उनके मौलिक विचारों को जानिए फिर किसी के बारे में कहनें की हिम्मत करिए।
मेरा ब्लॉग विद्वानों के अपमान के लिए नहीं है। वे विद्वान भी जो मेरे विचारों से विपरित विचार ही क्यों न रखते हो।
मैं नास्तिकों का पूरा सम्मान करता हूँ। बस उनकी विचारधारा पर चिंतन करना ही इस तरह के लेखों का उद्देश्य होता है। किन्तु आप जैसी तुच्छ सोच अगर सभी नास्तिकों की होती हो तो नास्तिकों से घृणा होना स्वभाविक है। आप इस ब्लॉग पर चर्चा के लिये गैर-लायक है। यहाँ दोबारा न रूख न करें।
मैनें आज तक किसी ब्लॉगर का अपमान नहीं किया। आप बिना शर्त अनुराग जी से माफ़ी मांगे। और यहां दोबारा न पधारें।
25 June, 2011 11:24
 सुज्ञ ने कहा
आदरणीय अनुराग शर्मा जी एवं मान्यवर दीप पाण्डेय जी,
मेरी नेट पर अनुपस्थिति में द्वेषी मानसिकता नें मेरे ब्लॉग मंच का उपयोग करके आपके बारे में जो अनर्गल प्रलाप किया उसके लिए मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ।
25 June, 2011 11:33
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हंसराज जी ने धार्मिक धारावाहिकों के अन्दाज में कहा कि दुस्साहस कैसे किया मैंनेऔर एक शाश्वत झूठ जो आस्तिक अक्सर बोलते हैं(कम से कम ब्लाग पर तो जरूर-100 नहीं तो 99 प्रतिशत) कि वे आस्तिक का सम्मान करते हैंयह सरासर झूठ है। इसका सबूत है और आप देख रहे हैं उनके कुछ कुछ चापलूसी भरे वाक्य कि कहीं आका नाराज न हो जायें। मुझे आकाओं से क्यों डर होऔर माफ़ी तो सिर्फ़ एक बात के लिए मांग सकता हूँ क्योंकि और कोई बात गलत ही नहीं है।
सुज्ञ की अन्तिम टिप्पणी मेरे बारे में
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सुज्ञ ने कहा
@”मुझे लगता है कि न केवल ब्लौग जगत में बल्कि सम्पूर्ण समाज में नास्तिकों या अज्ञेयवादियों को पापी और दुष्टात्माओं के रूप में ही जाना जाता है.”
माननीय निशांत जी,
वस्तुतः विद्वज्ञ नास्तिकों को सम्मान ही मिलता हैऔर उनकी वैचारिकता पर मनन भी होता है। किन्तु कईं नव-नास्तिकनास्तिकता में द्वेष युक्त अतिक्रमण करते हैचन्दन कुमार मिश्र जी का उदाहरण आपके सामनें है। इस प्रकार के नास्तिक लॉजिक से चर्चा करनें की जगह ईश्वर का अपमानआस्तिकों को मूर्ख आदि कुटिलता का प्रयोग करने लगते है। इनकी यहीं कुत्सित मानसिकता ‘दुष्टात्मा‘ कहलवाने का सबब बनती है। अन्यथा नास्तिकता और वह भी विभिन्न रूपों में समाज में स्वीकृत है।
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अब एक बात विदेशी भारतीय लोगों के लिए। आपको ऐतराज हो तो जताते रहिए।
भारत में कोई हिन्दी की सौ किताबें लिखे तो कुछ नहीं लेकिन अमेरिका और दूसरे देशों में जाकर एक घटिया किताब भी लिख दे तो सरकार और समाज की नजरों में बड़ा हिन्दी और देश का प्रेमी हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे आप हिन्दी या संस्कृत के महान आचार्य हों तब भी आपकी कोई पूछ नहीं लेकिन दस शब्द जानने वाले अंग्रेजी स्पोकेन कोचिंग चलाने वाले के पास पचास साइकिल तो दिख
ही जाती है।
जैसे भारत में आप की पूछ कोई हो चाहे मत हो लेकिन आप अमेरिका में भोजपुरी सम्मेलन कर लीजिए या पचास लोगों के साथ छठ मना लीजिए तो आप भारत प्रेमी और भारतीय संस्कृति के पुरोधा हो जाते हैं।
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अब निष्कर्षत: सुनिए। मुझे इन सबने मिलकर अज्ञानी(क्योंकि मैं दिद्वानों की सभा के लायक नहीं यानि हंसराज उर्फ़ सुज्ञ सहित यहाँ आने वाले तमाम लोग खुद को विद्वान घोषित करते हैं)दुष्टदुष्टात्माअहंकारीद्वेष युक्ततानाशाही सोच काधर्मविरोधीधर्महन्ताअति-असहिष्णुउल्लू सीधा करनामौकापरस्तआड़ लेनामेरी बातों को फालतूकायर और कुछ कुछ कहा। और खुद को कहीं दोषी नहीं पाते।
अन्त में इतनी बातें बहुत थीं और समय भी लगा लिखने में। और इसको फिर से देखने की फुरसत मेरे पास नहीं है। इसलिए कुछ गलतियाँ टंकण के दौरान हुई होंगी। उस पर ध्यान न दें।
चलते चलते एक श्लोक:
दुर्जन: परिहर्तव्य: विद्ययालंकृतोSपि सन्।
मणिनाविभूषित: सर्प: किमसौ न भयंकर:॥
घबड़ाइए नहीं। अब नहीं आऊंगा।