बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-2)

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युद्ध की राजनीति और हथियारों का व्यवसाय
युद्ध कभी भी राजनीतिक कारणों के लिये नहीं बल्कि आर्थिक कारणों के लिये ही लड़े जाते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह बात एकदम शीशे की तरह साफ नजर आती है कि इन विशालकाय कम्पनियों के आपसी हित जब टकराते हैं तो उसका परिणाम पूरी मानव जाति को झेलना पड़ता है। अमेरिका ने प्रथम विश्व युद्ध में दखल देने का निर्णय तभी लिया जब उसने देखा कि अमरीकी कम्पनियों के आर्थिक हित चौपट होते जा रहे हैं।

सन् 1914 तक अमरीकी कम्पनियों का यूरोपीय देशों के साथ कुल व्यापार 16.9 करोड़ डालर (वर्तमान समय में लगभग 3.42 अरब रूपये के बराबर) का, जो 1916 तक आते-आते मात्र 11.59 लाख डालर (वर्तमान समय में लगभग 2.08 करोड़ रूपये) रह गया था। यूरोपीय देशों के साथ व्यापार में आयी भारी गिरावट से अमरीकी कम्पनियों को बहुत अधिक घाटा हुआ। अब अमरीकी कम्पनियों ने इस घाटे को पूरा करने के लिये

अन्य मित्र देशें में सेंध लगाना शुरू किया और इसमें वे काफी सफल भी रहे। 1914 तक यूरोपीय देशों के बाहर दुनिया के अन्य देशों में अमरीकी कम्पनियों का प्रति वर्ष का कारोबार 82.4 करोड़ डालर था, जो 1916 में बढ़ कर 321.4 करोड़ डालर हो गया था। इस व्यापार में एक बड़ा हिस्सा हथियारों की बिक्री का शामिल था। क्योंकि युद्ध शुरू हो गया था और अमरीकी कम्पनियों ने अब हथियारों का उत्पादन शुरू कर दिया था। युद्ध के हालातों में अमरीकी कम्पनियों को हथियारों के व्यापार से अकूत फायदा हुआ। सन् 1916 के बाद हर बड़ी कम्पनी ने अपनी कुल पूँजी का एक बड़ा हिस्सा हथियारों के उत्पादन में लगा दिया था। इस घटना के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति विल्सन ने जर्मनी के खिलाफ यह कहकर कि अधिकार शान्ति से अधिक मूल्यवान हैयुद्ध की घोषणा कर दी। पूरे युद्ध के दौरान 375 अरब डालर के हथियार कम्पनियों द्वारा विभिन्न देशों को बेचे गये। अब कम्पनियों के मुँह हथियारों का खून लग चुका था, अतः अब कम्पनियों द्वारा हथियार उत्पादन में सबसे अधिक पूँजी निवेश किया जाने लगा। कई कम्पनियों ने अपने पुराने उत्पादों को बनाना बन्द करके हथियारों का उत्पादन शुरू कर दिया। कई और कम्पनियों ने उपभोक्ता सामग्री के साथ-साथ हथियारों के उत्पादन के क्षेत्र में कदम रखा।
युद्ध के बाद कम्पनियों के कार्य करने के तरीके में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। कम्पनियों ने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने के लिये आपस में मिलकर कार्टेल’ (कई कम्पनियों को मिलाकर एक समूह) बनाना शुरू कर दिया। बाजारों में आपसी प्रतिद्वन्दता से बचने के लिये कम्पनियों ने यह कदम उठाया। प्रथम विश्व युद्ध से द्वितीय विश्व युद्ध के बीच का समय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के इतिहास में कार्टेलाईजेशनके नाम से मशहूर है। अर्थात् शक्तियों का और अधिक केन्द्रीकरण होता गया। पूँजी कुछ केन्द्रों में ही सिमटती गयी। तकनीकी पर कुछ चुनी हुयी कम्पनियों का ही अधिकार होता गया। इस दौर की कुछ प्रमुख कम्पनियाँ जो हथियार उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही थीं और जिन कम्पनियों ने कई अन्य कम्पनियों को अपने में मिलाकर कार्टेल बनाये थे निम्न थीं:- जनरल मोटर्स, फोर्ड, स्टैन्डर्ड आयल,  ड्यूपान्ट, आई.सी.आई., एलाइड केमिकल्स, रेमिंगटन, कैंटर पिलर ट्रैक्टर, क्राइसलर कार्पोरेशन फायर स्टोन, जनरल इलैक्ट्रीकल्स कार्पोरेशन, इन्टरनेशनल हार्वेस्टर, कोल्ट, कोका-कोला, आई. बी. एम. आदि।
      द्वितीय विश्व युद्ध की पूरी रूपरेखा हेड्रिख मुल्लैर द्वारा बनायी गयी थी जिसके तहत पोलैण्ड के ऊपर सबसे पहला आक्रमण किया गया। हैड्रिख मुल्लैर, हिटलर के दाहिने हाथ के रूप में अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पद पर जर्मन सेना के संचालन के लिये नियुक्त हुआ था।
      इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हैड्रिल मुल्लैर द्वितीय विश्व युद्ध के समय कुख्यात बहुराष्ट्रीय कम्पनी आई.टी.टी. का प्रमुख था। यह बहुराष्ट्रीय कम्पनी युद्ध के समय में फासिस्ट गुट को वित्तीय सहायता प्रदान कर रही थी। इसके अलावा अपनी सहयोगी कम्पनी फोके बुल्फ एयर क्राफ्ट कार्पोरेशनके साथ मिलकर बमवर्षक विमानों की आपूर्ति फासिस्ट गुट को कर रही थी। सम्पूर्ण युद्ध के दौरान आई.टी.टी. की संचार सेवाओं ने नाजी युद्ध तन्त्र को सीधी सहायता की थी। पर युद्ध समाप्त होते ही यह कम्पनी अमरीकी सेना की भी प्रमुख ठेकेदार बन गयी और इसके अधिकारी मित्र राष्ट्रों के गुप्तचरों के साथ मिलकर घनिष्ठता से काम करने लगे। मजेदार बात यह थी कि आई.टी.टी दोनों ओर से युद्ध में लड़ रही थी। फासिज्म के खिलाफ यह कम्पनी अमरीका व सोवियत संघ को मदद कर रही थी तथा दूसरी ओर नाजी सेनाओं को मदद कर रही थी।
यह अत्यन्त ही विचित्र लगता है कि युद्ध समाप्ति के 30 वर्ष बाद आई.टी.टी. कम्पनी को अमेरिकी सरकार की ओर से 2 करोड़ 60 लाख डालर इस बात की क्षति पूर्ति के लिये प्राप्त हुये कि अमेरिकी विमानों ने जर्मनी में कम्पनी (आई.टी.टी.) के प्रतिष्ठान को भारी नुकसान पहुँचाया था। इस प्रकार आई.टी.टी. ने एक युद्ध के मैदान से तीन-तीन आर्थिक फसलें काटीं। दो बार अपने मुख्यालय के माध्यम से अमेरिका से और एक बार अपनी सहायक कम्पनी के माध्यम से जर्मनी से। यह गौर किया जाना चाहिए कि युद्ध के पूर्व भी इस कम्पनी के जर्मन सेना के गुप्तचर विभाग के प्रमुख गोयरिंग से अत्यन्त ही मधुर सम्बन्ध थे, जिसके कारण कम्पनी के हिटलर के साथ महत्वपूर्ण सम्बन्ध बने थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के तुरंत बाद अमेरिका की 23 बड़ी कम्पनियों ने नाभिकीय हथियारों को बनाना शुरू किया। इन हथियारों के परीक्षण स्थल बने अफ्रीका व एशिया के गरीब व छोटे देश। हथियारों का उत्पादन करने वाली कम्पनियाँ दि दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगीं। अब यह हथियारों का व्यवसाय कम्पनियों के फलने-फूलने का आधार बना। जो आगे चलकर वियतनाम युद्ध, कोरिया युद्ध, ईरान-ईराक युद्ध व कई अन्य छोटे युद्धों में और अधिक तेजी से फैलता गया।
ईरान के शाह और प्रतिक्रियावादी अरब हुकूमतों ने हथियारों को खरीदने में सैकड़ों अरब डालर खर्च किये हैं। इजरायल, चीन और मिस्र की सरकारें भी हथियारों के बढ़ाव को कायम रखने में सक्रिय रही हैं। इजरायल-मिस्र समझौते के बाद मध्य-पूर्व में अमरीका के सैनिक औद्योगिक समुच्चय के लिये मुनाफे कमाने की नयी संभावनायें पैदा हो गयी। ईरान व अफगानिस्तान की घटनाओं से भी उन्हें ऐसे ही मौके मिले। जापान और चीन के बीच सम्पन्न तथाकथित शान्ति समझौते ने जिसमें माओवादियों ने, नायकत्ववाद के बारे में एक विरोधी लाबी तैयार की, मित्शूविशी, कावासाकी, हिताची, जोसेन और अन्य विशालकाय जापानी उद्योगों के मुनाफों में भारी वृद्ध कर दी। पीकिंग के दूत कर्जों और हथियारों की तलाश में पश्चिम में सारे देशों को छाने डाल रहे हैं। अभी हाल में अमरीकी यात्रा के दौरान ली पेंग ने लाकहीड, मेकडोनाल्ड-डगलस और बोइंग जैसे दर्शनीय स्थानों में रूचि दिखायी है। उनको श्लेसिंगर, नन और जैकसन जैसे बदनाम युद्धवादियों के द्वारा सैर करायी गयी। बोलीबिया, ब्राजील, चिली, यूनान और इंडोनेशिया में दक्षिणपंथी षड्यन्त्रकारियों को अमरीका सरकार की सलाहकार निगमों ने सहायता पहुँचायी और इसके बदले में इन देशों के सेनाध्यक्षों ने अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध करायी हैं। थल सेना और नौ सेना के लगभग 500 प्रमुख अड्डों और सैनिक हस्तक्षेप के दर्जन से उपर नियंत्रणकारी चौकियों पर दुनिया भर में जहाँ कही भी अमरीकी झंडा गाडा गया है, वहाँ अमरीकी कंपनियाँ घुस गयीं। विश्वव्यापी सैनिक साम्राज्य का निर्माण करना इनके लिये एक अच्छा धंधा रहा है। जबकि इन कंपनियों के समर्थकों का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां मूलतः एक शान्तिपूर्वक समाज की स्थापना के लिये सुंदर-सुंदर चीजों का निर्माण करने में लगी हुई है। इन कंपनियों का बचाव करने के लिये कितने ही सुंदर शब्दों का इस्तेमाल क्यों न किया जाय, और यह प्रमाणित करने के लिये कितनी ही जी-तोड़ मेहनत क्यों न करें, कि दुनिया में स्थायित्व पैदा हो गया है और राष्ट्रों की हालत में सुधार हो गया है, सैनिक खर्चों में कटौती की गयी है, लेकिन तथ्य उल्टा ही प्रमाणित करते हैं। हाल ही में न्यूयार्क टाइम्स ने अपने एक संपादकीय में लिखा है कि हथियारों का उत्पादन करने और कानूनी तौर पर उनका निर्यात करने में अमरीका की एक हजार से ज्यादा कंपनियाँ लगी हुई हैं। उनमें वे प्रमुख
औद्योगिक प्रतिष्ठान भी शामिल हैं जो दैनिक उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करने के लिये जाने जाते हैं। युद्ध सामग्री के निर्माण में एक्सोन (तेल), जनरल मोटस (मोटर), आई.बी.एम. (कम्प्यूटर), आर.सी.ए. (टी.वीसैट ), गुडईयर (टायर), डूयूपोंट (रसायन), सिंगर (सिलाई की मशीनें), वेस्टिंग हाउस (बिजली के सामान) और गल्फ आयल जैसी कंपनियाँ भी शामिल हैं। इन निगमों की कारगहुजारियों के कारण स्थायी शांति नहीं रह पाती। बल्कि सच तो यह है कि ये निगमें लगातार दुनिया को युद्ध के कगार पर खड़ा करने की कोशिश में लगी रहती है।
वियतनाम पर अमरीकी आक्रमण ने विशेष तौर प, उन भ्रांतियों को अधिक धक्का पहुँचाया जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा फैलायी गयी थीं। वियतनामी जनता के लिये इस युद्ध के भयंकर परिणाम सर्वविदित हैं। लेकिन बड़ी संख्या में अमरीकी लोगों को भी हिन्द-चीन के जंगलों में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। फायदा हुआ केवल इन बहुराष्ट्रीय निगमों को।
1955 से लेकर वियतनाम युद्ध की समाप्ति तक इन निगमों को हथियारों के 75 प्रतिशत आर्डर प्राप्त हुये। उस काल में अमरीकी सेना की शस्त्रों की आपूर्ति करने वालों की सूची काफी कुछ कहती है- बोईंग-1800 करोड़ डालर, जनरल डायनामिक्स- 1400 करोड़ डालर, नार्थ अमेरिकन एवियेशन इन कार्पोरेशन- 1330 करोड़ डालर, यूनाईटेड एयर क्राफ्ट – 1160 करोड़ डालर, जनरल मोटर्स – 1050 करोड़ डालर, डगलस 850 करोड़ डालर, आई.टी.टी. – 710 करोड़ डालर, मार्टिन मारिये 660 करोड़ डालर, ह्यूग्स – 470 करोड़ डालर, मेक्डोनेल – 570 करोड़ डालर, स्पेरी रेंड – 560 करोड़ डालर, रिपब्लिक – 530 करोड़ डालर, गु्रमेन – 420 करोड़ डालर, बेनडिक्स – 410 करोड़ डालर, वेस्टिंग हाउस 390 करोड़ डालर, कर्टिस राइट – 380 करोड डालर, रेथियोन – 330 करोड डालर, आई.बी.एम. – 320 करोड़ डालर। इन निगमों को युद्ध सामग्री के आर्डरों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस सदस्यों और सीनेटरों की मद से मिला था।
इजरायल भी इस बात को स्वीकारने लगा है कि मिसाइलों का व्यापार संतरों से अधिक लाभदायक है” – ये शब्द वहां के प्रधानमंत्री ने हाल में ही व्यक्त किये है। इजरायल हथियारों को बेचने में समर्थ है। वहाँ इन हथियारों का उत्पादन राकवेल’, ’लाकहीड’, ’वानिया’, ’जेनिथ’, ’वेस्टिंग हाउस’, ’मफीनबोल’, ’मेग्रावोक्स’, ’एयरोजोट’, ’जनरल न्यूक्लियोनिक्स’, लिंग-टेक्को-वोग्टआदि निगम कर रहे है। इजरायल के शस्त्र उद्योग के संरक्षकों में ड्यूश बैंक, एत्रजीत्र शामिल हैं जो पश्चिम जर्मनी के सबसे बड़े बैंकों में से एक हैं। यह बैंक वहाँ के निगमों को वित्त मुहैया कराता है। पिछले 10-12 वर्षो में यहाँ के निगमों के निर्यात में 50 गुना वृद्धि हुई है। आज यह निर्यात 100 करोड़ मार्क को पार कर चुका है। ये निगम जेट (लड़ाकू बमवर्षक), आस्टंड – 1124 (समुद्र तटीय गश्ती विमान), फौगा – माजिस्टर (बमवर्षक), अरावा (सैनिक परिवहन विमान), जहाज से छोड़े
जाने वाले प्रक्षेपास्त्र, 155 एम.एम. तोपें, प्रक्षेपास्त्र ढाने वाले जहाज तक बेचते है। प्रिटोरिया की सरकार इनके मुख्य ग्राहकों में से एक हैं।
नाभिकीय हथियारों को बनाने की प्रौद्योगिकी को बेचना विशेष रूप से विनाशकारी है। दक्षिण अफ्रीका के गणराज्य में नाभिकीय हथियारों का विकास इन निगमों की सहायता से किया जा रहा है। ये जनता की माँग को अनदेखा करके उनके उत्पादन में जुटे हैं। ये निगमें उन मानदण्डों तक का उल्लंघन करती है जिनको सरकारें मानती हैं अभी हाल में अर्जेटीना को एक निगम द्वारा नाभिकीय संयंत्र और प्रोद्योगिकी बेचने का मामला प्रकाश में आया है। हालांकि अर्जेटीना की सरकार इस बात की समुचित गारंटी नहीं दें रही थी कि उक्त संयंत्र का उपयोग सैनिक उद्देश्यों के लिये नहीं किया जायेगा, पर फिर भी पश्चिम जर्मनी के निगम ने उस सरकार को प्रौद्योगिकी व रियेक्टर दोनों बेचे।
दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर की हार के बाद पश्चिम जर्मनी में सामरिक राकेटों का विकास करने और इनका निर्माण करने पर रोक लगा दी गयी थी परन्तु ओ.टी.आर.ए.जी. कंपनी की पारराष्ट्रीयता का लाभ उठाते हुये इस निगम से कुछ नहीं कहा गया। फिर पश्चिम जर्मनी को यह विचार आया कि प्रक्षेपास्त्र व्यापार किसी अन्य देश की धरती से किया जा सकता है, अतः इस कंपनी ने जायरे में एक क्षेत्र की रियासत हासिल कर ली और प्रक्षेपास्त्र क्षेत्र का विकास कर लिया। जनता के सामने इस पूरे सौदों को व्यापारिक कह कर प्रस्तुत किया गया। अब जायरे के उस क्षेत्र का इस्तेमाल सारे अफ्रीका को धमकाने के लिये किया जा रहा है। हथियारों का उत्पादन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नीति का एक मूल अंग है। वे इसको मेहनतकश जनता की कीमत पर मुनाफों का एक स्थायी स्रोत मानती हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 से लेकर 1969 के बीच अमेरिकी कम्पनियों का विश्व व्यापारी पूँजी निवेश 72 अरब डालर से बढ़कर लगभग 708 अरब डालर हो गया। जिसके परिणाम स्वरूप विश्व भर के कुल पूँजी निवेश का 65 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी कम्पनियों के पास हो गया।
इसके अतिरिक्त सन् 1952 के बीच में अमेरिका में बनी मार्शल योजना के तहत यूरोपीय देशों को अपने बाजारों को विकसित करने हेतु 17 अरब डालर की अतिरिक्त अमेरिकी सहायता दी गयी। जिसके परिणाम स्वरूप यूरोप की प्रति व्यक्ति आय नाटकीय तरीके से बढ़ गयी। मार्शल योजना की यह सफलता थी, जिसके कारण यूरोपीय बाजार में अमरीका की वस्तुओं की मांग और अधिक बढ़ गयी। अमीर देशों द्वारा गरीब देशों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता का वास्तविक रूप सन् 1952 में देखने को मिला। विकसित देशों द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता गरीब देशों में बाजार पैदा करने के काम आती है, न कि उन देशों का विकास करने में। यूरोपीय अर्थशास्त्री रेमन्ड वर्नोन ने योजना पर टिप्पणी करते हुये कहा था । अमेरिका के लिये मार्शल योजना एक ऐसा राजनीतिक हथियार है, जिससे वह अपने देश की कम्पनियों को यूरोप में चल रहे आर्थिक युद्ध में सम्पूर्ण विजय की ओर ले जा रहा है और दुनिया में अमेरिकी आर्थिक-आधिपत्य की जड़ों को मजबूत कर रहा है। इस मार्शल योजना के दूरगामी परिणाम होंगे। दुनिया के अन्य गरीब देश भी अमेरिकी मदद पाने के लिये एक दूसरे से होड़ करेंगे जिसकी वजह से उनका सही विकास अवरुद्ध होगा और वे एक ऐसे विकास के रास्ते पर धकेल दिये जायेंगे जहां से वापस लौटना उन गरीब देशों के लिये फिर असम्भव होगा।
सन् 1960 के आते-आते रेमन्ड बर्नोन द्वारा की गयी भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य सिद्ध हुयी। एशिया व अफ्रीका के देशों में विदेशी मदद के बहाने अमेरिकी व अन्य यूरोपीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की घुसपैठ बढ़ने लगी। अब गरीब देशों को आर्थिक मदद देना अमेरिका की रणनीति बन गयी। आने वाली अमेरिकी सरकारों ने इस परम्परा को लगातार आगे बढ़ाया।
यूरोपियन आर्थिक समुदाय का गठन इसी दशक में हुआ। जिसका मुख्य उद्देश्य अमेरिकी कम्पनियों के यूरोप में बढ़ते प्रभाव को कम करने तथा यूरोपीय कम्पनियों को आगे बढ़ाने के लिये था। इसमें यूरोपीय देश आंशिक रूप से सफल रहे। क्योंकि अधिकतर यूरोपीय देशों के पास विदेशी मुद्रा (डालर) का अभाव था। लेकिन यूरोपियन आर्थिक समुदाय के गठन के बाद यूरोपीय बाजार आर्थिक उतार-चढ़ाव के दौर के बाद स्थिर होने लगा इसी दौर में यूरोपियन कम्पनियों का उदय हुआ। हालांकि कुछ
यूरोपियन कम्पनियाँ तो इस शताब्दी के शुरूआती दौर में ही अस्तित्त्व में आ चुकी थी। लेकिन सन् 1960 और उसके बाद यूरोपीय कम्पनियाँ भी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार पर छाने लगीं। सन् 1970 व इसके बाद का दौर जापानी कम्पनियों के उदय का था।


बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आपसी विलय
पश्चिम की बाजार संस्कृति का एक प्रमुख सिद्धान्त है- प्रतियोगिता। अर्थात् कम्पनियों में यदि आपसी प्रतियोगिता होगी तो माल की गुणवत्ता उच्चस्तरीय होगी, दाम कम होगा और अन्ततः उससे उपभोक्ता को ही फायदा होगा। बाजार में एकाधिकार को रोकने के लिये जरूरी है कि कम्पनियों में आपसी प्रतिद्वन्दिता हो जिससे कि कोई कम्पनी बाजार में अपना एकाधिकार स्थापित न करे। इसके लिये आवश्यक है कि एक से अधिक कम्पनियाँ बाजार में हों जो एक सी वस्तुओं का उत्पादन करती हों, जिससे उपभोक्ता को वस्तुओं के चयन, मूल्य व गुणवत्ता आदि का समुचित अधिकार मिल सके। वह अपनी पसन्द से चीजों के खरीद सके। कम्पनियों की स्वस्थ प्रतियोगिता से बाजार के भी आर्थिक हितों में वृद्धि हो।
आधुनिक बाजार सिद्धान्त की ये बातें एकदम बेबुनियाद हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मुनाफाखोरी की संस्कृति ने इन सभी बुनियादी सिद्धान्तों को नकारा है। आपसी प्रतियोगिता से बचने के लिये ये कम्पनियाँ आपस में समझौते करती हैं। मुनाफाखोरी को अधिकतम बनाये रखने के लिये कम्पनियाँ बाजारों पर एकाधिकार रखती हैं। इस एकाधिकार व मुनाफे को उच्चतम बिन्दु तक पहुँचाने के लिये ये कम्पनियाँ किसी भी हद तक जा सकती है। एक दूसरे से गलाकाट प्रतियोगिता में लिप्त रहने वाली ये कम्पनियाँ आपस में विलय भी कर सकती हैं, सहगामी हो सकती हैं। यदि कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लगता है कि आपसी प्रतिद्वन्द्विता में उनके मुनाफे में कमी आ रही है और बाजार से उनका एकाधिकार समाप्त हो रहा है, तो वे कम्पनियाँ निजी स्वार्थों के लिये आपस में मिलकर किसी एक विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनी को जन्म देती हैं।
अधिकांश चर्चित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का जन्म इसी विलय की प्रक्रिया से चलते हुआ है। उदाहरण के लिये:-
1.         ब्रिटिश लीलैण्ड मोटर कार्पोरेशन
2.         इन्टरनेशनल कम्प्यूटर लिमिटेड
3.         द फ्रेन्च इलैक्ट्रीकल कम्पनी

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-1)

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प्रस्तुतकर्ता : चंदन कुमार मिश्र
इन विदेशी कम्पनियों ने देश में कम्पन पैदा कर दिया है। पूरे देश में लाखों-करोड़ों लोगों के अस्वस्थ बनाने, रोजगार छीन लेने, भारत को कमजोर बनाने, पूरे देश को जकड़ कर जोंक की तरह पकड़ कर रखने में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने कोई प्रयास नहीं छोड़ रखा है। इसी विषय पर आइए एक शानदार किताब पढ़ते हैं जो कुछ कड़ियों में आपके सामने प्रस्तुत की जायेगी जिसका नाम है- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल। इसके लेखक हैं राजीव दीक्षित। इस किताब में आप निम्न अध्यायों को पढ़ेंगे।

युद्ध की राजनीति और हथियारों का व्यवसाय



बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में प्रवेश

विदेशी पूँजी का धोखा

भुगतान सन्तुलन और निर्यात का भ्रम

कर्ज और आर्थिक सहायता की राजनीति

उच्च विदेशी तकनीक का झूठ

घटते रोजगार और बढ़ती बेरोजगारी

दवाओं के नाम पर लूट

गुलाम होती खेती

आधुनिक विकास या प्रकृति विनाश

संस्कृति पर हमला

राजनैतिक हस्तक्षेप

विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और भारत

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का असली चेहरा
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल
-राजीव दीक्षित
आमुख
मानव समाज के लम्बे इतिहास में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का उदय एक ऐसी घटना है जिसने मनुष्य की जीवन शैली और अनुभव से परखे टिकाऊ मूल्यों को झकझोर दिया है। नवजात शिशु के भरपूर पोषण के लिए प्रकृति प्रदत्त माँ के स्तनपान की चिरकाल से चली आयी स्वास्थ्य परम्परा के स्थान पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा बेबी फूडको स्थापित करवा देना इसका एक उदाहरण मात्र है। राज्य, राष्ट्रीयता, धर्म, ईमान इन सब से ऊपर उठकर मुनाफा और आर्थिक साम्राज्य की हवस ने इन कम्पनियों को सुपरस्टेटबना डाला है जो प्रकृति और मनुष्य दोनों के शोषण पर टिकी है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में – रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान से लेकर युद्ध के विकराल हथियार बनाने तक – इनकी घुसपैठ है। विश्व के पर्यावरण को, विभिन्न क्षेत्रों में उद्भूत संस्कृतियों को इन कम्पनियों ने रोड रोलर की तरह रौंद डाला है।
यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने पश्चिम के देशों को अपने उपनिवेश बनाने में बड़ी मदद दी। इस उपनिवेशीकरण ने पश्चिम के देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तीसरी दुनिया के देशों में अपना व्यापार जाल फैलाने का भरपूर अवसर दिया। उपनिवेशी ताकतों की छत्र छाया में इन्होंने लातीनी अमरीका, अफ्रीका और एशिया के देशों से सस्ता कच्चा काल बटोरा और अपने महंगे बने बनाएमाल से उनके बाजारों को पाट दिया। नतीजतन इन देशों की टिकाऊ अर्थव्यवस्था टूट गयी और सम्पन्न देश अविकसित देशों की श्रेणी में धकेले दिये गये। द्वितीय महायुद्ध के बाद उपनिवेशीकरण का जाल टूटा, पर विकास के नाम पर ये कम्पनियाँ तीसरी दुनिया में अपनी घुसपैठ बनाए रहीं। उपनिवेशकाल में जो काम पुलिस-फौज के हथियार करते थे, उत्तर उपनिवेशकाल में वह काम विश्व बैंक और मुद्राकोष की सहायता से ऋण के हथियार द्वारा किया गया। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तीसरी दुनिया में निर्बाध रूप से अपने पाँव पसारने का कानूनी हक गैट के यूरूग्वे चक्र की समाप्ति पर बने विश्व व्यापार संगठन ने दे दिया जिसके तहत ये कम्पनियाँ इन देशों से राष्ट्रीय व्यवहारपाने की हकदार बन गयी है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक स्वायत्तता को नष्ट कर दिया है तथा व्यापक पैमाने पर गैर-बराबरी, और उपभोक्तावादी अपसंस्कृति फैलाई है। अब तो विकसित देश भी इनके कारण बेरोजगारी और उसके फलस्वरूप फैलते सामाजिक तनाव के शिकार हो रहे हैं।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बढता मकडजाल न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनियां में मानवीय संस्कृति और सभ्यता के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। इसलिए इनके खिलाफ चलने वाले इस अभियान में हम सभी एकजुट होकर आवाज उठायेंगे तो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा कर सकेंगे।
राजीव दीक्षित
सेवाग्राम, वर्धा
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल
मानव सभ्यता के विकास के इतिहास में किसी भी नयी खोज ने इतने मनोवेग, गहरे-संदेह, तीखी आलोचना व सनसनी को जन्म नहीं दिया, जितना कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने। जासूसी उपन्यासों का सा रोमांच पैदा करने वाली इनकी रहस्यपूर्ण गतिविधियों की जब कलई खुलती है तो अन्तर्राष्ट्रीय प्रेस जगत भी भौंचक्का रह जाता है जो कि स्वयं इस तरह की कारगुजारियों का भंडाफोड़ करने का आदी है। रोशनी की एक नीली सी लकीर अन्तर्राष्ट्रीय जगत के उन पुरोधाओं को भी चकाचौंध से आँखें भींचने पर मजबूर कर देती है, जो इस मुगालत में रहते है कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति उनके इशारों पर संचालित होती है।
आज ऐसे किसी भी बड़े अन्तर्राष्ट्रीय या राष्ट्रीय विवादों को ढूँढ़ पाना कठिन है जिनके पीछे कहीं न कहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्वार्थ न जुड़ें हों। किसी आर्केस्ट्रा के संचालक की भाँति ये कम्पनियाँ यह निर्धारित करती है। कि देश के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों एवं नेताओं को किस प्रकार के स्वर निकालने चाहिए। ये कम्पनियाँ उनके प्रति विशेष रूप से निर्मम होती हैं जो उनकी बात नहीं मानते। ऐसे लोगों को सीधे-सीधे उनके पदों से हटा दिया जाता है या उनकी हत्या करवा दी जाती है। इसलिए इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सुपर स्टेटभी कहा जाता है। जिन देशों की ये कंपनियों होती हैं उन देशों की सरकारें भी इनसे भयभीत रहती है क्योंकि ये राज्य के ऊपर एक अधिराज्य के रूप में काम करती हैं। अब राज्य की नीति, राज्य की शक्ति’, ‘राज्य की सम्प्रभुता’, आदि शब्द अर्थहीन हो गये है। इन कंपनियों की नीतियों से ही अब राज्य की नीतियां निर्धारित होती है। किन्तु विकसित देश इनको बर्दास्त करते हैं और इनका पोषण भी करते है क्योंकि ये कम्पनियां उनके लिए विकासशील व अविकसित देशों का दोहन करती हैं और नये साम्राज्यवाद को बनाये रखती है।
इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आपस में अनिष्टकारी गठजोड़ वास्तव में नयी सम्प्रभु शक्ति है। ये कंपनियाँ विशाल राजनैतिक शक्ति वाले अधिकाधिक स्वाधीन केन्द्र बनते जा रहे है जिन्होंने दुनिया के सभी देशों में राज्य के अन्दर राज्य जैसा कुछ बना लिया है जिसने स्वतन्त्र शक्ति हासिल कर ली है। इन कम्पनियों की ताकत का अनुमान इस बात से ही आसानी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका जैसा शक्तिशाली राज्य भी इन कम्पनियों की अवैध गतिविधियों पर रोक नहीं लगा सकता है। अमेरिका के फडरल रिजर्व बोर्डको इस बात की जानकारी नहीं होती है कि कितना यूरो डालरकहां और किसके पास है ? और वह अमेरिका में कैसे प्रवेश कराया गया है ? (विदेशों में जमा तरल मुद्रा का भंडार यूरो डालरकहलाता है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास करीब 3100 अरब डालर (78,000 अरब रूपये लगभग) की तरल परिसम्पतियाँ बताई जाती है जो विश्व की सभी सरकारों की तरल परिसम्पतियों का लगभग तीन गुना है। इनमें जरा सा भी परिवर्तन करने पर विश्व भर में भयंकर वित्तीय संकट उत्पन्न हो सकता है।
सन् 1988 में संसार के कुछ प्रमुख देशों की कम्पनियों ने 10,720 अरब डालर (20,2960 अरब रूपये लगभग) का व्यापार किया। देशों के अनुसार, कम्पनियों के व्यापार का आँकड़ा निम्न है:-
अमेरिका          4807 अरब डालर                    (36,526 अरब रू.)
जापान              2843 अरब डालर                    (51,174 अरब रू.)
पश्चिम जर्मनी  1201 अरब डालर                    (21,618 अरब रू.)
फ्रांस                 947 अरब डालर                      (17046 अरब रू.)
इटली                828 अरब डालर                      (14,904 अरब रू.)
ब्रिटेन               813 अरब डालर                      (14,634 अरब रू.)
कनाडा              482 अरब डालर                      (8,676 अरब रू.)
(स्रोतः फारचून, जून 1990)
अब राजनैतिक रूप से किसी देश को गुलाम बनाना सम्भव नहीं है। अतः देशों को आर्थिक रूप से इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जरिये गुलाम बनाया जाता है। ये कम्पनियाँ आर्थिक साम्राज्यवादी शोषण का एक प्रमुख हथियार है। किसी भी देश की राजनैतिक व्यवस्था को नियंत्रित किया जाता है, इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा। क्योंकि राजनीति अपने आप में कोई एक निरपेक्ष तत्व नहीं है। दूसरी ओर आर्थिक व्यवस्था भी अपने आप में अन्तिम सत्य नहीं है। यदि किसी देश की राजनैतिक व्यवस्था में किंचित परिवर्तन होता है तो आर्थिक होता है तो आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था एक बडे़ अनुपात में बदलती है और समाजीकरण का पूरा ढाँचा ही परिवर्तित हो जाता है। जिससे जीवन मूल्यों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है और एक मिश्रित संस्कृति का आविर्भाव होता है जिसके पैर अपनी
ही जमीन से उखड़कर किसी दूसरी जमीन की तलाश में होते हैं।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का इतिहास
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जड़ें मध्यकाल में वेनिस, अँग्रेज, डच व फ्रांसीसी व्यापारियों द्वारा स्थापित कंपनियों में मिलती हैं। प्राचीन सभ्यता में भी व्यापारियों द्वारा दूसरे देश में जाकर व्यापार करने के उदाहरण मिलते हैं। देश की सीमाओं को लांघ कर दूसरे देशों में व्यापार करने के प्रमाण मेसोपोटामिया सभ्यताके समय के मौजूद हैं। लेकिन यह व्यापार मुख्यतः स्वतन्त्र व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता था। व्यापारी समूह बनाकर एक देश से दूसरे देश में अपने माल की बिक्री के लिये जाते थे, और आवश्यकता की वस्तुयें वहां से खरीद कर लाते थे। भारत का रोम के साथ व्यापार, भारत का बर्मा, मलाया (अब मलेशिया), चीन आदि के साथ व्यापार इसी श्रेणी में आता था। रोमन साम्राज्य के समय
पार-राष्ट्रीय व्यापार खूब होता था, लेकिन व्यापारियों द्वारा साम्राज्य के पतन के बाद भारत का व्यापार चीन के साथ शुरू हुआ। मुख्यतः दक्षिण भारत का हिस्सा चीन के साथ व्यापारिक गतिविधियों में अधिक संलग्न था। व्यापार के इस स्वरूप में शोषण की कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी और न ही मेजबान व मेहमान देशों के बीच इस व्यापार को लेकर कोई झगड़ा हुआ करता था।
आधुनिक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चरित्र वाली दुनिया की सबसे पहली कम्पनी द मस्कोवी कम्पनीमानी जाती है जिसकी स्थापना सन् 1553 में हुयी थी। इस कम्पनी ने अपनी स्थापना के 3 वर्षो बाद ही दुनिया के महत्वपूर्ण शहरों में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित कर लिये थे। सन् 1553 से 1581 तक मस्कोवी कम्पनीने अकूत मुनाफा कमाया और सन् 1581 में कम्पनी के अलमबरदारों ने एक और विशालकाय कम्पनी द टर्की कम्पनीको स्थापित कर लिया। इस टर्की कम्पनीकी विशेषता थी कि इसने स्थापना के समय ही दुनिया के महत्वपूर्ण नगरों में अपने पाँव पसारे। ऐसा नहीं था कि 1553 से सन् 1581 के बीच दुनिया में किसी अन्य कम्पनी का जन्म ही नहीं हुआ। अन्य कई छोटी कम्पनियाँ सामने आयी लेकिन अधिक दिन तक चल न सकी। अतः यह कहा जा सकता है कि सन् 1553 से सन् 1581 तक मस्कोवी कम्पनीका व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रहा।
            सन् 1600 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में व्यापार करने के लिये आयी। हालाँकि इस कम्पनी की स्थापना एलिजाबेथ प्रथम के समय में ही हो चुकी थी, लेकिन इस कम्पनी ने बहुराष्ट्रीय चरित्र सन् 1600 में ही ग्रहण किया। भारत आने से पूर्व इस कम्पनी ने दुनियाँ के अन्य हिस्सों में भी पैर जमाने की कोशिश की थी लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया में अनेक छोटी-मोटी डच कम्पनियाँ अपना व्यापार कर रहीं थी। भारत में भी कुछ डच कम्पनियों को प्रवेश हो चुका था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सन् 1612 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने डच कम्पनियों के साथ अम्बोनिया (इन्डोनेशिया) में एक युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक षड्यन्त्र के तहत डच कम्पनियों के अधिकारियों की सामूहिक हत्या करवा दी। सन् 1667 के आते-आते ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने डच कम्पनियों का नामो-निशान मिटा दिया। सूरत के बन्दरगाह पर कब्जा करने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1612 में स्वाली में भी एक युद्ध लड़ा जिसके बाद सूरत के बन्दरगाह पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पूर्ण अधिकार हो गया। इसके बाद ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शिकंजा पूरे देश पर कसता चला गया।
ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति से पूर्व, सन् 1670 में स्थापित हडसन बे कम्पनीसन् 1672 में स्थापित द रायल अफ्रीकन कम्पनी1711 में स्थापित द साउथ सी कम्पनी आदि विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ दुनिया के तमाम हिस्सों में व्यापार कर रही थी।
सन् 1750 के बाद का दौर ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति का दौर था। जिसके दौरान उत्पादन की तकनीक में आमूल परिवर्तन आया। सन् 1600 से 1750 के बीच अंग्रेजी कम्पनी ने, जिसमें ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी शामिल थी, अंग्रेजों को अकूत पूँजी का मालिक बना दिया। भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों का शोषण करके अंग्रेजी बाजार में पैसे का प्रवाह अत्याधिक बढ़ गया। बाजार की ताकतें (बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ) बाजार में ताकतवर होती गयी। मुद्रा का दबाव लगातार बढ़ने का परिणाम औद्योगिक क्रान्ति के रूप में सामने आया।
औद्योगिक क्रान्ति ने व्यापारिक कम्पनियों को जमीन से जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा दिया। अधिक उत्पादन व कम लागत के सिद्धान्त के चलते कम्पनियों के मुनाफे बहुत तेजी से बढ़ते गये। सन् 1765 से 1785 के बीच मात्र 20 वर्षों में एक तरफ तो कई नये आविष्कार हुये तथा दूसरी और कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का जन्म हुआ।
सन् 1770 के अकाल में भारत में जहां लाखों लोगों की मौत हो रही थी, वहीं अंग्रेजी जमीन पर वैभव का नंगा नाच हो रहा था। जिस अनुपात में लोग ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा रचाये गये अकाल में मर रहे थे उसी अनुपात में अंग्रेजी साम्राज्य में कम्पनियों तथा आविष्कारों से चमत्कार हो रहे थे। अंग्रेजी बैंकों में इतना अधिक धन जमा हो गया था कि उतना धन दुनिया के किसी भी हिस्से में यदि होता तो वहाँ भी औद्योगिक क्रान्ति हो गयी होती।
मात्र 50,000 पाउण्ड से भारत में व्यापार शुरू करने वाली ईस्ट इण्डिया कम्पनी सन् 1770 तक आते-आते भारत से 20,00000 पाउण्ड के बराबर का मुनाफा प्रतिवर्ष कमाती थी। सन् 1860 तक कुछ और विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, जो मूलतः ब्रिटेन की थी, दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी थी। इसमें ऐनड्रयू यूल एण्ड कम्पनी, डंकन एण्ड ब्रदर्स कम्पनी, मेक्लाइट एण्ड कम्पनी, बर्न एण्ड कम्पनी, डंकन एण्ड ब्रदर्स कम्पनी,  
आक्टेवियस स्टील एण्ड कम्पनी, गिलान्डर्स अर्बुथनाट एण्ड कम्पनी, शा वालेस कम्पनी ऐसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ थीं, जिनकी 50 से अधिक कम्पनियाँ दुनिया के विभिन्न हिस्सों
में कार्य कर रही थीं। इन ब्रिटिश कम्पनियों के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिन-जिन देशों में ये कम्पनियाँ व्यापार करने के लिये गयी, उन देशों में अंग्रेजी साम्राज्य का झंडा लहराया गया। ब्रिटिश साम्राज्य की सीमायें बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वहां की कम्पनियों ने निभायी थी।
18 वीं शताब्दी के मध्य तक उत्तरी अमेरिका में ब्रिटेन की 13 कम्पनियाँ व्यापार कर रहीं थी। बाद में ये क्षेत्र, जिनमें ब्रिटिश कम्पनियाँ व्यापार के नाम पर शोषण कर रही थीं, ब्रिटिश उपनिवेश बने। इस उपनिवेशों के नाम भी उन्हीं कम्पनियों के नाम पर रखे गये जो इन क्षेत्रों की मालिक बन बैठी थी। उदाहरण के लिये मैसाचुसेट, बोस्टन, लेक्सिग्रंटन, वर्जीनिया, मैरीलैण्ड, जर्सी, पेनसिल्वेनिया आदि जगहों के नाम कम्पनियों के नाम पर रखे गये। जार्ज वाशिंगटन जैसे नेताओं के नेतृत्व में ब्रिटिश उपनिवेशों को मुक्त कराने का राष्ट्रीय आंदोलन अमेरिका में शुरू हुआ। आंदोलन का सबसे ताकतवर पक्ष था, अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार। लोगों  ने अंग्रेजी कम्पनियों द्वारा बनायी गयी वस्तुओं को खरीदना बंद किया। कम्पनियों को अन्य प्रकार के सहयोग देना छोड़ा। असहयोगऔर बहिष्कारके नारों से अमेरिकी धरती गूंजी और इस गूंज का परिणाम सन् 1783 में
मिला, अंग्रेजी दासता से मुक्ति में। उन 13 अंग्रेजी कम्पनियों को अमेरिका की धरती से अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा।
ब्रिटिश कम्पनियों द्वारा जो बीज अमेरिका की धरती छोडे़ गये, वे अब पौधे बनने लगे थे। अमेरिका में भी छोटी-छोटी कम्पनियाँ अस्तित्व में आने लगीं थीं। सन् 1865 में अमेरिका का सिविल वार समाप्त हुआ जिसको अमेरिकी औद्योगिक क्रान्ति का नाम दिया जा सकता है। सिविल वार की समाप्ति के बाद अमेरिका उसी नक्शे कदम पर चलने लगा जिस पर कभी ब्रिटेन चला था।
अमेरिका की सबसे पहली बहुराष्ट्रीय कम्पनी सिंगरथी, जो 1867 में स्थापित हुई। इस कम्पनी ने देश के बाहर अपनी पहली उत्पादन इकाई 1867 में ही ग्लासगो (स्काटलैण्ड) में स्थापित की। सन् 1867 में बायरने अपनी पहली उत्पादन इकाई कोलोन (फ्रांस) में स्थापित की थी जिसमें रासायनिक पदार्थ एनीलीन तैयार किया जाता था। इस कम्पनी के जनक प्रख्यात वैज्ञानिक फ्रेडरिक बायर थे जो जर्मनी के थे। सन् 1866 में विश्वविख्यात भौतिक शास्त्री अल्फ्रेड नोबुल ने डायनामाइट के उत्पादन के लिये
नोबुल इण्डस्ट्रीजनामक कम्पनी की स्थापना हेम्बर्ग में की। ये तीनों कम्पनियाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ थीं, जो आज अपनी 450 से अधिक कम्पनियों के साथ आर्थिक जगत की बुलंदियों पर हैं। ज्ञात रहे कि दुनिया का प्रतिष्ठित नोबुल पुरस्कार, डायनामाइट व अन्य विस्फोटक पदार्थों का उत्पादन करने वाली कम्पनी नोबुल इण्डस्ट्रीज द्वारा ही दिया जाता है।
19 वीं शताब्दी की शुरूआत तक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आकार व समृद्धि में अत्यधिक वृद्धि होने लगी थी। अतः यूरोपीय देशों की सरकारों ने संरक्षणवाद की नीति को अपनाया था। जिसके तहत उन देशों की सरकारों ने अपने देश की कम्पनियों को संरक्षण दिया और दूसरे देश की कम्पनियों को अपने बाजार में घुसने पर कई पाबंदियां लगाई। सन् 1890 तक अमेरिका में 5000 कम्पनियाँ स्थापित हो चुकी थीं। यूरोपीय देशों में उनको घुसपैठ करना अब मुश्किल हो गया था। क्योंकि अधिकतर यूरोपीय देशों में कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिये गये थे। अब इन अमरीकी कम्पनियों ने आपसी प्रतियोगिता से बचने
के लिये आपस में ट्रस्ट बनाना शुरू कर दिया। 5000 कम्पनियों में आपस में गठजोड़ हुआ और प्रथम विश्व युद्ध तक आते-आत अमेरिका में 300 विशालकाय  कम्पनियाँ देश की अर्थव्यवस्था पर कब्जा करके यूरोपीय दशों में भी घुस चुकी थीं। इन 5000 कम्पनियों के आपसी गठजोड़ ने आगे आने वाली कम्पनियों को आपस की प्रतियोगिता से बचने का, एक दूसरे के हितों का आपस में न टकराने का आसान रास्ता दिखाया। जब 5000 कम्पनियों ने आपस में मिलकर 300 विशालकाय कम्पनियाँ स्थापित की तो यूरोपीय देशों में कोहराम मच गया। देशों के आर्थिक प्रतिबन्ध ताक पर धरे रह गये। साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनाकर इन कम्पनियों ने यूरोपीय देशों में घुसपैठ की तथा उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को अपने अनुरूप बदलकर रख दिया। खुले बाजार की अर्थव्यवस्था का नारा देकर उन देशों के पुश्तैनी रोजगार धंधों को चौपट किया। प्रथम विश्वयुद्ध के समय तक बाजी एक दम से पलट गयी थी। कल तक जो ब्रिटेन के हाथ थी अब बाजी अमेरिकी कम्पनियों के हाथ थी। सन् 1901 में ब्रिटेन में काम करने वाली कम्पनियों में सबसे बड़ी कम्पनी पूरे यूरोप की सबसे बड़ी कम्पनी हुआ करती थी। सन् 1914 तक पूरे यूरोप में जितनी कारें बनती थीं उनमें से एक-तिहाई कार अकेले अमरीका की फोर्ड कम्पनी बनाती थी। जबकि इस कम्पनी की स्थापना हेनरीफोर्ड ने सन् 1903 में की थी। प्रथम विश्वयुद्ध के शुरू होने तक अमरीकी कम्पनियों ने यूरोप को रौंद कर रख दिया। इन सन्दर्भ में एफ.ए, मैकेन्जी द्वारा 1902 में लिखित पुस्तक द अमेरिकन इन्वेडर्सअत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं। उनके स्वयं के शब्दों में– “अमेरिका ने यूरोप को रौंद दिया हे, अपनी फौजों से नहीं बल्कि कम्पनियों द्वारा तैयार उत्पादों से। इन कम्पनियों के कप्तान आज यूरोप के भाग्य विधाता बन बैठे हैं। जिन्होंने मैड्रिक से लेकर सेंट्स पीटरबर्ग तक लोगों के दैनिक जीवन को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इन आततायी कम्पनियों के सामने अब कुछ भी सुरक्षित नहीं रह गया है। हमारे ड्राईवर अमरीकी गाड़ियों की गोद में बैठने को बेताब हैं। हमारे बच्चे अब अमरीकी भोजन पर पल रहे हैं और हमारे बुजुर्ग भी अब अमरीकी ताबूतों में दफनायें जा रहे हैं।अमरीकी कम्पनियों द्वारा बने सामानों की बाढ़ में यूरोप डूब गया। सुई से लेकर बड़ी-बड़ी मोटर गाड़ियाँ तथा बच्चों को दूध पिलाने वाली बोतल से लेकर, मरने के बाद दफनाने के लिये ताबूत तक अमरीकी कम्पनियों द्वारा बनाये जा रहे थे। सन् 1914 तक कोयला, रेलवे, इस्पात, इन्जीनियरिंग, कार, पेट्रोलियम, एल्यूमिनियम, रसायन, कपड़ा आदि क्षेत्रों में अमरीकी कम्पनियों का प्रभुत्व स्थापित हो चुका था। सन् 1914
तक अमेरिका व यूरोप की कुल तरल परिसम्पत्ति का 90 प्रतिशत बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में लगा हुआ था।