प्रभात प्रकाशन मतलब भाजपा-जदयू का प्रकाशन…राष्ट्रीय पुस्तक मेला, पटना से लौटकर

7 टिप्पणियाँ

इस बारह तारीख को पुस्तक मेले में गए। बहुत अच्छा तो नहीं कह सकते लेकिन अच्छा ही लगा। वैसे भी पुस्तक मेले में पाठक को किताब लेकर पढ़ने-देखने की जितनी छूट दुकानदार देते हैं, उतनी दुकान में तो देते नहीं। नेशनल बुक ट्रस्ट और बिहार सरकार ने मिलकर पुस्तक मेला आयोजित किया है। पटना पुस्तक मेला भी जल्द ही लगेगा। सरकारी प्रकाशनों की किताबें भी खूब महँगी हुई हैं। अकादमियाँ भी किताब इतने कम दाम में बेचती हैं कि आम आदमी के खरीदने का सवाल ही नहीं उठता।
      विज्ञापनबाजी और करियर के नाम पर दुकानें धीरे-धीरे पुस्तक मेले में बढ़ती जा रही हैं। और पर्चियाँ भी पाठकों को पकड़ा ही दी जाती हैं। लोगों की जेब और हाथ में पर्चियाँ कैसे ठूँस या पकड़ा दी जाती हैं, इसपर दो-तीन साल पहले का एक कार्टून जरूर याद आ जाता है, जो सम्भवत: हिन्दुस्तान में छपा था। वह खोजने पर मिल नहीं रहा। हालाँकि मैं पोस्टरों, पर्चों से दूर रहता हूँ, विज्ञापन कुछ ठीक नहीं लगता। विज्ञापन पर कुछ विचार रखूंगा कभी।

      हाँ, तो रपट लिखने-विखने हमें आती नहीं। इसलिए सीधे बात पर आते हैं।

एक कोई पत्रकार महाशय (नाम रत्नेश था शायद) भाषण दे रहे थे। कह रहे थे कि कुछ दिन पहले उनसे निबन्ध लिखवाने के लिए किसी ने उनको दो-ढाई सौ किताबें दीं, और वह भी 3-400-500 पेज(उन्होंने पेज ही कहा था) की सब। और जनाब 4-5 महीने में सब पढ़ गए और धमाकेदार निबन्ध लिख गए। सम्भवत: मौर्य टीवी(प्रकाश झा का है) में काम करते हैं। ऐसे ही लग रहा है कि सफेद झूठ झाड़ रहे हैं।
      जयप्रकाश नारायण पर पढ़नेवालों के लिए सस्ता साहित्य मंडल ने कुछ कृपा की है। वहाँ से काफी कम कीमत पर जयप्रकाश पर कुछ पढ़ने-सोचने को मिल रहा है।
      बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी पुरानी किताबों पर नए दाम की मुहर लगाकर किताबें बेच रही हैं। एक चीज पर ध्यान गया और मैंने अकादमी वालों से कहा भी। दर्शनशास्त्र की कोई किताब थी। लेखक- हरिमोहन झा। मैथिली के स्वनामधन्य साहित्यकार। उनकी खट्टर काका का कोई जवाब नहीं। उसके कुछ अंश संशयवादी विचारक पर आप पढ़ सकते हैं। हाँ, तो किताब फिर से छपी है और उसपर लेखक के बारे में लिखा है कि सम्प्रति वे पढ़ा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि उनकी मृत्यु 1985 में ही हुई थी। और किताब का नया संस्करण भी इधर आया है। लेकिन अकादमी के लोगों को इससे भी मतलब नहीं कि लेखक जीवित है या मृत और उसका पता भी किताब में छाप गये।
      और सब अपनी किताबें बेच रहे हैं, उनपर अधिक नहीं कहना है। प्रभात प्रकाशन के बारे में जरूर कुछ कहना है। वहाँ, मैं बोल रहा हूँ सिरीज की किताबें आई हैं, जैसे- मैं तिलक बोल रहा हूँ, मैं विवेकानन्द बोल रहा हूँ, मैं भगतसिंह बोल रहा हूँ आदि। आश्चर्य तो तब हुआ जब उस सैकड़ों पन्ने की किताब में अलग-अलग विषयों पर सूक्तियों की तरह बहुत सारे वाक्य पढ़ने को मिले। लेकिन ईश्वर, समाजवाद, नास्तिकता, आस्तिकता आदि पर कुछ नहीं था। अब कोई बताए कि जब किसी विचारक की किताब में सैकड़ों विषयों पर उसकी बातें रखी जा रही हैं तब इन विषयों या बिन्दुओं को क्यों छोड़ा गया है? वामपंथ की आलोचना पर भी किताबें दिखी। निश्चय ही आलोचना भी एक आवश्यक चीज या विधा है। लेकिन वहाँ भाजपा या संघ के लोगों द्वारा घृणात्मक और राजनीतिक आलोचना ही दिखी। नीतिन गडकरी, आडवाणी, जसवंत सिंह, अरुण शौरी सहित सब भाजपाइयों की किताबें दिखीं। कलाम को छापकर भी प्रभात ने भाजपाई होने का ही प्रमाण दिया था। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश की बिहार पर किताबें हैं, जिसमें नीतीश कुमार का यशोगान किया गया होगा, मैंने देखा तो नहीं लेकिन लगा ऐसा ही। स्वयं नीतीश की किताब भी है। मतलब साफ कहें तो मुझे लगा कि प्रभात प्रकाशन मतलब भाजपा-जदयू…
इससे अधिक नहीं कहना है कुछ…बहुत कुछ लिखा जा सकता था लेकिन मेरे वश का नहीं है फिलहाल…
      

पैसा, वेतन, बिहार सरकार, आडवाणी की यात्रा …गड्डमड्ड बातें बिहार की ( दूसरा और अन्तिम भाग )

4 टिप्पणियाँ

(पैसा, वेतन, नीतीश कुमार, बिहार सरकार, प्रभात खबर, अंग्रेजी, निजी स्कूल, संसद, सांसदों के वेतन, आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी जनचेतना यात्रासब कुछ गड्डमड्ड हैं इस लेख में। इस लेख में सुसंगठित होना मेरे लिए सम्भव नहीं था। इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ।)

पिछले भाग के बाद
निजी स्कूलों का पंजीयन और उनकी ताकत

कैसे पूँजी की ताकत सत्ता को या सरकार को उसकी औकात बताती है, उसका नमूना बिहार में इन दिनों निजी स्कूल हैं। बिहार सरकार ने सभी निजी शिक्षण संस्थानों को पंजीयन के लिए कुछ दिनों का समय दिया था। खबर है कि पटना जिले के दस प्रतिशत स्कूलों ने भी पंजीयन नहीं कराया है और यही हाल कमोबेश सभी जिलों का है। सरकार को सीधे चुनौती देने का काम किया है इन सबने। और हमारी प्यारी बिहार सरकार पता नहीं कौन-सा खेल कब खेलती है
और सोचने की बात यह है कि निजी स्कूलों की मासिक फीस दो-चार सौ लेकर हजार-दो हजार तक है। लेकिन हमारी महान सरकार पंजीयन के लिए ली जा रही जानकारी में पैसे को छोड़कर सारी जानकारी माँग रही है। जैसे बच्चे कितने हैं, कमरे कितने हैं आदि। लेकिन बच्चों का, उनके अभिभावकों का जो आर्थिक शोषण जारी है, उसके लिए सरकार ने शायद(शायद इसलिए कि अभी तक सुनने को नहीं मिला है कि पैसे की बात सरकार पूछ रही है। अगर पूछा भी तो साल में पाँच सौ-हजार रूपये सरकार को दे देंगे ये सब, चंदा या भीख समझकरसरकार भी निश्चिन्त और ये संस्थान भी) कोई सवाल पूछे नहीं और गलती से पूछ भी ले तो इस अन्दाज में कि इन संस्थाओं के मालिक परेशान न हों।
यहाँ विरोधाभास है कि निजी संस्थान पंजीयन करा भी नहीं रहे, सरकार पैसे या फीस के बारे में कुछ पूछ भी नहीं रही। फिर माजरा क्या है?…फिलहाल तो यह बात समझ नहीं आ रही।
+2 स्कूलों के माध्यम से बिहार सरकार ने किया क्या   

लगभग छह सौ उच्च विद्यालयों को सरकार ने उत्क्रमित कर +2 बना दिया है। अब उच्च विद्यालयों के शिक्षक जो दशकों से दसवीं तक को पढ़ा रहे थे, वे तो इंटर को पढ़ा नहीं सकते थे/हैं। तो सरकार ने इन छह सौ विद्यालयों के लिए क्या किया यानी क्या उसने छह सौ +2 विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति की? आइए कुछ हिसाब देखते हैं।
      बिहार में लगभग 3000 उच्च विद्यालय हैं। इनमें से 1/5 को +2 कर दिया गया है। प्रति वर्ष इंटर में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या इन 600 विद्यालयों में चाहे जो हो, सवाल है कि एक +2 विद्यालय में इंटर को पढ़ाने के लिए कितने शिक्षक चाहिए? मेरी समझ में, कला, विज्ञान और वाणिज्य तीनों संकायों के लिए कम से कम 20-25।
हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, भूगोल, इतिहास, राजनीति शास्त्र, श्रम एवं समाज कल्याण, समाजशास्त्र, भौतिकी, रसायनशास्त्र, वनस्पति विज्ञान, जंतुविज्ञान, गणित, मनोविज्ञान, गृहविज्ञान, तर्कशास्त्र, कम्प्यूटर, अर्थशास्त्र जैसे विषय तो हर विद्यालय में हैं।
लेकिन आप नीतीश कुमार से यह जानकर बहुत खुश होंगे कि किसी भी उत्क्रमित विद्यालय में पाँच (मेरी जानकारी में तो एक-दो भी नहीं) भी शिक्षक नहीं भेजे गये हैं।
अब मामला साफ है कि सरकार ने हजारों-लाखों छात्रों का भविष्य चौपट करने का मन बना लिया है। फिर भी बिहार और नीतीश की जयकार हो रही है।
सरकार रोजगार कितनों को दे सकती है?

बिहार सरकार हर साल कितने लोगों को रोजगार दे सकती है? यह सवाल कोई मजाक नहीं, बल्कि बहुत गम्भीर और आवश्यक सवाल है। हर साल बिहार की आबादी कम-से-कम पंद्रह लाख अधिक हो जाती है। अब समस्या यह है कि अगर हर साल कम से कम 3-4 लाख रोजगार भी राज्य में पैदा नहीं होंगे/होते तब बेरोजगारी की समस्या का हल क्या है और हमारी बिहार सरकार 2015 तक विकसित बिहार कैसे बना लेगी? दस करोड़ अड़तीस लाख की जनसंख्या के राज्य में 2011 में नियुक्तियों की कुल संख्या बीस-तीस हजार भी शायद ही है। अब जितने लोग स्विस बैंकों पर भिड़े हैं या किसी राजनैतिक (वास्तव में नीतिविहीन) पार्टी को कोसते हैं, खासकर दक्षिणपंथियों के लिए कह रहा हूँ, उनके पास इस समस्या का समाधान क्या है? यह समस्या राज्य की भी है, इसे देश के लिए भी समान समझा जाय। जनसंख्या अधिक होने का बहाना यहाँ नहीं चलेगा क्योंकि अगर देश की जनसंख्या आज से आधी भी होती तब समस्या ज्यों-की-त्यों रहती। बेरोजगारी का प्रतिशत वही रहता। जब तक आपके पास ऐसी व्यवस्था ही नहीं है कि सबको रोजगार मिल सके, आपका हाल बुरा होना ही है।
बिहार के लिए मैंने पहले भी कहा है कि हर साल बीस लाख लोग सारी परीक्षाएँ देते हैं और रोजगार पचास हजार भी नहीं तो सीधा सा अर्थ है कि राज्य 19 लाख से अधिक लोगों को हर साल बेरोजगार रखने की व्यवस्था कर चुका है। चिल्लाकर या रोकर रोजगार की संख्या कोई भी सरकार कितना कर सकती है? यही न कि बीस लाख में से अधिकतम (वैसे मालूम है कि ऐसा सम्भव ही नहीं) दो लाख लोगों को रोजगार मिल सकता है और फिर अठारह लाख लोग बेरोजगार रहेंगे। अब जीवन तो सबका चल रहा है ही, वह चाहे भीख माँगकर हो, मजदूरी कर के हो, दुकान चलाकर हो या जैसे भी हो।
साफ है कि कोई भी सरकार बेरोजगारी की समस्या का हल नहीं कर सकती। हम किसी पार्टी को या नेता को कितना भी कोसें लेकिन इसका समाधान आपके पास भी नहीं है। समाधान तलाशना होगा। 

(समाप्त)

पैसा, वेतन, बिहार सरकार, आडवाणी की यात्रा …गड्डमड्ड बातें बिहार की ( पहला भाग )

4 टिप्पणियाँ

(पैसा, वेतन, नीतीश कुमार, बिहार सरकार, प्रभात खबर, अंग्रेजी, निजी स्कूल, संसद, सांसदों के वेतन, आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी जनचेतना यात्रा…सब कुछ गड्डमड्ड हैं इस लेख में। इस लेख में सुसंगठित होना मेरे लिए सम्भव नहीं था। इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ।)

प्रभात खबर के तमाशे
बिहार में इन दिनों मीडिया सुशील कुमार के पीछे पगलाया हुआ है। वही सुशील जिन्होंने कौन बनेगा करोड़पति में पाँच करोड़ रूपये जीते हैं। प्रभात खबर ने तो एक दिन के लिए अतिथि सम्पादक ही बना डाला है। बिहार सरकार मनरेगा का ब्रांड एम्बेसडर बनाना चाहती है। ऐसी खबर भी सुनने में आई। वही बिहार सरकार जो छह हजार रूपये की तनख्वाह सुशील को देती है।

अंग्रेजी के यशोगान का मंत्र बँचवाता प्रभात खबर
      एक तमाशा और मुझे परेशान करता है प्रभात खबर का। इन दिनों यह अखबार अंग्रेजी के स्तुति-गान के साथ रंगीन विज्ञापन कर रहा है और आईआईटी के श्रीश चौधरी के लिखे लेख को टुकड़ों में छाप रहा है। जैसा कि हमेशा होता है, भारत में भाषायी उदारता की बात सिर्फ़ अंग्रेजी के लिए होती है, इसी घोल के साथ श्रीश प्रभात खबर में दिख रहे हैं। साफ बात यह है कि अब हमारे यहाँ अंग्रेजी व्याकरण के किताबों की कमी पड़ गई है क्योंकि बड़े हिन्दी अखबार अंग्रेजी व्याकरण, शब्दावली आदि सीखा रहे हैं। सबूत के लिए आप अखबारों को देख भी सकते हैं। बस यही काम प्रभात खबर को करना है। उसे अंग्रेजी भाषा और व्याकरण के स्तंभ को शुरू करना है और इसके लिए वह लम्बी भूमिका बाँधते हुए पाठकों को श्रीश के लेख के साथ अंग्रेजी का घोल पिला रहा है,
अंग्रेजी के यशोगान के मंत्र बँचवा रहा है।
बिहार सरकार की तरक्की अंग्रेजी छापकर
    
संयोग से मुझे 1963 के मैट्रिक का प्रमाण पत्र हाल ही में देखने को मिल गया। आज से 48 साल पहले के उस प्रमाण पत्र में सब कुछ हिन्दी में छपा था। इसकी तुलना में अब के प्रमाणपत्र की हालत देखते हैं। मैट्रिक में अंक पत्र, मूल प्रमाण पत्र से लेकर स्नातकोत्तर तक के प्रमाण पत्रों में अंग्रेजी छाई हुई है। अंक-पत्रों में तो सिर्फ़ अंग्रेजी है। अभी हाल में लगभग 30 लाख लोगों ने शिक्षक पात्रता परीक्षा के लिए आवेदन किया है। आवेदन-पत्र में सब कुछ अंग्रेजी में लिखना था। इंटर परीक्षा के लिए जो आवेदन-पत्र भरे जा रहे हैं, उनमें भी अंग्रेजी के सिवा कुछ नहीं दिखता। हाँ, प्रतीक-चिन्ह यानी लोगो एक अपवाद है। हिन्दीभाषी राज्य के कई विभागों के विज्ञापन भी अंग्रेजी में अखबार में दिखते रहते हैं। बिजली बिल तो पूर्णत: अंग्रेजी में ही छपता है। अगर गिनने-देखने बैठ जाएँ तो यह सूची बहुत लम्बी हो जाएगी।
तकनीक के नाम पर या आधुनिक बनने के नाम पर हर जगह अंग्रेजी का मतलब साफ है कि सरकार बहुत पीछे हैं। अस्सी के दशक से ही हिन्दी की सुविधा कम्प्यूटर में मौजूद रही है। लेकिन हमारी सरकार आज तक बीस साल पहले के साफ्टवेयर या तकनीक का सहारा लेकर अपने को उच्च तकनीक से लैस मानती है। सबूत के लिए रेलवे टिकटों आदि का ही साफ्टवेयर देख लें, उसमें छपे अक्षरों का फांट देख लें। विज्ञापन नहीं देखना है, टिकट का काम वाला हिस्सा देखना है।
यही हाल इंटर की पढ़ाई के लिए कर दिया गया है। अब 500 अंकों की परीक्षा में हिन्दी मात्र पचास अंक तक आ चुकी है( अलग तरीके से पहले भी थी)। कुछ साल और देखिए, शायद बाहर भी कर दी जाय। अंग्रेजी की सेवा में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।
    
वेतन और बत्तीसी मामला पर बिहार सरकार और उसके मुखिया
      अब यहाँ समझ में नहीं आता कि सुशील कुमार के पाँच करोड़ रूपये (जो परिष्कृत जुए में जीते गए हैं) जीतने का अतिथि सम्पादक बनाने या ब्रांड एम्बेसडर बनाने से किस महान विचारधारा या आदर्श के तहत क्या सम्बन्ध है? इसे हम प्रभात खबर वालों की बुद्धि का प्रयोग मानें या मीडिया के सनकीपन का परिणाम?
            यहाँ जरा हटकर बिहार सरकार मतलब नीतीश सरकार के वेतन व्यवस्था पर बात करते हैं। कुछ दिन पहले जब केंद्र सरकार ने 26-32 वाली बात कही थी तब नीतीश कुमार ने भी इसे गलत ठहराया था और इस बयान से मीडिया में उनके महानता की छवि दिखाई जानी थी ही। जरा देखते हैं कि क्या दस रूपये तनख्वाह देने वाले शासक को यह अधिकार है कि वह दस रूपये की तनख्वाह की आलोचना करे? बिहार में पिछले छह सालों में अधिकांश नियुक्तियाँ छह हजार वाली ही हैं। अब जरा अनुमान लगाइए कि पटना या किसी जिला मुख्यालय में, जो कि शहर हैं, में एक व्यक्ति जिसकी तनख्वाह छह हजार है, उसके परिवार की स्थिति क्या होनी चाहिए। अगर परिवार में छह सदस्य हों या पाँच सदस्य हों (नौकरीपेशा, उसकी पत्नी, दो बच्चे, माँ-बाप) तब 6000/6=1000 प्रति माह। 1000/30=33 रूपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति आय हुई। और पाँच सदस्य मानें तब
      6000/(5*30)=40 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन।
अगर पटना की बात करें तब 6000 की कीमत का अन्दाजा नीतीश कुमार स्वयं लगा लें।
     अब बताइए कि 32 रूपये केंद्र सरकार ने बताए थे और यहाँ 33 या 40 रूपये दिए जाते हैं, साक्षर कहकर, यह कहकर कि सरकार ने रोजगार बढ़ाया है, बेरोजगारी घटी है। फिर नीतीश कुमार को 32 के हिसाब की आलोचना करनी चाहिए? क्या आलोचना से पहले उस मुद्दे पर वे खुद आलोचना के लायक नहीं, कम-से-कम तब जब आप राज्य के मुखिया हैं। विधायक निधि खत्म कर के हीरो और महान की छवि तो नीतीश कुमार ने पहले ही बना ली है लेकिन मुख्यमंत्री निधि का गठन या मंत्रियों को जिलों का अभिभावक बनाने जैसे कदम पर मीडिया ने चुप्पी क्यों साधी, नरम रुख क्यों अपनाया? कुछ दिनों पहले मंत्रियों के रिश्तेदारों को जमीन बहुत कम कीमत पर आवंटित किए गए थे, शोर मचाया गया, जाँच हुई और अन्त में कहा गया कि जिन्हें दिया गया है, वे उसके काबिल थे। अब सोचने की बात है कि सिर्फ़ मंत्रियों, विधायकों या बड़े नेताओं के बेटे-बेटियाँ और रिश्तेदार ही काबिल होते हैं?

      कम-से-कम मुझे तो नहीं लगता कि नीतीश कुमार 32 रूपये की बात पर उंगली उठाने के अधिकारी हैं।


वापस वेतन पर…

हाँ, वेतन की बात पर आते हैं। बिहार में एक उच्च विद्यालय में एक शिक्षक की तनख्वाह 7- 8 हजार, दूसरे की पच्चीस हजार हर जगह देखने को मिलेगी। ऐसे एक और मामले पर यहाँ लिखा था मैंने।  
      कुछ दिन पहले पटना जिले के सरकारी कार्यालय में तो अपने कम्प्यूटर, माडेम और प्रिंटर के साथ नौकरी करने पर भी तनख्वाह 4-5 हजार दी जाएगी, ऐसी विज्ञाप्ति दिखी थी।
      विधायकों और सांसदों के वेतन पर किसी को चिन्ता नहीं होती। इसी बिहार सरकार के 30 से अधिक ईमानदार भाजपा और जदयू सांसदों में से एक ने भी संसद में इस बात की चिन्ता जाहिर नहीं की कि उनके वेतन बढ़ाने से देश पर करोड़ों रूपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा। लेकिन केंद्र सरकार या कांग्रेस के खिलाफ़ गीत गाने में खूब मजा आता है इन लोगों को। अन्नामय माहौल में संसद में शिवानन्द तिवारी को नीतीश कुमार और बिहार सरकार के महान कार्यों का ढोल खूब जोर-जोर से पीटते देखा गया। वे भी जदयू के सांसद हैं।
      बात साफ है कि किसी को हजार, किसी को दो हजार वेतन देने वाला व्यक्ति किसी तरह से इस योग्य नहीं कि उसी के जैसा काम करने वाले पर दोषारोपण करे, कम-से-कम सत्ताधीश होने पर तो अवश्य ही। वेतन पर और भी बातें हैं, जिन्हें बाद में कभी रखूंगा।

आडवाणी की यात्रा पर कुछ…

भ्रष्टाचार विरोध की यात्रा की शुरूआत में ही भ्रष्टाचार का पैसा खर्च किया जा चुका है, जिसका जिक्र जेपी वाले लेख में मैंने किया था। भ्रष्टाचार का पैसा इसलिए कहा क्योंकि सब जानते हैं करोड़ में खर्च करने वाले भी करोड़पति, उद्योगपति या अमीर होते हैं, वे ही किसी राजनैतिक पार्टी को लाख या करोड़ में चंदा दे सकते हैं, वरना किसी पार्टी की हैसियत इतनी कहाँ कि वह कभी हवाई जहाज से अपने नेताओं को यात्रा करवाए।
    इस यात्रा की शुरूआत छपरा से हुई थी। सोचने की एक बात और है कि क्या इतनी सुरक्षा व्यवस्था आदि का इन्तजाम नीतीश लालू की किसी सभा, यात्रा आदि के लिए करते। सारे अधिकारियों को, पुलिस की बहुत बड़ी संख्या को इस यात्रा में झोंका गया था। अनुमंडलों के उच्च अधिकारी भी सेवा में हाजिर थे और वह भी उस अनुमंडल में जहाँ के अधिकारी वे थे ही नहीं। 


(अगला भाग कल…)

जेपी ही गायब थे आडवाणी की यात्रा में, हाँ…नीतीशायण चालू रही

12 टिप्पणियाँ

बारह तारीख (12-10-11) को पटना आने के क्रम में सैकड़ों जगह बैनर दिखे। छपरा में एक दिन पहले ग्यारह तारीख को जयप्रकाश नारायण की जयंती पर खूब तमाशा हुआ था। छपरा से पटना लगभग 70 किलोमीटर है। लेकिन 70 किलोमीटर के रास्ते पर मुझे जयप्रकाश नारायण की तस्वीर सिर्फ़ 2-3 जगह ही दिखी। दिखे तो बस नीतीश, आडवाणी और छोटे-बड़े तथाकथित महान नेता। सुषमा स्वराज को बिहार की प्रशंसा करके बहुत सुकून मिलता है, बिहार मतलब नीतीश के बिहार की। कुछ बातें हैं बिहार के बारे में, उस दिन की यात्रा के बारे में, राजनीति के बारे में।

      बैनरों पर जेपी नहीं दिखे, और जहाँ दिखे वहाँ भी उनकी तस्वीर से कई गुनी बड़ी तस्वीर औरों की दिखी। यह एक नजरिए से कोई बड़ी या बुरी बात नहीं भी हो सकती है। लेकिन इसमें आयोजक अपना विज्ञापन अधिक कर रहा है, ऐसा तो साफ नजर आता है। वैसे आडवाणी की यात्रा को शुरू जेपी के यहाँ से की जाय, इसके पीछे कारण क्या है? जहाँ तक मेरी समझ है, अभी बिहार के नीतीश और गुजरात के मोदी में राष्ट्रीय स्तर पर महान बनाई गई या बनवाई गई छवि को लेकर नीतीश कुछ आगे हैं। क्योंकि मोदी के साथ मुद्दा ही कुछ ऐसा जुड़ा है कि वे कुछ अलग मालूम पड़ते हैं। बिहार में धमाकेदार जीत और पहले ही केंद्रीय मंत्री रह चुकने से नीतीश और उनके गुरू-चेले कुछ मत्त-से हैं। सो एक बड़ा कारण तो यह रहा, नीतीश के बिहार को यात्रा शुरू की उपयुक्त जगह मानने का। दूसरा कारण यह रहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई या तमाशा जो भी हो रहा है, इसकी गम्भीर शुरूआत भी जेपी ने की थी, ऐसा माना जाता है। एक और कारण बिहार में भाजपा-जदयू की स्थिति का इतना मजबूत होना भी रहा होगा। आखिर भाजपा या आडवाणी को जेपी पहली बार कैसे याद आए? जेपी के गाँव में यात्रा को लेकर अचानक से बिजली का आ जाना, आखिर बिहार सरकार को नवम्बर 2005 से अक्तूबर 2011 तक यह गाँव या बिजली तनिक भी याद नहीं आए? क्योंकि अचानक जेपी के गाँव में बिजली आ गई थी। नीतीश ने सड़क बनवाने की भी बात सिताबदियारा(जेपी के यहाँ) प्रकरण को लेकर कही थी। यह सब पाखंड का साफ-साफ प्रदर्शन नहीं तो और क्या है?
      सुनने में आया कि छपरा के इस तामझामी यात्रारंभ में ढाई करोड़ का खर्चा आया। और यह सब पैसा दिया एक अभियंता ई सच्चिदानंद राय ने। ये बनियापुर के बताए जाते हैं। इनको इस बार जदयू का टिकट नहीं मिल पाया था। इन्होंने बिहार राज्य पथ परिवहन निगम को सौ बसें भी दी हैं, ऐसा सुनने को मिला। ईडेन सिटी नाम से छपरा में महँगे घर बनाए रहे हैं, जो बिकेंगे भी महँगे ही। वैसे सवाल तो यह भी है कि एक आदमी जो एक अभियंता हो, उसके पास इतनी सम्पत्ति कि 100 बसें खरीद सके या ढाई करोड़ आयोजन पर खर्च कर सके? जाहिर है या तो यह लूट की कमाई है या बाप-दादाओं की सम्पत्ति के नाम पर दिखाई जा रही सम्पत्ति है। अब ऐसा तो लगने ही लगा है कि अगली बार नीतीश सरकार में सच्चिदानंद राय को मंत्री पद मिलना तय है।
      आडवाणी, सुषमा, जेटली सहित कुछ नए युवा नेता भी खूब राग अलाप रहे थे ग्यारह को। सुषमा स्वराज तो नीतीश से भी ज्यादा नीतीश सरकार की प्रशंसा करती हैं अपने भाषणों में। संयोग या दुर्योग से इनके भाषणों से प्रभावित होने वाले लोग भी हैं। वैसे स्वराज अच्छा बोलती ही हैं। जब एक अच्छा वक्ता किसी के पक्ष में बोल रहा हो या झूठ बोल रहा हो तो पकड़ना और मुश्किल हो ही जाता है।
अगले दिन अखबार वाले जैसा कि आप जानते हैं, नीतीशायण में लगे रहे। प्रभात खबर तो जान की बाजी तक लगाने में जुटा है इस काम में। कुछ पन्ने रोज इसीलिए निकाले ही जाते हैं कि नीतीश की वंदना हो सके। यही हाल प्रभात खबर के संपादकीय का है।  वैसे बता दें कि प्रभात खबर सच्चिदानंद राय के ईडेन सिटी का विज्ञापन कुछ ज्यादा ही करता है। यहाँ तक कि ईडेन बसों से अगर आप यात्रा करें तो पढ़ने को इसी की कुछ प्रतियाँ दिखती हैं। सत्ता और दौलत से तालमेल तो दिखता ही है।
तो बात शुरू हुई थी आडवाणी और जेपी से। एक बात हमेशा ध्यान आती है कि जिस देश में 1947 तक की लड़ाई में लाखों नवजवान शामिल थे, उसमें आडवाणी या वाजपेयी का नाम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल क्यों नहीं है? जबकि उनकी उम्र इतनी तो थी ही कि वे लड़ सकें। 1947 के पहले आडवाणी जैसे लोग या नेता अगर नहीं लड़ रहे थे या उस समय इनका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था, तो इन्हें हम तो राष्ट्र का भला चाहने वाला नहीं मानेंगे। या फिर यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जेपी के आन्दोलन का लाभ मिलने पर जो लोग सत्ता में आए, उनमें आडवाणी भी शामिल थे और वह भी केंद्रीय मंत्री की हैसियत से। तो जिस जेपी के चलते इन्हें यह मिला उसी जेपी को आज तक भाजपा ने या आडवाणी ने क्यों याद नहीं किया? और आज याद करने का मतलब क्या है? हमारी समझ से इसे अवसरवादिता कहने में हर्ज नहीं है।
(कुछ बेतरतीबी से लिखा यह लेख कुछ सुगठित नहीं भी हो सकता है)

नीतीश कुमार के ब्लॉग से गायब कर दी गई मेरी टिप्पणी (हिन्दी दिवस आयोजन से लौटकर)

12 टिप्पणियाँ

मैं किसी ऐसे आयोजन में शामिल नहीं हुआ था जो हिन्दी दिवस पर हुए। फिर वहाँ से लौटने की बात क्यों? कारण है भाई। पिछले कुछ दिनों से लगातार हिन्दी पर पढ़ने को मिलता रहा है। आयोजनों में भाषण-पुरस्कार-शपथ आदि के अलावा कुछ होता तो है नहीं, इसलिए हम ब्लॉग-जगत के अलग-अलग घरों में पैदल ही घूमते रहे। 40-50 से कम लेख-कविताएँ नहीं पढ़ी होंगी। कई जगह टिप्पणी भी की। तो मेरा यह काम भी तो आयोजन में शामिल होना ही माना जाएगा।
कुछ दिनों से हिन्दी का जोर सबमें मार रहा था। कई तो ऐसे भी दिखे जो 14 सितम्बर बीतते ही अंग्रेजिया गये, जो उनकी असली प्रवृत्ति रही है। ऐसे लोग बड़े चालू किस्म के होते हैं। पूरा का पूरा गिरगिट। जब चाहा रंग बदल लिया।
कई लोगों ने जो सम्माननीय भी हैं, अच्छी बातें भी कहीं।
      इनमें से कुछ लिखनेवाले महाबुद्धिमान थे, तो कुछ भगवान ही थे। कुछ लोग कम या ज्ञात जानकारी या भ्रमों के प्रभाव में थे, तो कुछ संसार की हजारों भाषाओं के बीच मात्र अंग्रेजी के लिए उदारमना बन रहे थे। इन उदारमनाओं में पता नहीं अन्य भारतीय या विदेशी भाषाओं के प्रति इतना सम्मान है या नहीं, लेकिन ये जी जान लगाकर अंग्रेजी को धो-पोंछ रहे थे।
अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त करना हिन्दी के विरोध का सूचक नही है। पर मैंने लिखा- रावण का साथ देना राम का सहयोग नहीं है।
      कुछ लोगों के पेट में इस बात का दर्द अधिक ही हुआ कि क्यों अंग्रेजी के खिलाफ़ लिखा जाता है। अब ये लोग बेचारे कितनी मेहनत से अंग्रेजी सीखते हैं और उसी के दम पर इनका काम चलता है, तब कैसे बरदाश्त करें भला! यह अलग बात है कि इनके पास संसार की अन्य विदेशी भाषाओं का सीखने का समय नहीं ही होगा। कुछ लोग सच में ऐसे होंगे या अपने को इस धोखे में रख रहे होंगे कि वे बड़े महान लोग हैं या विश्व-नागरिक हो गये हैं। और कुछ लोग तो निश्चय ही ऐसी धारणा, भारत में फैलाये गये जाल में गलती से या जानबूझकर फँसने के कारण रखे हुए हैं। विस्तार में जाने की फिलहाल आवश्यकता नहीं लगती।
            वहीं कुछ अलग भी देखने को मिला। एक नई लेकिन बेहतर लेखिका ने भी कुछ लिखा। भाषा पर एक सुन्दर कविता भी मिली।
     वहीं कुछ लोग अपनी एक यात्रा या घुमाई में दस आदमी से मिल के भाषा पर बड़े विद्वान ही बन जाते हैं। जैसे वे अधिकृत इतिहासकार हों और वही सत्य बता सकते हों। ऐसे लोग शुरू करते हैं अपनी यात्रा गाथा से, जैसे यात्रा साहित्य के प्रपितामह हों। जैसे कोई तमिलनाडु गया चार दिन के लिए और वहाँ से भाषा का शोध-पत्र लेते आया। अब विश्वविद्यालयों को सोचना चाहिए कि ऐस लोगों के घर जाकर पी-एचडी की उपाधि जरूर देनी चाहिए। लेकिन वे हमेशा गलत ही करते हैं। बेचारे ऐसे-ऐसे एकदिनी शोधकर्ताओं के शोध का सम्मान होता ही नहीं।
      वहीं कुछ लोग समय के साथ चलने की सलाह देते नजर आते हैं।* उनके अन्दर जैसे कोई शेर सोया है, ऐसे पेश आते हैं। समय के साथ चलना भी कुछ अलग अर्थ देता है। समय के साथ यानि जिस समय को हमने बदला या बना लिया है। अब हम उसके कारण हैं और फिर हम अपनी मूर्खता को ही समय बना देते हैं। ऐसे लोग हिंग्रेजी के बड़े पक्षधर हैं। और अंग्रेजी के शब्दकोश में जय हो या महात्मा शब्द जुड़ने से अपने को या अपनी भाषा को परम सौभाग्यशाली समझते हैं। (अमेरिका या ब्रिटेन की कोई संस्था, जो चिरकुट ही क्यों न हो, कोई रिपोर्ट छाप दे तो लगता है कि भूचाल आ गया है। जैसे उसने माना तो आपकी आँखें झूठ हो सकती हैं लेकिन वे? सवाल ही नहीं है। अभी नरेन्द्र मोदी और नीतीश पर ध्यान दे लें। यह हाइटेक जमाना है भाई। आपके घर की सच्चाई, आप गलत या कम जानते हैं लेकिन अमेरिकी लोग अधिक।) ये अंगिंदी(अंग्रेजी में हिन्दी) के पक्षधर नहीं हो सकते क्योंकि अंग्रेजी में मिलावट की बात करना तो कानूनन जुर्म है। ऐसे लोग हिन्दी के दस वाक्य बोलें तो सौ अंग्रेजी शब्द चल सकते हैं(हैं, हो, कि, जैसे, लगता है, एक आदि शब्दों को छोड़कर सारे शब्द अंग्रेजी के) लेकिन अंग्रेजी के दस वाक्य में दस क्या दो शब्द भी हिन्दी के हों तो हिमालय टूट जाएगा। और सब जानते हैं कि ऐसे लोग बहुत ईमानदार और शान्तिप्रिय होते हैं, जिम्मेदार नागरिक होते हैं, जैसे हमारी फिल्मों में अभिनेता हुआ करते थे/हैं। (यहाँ बताता चलूँ कि मैंने जानबूझकर अमिताभ बच्चन के ब्लॉग पर इसी 14 तारीख को ही एक टिप्पणी लिखी थी …और अंग्रेजी में ही लिखते रहें। हिन्दी का सम्मान अंग्रेजी लिखकर ही होता है। फिर भी आप हिन्दी के लिए जाने जाते हैं। इस टिप्पणी को वहाँ से बाद में हटा दिया गया।)
      चलते-चलते एक और बात इस आयोजन पर। पिछले लेख में नीतीश कुमार के भाषाई रवैये पर लिखा था। जब मैं नीतीश के ब्लॉग पर गया, तब वहाँ से भी मेरी टिप्पणी हटा दी गई है। मेरे पिछले लेख को प्रकाशित करने तक उनके ब्लॉग पर 13 सितम्बर वाले अंग्रेजी लेख पर आठ टिप्पणियाँ थीं। (उनके ब्लॉग पर माडरेशन चालू है, जैसे रवि रतलामी जी ब्लॉग पर है। यानि स्वीकृति के बाद ही टिप्पणियाँ दिख सकती हैं।) लेकिन जब मैं 16 सितम्बर को वहाँ जाता हूँ, तब पंद्रह सितम्बर तक की गई 18 टिप्पणियाँ दिखती हैं। जबकि मैंने 14 सितम्बर को ही दिन में टिप्पणी कर दी थी। इसका प्रमाण है कि मैंने अपने ब्लॉग पर 14 सितम्बर को ही 5 बजकर 43 मिनट पर यह सूचना दी थी कि मैंने उनके ब्लॉग पर क्या टिप्पणी की है।
      फिलहाल तो यही बातें हैं। अब इतना तो तय है कि माडरेशन या टिप्पणियों का संपादन नीतीश कुमार या उनके कोई सहायक ही करते हैं। फिर क्यों ऐसा किया गया? मुझे शायद इसका जवाब मालूम है। क्योंकि मैं सरकारी सोच नहीं रखता। अब यह सरकारी सोच क्या है। इस पर अगले दिन…
……………………………………………………………………………………………………………………
*(इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो कृष्ण के परम शिष्य हैं। बचपन से पर्दों पर छपे या रजिस्टरों के पीछे छपे, गीता-सार में लिखा रहता था, जो हो रहा है, वह अच्छा ही हो रहा है। जो हुआ, वह भी अच्छा ही हुआ और जो होगा, वह भी अच्छा होगा। ऐसी बेसिर-पैर की बातें ऐसे लोगों को सहायता प्रदान करती हैं। ऐसे लोगों का नाम लेने की जरूरत नहीं। बस, यही जान लीजिए कि ऐसी बड़ी-बड़ी हस्तियाँ इसमें शामिल हैं, जिन्हें सरकार ने ऊँचे पदों पर बैठा रखा है। जैसे अकादमियों के निदेशक आदि। या फिर बड़े-बड़े लेखक भी शामिल हैं इसमें और ब्लॉगर भी)
………..
अभी-अभी एक नई खबर मिली है नीतीश सरकार के बारे में। इसे अवश्य देखें। अभी तक मैंने लगभग दस लेख बिहार सरकार के खिलाफ़ में लिखे हैं। जिनमें शिक्षकों और चिकित्सकों की लूट, सुशासन में अपराध, बेरोजगारी, घटिया शिक्षा नीति आदि विषय शामिल हैं। यह सरकार सिर्फ़ प्रशंसा करने वालों के लिए अच्छी है। चाहे अमिताभ हों या  कोई अभिनेत्री, कोई विदेशी हो या कोई बड़ा उद्योगपति, केवल इन्हें ही बिहार के मुख्यमंत्री और उनकी व्यवस्था अच्छी लगती है। क्योंकि जब पूँजीवाद के घोर समर्थक और शोषक लोगों को सुविधा मिलती है, तब वे भला सच कैसे बोलेंगे। मीडिया और कुछ तथाकथित भली संस्थाएँ नीतीश की छवि को महापुरुष में बदलने को जी-जान लगा रही हैं।

फेसबुक पर लिखने पर नीतीशराज में दो लेखकों का निलम्बन 

/ प्रमोद रंजन , 



क्या आपने कभी किसी ब्लॉग का सार्वजनिक विज्ञापन देखा है। कभी सुना है कि किसी बहुत बड़े बोर्ड-बैनर पर एक ब्लॉग का विज्ञापन किया हो? मैंने देखा है। पटना के गाँधी मैदान के पास, श्रीकृष्ण मेमोरियल सभागार के पास, रास्ते पर नीतीश के इसी ब्लॉग का विज्ञापन दिखता रहा है, मैंने कुछ महीने पहले तक देखा है। 
…….-11:26 पूर्वाह्न

भाषा पर नीतीश का दोहरा रवैया

13 टिप्पणियाँ

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दो अलग-अलग व्यवहारों को देखिए आज, हिन्दी दिवस पर। अब बताएँ वे सरकार के पक्षधर लोग कि हिन्दीभाषी राज्य बिहार के सुशासन बाबू का यह रवैया कैसा माना जाय। 

सबसे पहले देखिए इस जगह जहाँ आप पाएंगे वही सदाबहार अपील, जो हर साल करोड़ों पन्नों को बरबाद करने के लिए छापी जाती है।

14 सितम्बर को हिन्दी के लिए अपील करते नीतीश
              
फिर दैनिक जागरण की साइट पर यह खबर देखिए, जो ऐसे शुरू होती है।
सीएम ने लिखा ब्लॉग वादा पूरा किया, लेकिन जारी रहेगी मेरी जंग
पटना, जागरण ब्यूरो : लंबे अर्से के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने ब्लाग के माध्यम से एक बार फिर राज्यवासियों से मुखातिब हुए हैं। राज्य सरकार के प्रति विश्र्वास कायम रखने के लिए जनता को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा है कि पिछले नवंबर में बिहार चुनाव के आये नतीजों के बाद पहली बार मैं अपने विचार आप सभी से बांट रहा हूं। विश्र्व के विभिन्न क्षेत्रों से बहुतों ने मुझसे पूछा, मैंने ब्लाग पर लिखना क्यों छोड़ दिया। सच यह है कि मैं आप सभी से जुड़ने के लिए किसी बेहतर मौका के इंतजार में था। अब, वह समय आ गया। पिछले सप्ताह हमारी सरकार ने वह कर दिखाया जिसके बारे में मैं अर्से से बेचैन था। हमने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में लिप्त एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के घर में प्राथमिक विद्यालय खोल दिया। उनका घर पिछले साल बने विशेष न्यायालय कानून के तहत जब्त किया गया है। इस भवन में स्कूल का खुलना कोई साधारण ल्ल शेष पृष्ठ 21 पर
     
यह खबर आज पटना से प्रकाशित अन्य अखबारों में भी प्रकाशित है।
इस खबर के उल्लेख करने का अभिप्राय सिर्फ़ इतना ही है आप यह देख सकें कि मुख्यमंत्री ने अपना ब्लॉग कैसे लिखा है। यहाँ पढ़िए उनका लिखा।
13 सितम्बर को अंग्रेजी में लिखा लेख
     
तो श्रीमान अंग्रेजी में लिखते हैं और अपील हिन्दी के लिए। वह भी कल और आज, अलग-अलग भाषा में। यही नहीं इनके ब्लॉग पर लेखों के हिन्दी-अंग्रेजी अनुवाद एक साथ रहते हैं। कुल बारह लेखों में से सात अंग्रेजी में हैं। साफ समझना है कि ये लेख वे अमेरिका-इंग्लैंड-न्यूजीलैंड-आयरलैंड-कनाडा आदि देशों में पढ़े जाने के ही लिख रहे हैं। यहाँ यह बता दें कि कुछ दिन पहले इन्होंने एक किताब लिखी थी, वह भी अंग्रेजी में।
      इसे नीतीश का कौन-सा व्यवहार कहें? क्या यह नहीं हो सकता था कि आज बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् और बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी को बन्द करने का ऐलान कर दिया जाता?

बिहार पर विशेष : शिक्षा में सारे घटिया प्रयोग कर रही नीतीश सरकार

7 टिप्पणियाँ

बढ़ता हुआ बिहार जिन्हें देखना है, उनके लिए आज कुछ खास बातें हैं। जरा इस ओर भी एक नजर देख लीजिए ताकि आपका भ्रम भी टूटे।
बेहतर कहलाने की इच्छा अगर है, तो बेहतर काम भी तो करने चाहिए। लेकिन बिहार में नीतीश सरकार ठीक इसका उलटा कर रही है। बेहतर कहलाने की इच्छा तो बहुत है लेकिन बेहतर काम नहीं। यहाँ बात करते हैं इधर हुए शिक्षा-क्षेत्र में नए-नए खुराफ़ातों की। जैसे शिक्षक पात्रता परीक्षा, साइकिल बँटाई योजना, मैट्रिक में प्रायोगिक परीक्षा समाप्ति योजना, वित्तरहित महाविद्यालयों के लिए की गई दिखावटी योजना और दस हजारी योजना की। आइए जरा इसकी पड़ताल कर लेते हैं।

      पहले आते हैं पात्रता परीक्षा पर। इस परीक्षा के लिए अभी तक 20-25 लाख आवेदन आए हैं और माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षकों की पात्रता परीक्षा के लिए भी कार्यक्रम शुरु हो गए हैं। यानि 30 लाख से कम आवेदन नहीं आएंगे, इन दोनों को मिलाकर।
      अब जरा देखिए इसका मतलब क्या है। बिहार में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख परीक्षार्थी मैट्रिक और इंटर की परीक्षा में भाग लेते हैं। इंटर पास लोगों को प्राथमिक शिक्षक की पात्रता परीक्षा में सम्मिलित होना है और तब यह तय किया जाएगा कि कौन शिक्षक बनने का पात्र है और कौन नहीं। इसका मतलब क्या है। यही न कि इंटर पास सारे परीक्षार्थी पाँचवी और आठवीं को पढ़ाने के लायक नहीं हैं। तभी तो सरकार को इस तरह की परीक्षा आयोजित करनी पड़ती है कि इनमें से योग्य लोगों को चुना जा सके। यानि सरकार स्वयं मानती है कि उसकी व्यवस्था ऐसी है कि इंटर की परीक्षा पास अधिकतर उम्मीदवार गए गुजरे हैं और वे सब आठवीं तक को नहीं पढ़ा सकते। पाँचवी की बात भी नहीं जानते-समझते। जब सरकार को परीक्षा लेकर हम लाखों को छाँटते हुए देखेंगे तो इसका मतलब होगा कि उन लोगों को अयोग्य माना गया। तो क्या सरकार उनकी योग्यता बढ़ाने के लिए कोई इन्तजाम कर रही है या ऐसी कोई योजना है? अगर नहीं तो, क्या अयोग्यों को अयोग्य बनाए रखना ही सरकार की नीति है। यह जरूरी नहीं कि यहाँ उठाए गए सवाल हम हर राज्य या देश पर लागू करें। फिलहाल बात बिहार की हो रही है और सवाल उसी के लिए है। ऐसा इसलिए कहा गया कि बिहार की सत्तासीन सरकार पिछली सरकार को जब बेकार या निकम्मा (जो बहुत कुछ थी भी) साबित करने पर तुली है, क्या वह उससे  बेहतर काम शिक्षा या किसी दिशा में कर रही है। मुझे नहीं लगता कि सड़े हुए आम खाना न खाने से बेहतर है। इसलिए ऐसी व्यवस्था को जो दावा करती रहे कि उसने बड़ा तीर मार लिया है, आलोचनात्मक दृष्टि से देखना शायद गलत नहीं।
      क्या यह नहीं हो सकता था कि इंटर के सारे परीक्षार्थियों को ऐसी व्यवस्था दी जाती कि उनके अध्ययन और ज्ञान के स्तर में वृद्धि होती? यह तो एक सत्य की तरह है कि जिस व्यवस्था में पहले पास कर ली गई कक्षाओं के सवाल पूछे जाते हैं, वह व्यवस्था स्वयं साबित कर रही होती है कि उसमें बड़ी कमी रही है वरना इसकी आवश्यकता ही नहीं थी।
      बस, इसी कारण यह बात कही गई है। एक वाक्य में कहें तो, सरकार यह घोषणा करना चाहती है कि उसके शासन (क्योंकि अधिकांश उम्मीदवार नए ही हैं) में कितने लोग नकल करके या घटिया तरीके से पास कर रहे हैं। यह बात सरकार के ध्यान में नहीं है कि इस कार्य को ऐसे भी देखा जा सकता है। और सरकार अपनी ही असफलता बयान करने वाली है। मतलब पिछले छह सालों में इंटर पास सारे लोगों की संख्या 5-6 लाख भी मान लें, जो पात्रता परीक्षा देने लायक हैं, इनमें से अधिकांश को सरकार के घटिया शिक्षा-नीति के चलते अयोग्य साबित किया जाना है।
     अब आते हैं साइकिल बँटाई योजना पर। अब उच्च विद्यालयों के छात्रों को साइकिल के लिए पैसे दिए जा रहे हैं। इसका एक घटिया पक्ष देखिए। साइकिल देने  के पीछे एक कमजोर तर्क यह है कि  पढ़ने के लिए दूर से बच्चे आएंगे। इसका मतलब यह है कि विद्यालय कम हैं तभी दूर से पढ़ने आना पड़ता है। दस करोड़ की आबादी पर जहाँ लगभग दस लाख परीक्षार्थी मैट्रिक की परीक्षा में शामिल हों, वहाँ क्या इतने विद्यालय नहीं होने चाहिए कि छात्रों को अधिक दूर नहीं आना-जाना पड़े। एक-एक विद्यालय में हजार-पंद्रह सौ तक या इससे भी अधिक विद्यार्थी हैं और शिक्षक दस-बारह या इससे भी कम। अब एक हिसाब देखिए।
अगले साल से साइकिल के लिए 2500 रुपये दिए जाएंगे। इस साल नौ लाख से अधिक छात्र मैट्रिक की परीक्षा में शामिल हुए थे। इस हिसाब से दस लाख या अधिक छात्र आज के दिन जिस कक्षा में होंगे और जो अगले साल उसके आगे की कक्षा में साइकिल के लिए पैसे प्राप्त करेंगे, कुल 10 लाख * 2500= 250 करोड़ रुपये सिर्फ़ साइकिल के नाम पर प्राप्त करेंगे। अब जरा एक और हिसाब देखिए। अगर उच्च विद्यालय में तेरह कर्मचारी (शिक्षक-लिपिक सहित) हों और उन्हें आज के हिसाब से वेतन दिया जाय तो
250 करोड़ / 13(कर्मचारी-संख्या) * 7000(वेतन औसत आठ हजार मान लेते हैं) * 12(एक साल)= लगभग 22-2300 यानि नये दो हजार से अधिक उच्च विद्यालय तो आसानी से चलाए जा सकते हैं। इससे कम से कम आठ-दस हजार गाँवों के लिए यह साइकिल की योजना खत्म हो जाएगी। फिर सरकार नए उच्च विद्यालय क्यों नहीं खोल देती जिससे रोजगार भी मिलता, छात्रों को अपने नजदीक के विद्यालय में जाने के लिए साइकिल की आवश्यकता भी नहीं होती। जब सरकार अस्थायी जगहों पर महाविद्यालय चला सकती है तो उच्च विद्यालय क्यों नहीं? अगर हर पंचायत में एक उच्च विद्यालय खोल दिया जाय, तो क्या विद्यार्थियों को आराम, साइकिल न बाँटना, रोजगार आदि कई सुविधाएँ नहीं मिलने लगेंगी? सरकार चाहे तो कुछ दिनों में ही उच्च विद्यालय चलाने का इन्तजाम हो सकता है। किसी पंचायत के लोग आसानी से विद्यालय के लिए व्यवस्था कर देंगे। सरकार बाद में आराम से  विद्यालय-भवन आदि बनाती रहे। और इसके लिए पैसे की समस्या आती है तब विधायकों के लिए इतनी सुविधाएँ और ऊँची तनख्वाह किसलिए? जनता के चुने हुए लोग इसलिए तो नहीं जाते कि उन्हें बिल गेट्स या अम्बानी-सा घर मिले।
फिलहाल तो हाल यह है कि लगभग 30-32,000 की जनसंख्या पर एक उच्च विद्यालय है। महाविद्यालयों का हाल तो और खराब है। स्नातक की पढ़ाई के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में इतने कम महाविद्यालय हैं कि सीधे जिला मुख्यालय का ही विकल्प प्राय: बचता है। क्या कम से कम हर प्रखंड में एक स्नातक स्तरीय महाविद्यालय नहीं होना चाहिए? अगर कोई यह कहे कि धीरे-धीरे सब होगा या किया जाएगा तब इसका सीधा मतलब तो इतना ही है कि तब तक लाखों विद्यार्थी परेशान रहें। सबसे अच्छा हो कि सरकार सारे संस्थानों को बन्द ही कर दे, जब तक व्यवस्था नहीं होती। लाखों बेरोजगार लोगों को शिक्षित करने की क्या आवश्यकता है जब सरकार के पास उतने लोगों को रोजगार देने की क्षमता नहीं है।
      लाखों बेरोजगारों की फौज खड़ा करके क्या मिलेगा?
जब सब जगह शिक्षा के स्तर को बढ़ाने-सँवारने की बात होती है तब बिहार में मैट्रिक से प्रायोगिक परीक्षा को खत्म किया गया है। कितने ऊँचे और महान शिक्षाशास्त्री सरकार में हैं, इसका अन्दाजा इससे भी लगता है। विज्ञान की शिक्षा और वह भी सिर्फ़ किताब से! सवाल यह नहीं है कि लालू के शासन में क्या था। सवाल यह है कि आप किस आधार पर बेहतर हैं? जहाँ प्रायोगिक शिक्षा का अच्छा इन्तजाम होना चाहिए था, वहाँ सीधे उसे खत्म कर दिया जाना, कितना घटिया कदम है! पहले से ही विद्यालयों में प्रायोगिक शिक्षा की कमी रही है। मैट्रिक के सौ विद्यार्थियों में से कितनों ने एक भी प्रयोग किया है, यह पूछकर पता चल सकता है कि लालू और नीतीश सरकार की शिक्षा व्यवस्था का परिणाम क्या है। प्रयोगशालाओं को बेहतर बनाने की जगह उसे बन्द कर दिया जाना उचित समझा गया। लेकिन फिर भी सरकार के गुणगान में लगे लोग कम नहीं हैं।
      वित्तरहित वाला मामला भी कुछ ऐसा ही है। प्रथम श्रेणी पाने वाले छात्र पर इतना और द्वितीय श्रेणी पाने वाले पर उससे कम रुपये दिए जाने की बात कही गई है। अब इसका एक परिणाम देखिए। एक महाविद्यालय में सौ छात्र हैं और उनके परिणाम के आधार पर एक व्याख्याता को एक-दो हजार प्रति माह तो दूसरे में अगर पाँच सौ छात्र हैं तब एक व्याख्याता को दस हजार रुपये प्रति माह और हजार छात्र हैं तब बीस हजार प्रतिमाह। पता नहीं किस बुद्धिमान प्राणी के द्वारा ये सारे विचार रखे जाते हैं और इन्हें लागू भी कर दिया जाता है। अब सोचिए कि संयोग से एक व्याख्याता जो दरभंगा के किसी महाविद्यालय का है, जब सीवान के किसी महाविद्यालय के व्याख्याता से मिलता है तब, दोनों क्या बात करेंगे? एक का वेतन एक हजार और दूसरे का बीस हजार। यह है बिहार की शिक्षा व्यवस्था का परिणाम। एक मजदूर की कमाई से भी कम पर रहे और एक अगर राजधानी या शहरों में है तो पचास हजार या अधिक भी प्राप्त करे, यह क्या है। कौन सा खेल खेल रही है बिहार सरकार। यह सब्जी बाजार में आलू का भाव है, जो हर दुकान पर अलग नजर आ रहा है या शिक्षकों-व्याख्याताओं का वेतन?
      फिर छात्राओं को दस हजार रुपये इंटर में देने की योजना भी है, अगर वे मैट्रिक में प्रथम श्रेणी प्राप्त करती हैं। सब जानते हैं कि कैसे प्रथम श्रेणी प्राप्तकर्ताओं में भारी इजाफ़ा हुआ है। सरकार के सारे लोग जानते हैं लेकिन सरकार नहीं जानती? कैसी है यह सरकार? क्या शिक्षा को डुबाने का जिम्मा इसी सरकार ने ले रखा है? एक तो पहले से  गहरे पानी में गरदन तक फँसी है शिक्षा और अब उसे दस हजार फीट गहराई तक पहुंचाने के लिए तैयारी जोर-शोर से चल रही है।
      हाँ तो हम बात कर रहे थे दस हजारी योजना की। इसका तर्क यह हो सकता है कि छात्राओं के लिए पढ़ने का खर्च है यह। यानि सरकार फिर वही कह रही है कि छात्राओं के लिए इंटर के पढ़ाई की व्यवस्था   उनके निवास से दस किलोमीटर दूर रखो ताकि वे आने-जाने , पढ़ने में खर्च कर सकें। लेकिन यही सरकार न तो इंटर के लिए विद्यालय खोलना चाहती है न ही स्नातक स्तरीय किसी विद्यालय में उसे कोई रुचि है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि सारण जिले में जितनी लड़कियाँ पढ़ेंगी, सब इंटर के आगे पढ़ने के लिए सिवाय छपरा, जो जिला मुख्यालय है, के कहाँ जाएंगी? पूरे जिले की जनसंख्या 34-35 लाख से कम नहीं होगी। लेकिन इसके अन्दर स्नातक स्तरीय महाविद्यालय 35 भी नहीं हैं। और तो और बीस प्रखंडों के मुख्यालय में भी अधिकांश जगह नहीं हैं। कई गाँवों से चालीस किलोमीटर दूर तक स्नातक स्तरीय महाविद्यालय नहीं हैं और इंटर के लिए भी कुछ कुछ ऐसा ही हाल है। यह सब तो 2050 के लिए सोचा गया होगा शायद। दस हजारी योजना पर पहले भी लिखा जा चुका है।
      वहीं यह सरकार इसपर नहीं सोचती कि क्यों निजी विद्यालय लूट में लगे हैं और क्यों सरकारी शिक्षण संस्थानो में लोग रुचि कम लेने लगे हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि न तो सरकार शिक्षा में कोई सुधार कर रही है और न ही इसकी कोई उम्मीद दूर तक दिख रही है। ढोल पीटा जा रहा है। लोग नाच रहे हैं। 

Older Entries