नन्दी की पीठ का कूबड़ (बाल कहानी)- दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी

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नन्दी की पीठ का कूबड़

दामोदर धर्मानंद कोसाम्बी
हिन्दी अनुवाद: अरविन्द गुप्ता
(प्रोफेसर कोसम्बी द्वारा रचित बच्चों के लिए शायद यह एक मात्र कहानी है। यह कहानी उन्होंने अपने सहयोगी दिव्यभानुसिंह चावडा को, 1966 में, अपनी असामयिक मृत्यु से कुछ दिन पहले ही भेजी थी। यह कहानी किसी भी भाषा में पहली बार प्रकाशित हो रही है।)
(गाँव के वार्षिक मेले का अवसर है। उसमें जानवरों की खरीद-फरोख्त का अच्छा कारोबार होगा। गाँव के मुखिया का बेटा राम, सुबह-सुबह अपने नन्दी बैल को चराने ले जाता है। शाम को नन्दी जानवरों की जलूस की अगुवाई करेगा। जंगल के एक छोर पर तालाब है। धीरे-धीरे वहाँ बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे राम के बहुत से मित्र इकट्ठे हो जाते हैं। वे सभी एक सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करते हैं – भारतीय बैलों के पीठ पर कूबड़ क्यों होता है?)

रामः नन्दी! यह बताओ कि बैलों की पीठ पर ही कूबड़ क्यों होता है? जरा भैंस को देखो। और उधर घोड़े को देखो। उनकी पीठ तो एकदम चपटी है।
तभी राम का कुत्ता मोती दौड़ता और हाँफता हुआ आया। मोती ने कहा, ‘भौं, भौं! क्या तुम्हें पता है – जब मैं बिल्ली को पकड़ने दौड़ता हूँ तो वो अपनी पीठ मेहराब जैसे ऊपर उठाती है। नन्दी की पीठ के साथ भी शायद यही हुआ होगा। उसे किसी ने डराया होगा।उसके बाद मोती और नन्दी पानी पीने चले गए।
टर! टर! टर!मेंढक पानी से कूदते हुए टर्राया। हमारे बहादुर नन्दी को डराना काफी मुश्किल काम है। कुछ दिन पहले शेर ने पूरा दम लगाया फिर भी उसे भगा नहीं पाया। अब सब देखो – मैं कैसे फूलकर कुप्पा होता हूँ। मुझे लगता है कि नन्दी ने मेरी तरह ही अपने कूबड़ में हवा भर ली होगी।
यह सुनकर बूढ़ा नाग, पीपल के पेड़ की जड़ के बिल में से बाहर निकला। हिस! हिस! उसने फुँफकारते हुए कहा, हवा से सिर्फ छाती भरती है, पीठ नहीं। मैंने एक बार मोटा चूहा निगला और फिर मैं पूरे हफ्ते सोता रहा। तब मेरा शरीर भी बीच में फूल गया था। नन्दी ने भी जरूर कोई मोटी चीज निगली होगी।
हा! हा! हा!भालू चीखते हुए जंगल में से बाहर आया। नन्दी हमेशा छोटी-छोटी चीजें ही खाता है। तुम्हें क्या लगता है  उसने एक बड़ा कद्दू निगला है? पिछले साल मैंने मधुमक्खियों के छत्ते से शहद चुराया था। उसके बाद मधुमक्खियों ने मुझे जम कर काटा। उससे मेरा चेहरा एक तरफ बुरी तरह से फूल गया। मुझे लगता है कि हमारे नन्दी को भी किसी ने काटा होगा।
इसी बीच बंदर भी पीपल के पेड़ से कूदता हुआ नीचे आया। खों! खों! खों! देखो इस पेड़ के फल खाने के बाद मेरे नीचे के गाल किस तरह फूल जाते हैं। नन्दी घास चरता है। उसने जरूर उस घास को अपने कूबड़ में उसे छिपाया होगा। छिपी घास को ही वो बाद में धीरे-धीरे करके चबायेगा। देखो वो कैसे घास की जुगाली कर रहा है?’
तुम आखिर एक लालची बंदर की तरह ही बोले,’ राम ने कहा। देखो, नन्दी का कूबड़ हमेशा एक-जैसा ही रहता है। फल खाने के बाद तुम्हारे गाल एकदम पिचक जाते हैं। पर नन्दी का कूबड़ बिल्कुल एक-समान ही रहता है।
नन्दी ने कहा, ‘मुझे लगता था कि जिस प्रकार सभी बैलों के सींग होते हैं वैसे ही सभी बैलों का कूबड़ भी होता होगा। कल मुझे जिला स्तरीय प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार मिला। वहाँ पर यूरोप से लाये कुछ बैल भी थे। मुझे वो बैल कुछ अजीब लगे! उनके न तो सींग थे और उनकी पीठ भी एकदम चपटी, सपाट थी। यूरोप के बैल एक-दूसरे से फुसफुसाकर कह रहे थे, ‘जरा देखो उस कुबड़े बैल को, जिसे पहला ईनाम मिला है! मुझे इस सबके पीछे मनुष्य की ही कारिस्तानी नजर आती है। पीठ में कूबड़ के कारण बैल पर हल का जुआ अच्छी तरह बैठता है। कूबड़ के कारण ही मैं हल और बैलगाड़ी को बेहतर तरीके से खींच पाता हूँ। यूरोप के बैलों ने मुझे बताया – उनके देशों में जुताई के लिए पहले घोड़ों का उपयोग होता था। अब खेतों की जुताई मशीनों द्वारा की जाती है।
राम ने इससे असहमति जतायीः इस पुस्तक के अनुसार भगवान शिव नन्दी की सवारी करते हैं। भगवान ने नन्दी की पीठ पर कूबड़ इस लिए बनाया जिससे वो उसपर झुककर कुछ आराम कर सकें। देखो, इस चित्र में भगवान कितनी आसानी से नन्दी पर सवारी कर रहे हैं। हमारे गाँव का कुलदेवता तो स्वयं यह पीपल का पेड़ है। चलो, अब पीपल के पेड़ से ही नन्दी के कूबड़ का कारण पूछते हैं।
बूढ़े पीपल के पेड़ ने उत्तर दियाः नन्दी ने सही ही कहा। मनुष्य ने बैलों को अपने लिए बनाया है। इंसानों ने ही मोती जैसे कुत्ते बनाए हैं। इंसानों ने ही धान और गेहूँ बनाया है। साथ-साथ, मनुष्य ने खुद को भी बनाया है।
रामः यह कैसे सम्भव है? हमारा नया घर पिछले वर्ष बना था। कई लोगों ने उसे मिलकर बनाया था। उसके लिए पेड़ों को काटा गया। फिर लट्ठों और तख्तों को लम्बाई में काटा गया। इसके लिए कई लोगों को मेहनत करनी पड़ी। उसके बाद पूरे फ्रेम को कीलें ठोक कर जोड़ा गया। मैंने छत पर फूस बिछाने में अपने पिताजी की मदद की। परंतु हमने नन्दी को कैसे बनाया? वो छोटे बछड़े जैसा पैदा हुआ था और तभी से उसके पीठ पर कूबड़ है। दो साल पहले मोती एकदम छोटा पिल्ला था। मैंने बस इतना ही किया। माँ से निगाह बचाकर अपनी थाली में से मोती को कुछ अपना खाना खिलाया। हमने तो मोती को कुत्ता नहीं बनाया। अनाज पैदा करने के लिए हमने खेत में सिर्फ बीज बोए। इससे, बस चार महीने में हमें उसी प्रकार का बहुत सारा और अनाज मिला। हमने तो वो अनाज नहीं बनाया।
पीपल का पेड़ः राम तुम एक बहुत होशियार लड़के हो। यही सीखने का अच्छा तरीका है – बस प्रश्न पूछते रहो। तब तक प्रश्न पूछो जब तक तुम सच की जड़ तक नहीं पहुँचो। अब ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें वही बताने जा रहा हूँ जिसे मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। आज से हजारों साल पहले मनुष्य लगभग उसी तरह रहते थे जैसे आज तुम्हारा मित्र बंदर रहता है। वे भोजन और फलों के लिए पेड़ों पर चढ़ते। वो बेर और कुकुरमुत्ते तोड़ते। वे जमीन के अंदर से कंद खोदकर निकालते। मनुष्य बिल्कुल भालू की तरह ही शहद इकट्ठा करते। वे कभी-कभी भालू की तरह ही अपने पंजों से मछलियों का शिकार करते। वे मांस के लिए अन्य जानवरों का शिकार करते। तब न तो आग थी, न हल और न ही घर और झोपडि़याँ। तब गाँव भी नहीं थे। फिर ग्राम देवता का सवाल ही पैदा नहीं होता है। लोग इधर-उधर से भोजन एकत्र कर अपना जीवन चलाते थे। परंतु अब लोग अपना भोजन उगाते हैं।
रामः पर अगर हम इस प्रकार जी सकते थे तो फिर हमने क्यों भोजन उगाया? देखो मेरे पिता और बड़ा भाई खेतों पर कितनी मेहनत करते हैं। क्या हम इतनी मेहनत किए बिना जिन्दा नहीं रह सकते?’
पीपल का पेड़ः हर समय पर्याप्त मात्रा में भोजन इकट्ठा करना सम्भव नहीं होता है। कभी-कभी सूखा पड़ता है जिससे नदी-नाले सूख जाते हैं। मछलियाँ मर जाती हैं। शिकारी जानवर दूर-दराज चले जाते हैं। फल भी नहीं मिलते हैं। एक बात और है – पूरे साल भर चीजें इकट्ठी करना सम्भव नहीं होता है। इंसान को भोजन इकट्ठा करके उसे संभाल-संजोकर रखना सीखना पड़ा। बारिश के बाद की फसल अक्सर बहुत अच्छी होती है। आप पूरे साल उस फसल का अनाज खा सकते हैं। अगर अधिक उपज होगी तो उससे ज्यादा लोग जीवित रह पायेंगे। मैं अपनी सबसे ऊपर की टहनी से पाँच बड़े गाँवों को देख सकता हूँ। पुराने जमाने में इस पूरे इलाके में मुझे पाँच लोग भी नजर नहीं आते थे।
रामः ठीक है। पर लोगों ने मेरे मोती जैसे कुत्ते क्यों बनाए?’
पीपल का पेड़ः पुराने जमाने में शिकार के समय भेड़िये भी आदमियों की तरह शिकार का पीछा करते थे। यह देख मनुष्यों ने कुछ भेडि़यों के बच्चों को पाला। इनमें से अधिकतर बड़े होकर दुबारा जंगली भेड़िये बने और चले गए। परंतु उनमें से कुछ मनुष्यों के साथ रहने लगे। वे लोगों के लिए शिकार का पीछा करने लगे। इसके बदले में लोग उन्हें बचा हुआ मांस और हड्डियाँ खाने को देते। इस प्रकार जंगली भेड़िये पालतू बने। अब हम उन्हें कुत्ते के नाम से जानते हैं।
रामः मुझे खुशी है कि लोगों ने ऐसा किया। अगर मोती नहीं होता तो मैं भला क्या करता? परंतु नन्दी की पीठ पर कूबड़ किस तरह आया? शायद वो शुरू से ही था। मुझे अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला।
पीपल का पेड़ः मनुष्यों के लिए जंगली हिरणों का लगातार पीछा करना काफी कठिन काम था। गाय-बैल भी जंगली जीव थे। परंतु वो धीमी गति से चलते थे। मनुष्य मांस के लिए उनका पीछा करते। कुछ समय बाद उन्होंने मोती की तरह ही कुछ गाय-बैल के बछड़ों को भी पालतू बनाया। इसके लिए उन्होंने सबसे तगड़े बछड़ों को चुना। उनमें से कुछ की पीठ पर छोटा कूबड़ था। कूबड़ के कारण लोगों को अधिक मांस मिलता था। इसके लिए वो लगातार कूबड़ वाले बछड़ों को चुनते रहे और उन्हें भरपेट खाने को देते रहे। इससे धीरे-धीरे कूबड़ बड़ा होने लगा। मनुष्यों को कूबड़ वाले गाय-बैलों को पालतू बनाना ज्यादा आसान लगा। गायें दूध देतीं। अब धीरे-धीरे लोग शिकार करने की बजाए गाय-बैल पालने लगे। इस तरह धीरे-धीरे नन्दी जैसे, बड़े कूबड़ वाले बैल विकसित हुए।
रामः यह तो बहुत होशियारी की बात है। पर यह अनाज कैसे विकसित हुए?’
पीपल का पेड़ः सदियों पहले मैंने लोगों को भूख मिटाने के लिए पत्ते और घास के बीज खाते हुए देखा था। इसके अलावा खाने को कुछ और नहीं था। धीरे-धीरे उन्होंने सबसे मोटे बीजों को छाँट कर अलग किया। सभी घासें एक-जैसी नहीं होती हैं। लोगों ने पाया कि अच्छी घासें सबसे मुलायम और नर्म मिट्टी में ही अच्छी उगती हैं। मुलायम मिट्टी सभी जगह नहीं मिलती है। परंतु अगर कंद को एक नुकीली छड़ से खोदकर निकाला जाए तो अगले साल उस जगह पर अच्छी घास उगेगी। इसी कारण लोगों ने मोटी घास के बीजों को बोने के लिए जमीन में गड्ढे खोदने शुरू किए। लोग अगली फसल के लिए हमेशा सबसे मोटे बीज ही बोते।
रामः हम अनाज के बीजों को तो इस तरह नहीं बोते हैं। हम हल से खेत जोतते हैं। लोगों ने हल का उपयोग करना कैसे सीखा?’
पीपल का पेड़ः इसे सीखने में उन्हें बहुत समय लगा। पहले उन्होंने नुकीली छड़ से जमीन की सतह को खुरचा। परंतु उससे कोई खास फायदा नहीं हुआ। वैसे, कच्चा अनाज खाने में बहुत अच्छा नहीं होता। इसके लिए इंसान ने आग की जानकारी हासिल की। शुरू में उन्हें जंगल की भीषण आग से डर लगता था। वे आग और जंगली जीवों को देखकर डर से भागते थे। फिर उन्होंने खाना पकाना सीखा। वे आग से मिट्टी के बर्तन पका पाये। जमीन की गहरी जुताई के लिए उन्हें ऐसी चीज की जरूरत थी जो अधिक ताकत से खींच सके। तब उन्होंने हल के टेढ़े फल को खींचने के लिए बैलों का इस्तेमाल करना शुरू किया। हल को खींचने के लिए मनुष्य को बड़े जानवरों की जरूरत थी। इसलिए उन्होंने जानवरों को मांस के लिए मारना बंद किया। इस प्रकार उन्हें नन्दी जैसे बढि़या और ताकतवर बैल मिले।
रामः जरा कल्पना करो मेरे नन्दी को मारने की! कितनी बेवकूफी की बात है। पर अभी आपने मनुष्य द्वारा खुद अपने निर्माण का जिक्र किया था।
पीपल का पेड़ः मैंने अभी तुम्हें बताया कि किस प्रकार मनुष्य को आग ने भयभीत करना बंद किया। शुरू में लोग आग को भगवान के रूप में पूजते थे। धीरे-धीरे इंसानों ने आग बनाना सीखी। इसके लिए उन्होंने दो सूखी लकडि़यों को आपस में रगड़ा। फिर उन्होंने मुझे और नन्दी को पूजना शुरू किया। हमने मनुष्य को भोजन दिया। मेरे फल अभी भी खाने योग्य हैं। परंतु अब लोगों को मेरे छोटे भाई अंजीर के फल ज्यादा स्वादिष्ट लगते हैं। अंजीर आकार में बड़ी और मीठी होती हैं। वैसे अंजीर का पेड़ छोटा और कमजोर होता है। उसे अच्छी मिट्टी की जरूरत होती है। और साथ में ढेर पानी की भी। जंगल की सफाई, कटाई हुई। लेकिन मैं भाग्यवश बच गया। कई बार जंगल में आग लगी और मेरे परिवार के तमाम सदस्य मारे गए। मैं कई बार बाल-बाल बचा। लोग आज भी आग, नन्दी और मेरी पूजा करते हैं। पर अब यह पूजा-उपासना कम हो रही है। हमने मनुष्य को नहीं बनाया। मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ।
रामः फिर किसने बनाया?’
पीपल का पेड़ः वर्तमान मनुष्य को खुद उसने ही बनाया है। शुरू में वो छोटा और बंदर जैसा अच्छा दोस्त था। परंतु वो निस्सहाय था। आग के बाद उसने धातुओं को खोजा। पहले तांबा। फिर लोहा। उससे पहले मनुष्य ने पत्थरों के औजार बनाए। लोगों ने शिकार के लिए तीर-कमान बनाए। उन्होंने भोजन को संचित कर सुरक्षित रखने के लिए टोकरियाँ और चमड़े के थैले बनाए। मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल बनाए। इस प्रकार लोगों को अधिक भोजन मिल पाया। खेती-बाड़ी की कठिन मेहनत ने मनुष्य को बलवान बनाया। लोग अपने सिर पर भारी बोझ ढोने लगे। इस कारण लोग सीधे खड़े होकर चलने लगे। लोगों ने झोपडि़याँ और घर बनाये। वे कपड़े पहनने लगे। पुराने जमाने में कई बड़े-बूढ़े मनुष्य भी मेरी छाँव तले नंगे रहते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम बचपन में नंग-धड़ंग घूमते थे।
रामः गर्मी के दिनों में मुझे अभी भी कपड़े बिल्कुल नहीं सुहाते हैं। परंतु मेरी माँ मुझे नंग-धड़ंग दौड़ने से मना करती हैं। अब मुझे आप एक बात और बतायें। यह भगवान कब आये?’
पीपल का पेड़ः पहले लोगों ने चीजों के उगने के बारे में जाना। उन्होंने उगती चीजों को अपने उपयोग के लिए इकट्ठा किया। इससे लोगों को लगा कि सभी चीजों को कोई महान माता जन्म देती है। हम अभी भी कहते हैं, ‘पृथ्वी हमारी माता है।फिर इंसान ने इकट्ठी की गई चीजों से कहीं ज्यादा चीजें खुद बनाना सीखीं। तब उसने सोचा, ‘मुझे भी किसी ने बनाया होगा?’ तब इंसानों ने भगवान को जन्म दिया। लोगों ने कहा, ‘भगवान ने हर चीज बनायी है।परंतु मुझे असली सच पता है। मैं मनुष्य के सभी भगवानों से अधिक बूढ़ा हूँ। मैंने मनुष्य को स्वयं खुद का निर्माण करते हुए देखा है। उसे अभी इस काम को और आगे बढ़ाना है। वो कभी-कभी मनुष्य जाति के अन्य लोगों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार करता है।
अब शाम ढलने लगी थी। राम की माँ एक टोकरी में लाल फूल लेकर आयीं। उन्होंने टोकरी को तालाब के किनारे रखा। फिर उन्होंने बूढ़े पीपल के पेड़ के सामने झुक कर उसका नमन किया। राम की मित्र मंडली वहाँ से खिसक ली। माँ ने कहा, राम, इधर आओ। जल्दी तैयार हो। आज रात को नन्दी को जलूस में सबसे आगे रहना है। तुम्हें पता है कि नन्दी अन्य गाय-बैलों से पहले पैदा हुआ था। चलो, नन्दी को घर ले चलकर उसे सजायें।
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भारत में बौद्ध धर्म की क्षय – दामोदर धर्मानंद कोसांबी

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     अजीब हालत है। एक तरफ धर्म के नाम पर भयानक खून-खराबा भी होता है, और दूसरी तरफ ध्यान से देखने पर सभी धर्म एक जैसे लगते हैं। साफ है कि धर्मों की बुनियाद कहीं और है- शायद धर्मों से बाहर। यह छोटी-सी किताब इस गहरे रहस्य को कुछ-कुछ समझने में मदद देगी।

      यह सबको मालूम है कि ईसा पूर्व 1750 के आस-पास आर्य भाषा-भाषी कबीले भारत आने लगे और यहाँ बसने लगे। आर्य भाषी कबीलों का धर्म प्रकृति शक्ति के देवताओं पर आधारित था और यह धर्म भारत का भी धर्म बन गया। ईसा पूर्व 800-900 के आसपास लोहे के हल से खेती शुरू हुई, और ईसा पूर्व 500 के आसपास जैन और बौद्ध धर्म नए धर्म के रूप में पैदा किए गए जो आर्य धर्म से अलग थे। बौद्ध धर्म पूरे देश में फैल गया, और देश से बाहर चीन, जापान, बर्मा, दक्षिणपूर्व एशिया से इन्डोनेशिया तक फैल गया। चन्द्रगुप्त, अशोक, हर्षवर्धन जैसे बड़े-बड़े सम्राटों ने इस धर्म को अपनाया। यह धर्म लगभग 1500 वर्षों तक भारत का धर्म रहा। मगर 900-1000 ईसा पश्चात तक आते-आते बौद्ध धर्म बाहरी दुनिया में फला-फूला मगर भारत में मिट गया। क्यों?
      यह एक प्रख्यात ऐतिहासिक रहस्य है जिससे कई विद्वान समय-समय पर जूझते रहे हैं। एक ऐसे विद्वान हुए हैं- डी.डी.कोसांबी, जो आधुनिक भारत में इतिहास शास्त्र के जनक माने जाते हैं। इस किताब में उनका इस विषय पर एक महत्वपूर्ण लेख दिया जा रहा है।
      इस किताब को पढ़कर हमें भारत में बौद्ध धर्म की क्षय को समझने में मदद तो मिलेगी ही, साथ ही साथ धर्म की बुनियाद और आजकल के धर्मयुद्धों के असली कारणों का भी पता चलेगा।
      हम शायद यह भी समझ पाएँगे कि वर्तमान धर्मयुद्ध मानव इतिहास के आखिरी धर्मयुद्ध हैं, क्योंकि ये युद्ध असल में धर्म के मुखौटे लगाए हुए, भौतिक युद्ध हैं और समाज में भौतिक टेढ़ेपन को समाप्त करने के बाद ही ये युद्ध समाप्त होंगे।
संपादक
भारत में बौद्ध धर्म की क्षय
      चीनी यात्री ह्वेन सांग (630 ईसा पश्चात) ने अपनी भारत यात्रा के दौरान जब देखा कि, भारत की इस भूमि में बुद्ध की अनेक मूर्तियाँ क्षत-विक्षत स्थिति में दबी पड़ी हुई हैं तो उसने भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि, उस महान शिक्षक द्वारा स्थापित धर्म तथा उनकी शिक्षाएँ शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगी। बंगाल के शासक शशांक ने बौद्ध प्रतिमाओं को ध्वस्त कर दिया था। यहाँ तक कि उस पवित्र बोधिवृक्ष को काटकर जला दिया था, जिसके नीचे बैठकर बुद्ध को 12 सदियाँ पहले ज्ञान प्राप्त हुआ था।
      बाद में सम्राट अशोक के अंतिम वंशज पूमावर्मन ने उस बोधिवृक्ष की एक टहनी का पता लगाया और उसे लगाकर पल्लवित और पोषित किया। इसी प्रकार सम्राट हर्ष ने बंगाल के शासक शशांक को पराजित करके बौद्ध धर्म से संबंधित नष्ट हुए प्रतिष्ठानों का पुनरूद्धार किया तथा कई नए मठों और विहारों का निर्माण किया। हजारों बौद्धभिक्षु इन्हीं मठों में रहा और पढ़ा करते थे। उच्चस्तरीय शिक्षा प्रदान करने वाला समृद्ध नालंदा विश्वविद्यालय अपनी प्रतिष्ठा के चरम पर था। सब ठीक लगता था।
      क्षति अन्दरूनी कारणों से हुई। धीरे-धीरे बौद्ध धर्म के पतन की शुरुआत होने लगी। चीनी यात्री  ह्वेन सांग की रिपोर्ट की बातें सच साबित होने लगी। हालांकि स्वयं ह्वेन सांग को भी इस बात का भान नहीं होगा कि उसकी भविष्यवाणी इतनी जल्दी सच होगी, जब उन्होंने लिखा था-
      “इस काल में, ऐसे बौद्ध विद्वान जो बौद्ध धर्म की पावन रचनाओं की तीन शिक्षाओं की व्याख्या कर सकते थे, उनकी सेवाओं के लिए विभिन्न प्रकार के सेवकों को नियुक्त किया जाता था। उसे हाथी वाहन दिया जाता था। जो छह शिक्षाओं की व्याख्या करता था उसे सशस्त्र रक्षक दल दिया जाता था। जो सभासद परिमार्जित भाषा में अपने विचार (तर्क-वितर्क) प्रस्तुत करता था, सघन अध्येयता होता था तथा अपने विषय में माहिर होता था एवं तार्किक होता था, उसे बहुमूल्य आभूषणों से सजे हाथी में बिठाया जाता था। उसके लिए मठों के द्वार सदा खुले रहते थे। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति अपने तर्कों में असफल हो जाता था, तुच्छ और अश्लील मुहावरों का प्रयोग करता था या तार्किक नियमों की अवहेलना करता था तो उसके चेहरे पर लाल तथा सफेद रंग पोत दिया जाता था और उसके शरीर पर धूल तथा मिट्टी का लेप लगा दिया जाता था। या उसे रेतीली जगह पर गहरे खंदक में छोड़ दिया जाता था। इस प्रकार योग्य और अयोग्य, बुद्धिमान तथा मूर्ख की पहचान की जाती थी।” यह किस हालत के लक्षण थे?
      बुद्ध के समय में योग्यता निर्धारण की यह प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती थी। हमेशा भ्रमण करने वाले बौद्ध भिक्षुओं का कार्य सरल शब्दों में तथा आम भाषा में धर्मपरायणता (सदाचार-संयम) का प्रसार करना था। समृद्ध मठ उन साधारण ग्रामीणों की चिंता नहीं करते थे जिनके श्रम के उत्पादों पर ही इन मठाधीशों की ऐय्याशी चलती थी, और आडंबरी शास्त्रार्थ होते थे।
      बुद्ध द्वारा संचालित नियमों, संयमों और उनके अनुपालन को ध्यान में रखते हुए बौद्ध भिक्षुओं को साधारण वेश-भूषा में रहने की अनुमति थी। उन्हें सोने और चांदी के आभूषणों को छूने तक की मनाही थी। जबकि, बाद में अजंता की बुद्ध मूर्तियों के सिर पर आभूषण दिखाए गए हैं, या उन्हें बहुमूल्य आसन पर बैठा दिखाया गया है!
      बौद्ध धर्म के विचारों से प्रभावित होकर ही सम्राट अशोक ने रक्त-पात का रास्ता छोड़ दिया था और वह शांति-प्रिय हो गया था। उसने फरमान निकाल दिया था कि आगे सेना का उपयोग सिर्फ समारोह और परेड के दौरान ही किया जाएगा। धर्मपरायण सम्राट हर्ष ने बौद्धवाद के साथ किसी तरह अपनी युद्धनीतियों के समाधान की व्यवस्था की थी। उसी तरह वह बाद में भगवान सूर्य और महेश्वर, दोनों का आराधक हो गया था। हर्ष की सेना में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई। उसकी सेना में 60 हजार हाथी, 1 लाख घुड़सवार तथा बड़ी संख्या में पैदल सेना थी। वह बौद्ध था, यहाँ तक कि उसकी खुद की हत्या करने आया हत्यारा पकड़ा गया, और दरबारी लोग एकत्र होकर उसके लिए मृत्युदंड की सजा की माँग रहे थे, तो सम्राट हर्ष उसे छोड़ देने के हिमायती थे। जबकि आम जनता जो युद्धों में जान देने के लिए मजबूर थी और चाहती थी कि लड़ाइयां कम लड़ी जाएँ, ताकि जन-धन की क्षति न हो हर्षवर्धन का इनसे कोई वास्ता नहीं था।
      दूसरे शब्दों में, बौद्धवाद बहुत खर्चीला साबित हुआ। असंख्य मठ और उनमें रहने वाले ऐय्याशों पर, और सैनिकों पर, दोहरी लागत आने लगी। अपने प्रारंभ काल से ही बौद्धवाद एक सार्वभौमिक राजतंत्र के विकास का हिमायती था जो छोटे-मोटे युद्धों को रोकता था। स्वयं बुद्ध चक्रवर्ती थे, वे राजा के अध्यात्मिक प्रतिरूप थे। किंतु ऐसी महान विभूतियों ने जिन साम्राज्यों को चलाया वे बहुत महँगी व्यवस्थाएँ साबित हुई। भारत में हर्ष इस प्रकार के अंतिम सम्राट थे। इसके बाद छोटे-छोटे टुकड़ों में राज्यों का विभाजन हो गया। यह प्रक्रिया नीचे से उपजी सामंतवादी व्यवस्था के उदय तक चलती रही। धीरे-धीरे प्रशासन सामंती तंत्र के हाथों में चला गया। इस व्यवस्था का जन्म, भूमि पर संपत्ति के नए उपजे अधिकारों को लेकर हुआ।
      गाँवों ने साम्राज्यों और उनसे जुड़े संगठित धर्म को खंडित कर दिया। अब अपने में परिपूर्ण गाँव उत्पादन तंत्र के मानक बन गए। करों की वसूली मुद्रा के बजाय वस्तुओं में होने लगी क्योंकि खपत भी स्थानीय थी। दूरगामी व्यापार की गुंजाइश कम थी। इसलिए आपसी टकराहट भी नहीं होती थी।
      मध्यकालीन भारतीय परिस्थितियों में खाद्य और कच्ची सामग्री को दूरस्थ स्थानों में पहुँचाने के लिए परिवहन की व्यवस्था नहीं थी। सम्राट हर्ष ने अपने पूरे साम्राज्य का भ्रमण किया था, उसके दरबारी और सैनिक भ्रमण में साथ होते थे। चीनी तीर्थ यात्री ने लिखा है कि भारतीय लोग व्यापार में सिक्कों का उपयोग नहीं करते थे। इस काल में वस्तु विनिमय की प्रथा थी। प्रमाण के तौर पर देखा जा सकता है कि हर्ष काल के कोई सिक्के उपलब्ध नहीं हैं। इसके विपरीत मौर्यकालीन पंचमार्का वाले सिक्कों की भरमार पाई जाती है।
      प्रारंभ में बौद्धधर्म बहुत सफल रहा, क्योंकि तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में यह सफल रहा। ईसा पूर्व छठी शदी के गांगेय क्षेत्र का समाज अपने में परिपूर्ण शांतिमय गाँवों के रूप में संगठित नहीं था। आबादी बहुत कम थी। किंतु वह भी आपस में लड़ते हुए अर्ध जनजातीय प्रदेशों में बंटी हुई थी। कई जनजातियां ऐसी थी जो हल जोतकर कृषि उत्पादन काम नहीं करती थी। वैदिक ब्राह्मणवाद चरागाही संस्कृति वाले आसपास के पड़ोसी कबीलों के साथ लगातार युद्ध में लगे कबीलों के लिए उपयुक्त था। उभरती कृषि अर्थव्यवस्था के विकास में पशुबलि की प्रथा बाधक हो गई थी। मौर्यपूर्व व्यवस्था में धातु, नमक और कपड़े का व्यापार लंबी दूरी तक अपेक्षित था किंतु सक्षम राज्य के संरक्षण के बिना ऐसा संभव नहीं था। अतः आदिवासी समूहों और सार्वभौमिक साम्राज्य के बीच की दूरी को तय करने के लिए एक नए सामाजिक दर्शन की आवश्यकता थी।
      सार्वभौमिक राजतंत्र और सार्वभौमिक समाजिक धर्म समानांतर थे, यह इस बात से साबित हो जाता है कि उसी समय मगध का उदय हुआ। न केवल बौद्धधर्म बल्कि मगध राज्य के कई समकालीन मत- चाहे वे जैन हों, आजीविक हों, सभी वैदिक यज्ञों और पशुबलि का विरोध कर रहे थे। बौद्धधर्म वन्य देश और जंगली आदिवासियों के क्षेत्रों में बढ़ते व्यापार को संरक्षण दे रहा था। प्राचीन व्यापार मार्गों जूनार, कार्ला, नासिक, अजंता के स्मारक और अवशेष इस बात को प्रमाणित करते हैं।
      बौद्धधर्म का सभ्यता-निर्माण का काम ईसा की सातवीं सदी तक खत्म हो गया था। अहिंसा का सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से स्वीकार तो कर लिया गया था किंतु व्यवहार में उसका पालन नहीं हो रहा था। वैदिक पशु बलिप्रथा समाप्त हो गई थी। कुछ छोटे-छोटे राज्य इसके अपवाद थे किंतु इन पुनर्जागरणवादी प्रयासों का सामान्य अर्थव्यवस्था पर बहुत कम प्रभाव पड़ रहा था।
      अब नई समस्या थी गाँवों के किसानों पर अत्यधिक ताकत न इस्तेमाल करते हुए उनको दब्बू बनाए रखने की। इस शिक्षा का काम धर्म ने संभाल लिया। लेकिन बौद्धधर्म ने नहीं। अब गाँवों में वर्ग संरचना जाति के रूप में उजागर होने लगी, और बौद्धधर्म हमेशा जाति से नफरत करता था।
      आदिवासी नई उपजातियों में शामिल कर लिए गए। आदिवासी और कृषकवर्ग कर्मकांडों के जंजाल में फंसने लगा, जिसे बौद्धभिक्षुओं ने निषिद्ध कर दिया था। कर्मकांडों पर ब्राह्मणों का एकछत्र अधिपत्य स्थापित हो गया।
      इस समय ब्राह्मण पथप्रदर्शक के रूप में सामने आया, और उत्पादन के लिए प्रेरक की भूमिका निभाने लगा। क्योंकि खेतों की जुताई, बीज बोने, तथा फसल उगाने का मुहूर्त कब होगा, आदि इन सबके समय तय करने का पंचाग उनके पास रहता था। पंडित नई फसल और व्यापार की संभावनाओं की विधि बताने लगे। ब्राह्मण उत्पादन पर बोझ नहीं बनता था जैसा कि उसके वैदिक पूर्वज या बौद्धमठों द्वारा किया जाता था। इस काल में बुद्ध को विष्णु का ही अवतार मानकर समझौता किया गया। इसलिए औपचारिक बौद्धधर्म धीरे-धीरे लुप्त होने लगा।
किंतु बौद्धधर्म की महत्वपूर्ण शिक्षा का ह्रास नहीं होना चाहिए- अच्छे विचारों के लिए हर व्यक्ति को अपने दिलो-दिमाग के पोषण और प्रशिक्षण की जरूरत होती है, जैसे अच्छे गायन के लिए गले का रियाज और अच्छी दस्तकारी के लिए हाथों का अभ्यास जरूरी है। लेकिन विचारों का मूल्य और महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि उनसे कितनी सामाजिक प्रगति हो पाती है।
भारत ज्ञान विज्ञान समिति से प्रकाशित एवं धर्मानंद दामोदर कोसांबी के पुत्र दामोदर धर्मानंद कोसांबी द्वारा लिखित किताबभारत में बौद्ध धर्म की क्षय‘, 2007