महाभारत की घटना कभी हुई है, इसमें मुझे संदेह है। लेकिन जगह-जगह जीवन के अलग-अलग मौकों पर महाभारत की कहानी से कुछ उपमाएँ हमारे यहाँ दी जाती रही हैं। या फिर मौके-बेमौके पात्रों की तुलना हम लोगों से भी करते रहते हैं जैसे हमारे यहाँ चुप्पी से भीष्म का, कुटिलता से शकुनी मामा का, मोह से धृतराष्ट्र का, ताकत या ज्यादा खाने या विशाल शरीर से भीम का तो सीधा संबंध ही मान कर चला जाता है। इसी क्रम में मैं आज महाभारत और उस युद्ध में शामिल एक प्रमुख पात्र अर्जुन पर कुछ विचार रखना चाहता हूँ। यद्यपि यह मैं मानता हूँ कि यह कहानी वास्तविक नहीं है, फिर भी इस पर अपने ये विचार रख रहा हूँ।

     महाभारत में गीता का उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को दिया, ऐसी मान्यता है। और गीता को गीत की तरह समझा गया। संसार के सभी ज्ञान के सार-रुप में गीता जानी जाती रही है। लेकिन इस गीता और गीता के उपदेश में मुझे कुछ नौटंकी दिख रही है। यही मैं यहाँ बताना चाहता हूँ। पहली बात कि गीता का उद्देश्य है अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित करना। गीता का अन्तिम परिणाम क्या होता है, बस बहुत बड़ा नरसंहार जिसे सत्ता के लिए किया गया है। क्या इस उद्देश्य से उत्पन्न गीता को इतना बड़ा स्थान मिलना चाहिए? फिलहाल मैं गीता के इस विवाद में नहीं उलझ कर आगे बढ़ता हूँ।
     गीता में 18 अध्याय हैं, कुल सात सौ श्लोक हैं। यानि इतनी बात इसमें आई होगी कि उसे समझाने में कई घंटे तो निश्चय ही लगे होंगे। युद्धभूमि में यह उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को दिया था। लेकिन क्या यह सम्भव है? अब जरा यह विचार कर लेते हैं। दुर्योधन के बारे में कहा गया कि उसने पांडवों को पाँच गाँव या सूई की नोंक भर जमीन देने से भी इनकार कर दिया था। बचपन में जहर खिलाकर भीम को मारने का भी यत्न वह कर चुका था। द्रौपदी के हँसने मात्र से उसका चीरहरण कराने का काम भी उसने किया था। क्या यही दुर्योधन इतना शान्त और धैर्यवान था कि वह रणभूमि में चुपचाप बैठकर अर्जुन को उपदेश सुनने देता? क्या सारे सैनिक, राजा और अन्य योद्धा घंटों यूँ ही खड़े होकर सिर्फ़ मुँह ताकते रहे? क्या यह सम्भव है कि दुर्योधन जैसा आदमी यह सब कुछ शान्ति से सम्पन्न होने देता रहा? यही नहीं, कृष्ण को बाँधने और दंड देने का आदेश देनेवाला दुर्योधन वापस कृष्ण से उनकी नारायणी सेना कैसे माँग सकता था? यह भी एक सवाल है।
     अब आते हैं सबसे बड़ी बात पर। संसार में अर्जुन से ज्यादा मूर्ख कोई भी था या नहीं कि उसे एक युद्ध की बात को समझाने में 700 श्लोकों की(इसमें कई अन्य श्लोक भी शामिल हैं जैसे संजय या धृतराष्ट्र की बात) किताब बन गई। एक सवाल के जवाब में जिस आदमी को इतनी बातें समझानी पड़ें वह बुद्धिमान कैसे हो सकता है। जिस व्यक्ति को समझाने में इतना समय लगाना पड़े कि घंटों बीत जाएँ उससे ज्यादा समझदार तो भारत की सेना और पुलिस है जो एक आदेश मात्र से हजारों लोगों की जान ले सकती है। या तो इस भ्रम और मोह में पड़नेवाले अर्जुन को नरसंहार पसन्द नहीं था या फिर वह भारी मूर्ख यानि बहुत कम समझने वाला था। पहली बात को मानें तो कृष्ण को नरसंहार पसन्द है। वह कृष्ण जो बचपन में कई राक्षसों को खेलते-खेलते मार डालते हैं, वे दुर्योधन को समझा पाने में असमर्थ होने की वजह से एकदम अयोग्य शिक्षक या कहिए परामर्शदाता साबित होते हैं। उनकी जगह तो आज के नेता ही बेहतर हैं जो एक बार एक वाक्य में सैनिकों को युद्ध करने को तैयार कर देते हैं और वह भी एक नहीं लाखों सैनिकों को। यह बात जरूर है कि पहले राजा भी लड़ता था और अब सिर्फ़ सेना लड़ती है, राजा ताली पीटता है।
     और युद्धरत अर्जुन की तस्वीर तो हर जगह देखने को मिलती है उसमें अर्जुन राजसी वस्त्रों में क्यों दिखते हैं जबकि पांडव वनवास या अज्ञातवास के बाद युद्ध करते हैं। और क्या वन में रहना इतना बुरा माना जाता था जैसा कि आज भी आदिवासी समाज को माना जाता है, कि सजा के तौर पर वनवास ही चुना गया था?
     इस तरह मेरे कहने का सीधा सा मतलब है कि या तो अर्जुन एकदम मूर्ख है या कृष्ण एकदम मूर्ख और अयोग्य शिक्षक।
ध्यान दें: महाभारत का ज्ञान दिखाने वालों के लिए यह आलेख नहीं है।