ग्यान और भाखा – राहुल सांकिर्ताएन

3 टिप्पणियाँ

भाषा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस चिट्ठे का नाम भी हिन्दीभोजपुरी है। तो जाहिर है कि भाषा सम्बन्धी लेख यहाँ अक्सर पढने को मिलेंगे ही। राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ या ‘भागो नहीं बदलो’ से एक अध्याय यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। इस किताब पर एक विस्तृत लेख इसी महीने पढने को मिलेगा। फिलहाल यह अध्यायजो किताब का सत्रहवाँ अध्याय हैयहाँ प्रस्तुत है। इस किताब की भाषा बड़ी लचकदार है। शुद्धतावाद के पक्षधरों के लिए यह भाषा एक चुनौती है। राहुल जी ने इस किताब की भूमिका में ही लिखा है कि यह किताब छपराबलिया इलाके की भाषा के असर के साथ हिन्दी में लिखी जा रही है। इस किताब में ‘’ के लिए ‘’, ‘’ के लिए ‘’, ‘ज्ञ’ के लिए ‘ग्य’ जैसे कई प्रयोग थे। हमारे इलाके में ऐसी ही भाषा बोली जाती है। किताब में कुछ पात्र हैं और पूरी किताब संवादात्मक शैली में लिखी गयी है। ‘भैया’ कोई गप्पी नहीं बल्कि एक प्रबुद्ध चिन्तक और विद्वान है। ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ सामान्य किसान हैं और ‘सोहनलाल’ एक पढ़ा-लिखा और शहर में रहनेवाला युवक है। किताब की भूमिका से लगता है कि ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ नाम के दो व्यक्ति थेऔर एक साधारण पढा-लिखा व्यक्ति जो मात्र  6-7 तक पढ़ पाया होवह भी समझ सकेराहुल जी के लिए इस किताब की भाषा को इस लायक मानने के आधार भी थे।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि यह किताब 1945-46 के आस-पास की हैतो जाहिर हैकिताब पर उस समय का असर कई जगह दिखता है। बँगला और उर्दू को लेकर बंग्लादेश में चले लफड़े का पूर्वानुमान भी राहुल जी ने लगाया थाइसका अन्दाजा इस अध्याय के आखिरी वाक्य से लगता हैजो इंदिरा गाँधी के समय सच भी साबित हो गया।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है इस अध्याय को पूरी तरह टंकित भी मैंने नहीं किया है। इसे ओसीआर साफ्टवेयर की सहायता से यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
राहुल जी ने इस किताब में अपना नाम ‘राहुल सांकिर्ताएन’ लिखा है। इसे अलग-अलग टुकड़ो में देना उचित नहीं लगाइसलिए पूरे अध्याय को एक ही बार में यहाँ रखा जा रहा है। थोड़ा अधिक समय लगेगा पढने में। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

 अध्याय 17
ग्यान और भाखा
सोहनलालदुक्खू मामाअभी तक हमने भैया से बहुत सँभलसँभल के सवाल पूछा हैअब एकाध अपने मन का भी सवाल पूछ लेने दो।
दुखराम: पूछो भैनेहम भी सुनेंगेलेकिन दो चार आना हम भी समझें ऐसा पूछना।
सोहनलाल: नहीं समझ पाओगे दुक्खूमामातो दो ही चार आना भरनही तो सभी समझोगे। अच्छा तो भैयाजोकें जो कहती हैंकि जितना ग्यानविग्यान दुनिया में हैवह सब हमने ही पैदा किया हैहम  रहेंगे तो दिया बुझ जायगा।
भैया: हम कब कहते हैं जोंको ने कभी अच्छा काम किया ही नहीं लेकिन जो दिया बुझ जाने की बात कहते हैंवह गलत है। हम दिया बुझने नहीं देंगे। हमारे कमेरों के राज में ग्यानविग्यान बहुत चमकेगा। वहाँ ग्यान के विना कुछ हो भी नहीं सकता। जोंको के राज में आज अपढ़अबूझ हलवाहे से भी काम चल सकता है लेकिन हमारे लिए तो मोटरहल चलानेवाले हलवाहे चाहिए। राज सँभालते ही पहला काम हमें यह करना पड़ेगा कि देसभर में कोई बेपढ़ नहीं रहे।
दुखराम: लेकिन भैयाकितने लोगो में तो जेहन ही नहीं होतीवह कैसे पढ़ेंगे ?
भैया: जोंकों की जैसी पढ़ाई होगीतब तो सबको पढ़ नहीं बना सकते। जोंकें बिद्दा पढ़ाने के लिए भाखा पढ़ाती हैंअपनी भाखा पढ़ावे तो कोई उतनी मेहनत नहीं लेकिन वह पढ़ाती हैं अंगरेजीफारसीअरबीसंसकीरत। जो हम देस भर को अंगरेजी पढ़ा देने की परतिग्या करेंगे तो वह सात जनम का काम है दुक्खू भाईहम तो बल्कि भाखा पढ़ायेंगे ही नहीं। क्या कोई आदमी गूँगा है कि भाखा पढ़ायें। लोग कथाकहानी कहते हैंहँसीमजाक करते हैंदेसबिदेस की बात बतलाते हैंसब अपनी ही भाखा में कहते हैं बस हम पहले तो यही कहेंगे कि दोतीन दिन में अच्छर सिखला देंगे। अड़तालिस अच्छर तो कुल हई हैं। दोतीन नहीं तो पाँचछः दिन लग जायेंगेफिर आदमी जो भाखा बोलता हैउसी में छपी किताब हाथ में थमा देंगे।
दुखराम: ऐसा हो भैयातब पढ़ना काहे का मुस्किल हो।
भैया: ढोलामारुसारंगासदाव्रिच्छलोरिकीसोरठीनैकाकुँअरि विजयमलबेहुला के कितने सुन्दरसुन्दर खिस्से और गाने हैं। इन्हीं को छाप के दे दिया जायतब कहो दुक्खू भाई!
दुखराम: तो बूढ़े सुग्गे भी रामराम करने लगेंगे क्या किसी को पढ़ने में परिस्त्रम मालूम होगा।
भैया: बिद्दा अलग चीज है दुक्खू भाईभाखा अलग चीज है। लेकिन जोंकें हमको सिखलाती हैं कि भाखा पढ़ लेना ही ग्यान है। यह ठीक है कि ग्यान सिखाते बखत उसे किसी भाखा में बोला जाता है। लेकिन अँगरेजी में काहे बोला जायअरबीसंसकीरत में काहे बोला जायउसे अपनी बोली में काहे  बोला जाय।
सोहनलाल: लेकिन बोली तो पांच कोस पर बदल जाती है। ऐसा करने से तो हजारों भाखा बन जायेगीऔर कौनकौन में किताब छापते फिरेंगे?
भैया: पाँच को नहीं जो 5 अंगुल पर ही भाखा बदल जायतो भी हमको उसी में किताब छापनी पड़ेगी। तभी हम दस बरिस के भीतर अपने यहाँ किसी को बेपढ़ नहीं रहने देंगे।
सोहनलाल: लेकिन हिन्दी भी तो अपनी भाखा है।
भैया: जिसकी अपनी भाखा होउसे हिन्दी ही में पढ़ाना चाहिएतुम्हारे बनारस में सब लोग घर में हिन्दी ही बोलते हैं?
सोहनलाल: किताब वाली भाखा तो नहीं बोलते भैयाबोलते तो हैं वही बोली जो बनारस जिला के गाँव में बोली जाती है।
भैया: जो   अच्छी तरह सिखा दिया जाय तो अपनी बोली में आदमी कितने दिनो में सुद्धसुद्ध लिखने लगेगा?
सोहनलाल: अपनी बोली को तो भैयाअसुद्ध कोई बोल ही नहीं सकता। अच्छर में चाहे भले ही एकाध गलती हो जायलेकिन व्याकरन की गलती कभी नहीं होगी।
भैया: और हिन्दी कितना दिन पढ़ने पर व्याकरन की गलती नहीं करेगा।
सोहनलाल: कोईकोई आदमी तो भैया जिन्दगी भर पढ़ने पर भी  सुद्ध बोल सकते हैं  लिख सकते हैं।
भैया: लेकि अपनी बोली को तो आदमी चाहे भी तो असुद्ध नहीं बोल सकतायह तो मानते ही हो। अच्छा जिनगी भर हिन्दी  बोलनेवालों की बात छोड़ो। मामूली तौर से सुद्ध हिन्दी लिखनेबोलने में कितना समय लगेगा। हमारे गाँव के एक लड़के को ले लोजिसकी भाखा हिन्दी नहीं बल्कि भोजपुरी या बनारसी है।
सन्तोखी: मैं कहूँ भैयाहमारे यहाँ लड़के आठ बरस पढ़ के हिन्दी मिडिल पास करते हैंलेकिन तो भी  सुद्ध हिन्दी बोल सकते हैं लिख सकते  हैं।
भैया: सोहन भाईतुम इन्ट्रेन्स पास वालों की बात कहो।
सोहनलाल: जब पूछते ही होतो मैं बतलाता हूँ कि कितने तो बीपास कर के भी सुद्ध हिन्दी लिखबोल नहीं सकते।
भैया:  मैं आठ साल पढ़े मिडिल वाले को लेता हूँ  बीकी चौदह साल की पढ़ाई। मैं इतना समझता हूँ कि आदमी की जेहन बहुत खराब  हो और भाखा ही भाखा पढ़ता रहे तो पाँच बरस तो जरूर ही लगेंगे। लेकिन हिसाब और दूसरी चीज साथ ही साथ पढ़नी होतब काम नहीं बनेगा। हमारे मदरसों में जो हिसाबजुगराफिया सब कुछ अपनी ही भाखा में पढ़ना होतो पाँच बरस क्या भाखा सीखने में एक दिन भी नहीं देना होगा। ग्यान है हिसाबजुगराफियाइतिहासखेती की बिद्दाइंजन की बिद्दासड़कपुल मकान बनाने की बिद्दा और पचीसो तरह की बिद्दा। ग्यान पढ़ाने के लिए जब हम यह सरत रख देते हैं कि जब तक तुम पराई भाखा  पढ़ोगेतब तक ग्यान में हाथ नहीं लगा सकतेतब वह बहुत मुस्किल हो जाता है।
सन्तोखी: हम लोगों की भाखा को तो भैयालोग गँवारू कहते हैं।
भैया: आइलगइल”, “आयन गयन”, “आयोगयो”, “एलगेल” बोलने से तो गँवारु भाखा हो गईऔर आयेगये” कहने से वह अच्छी भाखा होगी। और कम् वेन्ट” कहने से वह बहुत अच्छी भाखा हो गई। काहेसे वह साहेब लोगों की भाखा है। साहेब लोगों का डंडा  सिर पर हैउनका राज हैइसलिए अँगरेजी बोली बहुत अच्छी भाखा हैवह देवताओं की भाखा से भी बढ़कर हैलेकिन जब साहब लोगों का राज  रहेऔर गँवार यही किसानमजूर अपना पंचायतीराज काय कर लेंतो क्या तब भी उनकी भाखा गँवारू रहेगीयह तो जिसकी लाठी उसकी भेंस” वाली बात हुई। गँवारू कह देने से काम नहीं चलेगा। जिस बखत इसी गँवारु भाखा में इसकूलकालेज सब जगह चौदह बरस तक पढ़ी जानेवाली बिद्दा पढ़ाई जायगी उसी में हजारों किताबें छपेंगी। उपन्यासकविताकहानी सब कुछ गँवारू भाखा में मिलने लगेगा। रोजानाहफ्तावारमाहवारीअखबार निकलने लगेंगेतब इस भाखा को कोई गँवारू नहीं कहेगा।
दुखराम: क्या ऐसा होगा भैया?
भैया: जो तुम लोग हमेसा गँवार बने रहना चाहोगेतो नहीं होगाजो तुम हमेसा गुलाम बने रहोगेतो भी नहीं होगाजो हिन्दुस्तान के आधे आदमियों को बेपढ़ बनाये रखना हैतो नहीं होगानहीं तो इसमें  अनहोनी कौनसी बात हैबल्कि अपनी बोली पकड़ने से तो छः बरस का रस्ता एक दिन में पूरा हो जाता है।
सोहनलाल: लेकिन अपनीअपनी बोली पढ़ाई जाने लगीतो दरभंगाबनारसमेरठ और उज्जैन के आदमी एक जगह होने पर कौनसी भासा बोलेंगे?
भैया: आज भी गौहाटीढाकाकटकपूनासूरतपेसावर के आदमी एकट्ठा होने पर क्या बोलते हैं।
सोहनलाल: हिन्दी बोलते हैंटूटीफूटी हिन्दी से काम चला लेते हैं।
भैया: लेकिन इकट्ठा होने का ख्याल करके उनसे यह नहीं  कहा जाता कि तुम असामीबँगलाउड़ियामराठीगुजरातीपस्तो छोड़ के हिन्दीसिरिफ हिन्दी पढ़ोनहीं तो कभी जो इकट्ठे होओगे तो बात करने में मुस्किल पड़ेगा। जैसे उन लोगों को अपनी भाखा में सब कुछ पढ़ाया जाता हैउसी तरह दरभंगा वालों को मैथिलीभागलपुर वालों को भगलपुरिया ( अंगिका )गया वालों को मगही,  छपरा वालों को छपरही ( मल्ली )लखनऊ वालों को अवधीबरैली वालों को बरैलवी ( पंचाली ),  गढ़वाल वालों को गढ़वालीमेरठ वालों को मेरठी ( खड़ी बोली या कौरवी )रोहतक वालों को हरियानवी ( यौधेयी  )जोधपुर वालों को मारवाड़ीमथुरा वालों को ब्रजभाखा,  झाँसी वालों को बुन्देलखंडीउज्जैन वालों को मालवीउदयपुर वालों को मेवाड़ीझालावाड़ वालों को बागड़ीखँड़ुआ वालों को नीमाड़ीछतीसगढ़ वालों को छतीसगढ़ी सबको अपनीअपनी भाखा में पढ़ाया जाय।
सोहनलाल: पढ़ाने में तो सुभीता होगा भैयाहर आदमी का पाँचपाँच साल बच जायेगा और डर के मारे जो बीच ही में पढ़ाई छोड़ बैठते हैंवह भी बात नहीं होगी लेकिन हिन्दी भाखावालों का एका टूट जायगा।
भैया: एका टूटने की बात तो इस बखत नहीं कह सकते हो सोहन भाईइस बखत तो एका सिर्फ दिमाग में है। मध्य प्रान्त अलग हैयुक्त प्रांत और बिहार भी अलग हैहरियाना भी पंजाब में है ओर रियासतों ने छप्पन टुकड़े कर डाले हैंइसे आप देखते ही हैं।
सोहनलाल: लेकिन हम तो चाहते हैं कि सबको मिलाकर हिन्द का एक बड़ा सूबा बना दिया जाय।
भैया: सूबा नहींपंचायती राजप्रजातंत्र। सूबा क्या हम हमेसा विदेसी जोंकों के गुलाम बने रहेंगेऔर अपना राज होने पर किसी सुरुजबंसी को दिल्ली के तख्त पर बैठायेंगेहमारा पंचायती राज रहेगाजो एक नहीं बहुत से पंचायतीराजों का संघ होगा। जो लोग चाहेंगे तो दरभंगा से बीकानेरऔर गंगोत्तरी से खँडवा तक का एक बड़ा प्रजातंत्रसंघ काय कर लेंगे जिसके भीतर पचीसों प्रजातंत्र रहेंगे।
सोहनलाल: तो भैयामल्ल प्रजातंत्र की बोली मल्लिका रहेगी और मालव प्रजातंत्र की मालवीयौधेय (अंबाला कभिश्नरीप्रजातंत्र की हरियानवीफिर जब वह हिन्द प्रजातंत्र संघ की बड़ी पंचायत (पार्लामेण्ट)  में बैठेंगेतो किस भाखा में बोलेंगे?
भैया: हिन्दी में बोलेंगे और किसमें बोलेंगे ? इन्हीं की बात क्यों पूछ रहे होमदरासकालीकटबेजवाड़ा,  पूनासूरतकटककलकत्ता और गोहाटी के मेम्बर भी जब सारे हिन्दुस्तान के प्रजातंत्र संघ की बड़ी पंचायत में इकट्ठा होंगेतो क्या वह अंगरेजी में लेच्चर देंगे। अंगरेज जोंको के जुवा के उतार फेंकने के साथ ही अंगरेजी भाखा का जोर हिन्दुस्तान में खतम हो जायगा तब हिन्दुस्तान में एक दूसरे के साथ बोलनेचालने और सारे देस की सरकार के कामकाज के लिये एक भाखा की जरूरत होगीतो वह भाखा हिन्दी ही होगी!
सोहनलाल: तो भैयाहिन्दी भाखा को तो तुम उजाड़ना नहीं चाहते हो ?
भैया: हम उजाड़ेंगे कि उसे और मजबूती से बसावेंगे। सारे हिन्द प्रजातंत्र संघ की वह संघ भाखा होगी। मदरसों में जैसे अंगरेजी के साथ दूसरी भाखा पढ़ाई जाती हैवैसे ही बारह बरस की उमर से 3-4 साल तक लड़कों को हर रोज एक घंटा हिन्दी पढ़नेका कायदा बना देंगे। उस बखत हिन्दी का जोर और बढ़ेगा कि घटेगा?
सोहनलाल: आज तो हिन्दी ही हिन्दी सब कुछ हैफिर तो ब्रिजमालवीमैथिली  अपने घर की मालकिन बन जाऐंगीफिरर बेचारी हिन्दी को जब कोई बुलायेगा तभी  चौखट के भीतर आयेगी।
भैया: आजकल यह कहना तो गलत है कि हिन्दी सब कुछ हैकाहेसे कि सब कुछ तो अंगरेजी है। दूसरे हिन्दी के चौखट के भीतर बैठाने की बात भी ठीक नहीं है। मेरठ कमिश्नरी के साढ़ेतीन जिले, ( मेरठमुजफ्फरनगरसहारनपुर,  देहरादून .5, बुलंद सहर 1/4 की भी तो जनम भाखा वही है। उसके बाद सारे हिन्दुस्तान में घरघर मे उसकी आव भगत रहेगी।
सोहनलाल: तो लोग अपनीअपनी भाखा का प्रजातंत्र बना लेंगेफिर तो हिन्दुस्तान सौ टुकड़ों में बँट जायेगा।
भैया: सोवियत की आबादी हम लोगों से आधी है20 करोड़ ही हैलेकिन वहाँ तो 182 भाखा बोली जाती है और सबका अपना छोटाबड़ा पंचायतीराज है। तुम चाहते हो कि पाँचों उगुँलियों को खुला नहीं रखा जाय बल्कि मिलाके सी दिया जायलेकिन इससे हाथ मजबूत नहीं होगा सोहन भाईसोवियत 182 प्रजातंत्र वाला होने पर भी एक बड़ा प्रजातंत्र है। हिन्दुस्तान भी 100 प्रजातंत्रों वालाएक बड़ा प्रजातंत्र हो तो कौनसी बुरी बात है?
सोहनलाल: अच्छा तो यही होता कि सारे हिन्दुस्तान का एक ही प्रजातंत्र होता?
भैया: अच्छा तो होता जो हिन्दुस्तान के लेग एक ही बोली बोलते होतेलेकिन वह तो अब हमारे हाथ में नहीं है। क्या सारे हिन्दुस्तान का तुम एक सूबा बनाना चाहते हो?
सोहनलाल: नहीं सूबा तो हम अलगअलग चाहते हैं। बंगालउड़ीसासिन्ध सबको मिटाकर एक सूबा तो बनाया नहीं जा सकता।
भैया: अंगरेजी राज में जो आज सूबा है और 12 लाख सालाना खरच पर वहाँ लाट साहब लाके बैठाये जाते हैंवही तब प्रजातंत्र कहा जायगाजिसका राजकाज पंचायत के हाथ में होगाअनेक सूबा को तो तुम मानते ही होउसका मतलब ही है कि अनेक प्रजातंत्र हिन्दुस्तान में रहेंगे और हिन्दुस्तान प्रजातंत्रों का संघ रहेगा। अब झगड़ा यही है  कि 14 प्रजातंत्र रहे या सौ ? मैं कहता हूँ कि उतने ही प्रजातंत्र हों जितनी भाखा लोग बोलते हों और अपनेअपने प्रजातंत्र में पढ़ाईलिखाईकचहरीपंचायत का सब कारबार अपनी भाखा में हो लेकिन सौ प्रजातंत्र होने का मतलब यह तो नहीं है कि अब वह एकदूसरे से कोई वास्ता नही रखेंगेऔर कछुए की तरह मूँड़ी समेटकर अपनी खोपड़ी में घुस जाएँगे। हमारे महा– प्रजातंत्र के ये सभी प्रजातंत्र हाथपैरनाककान की तरह अंग होंगे। सबमें एक  खून बहेगा। सब एकदूसरे की मदद करेंगे। उस बखत रेल की लाइनें आज से भी ज्यादा बढ़ जायेंगीपक्की सड़कें गाँवगाँव में पहुँच जायँगी। हर प्रजातंत्र में हवाई जहाज के अड्डे होंगे। लोगों की जेब में पैसा रहेगासाल में महीने डेढ़ महीने की सबको छुट्टी मिलेगी। तो बताओ लोग कूएँ के मेढक बनकर बैठे रहेंगे या अपने महादेस में घूमनेफिरने जायेंगे?
दुखराम: घूमनेफिरने जायँगे भैयादेस परदेस देखने का किसका मन नहीं कहतानातेदारोंरिस्तेदारों से मिलने की किसकी तबियत हीं होती।
भैया: जनमभाखा को कबूल करने से हिन्दी को नुकसान होगा यह ख्याल गलत है सोहन भाईउस बखत बनारस वाले कानपुर वालों से बहुत नगीच रहेंगे, टेलीफून भी नगीच कर देगाहवाई जहाज भी और जेब का पैसा भी। हिन्दी सीखना लोग बहुत पसन्द करेंगे, क्योंकि सारे देस की साझे की भाखा वही है,  फिर हिन्दी में पोथियाँ सबसे अधिक निकलेगी। आजकल देखते हैं  हिन्दी के सिनेमाफिल्म जितने निकलते हैंउतने बँगलामराठीतमिलतेलगू सारी भाखाओं के मिल के भी नहीं निकलते। हिन्दी भाखा की किताबों की भी वही हालत होगीउसके पढ़नेवाले देश भर में मिलेंगे। मुझे उमेद हैकि जैसे चौपटाध्याय फिल्म हिन्दी में निकल रहे हैंवह किताबें वैसी नहीं होंगी।
सोहनलाल: चौपटाध्याय फिल्म क्या कह रहे हो भैयाजो चौपटाध्याय होते तो इतने लोग देखने क्यों जाते और फिल्म वालों को लाखों रुपये का नफा कैसे मिलता?
भैया: देखनेवाले तो इसलिए जाते है कि दूसरा अच्छा फिल्म है कहाँदूसरे नाचगाना और सुन्दर मुँह के देखने की आदत लोगों की पहिले ही से हैबस वह समझते हैं कि चलो दो आना में तवायफ का नाच ही देख आएँलेकिन सिरिफ सुन्दर मुँह और सुरीले कंठ तक में ही फिल्म को खतम कर देना अच्छी बात नहीं है सोहन भाई। उसमें बातचीतहावभाव और तसवीरों से दुनिया का असली रूप दिखलाना होता हैसाथ ही साथ लोगों को रस्ता भी दिखलाना होता है। लेकिन रस्ता दिखलाने की बात छोड़ दोकाहेसे कि जोंकों के राज में वह अनहोनी बात है। लेकिन हिन्दी फिल्मों में सब चीजों में बेपरवाही देखी जाती है। फिल्म बनानेवाले तो जानते हैं कि उनके पास रुपया चला ही आयेगाफिर क्यों परवाह करें?
सोहनलाल: हिन्दी फिल्मों मे आपको क्या दोस मालूम होता है भैया?
भैया: पहिले गुन बताता हूँ तब दोस बताऊँगा। गुन तो यह है कि हमारे फिल्म के खिलाड़ी (अभिनेता ) और खिलाड़िनें (अभिनेत्रियाँअपना करतब दिखलाने में दुनिया के किसी भी खेलाड़ीखेलाड़िनी से कम नहीं हैं। और अच्छे फिल्म के लिए यह बहुत अच्छी चीज है। वह अपनी बातचीतहावभाव गीतनाच  सब में अच्छे हैंमैं सभी खेलाड़ीखेलाड़िनों के बारे में नहीं कहता लेकिन अच्छे खेलाड़ीखेलाड़िनों में यह सब गुन हैं। और इन्हीं गुनों का परताप है कि मदरासकालीकट और बेजवाड़ा में भी लोग अपनी भाखा के फिल्मों को छोड़कर हिन्दी फिल्मों को देखने आते हैंचाहे बेचारे फिल्म की भाखा को नहीं समझ पायें। मैं समझता हूँ कि ये हमारे खेलाड़ीखेलाड़िनों के गुन का ही परताप है। पैसा बनानेवाले फिल्म मलिकों की चले तो सायद उसमें भी कुछ खराबी कर दें।
सोहनलाल: और दोस क्या है भैया!
भैया: भाखा तीन कौड़ी की होती है उसमें लचक कहावत और  गहराई होती है। यह क्यों होता हैबहुत से फिल्म मालिक भाखा जानते ही नहींलेकिन तो भी अपने को महाविद्वान समझते हैं। एक तो उनके भाखा लिखनेवाले भी बहुत से उन्हीं की तरह हैं और जो कोई अच्छा भी लिखता होतो अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा कहने का अख्तियार फिल्म तैयार करनेवाले अपने हाथ में रखते हैं। समझ लो पूरी दमदसोधन हो जाती है।
सोहनलाल: दमदसोधन क्या है भैया?
भैया: किसी पंडित ने एक मुरुख से अपनी लड़की ब्याह दी। दामाद एक दिन ससुरार आया। छापाखाने से पहिले की बात हैउस वक्त किताबों को उतारनेवाले मामूली पढ़ेलिखे लेखक हुआ करते थे वह मजूरी लेक किताब उतार दिया करते थे। पंडित लोग किताब लेके फिर पढ़ते और जो असुद्ध होता उसपर पीला हड़ताल फेरते और जिसको ज्यादा ध्यान में रखना होता उसे गेरू से लाल कर देते। पंडित के दामाद ने पोथी, हड़ताल और गेरू को देखा। उन्होंने पोथी को हाथ में ले लिया। पंडिताइन को अपने दामाद पर बहुत गरव थाउन्होंने समझा कि दामाद भी बड़ा पंडित है और उससे कहा—“पंडित गेरू और हड़ताल से किताब को शोध रहे हैं तुम भी तो सोधते होगे बाबू!” दामाद कब पीछे रहनेवाले थे। उन्होंने कहा—“हाँ अइयामैं अच्छी तरह जानता हूँ।“ फिर जहाँ मन आया हड़ताल लगायाजहां मन या गेरू पोथी की दमदसोधन हो गई।
सोहनलाल: तो इसमें फिल्म पैदा करनेवालों का ज्यादा दोस है या भाखा लिखनेवालों का।
भैया: फिल्म पैदा करनेवालों का बहुत बड़ा दोस हैउनमें ख़ुद लियाकत नहीं है और  लायक आदमियों को चुन सकते हैं। भाखा लिखनेवालों में जो थोड़े से अच्छे भी हैंउनमें भी एक बड़ा दोस है। वह हिन्दी या उर्दू की किताबी भाखा लिखते हैं। किताब से पढ़के सीखनेवाले की भाखा में जीवट नहीं होता और सहरों मे जो थोड़ेबहुत बाबू लोग अपने घरों में हिन्दी भाखा बोलते हैंवह भी किताबी भाखा जैसी ही होती है।
सोहनलाल: तो जीवट वाली भाखा कौन बोलते हैं भैया?
भैया: मेरठमुजफ्फरनगरसहारनपुर के जिलों के गँवार।
सोहनलाल: तब तो  फिल्म की भाखा सीखने लिए इन गँवारों के पास जाना पड़ेगा?
भैया: उनके चरन में जाकर बैठना पड़ेगा। हिन्दी भाखा को किताब वालों ने नहीं पैदा कियाबल्कि इन्हीं गँवारों ने पैदा किया। हिन्दी पढ़नेवालों ने सैकड़ों बरस पहले उन गँवारों से भाखा तो ले लीलेकि भाखा में जीवट आने के मुहाविरेकहावतेंसबदों का तोड़नामरोड़ना और उन्हें मनमाने तौर से रखना इत्तादि बातें नहीं सीखींइसलिए हिन्दी भाखा में वह चमतकार नहीं  सका। किताब पढ़ने में तो किसी तरह आदमी बरदास भी कर लेगा लेकिन नाटक की बातचीत में इससे काम नहीं चल सकता।
सोहनलाल: तो भैयातुमने कोई फिल्म ऐसा नहीं पायाजिसमे कुछ जीवट वाली भाखा दिखाई दे।
भैया: मैंने सिर्फ एक फिल्म ऐसा देखा है जिसकी भाखा मुझे पसंद आईवह था –“जमीन।” मैं समझता हूँ जब तक फिल्म पैदा करनेवाले अपने को सब कुछ जाननेवाला मानना नहीं छोड़ेंगे और जब तक भाखा लिखनेवाले मेरठ के उन गँवारों के चरनों में नहीं बैठेंगेतब तक यह दोस नहीं जायेगा।
सोहनलाल: और दूसरे दोस क्या हैं भैया?
भैया: दूसरे दोस फिल्म पैदा करनेवालों को है चाहे उन्हें उनका अंधापन कह लो चाहेचाहे कम दाम ज्यादा नफा” का ख्याल समझ लोचाहे फिल्म मालिकों का अपने घर के पास ही फिल्म बनाने का हठ समझ लो। हिन्दी के फिल्म बम्बई या कलकत्ता में ही तैयार किये जाते हैं। वहीं के आसपास के गाँवोपहाड़ोंनदियों का फोटो खींचा जाता है। वहाँ  हिन्दी बोलने वाले  गाँव हैं  हिन्दी वालों के रीतिरवाज कपड़ेलत्ते। इसका फल यह होता है कि सब चीजें बनावटी दीख पड़ती हैं। बहुतसी चीजों को तो वह आने नहीं देते। जमीन” की तसवीरों में भी यह दोस मौजूद है। यह दोस बँगलामरहठी या तमिल फिल्मों में नहीं पाया जाताकाहेसे कि उनमें उन्हीं गाँवोंनदियोंपहाड़ों और लोगों की तसवीरें ली जाती हैंजो उस भाखा को बोलते हैं। हिन्दीफिल्मों का यह दोस तब तक दूर नहीं होगाजब तक देहरादून,  कालसी जैसी जगहों में फिल्म वाले अपने डंडाकुंडा उठाके नहीं  जाते।
सोहनलाल: और कौन दोस है भैया?
भैया: हिन्दी फिल्मों की सारी तसवीरें दोएक मील के छोटे से घेरे में घूमती रहती हैंवह विसाल नहीं होतीं। नदियोंपहाड़ोंखेतोंगाँवों का जो विसाल रूप हमें मिलना चाहिए उसे हम नहीं पाते। क्या जाने यह पैसा बचाने के ख्याल से होता होगा।
सोहनलाल: और कोई दोस है भैया?
भैया: हस्तिनापुर के पास गंगा का विसाल कछार हैवहाँ सैकैड़ों गाएँभैंसे चरती हैंचरवाहे मस्त होकर गाना गाते हैंगंगा में मलाह नाव खेता है और अपनी तान में सारी मेहनत भूल जाता है। धोबीकुम्हार सबके अपनेअपने गीतअपनेअपने बाजेचित्र विचित्र नाच हैं। सहरों में भी औरतों के ब्याह और दूसरे वक्त के अपनी खासखास नाच और नाटक हैं। इस तरह की सैकड़ों चीजें हैंजिनका बम्बई और कलकत्ता के फिल्मों में कहीं पता नहीं है।
सोहनलाल: और कोई दोस है भैया?
भैया: मैं अब एक ही दोस और कहूँगा। हिन्दी भाखा हिमालय की गोद में बोली जाती है। दुनिया के फिल्म वाले हिमालय के सुन्दर पहाड़ोंनदियोंझरनोंदेवदार वनों और बरफीली चोटियों को पा के निहाल हो जातेलेकिन हिन्दी फिल्म वालों के लिए वह कोई चीज नहीं। जापान के राज्य की राजधानी तोकियो हैलेकिन फिल्मों की राजधानी क्योतो हैकाहेसे कि क्योतो को थोड़ासा हिमालय का रूप मिला है। लेकिन हमारे आज के फिल्मवालों को इसका कभी ख्याल आयेगाइसमें सक है।
सोहनलाल: तो भैयाजो फिल्म बनानेवाले मेरठ कमिसनरी के हिमालय वाले टुकड़े में  जायँतो उनके बहुत से दोस हट जायँगे?
भैया: यह मैं मानता हूँलेकिन यह भी समझता हूँकि सेठ अपना घर छोड़ तपोबन में थोड़े जाना चाहेंगेवह पचास तरह का बहाना कर सकते हैं। और सबसे बड़ी बात यह हैकि नफा तो उन्हें खूब हो ही रहा है और थोड़े ही खर्च में। लेकिन हम फिल्म की बात करतेकरते बहुत दूर चले गये सोहन भाईमैं कह रहा था हिन्दी भाखा के बारे में
सोहनलाल: हाँतो तुम समझते हो कि अपनीअपनी भाखा को पढ़ाई की भाखा मान लेने पर हिन्दी को नुकसान नहीं होगालेकिन भैयादुनिया को हमें और एक दूसरे के नगीच लाना है। मरकस बाबा तो सारी मानुख जाति को एक बिरादरी देखना चाहते थेफिर किसी संजोग से जो हिन्दी के नाते हिन्दुस्तान के आधे लोग एक भाखा से बँध गये हैंउनको फिर तोड़फोड़ के अलग करनायह तो पैर पकड़ के पीछे खींचना है।
भैया: पैर पकड़कर पीछे खींचना नहीं है सोहन भाईयह हाथ पकड़ कर आगे बढ़ाना है। जनमभाखा से पढ़ाई करने पर दस बरस के भीतर ही हमारे यहाँ को अपढ़ नहीं रह जायगा। और एकदूसरी जगह जानेआपस में मिलने से हिन्दी भाखा सभी लोग थोड़ाबहुत बोल लेंगे। और समझने में तो किसी को मुसकिल नहीं होगाकाहेसे कि इन सब भाखाओ में बहुत से सबद एक ही से हैं। कविताकहानीउपन्यास का ढंग भी एकसा ही रहेगा। हिन्दी पोथियों की उतनी ही ज्यादा माँग होगीजितनी ही अधिक इन भाखाओं के पढ़नेलिखने वाले बढ़ेंगे। कमी इतनी होगीकि आज जो हमारे कितने ही भाई यह समझते हैंकि अवधीब्रजमालवीबनारसीमैथिली इत्तादि भाखायें कुछ दिनों में मर जायेंगीउनको जरूर निरास होना पड़ेगा। निरास वैसे भी होना पड़ेगाक्योंकि जो जनमभाखाओं को किताब की भाखा  भी बनाया जायतो भी सौपचास सालो में उन भाखाओं के मरते देखने की खुसी हमारे भाइयों को नहीं मिलेगी। अभी उन्हें मरना भी नहीं चाहिएक्योंकि उन्होंने अपने भीतर अपनी जाति की भाखासमाज,  विचारविकास ओगरह के इतिहास की बहुत सी अनमोल सामिगरी रखी है। मैं जानता हूँ जो दुनिया से जोंके उठ जायँगीतो मानुख जाति जरूर एक होगी और फिर सबकी एक साझी भाखा भी होगी। हो सकता है कि एक साझी और एक अपनी जनमभाखा दो भाखाओं का रहना मुसकिल हो जाय। लेकिन वह अभी सैकड़ों बरसों की बात है। उस बखत तक हरेक भाखा के भीतर जितने रतन छिपे हुए हैंसब जमा करके अच्छी तरह रख लिए गये रहेंगे। इसलिए किसी भाखा के नास होने से उतना नुकसान नहीं होगा।
सोहनलाल: लेकिन भैयायह बोलियाँ अभी ऐसी नहीं हैं कि इनमें साइन्सविग्यान पर किताबें लिखीं जायँ। हिन्दी ने बड़ी मुसकिल से यह कर पाया है।
भैया: जो मान लें कि बनारसी बोली में साइन्स की किताब नहीं लिखी जा सकतीतो कितने ही दिनों तक हिन्दी में किताबें पढ़ेंगेजब तक कि हिन्दी बोली नाबालिग से बालिग  हो जायगी। हिन्दी जैसी किसी भाखा की किताब पढ़ना और उसमें लिखनाबोलना दोनों में बहुत फरक है । समझ लेना बहुत सहज है। अपनी बोली के पढ़ाने का मतलब यह नहीं हैकि हिन्दी को लोग छुयेंगे नहीं। दूसरी बात यह है कि बनारसीमालवी किसी भी भाखा में साइन्सइन्जीरिंग की किताबों के लिखने में उतनी ही दिक्कत होगी,  जितनी हिन्दी में। आखिर हिन्दी ने भी साइन्स के सबदों को संसकीरत से लिया हैबँगलागुजराती , मराठी भी संसकीरत से ही सबदों को लेती हैं फिर बनारसीमैथिलीब्रिजमालवी ने क्या कसूर किया है?
सोहनलाल: हिन्दीउर्दू के बारे में तुम्हारी क्या राय है भैया?
भैया: मेरी राय क्या पूछ रहे होमैंने तो पहिले ही कह दिया है कि जिसकी जो जनमभाखा हो उसको उसी भाखा में पढ़ाना चाहिए। बनारस में बहुत से बंगाली भी रहते हैंउन्हें बँगला में पढ़ाना होगा। मराठे भी हैंउनको मराठी में पढ़ाना होगा। हाँकोई दो भाखा बोलनेवाला हो तो वह चाहे जिस पाठसाला में जाय। इसी तरह बनारस में जिस लड़के की जनमभाखा हिन्दी हैउसके लिए हिन्दी की पाठसाला काय करनी होगीजिसकी जनम भाखा उर्दू है उसके लिए उर्दू का मदरसा कायम करना होगा।
सोहनलाल: तो भैयातुम हिन्दीउर्दू को मिलाके एक भाखा नहीं करना चाहते।
भैया: मिलाना हमारे बस की बात नहीं हैदस पाँच आदमी बैठकर भाखा नहीं गढ़ा करते। हिन्दीउर्दू के बनने में सैकड़ों बरस  जाने कितनी पीढ़ियों ने काम किया है। मैं मानता हूँ कि हिन्दी और उर्दू भाखा मूल में एक ही भाखा है। कामेंपरसेइसउसजिसतिसनातागा” दोनों ही में एकसे हैंखाली झगड़ा है उधार लिए सबदों का। हिन्दी ने संसकरित से सबदों को उधार लिया है  और उर्दू ने अरबी और कुछकुछ पारसी से भीलेकिन दोनों ने इतना अधिक उधार लिया हैकि अकबाल की कविता को समझनेवाला सुमित्रानन्दन पन्त की कविता को बिलकुल नहीं समझ सकता और सुमित्रानन्दन पन्त की कविता जाननेवाला अकबाल को बिलकुल नहीं समझ सकता। इसलिए मूल में दोनों एक हैंकहने से काम नहीं चलेगा। अकबाल और पन्त दोनों के समझने के लिए दोनों भाखाओं को अच्छी तरह पढ़ना होगा।
सोहनलाल: तो हिन्दूमुसल्मानों की भाखाओं के मिलने का कोई रस्ता है?
भैया: चोटियों पर तो नहीं मालूम होतालेकिन जड़ में उसका झगड़ा ही नहीं है,
सोहनलाल: जड़ क्या है भैया?
भैया: जड़ यही है किजिसे जनमभाखा कहते हैंअवधी बोलनेवाले गाँव में चले जाइयेवहाँ चाहे बाभन देवता हो चाहेमोमिन जोलाहादोनों एक ही बोली बोलते हैं। बनारसछपरागुड़गाँवाथानाभवन के पास किसी गाँव में चले जाइयेकिसानोंमजूरों की भाखा एक हैचाहे वह हिन्दू हो या मुसल्मान।
दुखराम: वही जोंकों से जिनका बेसी रिसतानाता नहीं है।
भैया: देखा  सोहन भाईजड़ में अपनी एक भाखा तैयार हैहिन्दूमुसल्मान दोनों कमेरे उसी भाखा को बोलते हैं और फिर उनका  संसकीरत के साथ पच्छपात है  अरबी फारसी के साथ। यही दुक्खू भाई ने जो अभी कहा, “बेसी रिसतानाता” इसमें बेसी और रिसता पारसी भाखा से आया है और नाता अरबी भाखा से। रिसतानाता कहने से बिलकुल निपढ़गँवार बुढ़िया भी समझ लेगीलेकिन सम्बन्ध” कहने से उतना नहीं समझ पायेगी। हमने भी अपने इतने दिनों के सत्संग में पाँच सौ अरबीफारसी सबदों को लिया है, और हिन्दी में उनकी जगह अब सिरिफ संसकीरत के सबद ही लिखे जाते हैं। मै समझता हूँ कि कोई अदमी समरकन्द बुखारा से सात पीढ़ी पहिले आया होलेकिन अब उसकी भेखभाखा सब हिन्दुस्तान की हैतो वह हिन्दुस्तानी है। वह अपने पुरखा के सहर समरकन्दबुखारा में जायगातो वहाँ भी उसे लोग हिन्दुस्तानी कहेंगे आजकल समरकन्दबुखाराउजबेकिस्तान सोवियत प्रजातन्त्र के अच्छे सहर हैं। उसी तरह जिन अरबीपारसी सबदों को निपढ़ गँवारों ने अपना लिया है और उसको वह अपने ढंग से तोड़मरोड़ के बोलते हैंवे सबद अब बिदेसी नहींसुदेसी हैं। जिन संसकीरत सबदों को हमारे गँवार” छोड़ चुके हैंउनको फिर से लादना भी ठीक नहीं।
सोहनलाल: लेकिन भैयाइन गँवारों ने तो हजार बारह सौ संसकीरत के सबदों को निकाल कर अरबी के सबद लिए है। हमेसा’, ‘दिक्कत’, ‘मुसकिल’, ‘मवस्सर’, ‘अरज’, ‘गरज’, ‘लेकिन’, ‘बेसी’, ‘अमहक’ ( अहमक ), ‘इफरात’, ‘जमीन’, ‘हवा’, ‘तुफान’, ‘सहर’, ‘नौबत’, ‘जुलुम’, ‘परेसानी’, ‘मेहरबानी’, ‘वगैरह’  सबदों को उन्होंने लेकर संसकीरत के सबदों को छोड़ दिया है। जो संसकीरत के सबद रखे हैंउनके बोलने में भी लाठी से पीट के ठीकठाक कर डालते हैं। और आप इसी भाखा को अपनाने को कहते हैं?
भैया: दोनों बातों को एक में  मिलाओ सोहन भाईजहाँ तक जनमभाखा की बात, है उसके लिए  रामसरूप पंडित की बात मानी जायगी  कुतुबुद्दीन मोलबी कीउसके लिए तो धनिया भौजीगाँव की बेपढ़ अहिरिन को ही परमान माना जायगा। दोनों सबदों को उसके सामने रखा जायगाजो अरबी वाले सबद को वह समझेगी तो उसे ले लिया जायगासंसकीरत वाले को समझेगी तो उसको। बोलने में कठिन सबदों की धनिया भौजी कपालकीरिया करे हीगीऔर उसकी कपाल किरिया को भी मानना पड़ेगा। हिन्दीउर्दू को मिलाने का काम भी यही जनमभाखायें करेंगीक्योंकि जनमभाखाओं में हिन्दूमुसल्मान का झगड़ा नहीं है। जड़ वालों का रस्ता साफ हैचोटी वालों का झगड़ा है। उनमें जो अपनी जनमभाखा उरदू मानता हैवह उरदू में लिखेपढ़ेगा जो हिन्दी मानता है वह हिन्दी में। मेरठ कमिसनरी के साढ़े तीन जिले में भी कौन भाखा माननी चाहिए। इसका फैसला वहाँ कोई जाट की धनिया भाभी के हाथ में होगा।
सोहनलाल: और जो हिन्दुस्तान के संघ की भाखा हिन्दी होगीउसमें हिन्दीउर्दू का झगड़ा कैसे मिटेगा ?
भैया: पहिले तो हिन्दी के अपने साढ़े तीन जनम जिलों की भाखा के मुताबिक उसको मानना पड़ेगा। जिसके कारन बहुत से संसकीरत के सबद छूट जायँगेऔर बहुत से अरबी फारसी के भी। फिर यह प्रजातन्त्रों के ऊपर छोड़ दिया जायगा कि वह कौन भाखा पसन्द करेंगे। जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दो तरह के प्रजातंत्र हमारे देस में बनेंगेतो हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ में हिन्दी संघ भाखा होगी और पाकिस्तान में उरदू। मैं यह भी जानता हूँ कि आज की उरदू को जो बंगाल वाले पाकिस्तान पर लादा जायगातो बहुत मुसकिल होगी।
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योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-3)

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योद्धा संन्यासी का जीवन 

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अपने सत्तर वर्ष के जीवन में वे निरंतर सक्रिय रहे और एक साथ कई मोर्चों पर! हर मोर्चे पर उनका एक खास मकसद दिखाई देता है। भारतीय इतिहास के अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड में उन्होंने अपना लेखन कार्य शुरू किया। भारत की स्वाधीनता का आंदोलन प्रथम विश्व युद्ध के बाद तेज हुआ और उसमें विभिन्न धाराओं का संघर्ष ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगा। समाज सुधार की धारा बंगाल से विकसित हुई जिसका प्रभाव संपूर्ण देश के बुद्धिजीवियों पर पड़ा। राहुल ने अपना जीवन समाज सुधारक संन्यासी के रूप में शुरू किया; यह महज एक संयोग नहीं। वे प्रेमचंद की तरह आर्यसमाज के प्रभाव में आए और फिर कांग्रेस से भी प्रभावित हुए। लेकिन प्रेमचंद की ही तरह उनका इन धाराओं से मोहभंग भी हुआ। फिर उन्होंने पतनोन्मुख भाववाद के विरुद्ध बौद्ध दर्शन को एक वैचारिक-आधार के रूप में ग्रहण किया। भारतीय समाज की संरचना, जाति, वर्ण और वर्ग की विशिष्टता एवं शोषण के विभिन्न रूपों की जटिलता आदि तमाम सवालों से लगातार जूझते रहे। इनका समाधान उन्हें मार्क्सवादी दर्शन में दिखाई पड़ा। वैज्ञानिक चेतना और समग्र विश्वदृष्टि के लिए अनवरत आत्मसंघर्ष उनकी प्रारंभिक रचनाओं में खुलकर व्यक्त हुआ है। ज्ञान की पिपासा और निरंतर कार्य करने की बेचैनी उनके व्यक्तित्व की विलक्षण विशेषताएँ हैं। उनका मानना था कि ज्ञान, विचार द्वारा वस्तु को जानने की एक चिरंतन तथा अंतहीन प्रक्रिया है और ज्ञानात्मक चेतना मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व से निर्धारित और प्रभावित होती है।

साहित्य-दर्शन और इतिहास के बारे में राहुल जी का यह परिप्रेक्ष्य क्रमश: विकसित होता गया। उन्होंने अपने जीवन काल में जो कुछ लिखा, उसमें समाज को समझने, समझाने और उसे बेहतर रूप में बदलने की बौद्धिक कोशिश दिखाई देती है। इस क्रम में अगर उनसे कहीं कोई गलती या किसी खास विश्लेषण में यांत्रिकता दिखाई देती है तो इसके पीछे उस युग की बौद्धिक संरचना की अपनी सीमाएँ भी हैं। फिर राहुल जैसे विराट रचनाफलक वाले लेखक के साथ तो यह और भी सहज है पर रचना के स्तर पर उनकी वैचारिक तेजस्विता, मौलिक प्रतिभा और प्रतिबद्धता बेमिसाल है।

उनकी रचनात्मकता तीन मोर्चे पर सक्रिय दिखाई देती है। एक तरफ वह जीवन और समाज की वैज्ञानिक दृष्टि से पड़ताल करती है, दूसरी तरफ वह जीवन में हस्तक्षेप करते हुए आम जनता के मानसिक स्तर को उन्नत करने के प्रयास से प्रेरित है और तीसरे मोर्चे पर वह जनता की सांस्कृतिक जरूरत को पूरा करने की जिम्मेदारी निभाते हुए जन-साहित्य की परंपरा को समृद्ध करती है। समाज और जीवन के सरोकारों और समकालीन सामाजिक समस्याओं पर अपनी बेबाक राय जाहिर करते हुए कई बार वे प्रचार-साहित्य और अभियानी-लेखन के स्तर पर भी उतरे। लेकिन यहाँ भी उनका स्तर उतना ही उच्च है, जितना अपने सृजनात्मक साहित्य में! तुम्हारी क्षय”, “क्या करें”, “साम्यवाद ही क्यों?”, “भागो नहीं दुनिया को बदलो”, “तीन नाटक”, और रामराज्य और मार्क्सवाद जैसी पुस्तकें इसका उदाहरण हैं।
राहुल जी की जनपक्षधरता और तीव्र अन्वेषणात्मक प्रतिभा विवादों से परे है। अपने लेखन कार्यकाल के 34-35 वर्षों में उन्होंने लगभग 50 हजार पृष्ठों का साहित्य प्रकाशित किया। अभी भी उनकी कुछ पाण्डुलिपियाँ अप्रकाशित हैं। अपने सक्रिय जीवन की समस्त संभावनाओं का उन्होंने भरपूर उपयोग किया। एक बार किसी मित्र ने उनकी इस बात के लिए आलोचना कर दी कि आप हमेशा काम में जल्दबाजी दिखाते हैं। इतना लिखते हैं कि जल्दबाजी के कारण कई काम पूर्णता को नहीं छू पाते। इस पर राहुल जी ने बुद्ध को उद्धृत किया—“बुद्ध कह गए हैंसब्बम् खनिकम् (सब कुछ क्षणिक है) और फिर लेनिन ने भी कहा है कुछ भी अन्तिम नहीं है। इसलिए मैं नहीं मानता कि कोई भी मनुष्य पूर्ण है। मैंने कोई सत्य का एकाधिकार नहीं रखा है। मैं अपना काम करता हूँ। भावी पीढी आएगी और मेरे काम को सुधारेगी।
राहुल सांकृत्यायन के महान क्रांतिदर्शी कार्यकर्ता बहुत सारे लोग आज भी अनभिज्ञ हैं। कम लोगों को मालूम है कि वे बिहार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। 20 अक्टूबर, 1939 ईo को जब बिहार में भाकपा की इकाई गठित हुई तो पहली स्थापना बैठक में उपस्थित कुल 19 लोगों में एक राहुल जी भी थे। वे किसान आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती, कार्यानन्द शर्मा और राहुल सांकृत्यायन बिहार प्रांतीय किसान सभा के शलाका पुरुष माने जाते हैं। सन् 1939 ईo के शुरू में ही किसान सभा ने राहुल जी को छपरा जिले के किसान संघर्षों को संगठित करने की जिम्मेदारी सौंपी। फरवरी, ’39 में वे छपरा गए और वहाँ  आंदोलन का नेतृत्व करते रहे। अमवारी नामक एक गाँव में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा संरक्षित जमींदारों के एक गिरोह ने उन पर कातिलाना हमला कराया। 20 फरवरी, सन् 1939 को उन्हें गाँव के बाहर खेत में पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। फिर इसी हालत में पुलिस उन्हें जेल ले गई। इस घटना की सूचना जंगल में आग की तरह बिहार और फिर देश भर में फैल गई। उस वक्त के अखबारों ने भी इस घटना पर विस्तृत खबरें छापीं। रामवृक्ष बेनीपुरी और प्रोo मनोरंजन ने इस पर कई रचनाएँ लिखीं। जेल के अन्दर भी राहुल जी ने आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने किसान क्रांतिकारियों को राजनैतिक कैदी का दर्जा दिलाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल भी की। 1 अप्रैल, 1939 ईo को संपूर्ण बिहार में राहुल पर हमला विरोधी दिवस मनाया गया। वे सन् 1940 ईo में किसान सभा के प्रांतीय अध्यक्ष चुने गए। इसी वर्ष अखिल भारतीय किसान सभा के पाँचवे अधिवेशन (जो आंध्रप्रदेश के पलासा में होने वाला था) के लिए उन्हें सभापति भी मनोनीत किया गया। राहुल जी के जीवन और कर्म में सिद्धान्त और व्यवहार की जैसी एकरूपता दिखाई देती है वह सचमुच बेमिसाल है।
एक अध्यापक के रूप में उन्होंने सोवियत संघ के लेनिनग्राद में दो वर्षों तक कार्य किया। सन् 47 ईo में स्वदेश लौटे तो यहाँ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बंबई अधिवेशन के सभापति बनाए गए। सन् 47-48 ईo में भाषा-विवाद को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी से उनके गहरे मतभेद हुए। बंबई में साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में दिए भाषण पर भाकपा-नेतृत्व को घोर आपत्ति थी। इस प्रकरण को लेकर वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर दिए गए। लेकिन सदस्यता से वंचित रहने की स्थिति में भी वह भाकपा और उसकी राजनीतिक गतिविधियों का निरंतर समर्थन और सहयोग करते रहे। फरवरी, सन् 1955 ईo में फिर से कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। निधन के समय तक कम्युनिस्ट बने रहे।
उन्होंने कमलाजी से विवाह किया। सन् 1953 और 55 ईo में क्रमश: पुत्री जया और पुत्र जेता पैदा हुए। सन् 50 ईo में ही मसूरी में घर बसाया। लेकिन वह कहीं रुकने वाले कहाँ थे? सन् 58 ईo में फिर चीन गए। सन् 59 ईo में आए और मसूरी छोड़ दार्जिलिंग बसे। इसी वर्ष उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिर सन् 59-61 ईo के दौरान वे श्रीलंका में दर्शनशास्त्र के महाचार्य रहे।
सन् 1961 ईo के दिसम्बर महीने में स्मृति लोप का आघात हुआ और वे बिस्तर पर पड़ गए। एक महान् क्रांतिदर्शी लेखक यायावर और आंदोलनकारी के पाँव ठिठक गए। लगातार चलते ही रहने वाले इस विराट व्यक्तित्व के सामने मौत आ खड़ी हुई। सोवियत संघ में सात महीने तक चिकित्सा हुई। लेकिन 14 अप्रैल, 1963 का दिन आ पहुँचा।
जीवन और सृजन के प्रति उनकी अदम्य जिजीविषा आगे आने वाली पीढ़ियों को अनवरत काल तक प्रेरणा देगी। डॉo प्रभाकर माचवे ने उनके विपुल सृजनात्मक साहित्य के विषय की विविधताओं और विस्तार पर आश्चर्य प्रकट करते हुए लिखा है—“तिब्बत जैसे वर्जित प्रदेश की दुर्गम यात्राओं की बाधाओं और राष्ट्रीय आंदोलन के राजनैतिक संघर्ष में कारावास की कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने इतने ग्रंथ कैसे रचे ?”1 छह फुट लंबी स्वस्थ और सुंदर देहयष्टि वाले राहुल ने तेरह-चौदह वर्ष की अवस्था से मृत्यु तक लगातार संघर्ष किया। समाज और मानव जीवन की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे। अपने जीवन के किसी भी पल को व्यर्थ गुजरने नहीं देना चाहते थे, हर समय किसी न किसी योजना में लगे रहते।
वे आजीवन एक महान् बौद्धिक-योद्धा की तरह असत्य, अन्याय और अंधविश्वास से जूझते रहे। बौद्धदर्शन से मिली रोशनी ने उनके मार्क्सवादी विचारक को पैनी दृष्टि और तीक्ष्ण तर्क-शक्ति दी। उनका मानना था कि मार्क्सवाद को भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों में ठोस ढंग से लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त सामंती मूल्यों, जातिवाद-संप्रदायवाद और इन्हें सैद्धांतिक जामा पहनाने के ब्राह्मणवादी चिंतन का घोर विरोध किया। इतिहास की व्याख्या के क्रम में उन्होंने जाति-प्रथा का जमकर विरोध किया और इसे समाज की ऐसी विकृति के रूप में चिन्हित किया जो मानव संबंध और सामाजिक आर्थिक विकास की प्रक्रिया को क्षति पहुँचा रही है। उनका मानना था कि जन्म के आधार पर इस प्रकार का विभाजन झूठा और नितांत समाज विरोधी है। पूर्वजों द्वारा समाज के व्यवस्थित संचालन के लिए कर्म के आधार पर चार वर्णों में विभाजित व्यवस्था की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा—“कार्य विभाजन की यह प्रणाली अपनी उपयोगिता खोकर झूठे भेद-भाव के गर्त में जा पड़ी है। उन्होंने यहाँ तक कहा—“जब तक जाति-पाति की व्यवस्था समाप्त नहीं होगी भारत के विकास के लिए किए गए सभी प्रयत्न अपूर्ण रहेंगे।2
राहुल जी सामाजिक विषमताओं, धर्म एवं संप्रदाय से जुड़ी कुरीतियों, ब्राह्मणवादी चिंतन की जनविरोधी चालबाजियों, मायावाद, रहस्यवाद और पुनर्जन्मवाद पर प्रहार करते हुए भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं की व्याख्या करते हैं। वे इन दार्शनिक धाराओं के वर्गीय सरोकारों की शिनाख्त करते हैं। चलताऊ जार्गनवाद(जागरणवाद ही होना चाहिए शायद – प्रस्तुतकर्ता)  का सहारा लेने के बजाय बड़े सहजग्राह्य ढंग से इनकी व्याख्या करते हैं। अंधविश्वासों पर प्रहार करते हुए वह भारतीय इतिहास के जाने-पहचाने घटनाक्रमों से उदाहरण भी देते हैं कौटिल्य के अर्थशास्त्र को देखने से साफ पता चलता है कि हजारों प्रकार के मिथ्या विश्वास, जिन्हें इस बीसवीं शताब्दी में ब्रह्मविद्या, योग और महात्माओं का चमत्कार कहकर सुशिक्षित लोग प्रचारित करना चाहते हैं, उन्हें मौर्य-साम्राज्य का यह महान् राजनीतिज्ञ झूठा समझता है।
इस महान् रचनाकार के जीवन और कृतित्व की विविधता, गंभीरता और गहराई को देखकर सचमुच आश्चर्य होता है कि इतना सारा काम करने के लिए वह अपने समय का समायोजन कैसे कर लेते थे। वह एक स्वाधीनता सेनानी थे, एक क्रांतिदर्शी किसान नेता और एक कम्युनिस्ट नेता, उपन्यासकार-कहानीकार, गीतकार-नाटककार, निबंधकार, दार्शनिक-विचारक, इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता थे। इन क्षेत्रों में किए गए उनके काम असाधारण महत्व के साबित हुए। ऐसा लगता था मानो वे हर चुनौतीपूर्ण इच्छित काम को समाप्त करने की जल्दी में थे। पूरी उम्र को उन्होंने सार्थक बनाया और 21 वर्षीय राम ओदार साधू से 69 वर्षीय राहुल सांकृत्यायन के जीवन के एक-एक मिनट का उन्होंने उपयोग किया।
उनके रचना-कर्म और जीवन-कर्म का सबसे प्रमुख लक्ष्य समाज-परिवर्तन और मनुष्य की वास्तविक मुक्ति के महान् आदर्शों से अनुप्राणित था। कम लोगों को मालूम है कि मार्क्स-ऐंग्लिस (ऐंगिल्स प्रस्तुतकर्ता) के कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो को हिन्दी में लाने का पहला प्रयास राहुल सांकृत्यायन और आचार्य नरेंद्र देव ने संयुक्त रूप से किया। सन् 1931 ईo में राहुल जी और नरेंद्र देव ने मिलकर इस ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद किया। महान् कथाकार प्रेमचंद ने इन्हें प्रेरित किया। हिन्दी रूपान्तरण प्रेमचंद के ही प्रेस में छप रहा था। प्रेस पर पुलिस ने छापा डाला। कई और परेशानियों के कारण वह छप नहीं सका। इस बात की चर्चा स्वयं राहुल जी ने प्रेमचंद स्मृति शीर्षक अपने एक लेख में की है। उन्होंने अपनी दर्जनों पुस्तकों और पुस्तिकाओं (बुकलेट) के माध्यम से हिन्दी भाषी प्रदेशों की कई पीढ़ियों को मार्क्सवादी दर्शन और विचारधारा की ओर प्रेरित किया। आने वाली पीढ़ियाँ भी उनके साहित्य को पढ़कर सामाजिक बदलाव और मानव मुक्ति के महान् उद्देश्यों से अपने को जोड़ती रहेंगी। राहुल जी के प्रिय सहयोगी रहे, हिन्दी के कवि बाबा नागार्जुन ने उनकी महान् उपलब्धियों का इन शब्दों में मूल्यांकन किया है “….कितना विचित्र वह व्यक्ति है जिसे किसानों ने अपनी संस्था का प्रमुख चुना, प्रगतिशील लेखकों ने जिसको अपना पथ-प्रदर्शक घोषित किया और अब हिन्दी जगत् के साहित्यिकों ने जिसे अपने महासम्मेलन का अध्यक्ष निर्वाचित किया है।
1. राहुल सांकृत्यायन : प्रभाकर माचवे, पृष्ठ 27
2. मानव समाज: राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ 106

योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-2)

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योद्धा संन्यासी का जीवन

महापंडित राहुल सांकृत्यायन एक महान् रचनाकार, अन्वेषी इतिहासकार और जनयोद्धा थे। भारतीय नवजागरण की चेतना के इस महान् अग्रदूत ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रगतिशील और प्रौढ़ वैचारिक मूल्यों से जोड़ते हुए एक नई रचना-संस्कृति विकसित की। व्यक्तित्व की तरह उनका रचना-संसार भी व्यापक और बहुआयामी है। सचमुच, आश्चर्य होता है कि किशोरवय में ही घर-बार छोड़कर संन्यासी बन गये राहुल व्यवस्थित शिक्षा-दीक्षा और समय एवं सुविधा सम्बन्धी कठिनाइयों के बावजूद इतने महान् रचनाकार और बुद्धिजीवी कैसे बने!
जिज्ञासा और संघर्ष की प्रखर चेतना ने साधारण परिवार में जन्में बालक केदारनाथ को राहुल सांकृत्यायन के रूप में विकसित किया। ग्यारह वर्ष की अवस्था से शुरु हुई उनकी ज्ञान-यात्रा स्मृति लोप होने तक जारी रही। बुद्ध के इस वचन को उन्होंने हमेशा अपने जीवन-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण सूत्र माना –“मैंने ज्ञान को अपने सफर में नाव की तरह लिया है, सिर पर एक बोझ की तरह नहीं।

 उनका जन्म आजमगढ़ (उत्तरप्रदेश) जिले के पंदाहा गाँव, अपने नाना के घर रविवार, 9 अप्रैल, 1893 ईo को हुआ। पिता गोवर्द्धन पाण्डेय कनैला गाँव के रहने वाले थे। जन्म के समय उनकी माता कुलवंती देवी अपने मायके आई हुई थीं। नाना ने उनका नाम केदारनाथ रखा। वह चार भाइयों और एक बहन में सबसे ज्येष्ठ थे। बालक केदारनाथ को सन् 1898 ईo में मदरसे में दाखिल कराया गया। सन् 1900 ईo में आस-पास के कई गाँवों में हैजे की बीमारी फैली। गाँव का एक साथी बिरजू हैजे का शिकार हुआ। राहुल जी पर अपने मित्र की मृत्यु का शोक काफी दिनों तक छाया रहा। जनेऊ के लिए नाना रामशरण पाठक सन् 1902 ईo में उन्हें विंध्याचल ले गए। भविष्य के महान् यायावर और पर्यटक की संभवत: यह पहली यात्रा थी। उन्होंने पहली बार पहाड़ के दर्शन किए। सन् 1904 ईo में 11 वर्ष की अवस्था में परिवार वालों ने उनकी शादी कर दी। बालक केदारनाथ को यह सब तमाशा सा लगा। इस बारे में इन्होंने लिखा है—“उस वक्त ग्यारह वर्ष की अवस्था में मेरे लिए यह तमाशा था। जब मैं सारे जीवन पर विचारता हूँ तो मालूम होता है कि समाज के प्रति विद्रोह का प्रथम अंकुर पैदा करने में उसने ही पहला काम किया। सन् 1908 ईo में जब मैं पंद्रह साल का था, तभी से मैं उसे शंका की नजर से देखने लगा था। सन् 1908 ईo के बाद से तो मैं गृहत्याग का बाकायदा अभ्यास करने लगा, जिसमें भी इस तमाशे का थोड़ा-बहुत हाथ जरूर था। माँ कुलवंती देवी पहले ही चल बसी थीं। मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र 28 साल की थी। माँ के मर जाने के बाद राहुल का ननिहाल में पालन-पोषण हुआ था।
सन् 1907 ईo आते-आते राहुल का घर-परिवार से मोहभंग-सा होने लगा। इसी वर्ष वे पहली बार घर से भागे और कलकत्ता पहुँचे। फिर दूसरी बार सन् 1909 ईo में कलकत्ता गए। वहाँ कई तरह के काम किए। बनारस के सुँधनी साहू की वहाँ एक बड़ी दुकान थी। राहुल को उसमें नौकरी मिली। इस बीच वह बनारस भी रहे। सन् 1910 ईo के बाद से ही घुमक्कड़ी और सधुक्कड़ी उनके जीवन में रचबस गई। इस घुमक्कड़ संन्यासी का नाम पड़ा- राम ओदार दास। सन् 1911-12 ईo में पंडित मुखराम के यहाँ उनकी भेंट परसा मठ (छपरा) के महंत रामकुमार दास से हुई। वे मठ में रहने लगे और सन् 1912-13 ईo में महंत के उत्तराधिकारी तय किए गए। इस बीच एक बार वे कनैला-पंदाहा भी गए। लोगों ने बहुत फटकारा लेकिन कुछ ही दिनों बाद वे फिर परसा मठ पहुँच गए। लेकिन धीरे-धीरे मठ के बँधे-बँधाए जीवन की यांत्रिकता से वे ऊबने लगे। सन् 1913-14 ईo में उन्होंने दक्षिण भारत की लंबी यात्रा की। जुलाई, 1913 ईo में उन्होंने परसा मठ छोड़ा। आसनसोल, आद्रा, खड्गपुर होते हुए वे पुरी और फिर मद्रास पहुँचे। तिरूमलै भी गए। उन्होंने यहाँ तमिल सीखी। फिर तिरुपति कांजी कांचीपुरम् और रामेश्वरम् गए। सन् 1914 ईo में एक बार फिर परसा मठ लौटे। कुछ दिनों तक यहाँ रहने के बाद वे अयोध्या गए। इसी दौरान वे आर्य समाज के प्रभाव में आए। तब तक उन्होंने वेदांत का अध्ययन कर लिया था। इस इलाके में बलि चढ़ाने की परंपरा थी। काली मंदिर में बकरे की बलि देने के विरोध में उन्होंने एक जोरदार व्याख्यान दिया। सनातनी पुरोहितों ने उन्हें लाठियों से पीटा। वे एक युवा नास्तिक-आर्य समाजी संन्यासी के रूप में चर्चित हो चुके थे। फिर उन्होंने आगरा में रहते हुए संस्कृत, अरबी के धर्म ग्रंथों और इतिहास का अध्ययन किया। मेरठ से छपने वाले भास्कर में राहुल जी का पहला लंबा लेख इसी दौरान छपा। वह ढोंगी साधुओं के खिलाफ था। सन् 1916 ई में वे लाहौर गए और वहाँ संस्कृत एवं अरबी ग्रंथों का विशद् अध्ययन किया। सन् 1917 ईo में रूसी क्रांति हुई। उसकी खबरें राहुल जी रुचि के साथ पढ़ते। सन् 1918 ईo में उन्होंने साम्यवादी दर्शन का अध्ययन शुरु किया। उस वक्त इस बारे में बहुत कम साहित्य उपलब्ध था। सन् 1921-22 ईo में रूस के तत्कालीन कम्युनिस्ट नेता ट्राटस्की की प्रसिद्ध पुस्तक बोल्शेविज्म एवं विश्वक्रांति पढ़ने को मिली। 29 अक्टूबर, 1922 ईo को वे कांग्रेस के जिला सचिव चुने गए। फिर उन्होंने नेपाल की यात्रा की। यहाँ बौद्ध विद्वानों, लामाओं और भिक्षुओं से ज्ञान प्राप्त किया।
राहुल जी ने संन्यासी जीवन में ज्ञानार्जन किया और इस ज्ञान ने उन्हें समाज और राजनीति से जोड़ा। 11 जनवरी, 1922 ईo को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया। बक्सर जेल में रहे। रिहा होने के बाद यात्रा पर निकले। लौटने पर आंदोलन छिड़ा और और फिर जेल गए। अप्रैल, सन् 1923 ईo में उन्हें हजारीबाग जेल में भेजा गया। जेल प्रवास के दौरान उन्होंने बाईसवीं सदी नामक पुस्तक की रचना की। उनका जेल जाना, जेल में अध्ययन-लेखन, बाहर निकलकर आंदोलनों में शामिल होना और फिर जेल जाने का सिलसिला निरंतर जारी रहा।
18 अप्रैल, 1925 ईo को दो वर्ष की सजा भुगतकर हजारीबाग जेल से रिहा हुए। इस वक्त तक यह विद्वान संन्यासी बिहार में ब्रिटिश हुकूमत के लिए सिरदर्द बन चुका था। प्रशासन ने उन्हें आंदोलनकारी नेता के रूप में चिन्हित कर लिया था। सन् 1926 ईo में वे कानपुर कांग्रेस के लिए प्रतिनिधि और आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। उसी वर्ष उन्होंने तिब्बत की यात्रा की। फिर गोहाटी कांग्रेस में भाग लिया।
सन् 1922 ईo से 37 के बीच के वर्ष राहुल जी के जीवन और चिंतन के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जीवन-जगत, दर्शन, राजनीति और धर्म का गहरा अध्ययन किया। सन् 1930-31 ईo आते-आते वे अनीश्वरवादी हो गए। बौद्ध-दर्शन ने उन्हें गहरे सार तक प्रभावित किया। इसके अध्ययन के क्रम में वे तिब्बत, श्रीलंका और चीन गए। सन् 1927-28 ईo में उन्होंने श्रीलंका में अध्ययन और अध्यापन किया। सन् 1929-30 ईo के दौरान सवा साल उन्होंने तिब्बत में बिताए। सन् 30 ईo में भारत के लिए रवाना होने से पहले पुस्तकें, चित्रपट और अन्य महत्वपूर्ण चीजें बाँधकर खच्चरों के माध्यम से कलिंगपोंग रवाना कर दिया। अब वे रामओदार साधु से राहुल सांकृत्यायन बन गए। श्रीलंका स्थित विद्यालंकार विहार में बौद्ध भिक्षु के रूप में दीक्षित होने के बाद यह नया नाम मिला।
सन् 1932-33 ईo में वे यूरोप की यात्रा पर रहे। सन् 1934 ईo में दुबारा तिब्बत गए। वे कम्युनिस्ट-दर्शन के नज़दीक आ गए। इंग्लैंड-प्रवास के दौरान वे डेली-वर्कर नामक पत्र नियमित पढ़ते थे। उस वक्त अपने राजनीतिक चिंतन में आए परिवर्तन को उन्होंने स्वयं ही रेखांकित किया है मैं कम्युनिस्ट पार्टी का मेम्बर नहीं था लेकिन लेनिन-स्टालिन की पार्टी को छोड़ मैं किसी के विचारों और कार्यप्रणाली को पसन्द नहीं करता था। सन् 35 ईo में उन्होंने जापान, कोरिया, मंचूरिया, ईरान और सोवियत संघ की यात्रा की। सन् 1936 ईo में तीसरी बार तिब्बत गए। फिर 1937 ईo में दूसरी बार सोवियत संघ जा पहुँचे। सन् 1936-37 ईo के दौरान उन्होंने गांधीवाद और साम्यवाद और जमींदारी-प्रथा जैसे लेख लिखे। सोवियत संघ में उनकी मुलाकात लोला (पूरा नामएलेना नर्वेर्तोवना कोजैरोवस्काया) नामक प्रबुद्ध महिला से हुई। वह अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और मंगोल भाषाएँ बोल सकती थीं। उन्होंने लोला से रूसी सीख ली और उसे संस्कृत सिखाया। राहुल ने लोला से विवाह कर लिया और 5 सितम्बर, 1938 ईo को एक पुत्र ईगोर का जन्म हुआ। लेकिन जन्म से पहले ही राहुल स्वदेश लौट आए। लोला नहीं आ सकी।
यहाँ आने पर उन्होंने कई स्थानों पर आन्दोलन में भाग लिया। कांग्रेस से उनका पूरी तरह मोहभंग हो चुका था। सन् 1938-39 ईo में अमवारी के किसानों का नेतृत्व किया। बड़हिया रेवड़ा और गया के किसान आन्दोलन में भी भाग लिया। फरवरी, 1939 ईo में अमवारी आन्दोलन के दौरान उन पर प्राणघातक हमला हुआ और जेल भेजे गए। जेल-प्रवास में उन्होंने तुम्हारी क्षय लिखी। 10 मई को जेल से रिहा हुए। छितौली किसान आन्दोलन में भाग लेते वक्त फिर गिरफ्तार हुए और हजारीबाग जेल भेजे गए। जेल में अनशन कर दिया। अनशन के 17वें दिन उन्हें रिहा किया गया।
सन् 1940 ईo में उन्हें प्रान्तीय किसान सभा का सभापति चुना गया। उधर रामगढ़ कांग्रेस के लिए प्रतिनिधि और प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए। मार्च महीने में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग से देवली कैंप जेल भेजे गए। यहीं पर उन्होंने कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के साथ 23 अक्टूबर, 1941 ईo से इतिहास प्रसिद्ध भूख हड़ताल की।
इस दौरान उन्होंने अपनी पुस्तकें—“दर्शन-दिग्दर्शन, विश्व की रूपरेखा, मानव समाज, वैज्ञानिक भौतिकवाद, बौद्धदर्शन लिखीं। राहुलजी दो दर्जन से अधिक भाषाओं के ज्ञाता थे पर उन्होंने आमतौर पर हिन्दी में ही लिखना पसंद किया। प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता और उनके सहकर्मी रहेरमेश सिन्हा, अली अशरफ और इंद्रदीप सिन्हा के अनुसार वे 34 भाषाएँ जानते थे। मित्र और सहयोगी रहे डॉo प्रभाकर माचवे ने भी लिखा है—“वे 34 से अधिक भाषाओं के ज्ञाता थे। यह जानकर विस्मय होता कि कैसे उन्होंने इतनी भाषाएँ सीखीं!

(जारी…)

योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-1)

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राहुल सांकृत्यायन भारत ही नहीं संसार के लेखन-जगत में एक अलग और महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। एक साथ बहुत से क्षेत्रों में असाधारण विद्वत्ता के स्वामी लेखकों और चिंतकों में उनका नाम पहली पँक्ति के लेखकों-चिंतकों में भी शायद सबसे पहले ही लिया जा सकता है। रामकृष्ण परमहंस को सब धर्मों की उपासना के लिए जाना जाता है लेकिन एक चेतन यात्रा का जो दर्शन राहुल जी में होता है, वह परमहंस में नहीं। राहुल जी की यात्रा एक सगुणोपासक संन्यासी से निर्गुणोपासक तक और फिर बौद्ध से मार्क्स तक आती है। ऐसी यात्रा का दूसरा उदाहरण और वह भी इस अन्दाज में कि मनुष्य और समाज की समझ विकसित होती जाये, शायद ही है।

आज से यहाँ उनके उपर उर्मिलेश की किताब को प्रकाशित किया जा रहा है। अन्त में उसे पीडीएफ़ में उपलब्ध करा दिया जाएगा। आज किताब में शुरु में दिए गए वक्तव्य और भूमिका से शुरु करते हैं।


योद्धा महापंडित:

राहुल सांकृत्यायन

लेखक- उर्मिलेश

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
प्रकाशन वर्ष- 1994


वक्तव्य

महामंडित राहुल सांकृत्यायन इस शताब्दी के अनुपमेय साहित्यकार, चिंतक और भारत के अतीत-प्रसंगों के समय-सापेक्ष व्याख्याता थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व प्रगतिशील चेतना के सतत विकास का साक्षी है। उनके विकासमान व्यक्तित्व के विश्लेषण से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। रूढ़ियों, अंधविश्वासों से जर्जर एक पिछड़े हुए गाँव के सनातनी ब्राह्मण-परिवार में जन्म लेकर अपनी जीवन-यात्रा के अनुभवों से सीखते हुए वह मार्क्सवाद तक पहुँचते हैं। संपूर्ण भारतीय रचनाकर्म और संघर्ष की सहयात्रा में वे उत्तुंग शिखर पर आसीन एक अद्वितीय व्यक्तित्व हैं।
उनके साहित्य में स्वतंत्रतापूर्व और स्वातंत्र्योत्तर भारत के कसकते-कराहते अनुभवों का ऐसा हाहाकार है, जो हमें सोचने को विवश करता है कि विवशता के भीतर से ही शक्ति उत्पन्न होती है। राहुलजी ने रचनात्मक साहित्य, अनुवाद, कोश, जीवनियाँ, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, दर्शन और यात्रा-साहित्य आदि अनेक विषयों पर प्रामाणिक रचनाएँ लिखकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। उनकी मूल चिंता अपने समय और समाज को समझने तथा भविष्य की दिशा निर्धारित करने की थी। समय और समाज के इसी द्वन्द्व ने उनके चिंतन और संघर्ष को अर्थदीप्ति प्रदान की है। आर्थिक गुलामी को वह सभी प्रकार की स्वतंत्रता का अवरोधक मानते थे और पूँजीवादी व्यवस्था के पोषक तत्वों को जोंक कहते थे। प्रत्यक्ष-जगत से परे मनुष्य के भाग्य का निर्णायक और नियामक कोई और सर्वशक्तिमान नहीं है- ऐसा उनका मानना था। बौद्ध धर्म और दर्शन से उनका लगाव इसी सोच के कारण हुआ।
राहुलजी का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था लेकिन बिहार ही उनका कार्यक्षेत्र रहा। यहीं सारण के परसामठ में वह सनातनी साधु के रूप में रहे फिर बौद्ध और मार्क्सवादी बने। इसी क्षेत्र में उन्होंने किसान-संघर्षों का नेतृत्व किया। महान् इतिहासविद् काशी प्रसाद जायसवाल से उनका स्नेहपूर्ण सम्बन्ध रहा। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से शुरु से ही उनका लगाव रहा। परिषद् को उनके द्वारा लिखित या संपादित चार प्रमुख पुस्तकों के प्रकाशन का गौरव प्राप्त है। मध्य एशिया का इतिहास जैसी युगांतरकारी कृति परिषद् ने ही प्रकाशित की, जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस वर्ष पूरे देश में राहुल जन्म-शती के अवसर पर समारोह हुए हैं। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने भी 10 अगस्त, 1993 को पटना में एक भव्य समारोह आयोजित किया था। प्रस्तुत विनिबंध योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन जन्मशती वर्ष पर उर्मिलेश द्वारा पठित आलेख का विस्तारित पुस्तकाकार रूप है।
श्री उर्मिलेश ख्यातिप्राप्त पत्रकार और सजग लेखक हैं। अभी हाल में द टाइम्स फेलोशिप कौंसिल ने उन्हें वर्ष 1993 की टाइम्स फेलोशिप देकर सम्मानित किया। इसके पूर्व बिहार कृषि-संकट और भूमि-सुधार सम्बन्धी समस्या पर उनकी पुस्तक बिहार का सच (प्रकाशन वर्ष 1991) आई थी और वह समाजशास्त्रियों और शोध-छात्रों के बीच चर्चित और प्रशंसित हुई। जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने वर्ष 1981 में उन्हें राहुल सांकृत्यायन के साहित्य की आलोचनात्मक अनुक्रमणिका विषय पर एम0 फिल0 उपाधि प्रदान की। पहल, समकालीन सृजन, हिन्दी कलम और नवभारत टाइम्स में प्रकाशित राहुल विषयक उनके आलेख चर्चित रहे।
योद्धा महापंडित : राहुल सांकृत्यायन शीर्षक इस विनिबंध में राहुलजी के जीवन और कृतित्व की संक्षिप्त किन्तु मौलिक व्याख्या की गई है। राहुलजी की वैचारिक पूँजी को सहेज-संभालकर रखना आज इसलिए भी आवश्यक है कि आने वाले समाज को एक दिशा बोध मिल सके। यह विनिबंध सामान्यजन के लिए लिखा जाने वाला श्रेष्ठ-रोचक साहित्य है; जिसमें स्वाधीनता और मानवीय मर्यादा की प्रतिष्ठा के लिए आजीवन संघर्षरत महायोद्धा के जीवन-संघर्षों का चल-विवरण प्रस्तुत हुआ है। …
महेन्द्र प्रसाद यादव
निदेशक
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्
पटना
भूमिका

महापंडित राहुल सांकृत्यायन भारतीय साहित्य-जगत में विलक्षण व्यक्तित्व हैं। ज्ञान-विज्ञान की अनेक विधाओं के प्रखर विद्वान होते हुए उन्होंने आम जनता के संघर्षों में सक्रिय हिस्सेदारी निभाई। कभी स्वाधीनता सेनानी तो कभी किसान योद्धा के रूप में वे सक्रिय रहे। आजादी के बाद भी उन्हें कई बार जेल यात्रा करनी पड़ी। लेकिन हर तरह की कठिनाइयों में उनकी लेखनी निरंतर चलती रही।
सहज और सादगी भरे लेखन में उनकी वैचारिक तेजस्विता और बौद्धिक स्पष्टता की चमक है, जो उन्हें समकालीन बुद्धिजीवियों के बीच एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। सन् 1921 से सन् 1960 तक एक लेखक, विचारक और जनयोद्धा के रूप में निरंतर सक्रिय रहे। हिन्दी भाषा और साहित्य को राष्ट्रीय चेतना, प्रगतिशील मूल्यों एवं प्रौढ़ वैचारिकता से लैस करने में वह सबसे आगे रहे।
यह दुर्भाग्यजनक ही कहा जाएगा कि हिन्दी के हमारे विश्वविद्यालयीय मठाधीशों और सत्ता प्रतिष्ठानों ने नवजागरण की इस महान मनीषा का सम्यक मूल्यांकन करने की कोई चेष्टा नहीं की। उनकी उपेक्षा का क्रम अब तक जारी रहा है। यह वर्ष पूरे देश में राहुल जन्मशती वर्ष के रूप मनाया जा रहा है। पहली बार हिन्दी के विश्वविद्यालयीय मठाधीशों ने जनता और सुधी साहित्य-प्रेमियों की सक्रिय पहलकदमी देखकर राहुलजी को याद किया। राहुल साहित्य के एक अदना विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए यह सुखद घटना है कि आज पूरे देश में राहुलजी पर लिखा-पढ़ा जा रहा है।
वर्षों तक उनके सहयात्री रहे, हिन्दी के यशस्वी कवि नागार्जुन ने उन्हें याद करते हुए अपने एक संस्मरण में लिखा है: वे रूढ़िभंजक थे, प्रोग्रेसिव थे, नास्तिक थे…। पर राहुलजी को जिन लोगों ने महापंडित की उपाधि दी, उन्हें उनके व्यक्तित्व के यह गुण पसंद नहीं थे। वे तो संस्कृत, वेदान्त, साहित्य, संस्कृति और पुरातत्व के क्षेत्र में उनकी विद्वता पर लट्टू थे। निस्संदेह राहुलजी उच्चकोटि के विद्वान और बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न महापंडित थे। लेकिन उनमें साधारण और रूढ़ अर्थों वाला पांडित्य नहीं था। वे सही मायने में एक योद्धा थे- वैचारिक युद्ध के तेजस्वी और विद्रोही योद्धा! इसलिए पुस्तक का नामकरण अटपटा नहीं लगना चाहिए।
बिहार राहुलजी का कर्मक्षेत्र रहा। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने गत 10 अगस्त, 93 को राहुल सांकृत्यायन की स्मृति में एक संगोष्ठी का आयोजन किया। परिषद् के निदेशक प्रो0 महेन्द्र प्रसाद यादव की पहल पर आयोजित इस संगोष्ठी में मुझे मुख्य वक्ता के रूप में आलेख-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया। उसी दौरान परिषद् ने राहुलजी पर एक पुस्तक प्रकाशित करने की योजना बनायी और यह दायित्व मुझे सौंपा। यह पुस्तक इसी योजना के तहत प्रकाशित हो रही है।
आदरणीय राजेंद्र यादव, डॉ0 मैनेजर पाण्डेय, आनंद स्वरूप वर्मा, अनवर जमाल, भाई महेन्द्र जी, पी एन विद्यार्थी, अरुण कमल, डॉ खगेन्द्र ठाकुर, अंबिका चौधरी, सत्येन्द्र सिन्हा, प्रेम कुमार मणि और मदन कश्यप ने समय-समय पर मेरा उत्साहवर्द्धन किया। इनका मैं आभारी हूँ।
उर्मिलेश
22 फरवरी, 1994
पटना

आगे आप योद्धा संन्यासी का जीवन, इतिहास की तह में रचनाशीलता की तलाश, महान् स्वप्नदर्शी का यात्रा-दर्शन, हिन्दी क्षेत्रों में नई सामाजिक चेतना और राहुल, तिब्बत में ग्रन्थों की खोज, और स्वाधीनता आंदोलन, समाजवाद और राहुल अध्याय पढ़ेंगे। परिशिष्ट में राहुलजी के जीवन की प्रमुख की घटनाएँ, राहुलजी की पुस्तकों की सूची आदि पढ़ेंगे।