मनोहर पोथी बेचते बच्चे (कविता)

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हाल की एक कविता जिसके कुछ भाव आजादी कविता से मिलते हैं… 
दस रुपये में चार किताबें
बेच रहे थे बच्चे
उस दिन
रेलगाड़ी में
जिनकी उम्र दस साल भी नहीं थी।

मनोहर पोथी भी थी उसमें
जिसमें
गाँधी की जीवनी
अनिवार्य होती है।
मुझे याद है
मनोहर पोथी का पहला रंगीन आवरण
जिसमें बच्चे खेलते-कूदते-हँसते-गाते
उछलते हुए दिखते थे।
संसद की अलमारी में
किसी मोटी-सी फ़ाइल में
पड़ा है निः शुल्क शिक्षा का अधिकार
और यहाँ गली में
हर रोज दिखते हैं
मनोहर पोथी बेचते बच्चे।
जिन्हें मालूम नहीं
कि
मनोहर पोथी का ज़माना
अब लद चुका है
अब स्टीकरों वाली
100-100 रुपये की किताबें
नर्सरी के बच्चों को दी जाती हैं
जो दुकानों पर नहीं
विद्यालयों में ही मिल जाती हैं,
जो विद्यालय कम
दुकान ज़्यादा है
क्योंकि वहाँ
किताबें, कॉपियाँ
जूते-मोजे
टाई-बेल्ट
बैच-बैग
सब कुछ मिलते हैं अब।
उन बेवकूफ़ों को
यह पता नहीं
कि
हर वह चीज़ जो
बीते ज़माने की हो चुकी है
उन्हें ही मिलती है।
मनोहर पोथी के
का भी अता-पता नहीं है उन्हें
हाँ, वे दस रुपये का नोट
ज़रूर पहचानते हैं।
मैं यही देखता रहा
कि
नहीं खरीद सकता मैं
दस रुपये देकर
मनोहर पोथी की किताब
मैं बड़ा हो गया हूँ अब।
… और वे रेल के डिब्बे बदलकर
फिर चिल्लाते हैं
दस रुपये में चार किताबें
मनोहर पोथी… मनोहर पोथी।
कभी-कभी दिखता है मुझे
कि
कल के हिंदुस्तान हैं यही
मनोहर पोथी बेचते बच्चे
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स्कूल की घंटी (कविता)

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घंटियां
बजती हैं
किसी के मरने पर
उसकी अर्थी के साथ
लेकिन स्कूल में
आखिर किसलिए बजती हैं घंटियां
किसके मरने पर
किसकी अर्थी पर
शिक्षा की
या
पढ़ाई के बोझ से दबे
शिक्षकों को देखते ही
सहमे-से मासूम बच्चों की
या
उनके दिलों में
जगने वाली उमंगों की । 

(शिक्षक दिवस पर नहीं लिख सका था। यह कविता आज से 5-6 साल पहले की है।)

ईश्वर तुम्हें धिक्कार है! (एक अधूरी कविता)

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निर्मल  हृदय की  प्रार्थना
निष्कपट मन की  भावना
कोई    नहीं   सम्भावना
फिर   भी तुम्हारी साधना
यह  कर  रहा  संसार है!
ईश्वर  तुम्हें  धिक्कार है!

ये  चीख कैसी आज सुन
तनिक   ये  आवाज सुन
ले  सुनाता,   राज  सुन
तेरा  ही  ये  व्यापार  है!
ईश्वर  तुम्हें  धिक्कार है!
कहीं  तंत्र है, कहीं मंत्र है
चमचा  तेरा   स्वतंत्र  है
क्या  खूब!  ये  षडयंत्र है
हर  जगह  अत्याचार  है!
ईश्वर  तुम्हें  धिक्कार  है!
है   एक   मेरी   चाहना
हो  अगर  मुझसे  सामना
एक  प्रश्न  मुझको  पूछना
क्या दिल में  तेरे प्यार है?
ईश्वर तुम्हें   धिक्कार  है!
24 अप्रिल 2010 को लिखी काल्पनिक सत्ता के प्रति यह मेरी एक कविता है जो अधूरी रह गई थी। जब कविता लिख रहा होता हूँ और किसी किस्म का विघ्न पैदा होता है या कोई बीच में आकर अवरोध पैदा कर देता है तब वह कविता अधूरी ही रह जाती है। फिर उसे शायद ही पूरा कर पाता हूँ या कर पाऊंगा।
      लाखों-करोड़ों लोग कितनी श्रद्धा और निर्मल हृदय से भगवान की पूजा, जप-तप-व्रत-पाठ-नमाज-रोजा जाने क्या-क्या करते हैं लेकिन होता क्या है? 

21वीं सदी का समय(कविता)

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सात महीने पहले की एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ। कुछ लोग सोच सकते हैं कि मैं पुराना माल ठेल रहा हूँ। लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि मेरे पास इन दिनों विचारों की कमी नहीं है। बस थोड़ी शान्ति और समय मिले तो प्रस्तुत करूंगा। तो लीजिए पढ़िए 2011 में 21वीं सदी की कविता।
बिल्ली ने कहा ।
दूध नहीं पिउंगी,
दूध में मिलावट है,
पानी मिलाया गया है उसमें
और वो भी, वो पानी
जिसमें पहले से मिलावट है ।

कल रात
काफी देर तक
गुनगुनाता रहा एक मच्छर
मैंने पूछा काटते क्यों नहीं ?
मच्छर ने जवाब दिया
अब नहीं काटूंगा कभी
खून में मिलावट है,
आदमी का खून
आदमी का नहीं लगता ।
चूहा भी बैठा रहता है
शांत
सिर्फ़ पतले प्लास्टिक से काम चलाता ।
किताबों को नहीं काटता, कुतरता
दाँतों से ।
उसकी शिकायत है
किताबों में लेखक नहीं,
सिर्फ़ कागज और स्याही दिखते हैं ।

ऊर्जा की बचत( भोजपुरी कविता का हिन्दी अनुवाद)

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कुछ दिन पहले एक कविता लिखी थी। अपनी मातृभाषा में यानि भोजपुरी में। उसका अनुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। अपने व्यस्तता और कुछ परेशानियों की वजह से बहुत सारे विचारों को लिख नहीं पा रहा हूँ। आप मूल कविता यहाँ पढ़ सकते हैं।
गरीब का पेट
एक मशीन है
जो एक दिन के खाना से भी
चला लेता है दो-चार दिन तक काम।


जब सारे वैज्ञानिक
व्यस्त हैं
अपने अपने प्रयोग में
कि कैसे ऊर्जा की खपत कम होगी
तब एक गरीब
सहस्राब्दी का नोबेल पुरस्कार जीत लेता है
क्योंकि अपने जीवन में वह
एक तिहाई या आधा
ऊर्जा बचाये रहता है
बिना किसी खर्च के।

और ये कोई नई बात नहीं है
ये तो हजारों साल
से होता आ रहा है

तब भी
वैज्ञानिक लोग
व्यस्त हैं
ऊर्जा की बचत के
चक्कर में।

कर सफ़र जा रहे (गीत)

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सात साल पहले मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था। स्वतंत्रता दिवस से पहले 31 जुलाई 2004 को एक गीत लिखा जो मशहूर गीत कर चले हम फ़िदा की तर्ज पर था। शुरु-शुरु में तो लिखनेवाले प्रसिद्ध तर्जों पर ही गीत लिखा करते हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। उसी तरह मैंने भी यह गीत लिख दिया। 15 अगस्त 2004 को इसे गाना था। अब तो गीत नहीं गाता, बस सुनने का शौक है। पूर्वाभ्यास(रिहर्सल) के समय इसे गाने के दौरान कर चले हम फ़िदा की पँक्तियाँ जुबान पर अपने आप आ जाती थीं। गीत कुछ है ही इस तरह का कि अगर आप गाएँ तो कर चले हम फ़िदा बीच में आ ही जाता है। मैं अपनी लिखी कविताओं और गीतों में बहुत कम को ही पसन्द करता हूँ लेकिन आज भी यह गीत मुझे पसन्द है और शायद हमेशा रहेगा। पढ़िए वह गीत और बताइए कैसा लगा? यह गीत भी, मानकर चलिए उसी दृश्य पर है जिसपर कर चले हम फ़िदा फिल्माया गया है। ध्यान रहे यह आज से सात साल पहले लिखा था। इसलिए इसमें कोई सुधार नहीं करनेवाला। लीजिए पढ़िए वह गीत।

कर सफ़र जा रहे दूर हम साथियों।
माँ न रोवे तू करना करम साथियों।
कर सफ़र  ……2
गोली लगती रही ख़ून गिरते रहे
फ़िर भी दुश्मन को हमने न रहने दिया
गिर पड़े आँख मूँदे धरती में हम
पर गुलामी की पीड़ा न सहने दिया
अपने मरने का हमको न गम साथियों
माँ न रोवे…
कर सफ़र  …
जान देने की बारी अयेगी जब
पीछे हटना नहीं ज़िंदग़ी में कभी
जाँ भी देना वतन पे न तू भूलना
मरते-मरते ये हम कह रहे हैं अभी
मरते दम तक सहा गोली बम साथियों
माँ न रोवे…
कर सफ़र …
देश मुनियों का यह न अंधेरे में हो
तुम जलाते ही रहना नये दीप को
ख़ुश रखना सबों को किसी भी तरह
मोती ही लेना तुम फेंक के सीप को
तुम कभी रहने देना न तम साथियों
माँ न रोवे…
कर सफ़र  …
भूलना न कभी बात ये तुम सभी
हम जनम लेते हैं सिर्फ़ भारत में ही
प्यार करना सबों से न नफ़रत कभी
क्योंकि इससे पड़ोगे मुसीबत में ही
यहीं लेंगे जनम हरदम साथियों
माँ न रोवे…
कर सफ़र  … 2
माँ न रोवे …2

भगवान बहुत दयालु है(लघुकथा)

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मूर्तिकार बहुत सुन्दर मूर्तियाँ बनाता था। एक महीने पहले सुबह-सुबह उसके पास दो बच्चे पहुँचे। एक ने गणेश की, दूसरे ने क्राइस्ट की मूर्ति मांगी। मूर्तिकार ने दोनों को दो सुन्दर मूर्तियाँ बेच दी। रास्ते में मूर्ति को लेकर झगड़ा शुरु हो गया। इसी बीच मूर्तियाँ टूट गईं। हाथापाई शुरु हो चुकी थी। झगड़ा बच्चों के माँ-बाप तक पहुँचा। जमकर मार-पीट हुई। मुकद्दमा शुरु हो गया है। वकीलों की चांदी है। हाँ, मूर्तियाँ फिर खरीद ली गई हैं। मूर्तिकार भी फायदे में है। और मूर्तियों में समाए भगवान चुपचाप देख रहे हैं क्योंकि उन्हें ही तो वकील और मूर्तिकार का धंधा चलाना है!

      झगड़ा अब हिन्दू-ईसाई का हो गया है। हथियार भी बिकने शुरु हो गए हैं। उनकी भी चांदी है। सचमुच भगवान बहुत दयालु है। सबों का खयाल रखता है।

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