क्यों – कमला बक़ाया (कविता)

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यह बच्चों के लिए रची गई एक साधारण-सी कविता है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह एक असाधारण कविता है। कमला बक़ाया की यह कविता इस देश और दुनिया के हर बच्चे तक पहुँचाई जानी चाहिए, ऐसा हमें लगता है। यहाँ प्रस्तुत है-

क्यों – कमला बक़ाया
कहानी बहुत पुरानी है,
पर अब तक याद ज़ुबानी है।
इक छोटा-सा घर कच्चा था,
उसमें माँ थी, इक बच्चा था।
बिन बाप मड़ैया सूनी थी,
माँ पर मेहनत दूनी थी।
यह बच्चा बड़ा हुआ ज्यों-ज्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”


है बाप नहीं मेरा -पर क्यों?
दिन-रात अंधेरा है घर क्यों?
इतनी है हमें ग़रीबी क्यों?
और साथ में मोटी बीबी क्यों?
बहुतेरा माँ समझाती थी,
हर तरह उसे फुसलाती थी,

पर बच्चा हठ्ठी बच्चा था,
और आन का अपनी सच्चा था।

यह आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

माँ ने कुछ काम सँभाला था,
रो-धोकर उसको पाला था।

फिर वह भी उसको छोड़ गई,
दुनिया से नाता तोड़ गई।
बच्चे को अब घर-बार नहीं,
माँ की ममता और प्यार नहीं।
बस रैन-बसेरा सड़कों पे,
और साँझ-सबेरा सड़कों पे।
वह हर दम पूछा करता, “क्यों?”
दुनिया में कोई मरता क्यों?
यूँ फंदे कसे ग़रीबी के,
घर पहुँचा मोटी बीबी के।
घर क्या था बड़ी हवेली थी,
पर बीबी यहाँ अकेली थी।
गो नौकर भी बहुतेरे थे,
घर इनके अलग अंधेरे थे।
बच्चे को बान पुरानी थी,
कुछ बचपन था, नादानी थी।
पूछा- यह बड़ी हवेली क्यों?
बीबी यहाँ अकेली क्यों?

नौकर-चाकर सब हँसते थे,
कुछ तीखे फ़िक़रे कसते थे।

भोले बच्चे! पगलाया क्यों?
हर बात पे करने आया, “क्यों?”
दिन-रात यहाँ हम मरते हैं,
सब काम हम ही तो करते हैं।

रूखा-सूखा जो पाते हैं,
वह खाते, शुकर मनाते हैं।
क़िस्मत में अपनी सैर नहीं,
छुट्टी माँगो तो ख़ैर नहीं।
चलती है कहाँ फ़क़ीरों की?
है दुनिया यहाँ अमीरों की।
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा था नौकर बीबी का,
फिर देखा मज़ा ग़रीबी का।
दिन भर आवाज़ें पड़ती थीं,
हो देर तो बीबी लड़ती थी।
बावर्ची गाली देता था,
कुछ बदले माली लेता था।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”

नित पकते हलुवे-मांदे क्यों?
हम रगड़ें जूठे भांडे क्यों?
बीबी है चुपड़ी खाती क्यों?
सूखी हमें चपाती क्यों?

यह बात जो बीबी सुन पाई,
बच्चे की शामत ले आई।
क्यों हरदम पूछा करता, “क्यों?”
हर बात पे आगे धरता, “क्यों?”
यह माया है शुभ कर्मों की,
मेरे ही दान औधर्मों की।
सब पिछला लेना-देना है,
कहीं हलवा कहीं चबेना है।
माँ-बाप को तूने खाया क्यों?
भिखमंगा बनकर आया क्यों?

मुँह छोटा करता बात बड़ी,
सुनती हूँ मैं दिन-रात खड़ी।
इस “क्यों” में आग लगा दूँगी,
फिर पूछा, मार भगा दूँगी।
बच्चा यह सुन चकराया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
माँ-बाप को मैंने खाया क्यों?
भिखमंगा मुझे बनाया क्यों?
फिर बोला! पाजी, हत्यारा!
कह बीबी ने थप्पड़ मारा।
बच्चा रोया, ललकारा- क्यों?
तुमने हमको मारा क्यों?
दिल बात ने इतना तोड़ दिया,
बच्चे ने वह घर छोड़ दिया।
वह फिरा किया मारा-मारा
लावारिस, बेघर, बेचारा।
न खाने का, न पानी का,
यह बदला था नादानी का।
पर आदत बनी रही ज्यों-त्यों,
हर बात पे पूछा करता, “क्यों?”
इक ग्वाला दूध लिए जाता,
भर गागर मुँह तक छलकाता।
बच्चे का मन जो ललचाया,
भूखा था, पास चला आया।
यह दूध कहाँ ले जाते हो?
इतना सब किसे पिलाते हो?

थोड़ा हमको दे जाओ ना!

लो दाम निकालो, आओ ना।
पैसे तो मेरे पास नहीं।
तो दूध की रखो आस नहीं।
जो बच्चा पैसा लाएगा,
वह दूध-दही सब खाएगा।

यह सुन वह सटपटाया यों,
फिर उसके मुँह पर आया, “क्यों?”
दुनिया सब दूध उड़ाए क्यों?
भूखा ग़रीब मर जाए क्यों?

ग्वाला बोला- दीवाना है,
कुछ दुनिया को पहचाना है?
यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चे ने मुँह की खाई तो,
पर भूख न मिटने पाई यों।
गो थककर बच्चा चूर हुआ,
पर भूख से फिर मजबूर हुआ
थी पास दुकान मिठाई की,
लोगों ने भीड़ लगाई थी।
कोई लड्डू लेकर जाता था,
कोई रबड़ी बैठा खाता था।
क्या सुर्ख़-सुर्ख़ कचौरी थी,
कूंडे में दही फुलौरी थी।
थी भुजिया मेथी आलू की,
और चटनी साथ कचालू की।

बच्चा कुछ पास सरक आया,
न झिझका और न शर्माया।
भइया हलवाई सुनना तो,
पूरी-मिठाई हमें भी दो।
कुछ पैसा-धेला लाए हो?
यूँ हाथ पसारे आए हो?
पैसे तो अपने पास नहीं।
बिन पैसे मिलती घास नहीं।
हम देते हैं ख़ैरात नहीं,
पैसे बिन करते बात नहीं।

दमड़ी औक़ात कमीने* की,

यह सूरत खाने-पीने की!
अब रस्ता अपना नापो ना,
क़िस्मत को खड़े सरापो ना।
हलवाई ने धमकाया ज्यों,
फिर उसके मुँह पर आया, क्यों?
कहते हो मुझे कमीना* क्यों?
मेरा ही मुश्किल जीना क्यों?
बच्चा हूँ, मैं बेजान नहीं,
बिन पैसे क्या इंसान नहीं?
हट, हट! क्यों शोर मचाया है,
क्या धरना देने आया है?
नहीं देते, तेरा इजारा है?
क्या माल किसी का मारा है?
अब चटपट चलता बन ज्यों-त्यों,
नहीं रस्ते नाप निकलता क्यों?
जो बच्चा पैसे लाएगा,
लड्डू-पेड़ा सब पाएगा।

यह जग की रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।
बच्चा थककर बेहाल हुआ,
भूखा, बेचैन, निढाल हुआ।
आगे को क़दम बढ़ाता था,
तो सिर चकराया जाता था।
तरसा था दाने-दाने को,
कुछ बैठ गया सुस्ताने को।
हिस था ठंडे-पाले का,
न होश उस गंदे नाले का।

थी सरदी खूब कड़ाके की
तपन पेट में फ़ाक़े की।
कुछ दूर को कुत्ता रोता था,
न जाने क्या-कुछ होता था।

दिखता हर तरफ़ अंधेरा था,
कमज़ोरी ने कुछ घेरा था।
आँखें उसकी पथराई थीं,
बेबस बाँहें फैलाई थीं।

वह ऐसे डूब रहा था ज्यों,

फिर मुँह पर उसके आया, क्यों?”
आराम से कोई सोता क्यों?
कोई भूखा-नंगा रोता क्यों?
फिर जान पड़ी बेहोशी-सी,
एकदम गुमसुम ख़ामोशी-सी।
देखा कोई बूढ़ा आता है,
इक टाँग से कुछ लँगड़ाता है।
वह पास को आया बच्चे के,
सिर को सहलाया बच्चे के।
क्यों बच्चे सरदी खाता है,
यूँ बैठा ऐंठा जाता है?

बाबा मेरा घर-बार नहीं,
करने वाला कोई प्यार नहीं।
मैं ये ही पूछा करता- क्यों?
मुझ जैसा भूखा मरता क्यों?
कहते हैं रीत पुरानी है,
मत पूछो क्यों, नादानी है।

पर ऐसी रीत पुरानी क्यों?
मैं पूछूँ- यह नादानी क्यों?

यह तो कुछ नहीं बताते हैं,
उलटे मुझको धमकाते हैं।
बुड्ढे ने उसको पुचकारा,
यूँ अपना हाल कहा सारा।
हाँ, है तो रीत पुरानी यह,
पर अपनी ही नादानी यह।
गर सब ही पूछा करते यों,
जैसे तुम, पूछ रहे हो, “क्यों?
तो अब तक रंग बदल जाता,
दुनिया का ढंग बदल जाता।
है समझ नहीं इन बातों की,
है करामात किन हाथों की।

हम ही तो महल उठाते हैं,

हम ही तो अन्न उगाते हैं।
सब काम हम ही तो करते हैं,
फिर उलटे भूखों मरते हैं।
बूढ़ा तो हूँ, बेजान नहीं,
क्या मन में कुछ अरमान नहीं?

मैंने भी कुनबा पाला था,
बरसों तक काम सँभाला था।
जब तक था ज़ोर जवानी का,
मुँह देखा रोटी-पानी का।
यह टाँग जो अपनी टूट गई,
रोटी भी हम से रूठ गई।
कुछ काम नहीं कर पाता हूँ,
यूँ दर-दर ठोकर खाता हूँ।
जोड़ों में होता दर्द बड़ा,
गिर जाता हूँ मैं खड़ा-खड़ा।
न बीबी है, न बच्चा है,
इक सूना-सा घर कच्चा है।
मैं भी सोचा करता हूँ यों,
आहे ग़रीब है भरता क्यों?

कहानी यहाँ अधूरी है,
इसकी हमको मजबूरी है।
कुछ लोग यह अब भी कहते हैं,
जो दूर कहीं पर रहते हैं,
उनको था दिया सुनाई यों,
इक बच्चा पूछ रहा था, क्यों?
वह सड़क किनारे बैठा था,
नीला, सरदी से ऐंठा था।
पर दोनों होंठ खुले थे यों
जैसे वह पूछ रहा था, क्यों?
फुलौरी- पकौड़ापकौड़ीफुलौरा, पकोड़ा, पकोड़ीघी या तेल में पकी हुई बेसन या पीठी की बरी या बट्टी
कचालू-  एक प्रकार की अरवी।
दमड़ी- पैसे का आठवाँ भाग।
इजारा- अधिकार, हक़, स्वत्व, दावा, दख़ल, अधिकृति, इख्तियार, अख़्तियार;  वह अधिकार जिसके आधार पर कोई वस्तु अपने पास रखी अथवा किसी से ली या माँगी जा सकती हो
* ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। समाज के यथार्थ प्रतिबिंबन के लिए लेखक कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं, किंतु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए।
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अमिताभ वाली ‘नास्तिक’ और नास्तिकों का अपमान

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21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उसी लेख के संपादित और परिवर्धित रूप को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। आज दूसरा हिस्सा प्रस्तुत है।

फिल्मों पर लिखे लेख के पहले भाग पर एक मित्र ने ग़ुलामी का ज़िक्र किया है। ग़ुलामी फ़िल्म में धर्मेन्द्र और मिथुन की मुख्य भूमिका थी। उसमें धर्मेन्द्र को मैक्सिम गोर्की की माँ पढ़ते दिखाया गया है और ज़मीनदारी से लड़ने के क्रम में अंत में सारे ज़मीनी दस्तावेज़ों या कागज़ातों को जलाते हुए भी दिखाया गया है। फ़िल्मों में जो जनपक्षधरता दिखाई गई है, वह सुधारवाद या अंशतः मार्क्सवाद को छूती नज़र आती है। मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने, उसके बगल से कटते हुए निकलने का उदाहरण फ़िल्मों में ज़रूर कई बार आया है, लेकिन लेनिन या चे जैसी दृढता और सिद्धान्तनिष्ठा नहीं दिखाई गई। एक साधारण आदमी जो थोड़ा भी सोचेगा, वह यह कह सकता है ग़रीबी समाप्त होनी चाहिए, बेहतर जीवन जीने का अधिकार सबको मिलना चाहिए, यही सारी बाते गाँधी जी जैसे लोग भी करते हैं और मार्क्स भी, भगतसिंह भी, लोहिया भी। अंतर इतना है कि वामपंथ (यहाँ लिखते समय यह शब्द मुझे अच्छा नहीं लग रहा) के अनुसार जिस क़िस्म के विकास की बात होती है, वह फ़िल्मों में नहीं दिखाया जाता। मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने और मार्क्सवादी होने में अंतर तो ज़रूर है। एक व्यक्ति जो हिन्दू है, जाति से ब्राह्मण है और माँसाहारी है, सिर्फ़ माँसाहारी होने मात्र से वह ईसाई नहीं हो जाता। पूरे तौर पर अनीश्वरवादी और मार्क्सवादी व्यक्ति को नहीं दिखाया जाने का प्रश्न मेरे इस लेख का केंद्रीय विषय था। और हमारे यहाँ तो ऊपर से कुछ वामपंथी दिखनेवाली फ़िल्में भी धर्म के चंगुल से मुक्त नहीं दिखाई जातीं। यहाँ फ़िल्मों में वामपंथ के नज़दीक दिखनेवाले पात्रों पर ईश्वरीय दासता थोपना भी तो एक शग़ल रहा है। देव आनंद की मशहूर फ़िल्म गाईड अंत में आध्यात्मिक बन जाती है, ऐसे ही फ़िल्मों में नायकों के संघर्ष को सामूहिक संघर्ष दिखाया भी गया तो, उसे धार्मिक रंग चढा ही दिया गया।
   अब आज उसी लेख का दूसरा हिस्सा- 

नास्तिक और नास्तिकों का अपमान

   एक फ़िल्म आई थी नास्तिक। इस फ़िल्म में जानबूझकर अपनी मर्जी की काल्पनिक कथा के ज़रिये नास्तिकों का अपमान किया गया। नास्तिक भी नक़ली क़िस्म का। आज के दिन भारत में किसी भी विषय पर फ़िल्म बने, तो लोग या कोई समुदाय आहत होने लगता है, हल्ला मचाने लगता है, लेकिन नास्तिकों के अपमान से युक्त इस फ़िल्म के ख़िलाफ़ कोई जंग नहीं छेड़कर नास्तिकों ने अपनी शांतिप्रियता और सनकी नहीं होने का परिचय दिया था। भारत में फ़िल्मों के नायक दृढतापूर्वक नास्तिक होनेवाले लोग कभी नहीं रहे। आख़िर क्या वजह है कि भारत के फ़िल्म निर्माताओं के अबतक कम-से-कम 5-7 हजार फ़िल्मों को बना लेने के बाद भी दार्शनिक आधार के साथ (फ़ैशनबाज और फ़ैशन के लिए धार्मिकों और धर्म का मज़ाक उड़ानेवालों का कोई दार्शनिक आधार शायद ही होता है) नास्तिकता में जीनेवाले व्यक्ति को फ़िल्म का नायक नहीं बनाया गया। भारत में फ़िल्मों में नास्तिक दिखाए गए तो क्रूर क़िस्म के, खलनायकी चरित्र वाले, बुरे काम करनेवाले बनाकर।
   यहाँ फ़िल्म के लिए नायिका और गीतों के साथ प्रायः प्रेमगीतो का होना लगभग आवश्यक शर्त-सी रहा है। लेकिन नास्तिक क्या इतना क्रूर होता है, जो प्रेम नहीं कर सकता, प्रेमगीत नहीं गा सकता! भवन, भाषा, भूषा और भोजन, इन तीनों के एकदम आधुनिक हो जाने के बाद भी भारतीय फ़िल्मों में अभी नास्तिकता को प्रस्तुत कर पाना मुश्किल रहा है।
   नास्तिक फ़िल्म में एक रुष्ट भक्त या दास की तरह अमिताभ को दिखाकर नास्तिकों और नास्तिकता को तनिक भी नहीं समझ सकने और अपने काल्पनिक और दोषपूर्ण समझ को लोगों के सामने रखने की ग़लती नास्तिक फ़िल्म के द्वारा की गई थी।
धर्म, चमत्कार, भाग्य और संयोगों से भरी फ़िल्में
हिन्दी फ़िल्मों में धर्म और चमत्कार, भाग्य या संयोगों की अधिकता और प्रबलता भी जमकर दिखाए जाते रहे हैं। ख़ासकर नायकों की माँ, पत्नी या प्रेमिका का दुर्गा, शंकर आदि के मंदिर में प्रार्थना करना, सिर पटकपटक कर रक्षा की गुहार लगाना, या फिर जंतर पहनना आदि दिखाकर तिलिस्मी कहानियों-सी अयथार्थता का ख़ूब प्रदर्शन किया जाता रहा है। आरती, पूजा आदि के बाद देवताओं की मूर्तिओं की ओर से फूल, हथियार का गिरना या किसी अन्य संकेत का मिलना, जिससे खलनायक का पता चल सके या फिर भक्त ठीक हो सके, एक साधारण घटना के रूप में फ़िल्मों में दिखाए जाते रहे हैं। अमर अकबर एंथोनी में ईसाई गिरजे में अमिताभ की ओर जो संकेत प्राप्त होता है, वह ईसाई का (यहाँ सिर्फ़ हिन्दुओं के चमत्कारों की बात की जा रही है, ऐसा न समझा जाय) या फिर कई फ़िल्मों में अल्लाह, ताबीज़ या इस्लाम का चमत्कार भी दिखाया जाता रहा है। पता नहीं क्यों हिन्दी फ़िल्मों के नायकों और नायिकाओं पर (जो प्रायः समृद्ध परिवारों के होते हैं) भगवानों की इतनी मेहरबानी क्यों है! धार्मिक फ़िल्मों की तो बात यहाँ करनी ही नहीं।
   एक बार मैंने सोचा कि ऐसी कितनी फ़िल्में हैं जिनमें भाग्य या संयोग का चमत्कार नहीं दिखाया गया है, तो एक फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म (अगर मैं सही याद कर पा रहा हूँ तब यही फ़िल्म)  के सिवा मैं कोई फ़िल्म ढूँढ न सका। यह हो सकता है कि और बहुत सारी फ़िल्मों में भाग्य का खेल नहीं के बराबर या नहीं खेला गया होगा, लेकिन मैं उन्हें नहीं ढूँढ सका। संयोगों या भाग्य के खेल से मेरा मतलब यह है कि नायक या नायिका के जीवन में ऐसी घटनाएँ घटती हों, जो वास्तविक जीवन में 16 आने में 4 आने ही हो पाती हैं। जैसे- बेटों का बिछुड़ना और 20-30 साल बाद माँ-बाप सबका फिर से एक जगह हो जाना (उदाहरण- वक़्त फ़िल्म, जिसमें ऐ मेरी जोहराजबीं वाला गीत है), नायिका के ऊपर बलात्कार का ख़तरा अंतिम चरण तक मँडराना और उसका उसके भाई, प्रेमी आदि के द्वारा बचा लिया जाना (ऐसी फ़िल्में भी हैं, जिनमें नायिका के बलात्कार से बचाया नहीं जा सका, ताकि बदला लेना कथा का महत्वपूर्ण भाग बन सके। लेकिन उसी फ़िल्म में दूसरी बहुत-सी जगहों पर संयोगों का ज़बरदस्त प्रभाव दिखा है।), नायकों का गुंडों से (वह भी अकेले 20-30 या अधिक से) लड़ना और अंतिम स्थिति में नायक का बच निकलना, बहुत ज़्यादा ऐक्शन और मारधाड़ के बाद भी हाथी के शरीर पर गेंद जैसी चोट होना, नायक के बेटे, भतीजे आदि का ऊँचाई से फेंका जाना लेकिन, उसे बचा लिया जाना जैसे बहुत सारे भाग्य के खेलों से फ़िल्में भरी हुई हैं।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि हिन्दी फ़िल्मों का नायक महाशक्तिशाली (सुपरमैन) और भगवान् का अत्यंत प्रिय तो रहा ही है। 

हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी क्यों नहीं

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21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उस लेख को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। पहला हिस्सा प्रस्तुत है।
हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी क्यों नहीं
नायक, खलनायक और संघर्ष का चक्कर
फ़िल्मों में पहले खलनायकी का बड़ा महत्व था। लोग नायक के साथ एकात्म होकर कुछ घंटे खलनायक से स्वयं ही लड़ने का काल्पनिक और अनोखा अनुभव प्राप्त करते थे। आज भी यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आज भी भोजपुरी या दक्षिण की फ़िल्मों में खलनायकी का होना एक ज़रूरी-सी शर्त बना हुआ है।

   भारत में फ़िल्मों का नायक ख़ूब संघर्ष करता दिखता रहा है। लावारिस, ग़ुलाम, बेघर, ग़रीब, अनाथ या जिसके माँ-बाप बचपन में मर गए हों, ऐसे नायकों की बाढ़ का दौर कुछ-कुछ अभी भी क़ायम है, जो कि पहले थमने का नाम नहीं ले रहा था। ग़रीब और साधारण आदमी का किरदार निभा-निभाकर धन्ना सेठ बननेवालों की संख्या कम नहीं है। कुछ फ़िल्मकारों ने वेश्याओं को भी नायिका के तौर पर दिखाकर, यह स्वीकारना पड़ेगा कि कई बार बेजोड़ और शानदार फ़िल्मों का निर्माण कर, करोड़ो कमाए हैं। कुछ लोगों को सच्ची घटना पर फ़िल्म बनानेवाले बड़े महान् नज़र आते हैं। सच्ची घटनाओं पर बननेवाली फ़िल्में लोगों को ज़्यादा खींचती है और इस वजह से फ़िल्मकार बोरियों में भरकर रुपये झाड़ ले जाते हैं और ताली पीटते रहनेवाले लोग बेवकूफ़ों की तरह ख़ुश होते हैं।
   वापस नायक और फ़िल्मी संघर्ष पर आते हैं। हिन्दी फ़िल्मों का नायक प्रायः क्रांतिकारी तभी बनता है, जब उसके अपने परिवार के सदस्य या किसी दोस्त या पड़ोसी या फिर आशिक़ पर किसी तरह का क़हर खलनायक द्वारा ढाया जाता है। यहाँ साफ़ समझ में आता है कि हिन्दी फ़िल्मों का नायक एक सनकी और बदला लेनेवाले से ज़्यादा शायद ही होता है। वह वास्तव में क्रांतिकारी सिर्फ़ ऐतिहासिक फ़िल्म में ही बनाया जाता है, या बनाए जाने की कोशिश का शिकार होता है। आमिर ख़ान की फ़िल्म रंग दे बसंती के प्रशंसकों की कमी नहीं है, लेकिन प्रशंसा की बजाय आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की कोशिश करते ही सारा खेल सामने आने लगता है और लोगों की भावनाओं के साथ खेलकर, उनका विज्ञापनी इस्तेमाल कर करोड़ों-अरबों पीट लेने का षडयंत्र साफ़ दिखने लगता है।
   पूँजीपति और शोषक वर्गों के खिलाफ़ बोलने की औक़ात तो नायकों में होती नहीं, इसलिए हिन्दी फ़िल्मों में नायिका और नायक से अक्सर यह सुनने को मिलता रहा है कि अमीर होना गुनाह नहीं है। हिन्दी फ़िल्मों में बहुत संघर्ष कर के आगे बढ़नेवाला नायक हमें बाद में पूँजीपति बनते ही दिखाया जाता रहा है। पता नहीं किस कोने में सारे नायकों को रखा जाता है कि कोई भी नायक लेनिन या भगतसिंह या चे नहीं बनता। फ़िल्मों में कभी भी समाजवादी क्रांति को सफल होते या लोगों को बेहतर ज़िंदग़ी जीते दिखाया ही नहीं जाता। उन्हें अमेरीकी नमूने (मॉडल) के विकास के सपने दिखाये जाते हैं। वह (नायक) संघर्ष करता है ख़ुद के लिए, परिवार के लिए, बहन के लिए, दोस्त के लिए, आशिक़ के लिए, कभी ऐसा नहीं दिखता कि वह पूँजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। वह संघर्ष करता है तो पूँजीपति से, सिर्फ़ उससे जिससे उसे निजी मामले के लिए बदला लेना है। साफ़ बात है कि पूँजीपति वर्ग से कभी संघर्ष करते, जीतते दिखाने की औक़ात निर्माताओं में नहीं रही है अपने यहाँ। यहाँ का नायक लड़ता है- अमरीश पुरी से, सदाशिव अमरापुरकर से, डैनी से, गुलशन ग्रोवर से, अनुपम खेर से, शक्ति कपूर से…। परिवर्तन कुछ ऐसा ही हुआ है कि पहले जहाँ पौराणिक कथाओं में राक्षस और देवता लड़ते थे, वहाँ अब खतरनाक चेहरेवाले (इन दिनों स्टाइलिश लुक वाले) खलनायक और नायक लड़ते हैं। हमें लगता है कि हिन्दी फ़िल्मों का नायक वर्गीय चेतना से लैस नहीं होता। हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी तो हो ही नहीं सकता… … चाहे आप पैग़ाम का उदाहरण ही क्यों नहीं ले लें, सुधारवादी भले दिख जाय।
नोटः हिन्दी फ़िल्मों का हाल शायद तमाम भारतीय फ़िल्मों का है… …

पैसा, वेतन, बिहार सरकार, आडवाणी की यात्रा …गड्डमड्ड बातें बिहार की ( दूसरा और अन्तिम भाग )

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(पैसा, वेतन, नीतीश कुमार, बिहार सरकार, प्रभात खबर, अंग्रेजी, निजी स्कूल, संसद, सांसदों के वेतन, आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी जनचेतना यात्रासब कुछ गड्डमड्ड हैं इस लेख में। इस लेख में सुसंगठित होना मेरे लिए सम्भव नहीं था। इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ।)

पिछले भाग के बाद
निजी स्कूलों का पंजीयन और उनकी ताकत

कैसे पूँजी की ताकत सत्ता को या सरकार को उसकी औकात बताती है, उसका नमूना बिहार में इन दिनों निजी स्कूल हैं। बिहार सरकार ने सभी निजी शिक्षण संस्थानों को पंजीयन के लिए कुछ दिनों का समय दिया था। खबर है कि पटना जिले के दस प्रतिशत स्कूलों ने भी पंजीयन नहीं कराया है और यही हाल कमोबेश सभी जिलों का है। सरकार को सीधे चुनौती देने का काम किया है इन सबने। और हमारी प्यारी बिहार सरकार पता नहीं कौन-सा खेल कब खेलती है
और सोचने की बात यह है कि निजी स्कूलों की मासिक फीस दो-चार सौ लेकर हजार-दो हजार तक है। लेकिन हमारी महान सरकार पंजीयन के लिए ली जा रही जानकारी में पैसे को छोड़कर सारी जानकारी माँग रही है। जैसे बच्चे कितने हैं, कमरे कितने हैं आदि। लेकिन बच्चों का, उनके अभिभावकों का जो आर्थिक शोषण जारी है, उसके लिए सरकार ने शायद(शायद इसलिए कि अभी तक सुनने को नहीं मिला है कि पैसे की बात सरकार पूछ रही है। अगर पूछा भी तो साल में पाँच सौ-हजार रूपये सरकार को दे देंगे ये सब, चंदा या भीख समझकरसरकार भी निश्चिन्त और ये संस्थान भी) कोई सवाल पूछे नहीं और गलती से पूछ भी ले तो इस अन्दाज में कि इन संस्थाओं के मालिक परेशान न हों।
यहाँ विरोधाभास है कि निजी संस्थान पंजीयन करा भी नहीं रहे, सरकार पैसे या फीस के बारे में कुछ पूछ भी नहीं रही। फिर माजरा क्या है?…फिलहाल तो यह बात समझ नहीं आ रही।
+2 स्कूलों के माध्यम से बिहार सरकार ने किया क्या   

लगभग छह सौ उच्च विद्यालयों को सरकार ने उत्क्रमित कर +2 बना दिया है। अब उच्च विद्यालयों के शिक्षक जो दशकों से दसवीं तक को पढ़ा रहे थे, वे तो इंटर को पढ़ा नहीं सकते थे/हैं। तो सरकार ने इन छह सौ विद्यालयों के लिए क्या किया यानी क्या उसने छह सौ +2 विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति की? आइए कुछ हिसाब देखते हैं।
      बिहार में लगभग 3000 उच्च विद्यालय हैं। इनमें से 1/5 को +2 कर दिया गया है। प्रति वर्ष इंटर में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या इन 600 विद्यालयों में चाहे जो हो, सवाल है कि एक +2 विद्यालय में इंटर को पढ़ाने के लिए कितने शिक्षक चाहिए? मेरी समझ में, कला, विज्ञान और वाणिज्य तीनों संकायों के लिए कम से कम 20-25।
हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, भूगोल, इतिहास, राजनीति शास्त्र, श्रम एवं समाज कल्याण, समाजशास्त्र, भौतिकी, रसायनशास्त्र, वनस्पति विज्ञान, जंतुविज्ञान, गणित, मनोविज्ञान, गृहविज्ञान, तर्कशास्त्र, कम्प्यूटर, अर्थशास्त्र जैसे विषय तो हर विद्यालय में हैं।
लेकिन आप नीतीश कुमार से यह जानकर बहुत खुश होंगे कि किसी भी उत्क्रमित विद्यालय में पाँच (मेरी जानकारी में तो एक-दो भी नहीं) भी शिक्षक नहीं भेजे गये हैं।
अब मामला साफ है कि सरकार ने हजारों-लाखों छात्रों का भविष्य चौपट करने का मन बना लिया है। फिर भी बिहार और नीतीश की जयकार हो रही है।
सरकार रोजगार कितनों को दे सकती है?

बिहार सरकार हर साल कितने लोगों को रोजगार दे सकती है? यह सवाल कोई मजाक नहीं, बल्कि बहुत गम्भीर और आवश्यक सवाल है। हर साल बिहार की आबादी कम-से-कम पंद्रह लाख अधिक हो जाती है। अब समस्या यह है कि अगर हर साल कम से कम 3-4 लाख रोजगार भी राज्य में पैदा नहीं होंगे/होते तब बेरोजगारी की समस्या का हल क्या है और हमारी बिहार सरकार 2015 तक विकसित बिहार कैसे बना लेगी? दस करोड़ अड़तीस लाख की जनसंख्या के राज्य में 2011 में नियुक्तियों की कुल संख्या बीस-तीस हजार भी शायद ही है। अब जितने लोग स्विस बैंकों पर भिड़े हैं या किसी राजनैतिक (वास्तव में नीतिविहीन) पार्टी को कोसते हैं, खासकर दक्षिणपंथियों के लिए कह रहा हूँ, उनके पास इस समस्या का समाधान क्या है? यह समस्या राज्य की भी है, इसे देश के लिए भी समान समझा जाय। जनसंख्या अधिक होने का बहाना यहाँ नहीं चलेगा क्योंकि अगर देश की जनसंख्या आज से आधी भी होती तब समस्या ज्यों-की-त्यों रहती। बेरोजगारी का प्रतिशत वही रहता। जब तक आपके पास ऐसी व्यवस्था ही नहीं है कि सबको रोजगार मिल सके, आपका हाल बुरा होना ही है।
बिहार के लिए मैंने पहले भी कहा है कि हर साल बीस लाख लोग सारी परीक्षाएँ देते हैं और रोजगार पचास हजार भी नहीं तो सीधा सा अर्थ है कि राज्य 19 लाख से अधिक लोगों को हर साल बेरोजगार रखने की व्यवस्था कर चुका है। चिल्लाकर या रोकर रोजगार की संख्या कोई भी सरकार कितना कर सकती है? यही न कि बीस लाख में से अधिकतम (वैसे मालूम है कि ऐसा सम्भव ही नहीं) दो लाख लोगों को रोजगार मिल सकता है और फिर अठारह लाख लोग बेरोजगार रहेंगे। अब जीवन तो सबका चल रहा है ही, वह चाहे भीख माँगकर हो, मजदूरी कर के हो, दुकान चलाकर हो या जैसे भी हो।
साफ है कि कोई भी सरकार बेरोजगारी की समस्या का हल नहीं कर सकती। हम किसी पार्टी को या नेता को कितना भी कोसें लेकिन इसका समाधान आपके पास भी नहीं है। समाधान तलाशना होगा। 

(समाप्त)

समाजवाद ही क्यों? – अल्बर्ट आइन्सटीन

7 टिप्पणियाँ

…लियो ह्यूबरमैन और पॉल स्वीजी ने समाजवादी और मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य से घटनाओं का व्यापक विश्लेषण करने और उन पर टीका टिप्पणी करने के लिए एक मंच के रूप में मंथली रिव्यू पत्रिका की शुरूआत की थी। आइन्सटीन ने उस पत्रिका की नींव डाले जाने का स्वागत किया और मई 1949 में निकलने वाले उसके पहले अंक के लिए लियो ह्यूबरमैन के दोस्त नॉटो नाथन के आग्रह पर यह लेख लिखा था…लेख थोड़ा लम्बा है, लेकिन दो टुकड़ों में देने पर कुछ ठीक नहीं लगता। इसलिए पढ़ने में थोड़ा समय लगेगा।

समाजवाद ही क्यों?
-अल्बर्ट आइन्सटीन
क्या ऐसे व्यक्ति का समाजवाद के बारे में विचार करना उचित है जो आर्थिक-सामाजिक मामलों का विशेषज्ञ नहीं है? कई कारणों से मेरा विश्वास है कि यह उचित है।

      सबसे पहले वैज्ञानिक ज्ञान के दृष्टिकोण से इस सवाल पर विचार करें। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि खगोल विज्ञान और अर्थशास्त्र में कार्य-पद्धति का कोई मूलभूत फर्क नहीं है; दोनों ही क्षेत्रों में वैज्ञानिक किन्हीं परिघटनाओं के अन्तरसंबंधों को यथासम्भव स्पष्ट ढंग से समझने लायक बनाने के लिए उन परिघटनाओं के एक सीमित समूह के लिए सामान्य तौर पर स्वीकार्य नियमों को ढूँढने का प्रयास करते हैं। लेकिन वास्तव में, इन दोनों विज्ञानों के बीच कार्य-पद्धति का फर्क मौजूद है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में सामान्य नियमों की खोज इस बात से कठिन हो जाती है कि जिन आर्थिक परिघटनाओं का हम निरीक्षण करते हैं उन्हें बहुत-सी ऐसी बातें प्रभावित करती हैं जिनका मूल्यांकन अलग से कर पाना कठिन होता है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि सभी जानते हैं, मानव इतिहास के तथाकथित सभ्यकाल के शुरू से ही संचित अनुभव ऐसे कारणों से बहुत ज्यादा प्रभावित और सीमित होते रहे हैं जो स्वभावत: किसी भी तरह महज आर्थिक नहीं होते। उदाहरण के लिए, इतिहास में अधिकतर बड़े राज्यों का अस्तित्व अन्य देशों को जीतने पर आधारित रहा है। विजेता लोगों ने कानूनी और आर्थिक तौर पर अपने को विजित देश के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के रूप में स्थापित किया। उन्होंने जमीन की मिल्कियत में अपना एकाधिकार कायम किया और अपने ही बीच के लोगों में से पुरोहित नियुक्त किये। शिक्षा पर नियन्त्रण रखने वाले पुरोहितों ने समाज के वर्ग-विभाजन को एक स्थायी संस्था का रूप दिया और मूल्यों के एक ढाँचे की रचना की, जिससे उसी समय से लोग काफी हद तक अचेतन रूप से, अपने सामाजिक व्यवहार में निर्देशित होते थे।
थोर्स्टीन बेव्लेन द्वारा बतायी गयी मानव विकास की लूटपाट की अवस्था, कहने को तो बीते दिनों की ऐतिहासिक परम्परा है किंतु हम आज भी इससे आगे नहीं बढ़ सके हैं। जिन आर्थिक तथ्यों का हम निरीक्षण कर सकते हैं वे इसी अवस्था के हैं। इसलिए उनसे निकाले गये नियम भी दूसरी अवस्थाओं पर लागू नहीं होते। चूँकि समाजवाद का वास्तविक लक्ष्य सुनिश्चित तौर पर मानव विकास को, इस लूट-पाट की अवस्था को पार करना और उससे आगे बढ़ाना है, इसलिए अपनी मौजूदा स्थिति में आर्थिक विज्ञान भविष्य के समाजवादी समाज पर थोड़ा ही प्रकाश डाल सकता है।
      दूसरे, समाजवाद का एक निश्चित सामाजिक और नैतिक लक्ष्य है। विज्ञान न तो लक्ष्यों का निर्माण कर सकता है और न ही उनको इन्सान के अन्दर उतार सकता है। विज्ञान, ज्यादा से ज्यादा, किन्हीं लक्ष्यों को प्राप्त करने के साधन जुटा सकता है लेकिन खुद ये लक्ष्य उदात्त नैतिक आदर्शों वाले व्यक्तित्वों द्वारा ही तय किये जाते हैं और यदि ये लक्ष्य मुर्दा न होकर जीवन्त और ओजस्वी हैं तो उन बहुत सारे लोगों द्वारा अपनाये और आगे बढ़ाये जाते हैं जो आधे अचेतन रूप से समाज के मन्थर विकास को निर्धारित करते हैं।
      इन कारणों से, मानवीय समस्याओं के प्रश्न पर हमें विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धतियों को आवश्यकता से अधिक करके नहीं आँकना चाहिए और यह भी नहीं मानना चाहिए कि समाज के संगठन को प्रभावित करने वाले प्रश्नों पर अभिव्यक्ति का अधिकार केवल विशेषज्ञों का ही है।
      अनगिनत लोग इधर कुछ समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि मानव समाज एक संकट के दौर से गुजर रहा है और इसकी स्थिरता भयंकर रूप से छिन्न-भिन्न हो गई है। यह एक ऐसी स्थिति का लक्षण है, जब लोग उस छोटे या बड़े समूह के प्रति असंपृक्तता या यहाँ तक कि शत्रुतापूर्ण भाव महसूस करने लगते हैं, जिसमें वे रहते हैं। अपनी बात साफ करने के लिए एक निजी अनुभव बताऊँ। हाल ही में मैंने एक प्रबुद्ध सज्जन से एक और युद्ध के खतरे के बारे में बातचीत की जो मेरे विचार से मानवता के अस्तित्व के लिए गंभीर संकट पैदा कर देगा और मैंने कहा कि उस संकट से केवल एक राष्ट्रोपरि या अधिराष्ट्रीय (सुप्रानेशनल) संगठन ही रक्षा कर सकता है। इस पर मेरे अतिथि ने बहुत शांत और ठंढे ढंग से कहा, आप मानव जाति के मिट जाने का इतनी गम्भीरता से क्यों विरोध करते हैं?
      मुझे यकीन है कि कम से कम एक शताब्दी पहले किसी ने भी इतने हल्के ढंग से इस किस्म का बयान नहीं दिया होता। यह एक ऐसे आदमी का बयान है जो अपने भीतर सामंजस्य कायम करने का निरर्थक प्रयास करता रहा है और काफी हद तक इसमें सफल होने की उम्मीद खो चुका है। यह एक ऐसे दर्दनाक एकाकीपन और अलगाव की अभिव्यक्ति है जिससे आजकल बहुत से लोग पीड़ित हैं। इसका कारण क्या है? क्या कोई समाधान भी है?
      सवाल खड़े करना आसान है मगर किसी भी हद तक भरोसेमन्द जवाब देना कठिन है। फिर भी जहाँ तक हो सकेगा, मैं प्रयास अवश्य करूँगा हालाँकि इस तथ्य के प्रति मैं काफी सचेत हूँ कि हमारी अनुभूतियाँ और हमारे प्रयास अक्सर इतने अन्तर्विरोधी और दुर्बोध होते हैं कि सीधे-सीधे सूत्रों में व्यक्त नहीं किए जा सकते।
      मनुष्य एक ही समय में और एक ही साथ एकाकी प्राणी भी होता है और सामाजिक प्राणी भी। एक एकाकी प्राणी की हैसियत से वह खुद अपने और अपने सबसे ज्यादा करीबी लोगों के अस्तित्व की रक्षा का प्रयास करता है, अपनी निजी इच्छाओं की तृप्ति का प्रयास करता है और अपनी सहज योग्यताओं के विकास का प्रयास करता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते वह संगी-साथियों का स्नेह और सम्मान पाना चाहता है, उनकी खुशियों का भागीदार होना चाहता है, उनके दुखों में दिलासा देना और उनकी जिन्दगी को बेहतर बनाना चाहता है।
      किसी मनुष्य के विशिष्ट चरित्र के पीछे केवल इन विविध व बहुधा परस्पर-विरोधी प्रयासों का ही अस्तित्व है और इनका विशिष्ट संयोजन ही उस हद को भी तय करता है जिस हद तक कोई मनुष्य आन्तरिक संतुलन पा सकता है तथा समाज के हित में योगदान कर सकता है। यह बिल्कुल संभव है कि इन दोनों प्रवृत्तियों की सापेक्षिक शक्ति का निर्धारण मुख्यतः वंशानुक्रम द्वारा होता है। किंतु अंतिम रूप से जो व्यक्ति उभर कर सामने आता है उसका निर्धारण मुख्य तौर पर उस समाज के ढाँचे द्वारा जिसमें वह पलता-बढ़ता है, उस समाज की परम्पराओं द्वारा और खास व्यवहारों के प्रति उस समाज के मूल्यांकन द्वारा होता है। किसी भी व्यक्ति के लिए समाज की धारणा का अर्थ अपने समकालीनों और पिछली पीढ़ियों के सभी लोगों के साथ उसके प्रत्यक्ष-परोक्ष संबंधों का कुल योग होता है। व्यक्ति सोचने, महसूस करने, प्रयास करने और कार्य करने में खुद सक्षम है, किंतु वह अपने शारीरिक, बौद्धिक और भावनात्मक अस्तित्व के लिए समाज पर इतना अधिक निर्भर है कि समाज के दायरे के बाहर उसके विषय में विचार करना या उसे समझ पाना असंभव है। यह समाज ही है जो आदमी को भोजन, वस्त्र, आवास, काम के औजार, भाषा, विचारों के रूप और उनकी अधिकांश अन्तर्वस्तु देता है, उसका जीवन उन लाखों-लाख वर्तमान और विगत लोगों के श्रम और कौशल के ही कारण सम्भव है, जो सब के सब इस छोटे से शब्द। समाज के पीछे छिपे हुए हैं।
      इसलिए, यह स्पष्ट है कि व्यक्ति की समाज पर निर्भरता प्रकृति का एक ऐसा तथ्य है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता, ठीक उसी तरह जैसे कि चींटियों और मक्खियों के मामले में है। लेकिन जहाँ चींटियों और मक्खियों की पूरी जीवन-प्रक्रिया की छोटी से छोटी बात भी सारत: वंशानुगत प्रवृत्तियों द्वारा निर्धारित होती है, वहीं मनुष्य की सामाजिक बनावट और अंतर्सम्बन्ध बदले जा सकते हैं तथा बदलाव के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। स्मृति, नये संयोजनों के निर्माण की क्षमता व मौखिक संवाद के गुण द्वारा मनुष्य में वे विकास सम्भव हो सके हैं जो जैविक आवश्यकताओं द्वारा निर्दिष्ट नहीं होते। ऐसा विकास परम्पराओं, संस्थाओं व संगठनों में, साहित्य में, वैज्ञानिक व अभियांत्रिक उपलब्धियों में, कलाकृतियों में खुद को अभिव्यक्त करता है। इससे स्पष्ट होता है कि आदमी कैसे एक निश्चित अर्थ में अपने जीवन को खुद अपने व्यवहार से प्रभावित कर सकता है और कैसे इस प्रक्रिया में सचेत चिंतन और जरूरत एक भूमिका अदा कर सकते हैं।
      आदमी जन्म से ही आनुवांशिकता द्वारा उन स्वभावगत आवेगों सहित जो मानव जाति की लाक्षणिक विशेषताएँ हैं, एक जैविक संरचना पाता है, जिसे हमें स्थिर व अपरिवर्तनीय मानना चाहिए। इसके साथ ही, अपने जीवन काल के दौरान वह एक सांस्कृतिक संरचना पाता है जिसे वह संवादों और बहुत से दूसरे प्रकार के प्रभावों के जरिए समाज से ग्रहण करता है। यह सांस्कृतिक संरचना ही वह चीज है जो समय के साथ-साथ बदलती रहती है तथा व्यक्ति और समाज के बीच के संबंधों को बहुत ज्यादा हद तक तय करती है। तथाकथित आदिम संस्कृतियों की तुलनात्मक खोज द्वारा आधुनिक नृतत्वशास्त्र हमें बताता है कि मनुष्यों के सामाजिक व्यवहार में काफी अन्तर हो सकता है जो समाज में प्रचलित सांस्कृतिक बनावट और समाज में प्रभावी संगठन के स्वरूप पर निर्भर है। किसी मानव समुदाय की उन्नति के लिए प्रयासरत लोग अपनी आशाएँ इसी पर आधारित कर सकते हैं कि अपनी जैविक संरचना के कारण, एक दूसरे का विनाश करने के लिए या किसी क्रूर व आत्मघाती स्थिति की दया पर बने रहने के लिए मानव जाति अभिशप्त नहीं है।
      यदि हम खुद से सवाल करें कि मानव जीवन को यथासंभव संतोषजनक बनाने के लिए समाज की संरचना तथा व्यक्ति का सांस्कृतिक दृष्टिकोण कैसे बदला जाय, तो इस तथ्य के बारे में हमें सतत् सचेत रहना होगा कि कुछ ऐसी भी परिस्थितियाँ हैं जिन्हें बदल पाने में हम असमर्थ हैं। जैसा पहले ही बताया जा चुका है कि व्यावहारिक अर्थों में मनुष्य की जैविक प्रकृति परिवर्तनशील नहीं है और पिछली शताब्दियों के तकनीकी व जनसांख्यिकीय विकास द्वारा निर्मित परिस्थितियाँ भी बनी रहने वाली हैं। अपेक्षतया घनी आबादियों के अस्तित्व की खातिर अपरिहार्य सामग्री की आपूर्ति के लिए एक चरम श्रम-विभाजन तथा अत्यन्त केन्द्रित उत्पादन तंत्र परम आवश्यक है। अतीत की ओर देखने पर वह समय, जो इतना रमणीय लगता था, जबकि व्यक्ति या सापेक्षतया छोटे समूह पूरी तरह आत्मनिर्भर रह सकते थे, सदा के लिए जा चुका है। यह कहना बहुत अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि मानव जाति ने अभी ही उत्पादन व उपभोग के एक विश्वव्यापी समुदाय की रचना कर ली है।
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दुनिया से वादा किया गया था कि आवश्यकताओं के बंधन से मुक्ति मिलेगी लेकिन दुनिया का बड़ा हिस्सा भुखमरी का सामना कर रहा है जबकि दूसरे प्रचुरता का जीवन जी रहे हैं।
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            अब मैं उस बिन्दु पर पहुँच गया हूँ जहाँ से मैं आज के संकट के सारतत्व की ओर थोड़े में इंगित कर सकता हूँ। यह व्यक्ति के समाज के साथ संबंध से ताल्लुक रखता है। आज इंसान समाज के ऊपर अपनी निर्भरता के प्रति हमेशा से अधिक सचेत हो गया है। किन्तु वह इस निर्भरता को एक सकारात्मक गुण के रूप में, एक जीवंत बंधन के रूप में, एक रक्षक शक्ति के रूप में महसूस नहीं करता है। बल्कि इसे अपने प्राकृतिक अधिकारों, यहाँ तक कि अपने आर्थिक अस्तित्व के लिए भी खतरे के रूप में महसूस करता है। इसके अतिरिक्त, समाज में उसकी स्थिति ऐसी है कि उसकी (मानसिक) संरचना में निहित स्वार्थी प्रवृत्तियाँ निरन्तर प्रबल होती जा रही हैं। जबकि उसकी सामाजिक प्रवृत्तियों का, जो स्वभाव से ही कमजोर हैं, क्षरण तेज गति से हो रहा है। सभी लोग चाहे समाज में उनका जो स्थान हो, क्षरण की इस प्रक्रिया के शिकार हैं। अनजाने ही अपने स्वार्थों के कैदी बने हुए हैं, वे स्वयं को अरक्षित, एकाकी तथा जीवन के सहज, सरल व निष्कपट आनन्द से वंचित महसूस कर रहे हैं। आदमी की जिन्दगी छोटी और जोखिम भरी है। इस जीवन में खुद को समाज के प्रति समर्पित करके ही वह सार्थकता पा सकता है।
      मेरे ख्याल से बुराई का असली स्रोत वर्तमान पूँजीवादी समाज की वह आर्थिक अराजकता है, जो आज मौजूद है। हमारे सामने विशाल उत्पादक समुदाय है जिसके सदस्य एक दूसरे को सामूहिक श्रम के फल से वंचित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा वे बल प्रयोग द्वारा नहीं बल्कि कुल मिलाकर कानूनी रूप से कायम नियमों का ईमानदारी से पालन करके ही करते हैं। इस संदर्भ में यह अनुभव करना महत्वपूर्ण है कि उत्पादन के साधन, अर्थात् समस्त उत्पादक क्षमता जो उपभोक्ता सामग्री के साथ-साथ पूँजीगत सामग्री पैदा करने के लिए आवश्यक है, कानूनी तौर पर व्यक्तियों की निजी सम्पत्ति हो सकते हैं और अधिकतर हैं भी।
      आगे की बहस में सरलता की दृष्टि से मैं उन सभी लोगों को मजदूर कहूँगा जिनका उत्पादन के साधनों के मालिकाने में कोई हिस्सा नहीं है। हालाँकि यह इस शब्द के परंपरागत प्रयोग के पूरी तरह अनुरूप नहीं है। उत्पादन के साधनों का मालिक मजदूर की श्रमशक्ति को खरीद सकने की स्थिति में होता है। उत्पादन के साधनों का प्रयोग करके मजदूर नयी चीजें बनाता है जो पूँजीपति की संपत्ति बन जाती है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु मजदूर द्वारा किये गए वास्तविक उत्पादन और उसे मिले वास्तविक मेहनताने के बीच का सम्बन्ध है। श्रम अनुबंध की स्वतंत्रता के कारण मजदूर जो पाता है, वह उसके द्वारा उत्पादित सामग्री के वास्तविक मूल्य से निर्धारित न होकर उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं से और काम की तलाश में होड़ में लगे मजदूरों की संख्या के अनुपात में पूँजीपति को श्रम-शक्ति की जरूरत से निर्धारित होता है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि सैद्धान्तिक रूप से भी मजदूर का वेतन उसके द्वारा किए गए उत्पादन के मूल्य द्वारा निर्धारित नहीं होता।
      अंशत: पूँजीपतियों की आपसी होड़ के कारण और अंशत: तकनीकी विकास के कारण निजी पूँजी कुछ हाथों में केन्द्रित होती जाती है और बढ़ता हुआ श्रम-विभाजन उत्पादन की लघुतर इकाइयों की कीमत पर वृहत्तर इकाइयों के निर्माण को प्रोत्साहित करता है। इस विकास का ही परिणाम निजी पूँजी का एक गुटतंत्र (ऑलीगार्की) है; जिसकी अपार शक्ति को जनतांत्रिक ढंग से संगठित एक राजनीतिक समाज द्वारा भी प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। यह एक सच्चाई है क्योंकि विधायिका संस्थाओं के सदस्यों का चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा होता है, जो पूँजीपतियों से आर्थिक सहायता प्राप्त करते हैं या दूसरे तरीकों से उनके प्रभावों में रहते हैं। ये पूँजीपति व्यावहारिक तौर पर हर तरीके से निर्वाचकों को विधायिका से अलग कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि जनता के प्रतिनिधि आबादी के दलित-शोषित तबकों के हितों की वस्तुत: पर्याप्त रक्षा नहीं करते। इसके अतिरिक्त, वर्तमान परिस्थितियों में निजी पूँजीपति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सूचना के प्रमुख स्रोतों (प्रेस, रेडियो, शिक्षा) पर अनिवार्यत: अपने नियंत्रण रखते हैं। इस प्रकार किसी नागरिक के लिए वस्तुगत निष्कर्षों तक पहुँच सकना या अपने राजनीतिक अधिकारों का सटीक प्रयोग कर पाना अत्यन्त कठिन होता है और वास्तव में अधिकांश मामलों में तो एकदम असंभव होता है।
      इस प्रकार, सम्पत्ति के निजी मालिकाने पर आधारित अर्थव्यवस्था में मौजूदा स्थिति को दो मुख्य सिद्धान्तों द्वारा स्पष्ट किया जाता है; पहला उत्पादन के साधनों (पूँजी) पर निजी मालिकाना होता है और मालिक जैसे भी ठीक समझें उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरा, श्रम अनुबंध स्वतंत्र होता है। वास्तव में, इस अर्थ में एक शुद्ध पूँजीवादी समाज जैसी कोई चीज नहीं होती। विशेष तौर पर उल्लेखनीय है कि मजदूर लम्बे और तीखे राजनीतिक संघर्षों द्वारा स्वतंत्र श्रम समझौते का किंचित सुधारा हुआ रूप, कुछ इस तरह के मजदूरों के लिए पा सकने में सफल हुए हैं, किंतु समग्रता में आज की अर्थव्यवस्था शुद्ध पूँजीवाद से बहुत भिन्न नहीं है।
      उत्पादन मुनाफे के लिए किया जाता है न कि उपयोग के लिए। ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि सक्षम और काम के इच्छुक सभी लोग हमेशा काम पा सकने की हालत में रहें, बेकारों की फौज लगभग हमेशा मौजूद रहती है। मजदूर हरदम काम छिन जाने के भय से ग्रस्त रहता है। चूँकि बेकार और बहुत कम वेतन पाने वाले मजदूर एक लाभदायक बाजार नहीं बनाते, इसी से उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन सीमित रहता है, जिसका परिणाम होता है, भयंकर कठिनाई। तकनीकी प्रगति सबके काम का बोझ घटाने के बजाय लगातार और अधिक बेकारी पैदा करती है। पूँजीपतियों के बीच की होड़ के साथ जुड़ा मुनाफे का मकसद ही पूँजी के संचय और उपयोग में अस्थिरता के लिए जिम्मेदार है। यह समाज को उत्तरोत्तर गहन महामंदी की ओर ले जाता है। यह असीमित होड़ श्रम की बड़े पैमाने पर बर्बादी को पैदा करती है और साथ ही व्यक्तियों की सामाजिक चेतना को पंगु बनाती है जिसका उल्लेख मैं पहले ही कर चुका हूँ।
      व्यक्तियों के इस प्रकार पंगु बनाए जाने को मैं पूँजीवाद का सबसे बड़ा अभिशाप मानता हूँ। हमारा सारा शैक्षणिक ढाँचा इस अभिशाप से ग्रस्त है। विद्यार्थी के मन में एक अतिरंजित प्रतियोगी दृष्टिकोण बैठाया जाता है तथा उसे आगामी कैरियर के लिए तैयारी के रूप में धनपिपासु (लोभी) सफलता की पूजा करना सिखाया जाता है।
      मैं इस बात से सहमत हूँ कि इन विकट बुराइयों को समाप्त करने का केवल एक ही रास्ता है, केवल एक समाजवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना द्वारा ही ऐसा किया जा सकता है, जिसके साथ-साथ सामाजिक लक्ष्यों से युक्त एक शिक्षा व्यवस्था भी हो। ऐसी अर्थ-व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर स्वयं समाज का स्वामित्व होता है और उनका उपयोग नियोजित ढंग से होता है। नियोजित अर्थव्यवस्था समुदाय की आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन को समायोजित करती है, काम करने में सक्षम लोगों के बीच किये जाने वाले काम को बाँट देती है तथा प्रत्येक स्त्री, पुरुष और बच्चे को आजीविका की गारण्टी देती है। ऐसे समाज में शिक्षा, व्यक्ति की सहज क्षमता का विकास करने के साथ ही हमारे वर्तमान समाज की सत्ता और सफलता का गुणगान करने की जगह उसके अन्दर अपने जैसे लोगों के प्रति एक जिम्मेदारी की भावना को विकसित करने का प्रयास करेगी।
      फिर भी, इसे याद रखना जरूरी है कि एक नियोजित अर्थव्यवस्था ही समाजवाद नहीं होती है। एक नियोजित अर्थव्यवस्था में व्यक्ति पूरी तौर पर गुलाम हो सकता है। समाजवाद की स्थापना कुछ अत्यन्त कठिन सामाजिक-राजनैतिक समस्याओं के समाधान  की माँग करती है; राजनैतिक और आर्थिक शक्ति के व्यापक केन्द्रीयकरण को ध्यान में रखते हुए नौकरशाही को सर्वशक्ति-सम्पन्न व उद्धत होने से कैसे रोका जा सकता है? व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा कैसे हो सकती है और इसके साथ ही नौकरशाही की ताकत को निष्प्रभावी बनाने वाली जनतांत्रिक शक्ति को सुनिश्चित तौर पर कैसे स्थापित किया जा सकता है?
      हम संक्रमण के युग से गुजर रहे हैं। समाजवाद के लक्ष्य और समस्याओं के प्रति स्पष्टता इस दौर में सबसे ज्यादा अहमियत रखती है। मौजूदा हालात में इन समस्याओं पर स्वतंत्र और बेरोक-टोक बहस-मुबाहिसे पर सख्त वर्जनाएँ लागू हैं। इसलिए इस पत्रिका की शुरूआत मेरे विचार में एक अहम जन सेवा है।
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