सिर्फ सॉरी शब्द कहना सही है ? ( फेसबुक से, भाग- 1)

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बहुत सारे विचार दिमाग में लिखने को उकसाते हैं, लेकिन इधर नहीं लिखा कुछ। सोचा कि फेसबुक पर कई बार कुछ अच्छे विचार तो उतर जाते हैं ही या कई बार कुछ काम का भी लिख दिया जाता है, तो उसे सँजोकर यहाँ प्रस्तुत करने का खयाल आया। पहला भाग प्रस्तुत हैः

31 जनवरी 2012
2012 को रामानुजन की याद में भारत में राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया गया है।

इस अत्यंत प्रतिभाशाली और महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन, जिन्हें दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शुमार किया जाता है, पर एक किताब आई, नाम था मैन हू नेव(या न्यू) इनफिनिटी किताब के लेखक थे राबर्ट कैनिगेल। कैनिगेल ने इस बहुप्रशंसित ग्रंथ को लिखने के लिए कुछ सप्ताह रामानुजन के जन्मस्थान में भी बिताये थे। यह किताब 1991 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। 


अब ज़रा ध्यान देनेवाली बात सुनें 
इस किताब का जर्मन अनुवाद 1993 में, जापानी अनुवाद 1994 में, कोरियाई संस्करण 2000 में, चीनी संस्करण 2002 में, इतालवी अनुवाद 2003 में, थाई अनुवाद 2007 में, यूनानी संस्करण 2008 में प्रकाशित हुआ। लेकिन तय है कि भारतीय भाषाओं के संस्करण अब तक नहीं आये हैं। किताब लिखे जाने को 20 साल बीत चुके हैं। किताब बहुत आवश्यक और बेहतरीन मानी गयी है। पृष्ठ 400 से ज्यादा हैं। 
क्या आपको इन भाषाओं में इस महान किताब के अनुवाद होने के वर्ष से उस भाषा के लोगों और उस भाषा के देश को लेकर कुछ पता चलता है! 
मुझे सबसे ज्यादा हिन्दी विरोधी लोगों के राज्य तमिल को लेकर अफसोस होता है क्योंकि इन्होंने अंग्रेजी के तलवे चाटने में कोई कसर छोड़ी और खुद तमिल का भला भी करते हैं, करनेवाले लगते हैं। उनके नाम पर हर साल एक दिवस मनानेवाले राज्य ने तमिल अनुवाद भी पेश नहीं किया है, जहाँ तक मेरी जानकारी है।
भारत जिनपर गर्व कर सकता है, ऐसे एकदम गिने चुने लोगों में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बचपन से उनको थोड़ा जाना हैएक आकर्षण पैदा होता हैमेरे सबसे प्रिय लोगों मे हैं रामानुजनहाँ 32 साल की उम्र में चल बसे थे वे
विशेष: रामानुजन के सामने विवेकानंद की देन का कोई महत्व नहीं है।
पढना चाहते हैं तो 
www.4shared.com/get/mABclt8P/The_Man_Who_Knew_Infinity_-_A_.html पर जाएँ…


30 जनवरी 2012
क्या अफसोस व्यक्त करने के लिए सिर्फ सॉरी शब्द कहना सही है ? सॉरी का अर्थ जितना होता है, उतना ही माफी माँगने के लिए प्रयोग करना ठीक वैसे ही है जैसे एक छोटा बच्चा जिसकी भाषा अभी अच्छी नहीं है, वह मुझे भूख लगी है कि जगह सिर्फ रोना शुरू कर दे या नानी की जगह सिर्फ नीकहे। सॉरी का अर्थ एक वाक्य कैसे हो सकता है। इसे कूटशब्द या कोड की तरह इस्तेमाल करना ऐसे लगता है जैसे भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कोई आतंकवादी अपने मित्र को संदेश भेज रहा हो। … … … असहमतियाँ विशेष रूप से आमंत्रित हैं।
×  ×  ×
गोपाल गोडसे की किताब गाँधी वध क्यों पढते वक्त एक बात हमेशा दिखती है कि वह कोई सनकी आदमी लिख रहा है, बोल रहा हैअदालत में नाथूराम का बयान देखने पर कितनों को महानता के दर्शन होते हैं लेकिन उस बयान मे सिवाय इस बात के कि गोडसे हिन्दू है, एक ब्राह्मण हैकोई बात महत्वपूर्ण नहीं होती… … कोई वैज्ञानिकता नहीं, कोई समझ नहीं लेकिन फिर भी गोडसे के भक्तों की कमी भी नहीं हमारे देश में।
26 जनवरी 2012
भारत में संविधान चुटकुले की किताब है!
×  ×  ×
प्रतियोगिता नहीं सहयोगिता… … यह होना चाहिए… … वरना हमारे देश में समस्याएँ खासकर बेरोजगारी बरकरार रहेगी ही। सही हूँ मैं ? … … और हमारे आधुनिक नौटंकीबाज विचारक मैनेजमेंटियाते हैं पटक पटक कर, लोगों को पीछे धकेल कर जीना सिखाते हैं… … वैसे ये क्या खाक़ सिखायेंगे!
25 जनवरी 2012
फिल्मों में नौकरों से, गँवारों से हिन्दी, क्षेत्रीय भाषाएँ बोलवाई जाती हैं, लेकिन साहब या मेमसाहब मालिक या अंग्रेजी बोलते हैं। स्कूल देखिएगा तो अंग्रेजी में पढ़ाई हो रही है। इसका सीधा सा अर्थ तो इतना ही है कि हिन्दी नौकरों की भाषा है, दाइयों की भाषा है?
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आईने में नेता (कविता)

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आईने में चेहरा देखते ही
डर जाता है आईना।

आखिर कौन है यह
जिसके सामने जाने से डरता है
आईना भी,
जो बेजान है
जिसकी शक्ल आईने में
बदल जाती है
और दिखता है कोई
पुराणों में वर्णित
राक्षस जैसा, डरावना
शायद नेता है!
आईने में जब यह व्यक्ति देखता है खुद को
नजर आता है चौरासी लाख पेटों वाला
भूत
लेकिन चेहरा तो नहीं दिखता ऐसा
फिर आईना झूठ बोल रहा है?
कहते हैं आईना सच ही बोलता है
इस हिसाब से
यह नेता ही है…

नीतीश कुमार के ब्लॉग से गायब कर दी गई मेरी टिप्पणी (हिन्दी दिवस आयोजन से लौटकर)

12 टिप्पणियाँ

मैं किसी ऐसे आयोजन में शामिल नहीं हुआ था जो हिन्दी दिवस पर हुए। फिर वहाँ से लौटने की बात क्यों? कारण है भाई। पिछले कुछ दिनों से लगातार हिन्दी पर पढ़ने को मिलता रहा है। आयोजनों में भाषण-पुरस्कार-शपथ आदि के अलावा कुछ होता तो है नहीं, इसलिए हम ब्लॉग-जगत के अलग-अलग घरों में पैदल ही घूमते रहे। 40-50 से कम लेख-कविताएँ नहीं पढ़ी होंगी। कई जगह टिप्पणी भी की। तो मेरा यह काम भी तो आयोजन में शामिल होना ही माना जाएगा।
कुछ दिनों से हिन्दी का जोर सबमें मार रहा था। कई तो ऐसे भी दिखे जो 14 सितम्बर बीतते ही अंग्रेजिया गये, जो उनकी असली प्रवृत्ति रही है। ऐसे लोग बड़े चालू किस्म के होते हैं। पूरा का पूरा गिरगिट। जब चाहा रंग बदल लिया।
कई लोगों ने जो सम्माननीय भी हैं, अच्छी बातें भी कहीं।
      इनमें से कुछ लिखनेवाले महाबुद्धिमान थे, तो कुछ भगवान ही थे। कुछ लोग कम या ज्ञात जानकारी या भ्रमों के प्रभाव में थे, तो कुछ संसार की हजारों भाषाओं के बीच मात्र अंग्रेजी के लिए उदारमना बन रहे थे। इन उदारमनाओं में पता नहीं अन्य भारतीय या विदेशी भाषाओं के प्रति इतना सम्मान है या नहीं, लेकिन ये जी जान लगाकर अंग्रेजी को धो-पोंछ रहे थे।
अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त करना हिन्दी के विरोध का सूचक नही है। पर मैंने लिखा- रावण का साथ देना राम का सहयोग नहीं है।
      कुछ लोगों के पेट में इस बात का दर्द अधिक ही हुआ कि क्यों अंग्रेजी के खिलाफ़ लिखा जाता है। अब ये लोग बेचारे कितनी मेहनत से अंग्रेजी सीखते हैं और उसी के दम पर इनका काम चलता है, तब कैसे बरदाश्त करें भला! यह अलग बात है कि इनके पास संसार की अन्य विदेशी भाषाओं का सीखने का समय नहीं ही होगा। कुछ लोग सच में ऐसे होंगे या अपने को इस धोखे में रख रहे होंगे कि वे बड़े महान लोग हैं या विश्व-नागरिक हो गये हैं। और कुछ लोग तो निश्चय ही ऐसी धारणा, भारत में फैलाये गये जाल में गलती से या जानबूझकर फँसने के कारण रखे हुए हैं। विस्तार में जाने की फिलहाल आवश्यकता नहीं लगती।
            वहीं कुछ अलग भी देखने को मिला। एक नई लेकिन बेहतर लेखिका ने भी कुछ लिखा। भाषा पर एक सुन्दर कविता भी मिली।
     वहीं कुछ लोग अपनी एक यात्रा या घुमाई में दस आदमी से मिल के भाषा पर बड़े विद्वान ही बन जाते हैं। जैसे वे अधिकृत इतिहासकार हों और वही सत्य बता सकते हों। ऐसे लोग शुरू करते हैं अपनी यात्रा गाथा से, जैसे यात्रा साहित्य के प्रपितामह हों। जैसे कोई तमिलनाडु गया चार दिन के लिए और वहाँ से भाषा का शोध-पत्र लेते आया। अब विश्वविद्यालयों को सोचना चाहिए कि ऐस लोगों के घर जाकर पी-एचडी की उपाधि जरूर देनी चाहिए। लेकिन वे हमेशा गलत ही करते हैं। बेचारे ऐसे-ऐसे एकदिनी शोधकर्ताओं के शोध का सम्मान होता ही नहीं।
      वहीं कुछ लोग समय के साथ चलने की सलाह देते नजर आते हैं।* उनके अन्दर जैसे कोई शेर सोया है, ऐसे पेश आते हैं। समय के साथ चलना भी कुछ अलग अर्थ देता है। समय के साथ यानि जिस समय को हमने बदला या बना लिया है। अब हम उसके कारण हैं और फिर हम अपनी मूर्खता को ही समय बना देते हैं। ऐसे लोग हिंग्रेजी के बड़े पक्षधर हैं। और अंग्रेजी के शब्दकोश में जय हो या महात्मा शब्द जुड़ने से अपने को या अपनी भाषा को परम सौभाग्यशाली समझते हैं। (अमेरिका या ब्रिटेन की कोई संस्था, जो चिरकुट ही क्यों न हो, कोई रिपोर्ट छाप दे तो लगता है कि भूचाल आ गया है। जैसे उसने माना तो आपकी आँखें झूठ हो सकती हैं लेकिन वे? सवाल ही नहीं है। अभी नरेन्द्र मोदी और नीतीश पर ध्यान दे लें। यह हाइटेक जमाना है भाई। आपके घर की सच्चाई, आप गलत या कम जानते हैं लेकिन अमेरिकी लोग अधिक।) ये अंगिंदी(अंग्रेजी में हिन्दी) के पक्षधर नहीं हो सकते क्योंकि अंग्रेजी में मिलावट की बात करना तो कानूनन जुर्म है। ऐसे लोग हिन्दी के दस वाक्य बोलें तो सौ अंग्रेजी शब्द चल सकते हैं(हैं, हो, कि, जैसे, लगता है, एक आदि शब्दों को छोड़कर सारे शब्द अंग्रेजी के) लेकिन अंग्रेजी के दस वाक्य में दस क्या दो शब्द भी हिन्दी के हों तो हिमालय टूट जाएगा। और सब जानते हैं कि ऐसे लोग बहुत ईमानदार और शान्तिप्रिय होते हैं, जिम्मेदार नागरिक होते हैं, जैसे हमारी फिल्मों में अभिनेता हुआ करते थे/हैं। (यहाँ बताता चलूँ कि मैंने जानबूझकर अमिताभ बच्चन के ब्लॉग पर इसी 14 तारीख को ही एक टिप्पणी लिखी थी …और अंग्रेजी में ही लिखते रहें। हिन्दी का सम्मान अंग्रेजी लिखकर ही होता है। फिर भी आप हिन्दी के लिए जाने जाते हैं। इस टिप्पणी को वहाँ से बाद में हटा दिया गया।)
      चलते-चलते एक और बात इस आयोजन पर। पिछले लेख में नीतीश कुमार के भाषाई रवैये पर लिखा था। जब मैं नीतीश के ब्लॉग पर गया, तब वहाँ से भी मेरी टिप्पणी हटा दी गई है। मेरे पिछले लेख को प्रकाशित करने तक उनके ब्लॉग पर 13 सितम्बर वाले अंग्रेजी लेख पर आठ टिप्पणियाँ थीं। (उनके ब्लॉग पर माडरेशन चालू है, जैसे रवि रतलामी जी ब्लॉग पर है। यानि स्वीकृति के बाद ही टिप्पणियाँ दिख सकती हैं।) लेकिन जब मैं 16 सितम्बर को वहाँ जाता हूँ, तब पंद्रह सितम्बर तक की गई 18 टिप्पणियाँ दिखती हैं। जबकि मैंने 14 सितम्बर को ही दिन में टिप्पणी कर दी थी। इसका प्रमाण है कि मैंने अपने ब्लॉग पर 14 सितम्बर को ही 5 बजकर 43 मिनट पर यह सूचना दी थी कि मैंने उनके ब्लॉग पर क्या टिप्पणी की है।
      फिलहाल तो यही बातें हैं। अब इतना तो तय है कि माडरेशन या टिप्पणियों का संपादन नीतीश कुमार या उनके कोई सहायक ही करते हैं। फिर क्यों ऐसा किया गया? मुझे शायद इसका जवाब मालूम है। क्योंकि मैं सरकारी सोच नहीं रखता। अब यह सरकारी सोच क्या है। इस पर अगले दिन…
……………………………………………………………………………………………………………………
*(इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो कृष्ण के परम शिष्य हैं। बचपन से पर्दों पर छपे या रजिस्टरों के पीछे छपे, गीता-सार में लिखा रहता था, जो हो रहा है, वह अच्छा ही हो रहा है। जो हुआ, वह भी अच्छा ही हुआ और जो होगा, वह भी अच्छा होगा। ऐसी बेसिर-पैर की बातें ऐसे लोगों को सहायता प्रदान करती हैं। ऐसे लोगों का नाम लेने की जरूरत नहीं। बस, यही जान लीजिए कि ऐसी बड़ी-बड़ी हस्तियाँ इसमें शामिल हैं, जिन्हें सरकार ने ऊँचे पदों पर बैठा रखा है। जैसे अकादमियों के निदेशक आदि। या फिर बड़े-बड़े लेखक भी शामिल हैं इसमें और ब्लॉगर भी)
………..
अभी-अभी एक नई खबर मिली है नीतीश सरकार के बारे में। इसे अवश्य देखें। अभी तक मैंने लगभग दस लेख बिहार सरकार के खिलाफ़ में लिखे हैं। जिनमें शिक्षकों और चिकित्सकों की लूट, सुशासन में अपराध, बेरोजगारी, घटिया शिक्षा नीति आदि विषय शामिल हैं। यह सरकार सिर्फ़ प्रशंसा करने वालों के लिए अच्छी है। चाहे अमिताभ हों या  कोई अभिनेत्री, कोई विदेशी हो या कोई बड़ा उद्योगपति, केवल इन्हें ही बिहार के मुख्यमंत्री और उनकी व्यवस्था अच्छी लगती है। क्योंकि जब पूँजीवाद के घोर समर्थक और शोषक लोगों को सुविधा मिलती है, तब वे भला सच कैसे बोलेंगे। मीडिया और कुछ तथाकथित भली संस्थाएँ नीतीश की छवि को महापुरुष में बदलने को जी-जान लगा रही हैं।

फेसबुक पर लिखने पर नीतीशराज में दो लेखकों का निलम्बन 

/ प्रमोद रंजन , 



क्या आपने कभी किसी ब्लॉग का सार्वजनिक विज्ञापन देखा है। कभी सुना है कि किसी बहुत बड़े बोर्ड-बैनर पर एक ब्लॉग का विज्ञापन किया हो? मैंने देखा है। पटना के गाँधी मैदान के पास, श्रीकृष्ण मेमोरियल सभागार के पास, रास्ते पर नीतीश के इसी ब्लॉग का विज्ञापन दिखता रहा है, मैंने कुछ महीने पहले तक देखा है। 
…….-11:26 पूर्वाह्न

भाषा पर नीतीश का दोहरा रवैया

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दो अलग-अलग व्यवहारों को देखिए आज, हिन्दी दिवस पर। अब बताएँ वे सरकार के पक्षधर लोग कि हिन्दीभाषी राज्य बिहार के सुशासन बाबू का यह रवैया कैसा माना जाय। 

सबसे पहले देखिए इस जगह जहाँ आप पाएंगे वही सदाबहार अपील, जो हर साल करोड़ों पन्नों को बरबाद करने के लिए छापी जाती है।

14 सितम्बर को हिन्दी के लिए अपील करते नीतीश
              
फिर दैनिक जागरण की साइट पर यह खबर देखिए, जो ऐसे शुरू होती है।
सीएम ने लिखा ब्लॉग वादा पूरा किया, लेकिन जारी रहेगी मेरी जंग
पटना, जागरण ब्यूरो : लंबे अर्से के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने ब्लाग के माध्यम से एक बार फिर राज्यवासियों से मुखातिब हुए हैं। राज्य सरकार के प्रति विश्र्वास कायम रखने के लिए जनता को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा है कि पिछले नवंबर में बिहार चुनाव के आये नतीजों के बाद पहली बार मैं अपने विचार आप सभी से बांट रहा हूं। विश्र्व के विभिन्न क्षेत्रों से बहुतों ने मुझसे पूछा, मैंने ब्लाग पर लिखना क्यों छोड़ दिया। सच यह है कि मैं आप सभी से जुड़ने के लिए किसी बेहतर मौका के इंतजार में था। अब, वह समय आ गया। पिछले सप्ताह हमारी सरकार ने वह कर दिखाया जिसके बारे में मैं अर्से से बेचैन था। हमने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में लिप्त एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के घर में प्राथमिक विद्यालय खोल दिया। उनका घर पिछले साल बने विशेष न्यायालय कानून के तहत जब्त किया गया है। इस भवन में स्कूल का खुलना कोई साधारण ल्ल शेष पृष्ठ 21 पर
     
यह खबर आज पटना से प्रकाशित अन्य अखबारों में भी प्रकाशित है।
इस खबर के उल्लेख करने का अभिप्राय सिर्फ़ इतना ही है आप यह देख सकें कि मुख्यमंत्री ने अपना ब्लॉग कैसे लिखा है। यहाँ पढ़िए उनका लिखा।
13 सितम्बर को अंग्रेजी में लिखा लेख
     
तो श्रीमान अंग्रेजी में लिखते हैं और अपील हिन्दी के लिए। वह भी कल और आज, अलग-अलग भाषा में। यही नहीं इनके ब्लॉग पर लेखों के हिन्दी-अंग्रेजी अनुवाद एक साथ रहते हैं। कुल बारह लेखों में से सात अंग्रेजी में हैं। साफ समझना है कि ये लेख वे अमेरिका-इंग्लैंड-न्यूजीलैंड-आयरलैंड-कनाडा आदि देशों में पढ़े जाने के ही लिख रहे हैं। यहाँ यह बता दें कि कुछ दिन पहले इन्होंने एक किताब लिखी थी, वह भी अंग्रेजी में।
      इसे नीतीश का कौन-सा व्यवहार कहें? क्या यह नहीं हो सकता था कि आज बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् और बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी को बन्द करने का ऐलान कर दिया जाता?

सिर्फ़ एक बार (हिन्दी दिवस पर विशेष)

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सब जानते होंगे कि ब्लागर ने पोस्ट के लिए संदेश शब्द अपनाया है। यह हिन्दी में ब्लागर का इस्तेमाल करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन हमने पोस्ट को ही माना। ठीक यही हाल चिट्ठा शब्द का हुआ। जब पहली बार ब्लॉग के लिए इस शब्द का इस्तेमाल हुआ तब हिन्दी के कई नए शब्द उभरे जैसे- चिट्ठाकारी या चिट्ठेकारी, चिट्ठा-जगत, चिट्ठेकार आदि। लेकिन जैसा कि हम हिन्दी लोगों की आदत है, हमने अंग्रेजी शब्द को ऐसे स्वीकारा जैसे वह अमृत हो। शब्द तो कोई बुरा नहीं होता। लेकिन मैंने सुना है कि अंधे को सूरदास कहना अधिक सम्मानजनक है और उचित भी। आज कितने प्रतिशत ब्लॉगर चिट्ठा शब्द इस्तेमाल करते हैं? शायद बहुत कम। मैं स्वयं भी अधिकांशत: ब्लॉग शब्द का इस्तेमाल करता हूँ, चिट्ठे का कम। इसका कारण मैं स्वयं भी हूँ और अन्य लोग भी। शब्दों का भाषाओं में आना-जाना लगा रहता है लेकिन वह स्वाभाविक होता है। हमने जानबूझकर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया है। उदारवाद हमेशा मूल रूप से खतरनाक साबित होता आया है, क्योंकि वह कहीं-न-कहीं नाव में छेद कर देता है। चाहे वह भाषा के मामले में हो या सुरक्षा के मामले में। उदार होने के साथ-साथ स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखना भी अनिवार्य है।

      यह था आज का बकवासी बयान।
      14 सितम्बर कल है। सब जगह, अखबार में, ब्लॉग पर (और पता नहीं चैनलों पर क्या हाल है) हिन्दी का जोर चल रहा होगा। एक-से-एक विद्वान, अनुभवी और बड़े लोग इस विषय पर यानि हिन्दी दिवस पर या तो लिख चुके हैं या आज-कल में लिख डालेंगे। अब जरा एक मूर्ख और अनुभवहीन का भी लिखा उसी क्रम में आप देख लीजिए।
      1949 में जब 14 सितम्बर को हिन्दी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया गया तब से लेकर आज तक हिन्दी के पक्ष में सारे काम सरकार करती आई है और लोग भी, आप यह जानते ही हैं! तो आइये हम भी हिन्दी के क्षरण-मरण(?) दिवस को मना ही लेते हैं।
      हमारे यहाँ रवींद्र कालिया, सुधीश पचौरी, प्रसून जोशी जैसे लोग भी खुश हैं हिन्दी की हालत से, जिनका खाना-पीना ही हिन्दी से चलता है। विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों ने कितना काम किया है, यह इसी से साफ होता है कि महीने में एक लाख रुपये तक या अधिक ही, उनकी जेब में तनख्वाह के रूप में आते हैं। हिन्दी दिवस हो या प्रेमचन्द जयन्ती, बड़े जोर-शोर से मना लिया जाता है इनके द्वारा। निजी स्कूलों में तो हिन्दी के शिक्षक होते ही हैं अंग्रेजी का प्रसार करने के लिए। अब इसमें बेचारगी है या आवारगी, यह तो वे ही जानें? और ये सारे हिन्दी के नाम पर खाने वाले लोग 364 दिन तक हिन्दी के लिए क्या करते हैं, यह आप भी जानते हैं और हम भी। सब के अन्दर आज-कल हिन्दी-प्रेम उमड़ रहा होगा। तो आइए, हम हिन्दी का अन्तिम संस्कार होने से पहले रो-गा लें।
आप अगर हिन्दी को लेकर चली 1948 और 1949 की पूरी बहस पढ़ें, तो स्वयं जान लेंगे कि हिन्दी को लेकर तथाकथित महान लोगों के कैसे विचार थे? कैसे-कैसे दोमुँहे लोग संविधान-सभा में बैठते थे और बोलते थे, यह सब आप उस बहस से जान सकते हैं। अन्तर्जाल पर अंग्रेजी में मौजूद है वह हिन्दी वाली बहस। 

अब इसी क्रम में जरा दो धुरंधरों की बात यहाँ रख देता हूँ। पहले राममनोहर लोहिया और दूसरे हरिशंकर परसाई।
“अंग्रेजी राज्य के खत्म होने पर भाषा का सवाल उग्र रूप से उठा। अगर मध्यदेशियों में शिवाजी या सुभाष बोस जैसा बड़प्पन होता तो अंग्रेजी हटाने और हिंदी चलाने के लिए समय-सीमा की बात कभी सोची या स्वीकारी नहीं जाती। 1950 में 1965 की सीमा बाँधना महान मूर्खता और महान क्षुद्रता थी। जो कोई उस  समय के शक्तिशाली राजपुरुष थे, अच्छी तरह देख रहे थे कि समय के प्रवाह से अंग्रेजी का मामला सुधरेगा और हिंदी का बिगड़ेगा। कसम और संकलो की लड़ाई थी। कसम खाते थे हिंदी के लिए और संकल्प रहता था अंग्रेजी को चलाते रहने के लिए। ऐसी हालत में कसम खाली रस्मी और ऊपरी रह जाती है। सब काम कसम से उलटा होता रहा हैसमय-सीमा बाँधने की जरूरत हुई, एक इसलिए कि हिंदी को समृद्ध बनाना है, दो, इसलिए कि इसे तट देश की स्वीकृति, प्रचार इत्यादि के जरिए दिलाना है।
– राम मनोहर लोहिया
भाषा, भूमिका, पृ 9-10
और कितने लोग समझते हैं कि सरकारों ने हिन्दी के लिए बड़ा भारी काम किया है, तो यह देखिए-
प्रगति जो पर्याप्त नहीं हुई है, उसका कारण स्वयं सरकार है। सन् 1965 में हिंदी को अंग्रेजी का स्थान लेना है- जब यह विधान में स्पष्ट अंकित है तब भारत के शिक्षा मंत्रालय ने इस ओर कितने और कितने बेमन से कदम बढ़ाए हैं।
– हरिशंकर परसाई
परसाई रचनावली, खण्ड-6, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, वर्ष 1, अंक 7, नवम्बर 1956, पृ 154
इस बार पढ़वानी तो कविता थी लेकिन भाषण अधिक हो गया। कविता पाँच साल पहले लिखी गई थी। विचारों में परिवर्तन आया है, आना चाहिए।
सिर्फ़ एक बार
364 दिन
किसी को याद आती है?
अपने जन्मदिन की ।
साल में एक दिन आता है
जन्मदिन
उत्सव का दिन ।
आज 14 सितम्बर है
शायद !
आज ही आता है वो
हिन्दी डे ।
क्या ये सब डे मनाना जरूरी है?
लोग भी सिर्फ़ बिना मतलब के काम किया करते हैं ।
क्यों है न अंकल !
हमारे सर कहा करते हैं-
एक बूढ़ा था ।
जिस दिन हम आजाद हुए न !
उसी दिन की बात है
आई मिन फिफ्टिन्थ् अगस्त नाइन्टीन फोर्टी सेवन की ।
उसने कहा- दुनिया को खबर कर दो
कि गाँधी को अंग्रेजी नहीं आती ।
तो जितने भी विदेश प्रेमी थे न !
उन्होंने कहा- चुप बे !
तू सच बोलता है ।
तुझे नहीं आती होगी ।
देख, मैं तुझे सिखाता हूँ
और शुरु हो गयी अंग्रेजी ।
एक छोटे-से गाँव के स्कूल के लड़के ने
एक आदमी से कहा ।
उस आदमी ने लड़के से पूछा-
का कहते हो बबुआ? हम त कुछ समझ ही नहीं पाया ।
     
वह आदमी ठीक से
हिंदी भी नहीं जानता था ।
यह दृश्य है हिंदी-दिवस का
भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी के
हिंदी-दिवस का ।
आज सुबह अखबार में कुछ लोगों ने कहा है- हिंदी दिवस मनाने -की कोई जरुरत नहीं लगती ।
उनसे हिंदी पूछ रही है
टूटी झोंपड़ी में खड़ी होकर
निराला, पंत, दिनकर, महादेवी, भारतेंदु, प्रसाद, प्रेमचंद की
किताबों से निकलकर
अंग्रेजी के गगनचुम्बी इमारत के सामने ।
जब प्यार सब दिन करते हो तो
यह वैलेंटाइन-डे क्यों मनाते हो? तुम तो 59 साल पहले आजाद हो चुके हो
फिर ये 15 अगस्त मनाते हो
आखिर किसलिए?
ये क्या? सुनते ही तुम्हें नींद आने लगी ! हाँ आनी चाहिए, मां की लोरी जो है?
एक बार
सिर्फ़ एक बार
मेरी झोंपड़ी में आके तो देखो मेरे बच्चों ।
( आंसू बहने लगे
हिंदी की आंखों से )
कैसे-कैसे पकवान बनाकर रखे हैं
मैंने तेरे लिए
अपनी संतान के लिए ।
मैंने सैकड़ों वर्ष से
दीपक जलाये रखे हैं
केवल तुम्हारे लिए ।
बत्ती लगभग जल चुकी है
अब भय है कहीं बुझ न जाए
पर मेरे बच्चों, भरोसा नहीं टूटा है तुमपर से
माँ हूँ
कुछ भी करोगे
माफ़ कर दूंगी ।
लेकिन तुम सच्चे दिल से
मेरी गोद में तो आ !
सिर्फ़ एक बार
तुझे माफ़ कर दूंगी
तुझे अपार स्नेह दूंगी ।
लेकिन आओ तो एक बार भी
मेरी सुनने ।
-14.09.06 

भारतीय राजनीति और हिन्दी व्याकरण -1

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कुछ अजीब तो नहीं लग रहा कि हिन्दी व्याकरण से राजनीति का सम्बन्ध क्या है। बात तो हर भारतीय भाषा के व्याकरण की, की जा सकती है लेकिन फिलहाल हम हिन्दी भाषी होते हुए, हिन्दी व्याकरण की ही बात करेंगे।
      व्याकरण नियम, भाषा और शब्द का ही दूसरा नाम है। व्याकरण में शब्दकोश, काल, सर्वनाम, अपवाद, संधि, समास, कारक, प्रत्यय, उपसर्ग, वचन, चिन्ह, छंद आदि तो होंगे ही। आइये शुरु करते हैं, हिन्दी व्याकरण में राजनीति का खेल।

शब्दकोश: इसमें शब्द होते हैं। अभी-अभी प्रधानमंत्री का 15 अगस्त को दिया व्याख्यान पढ़ने को मिला। शुरु के दो-तीन अनुच्छेद पढ़े और आगे पढ़ने की बिलकुल ही जरूरत न लगी। प्रधानमंत्री का भाषण जो हर साल होता है, वहाँ एक शब्दकोश का इस्तेमाल होता है। इतना ही नही वहाँ वाक्य भी वही इस्तेमाल होते हैं, जो पिछली बार हुए थे। जैसे फिल्मों के रिमेक का चक्कर है, वैसे वहाँ भाषण में भी दुहराने का चक्कर है। यानि वाक्यों में दाएँ-बाएँ करके भाषण तैयार। हाँ, तो शब्दकोश की बात। हर वर्ग के अपने शब्द हैं, उनका अपना शब्दकोश हैं। पाँचवीं के छात्र के लिए कम शब्दों वाला शब्दकोश है तो स्नातकोत्तर के लिए अधिक शब्दों वाला। इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री (या कहें प्रधानमंत्री कार्यालय) के पास भी एक शब्दकोश है। उसमें कुछ शब्द हैं और नियम यह है कि हर साल उसी शब्द सीमा में रहकर भाषण देना है। तो प्रधानमंत्री महाशय हर साल उसी शब्द-सीमा में ही नहीं, उसी वाक्य-सीमा, उसी विचार-सीमा में रहकर कहते आए हैं कि प्यारे देशवासियो! हम तेजी से आगे बढ़ रहें हैं लेकिन हमारे पीछे जाने की गति कम नहीं हुई है। इसलिए हम दो कदम आगे और चार कदम पीछे चलते रहेंगे। आदि आदि…। हर साल जैसे लगता है कि राम और श्याम, सीता और गीता और चालबाज के नाम पर हम एक कहानी ही देख रहे हैं और आश्चर्य यह है कि इन तीनों के मुख्य कलाकार को फिल्मफेयर का श्रेष्ठ अभिनेता या अभिनेत्री पुरस्कार भी मिल जाता है।
      जब भी सवाल उठता है तब बने बनाये वाक्य तैयार रहते हैं। इसकी जाँच हो रही है, दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा, इसके लिए समिति और आयोग गठित कर के इसका निपटारा किया जाएगा, सरकार अपना काम कर रही है– यही सब नमूने हैं वाक्यों के।
      भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने एक किताब छापी है, कीमत इतनी नहीं कि आप आसानी से खरीद सकें। वह भी शब्दकोश और शब्द का ध्यान तो रखती ही है। किताब में सिर्फ़ वैसे शब्द हैं जिन्हें असंसदीय कहा जाता है और जिन्हें संसद में कब, किसने प्रयोग किये हैं, यह दिया गया है। जैसे चमचा शब्द है, यह एक असंसदीय शब्द है।
      तो कुल मिलाकर कहना यह है कि हमारे मंत्री, नेता, विधायक, सांसद सारे लोग शब्दकोश के गम्भीर अध्येता हैं और इन सबकी अपनी सीमाएँ हैं, और चूँकि ये सब अच्छे छात्र हैं, इसलिए सीमा से बाहर नहीं आते चाहे कितनी सीमाएँ दम तोड़ रही हों। ध्यान देकर देखिए तो पता चलेगा कि विधायक या सांसद जो मंत्री नहीं हैं, किसी समारोह के अवसर पर वही शब्द, वही शैली और वाक्य दुहराते नजर आएंगे। और मंत्री किस्म के लोगों की शब्द-सूची तो और अच्छी होती है। कभी कभी तो बिहारी के दोहे भी फीके पड़ जाते हैं। एक वाक्य के दस मायने हमारे पत्रकार लोग निकाल लेते हैं और जनता इस अद्भुत साहित्यिक शब्द-प्रयोग से चकित हो जाती है। और बहुअर्थी वाक्य के लिए बहुमत से इन्हें यमलोक, नहीं नहीं लोकसभा में पहुंचा देती है।
काल: यह वह काल नहीं जो जान लेता है। अकाल भी नहीं। जब मैंने काल ध्यान दिया तो साफ साबित होता है कि राजनीति में एक ही काल सबसे अधिक प्रिय है और सबसे अधिक प्रयोग किया जाता है, वह है भविष्य काल।
      वर्तमान काल तो चिन्ता का विषय है ही नहीं। उसे कुछ नहीं कह सकते। बचा भूतकाल तो वह यह बेचारा मर चुका है या बीत चुका है। कोई नेता अपना भूतकाल देखेगा, तो कैसे जिएगा वह? इसे हम अधिक महत्व नहीं दे सकेंगे। अब बचा एकमात्र भविष्यकाल।
      आप ध्यान दें- हर दिन अखबार, रेडियो, दूरदर्शन (निकटदर्शन रहे तो समस्या हो जाएगी) पर खबरें देखिए। जाएगा, जाएगी, जाएंगे, होगा, होंगे सारे भविष्यकाल को व्यक्त करने वाले शब्द निश्चय ही दिखेंगे। हमारे मंत्री-मुख्यमंत्री-विधायक-सांसद के मुखारविन्द से यह काल सर्वाधिक निकलता है। घोषणाएँ तो सार्वकालिक उदाहरण हैं। तो जनता इन्तजार करे कि बहुत कुछ घोषित है और किया भी जाएगा। जनता कभी भूतकाल के सवाल नहीं उठाती। सबूत तो हर चुनाव है। वैसे भी हाईटेक जमाना है। भविष्य की कल्पना और बातें होनी चाहिए न कि भूतकाल के सवाल कि क्या नहीं किया या क्या कहा था जैसे फालतू के सवाल।
      बस आप आज से अखबार में खबरों की तरफ़ ध्यान देना शुरु कर दें, बस आप खुद देख लेंगे कि मरने-दुर्घटना-समारोहसम्मान जैसी खबरों को छोड़कर भविष्यकाल के सिवा शायद ही और कुछ होता हो। इसे कहते हैं कल्पनाशीलता और दूरदर्शिता।
(जारी…)

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास( चौथा और अन्तिम भाग):- अवश्य पढ़ें

1 टिप्पणी

(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद  (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधानसे लिया गया है। इसे देखिए, लोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)



पहला भाग        दूसरा भाग        तीसरा भाग


अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का आधार अँगरेजी: एक भ्रमजाल



     ऐसे ही खेद की यह बात है कि अँगरेजी के कारण हममें कुछ यह भावना पैदा हो गई हो कि हम विदेशियों से कुछ हेय हैं और हम उनके समकक्ष तभी हो सकते हैं, जब हम उनकी भाषा में ही या अँगरेजी के माध्यम द्वारा उनसे बात करें। मेरी यह मान्यता है कि यही हेयता की भावना इस तर्क के पीछे है कि बाह्य जगत से हमारा सम्पर्क केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही हो सकता है। कहा यह जाता है कि आज संसार के विभिन्न देश एक-दूसरे के अत्यन्त निकट आ गये हैं उर इसलिए प्रत्येक देश और प्रत्येक जाति के लिए यह वांछनीय है कि सारे भू-मण्डल से अपना सम्पर्क बनायें रखे और जहाँतक हमारे देश का सम्बन्ध है, यह कहा जाता है कि यह सम्पर्क केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही रखा जा सकता है। प्रश्न यह होता है कि हमारे लिए ही यह क्यों आवश्यक है कि हमारा बाह्य जगत् से सम्पर्क अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही हो? यह बात फ्रांस, रूस, दक्षिण अमेरिका, चीन आदि के लिए आवश्यक क्यों नहीं है? क्या इन देशों का बाह्य जगत् से सम्पर्क नहीं है? क्या वे लोग संयुक्तराज्य में केवल अँगरेजी के द्वारा ही विचार-विनिमय करते हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि दक्षिणी अमेरिका के राज्यों के प्रतिनिधि स्पेनिश भाषा के माध्यम द्वारा, रूस के प्रतिनिधि रूसी भाषा के द्वारा और चीन के चीनी भाषा के द्वारा सब काम वहाँ करते हैं? यदि वे लोग अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम द्वारा बाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं, तो फिर ऐसी कौन-सी बाधा है कि हम अपनी भाषा के माध्यम द्वारा बाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित न कर सकें? यह ठीक है कि आज संयुक्तराष्ट्र में हिन्दी एक स्वीकृत भाषा नहीं है, किन्तु क्या इसका यह कारण नहीं है कि जिस समय संयुक्तराष्ट्र की स्थापना हुई थी, उस समय हम परतन्त्र थे और अँगरेजों के दास थे, अत: वहाँ हमारे सम्बन्ध में यह विचार ही पैदा न हुआ कि हमारी भी कोई माँग हो सकती है। चीन ने अपनी गरिमा रखने के लिए अपनी भाषा को वहाँ मान्य कराया, किन्तु क्या स्वतन्त्र होने के पश्चात् हमने एक दिन भी यह प्रयास किया है कि हमारी भाषा उस संगठन की एक स्वीकृत भाषा हो जाय? पर हम करते ही कैसे, जब हम अपने देश में ही अपनी भाषा को राज्यासन पर बिठाने को उत्सुक नहीं हैं। परिणाम यह हुआ है कि विदेशी हमको तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं और समझते हैं कि हम ऐसी बर्बर जाति के लोग हैं, जिनकी अपनी कोई भाषा नहीं और जो अपने भूतपूर्व शासकों की भाषा की जूठन से काम चलाते हैं। कैसा पतन है यह उस देश का, जिसकी भाषा एक दिन सारे दक्षिण एशिया और अन्य देशों की विचार-विनिमय की भाषा थी, जिसमें अनेक देशों के विद्यार्थी उस भाषा का ज्ञान उपार्जित करने को आते थे और जो देश सारे सभ्य जगत् का सांस्कृतिक केन्द्र था। कैसा पतन है कि आज उस देश के वासी इस बात में अपना गौरव समझें कि उनकी सन्तान केवल अँगरेजी बोल सकती है, इस देश की एक भाषा नहीं। हमारी आत्मा का हनन इससे अधिक और क्या हो सकता है और यह इसलिए हुआ है कि अँगरेजी हमपर लादी गई। राजनीतिक शास्त्र में एक सूत्र है कि यदि कोई जाति अन्य जाति पर अपना राज्य पूर्णत: जमाना चाहती है, तो उसे यह चाहिए कि वह विजित जाति की भाषा नष्ट कर दे। अँगरेजों ने इस प्रयोजन से हमपर अँगरेजी लादी थी। वे हमारी भारतीय आत्मा का हनन करना चाहते थे। वे इसमें कुछ सीमा तक सफल हुए, किन्तु हमारी क्रान्ति ने उन्हें पूर्णत: सफल न होने दिया, पर आज हमारी आत्मा की इस शत्रु को हमपर क्यों लादा जा रहा है?
अँगरेजी भाषा से मुझे कोई द्वेष नहीं, पर………
मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मुझे अँगरेजी भाषा से कोई विद्वेष नहीं है, किन्तु जो काँटा मेरे मन में चुभता है वह यह है कि इस भाषा को हमारे देश में विषमता का, शोषण का, वर्गप्रभुत्व का साधन बनाया जा रहा है और इसका ऐसा प्रयोग किया जा रहा है कि जिससे हमारे देश की आत्मा का हनन हो। इस विषय में मेरा वही मत है, जो अँगरेजों के सम्बन्ध में गांधीजी का था। वे सदा कहते थे कि उनकी अँगरेज जाति से शत्रुता नहीं, अँगरेजों से वे प्रेम करते हैं, परन्तु यह होते हुए भी अँगरेजी राज्य इस देश पर अस्वाभाविक है, इस देश की समस्त पीड़ाओं का कारण है, इसलिए उसे जाना ही चाहिए। अँगरेजी भाषा के सम्बन्ध में भी मेरी यही स्थिति है। यदि अँगरेजी से ऐसे ही बरता जाय, जैसा कि अन्य विदेशी भाषाओं से बरता जाता है, तो मैं उसका स्वागत करूँगा। न तो मुझे और न किसी हिन्दी या भारतीय भाषाप्रेमी को इस बात में कोई आपत्ति है या हो सकती है कि जो लोग चाहें, वे अँगरेजी सीखें, चाहे फ्रांसीसी सीखें, चाहे चीनी सीखें। यदि कुछ लोग कई भाषाएँ सीखना चाहते हों तो यह भी अच्छी बात होगी। और इसके लिए प्रबन्ध होना चाहिए। किन्तु, केवल इस दृष्टि से कि यहाँ अँगरेजी लादी जाय, यह दलील देना कि कई भाषाओं का ज्ञान-उपार्जन हर विद्यार्थी के लिए वांछनीय है, कुछ उचित बात नहीं है। मैं यह पूछना चाहता हूँ कि जो लोग आज इस वांछनीयता की दुहाई देते हैं, उनमें से कितनों ने यह सोचा भी है, प्रयास करने का तो प्रश्न ही नहीं, कि वे इस देश की कुछ भाषाएँ भी सीख लें। मुझे तो ऐसा लगता है कि अँगरेजी के अतिरिक्त उन्होंने कोई और भाषा सीखने का विचार तक नहीं किया और यहाँ तक कि जो भाषा उन्हें अपनी माता से मिलती थी, उसको भी उन्होंने भुला दिया और यह प्रयास किया कि उनकी संतान अँगरेजी के अतिरिक्त न और कुछ जाने, न बोले। अँगरेजी के मोह में वे इतने पागल हैं कि इस विचार से कि पाँच-छह वर्ष की अवस्था से हमारे देश के बालकों को वे अनिवार्यत: अँगरेजी पढ़ाने के लिए तर्क दे सकें, उन्होंने अँगरेजी बोलनेवालों देशों से विद्वान् बुलाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि छोटे बालकों के लिए कई भाषाएँ सीख लेना बहुत आसान होता है, और इसीलिए छोटी कक्षाओं में ही उन्होंने अँगरेजी  की पढ़ाई आरम्भ कर दी है। पर प्रश्न यह होता है कि अँगरेजी की ही क्यों? क्यों इस देश की कई भाषाओं का ज्ञान कराना ठीक नहीं? पर ऐसी कोई योजना नहीं दिखाई पड़ती। कहा यह जाता है कि फ्रांस का राजकुल अपने मुकुट को आँखों पर धरे पहाड़ के कगार पर जा रहा था और खड्ड में जा पड़ा एवं विनष्ट हो गया। कहीं इतिहास यह न कहे कि भारत में अँगरेजी-वर्ग इस अँगरेजी मुकुट को आँखों पर धरे इसी प्रकार खड्ड में जा पड़ा। मेरा यह प्रयास है कि समय रहते हम सँभल जाय और इसी दृष्टि से मैं आप सबका आह्वान करता हूँ कि आप इस महाप्रयास में लग जायँ कि इस देश की भाषाएँ शीघ्रतिशीघ्र राज्य-क्षेत्र में अपना उचित स्थान पा जायँ।
सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं का माध्यम
     इस प्रयास के दो पहलू हैं। एक तो उन बाधाओं को हटाना, जो हमारी भाषाओं की प्रगति को अवरुद्ध कर रही हैं। मेरे विचार में सबसे बड़ी बाधा तो यह है कि लोक-सेवा-आयोगों कि परीक्षा का माध्यम आज सर्वत्र केवल अँगरेजी है। यह उन प्रदेशों के प्रति घोर अन्याय है, जिन्होंने देशी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बना लिया है। उन प्रदेशों के विद्यार्थी इन परीक्षाओं में पिछड़े रह जाते हैं 
(यहाँ एक तथ्य की तरफ़ मैं आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा कि आखिर क्या वजह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में प्राय: (शायद 95 प्रतिशत या 100 प्रतिशत ऐसा ही होता है) अंग्रेजी माध्यम के उम्मीदवार ऊँचा स्थान हासिल करते हैं? क्या हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने वाला इतना बेवकूफ़ होता है और अगर ऐसा है, तो सरकार घोषित कर दे कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी हो ही नहीं सकती, केवल और केवल अंग्रेजी हो सकती है। वैसे भी आज से एक साल पहले संसद में गृह मंत्री से पूछे गये एक सवाल के जवाब में कहा गया था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। सबूत के लिए यहाँ देखें। पूरे देश में हिन्दी माध्यम के किसी उम्मीदवार के अन्दर ऐसी क्षमता है ही नहीं कि वह ऊँचा स्थान हासिल कर सके? कभी-कभार ऐसा गलती से हो जाता हो, तब उसकी बात अलग है। 2001-02 में कई लोगों ने शिकायत की थी कि हिन्दी माध्यम से होने के बावजूद साक्षात्कार में उनसे अंग्रेजी बोलने को कहा गया और अंग्रेजी में सवाल पूछे गए। मैं पूछना चाहता हूँ कि जब ऐसे उम्मीदवार लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद साक्षात्कार देने पहुंच सकते हैं, तब वे अभी भी बेवकूफ़ समझे जाते हैं? सिविल सेवा के लिए सिविल यानि साधारण लोगों की भाषा अपनाई जाती है? इस तरह की दुष्टता और कुचक्र का मतलब तो यही है सारे हिन्दी भाषी गधे हैं और कभी-कभार एक-दो को छोड़कर सर्वोच्च स्थान हासिल करने वाले 10-20 या 30 उम्मीदवार तो हिन्दी माध्यम का शायद ही हो सकता है। सरकार यह घोषित कर दे कि प्रशासनिक सेवा की परीक्षा देने का और प्रशासनिक सेवा में जाने का अधिकार सिर्फ़ अंग्रेजों की मानस संतानों को है और किसी को नहीं। – प्रस्तुतकर्ता) 
और इसलिए इन प्रदेशों में भी यह प्रयास हो रहा है कि शिक्षा का माध्यम पुन: अँगरेजी हो जाय। कम-से-कम विश्वविद्यालयों के शिक्षक इसी आधार पर वह तर्क देते हैं कि उच्च शिक्षा का माध्यम अभी अँगरेजी ही रहना चाहिए। भारत-सरकार और राज्य-सरकारों का यह कर्त्तव्य है कि वे देशी भाषाओं के प्रति इस घोर अन्याय को अविलम्ब बन्द कर दें। इसलिए, हिन्दी और अन्य देशी भाषाएँ इन परीक्षाओं का माध्यम स्वीकार की जानी चाहिए? इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि हमारे देश की भाषाएँ इन परीक्षाओं के लिए वैकल्पिक विषयों की सूची में भी सम्मिलित की जायँ। 

(हालांकि अब ऐसा हो चुका है, लेकिन सभी जानते हैं कि भाषाओं के मामले में किसका वर्चस्व है। – प्रस्तुतकर्ता)

यह कितनी भारी विडम्बना है कि इन परीक्षाओं के लिए यूरोप की प्रादेशिक भाषाएँ, अर्थात् फ्रेंच, जर्मन, इटालियन इत्यादि-इत्यादि वैकल्पिक विषयों में तो हों, किन्तु इस देश की एक भी प्रादेशिक भाषा उस सूची में न हो। मानों, हमारे राज-कर्मचारियों के लिए फ्रांसीसी या स्पेनिश सीखना तो वांछनीय है, किन्तु इस देश की एक भी प्रादेशिक भाषा जानना या सीखना वांछनीय नहीं है। अँगरेजों ने तो इस देश की भाषाओं को इन परीक्षाओं के लिए वैकल्पिक विषय इसलिए न रखा था कि उनकी तुलना में यहाँ के परीक्षार्थी अधिक सफलता प्राप्त न कर पायें और यूरोप की प्रादेशिक भाषाओं को इसलिए रखा था कि अँगरेज परीक्षार्थी भारतीयों की अपेक्षा उन परीक्षाओं में अधिक संख्या में सफल हो सकें। किन्तु, आज किस सिद्धान्त पर भारतीय भाषाओं का बहिष्कार किया जा रहा है? इस बहिष्कार के कारन इन भाषाओं की प्रगति में बाधा पड़ रही है और यह अविलम्ब दूर होना चाहिए।
उच्च न्यायालयों की भाषा
      इसके अतिरिक्त आज हमारी भाषाओं के सामने यह बाधा भी है कि उनका प्रयोग उच्च न्यायालयों में नहीं हो सकता। हमारा आज जो संविधान है, उसमें यह एक उपबन्ध है कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की भाषा केवल अँगरेजी होगी। परिणामत:, वहाँ व्यवसाय करनेवाले सब लोग अँगरेजी का ही प्रयोग कर सकते हैं और करते हैं। स्वभावत: सारे विधि-व्यवसायों का हित इसी में हो जाता है कि वे देशी भाषाओं से कुछ विशेष वास्ता न रखकर अँगरेजी से ही अपना वास्ता रखें। विधि के क्षेत्र से हमारी भाषाओं के इस बहिष्कार के कारण भी वे पनप नहीं पातीं। कैसी अजीब बात है कि जिस देश के निन्यानबे प्रतिशत लोग अँगरेजी का एक शब्द नहीं समझते, उनकी जीवन-व्यवस्था के लिए नियम और विधियाँ अँगरेजी में ही बनाई जायँ। जो कारखानों में काम करते हैं और जिनके लिए अँगरेजी करिया अक्षर भैंस बराबर है, उनके अधिकारों की विधियाँ भी अँगरेजी में बनाई जायँ।

(आठवीं और पाँचवी पास उम्मीदवार के लिए नियुक्ति के आवेदन-पत्र(फार्म) तक अंग्रेजी में छापे जाते हैं। – प्रस्तुतकर्ता) 

परिणाम यह है कि विधियों से जो अधिकार हमारे जनसाधारण को मिले हुए हैं और जो दायित्व उनपर रखे हुए हैं, उनसे वे सर्वथा अपरिचित रह जाते हैं और कुछ मुट्ठी-भर अँगरेजी पढ़े-लिखे हाथों की इसलिए कठपुतली हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त हमारी न्याय-प्रणाली इस अँगरेजी के कारन अत्यन्त खर्चीली और शिथिल गतिवाली हो गई है। जब कभी उच्च न्यायालय में कोई अपील जाती है, तब इस कारण कि उच्च न्यायालय की भाषा अँगरेजी है, उस मुकदमे की पूरी कार्यवाही का उल्था अँगरेजी में करना पड़ता है। इस उल्थे को पेपर-बुक कहा जाता है और इसके तैयार करने में पर्याप्त धन और समय का खर्च होता है। कभी तो पेपर-बुक हजारों रुपया खर्च बैठता है और वर्षों में यह तैयार होता है; किन्तु कैसे आश्चर्य की बात है कि न्याय-प्रणाली के इस दोष के प्रति विधि-आयोग ने संकेत तक नहीं किया है; क्योंकि अँगरेजी का चश्मा उसकी आँखों पर भी चढ़ा हुआ था और वह अँगरेजी से होनेवाली इस हानि को देख ही नहीं सकता था। मैं समझता हूँ कि हमारी भाषाओं की इस बाधा को भी तुरन्त दूर कर देना चाहिए और इस बात की अनुमति चाहिए कि उच्च न्यायालयों में और उच्चतम न्यायालय में देशी भाषाओं या हिन्दी का प्रयोग किया जा सके।
मन्त्रियों और शासन-तन्त्र की भाषा
       इसके अतिरिक्त हमारे मन्त्रियों और उच्च पदाधिकारियों द्वारा भी अँगरेजी का अपने सब कार्यों में प्रयोग हमारी भाषाओं के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। यथा राजा तथा प्रजा के सिद्धान्त के अनुसार इन मन्त्रियों की देखादेखी अन्य लोग भी इसी में अपना गौरव समझते हैं कि वे भी अपने विभिन्न कार्यों में अँगरेजी का प्रयोग करें, चाहे वह अँगरेजी कितनी ही टूटी-फूटी, गलत-सलत क्यों न हो।

(अभी तो केंद्र के सारे विशेष मंत्री अंग्रेजी के अलावे शायद ही कुछ बोलते हैं। कुछ चिल्लाते भी हैं, लेकिन अपने बच्चों को विदेशों में पता नहीं क्या पढ़ाते हैं? ऐसा क्या पढ़ने जाते हैं इनके लाडले-लाडलियाँ विदेश और अन्त में आकर भारत में करते क्या हैं, सब जानते ही हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एक पर्चा छापता है हर 14 सितम्बर को। उस पर हमारे वर्त्तमान गृह मंत्री के हस्ताक्षर हिन्दी में यानि नागरी में रहते हैं। लेकिन वर्त्तमान गृह मंत्री हिन्दी कब बोलते हैं? – प्रस्तुतकर्ता) 

अत:, हमारे मन्त्रियों और उच्च पदाधिकारियों को भी अपना यह कर्त्तव्य मानना चाहिए कि वे अपना सारा कार्य अपनी प्रादेशिक भाषाओं के माध्यम द्वारा ही करें। साथ ही सचिवालयों में भी हिन्दी-भाषा-भाषी क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग और इतर भाषाभाषी क्षेत्रों में वहाँ की भाषाओं का प्रयोग तुरन्त होना चाहिए, तभी हमारी भाषाओं को वह सम्मान मिलेगा, जो उनकी प्रगति के लिए प्राणवायु के समान है। शब्द-संचार के जो यान्त्रिक साधन आज अँगरेजी के लिए उपलब्ध हुए हैं, वे भारतीय भाषाओं के लिए भी अविलम्ब किये जाने चाहिए, तभी हमारी देशी भाषाओं के समाचार-पत्र उस बाधा से मुक्त हो सकेंगे, जो आज उन्हें घेरे हुए है और जिसके कारण वे उतनी शीघ्रता से समाचार नहीं दे सकते, जितना शीघ्रता से कि अँगरेजी-पत्र दे लेते हैं। बाधाएँ तो और भी हैं, किन्तु उन सब को गिनाना आवश्यक नहीं है। केवल इतना कह देना मैं पर्याप्त समझता हूँ कि हमारी भाषाओं को वे सब सुविधाएँ दी जानी चाहिए, जो अँगरेजी को दी जा रही हैं।
चारों हिन्दीभाषी राज्यों में हिन्दी चलाओ—योजना
      जहाँ तक हिन्दी-भाषाभाषी उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, और मध्यप्रदेशचार राज्यों का सम्बन्ध है, मैंने हाल ही हिन्दी चलाओ नामक एक योजना प्रस्तुत की है। इन चारों राज्यों में इस योजना को काफी समर्थन मिला है। कहा जाता है कि रचनात्मक ढंग की यह पहली ब्यौरेवार योजना है। जो कुछ हो, हमें प्रयत्न करना है कि इन चारों राज्यों में यह योजना कार्यरूप में परिणत की जाय।
हिन्दी का कहीं कोई विरोध नहीं
      परन्तु, जब मैं इन चारों हिन्दी-भाषाभाषी राज्यों में हिन्दी चलाने की बात कहता हूँ, तब यह न समझ लिया जाय कि मैं यह मानता हूँ कि जिन राज्यों अथवा क्षेत्रों की मातृभाषा हिन्दी नहीं है, वहाँ हिन्दी का ऐसा विरोध है, जिसपर ध्यान दिया जाय।
      हमारी संविधान-सभा ने सर्वमत से हिन्दी को इस देश की राजभाषा स्वीकृत किया था। आज यत्र-तत्र इतर भाषाभाषी कतिपय सज्जन हिन्दी का विरोध करते सुने जाते हैं। एक तो वे दक्षिण के चार राज्यों में से केवल तमिल-भाषाभाषी मद्रास के महानुभव हैं और कुछ बंगाल के। परन्तु, यह विरोध रोटियों के कारण है और जिस मद्रासराज्य में यह विरोध दिख रहा है, वहाँ इस विरोध के साथ ही हिन्दी सीखनेवालों की संख्या बढ़ी है। शेष भारत के किसी भी भाग में हिन्दी का कोई विरोध नहीं है। मैंने समूचे भारत के जाने कितने दौरे किये हैं और करता भी रहता हूँ और यह बात मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहता हूँ।
साहित्य-सर्जन
     दूसरा हमारे प्रयास का पहलू सर्जनात्मक हो मैं इस संस्था को बधाई देता हूँ कि इसने इस बारे में स्तुत्य कार्य दिया है।  किन्तु, हम अबतक के कार्य से सन्तोष करके नहीं बैठ सकते। हमें इस देश की आत्मा की अभिव्यक्ति अपनी भाषाओं के माध्यम द्वारा ही हर प्रकार से करनी है। हमारे साहित्यकारों का यह धर्म है कि वे अपनी जीवनानुभूति अपनी भाषाओं के सुन्दरतम शब्दों में अभिव्यक्त करके इन भाषाओं के साहित्य-भाण्डार को परिपूर्ण कर दें। हमारा देश आज एक महान् यात्रा पर चल पड़ा है। ऐसी यात्रा पर, जो उस महामन्दिर में उपासना के लिए है, जिसके प्रसाद से हमारे देश के प्रत्येक नर-नारी का जीवन सब दृष्टियों से सम्पन्न, समृद्ध और आनन्दमय हो जायगा।
आह्वान
     पिछली शताब्दियों में अनेक कारणों से हमारा जीवन गतिहीन हो गया था और इस कारण हम अन्य जातियों से बहुत पिछड़ गये। हमें अब बड़े पग बढ़ाकर उनके समकक्ष आ जाना है और यह हम तभी कर पायेंगे, जब हमारे प्रत्येक नागरिक के हृदय में यह ज्योति जग जाये कि उस के प्रयास पर उसका और हम सबका भविष्य निर्भर करता है। हमें उसे गतिमान बना देना है, गाँव-गाँव और नगर-नगर में हमें यह नवसंदेश पहुंचा देना है। यह काम हमारे भाषा के साहित्यिकों का है, कवियों का है, कलाकारों का है और साथ ही हमारे दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का है। मैं आपका आह्वान करता हूँ कि आप इस ज्योति-शिखा को लेकर इस भाषा की अपार शक्ति को लेकर ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में अलख जगायें। हमारे जन-मानस को आन्दोलित कर दें, जिससे कि वे सब बाधाओं को हटाकर, सब विदेशी जंजीरों को तोड़कर अपना भाग्य-निर्माण करने के लिए और संसार की जातियों में अपना उचित स्थान प्राप्त करने के लिए, द्रुतगति से अग्रसर हो सकें।
(अब आश्चर्य होता है कि ऐसा पचास सालों बाद भी न हो पाया है। उल्टे पिछले पचास सालों में अंग्रेजी के जुआ-घर खुलते गए हैं और अब तो गाँव में भी खुल रहे हैं। क्या यह आह्वान फिर किया जाय? वैसे भी यह मामला अब चालीस सालों से दबा हुआ है। आप क्या चाहते हैं?  -प्रस्तुतकर्ता)

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