ग्यान और भाखा – राहुल सांकिर्ताएन

3 टिप्पणियाँ

भाषा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस चिट्ठे का नाम भी हिन्दीभोजपुरी है। तो जाहिर है कि भाषा सम्बन्धी लेख यहाँ अक्सर पढने को मिलेंगे ही। राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ या ‘भागो नहीं बदलो’ से एक अध्याय यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। इस किताब पर एक विस्तृत लेख इसी महीने पढने को मिलेगा। फिलहाल यह अध्यायजो किताब का सत्रहवाँ अध्याय हैयहाँ प्रस्तुत है। इस किताब की भाषा बड़ी लचकदार है। शुद्धतावाद के पक्षधरों के लिए यह भाषा एक चुनौती है। राहुल जी ने इस किताब की भूमिका में ही लिखा है कि यह किताब छपराबलिया इलाके की भाषा के असर के साथ हिन्दी में लिखी जा रही है। इस किताब में ‘’ के लिए ‘’, ‘’ के लिए ‘’, ‘ज्ञ’ के लिए ‘ग्य’ जैसे कई प्रयोग थे। हमारे इलाके में ऐसी ही भाषा बोली जाती है। किताब में कुछ पात्र हैं और पूरी किताब संवादात्मक शैली में लिखी गयी है। ‘भैया’ कोई गप्पी नहीं बल्कि एक प्रबुद्ध चिन्तक और विद्वान है। ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ सामान्य किसान हैं और ‘सोहनलाल’ एक पढ़ा-लिखा और शहर में रहनेवाला युवक है। किताब की भूमिका से लगता है कि ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ नाम के दो व्यक्ति थेऔर एक साधारण पढा-लिखा व्यक्ति जो मात्र  6-7 तक पढ़ पाया होवह भी समझ सकेराहुल जी के लिए इस किताब की भाषा को इस लायक मानने के आधार भी थे।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि यह किताब 1945-46 के आस-पास की हैतो जाहिर हैकिताब पर उस समय का असर कई जगह दिखता है। बँगला और उर्दू को लेकर बंग्लादेश में चले लफड़े का पूर्वानुमान भी राहुल जी ने लगाया थाइसका अन्दाजा इस अध्याय के आखिरी वाक्य से लगता हैजो इंदिरा गाँधी के समय सच भी साबित हो गया।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है इस अध्याय को पूरी तरह टंकित भी मैंने नहीं किया है। इसे ओसीआर साफ्टवेयर की सहायता से यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
राहुल जी ने इस किताब में अपना नाम ‘राहुल सांकिर्ताएन’ लिखा है। इसे अलग-अलग टुकड़ो में देना उचित नहीं लगाइसलिए पूरे अध्याय को एक ही बार में यहाँ रखा जा रहा है। थोड़ा अधिक समय लगेगा पढने में। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

 अध्याय 17
ग्यान और भाखा
सोहनलालदुक्खू मामाअभी तक हमने भैया से बहुत सँभलसँभल के सवाल पूछा हैअब एकाध अपने मन का भी सवाल पूछ लेने दो।
दुखराम: पूछो भैनेहम भी सुनेंगेलेकिन दो चार आना हम भी समझें ऐसा पूछना।
सोहनलाल: नहीं समझ पाओगे दुक्खूमामातो दो ही चार आना भरनही तो सभी समझोगे। अच्छा तो भैयाजोकें जो कहती हैंकि जितना ग्यानविग्यान दुनिया में हैवह सब हमने ही पैदा किया हैहम  रहेंगे तो दिया बुझ जायगा।
भैया: हम कब कहते हैं जोंको ने कभी अच्छा काम किया ही नहीं लेकिन जो दिया बुझ जाने की बात कहते हैंवह गलत है। हम दिया बुझने नहीं देंगे। हमारे कमेरों के राज में ग्यानविग्यान बहुत चमकेगा। वहाँ ग्यान के विना कुछ हो भी नहीं सकता। जोंको के राज में आज अपढ़अबूझ हलवाहे से भी काम चल सकता है लेकिन हमारे लिए तो मोटरहल चलानेवाले हलवाहे चाहिए। राज सँभालते ही पहला काम हमें यह करना पड़ेगा कि देसभर में कोई बेपढ़ नहीं रहे।
दुखराम: लेकिन भैयाकितने लोगो में तो जेहन ही नहीं होतीवह कैसे पढ़ेंगे ?
भैया: जोंकों की जैसी पढ़ाई होगीतब तो सबको पढ़ नहीं बना सकते। जोंकें बिद्दा पढ़ाने के लिए भाखा पढ़ाती हैंअपनी भाखा पढ़ावे तो कोई उतनी मेहनत नहीं लेकिन वह पढ़ाती हैं अंगरेजीफारसीअरबीसंसकीरत। जो हम देस भर को अंगरेजी पढ़ा देने की परतिग्या करेंगे तो वह सात जनम का काम है दुक्खू भाईहम तो बल्कि भाखा पढ़ायेंगे ही नहीं। क्या कोई आदमी गूँगा है कि भाखा पढ़ायें। लोग कथाकहानी कहते हैंहँसीमजाक करते हैंदेसबिदेस की बात बतलाते हैंसब अपनी ही भाखा में कहते हैं बस हम पहले तो यही कहेंगे कि दोतीन दिन में अच्छर सिखला देंगे। अड़तालिस अच्छर तो कुल हई हैं। दोतीन नहीं तो पाँचछः दिन लग जायेंगेफिर आदमी जो भाखा बोलता हैउसी में छपी किताब हाथ में थमा देंगे।
दुखराम: ऐसा हो भैयातब पढ़ना काहे का मुस्किल हो।
भैया: ढोलामारुसारंगासदाव्रिच्छलोरिकीसोरठीनैकाकुँअरि विजयमलबेहुला के कितने सुन्दरसुन्दर खिस्से और गाने हैं। इन्हीं को छाप के दे दिया जायतब कहो दुक्खू भाई!
दुखराम: तो बूढ़े सुग्गे भी रामराम करने लगेंगे क्या किसी को पढ़ने में परिस्त्रम मालूम होगा।
भैया: बिद्दा अलग चीज है दुक्खू भाईभाखा अलग चीज है। लेकिन जोंकें हमको सिखलाती हैं कि भाखा पढ़ लेना ही ग्यान है। यह ठीक है कि ग्यान सिखाते बखत उसे किसी भाखा में बोला जाता है। लेकिन अँगरेजी में काहे बोला जायअरबीसंसकीरत में काहे बोला जायउसे अपनी बोली में काहे  बोला जाय।
सोहनलाल: लेकिन बोली तो पांच कोस पर बदल जाती है। ऐसा करने से तो हजारों भाखा बन जायेगीऔर कौनकौन में किताब छापते फिरेंगे?
भैया: पाँच को नहीं जो 5 अंगुल पर ही भाखा बदल जायतो भी हमको उसी में किताब छापनी पड़ेगी। तभी हम दस बरिस के भीतर अपने यहाँ किसी को बेपढ़ नहीं रहने देंगे।
सोहनलाल: लेकिन हिन्दी भी तो अपनी भाखा है।
भैया: जिसकी अपनी भाखा होउसे हिन्दी ही में पढ़ाना चाहिएतुम्हारे बनारस में सब लोग घर में हिन्दी ही बोलते हैं?
सोहनलाल: किताब वाली भाखा तो नहीं बोलते भैयाबोलते तो हैं वही बोली जो बनारस जिला के गाँव में बोली जाती है।
भैया: जो   अच्छी तरह सिखा दिया जाय तो अपनी बोली में आदमी कितने दिनो में सुद्धसुद्ध लिखने लगेगा?
सोहनलाल: अपनी बोली को तो भैयाअसुद्ध कोई बोल ही नहीं सकता। अच्छर में चाहे भले ही एकाध गलती हो जायलेकिन व्याकरन की गलती कभी नहीं होगी।
भैया: और हिन्दी कितना दिन पढ़ने पर व्याकरन की गलती नहीं करेगा।
सोहनलाल: कोईकोई आदमी तो भैया जिन्दगी भर पढ़ने पर भी  सुद्ध बोल सकते हैं  लिख सकते हैं।
भैया: लेकि अपनी बोली को तो आदमी चाहे भी तो असुद्ध नहीं बोल सकतायह तो मानते ही हो। अच्छा जिनगी भर हिन्दी  बोलनेवालों की बात छोड़ो। मामूली तौर से सुद्ध हिन्दी लिखनेबोलने में कितना समय लगेगा। हमारे गाँव के एक लड़के को ले लोजिसकी भाखा हिन्दी नहीं बल्कि भोजपुरी या बनारसी है।
सन्तोखी: मैं कहूँ भैयाहमारे यहाँ लड़के आठ बरस पढ़ के हिन्दी मिडिल पास करते हैंलेकिन तो भी  सुद्ध हिन्दी बोल सकते हैं लिख सकते  हैं।
भैया: सोहन भाईतुम इन्ट्रेन्स पास वालों की बात कहो।
सोहनलाल: जब पूछते ही होतो मैं बतलाता हूँ कि कितने तो बीपास कर के भी सुद्ध हिन्दी लिखबोल नहीं सकते।
भैया:  मैं आठ साल पढ़े मिडिल वाले को लेता हूँ  बीकी चौदह साल की पढ़ाई। मैं इतना समझता हूँ कि आदमी की जेहन बहुत खराब  हो और भाखा ही भाखा पढ़ता रहे तो पाँच बरस तो जरूर ही लगेंगे। लेकिन हिसाब और दूसरी चीज साथ ही साथ पढ़नी होतब काम नहीं बनेगा। हमारे मदरसों में जो हिसाबजुगराफिया सब कुछ अपनी ही भाखा में पढ़ना होतो पाँच बरस क्या भाखा सीखने में एक दिन भी नहीं देना होगा। ग्यान है हिसाबजुगराफियाइतिहासखेती की बिद्दाइंजन की बिद्दासड़कपुल मकान बनाने की बिद्दा और पचीसो तरह की बिद्दा। ग्यान पढ़ाने के लिए जब हम यह सरत रख देते हैं कि जब तक तुम पराई भाखा  पढ़ोगेतब तक ग्यान में हाथ नहीं लगा सकतेतब वह बहुत मुस्किल हो जाता है।
सन्तोखी: हम लोगों की भाखा को तो भैयालोग गँवारू कहते हैं।
भैया: आइलगइल”, “आयन गयन”, “आयोगयो”, “एलगेल” बोलने से तो गँवारु भाखा हो गईऔर आयेगये” कहने से वह अच्छी भाखा होगी। और कम् वेन्ट” कहने से वह बहुत अच्छी भाखा हो गई। काहेसे वह साहेब लोगों की भाखा है। साहेब लोगों का डंडा  सिर पर हैउनका राज हैइसलिए अँगरेजी बोली बहुत अच्छी भाखा हैवह देवताओं की भाखा से भी बढ़कर हैलेकिन जब साहब लोगों का राज  रहेऔर गँवार यही किसानमजूर अपना पंचायतीराज काय कर लेंतो क्या तब भी उनकी भाखा गँवारू रहेगीयह तो जिसकी लाठी उसकी भेंस” वाली बात हुई। गँवारू कह देने से काम नहीं चलेगा। जिस बखत इसी गँवारु भाखा में इसकूलकालेज सब जगह चौदह बरस तक पढ़ी जानेवाली बिद्दा पढ़ाई जायगी उसी में हजारों किताबें छपेंगी। उपन्यासकविताकहानी सब कुछ गँवारू भाखा में मिलने लगेगा। रोजानाहफ्तावारमाहवारीअखबार निकलने लगेंगेतब इस भाखा को कोई गँवारू नहीं कहेगा।
दुखराम: क्या ऐसा होगा भैया?
भैया: जो तुम लोग हमेसा गँवार बने रहना चाहोगेतो नहीं होगाजो तुम हमेसा गुलाम बने रहोगेतो भी नहीं होगाजो हिन्दुस्तान के आधे आदमियों को बेपढ़ बनाये रखना हैतो नहीं होगानहीं तो इसमें  अनहोनी कौनसी बात हैबल्कि अपनी बोली पकड़ने से तो छः बरस का रस्ता एक दिन में पूरा हो जाता है।
सोहनलाल: लेकिन अपनीअपनी बोली पढ़ाई जाने लगीतो दरभंगाबनारसमेरठ और उज्जैन के आदमी एक जगह होने पर कौनसी भासा बोलेंगे?
भैया: आज भी गौहाटीढाकाकटकपूनासूरतपेसावर के आदमी एकट्ठा होने पर क्या बोलते हैं।
सोहनलाल: हिन्दी बोलते हैंटूटीफूटी हिन्दी से काम चला लेते हैं।
भैया: लेकिन इकट्ठा होने का ख्याल करके उनसे यह नहीं  कहा जाता कि तुम असामीबँगलाउड़ियामराठीगुजरातीपस्तो छोड़ के हिन्दीसिरिफ हिन्दी पढ़ोनहीं तो कभी जो इकट्ठे होओगे तो बात करने में मुस्किल पड़ेगा। जैसे उन लोगों को अपनी भाखा में सब कुछ पढ़ाया जाता हैउसी तरह दरभंगा वालों को मैथिलीभागलपुर वालों को भगलपुरिया ( अंगिका )गया वालों को मगही,  छपरा वालों को छपरही ( मल्ली )लखनऊ वालों को अवधीबरैली वालों को बरैलवी ( पंचाली ),  गढ़वाल वालों को गढ़वालीमेरठ वालों को मेरठी ( खड़ी बोली या कौरवी )रोहतक वालों को हरियानवी ( यौधेयी  )जोधपुर वालों को मारवाड़ीमथुरा वालों को ब्रजभाखा,  झाँसी वालों को बुन्देलखंडीउज्जैन वालों को मालवीउदयपुर वालों को मेवाड़ीझालावाड़ वालों को बागड़ीखँड़ुआ वालों को नीमाड़ीछतीसगढ़ वालों को छतीसगढ़ी सबको अपनीअपनी भाखा में पढ़ाया जाय।
सोहनलाल: पढ़ाने में तो सुभीता होगा भैयाहर आदमी का पाँचपाँच साल बच जायेगा और डर के मारे जो बीच ही में पढ़ाई छोड़ बैठते हैंवह भी बात नहीं होगी लेकिन हिन्दी भाखावालों का एका टूट जायगा।
भैया: एका टूटने की बात तो इस बखत नहीं कह सकते हो सोहन भाईइस बखत तो एका सिर्फ दिमाग में है। मध्य प्रान्त अलग हैयुक्त प्रांत और बिहार भी अलग हैहरियाना भी पंजाब में है ओर रियासतों ने छप्पन टुकड़े कर डाले हैंइसे आप देखते ही हैं।
सोहनलाल: लेकिन हम तो चाहते हैं कि सबको मिलाकर हिन्द का एक बड़ा सूबा बना दिया जाय।
भैया: सूबा नहींपंचायती राजप्रजातंत्र। सूबा क्या हम हमेसा विदेसी जोंकों के गुलाम बने रहेंगेऔर अपना राज होने पर किसी सुरुजबंसी को दिल्ली के तख्त पर बैठायेंगेहमारा पंचायती राज रहेगाजो एक नहीं बहुत से पंचायतीराजों का संघ होगा। जो लोग चाहेंगे तो दरभंगा से बीकानेरऔर गंगोत्तरी से खँडवा तक का एक बड़ा प्रजातंत्रसंघ काय कर लेंगे जिसके भीतर पचीसों प्रजातंत्र रहेंगे।
सोहनलाल: तो भैयामल्ल प्रजातंत्र की बोली मल्लिका रहेगी और मालव प्रजातंत्र की मालवीयौधेय (अंबाला कभिश्नरीप्रजातंत्र की हरियानवीफिर जब वह हिन्द प्रजातंत्र संघ की बड़ी पंचायत (पार्लामेण्ट)  में बैठेंगेतो किस भाखा में बोलेंगे?
भैया: हिन्दी में बोलेंगे और किसमें बोलेंगे ? इन्हीं की बात क्यों पूछ रहे होमदरासकालीकटबेजवाड़ा,  पूनासूरतकटककलकत्ता और गोहाटी के मेम्बर भी जब सारे हिन्दुस्तान के प्रजातंत्र संघ की बड़ी पंचायत में इकट्ठा होंगेतो क्या वह अंगरेजी में लेच्चर देंगे। अंगरेज जोंको के जुवा के उतार फेंकने के साथ ही अंगरेजी भाखा का जोर हिन्दुस्तान में खतम हो जायगा तब हिन्दुस्तान में एक दूसरे के साथ बोलनेचालने और सारे देस की सरकार के कामकाज के लिये एक भाखा की जरूरत होगीतो वह भाखा हिन्दी ही होगी!
सोहनलाल: तो भैयाहिन्दी भाखा को तो तुम उजाड़ना नहीं चाहते हो ?
भैया: हम उजाड़ेंगे कि उसे और मजबूती से बसावेंगे। सारे हिन्द प्रजातंत्र संघ की वह संघ भाखा होगी। मदरसों में जैसे अंगरेजी के साथ दूसरी भाखा पढ़ाई जाती हैवैसे ही बारह बरस की उमर से 3-4 साल तक लड़कों को हर रोज एक घंटा हिन्दी पढ़नेका कायदा बना देंगे। उस बखत हिन्दी का जोर और बढ़ेगा कि घटेगा?
सोहनलाल: आज तो हिन्दी ही हिन्दी सब कुछ हैफिर तो ब्रिजमालवीमैथिली  अपने घर की मालकिन बन जाऐंगीफिरर बेचारी हिन्दी को जब कोई बुलायेगा तभी  चौखट के भीतर आयेगी।
भैया: आजकल यह कहना तो गलत है कि हिन्दी सब कुछ हैकाहेसे कि सब कुछ तो अंगरेजी है। दूसरे हिन्दी के चौखट के भीतर बैठाने की बात भी ठीक नहीं है। मेरठ कमिश्नरी के साढ़ेतीन जिले, ( मेरठमुजफ्फरनगरसहारनपुर,  देहरादून .5, बुलंद सहर 1/4 की भी तो जनम भाखा वही है। उसके बाद सारे हिन्दुस्तान में घरघर मे उसकी आव भगत रहेगी।
सोहनलाल: तो लोग अपनीअपनी भाखा का प्रजातंत्र बना लेंगेफिर तो हिन्दुस्तान सौ टुकड़ों में बँट जायेगा।
भैया: सोवियत की आबादी हम लोगों से आधी है20 करोड़ ही हैलेकिन वहाँ तो 182 भाखा बोली जाती है और सबका अपना छोटाबड़ा पंचायतीराज है। तुम चाहते हो कि पाँचों उगुँलियों को खुला नहीं रखा जाय बल्कि मिलाके सी दिया जायलेकिन इससे हाथ मजबूत नहीं होगा सोहन भाईसोवियत 182 प्रजातंत्र वाला होने पर भी एक बड़ा प्रजातंत्र है। हिन्दुस्तान भी 100 प्रजातंत्रों वालाएक बड़ा प्रजातंत्र हो तो कौनसी बुरी बात है?
सोहनलाल: अच्छा तो यही होता कि सारे हिन्दुस्तान का एक ही प्रजातंत्र होता?
भैया: अच्छा तो होता जो हिन्दुस्तान के लेग एक ही बोली बोलते होतेलेकिन वह तो अब हमारे हाथ में नहीं है। क्या सारे हिन्दुस्तान का तुम एक सूबा बनाना चाहते हो?
सोहनलाल: नहीं सूबा तो हम अलगअलग चाहते हैं। बंगालउड़ीसासिन्ध सबको मिटाकर एक सूबा तो बनाया नहीं जा सकता।
भैया: अंगरेजी राज में जो आज सूबा है और 12 लाख सालाना खरच पर वहाँ लाट साहब लाके बैठाये जाते हैंवही तब प्रजातंत्र कहा जायगाजिसका राजकाज पंचायत के हाथ में होगाअनेक सूबा को तो तुम मानते ही होउसका मतलब ही है कि अनेक प्रजातंत्र हिन्दुस्तान में रहेंगे और हिन्दुस्तान प्रजातंत्रों का संघ रहेगा। अब झगड़ा यही है  कि 14 प्रजातंत्र रहे या सौ ? मैं कहता हूँ कि उतने ही प्रजातंत्र हों जितनी भाखा लोग बोलते हों और अपनेअपने प्रजातंत्र में पढ़ाईलिखाईकचहरीपंचायत का सब कारबार अपनी भाखा में हो लेकिन सौ प्रजातंत्र होने का मतलब यह तो नहीं है कि अब वह एकदूसरे से कोई वास्ता नही रखेंगेऔर कछुए की तरह मूँड़ी समेटकर अपनी खोपड़ी में घुस जाएँगे। हमारे महा– प्रजातंत्र के ये सभी प्रजातंत्र हाथपैरनाककान की तरह अंग होंगे। सबमें एक  खून बहेगा। सब एकदूसरे की मदद करेंगे। उस बखत रेल की लाइनें आज से भी ज्यादा बढ़ जायेंगीपक्की सड़कें गाँवगाँव में पहुँच जायँगी। हर प्रजातंत्र में हवाई जहाज के अड्डे होंगे। लोगों की जेब में पैसा रहेगासाल में महीने डेढ़ महीने की सबको छुट्टी मिलेगी। तो बताओ लोग कूएँ के मेढक बनकर बैठे रहेंगे या अपने महादेस में घूमनेफिरने जायेंगे?
दुखराम: घूमनेफिरने जायँगे भैयादेस परदेस देखने का किसका मन नहीं कहतानातेदारोंरिस्तेदारों से मिलने की किसकी तबियत हीं होती।
भैया: जनमभाखा को कबूल करने से हिन्दी को नुकसान होगा यह ख्याल गलत है सोहन भाईउस बखत बनारस वाले कानपुर वालों से बहुत नगीच रहेंगे, टेलीफून भी नगीच कर देगाहवाई जहाज भी और जेब का पैसा भी। हिन्दी सीखना लोग बहुत पसन्द करेंगे, क्योंकि सारे देस की साझे की भाखा वही है,  फिर हिन्दी में पोथियाँ सबसे अधिक निकलेगी। आजकल देखते हैं  हिन्दी के सिनेमाफिल्म जितने निकलते हैंउतने बँगलामराठीतमिलतेलगू सारी भाखाओं के मिल के भी नहीं निकलते। हिन्दी भाखा की किताबों की भी वही हालत होगीउसके पढ़नेवाले देश भर में मिलेंगे। मुझे उमेद हैकि जैसे चौपटाध्याय फिल्म हिन्दी में निकल रहे हैंवह किताबें वैसी नहीं होंगी।
सोहनलाल: चौपटाध्याय फिल्म क्या कह रहे हो भैयाजो चौपटाध्याय होते तो इतने लोग देखने क्यों जाते और फिल्म वालों को लाखों रुपये का नफा कैसे मिलता?
भैया: देखनेवाले तो इसलिए जाते है कि दूसरा अच्छा फिल्म है कहाँदूसरे नाचगाना और सुन्दर मुँह के देखने की आदत लोगों की पहिले ही से हैबस वह समझते हैं कि चलो दो आना में तवायफ का नाच ही देख आएँलेकिन सिरिफ सुन्दर मुँह और सुरीले कंठ तक में ही फिल्म को खतम कर देना अच्छी बात नहीं है सोहन भाई। उसमें बातचीतहावभाव और तसवीरों से दुनिया का असली रूप दिखलाना होता हैसाथ ही साथ लोगों को रस्ता भी दिखलाना होता है। लेकिन रस्ता दिखलाने की बात छोड़ दोकाहेसे कि जोंकों के राज में वह अनहोनी बात है। लेकिन हिन्दी फिल्मों में सब चीजों में बेपरवाही देखी जाती है। फिल्म बनानेवाले तो जानते हैं कि उनके पास रुपया चला ही आयेगाफिर क्यों परवाह करें?
सोहनलाल: हिन्दी फिल्मों मे आपको क्या दोस मालूम होता है भैया?
भैया: पहिले गुन बताता हूँ तब दोस बताऊँगा। गुन तो यह है कि हमारे फिल्म के खिलाड़ी (अभिनेता ) और खिलाड़िनें (अभिनेत्रियाँअपना करतब दिखलाने में दुनिया के किसी भी खेलाड़ीखेलाड़िनी से कम नहीं हैं। और अच्छे फिल्म के लिए यह बहुत अच्छी चीज है। वह अपनी बातचीतहावभाव गीतनाच  सब में अच्छे हैंमैं सभी खेलाड़ीखेलाड़िनों के बारे में नहीं कहता लेकिन अच्छे खेलाड़ीखेलाड़िनों में यह सब गुन हैं। और इन्हीं गुनों का परताप है कि मदरासकालीकट और बेजवाड़ा में भी लोग अपनी भाखा के फिल्मों को छोड़कर हिन्दी फिल्मों को देखने आते हैंचाहे बेचारे फिल्म की भाखा को नहीं समझ पायें। मैं समझता हूँ कि ये हमारे खेलाड़ीखेलाड़िनों के गुन का ही परताप है। पैसा बनानेवाले फिल्म मलिकों की चले तो सायद उसमें भी कुछ खराबी कर दें।
सोहनलाल: और दोस क्या है भैया!
भैया: भाखा तीन कौड़ी की होती है उसमें लचक कहावत और  गहराई होती है। यह क्यों होता हैबहुत से फिल्म मालिक भाखा जानते ही नहींलेकिन तो भी अपने को महाविद्वान समझते हैं। एक तो उनके भाखा लिखनेवाले भी बहुत से उन्हीं की तरह हैं और जो कोई अच्छा भी लिखता होतो अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा कहने का अख्तियार फिल्म तैयार करनेवाले अपने हाथ में रखते हैं। समझ लो पूरी दमदसोधन हो जाती है।
सोहनलाल: दमदसोधन क्या है भैया?
भैया: किसी पंडित ने एक मुरुख से अपनी लड़की ब्याह दी। दामाद एक दिन ससुरार आया। छापाखाने से पहिले की बात हैउस वक्त किताबों को उतारनेवाले मामूली पढ़ेलिखे लेखक हुआ करते थे वह मजूरी लेक किताब उतार दिया करते थे। पंडित लोग किताब लेके फिर पढ़ते और जो असुद्ध होता उसपर पीला हड़ताल फेरते और जिसको ज्यादा ध्यान में रखना होता उसे गेरू से लाल कर देते। पंडित के दामाद ने पोथी, हड़ताल और गेरू को देखा। उन्होंने पोथी को हाथ में ले लिया। पंडिताइन को अपने दामाद पर बहुत गरव थाउन्होंने समझा कि दामाद भी बड़ा पंडित है और उससे कहा—“पंडित गेरू और हड़ताल से किताब को शोध रहे हैं तुम भी तो सोधते होगे बाबू!” दामाद कब पीछे रहनेवाले थे। उन्होंने कहा—“हाँ अइयामैं अच्छी तरह जानता हूँ।“ फिर जहाँ मन आया हड़ताल लगायाजहां मन या गेरू पोथी की दमदसोधन हो गई।
सोहनलाल: तो इसमें फिल्म पैदा करनेवालों का ज्यादा दोस है या भाखा लिखनेवालों का।
भैया: फिल्म पैदा करनेवालों का बहुत बड़ा दोस हैउनमें ख़ुद लियाकत नहीं है और  लायक आदमियों को चुन सकते हैं। भाखा लिखनेवालों में जो थोड़े से अच्छे भी हैंउनमें भी एक बड़ा दोस है। वह हिन्दी या उर्दू की किताबी भाखा लिखते हैं। किताब से पढ़के सीखनेवाले की भाखा में जीवट नहीं होता और सहरों मे जो थोड़ेबहुत बाबू लोग अपने घरों में हिन्दी भाखा बोलते हैंवह भी किताबी भाखा जैसी ही होती है।
सोहनलाल: तो जीवट वाली भाखा कौन बोलते हैं भैया?
भैया: मेरठमुजफ्फरनगरसहारनपुर के जिलों के गँवार।
सोहनलाल: तब तो  फिल्म की भाखा सीखने लिए इन गँवारों के पास जाना पड़ेगा?
भैया: उनके चरन में जाकर बैठना पड़ेगा। हिन्दी भाखा को किताब वालों ने नहीं पैदा कियाबल्कि इन्हीं गँवारों ने पैदा किया। हिन्दी पढ़नेवालों ने सैकड़ों बरस पहले उन गँवारों से भाखा तो ले लीलेकि भाखा में जीवट आने के मुहाविरेकहावतेंसबदों का तोड़नामरोड़ना और उन्हें मनमाने तौर से रखना इत्तादि बातें नहीं सीखींइसलिए हिन्दी भाखा में वह चमतकार नहीं  सका। किताब पढ़ने में तो किसी तरह आदमी बरदास भी कर लेगा लेकिन नाटक की बातचीत में इससे काम नहीं चल सकता।
सोहनलाल: तो भैयातुमने कोई फिल्म ऐसा नहीं पायाजिसमे कुछ जीवट वाली भाखा दिखाई दे।
भैया: मैंने सिर्फ एक फिल्म ऐसा देखा है जिसकी भाखा मुझे पसंद आईवह था –“जमीन।” मैं समझता हूँ जब तक फिल्म पैदा करनेवाले अपने को सब कुछ जाननेवाला मानना नहीं छोड़ेंगे और जब तक भाखा लिखनेवाले मेरठ के उन गँवारों के चरनों में नहीं बैठेंगेतब तक यह दोस नहीं जायेगा।
सोहनलाल: और दूसरे दोस क्या हैं भैया?
भैया: दूसरे दोस फिल्म पैदा करनेवालों को है चाहे उन्हें उनका अंधापन कह लो चाहेचाहे कम दाम ज्यादा नफा” का ख्याल समझ लोचाहे फिल्म मालिकों का अपने घर के पास ही फिल्म बनाने का हठ समझ लो। हिन्दी के फिल्म बम्बई या कलकत्ता में ही तैयार किये जाते हैं। वहीं के आसपास के गाँवोपहाड़ोंनदियों का फोटो खींचा जाता है। वहाँ  हिन्दी बोलने वाले  गाँव हैं  हिन्दी वालों के रीतिरवाज कपड़ेलत्ते। इसका फल यह होता है कि सब चीजें बनावटी दीख पड़ती हैं। बहुतसी चीजों को तो वह आने नहीं देते। जमीन” की तसवीरों में भी यह दोस मौजूद है। यह दोस बँगलामरहठी या तमिल फिल्मों में नहीं पाया जाताकाहेसे कि उनमें उन्हीं गाँवोंनदियोंपहाड़ों और लोगों की तसवीरें ली जाती हैंजो उस भाखा को बोलते हैं। हिन्दीफिल्मों का यह दोस तब तक दूर नहीं होगाजब तक देहरादून,  कालसी जैसी जगहों में फिल्म वाले अपने डंडाकुंडा उठाके नहीं  जाते।
सोहनलाल: और कौन दोस है भैया?
भैया: हिन्दी फिल्मों की सारी तसवीरें दोएक मील के छोटे से घेरे में घूमती रहती हैंवह विसाल नहीं होतीं। नदियोंपहाड़ोंखेतोंगाँवों का जो विसाल रूप हमें मिलना चाहिए उसे हम नहीं पाते। क्या जाने यह पैसा बचाने के ख्याल से होता होगा।
सोहनलाल: और कोई दोस है भैया?
भैया: हस्तिनापुर के पास गंगा का विसाल कछार हैवहाँ सैकैड़ों गाएँभैंसे चरती हैंचरवाहे मस्त होकर गाना गाते हैंगंगा में मलाह नाव खेता है और अपनी तान में सारी मेहनत भूल जाता है। धोबीकुम्हार सबके अपनेअपने गीतअपनेअपने बाजेचित्र विचित्र नाच हैं। सहरों में भी औरतों के ब्याह और दूसरे वक्त के अपनी खासखास नाच और नाटक हैं। इस तरह की सैकड़ों चीजें हैंजिनका बम्बई और कलकत्ता के फिल्मों में कहीं पता नहीं है।
सोहनलाल: और कोई दोस है भैया?
भैया: मैं अब एक ही दोस और कहूँगा। हिन्दी भाखा हिमालय की गोद में बोली जाती है। दुनिया के फिल्म वाले हिमालय के सुन्दर पहाड़ोंनदियोंझरनोंदेवदार वनों और बरफीली चोटियों को पा के निहाल हो जातेलेकिन हिन्दी फिल्म वालों के लिए वह कोई चीज नहीं। जापान के राज्य की राजधानी तोकियो हैलेकिन फिल्मों की राजधानी क्योतो हैकाहेसे कि क्योतो को थोड़ासा हिमालय का रूप मिला है। लेकिन हमारे आज के फिल्मवालों को इसका कभी ख्याल आयेगाइसमें सक है।
सोहनलाल: तो भैयाजो फिल्म बनानेवाले मेरठ कमिसनरी के हिमालय वाले टुकड़े में  जायँतो उनके बहुत से दोस हट जायँगे?
भैया: यह मैं मानता हूँलेकिन यह भी समझता हूँकि सेठ अपना घर छोड़ तपोबन में थोड़े जाना चाहेंगेवह पचास तरह का बहाना कर सकते हैं। और सबसे बड़ी बात यह हैकि नफा तो उन्हें खूब हो ही रहा है और थोड़े ही खर्च में। लेकिन हम फिल्म की बात करतेकरते बहुत दूर चले गये सोहन भाईमैं कह रहा था हिन्दी भाखा के बारे में
सोहनलाल: हाँतो तुम समझते हो कि अपनीअपनी भाखा को पढ़ाई की भाखा मान लेने पर हिन्दी को नुकसान नहीं होगालेकिन भैयादुनिया को हमें और एक दूसरे के नगीच लाना है। मरकस बाबा तो सारी मानुख जाति को एक बिरादरी देखना चाहते थेफिर किसी संजोग से जो हिन्दी के नाते हिन्दुस्तान के आधे लोग एक भाखा से बँध गये हैंउनको फिर तोड़फोड़ के अलग करनायह तो पैर पकड़ के पीछे खींचना है।
भैया: पैर पकड़कर पीछे खींचना नहीं है सोहन भाईयह हाथ पकड़ कर आगे बढ़ाना है। जनमभाखा से पढ़ाई करने पर दस बरस के भीतर ही हमारे यहाँ को अपढ़ नहीं रह जायगा। और एकदूसरी जगह जानेआपस में मिलने से हिन्दी भाखा सभी लोग थोड़ाबहुत बोल लेंगे। और समझने में तो किसी को मुसकिल नहीं होगाकाहेसे कि इन सब भाखाओ में बहुत से सबद एक ही से हैं। कविताकहानीउपन्यास का ढंग भी एकसा ही रहेगा। हिन्दी पोथियों की उतनी ही ज्यादा माँग होगीजितनी ही अधिक इन भाखाओं के पढ़नेलिखने वाले बढ़ेंगे। कमी इतनी होगीकि आज जो हमारे कितने ही भाई यह समझते हैंकि अवधीब्रजमालवीबनारसीमैथिली इत्तादि भाखायें कुछ दिनों में मर जायेंगीउनको जरूर निरास होना पड़ेगा। निरास वैसे भी होना पड़ेगाक्योंकि जो जनमभाखाओं को किताब की भाखा  भी बनाया जायतो भी सौपचास सालो में उन भाखाओं के मरते देखने की खुसी हमारे भाइयों को नहीं मिलेगी। अभी उन्हें मरना भी नहीं चाहिएक्योंकि उन्होंने अपने भीतर अपनी जाति की भाखासमाज,  विचारविकास ओगरह के इतिहास की बहुत सी अनमोल सामिगरी रखी है। मैं जानता हूँ जो दुनिया से जोंके उठ जायँगीतो मानुख जाति जरूर एक होगी और फिर सबकी एक साझी भाखा भी होगी। हो सकता है कि एक साझी और एक अपनी जनमभाखा दो भाखाओं का रहना मुसकिल हो जाय। लेकिन वह अभी सैकड़ों बरसों की बात है। उस बखत तक हरेक भाखा के भीतर जितने रतन छिपे हुए हैंसब जमा करके अच्छी तरह रख लिए गये रहेंगे। इसलिए किसी भाखा के नास होने से उतना नुकसान नहीं होगा।
सोहनलाल: लेकिन भैयायह बोलियाँ अभी ऐसी नहीं हैं कि इनमें साइन्सविग्यान पर किताबें लिखीं जायँ। हिन्दी ने बड़ी मुसकिल से यह कर पाया है।
भैया: जो मान लें कि बनारसी बोली में साइन्स की किताब नहीं लिखी जा सकतीतो कितने ही दिनों तक हिन्दी में किताबें पढ़ेंगेजब तक कि हिन्दी बोली नाबालिग से बालिग  हो जायगी। हिन्दी जैसी किसी भाखा की किताब पढ़ना और उसमें लिखनाबोलना दोनों में बहुत फरक है । समझ लेना बहुत सहज है। अपनी बोली के पढ़ाने का मतलब यह नहीं हैकि हिन्दी को लोग छुयेंगे नहीं। दूसरी बात यह है कि बनारसीमालवी किसी भी भाखा में साइन्सइन्जीरिंग की किताबों के लिखने में उतनी ही दिक्कत होगी,  जितनी हिन्दी में। आखिर हिन्दी ने भी साइन्स के सबदों को संसकीरत से लिया हैबँगलागुजराती , मराठी भी संसकीरत से ही सबदों को लेती हैं फिर बनारसीमैथिलीब्रिजमालवी ने क्या कसूर किया है?
सोहनलाल: हिन्दीउर्दू के बारे में तुम्हारी क्या राय है भैया?
भैया: मेरी राय क्या पूछ रहे होमैंने तो पहिले ही कह दिया है कि जिसकी जो जनमभाखा हो उसको उसी भाखा में पढ़ाना चाहिए। बनारस में बहुत से बंगाली भी रहते हैंउन्हें बँगला में पढ़ाना होगा। मराठे भी हैंउनको मराठी में पढ़ाना होगा। हाँकोई दो भाखा बोलनेवाला हो तो वह चाहे जिस पाठसाला में जाय। इसी तरह बनारस में जिस लड़के की जनमभाखा हिन्दी हैउसके लिए हिन्दी की पाठसाला काय करनी होगीजिसकी जनम भाखा उर्दू है उसके लिए उर्दू का मदरसा कायम करना होगा।
सोहनलाल: तो भैयातुम हिन्दीउर्दू को मिलाके एक भाखा नहीं करना चाहते।
भैया: मिलाना हमारे बस की बात नहीं हैदस पाँच आदमी बैठकर भाखा नहीं गढ़ा करते। हिन्दीउर्दू के बनने में सैकड़ों बरस  जाने कितनी पीढ़ियों ने काम किया है। मैं मानता हूँ कि हिन्दी और उर्दू भाखा मूल में एक ही भाखा है। कामेंपरसेइसउसजिसतिसनातागा” दोनों ही में एकसे हैंखाली झगड़ा है उधार लिए सबदों का। हिन्दी ने संसकरित से सबदों को उधार लिया है  और उर्दू ने अरबी और कुछकुछ पारसी से भीलेकिन दोनों ने इतना अधिक उधार लिया हैकि अकबाल की कविता को समझनेवाला सुमित्रानन्दन पन्त की कविता को बिलकुल नहीं समझ सकता और सुमित्रानन्दन पन्त की कविता जाननेवाला अकबाल को बिलकुल नहीं समझ सकता। इसलिए मूल में दोनों एक हैंकहने से काम नहीं चलेगा। अकबाल और पन्त दोनों के समझने के लिए दोनों भाखाओं को अच्छी तरह पढ़ना होगा।
सोहनलाल: तो हिन्दूमुसल्मानों की भाखाओं के मिलने का कोई रस्ता है?
भैया: चोटियों पर तो नहीं मालूम होतालेकिन जड़ में उसका झगड़ा ही नहीं है,
सोहनलाल: जड़ क्या है भैया?
भैया: जड़ यही है किजिसे जनमभाखा कहते हैंअवधी बोलनेवाले गाँव में चले जाइयेवहाँ चाहे बाभन देवता हो चाहेमोमिन जोलाहादोनों एक ही बोली बोलते हैं। बनारसछपरागुड़गाँवाथानाभवन के पास किसी गाँव में चले जाइयेकिसानोंमजूरों की भाखा एक हैचाहे वह हिन्दू हो या मुसल्मान।
दुखराम: वही जोंकों से जिनका बेसी रिसतानाता नहीं है।
भैया: देखा  सोहन भाईजड़ में अपनी एक भाखा तैयार हैहिन्दूमुसल्मान दोनों कमेरे उसी भाखा को बोलते हैं और फिर उनका  संसकीरत के साथ पच्छपात है  अरबी फारसी के साथ। यही दुक्खू भाई ने जो अभी कहा, “बेसी रिसतानाता” इसमें बेसी और रिसता पारसी भाखा से आया है और नाता अरबी भाखा से। रिसतानाता कहने से बिलकुल निपढ़गँवार बुढ़िया भी समझ लेगीलेकिन सम्बन्ध” कहने से उतना नहीं समझ पायेगी। हमने भी अपने इतने दिनों के सत्संग में पाँच सौ अरबीफारसी सबदों को लिया है, और हिन्दी में उनकी जगह अब सिरिफ संसकीरत के सबद ही लिखे जाते हैं। मै समझता हूँ कि कोई अदमी समरकन्द बुखारा से सात पीढ़ी पहिले आया होलेकिन अब उसकी भेखभाखा सब हिन्दुस्तान की हैतो वह हिन्दुस्तानी है। वह अपने पुरखा के सहर समरकन्दबुखारा में जायगातो वहाँ भी उसे लोग हिन्दुस्तानी कहेंगे आजकल समरकन्दबुखाराउजबेकिस्तान सोवियत प्रजातन्त्र के अच्छे सहर हैं। उसी तरह जिन अरबीपारसी सबदों को निपढ़ गँवारों ने अपना लिया है और उसको वह अपने ढंग से तोड़मरोड़ के बोलते हैंवे सबद अब बिदेसी नहींसुदेसी हैं। जिन संसकीरत सबदों को हमारे गँवार” छोड़ चुके हैंउनको फिर से लादना भी ठीक नहीं।
सोहनलाल: लेकिन भैयाइन गँवारों ने तो हजार बारह सौ संसकीरत के सबदों को निकाल कर अरबी के सबद लिए है। हमेसा’, ‘दिक्कत’, ‘मुसकिल’, ‘मवस्सर’, ‘अरज’, ‘गरज’, ‘लेकिन’, ‘बेसी’, ‘अमहक’ ( अहमक ), ‘इफरात’, ‘जमीन’, ‘हवा’, ‘तुफान’, ‘सहर’, ‘नौबत’, ‘जुलुम’, ‘परेसानी’, ‘मेहरबानी’, ‘वगैरह’  सबदों को उन्होंने लेकर संसकीरत के सबदों को छोड़ दिया है। जो संसकीरत के सबद रखे हैंउनके बोलने में भी लाठी से पीट के ठीकठाक कर डालते हैं। और आप इसी भाखा को अपनाने को कहते हैं?
भैया: दोनों बातों को एक में  मिलाओ सोहन भाईजहाँ तक जनमभाखा की बात, है उसके लिए  रामसरूप पंडित की बात मानी जायगी  कुतुबुद्दीन मोलबी कीउसके लिए तो धनिया भौजीगाँव की बेपढ़ अहिरिन को ही परमान माना जायगा। दोनों सबदों को उसके सामने रखा जायगाजो अरबी वाले सबद को वह समझेगी तो उसे ले लिया जायगासंसकीरत वाले को समझेगी तो उसको। बोलने में कठिन सबदों की धनिया भौजी कपालकीरिया करे हीगीऔर उसकी कपाल किरिया को भी मानना पड़ेगा। हिन्दीउर्दू को मिलाने का काम भी यही जनमभाखायें करेंगीक्योंकि जनमभाखाओं में हिन्दूमुसल्मान का झगड़ा नहीं है। जड़ वालों का रस्ता साफ हैचोटी वालों का झगड़ा है। उनमें जो अपनी जनमभाखा उरदू मानता हैवह उरदू में लिखेपढ़ेगा जो हिन्दी मानता है वह हिन्दी में। मेरठ कमिसनरी के साढ़े तीन जिले में भी कौन भाखा माननी चाहिए। इसका फैसला वहाँ कोई जाट की धनिया भाभी के हाथ में होगा।
सोहनलाल: और जो हिन्दुस्तान के संघ की भाखा हिन्दी होगीउसमें हिन्दीउर्दू का झगड़ा कैसे मिटेगा ?
भैया: पहिले तो हिन्दी के अपने साढ़े तीन जनम जिलों की भाखा के मुताबिक उसको मानना पड़ेगा। जिसके कारन बहुत से संसकीरत के सबद छूट जायँगेऔर बहुत से अरबी फारसी के भी। फिर यह प्रजातन्त्रों के ऊपर छोड़ दिया जायगा कि वह कौन भाखा पसन्द करेंगे। जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दो तरह के प्रजातंत्र हमारे देस में बनेंगेतो हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ में हिन्दी संघ भाखा होगी और पाकिस्तान में उरदू। मैं यह भी जानता हूँ कि आज की उरदू को जो बंगाल वाले पाकिस्तान पर लादा जायगातो बहुत मुसकिल होगी।
*     *     *
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स्वेटर (कविता)

6 टिप्पणियाँ

पहले

माँ बुनती थी स्वेटर
अपने बेटे के लिए ।
पत्नी, पति के लिए,
प्रेमिका, प्रेमी के लिए,
बहन, भाई के लिए ।
आज
स्वेटर तैयार हो रहे
कंपनियों द्वारा,
कस्टमर के लिए
उपभोक्ता के लिए ।

(फेसबुक पर कुछ पढ़ने के बाद कल इस कविता का खयाल आ गया। फरवरी 2008 में लिखी इस कविता को मैं अपनी पसन्दीदा कविताओं में मानता रहा हूँ।)

सिर्फ़ एक बार (हिन्दी दिवस पर विशेष)

17 टिप्पणियाँ

सब जानते होंगे कि ब्लागर ने पोस्ट के लिए संदेश शब्द अपनाया है। यह हिन्दी में ब्लागर का इस्तेमाल करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन हमने पोस्ट को ही माना। ठीक यही हाल चिट्ठा शब्द का हुआ। जब पहली बार ब्लॉग के लिए इस शब्द का इस्तेमाल हुआ तब हिन्दी के कई नए शब्द उभरे जैसे- चिट्ठाकारी या चिट्ठेकारी, चिट्ठा-जगत, चिट्ठेकार आदि। लेकिन जैसा कि हम हिन्दी लोगों की आदत है, हमने अंग्रेजी शब्द को ऐसे स्वीकारा जैसे वह अमृत हो। शब्द तो कोई बुरा नहीं होता। लेकिन मैंने सुना है कि अंधे को सूरदास कहना अधिक सम्मानजनक है और उचित भी। आज कितने प्रतिशत ब्लॉगर चिट्ठा शब्द इस्तेमाल करते हैं? शायद बहुत कम। मैं स्वयं भी अधिकांशत: ब्लॉग शब्द का इस्तेमाल करता हूँ, चिट्ठे का कम। इसका कारण मैं स्वयं भी हूँ और अन्य लोग भी। शब्दों का भाषाओं में आना-जाना लगा रहता है लेकिन वह स्वाभाविक होता है। हमने जानबूझकर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया है। उदारवाद हमेशा मूल रूप से खतरनाक साबित होता आया है, क्योंकि वह कहीं-न-कहीं नाव में छेद कर देता है। चाहे वह भाषा के मामले में हो या सुरक्षा के मामले में। उदार होने के साथ-साथ स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखना भी अनिवार्य है।

      यह था आज का बकवासी बयान।
      14 सितम्बर कल है। सब जगह, अखबार में, ब्लॉग पर (और पता नहीं चैनलों पर क्या हाल है) हिन्दी का जोर चल रहा होगा। एक-से-एक विद्वान, अनुभवी और बड़े लोग इस विषय पर यानि हिन्दी दिवस पर या तो लिख चुके हैं या आज-कल में लिख डालेंगे। अब जरा एक मूर्ख और अनुभवहीन का भी लिखा उसी क्रम में आप देख लीजिए।
      1949 में जब 14 सितम्बर को हिन्दी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया गया तब से लेकर आज तक हिन्दी के पक्ष में सारे काम सरकार करती आई है और लोग भी, आप यह जानते ही हैं! तो आइये हम भी हिन्दी के क्षरण-मरण(?) दिवस को मना ही लेते हैं।
      हमारे यहाँ रवींद्र कालिया, सुधीश पचौरी, प्रसून जोशी जैसे लोग भी खुश हैं हिन्दी की हालत से, जिनका खाना-पीना ही हिन्दी से चलता है। विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों ने कितना काम किया है, यह इसी से साफ होता है कि महीने में एक लाख रुपये तक या अधिक ही, उनकी जेब में तनख्वाह के रूप में आते हैं। हिन्दी दिवस हो या प्रेमचन्द जयन्ती, बड़े जोर-शोर से मना लिया जाता है इनके द्वारा। निजी स्कूलों में तो हिन्दी के शिक्षक होते ही हैं अंग्रेजी का प्रसार करने के लिए। अब इसमें बेचारगी है या आवारगी, यह तो वे ही जानें? और ये सारे हिन्दी के नाम पर खाने वाले लोग 364 दिन तक हिन्दी के लिए क्या करते हैं, यह आप भी जानते हैं और हम भी। सब के अन्दर आज-कल हिन्दी-प्रेम उमड़ रहा होगा। तो आइए, हम हिन्दी का अन्तिम संस्कार होने से पहले रो-गा लें।
आप अगर हिन्दी को लेकर चली 1948 और 1949 की पूरी बहस पढ़ें, तो स्वयं जान लेंगे कि हिन्दी को लेकर तथाकथित महान लोगों के कैसे विचार थे? कैसे-कैसे दोमुँहे लोग संविधान-सभा में बैठते थे और बोलते थे, यह सब आप उस बहस से जान सकते हैं। अन्तर्जाल पर अंग्रेजी में मौजूद है वह हिन्दी वाली बहस। 

अब इसी क्रम में जरा दो धुरंधरों की बात यहाँ रख देता हूँ। पहले राममनोहर लोहिया और दूसरे हरिशंकर परसाई।
“अंग्रेजी राज्य के खत्म होने पर भाषा का सवाल उग्र रूप से उठा। अगर मध्यदेशियों में शिवाजी या सुभाष बोस जैसा बड़प्पन होता तो अंग्रेजी हटाने और हिंदी चलाने के लिए समय-सीमा की बात कभी सोची या स्वीकारी नहीं जाती। 1950 में 1965 की सीमा बाँधना महान मूर्खता और महान क्षुद्रता थी। जो कोई उस  समय के शक्तिशाली राजपुरुष थे, अच्छी तरह देख रहे थे कि समय के प्रवाह से अंग्रेजी का मामला सुधरेगा और हिंदी का बिगड़ेगा। कसम और संकलो की लड़ाई थी। कसम खाते थे हिंदी के लिए और संकल्प रहता था अंग्रेजी को चलाते रहने के लिए। ऐसी हालत में कसम खाली रस्मी और ऊपरी रह जाती है। सब काम कसम से उलटा होता रहा हैसमय-सीमा बाँधने की जरूरत हुई, एक इसलिए कि हिंदी को समृद्ध बनाना है, दो, इसलिए कि इसे तट देश की स्वीकृति, प्रचार इत्यादि के जरिए दिलाना है।
– राम मनोहर लोहिया
भाषा, भूमिका, पृ 9-10
और कितने लोग समझते हैं कि सरकारों ने हिन्दी के लिए बड़ा भारी काम किया है, तो यह देखिए-
प्रगति जो पर्याप्त नहीं हुई है, उसका कारण स्वयं सरकार है। सन् 1965 में हिंदी को अंग्रेजी का स्थान लेना है- जब यह विधान में स्पष्ट अंकित है तब भारत के शिक्षा मंत्रालय ने इस ओर कितने और कितने बेमन से कदम बढ़ाए हैं।
– हरिशंकर परसाई
परसाई रचनावली, खण्ड-6, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, वर्ष 1, अंक 7, नवम्बर 1956, पृ 154
इस बार पढ़वानी तो कविता थी लेकिन भाषण अधिक हो गया। कविता पाँच साल पहले लिखी गई थी। विचारों में परिवर्तन आया है, आना चाहिए।
सिर्फ़ एक बार
364 दिन
किसी को याद आती है?
अपने जन्मदिन की ।
साल में एक दिन आता है
जन्मदिन
उत्सव का दिन ।
आज 14 सितम्बर है
शायद !
आज ही आता है वो
हिन्दी डे ।
क्या ये सब डे मनाना जरूरी है?
लोग भी सिर्फ़ बिना मतलब के काम किया करते हैं ।
क्यों है न अंकल !
हमारे सर कहा करते हैं-
एक बूढ़ा था ।
जिस दिन हम आजाद हुए न !
उसी दिन की बात है
आई मिन फिफ्टिन्थ् अगस्त नाइन्टीन फोर्टी सेवन की ।
उसने कहा- दुनिया को खबर कर दो
कि गाँधी को अंग्रेजी नहीं आती ।
तो जितने भी विदेश प्रेमी थे न !
उन्होंने कहा- चुप बे !
तू सच बोलता है ।
तुझे नहीं आती होगी ।
देख, मैं तुझे सिखाता हूँ
और शुरु हो गयी अंग्रेजी ।
एक छोटे-से गाँव के स्कूल के लड़के ने
एक आदमी से कहा ।
उस आदमी ने लड़के से पूछा-
का कहते हो बबुआ? हम त कुछ समझ ही नहीं पाया ।
     
वह आदमी ठीक से
हिंदी भी नहीं जानता था ।
यह दृश्य है हिंदी-दिवस का
भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी के
हिंदी-दिवस का ।
आज सुबह अखबार में कुछ लोगों ने कहा है- हिंदी दिवस मनाने -की कोई जरुरत नहीं लगती ।
उनसे हिंदी पूछ रही है
टूटी झोंपड़ी में खड़ी होकर
निराला, पंत, दिनकर, महादेवी, भारतेंदु, प्रसाद, प्रेमचंद की
किताबों से निकलकर
अंग्रेजी के गगनचुम्बी इमारत के सामने ।
जब प्यार सब दिन करते हो तो
यह वैलेंटाइन-डे क्यों मनाते हो? तुम तो 59 साल पहले आजाद हो चुके हो
फिर ये 15 अगस्त मनाते हो
आखिर किसलिए?
ये क्या? सुनते ही तुम्हें नींद आने लगी ! हाँ आनी चाहिए, मां की लोरी जो है?
एक बार
सिर्फ़ एक बार
मेरी झोंपड़ी में आके तो देखो मेरे बच्चों ।
( आंसू बहने लगे
हिंदी की आंखों से )
कैसे-कैसे पकवान बनाकर रखे हैं
मैंने तेरे लिए
अपनी संतान के लिए ।
मैंने सैकड़ों वर्ष से
दीपक जलाये रखे हैं
केवल तुम्हारे लिए ।
बत्ती लगभग जल चुकी है
अब भय है कहीं बुझ न जाए
पर मेरे बच्चों, भरोसा नहीं टूटा है तुमपर से
माँ हूँ
कुछ भी करोगे
माफ़ कर दूंगी ।
लेकिन तुम सच्चे दिल से
मेरी गोद में तो आ !
सिर्फ़ एक बार
तुझे माफ़ कर दूंगी
तुझे अपार स्नेह दूंगी ।
लेकिन आओ तो एक बार भी
मेरी सुनने ।
-14.09.06 

दूसरा प्रेमचंद (कहानी)

3 टिप्पणियाँ

(यह कहानी मूलतः तब लिखी गई थी जब इसे लिखने वाला पंद्रह साल का था। और अब आंशिक संशोधन के साथ पोस्‍ट की जा रही है।)


अब भी तुम किताबें ही लिखते रहोगे या हमारे लिए कुछ करोगे भी? हम भूख से मर रहे हैं और तुम हो कि बस, जब देखो कुछ-न-कुछ लिखते रहते हो। आखिर कब तक लिखोगे तुम? लिखने से क्या तुम्हारी ग़रीबी दूर हो जायेगी? तुम अपना समय लिखने में लगा रहे हो पर कोई लाभ तो हो नहीं रहा है। मेरी मानो तो तुम लिखना छोड़ दो। ग़रीबी की मार असह्य होने पर लक्ष्मी ने कहा।

      क्या करूँ, दिन भर तो ईंट ढ़ोते-ढ़ोते खून की तरह पसीने बहाता रहता हूँ। रात को थोड़ी देर कुछ लिखने से क्या हमारी ग़रीबी ख़त्म हो जायेगी, जो न लिखूँ। मेरा स्वभाव ही बन गया है यह। जब भी शाम को थका-हारा घर आता हूँ, इस फटी-चिथड़ी पुरानी चटाई पर बैठते ही हाथ ख़ुद ही आगे बढ़ जाते हैं, कुछ-न-कुछ लिखने के लिए। आख़िर नहीं लिखने से क्या हम सेठ बन जाएंगे? जाओ मुझे लिखने दो। खीझे मन से धनपत ने कहा।
      धनपत कहानियाँ लिखता था। उपन्यास, कविताएँ, ग़ज़ल आदि भी लिखा करता था। उसकी लेखनी में प्रेमचंद-सी शक्ति थी। मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत गद्य की अभिव्यक्ति और मानवीय समाज की समस्याओं को उज़ागर करना ही धनपत की लेखनी का मूल उद्देश्य था। उसके कहानियों को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता था मानो मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ हों।
      उसके साहित्यकार बनने की कहानी यों है।
      एक बहुत ग़रीब परिवार में एक विधवा रहती थी। एक पाँच-छ: साल का लड़का था उसे, नाम था- धनपत। किसी तरह उस विधवा ने उसका पालन-पोषण किया। धनाभाव उसके लिए एक बड़ी समस्या थी। धनपत इसी कारण गाँव के ही विद्यालय में किसी तरह सातवाँ तक पढ़ गया पाया था।
      भगवान् ने उस धनपत को अद्भुत सौंदर्य प्रदान किया था। इतना सुंदर था वो कि पूर्णिमा के चंद्रमा का सौंदर्य भी फींका पड़ जाता था। स्वास्थ्य भी ठीक था। उसका शरीर एकदम फूला हुआ था। माँ किसी तरह अपने आधा पेट खाकर भी पुत्र को पूरा भोजन तथा सुख देने के लिए लालायित रहती थी।
      उनलोगों के पास थोड़ी-सी जमीन थी, जिसपर वे खेती करते थे। पर, उस खेती से दो व्यक्तियों का पेट भला से कहाँ भर सकता था? धनपत की माँ को मज़ूरी भी करनी पड़ती थी। मज़ूरी में भी ज़मींदार बहुत कम पैसे देते थे। फ़िर भी दो व्यक्तियों के लिए भोजन वह मुश्किल से जुटा पाती थी।
      उन दिनों बाल-विवाह की प्रथा चल रही थी। उसकी माता ने भी उसकी शादी बारह बरस की उम्र में कर दी। कुछ वर्षों बाद धनपत की माँ बीमार पड़ गई। इलाज़ के लिए पैसे की ज़रूरत थी। पैसे नहीं होने से इलाज़ भी नहीं हुआ। वह स्वर्ग-सिधार गई। बाद में दो बेटे तथा तथा एक बेटी भी धनपत को हुए।(शायद यह  प्रयोग हिन्दी में गलत है, लेकिन उस समय यही लिखा था) अब धनपत पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उसके परिवार में पाँच सदस्य हो गये। अब तो आर्थिक दुर्दशा और बिगड़ गई।
      बाद में वह गाँव छोड़कर शहर की तरफ़ मुड़ा। शहर में धनपत अज़नबी था। रात-दिन घूमता रहता। कड़ी धूप में बेचारा दिन-भर इधर-उधर दौड़ता रहता। पर, किसी को भी दया नहीं आई। कोई ठौर-ठिकाना नहीं पा सका। थका-हारा धनपत बेचारा एक पुस्तकालय के बाहर बैठा था। पुस्तकालयाध्यक्ष थोड़ी देर बाद बाहर आए। उस महाशय को दया आ गई। उन्होंने धनपत की पूरी ख़बर ली। उन्होंने पुस्तकालय की सफ़ाई करवाने के लिए धनपत को काम पर रख लिया। अब धनपत को एक ठिकाना मिल गया।
      जब भी पुस्तकालयाध्यक्ष रात को किताबें पढ़ते तो धनपत को भी किताबें पढ़ने की इच्छा होती। एक दिन उसने उनसे कुछ पुस्तकें मांगी। पुस्तकालयाध्यक्ष बहुत दयालु आदमी थे। उन्होंने धनपत को किताबें पढ़ने की इज़ाज़त दे दी। अब धनपत जब भी खाली समय पाता किताबें पढ़ता। दो-तीन वर्षों में वह बहुत बड़ा विद्वान बन गया। उसमें प्रतिभा छिपी हुई थी।
      पर, भला उसके भाग्य में चैन और सुख कहाँ था? पुस्तकालयाध्यक्ष कि मृत्यु हो गई। धनपत उन्हें अध्यक्ष जी कहता तथा बाद में उनसे जुड़ी यादों को स्मरण करता। वह बाद में कहता था-ज़िंदग़ी में मुझे एक ही ऐसा आदमी मिला जो इंसानियत के दर्दों(शायद यह प्रयोग भी गलत था) से परिचित हो। वे हैं अध्यक्ष जी। अध्यक्ष जी के मरने के बाद उसे पुस्तकालय के अन्य कर्मचारियों ने निकाल दिया। अब वह दर-दर भटकने लगा। उसके पास योग्यता थी। एक प्राध्यापक-सी योग्यता। फ़िर भी वह जहाँ गया उससे प्रमाण-पत्र की मांग की गई। वह तो अब साक्षर धनपत से विद्वान धनपत बन गया था। सिर्फ़ प्रमाण-पत्र के अभाव में उसे कहीं आश्रय नहीं मिल सका। भला हमारी सरकार और समाज को योग्यता से क्या मतलब? उन्हें तो चाहिए बस एक काग़ज़ यानि प्रमाण-पत्र। ऐसे सरकार और समाज से भला धनपत को क्या-कुछ हाथ लगनेवाला था। वह गाँव लौट आया।
      गाँव में जाने पर उसे पता चला कि उसकी अनुपस्थिति में ज़मींदार द्वारा उसकी जो थोड़ी जमीन थी ज़ाल फ़रेबी से हड़प ली गयी है। जो थोड़ी उपज़ होती थी वो भी समाप्त हो गयी। अब तो चारों ओर से आर्थिक दुर्दशा ने घेर रखा था धनपत को। न जाने उसका वह अद्भुत सौंदर्य कहाँ लुप्त हो गया? एकदम दुबला हो गया था वो, गरीबी की मार से। लोग तो उसे तीन-चार वर्षों में पहचान भी नहीं पाये।
      गाँव में जाकर अब वह ईंट-भठ्ठे पर मज़ूरी करने लगा। दिन भर ईंट ढ़ोना पड़ता था। बहुत कम पैसे देते थे मालिक। भला शोषक वर्ग के मालिकों को मज़दूरों के सुख से क्या मतलब? परिवार का ख़र्च भी ठीक से नहीं चल पाता था। इस आर्थिक दुर्दशा और शोषण के चलते उसके अंदर का कहानीकार जग उठा। अब वह कहानियों और अन्य साहित्यिक विधाओं के माध्यम से अपने अंतर्मन की समस्याओं को प्रकट करने लगा। प्रतिदिन रात को कुछ-न-कुछ लिखा करता था। बहुत मुश्किल से कुछ पैसे बचाकर क़ाग़ज़ ख़रीदकर साहित्य-सृजन करता था। गाँव के जो कुछ थोड़े पढ़े-लिखे लोग थे उन्हें अपनी कहानियाँ सुनाता तो उसे लोग दूसरा प्रेमचंद कहा करते थे। वह कहानियों में मानवीय संवेदनाओं और समाज की समस्याओं का चित्रण तो यों करता मानो किसी दूसरे प्रेमचंद ने जन्म ले लिया हो। लेकिन गाँव का कोई भी आदमी आर्थिक सहायता नहीं करता क्योंकि गाँव के अधिकांश लोगों की ज़िंदग़ी और आर्थिक हालत धनपत सी ही थी।
      धनपत में प्रतिभा और योग्यता की कमी नही थी पर योग्यता की पूछ भला कहाँ जो वह सुखी रह सके।
      पड़ोसी के इक्के-दुक्के धनी बच्चों के हाथ में खिलौने देखकर उसके बच्चे भी उससे वैसे ही खिलौनों की मांग करते थे, पर बेचारा धनपत क्या करता? शायद हर योग्य व्यक्ति की वर्तमान समाज में ऐसी ही हालत है, क्योंकि योग्य होने पर ऐसा ही सुख मिलता है। रात को बेचारा धनपत ऐसी ही दर्द भरी ज़िंदग़ी की कहानियाँ रोते-रोते लिखा करता था।
            धनपत ठीक वैसे ही आर्थिक दुर्दशा से ग़ुज़र रहा था जैसे कि कथा सम्राट् प्रेमचंद ग़ुज़रे थे। नाम भी तो धनपत ही था जो प्रेमचंद का पूर्व नाम था। इस प्रकार उसे दूसरा प्रेमचंद हर क्षेत्र में कहा जा सकता है।
      यही कहानी है धनपत के साहित्यकार बनने की। इसी कारण लक्ष्मी उससे ऐसी बातें कह रही थी ताकि काग़ज़ से होने वाले ख़र्च तो बच सकेंगे पर धनपत के अनुसार उस बचत से गरीबी खत्म नहीं होगी।
      एक दिन ऐसे ही लक्ष्मी की बात पर खीझकर धनपत ने कहा-क्या आशुलिपि सीख लूँ, ताकि काग़ज पर पैसे कम ख़र्च होंगे। जब देखो, क़ाग़ज़ के पैसे पर भिड़ी रहती है।
      धनपत आर्थिक रूप से कमज़ोर था। उसके परिवार के ख़र्चे के लिए भी पैसे नहीं मिल पाते थे। इसी कारण धनपत के साहित्य-सृजन से खिन्न होकर, उसकी पत्नी ने उसे न लिखने का सलाह दिया। जब भी वह धनपत को लिखते देखती उसे परिवार की स्थिति का ख़याल आ जाता जिससे वह साहित्य पर क्रुद्ध रहती थी। यद्यपि साहित्य का उसकी स्थिति में कोई दोष नहीं था। फ़िर भी मानव मन तो कभी-कभी ऊब ही जाता है।
      धीरे-धीरे धनपत के परिवार की आर्थिक स्थिति डाँवाडोल होती जा रही थी पर किसी ने भी उसकी ज़िंदग़ी के ज़ख़्म पर मलहम नहीं लगाया।
      इधर जैसे-जैसे बच्चों की आयु बढ़ती जा रही थी ख़र्च भी तेजी से बढ़ता जा रहा था। भूख से सभी की स्थिति दयनीय हो गयी। वह इन सारी हालातों को अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से व्यक्त किया करता था। वह मुख्यत: कहानीकार तथा द्वितीयत: उपन्यासकार था। पर, उसकी एक भी रचना पर आर्थिक सहायता नहीं दी गयी। भला अब के लोगों को साहित्य से क्या मतलब? वे तो सिर्फ़ अपने लिए जीते हैं। यही हालत हमारी सरकार की भी है।
      शायद धनपत के माँ के मरने की घटना की पुनरावृत्ति होने वाली थी। एक दिन लक्ष्मी भी बीमार पड़ गयी। इलाज नहीं हो पाया। भूख से बिलखते वह इस दुनियाँ को छोड़ चली। अब धनपत के अंतर्मन को एक बड़ा भारी धक्का लगा। उसके परिवार में एक-एक करके सभी बेटे-बेटियों को पोषणहीनता का शिकार होना पड़ा। इधर ईंट-भठ्ठा भी बंद हो गया। अब तो चारों ओर बस मुश्किलें और मुसीबत। अब धनपत खेतों में मज़ूरी करने लगा। एक-एक कर सभी बेटे दुनियाँ को छोड़ते गये। बेटी भी इलाज के अभाव में दुनियाँ से विदा हो गई। भगवान् ने बस एक दूसरे प्रेमचंद को कष्ट सहते रहने के लिए ज़िंदा छोड़ दिया। भला धनपत न बचता तो वैसी दु:ख-दर्द भरी कहानी कौन लिखता? अब तो धनपत का दिल पूरी तरह टूट चुका था।
      किसी तरह वह दूसरा प्रेमचंद भी कष्ट सहते हुए ज़िंदग़ी का बोझ ढ़ोता(हर जगह ढ नहीं लिखकर ढ़ लिखा हुआ है, वह गलत है) रहा। अब वह गज़ल जो दर्द से भरे होते थे, लिखा करता था। एक दिन वह महान् कथाकार भी बीमारी क शिकार हुआ। अब तो मज़ूरी भी बंद। जीने का एकमात्र सहारा था उसका कठिन शारीरिक श्रम। अब बीमार होने पर वह भी साथ छोड़ चला। एक रात किसी भी तरह वह अपनी अंतिम रचना रच रहा था। वह एक ग़ज़ल लिख रहा था-

ढ़ोता रहा मैं ज़िंदग़ी भर दर्द की गठरी।
ख़ुदा भी ज़ालिम हुआ मेरी खातिर उस घड़ी।
बिना किये ग़ुनाह की सजा पाता रहा,
हाथ में बांधी गयी थी मेरे हथकड़ी।
खाने को रोटी को कौन पूछे धनपत
मुझे मिल पायी नहीं घास भी हरी-भरी।
इतने भूख से बेचैन था मैं इससे,
गा न सका अपने दर्द के ग़ज़ल की भी दो कड़ी।
शायद हर ज़िंदग़ी की दास्ताँ है यही,
मची है सबों की ज़िंदग़ी में अफ़रा-तफ़री।
दिल भी बैठ गया मेरा अब पूरा,
ऐसे ज़िंदग़ी की करते-करते चाकरी।
ऐसे ज़िंदग़ी की करते-करते चाकरी……यहीं तक, बस यहीं तक है उस महान् साहित्यकार के अंतिम गजल की अंतिम पँक्ति। इसी पँक्ति के लिखने के बाद हाथ में कलम लिये हुए दूसरे प्रेमचंद का निधन हो गया। इसी पँक्ति के साथ रुक गयी इस भूखे कहानीकार, कवि, लेखक, उपन्यासकार की लेखनी हमेशा के लिए रुक गयी।
अब उसके अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे पड़ोसी और गाँव वालों के पास। संयोग से उसके मरने की रात के बाद सुबह ही कुछ सरकारी कर्मचारी उस गाँव में आए। गाँववालों ने उनसे धनपत तथा उसकी रचनाओं के बारे में बतलाया। वे सब उसके घर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि तीस-चालीस पुस्तकों की पांडुलिपियाँ रखी हुई हैं। उन्होंने उनमें से कुछ को पढ़ा तथा सभी पुस्तकें शहर ले गये। बाद में उनके द्वारा धनपत की सारी रचनाएँ पढ़ी गयीं। उनको लगा कि सचमुच धनपत एक महान् तथा अद्वितीय कथाकार था। सरकार के द्वारा घोषणा की गयी कि दूसरे प्रेमचंद यानि धनपत को मरणोपरांत काफ़ी धनराशि प्रदान की जायेगी।
उधर दूसरे प्रेमचंद का शव गाँव के परती पर फेंका हुआ था। गिद्ध और चील उसे नोच-नोच कर खा रहे थे। मानो वे ही उसका अंतिम संस्कार कर रह हों।
सरकारी घोषणा तो की गयी पर सरकारी घोषणा तो बस घोषणा तक ही सीमित होती है। उसका यथार्थ के साथ कोई रिश्ता नहीं होता। एक भी रूपया दूसरे प्रेमचंद के श्राद्ध के लिए सरकार के द्वारा नहीं दिया गया। यही है हमारे समाज और हमारे सरकार की व्यवस्था।
      मानो दूसरे प्रेमचंद का शव कह रहा था-आज हमारे समाज में लेखक, साहित्यकार, कहानीकार मेरी तरह ही जीते हैं। जो सम्मान यहाँ साहित्यकारों को दिया जाता है वह पूरी दुनियाँ में मिलना नामुमकिन है। पूरी ज़िंदग़ी एक साहित्यकार दुनियाँ को कुछ-न-कुछ देता ही रहता है। क्योंकि लेना उसने सीखा ही नहीं। दूसरों को सुखी बनाने में ही उसे परम आनंद की अनुभूति होती है। वह अपनी मेहनत से खून की बूंदें टप्-टप् गिराता है, पसीना नहीं। फ़िर भी किसी के द्वारा क़ाग़ज़ तक की क़ीमत नहीं दी जाती।
किसी की योग्यता से भला किसी को क्या मतलब? सब तो अपने में ही मशग़ुल रहते हैं। एक साहित्यकार को उसकी ज़िंदग़ी में याद नहीं किया जाता क्योंकि वह स्वतंत्र होता है। स्वतंत्र रहना चाहता है। उसकी लेखनी आज़ादी की पूजा करती है। वह किसी के आधीन नहीं रहना चाहती। मैं भूख से मरनेवाला भूखा लेखक हूँ। मैं भूख का मारा हूँ। मैं सभी दु:खों-दर्दों का भुक्तभोगी हूँ। इन्हीं शुभ वचनों के साथ पूरी ज़ालिम दुनियाँ को दूसरे प्रेमचंद यानि धनपत का अंतिम प्रणाम!

नाथूराम ने अंग्रेजी भाषा का राज कायम करने में दिया है बहुत बड़ा सहयोग

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नाथूराम गोडसे। जाने कितने लोगों का आदर्श है ये नाम। अखंड भारत का स्वप्न देखनेवाले अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो नाथूराम को आदर्श माने बैठे हैं। मैं आज नाथूराम की बात किसी विवाद के लिए नहीं कर रहा। आज मेरा विषय कुछ अलग है। 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सभी लोगों में गाँधी जी स्वभाषा के सबसे अधिक पक्षधर थे। इतना तो तय माना जा सकता है कि अगर 1948 के बाद और भारतीय संविधान बनने तक गाँधी जीवित होते तब निश्चित तौर पर हिन्दी और भारतीय भाषा का स्थान आज से बेहतर होता। आज जो अंग्रेजी की स्थिति है, उसमें और 1890 की स्थिति में रत्ती भर का फर्क नहीं है। अंग्रेजी का कोई सुखद प्रभाव हमारे देश पर कभी रहा है, इसपर सोचना व्यर्थ है। यह न सोचें कि अंग्रेजी के माध्यम से बहुत भारी बात हो गई। कुछ लोग यह सोचते हैं कि अंग्रेजी के चलते हमारे देश के लोगों को विश्व का श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने को मिला लेकिन इस बात पर मैं यहाँ अधिक नहीं कहूंगा क्योंकि मैं अपनी किताब में इस पर विस्तार से लिख चुका हूँ।

इस बात की गारंटी तो नहीं ली जा सकती कि नाथूराम अगर गाँधी को नहीं मारता तो गाँधी को और कोई भी नहीं मारता। लेकिन अभी हम यह मानकर चलें कि नाथूराम ने गाँधी की हत्या की। उससे कोई फायदा तो किसी को नहीं मिला। क्योंकि मैंने हमेशा कहा है कि गाँधी सबसे बदनसीब नेता हैं। उन्हें दलितों ने अस्वीकार किया, हिन्दुओं ने अस्वीकार किया और मुस्लिमों ने भी अस्वीकार किया। कुछ अपवाद हो सकते हैं।

मेरा विषय बहुत छोटा है। इसलिए अधिक तो नहीं कहूंगा लेकिन नाथूराम अपने को जितना समझदार माने लेकिन सच तो यही है कि गाँधी को मारकर उसने अंग्रेजी की स्थिति बहुत मजबूत कर दी। इस बात पर कितनों को परेशानी होगी लेकिन सच तो यही लगता है। कारण यह है कि गाँधी जी हिन्दी और भारतीय भाषाओं के सबसे बड़े पक्षधर थे। इस बात के एक नहीं सैकड़ों सबूत हैं। 

गाँधी जी को बहुत से लोगों ने जिद्दी भी कहा है। लेकिन गांधी के असर को देखते हुए इतना तय माना जा सकता है कि अंग्रेजी के खिलाफ़ आजादी के बाद अगर कोई दमदार कदम और आंदोलन उठा सकता था और उसे सफल बना सकता था तो वह एकमात्र गाँधी थे। इसलिए मैं मानता हूँ कि गाँधी की हत्या करके गोडसे ने भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी  का राज एक लम्बे समय के लिए कायम कर दिया और सिवाय गाँधी के दूसरा ऐसा कोई बड़ा नेता था ही नहीं जिसका असर पूरे देश पर हो और भाषा के मामले पर विवाद को सही दिशा देते हुए वह अंग्रेजी का साम्राज्य खत्म कर पाता या इसके लिए कोशिश कर पाता। उनके अलावे लगभग सारे बड़े नेता अंग्रेजी के भक्त बने हुए थे और गाँधी जी के जीवित रहते हिन्दी के समर्थन में शायद मजबूरी में रहते थे।

अन्त में नाथूराम ने अंग्रेजी भाषा का साम्राज्य कायम किया है अपनी मूर्खतापूर्ण हरकत से। यहाँ ऐसे लोग कृपा करेंगे जो आजादी की लड़ाई, गाँधी, नरम दल, गरम दल, अहिंसा जैसी बात पर बहस करें क्योंकि मेरा मुद्दा यहाँ भाषा है और कुछ नहीं।

देशद्रोही की परिभाषा(कविता)

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23 मार्च 2011 को तेवरआनलाइन पर प्रकाशित मेरे आलेख ने मेरे अन्दर यह इच्छा पैदा की कि एक किताब लिखी जाय जो अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन बनाए। फिर विस्तार से हिन्दी और अंग्रेजी पर चर्चा करते हुए तथ्यों और तर्कों के साथ किताब लिखने में लग गया। अब वह किताब लगभग तैयार है। किताब कुछ वेबसाइटों पर प्रकाशित होने जा रही है। आज से यह सिलसिला शुरु कर चुके हैं तेवरआनलाइन के संपादक आलोक नंदन। मेरी किताब शुरु होती है एक कविता से जिसका शीर्षक है देशद्रोही की परिभाषा। किताब का नाम रखा है देशद्रोहियों की भाषा है अंग्रेजी। यह नाम कैसा है, जरूर बताएँ या अपना मत दें। आज से एक सर्वेक्षण शुरु कर रहा हूँ जो दाहिनी तरफ़ सबसे उपर दिखेगा। यह सर्वेक्षण तब तक चलेगा जब तक यह किताब ई-बुक या पुस्तक के रुप में प्रकाशित होगी। पूरी किताब जिन वेबसाइटों पर प्रकाशित होगी उनके लिंक जल्द ही दे दूंगा। पूरी किताब मैं यहाँ प्रकाशित नहीं करूंगा। हाँ, समाप्ति के बाद उसका पीडीएफ़-संस्करण अवश्य मेरे चिट्ठे पर उपलब्ध करा दूंगा। तो लीजिए आज पढ़िए उस किताब की शुरुआत में आनेवाली कविता को।



कभी विकास के नाम पर,

कभी कुछ सिक्कों की खातिर।
जिसने उस घर में नौकरी की, उसके तलवे चाटे
जिस घर के लोगों ने बेरहमी से मेरे घर के 
बच्चों को बचपन में पटक कर मार दिया,
बूढों को गोली मार दी,
मांओं से, बहनों से, बेटियों से बलात्कार किया और फिर जिंदा दफना दिया,
युवाओं को फांसी, कालेपानी की सजा दी।
जिसने उससे भीख ली, कर्ज लिया,
जिसने मेरे घर के लोगों से एक-एक पाई हड़पने के लिए सौ-सौ कोड़े बरसाये,
जिसने दुनिया की सबसे क्रूर हत्याओं को मेरे घर में अंजाम दिया।
जिसने उसके सामने सिर झुकाया,
जिसने मेरे घर में सैकड़ों साल तक आग लगायी,
एक-एक ईंट उठा ले गये जो,
जिनके अत्याचार के सामने काल भी काँप जाये
जिसने उन हत्यारों की भाषा मुझसे ही बोलनी शुरु कर दी
झूठे बहाने बनाकर,
तुम ही बताओ, ऐ कविता पढ़ने वाले! 
उसे मैं देशद्रोही के सिवा क्या कहूँ?
क्योंकि ये मेरे ही घर के रहनेवाले हैं,
मेरे ही खून को पीने वाले हैं,
और मैं ही तो देश हूँ, मेरा नाम भारत है
जिसे ये देशद्रोही इंडिया बना रहे हैं।
जिसने मेरे हर हिस्से को गिरवी रख दिया है
अत्याचारियों के पास
प्रगति का ढोंग करते-करते।
तुम ही बताओ, ऐ कविता पढ़ने वाले! 
उसे मैं देशद्रोही के सिवा क्या कहूँ?
मैं इंतजार कर रहा हूं 
हजार सालों से शान्ति का,
होकर क्षत-विक्षत
थक गया हूं आक्रमणों से
और इस उम्मीद में बैठा हूँ कि 
कोई तो पैदा होगा जो नपुंसक नहीं होगा।
जो उन क्रूर लोगों की विरासत नहीं थामेगा
और मेरी तरफ़ देखेगा।
क्यों कि सारे वीरों को तो उन राक्षसों ने मार डाला।
सिर्फ़ संतान पैदा कर देने से मर्द नहीं हो जाता कोई
संतान तो कुत्ते, भेड़िये, गदहे सब पैदा कर लेते हैं।
कोई तो पैदा होगा जो 
समुंदर के पूरे पानी को थूक बनाकर
इनके मुँह पर उड़ेल देगा।
इस उम्मीद में बैठा हूँ मैं कि
कोई तो पैदा होगा जो मुझे उधार के राजसी वस्त्र न पहना कर
अपना फटा चिथड़ा ही पहनाएगा।
कोई तो मेरे घर के छीने हुए हिस्से को वापस लाएगा
कोई तो मेरा हीरा वापस छीन कर लाएगा
याद रखो माँगकर नहीं छीन कर लाएगा।
इस उम्मीद में बैठा हूँ कि
कोई तो पैसे, नौकरी, पत्नी, परिवार, मस्ती और विदेश के
मोह से निकलकर मुझे देखेगा।
इन देशद्रोहियों से कैसे उम्मीद करूँ?
ऐ कविता पढ़ने वाले!
तुम तो देशद्रोही नहीं हो!
फिर क्यों देख रहे हो यह सब चुपचाप?
तुम्हें उठना होगा और लड़ना होगा 
इन देशद्रोहियों से।
उठो! निकलो अपने स्वार्थ के कुएं से
और कूद जाओ रणक्षेत्र में।
और खत्म कर डालो आक्रमणों का इतिहास 
एक आखिरी आक्रमण से।
तुम्हें जीतना होगा
जीतना होगा
जीतना होगा , यह युद्ध कम से कम मेरी खातिर।

आखिर कौन है ये भगतसिंह?

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भगतसिंह के बहाने अपनी बात

भगतसिंह- एक जाना पहचाना नाम विशेष रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक्शन हीरो के तौर पर। इस नाम के बारे में मुझे क्यों कुछ कहने की जरुरत हो रही है जबकि इस नाम के उपर लाखों पन्ने भरे जा चुके हैं, करोड़ों रूपये का व्यापार हिन्दी सिनेमा कर चुका है। कुछ तो ऐसा है जरुर कि मैं कुछ कहना चाह रहा हूं। तो चलिए भगतसिंह की रेलगाड़ी में सैर करते हैं।

      पहली बात ये कि हम भगतसिंह को कैसे जानते हैं, कितना जानते हैं तो हम सिर्फ़ यही जानते हैं कि भगतसिंह एक क्रांतिकारी थे जो हिंसक तरीके से आजादी चाहते थे। उनका जन्म पंजाब में हुआ था। उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी सौंडर्स की हत्या, एसेम्बली में बम फेंकना जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। उन्हें 23 मार्च 1931 को सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी दे दी गई। और गांधीजी ने उन्हें बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। उनका नारा था इंकलाब जिंदाबाद!! यही जानकारी अधिकांश लोगों को है जो भगतसिंह-भगतसिंह का शोर मचाते हैं और गांधी चोर था, गांधी ऐसा था, वैसा था कहते फिरते हैं। और कुछ उत्साह से 15 अगस्त और 26 जनवरी को उनके नाम पर कुछ गाने गाना, लोट-लोट कर नौटंकी करना, डांस करना और बहुत से बहुत हुआ तो किसी संगठन के बोर्ड पर भगतसिंह का फोटो लगाकर ब्रांड की तरह भगतसिंह का इस्तेमाल करना बस यही काम हमारे द्वारा किये जाते हैं। मैंने किसी मां-बाप को यह बताते हुए न देखा है न सुना है कि वो अपने बच्चों को भगतसिंह बनने की ओर प्रेरित करते हों। आप पूछ कर देख लें बच्चों से कि क्या बनना चाहते हो? जवाब होगा- सलमान खान, शाहरुख खान, सचिन तेंदुलकर, धोनी, मुकेश अंबानी, बिल गेट्स, डाक्टर, इंजीनियर, मिस इंडिया, हीरो, हीरोइन। बस यहीं तक सोच हो सकती है। इससे आगे कुछ सोचना तो दूर की बात है। मैं अक्सर देखता हूं कि युवा जिनका काम सुबह शाम शराब, गाली-गलौज, अभद्रता, ग्लैमर, बाइक और सिगरेट का इस्तेमाल करना होता है गांधी से जलते हैं क्योंकि गांधी ग्लैमरस नहीं हैं, बूढे हैं देख कर मन दुखी हो जाता है तो बेचारे भगतसिंह के नाम पर कूदते हैं कि हिंसा बहुत अच्छी चीज है पर दुख इस बात का है कि न तो उनको भगतसिंह के बारे में ज्यादा मालूम है न ही गांधी के बारे में। वैसे यह जरुर बता दूं कि भगतसिंह से ज्यादा वे गांधी जी के ही बारे में जानते हैं। मेरा दावा ये नहीं मैं बहुत ज्यादा जानता हूं दोनों के बारे में। गांधी का सम्पूर्ण वांगमय 50 हजार से ज्यादा पृष्ठों में भारत सरकार ने छापा है। और भगतसिंह का सब कुछ सिर्फ़ चार-पांच सौ पृष्ठों में सिमटा हुआ है। अगर आप भगतसिंह की किताब या विचारधारा की बात करेंगे तो ये भाग खड़े होते हैं। मैं बता दूं कि मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो भगतसिंह के नाम पर लड़ने को तैयार हो जाते हैं लेकिन मैंने जब भगतसिंह की किसी किताब या लेख पर उनका ध्यान दिलाया तो उन्होंने पलटी मार दी। भगतसिंह का पक्ष युवा वर्ग खूब लेता है लेकिन जैसे ही भगतसिंह जैसा बनने की बात आती है उसका ध्यान अमेरिका, इंग्लैंड, दौलत, ऐशो आराम  पर चला जाता है।   
      पंजाब जिसे सुनते ही पगड़ी की याद आ जाती है जहां पहचानना मुश्किल होता है कि कौन कैसा है? सारे लोग एक ही जैसे दिखते हैं वहीं एक अलग सा दिखने वाला बच्चा पैदा होता है 28 सितम्बर 1907 को। चूंकि कोई देश या इतिहास इसके पीछे नहीं पड़ता कि लेनिन, मार्क्स, हिटलर, बुद्ध या कोई और किसका बेटा है, ठीक उसी तरह यह बच्चा किसका बेटा है मुझे बताने में कोई रूचि नहीं। यहां मैं एक बात कहना चाहता हूं कि अगर कोई ये समझे कि फलां आदमी या महापुरुष के माता पिता बड़े महान थे  जो उन्होंने किसी महापुरुष को जन्म दिया या पाला तो ये बिल्कुल ही मानने लायक नहीं है क्योंकि सब जानते हैं दुनिया के लगभग सारे महान या क्रांतिकारी आदमी के मां-बाप की वे इकलौती संतान नहीं थे। लगभग सभी के एक से ज्यादा संतान थी। तब अगर वे वाकई में महान थे और बहुत बुद्धिमान, शक्तिशाली या गुणवान थे तो उन्होंने अपने दूसरे बेटे को महान क्यों नहीं बना दिया। जहां तक मुझे याद आ रहा है, विवेकानंद दस से ज्यादा भाई-बहन थे तो क्यों नहीं उनके माता-पिता ने दूसरा विवेकानंद पैदा कर दिया। कोई आदमी अपने मां-बाप से शरीर लेकर पैदा होता है पर उसकी खुद की सोच, समय की जरुरत, उसका खुद का मंथन, खुद का संघर्ष आदि उसे महान बनाते हैं न कि किसी खास का बेटा होना।
      उस बच्चे की जीवनी बताना मेरा लक्ष्य नहीं इसलिए यहां लम्बी जीवनी नहीं चलेगी। लेकिन उन घटनाओं का जिक्र जरुर होगा जिससे वह बच्चा भगतसिंह बना। घर में सदस्यों का आजादी के आंदोलन से किसीन-किसी तरह से पहले से जुड़ा हुआ होना, बचपन में ही जलियांवाला बाग हत्याकांड को नजदीक से जानना, आंदोलनों का दौर होना ये सारे कारण उस समय मौजूद थे। लेकिन बेखौफ मौत, हंसते हुए फांसी पर चढना, फांसी के पहले चिंता नहीं होने की वजह से वजन का बढ़ जाना, लम्बी भूख हड़ताल, मरने के समय किसी भगवान, वाहे गुरु जैसे छलावे या सहारों का स्मरण भी न करना, अल्पायु में घोर अध्ययन, एक विचारक होना और सबसे महत्वपूर्ण साढे तेईस साल की उम्र में दुनिया से चले जाना- ये घटनाएं बताती हैं भगतसिंह नाम का युवक भगतसिंह क्यों और कैसे बना?
किताबों, भाषा, साहित्य और हिन्दी पर
      21 फरवरी 1921 को 140 सिखों को महन्त नारायणदास ने बड़ी बेरहमी से मार डाला था ननकाना साहिब में। इसमें अंग्रेजों की मदद महन्त को मिली थी। बहुतों को जिंदा जला डाला गया था। इस घटना से आहत लोगों ने पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरु कर दी। लोग पंजाबी सीखने पढ़ने, लिखने लगे। भगतसिंह ने भी इस प्रभाव में आकर पंजाबी सीखी। यही पंजाबी भाषा एक बार उनके लेखन का विषय बनी। 1924 में पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के लिए उन्होंने एक लेख लिखा था पंजाबी भाषा और उसके लिपि की समस्या पर। इस लेख भगतसिंह ने साहित्य और भाषा पर विचार किया है। अब आज के युवाओं के लिए साहित्य और भाषा का महत्व कितना रह गया है? जरा देखते हैं। अगर एक छात्र हिन्दी से एम ए कर रहा हो तो उसे और छात्र एवं लोग बड़ी नीची दृष्टि से देखते हैं। जब हमें पता चलता है कि मेरे बगल में एक लेखक रहते हैं तब हम उनके उपर हंसते हैं और कहते हैं- वह कुछ नहीं बस टाइम बर्बाद करता है। मेरी मातृभाषा भोजपुरी है। लेकिन जब मैं घर में या बाहर भोजपुरी बोलता हूं तब कभी-कभी लोग या ज्यादातर मेरे रिश्तेदार मुझे मूर्ख समझते हैं। उन्हें मैं पुराना लगता हूं। पुराना जानकर अगर फेंकना ही किसी का उद्देश्य हो तब भगतसिंह भी 80 साल पुराने हो चुके हैं और उन्हें भी हमें हमेशा के लिए दफना देना चाहिए!
आज हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी नहीं, अंग्रेजी है। मैं यह बात होशोहवास में कह रहा हूं। हमारे देश में जब आप किसी के घर जाते हैं तो वहां बच्चों के माता-पिता क ख ग सुनाने को नहीं कहते, बच्चा ए बी सी डी अगर सुनाता है तब उनके कलेजे को ठंढक पड़ती है। अगर कोई ग्रामीण क्षेत्र का बच्चा अपने रिश्तेदार के यहां शहर जाता है और वह अच्छी अंग्रेजी नहीं जानता तो उसे मानसिक परेशानी और कुंठा का शिकार होना पड़ता है और फिर टूटी-फूटी ही सही लेकिन अंग्रेजी का उपयोग अपने दैनिक जीवन में वो शुरु कर देता है। इस देश में एक खासियत ये है कि यहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। हर भाषा के अपने-अपने तर्क और पक्ष हैं लेकिन भगतसिंह के अनुसार समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक साहित्य, एक आदर्श और एक राष्ट्र बनाना पड़ेगा; परन्तु समस्त एकताओं से पहले एक भाषा का होना जरुरी है ताकि हम एक-दूसरे को भली-भांति समझ सकें। एक पंजाबी और एक मद्रासी इकट्ठे बैठकर केवल एक दूसरे का मुंह ही न ताका करें, बल्कि एक दूसरे के विचार तथा भाव जानने का प्रयत्न करें, परन्तु यह पराई भाषा अंग्रेजी में नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की अपनी भाषा हिन्दी में। भाषा के लिए आखिर इतना जोर क्यों? भाषा ही हमारे बीच एक ऐसी माध्यम है जिसके सहारे हम एक दूसरे से सम्पर्क करते हैं। अपनी भाषा हम क्यों इस्तेमाल करें यह प्रश्न जिसके दिमाग में आता है उसे सोचना चाहिए क्या किसी देश ने अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा से अपना विकास किया है या नहीं। भगतसिंह ने हिन्दी को सर्वांगसम्पूर्ण लिपि वाली भाषा कहा है।  यहां हम यह बता दें कि हिन्दी क्यों और कैसे अंग्रेजी से आसान और बेहतर है और कैसे यह भगतसिंह के बात को सच साबित करती है?
1)      हिन्दी के पास नये-नये शब्द बनाने की अपार क्षमता है अंग्रेजी के पास नहीं। तो हमारी हिन्दी में तो हर चीज के लिए बनायी जा सकती है।
2)      हिन्दी के पास जितने वर्ण हैं उनमें संसार की लगभग सभी भाषाओं के शब्दों के उच्चारण की क्षमता है।
3)      जैसे लिखे वैसे पढे ऐसी तो बहुत ही कम भाषाएं हैं उनमें से हिन्दी है। जर्मन, फ्रेंच और अंग्रेजी जैसी भाषाएं ऐसी नहीं हैं कि हम जो लिखें वहीं पढे। कुछ शब्द जैसे Manager जर्मन में मैनेजर पढा ही नहीं जाता।
4)      तमिल में वर्णों के वर्ग में कुछ वर्ण होते ही नहीं। जहां तक मुझे याद है तमिल में गांधी को कांधी लिखना पड़ता है। बांग्ला में लक्ष्मी लिखते हैं पढ़ते हैं लोखी। भगतसिंह के अनुसार एक बार एक अनुवादक ने ॠषि नचिकेता को उर्दू में लिखा होने से नीची कुतिया समझकर ए बिच आफ लो ओरिजिन अनुवाद किया था। इसमें दोष उर्दू भाषा और लिपि का था। उन्हीं के अनुसार पंजाबी में हलन्त और संयुक्ताक्षर के अभाव के कारण बहुत सारे शब्दों को ठीक से नहीं लिखा जा सकता है। चीनी की तो महिमा ही अपार है। वहां तो हर शब्द के लिए ही चिन्ह निश्चित किये गये हैं। उनमें शायद नये शब्दों को लिखने के लिए चिन्ह ही नहीं हैं। हमारे यहां अंग्रेजी पढ़ते समय बच्चों को अलग से याद कराना पड़ता है कि ये शब्द साइलेंस वाले हैं।
5)      अंग्रेजी में एक होता है Article जिसका स्थान हिन्दी में है ही नहीं। ठीक इसी तरह से कैपिटल और स्माल अल्फाबेट्स का भी ध्यान लिखते समय रखना पड़ता है। लोग कहते हैं हिन्दी में वर्ण ज्यादा हैं तो क्या अंग्रेजी में लिखने के तरीकों को मिलाकर 104(26*2*2)  अल्फाबेट्स नहीं हैं।  और वर्ण ज्यादा होने का ही फायदा है कि हम अधिकांश भाषाओं के शब्द हिन्दी में सुनकर लिख सकते हैं।
6)      एक विषय है विशेषण। अंग्रेजी में तो लम्बा-चौड़ा अध्याय है। साथ ही याद रखना पड़ता है कि किस शब्द का रूप अब क्या होता है। हिन्दी में तत्सम शब्दों के साथ तर या तम लगाने से ही काम खत्म। अगर शब्द तत्सम नहीं है तब उससे या सबसे जोड़ लीजिये और हो गया काम। जैसे- सुंदर से सुंदरतर या सुंदरतम और खराब से उससे खराब या सबसे खराब।
7)      एक भयानक अध्याय है Preposition शायद अंग्रेजी का सबसे ज्यादा बड़ा और पूरा नहीं हो सकने वाला अध्याय। अब हिन्दी में देखते हैं। Over, On, At आदि का झंझट ही नहीं। अगर उपर है तो बस उपर है।
8)      चाय बनाना, सवाल बनाना, दाढ़ी बनाना, खाना बनाना, मूर्ख बनाना, घर बनाना, सामान बनाना आदि के लिए To prepare tea, to solve, to shave, to cook food, to make fool, to build, to manufacture, to create इस्तेमाल किये जाते हैं। अब देखिए हिन्दी में बनाना मतलब बनाना, क्या बना रहे हैं इसको अलग से याद रखने का कोई काम नहीं।
9)      हमारे यहां या किसी भी सभ्यता में आदर का होना आवश्यक है। अंग्रेजी में He was a teacher. थे या था पता नहीं। Suman is going. लड़का है या लड़की पता नहीं। You तुम है या आप कुछ पता नहीं। लिंग के मामले में भी अंग्रेजी कुछ खास नहीं। आदर की कोई भावना ही नहीं है अंग्रेजी में। फिर यह सभ्य कैसे हो गयी?
10)  अपवादों की बात करें तो जिस भाषा में अपवाद कम हों वह उतनी ही अच्छी या वैज्ञानिक भाषा होती है।
11)  एक बार मेरे एक शिक्षक ने कह दिया कि अंग्रेजी में सुंदर के लिए बहुत सारे शब्द हैं जैसे- नाइस, ब्यूटीफुल, फाइन आदि। मैंने कहा कि हिन्दी में पर्यायवाची शब्दों को देख लें तो पता चले। किसी-किसी शब्द के सौ से ज्यादा अर्थ हैं। इस मामले में अंग्रेजी हिन्दी से ज्यादा कैसे समृद्ध हो गयी। एक शब्द है- सारंग या हरि इनके अर्थ देख लें तो पता चले कि एक शब्द के लिए हमारे पास कितने शब्द हैं।
12)  अनुवाद के मामले में भी अंग्रेजी बहुत गरीब भाषा है। जैसे सरकार सड़क बनवाती है का अंग्रेजी होता है कि सरकार बनी हुई सड़क प्राप्त करती है। यानि प्रेरणार्थक क्रियाओं के मामले में भी हिन्दी निर्विवाद अंग्रेजी से ज्यादा समृद्ध है।
13)  जिस तकनीक की भाषा का हम शोर मचाते हैं उसमें तो अधिकतर शब्द लैटिन, जर्मन आदि से लिए गए हैं। रासायनिक तत्वों के नाम तो कुछ ही अंग्रेजी के होंगे या नहीं भी होंगे। इस तरह से रसायनशास्त्र तो अंग्रेजी ने उधार के शब्दों से चला रखे हैं।
14)  एक Question Tags होता है जिसे सबको पढना पड़ता है लेकिन हिन्दी में इसके लिए कोई माथा पच्ची नहीं करनी होती।
15)  छंद, रस या अलंकार के मामले में तो हिन्दी का कोई जोड़ ही जल्दी नहीं मिलेगा। कविता लिखने के इतने तरीके हैं हिन्दी में कि आप सारे में लिख ही नहीं पायेंगे।
16)  भाषा सीखने के लिए शब्द और व्याकरण हम ये ही दो चीजें सीखते हैं। व्याकरण तो मैंने बता दिया। शब्दों के मामले में संयुक्त शब्दों को बनाने की या इस्तेमाल करने की परंपरा या जो छूट हिन्दी में है वो कभी अंग्रेजी देती ही नहीं। हम बहुत सारे शब्द हिन्दी में बिना जाने भी प्रयोग कर सकते हैं अगर हिन्दी के शब्दों से हमारा थोड़ा भी अच्छा परिचय हो लेकिन अंग्रेजी में एक-एक शब्द सीखना पड़ता है तब जाकर हम अंग्रेजी सीखते हैं। ऐसा नहीं कि हर जगह अंग्रेजी कमजोर ही है बहुत जगह उसमें भी कुछ चीजें आसान हो जाती हैं।
17)  नियमों के मामले में जिस भाषा के नियमों की संख्या जितनी कम हो उसे उतना ही सरल या आसान माना जायेगा। इस हिसाब से ये बताने की जरुरत नहीं कि हिन्दी में अंग्रेजी से कम नियम होते हैं या ज्यादा।
ये कुछ बातें जो अभी याद आईं मैंने लिखीं। अगर किसी भाषा की सरलता को जानना हो तो सबसे आसान और कारगर उपाय यह है कि हम किसी ऐसे आदमी से दूर-दूर तक जो हिन्दी और अंग्रेजी नहीं जानता उसे दोनों भाषाएं सिखाने के बाद देख सकते हैं कि कौन सी भाषा जल्दी सीखी जा सकती है। फिर भी हर जगह युवक स्पीकिंग कोर्स करते हुए पाए जाते हैं। वहां उन्हें 100 दिन में, 3 महीने, 4 महीने या 6 महीने में धाराप्रवाह अंग्रेजी सीखायी जाती है। यह एक बहुत बड़ा सच है कि कोई भी भाषा कठिन परिश्रम के बाद ही आती है न कि कुछ दिन हाय, हेल्लो, गुड मार्निंग, बाय आदि के इस्तेमाल से। आप चाहे कितनी भी अच्छी हिन्दी जानते हों आपसे कोई हिन्दी सीखने नहीं आता लेकिन एक नौसिखिये से अंग्रेजी सीखने के लिए भीड़ लग जाती है। कोई भी हिन्दुस्तानी बिना अपनी मातृभाषा में सोचे अपनी बात अंग्रेजी में तो कहता नहीं फिर सीधे हिन्दी में ही क्यों न कही जाय। दक्षिण के लोगों के लिए इतना ही कहना है कि जब वे अंग्रेजी सीखकर दूसरे राज्यों से सम्पर्क कर सकते हैं तब हिन्दी सीखकर क्यों नहीं। हिन्दी इसलिए कि यह भाषा भारत में लगभग 80 करोड़ लोग जानते, समझते, बोलते , पढते या लिखते हैं। क्या हमें यह याद नहीं करना चाहिए कि सात लाख बत्तीस हजार क्रांतिकारियों ने अपनी जान अंग्रेजों को भगाने के लिए दी थी और हम उसी अंग्रेजों की अंग्रेजी को अपने घर में आदर के साथ बिठाये हुए हैं।
      न्याय शास्त्र पर भारत में बहुत पहले से किताबें लिखी जाती रही हैं फिर भी हम न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी रखे हुए हैं। अंतर्राष्ट्ररीय स्तर पर हमारे देश का नाम शायद दुनिया में एक अनोखा उदाहरण है जिसे हम अपने देश की भाषा में नहीं बल्कि अंग्रेजी में रखे हुए हैं यानि इंडिया। हमारे देश का नाम भारत होना चाहिए था लेकिन अंग्रेजों की मानस संतानें हमारे देश में आज भी हैं। दुनिया में दो सौ से ज्यादा देश हैं। एक हमारा ही काम अंग्रेजी के बिना नहीं चलता। लगभग 10-12 देशों के अलावे अंग्रेजी किसी भी देश वह स्थान नहीं रखती जो हमारे देश में रखती है। जर्मनी, फ्रांस, रूस, जापान आदि देश क्या अपनी भाषाओं के दम पर आज सब कुछ नहीं कर रहे? फिर हमारे देश में अंग्रेजी का कुत्ता क्यों सबको काटे जा रहा है? अगर अंग्रेजी जानने भर से ही कोई नौकरी पा लेता तो क्या इंग्लैंड में कोई भी गरीब नहीं, भिखारी नहीं। गणित और विज्ञान के क्षेत्र में रूस का स्थान आप से छुपा नहीं है फिर भी हम क्यों अंग्रेजी के पिछलग्गू बने हुए हैं? अर्थशास्त्र भी चाणक्य के जमाने से है फिर भी हमें अंग्रेजी में अर्थशास्त्र क्यों पढाया जाता है? हमारे हिन्दी में जब यह खासियत है कि वह अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने में मिला लेती है तब भी हमें विकलांग भाषा की जरुरत क्यों होनी चाहिए? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जगदीश चंद्र बसु के सारे शोध-पत्र बांग्ला में लिखे गये थे। हमें अपनी भाषा का इस्तेमाल करना ही होगा वरना एक दिन भाषायी रूप से हम सौ प्रतिशत अंग्रेजी के गुलाम हो जायेंगे।
      हमारे यहां बिहार में दूरदर्शन पर उर्दू समाचार सवा सात बजे से प्रसारित किया जाता है। मैं हमेशा देखता हूं कि जिस शब्द का उर्दू में अभाव है उसे अंग्रेजी में कहा जाता है जैसे कार्यक्रम को प्रोग्राम। ऐसे अनेक शब्द हैं जिनके लिए अंग्रेजी के शब्द इस समाचार में इस्तेमाल किये जाते हैं। ऐसी भाषायी कट्टरता बिल्कुल ठीक नहीं है। जब हम हिन्दी में हरेक वाक्य में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल करते हों, हमारी फिल्मों की भाषा हिन्दी नहीं हिन्दी-उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी हो तब इन उर्दू वालों की समझ पर दुख होता है। किसी भी तरह की संकीर्णता या कट्टरता का विरोध होना चाहिए। यह हमारे देश के लिए घातक है।
      भारत एक ऐसा देश है जहां हमें तब अच्छा समझा जाता है, विद्वान समझा जाता है जब हमारे घरों में अंग्रेजी की किताबें हों और अंग्रेजी अखबार आता है लेकिन अन्य देशों में लोगों को तब सभ्य समझा जाता है जब उनके घरों में उनके अपनी भाषा की किताबें हों और उनकी भाषा का अखबार हर दिन आता हो। आंकड़े कहते हैं कि अंग्रेजी भाषा के कारण लाखो-करोड़ों बच्चे पढाई बीच में ही छोड़ देते हैं। फिर भी हम क्यों कुछ करोड़ लोगों के लिए ही सोचते हैं और अंग्रेजी को सब कुछ बनाने पर तुले हुए हैं। आज भी गांवों में लगभग 90 करोड़ लोग रहते हैं। आप चले जाइए और अंग्रेजी का एक छोटा सा अनुच्छेद उन्हें पकड़ा दीजिए और कहिए कि इसका अर्थ वे अपनी भाषा में बता दें तो मेरा दावा है कि कुछ गांवों को छोड़कर सारे गांवों में एक-दो आदमी भी ऐसा नहीं मिलेगा। पूरे भारत में दो करोड़ लोग भी ठीक से अंग्रेजी नहीं समझते-जानते हैं। हमारे देश का इतिहास या और किसी भी विषय की पाठ्यपुस्तक का मूल अंग्रेजी में लिखा जाता है फिर उसे हिन्दी में अनूदित करके छापा जाता है और इस अनुवाद के दौरान ऐसी मूर्खता भरी गलतियां की जाती हैं कि कभी-कभी शब्दों को समझना शिक्षकों के लिए भी बहुत कठिन हो जाता है। अपनी भाषा के प्रति कोई सम्मान अधिकांश लोगों में  है ही नहीं। लेकिन हमारी सरकार जब किताब छापती है तब भगतसिंह को आतंकवादी करार दिया जाता है। ऐसी महान सरकार के सरदार जी जैसे प्रधानमंत्री का हिन्दी प्रेम सभी जानते हैं। हम जानते हैं कि दुनिया की सबसे अच्छी सोच अंग्रेजी में नहीं पैदा हुई। दर्शन या साहित्य के मामले में जर्मनी, फ्रांस या रूस ही आगे हैं। वैसे भी जब अंग्रेजी को इंगलैंड की राष्ट्रभाषा बनाया जा रहा था तब ठीक वही तर्क दिये गये थे जो आज हिन्दी के विरोध में दिये जाते हैं। वहां बुद्धिमान लोगों ने कहा था कि अंग्रेजों जाहिलों, गंवारों की भाषा है। इसका विरोध किया गया था।
      एक और बहुत ही महत्वपूर्ण बात कि हमारी चिंता दुनिया के प्रति इस मामले में क्यों इतनी ज्यादा है कि हमारी बात दूसरे देश कैसे समझेंगे? जब सभी देश के नायक, राजनेता या लोग कहीं भी अपनी भाषा बोलते हैं और वे चिंता नहीं करते कि हम या कोई दूसरा उनकी बात कैसे समझेंगे तब हमें क्यों सोचना चाहिए कि वे कैसे समझेंगे? इस बात की चिंता से कोई लाभ नहीं होने वाला। एक और गम्भीर बात कि दूसरे देश अपने सारे दस्तावेज या पत्र अपनी भाषा में तैयार करते हैं तब हम अंग्रेजी में तैयार करके क्यों उन्हें बताना चाहते हैं कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था से लेकर हमारी सारी योजनाएं अंग्रेजी में हैं और इन्हें वे आसानी से समझकर इनका इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं। एक बात ध्यान दें कि सारे देशों में राजदूत या दूतावास होते हैं जो एक दूसरे की भाषा समझने में भी काम आते हैं।
      वैज्ञानिक यह बात कह चुके हैं कि संस्कृत कम्प्यूटर के लिए सबसे अच्छी भाषा है और सब जानते हैं कि हिन्दी का उद्भव संस्कृत से ही हुआ है।
      लोगों का कहना होगा कि भगतसिंह के जमाने में अंग्रेजी की हालत दूसरी थी, अब हमारी जरुरत बन गयी है अंग्रेजी। लेकिन कोई भी आदमी जरा सोचें कि सिवाय हमारी मानसिक गुलामी के अंग्रेजी की क्या और कितनी जरुरत है? हिन्दी को विस्थापित करने की सोची समझी चाल के अलावे अंग्रेजी का प्रयोग क्या है? हम जरा गौर से देखें  और सोचें तब हमें पता चलेगा कि अंग्रेजी का लबादा हमने बिना मतलब के ही ओढ़ रखा है। हमारे सारे काम हिन्दी या भारतीय भाषाओं से चलते हैं या चल सकते हैं। अंग्रेजी तो सिर्फ़ नौटंकी के लिए रखी गयी है। अंग्रेजी की आवश्यकता तो ऐसे बतायी जाती है जैसे खाना से लेकर सोना तक इसके बिना होगा ही नहीं। यानि अंग्रेजों के आने के पहले भारत में लोग कुछ करते ही नहीं थे। अगर हरेक आदमी अंग्रेजी पढने लगे तो ऐसा लगता है कि सारे लोग अमेरिका और इंग्लैड में ही नौकरी करेंगे। अगर विदेशों से या विदेशियों से बात करने की जरुरत होती है तो कितने लोगों की आवश्यकता है? क्या पूरे देश को ब्रिटेन की महारानी से मिलना है? हमें किसी भी निजी या सरकारी कार्यालय में हाथ पर गिनने लायक कर्मचारी मिलेंगे जिनको अंग्रेजी में बात करने की जरुरत है? एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक कम्पनी है भारत में जिसमें कुल 10000 लोग काम करते हैं। तो इन 10000 लोगों में सिर्फ़ 2-4 या पांच को ही अंग्रेजी के इस्तेमाल की जरुरत(बनावटी जरुरत, मैं नहीं मानता कि यह जरुरी है) होती है तब क्यों सारे देश को अंग्रेजी के कुत्ते से कटवाने पर हम तुले हुए हैं?
      सवाल सिर्फ़ भाषा का नहीं, हमारे अपने स्वाभिमान,शहीदों के सम्मान, राष्ट्रीय अस्मिता का भी है। इसलिए हम अंग्रेजी का विरोध करते हैं। आगे यह बात भी आयेगी अंग्रेजी सीखने के पीछे लोगों की मानसिकता क्या होती हैं?
      अब सवाल है साहित्य का। भगतसिंह के जेल की डायरी में लगभग 43 लेखकों और 100 से ज्यादा किताबों का जिक्र आया है। यानि भगतसिंह युवावस्था में ही किताबों और साहित्य के प्रति रुचि रखते थे और भरपूर अध्ययन भी करते थे। क्योंकि उन्हें मालूम था कि भाषा को जानने के बाद अध्ययन ही वह रास्ता है जो हमें चिंतन के उन सारे घरों से हमारा परिचय कराता है जो बहुत समय लगाने के बाद, बहुत सोचने के बाद और लम्बे और कठिन मानसिक परिश्रम से बनाया गया है। उन्होंने इतनी कम उम्र में ही दुनिया के लगभग सभी प्रमुख लोगों को पढा जो उस समय चेतना और चिंतन संसार में छाये हुए थे जैसे- मार्क्स, लेनिन, टाल्स्टाय, गोर्की आदि। अध्ययन और लेखन से उनका गहरा नाता रहा है। वे हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाएं अच्छी जानते थे। वे कभी बलवंत तो कभी विद्रोही नाम से भी लिखा करते थे। इन नामों की वजह से हो सकता है कि अभी भी उनका लिखा बहुत कुछ प्रकाश में नहीं आया हो। यहां सवाल है कि आज के युवा अध्ययन और साहित्य का कितना महत्व समझते हैं? इस विषय पर थोड़ा विचार करते हैं।
      भगतसिंह का मानना था कि किसी भी देश या समाज का साहित्य ही उसकी धरोहर है। और इसलिए साहित्य का संरक्षण और संवर्धन रुकना नहीं चाहिए। हम खुद सोचें कि आखिर हम अपने बीते कल को कैसे जानते हैं या भगतसिंह को ही कैसे जानते हैं? सीधा सा उत्तर है किताबों से। मौखिक जानकारी के साथ छेड़छाड़ होने की उम्मीद ज्यादा आसान होती है। वैसे यह छेड़छाड़ किताबों के साथ भी मुश्किल नहीं। लेकिन मौखिक चीजों को बचाकर रखना किताबों या साहित्य की तुलना में बहुत कठिन होता है। मानव ने अपने विकास के मार्ग में कौन-कौन से रोड़े देखे या क्या-क्या पाया चाहे वह विज्ञान की उपलब्धि हो, इतिहास या गणित की हो चाहे कला, संगीत आदि की हो इन सारे चीजों को साहित्य और किताबें ही बचाकर रखती हैं। लेकिन अब सवाल यह है हम आज कितना साहित्य पढते हैं? कितनी किताबें पढी जाती हैं? युवाओं के पास जवाब है कि उन्हें समय नहीं मिलता, फिल्म देखना है, रोमांस करना है, कोर्स और पढाई पर ध्यान देना है, टीवी, रेडियो या फिर इंटरनेट भी हैं, मोबाइल जैसा असुर भी है ही, आखिर पढाई करें तो कैसे? अगर कोई पढता है या अध्ययन में रुचि रखता है तो उसे उसी के मित्र पढाकू, किताबी कीड़ा कहते हैं या चिढाते हैं। बात वास्तव में रुचि की है। मां-बाप बचपन से ही चाहते हैं कि स्कूल की पढाई ही सब कुछ है। नंबर लाने के लिए तो पढाई करनी होती है। शहरों में हर जगह मुझे यही लगता है कि मां-बाप बच्चों को मशीन बनाने के लिए पढा रहे हैं। ट्यूटर आता है, उससे कहा जाता है सिलेबस पूरा करा दीजिये। अगर नंबर आ गये तो बस हो गई पढाई। बहुत से लोग कहते हैं कि पढनेवाले कम नहीं हैं। कुछ का कहना है कि अब साहित्य जैसी चीज कौन पढेगा? विज्ञान पढने का जमाना है। एक बात गौर करने लायक है कि हाल के वर्षों में वैज्ञानिक कम हो रहे हैं। कमाऊ इंजीनियर ज्यादा। सभी जानते हैं कि विज्ञान नया कुछ देता है तो सिर्फ़ जिज्ञासा और खोजी स्वभाव, कठिन परिश्रम और रुचि होने से। विज्ञान का पढने का एक अच्छा उदाहरण दे रहा हूं। पटना में बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी है। अकादमी ने ऐसी किताबें छापी हैं जो दुर्लभ हैं। रसायन, गणित या भौतिकी ही नहीं चिकित्सा और अभियांत्रिकी पर हिन्दी में ऐसी-ऐसी किताबे हैं जो बहुत खोजना पड़ता है तब जाकर मिलती हैं। एक से एक देशी-विदेशी लेखकों की किताबें। लेकिन अगर वह किताब 1973 में छपी थी 1000 प्रति तो आज भी खत्म नहीं हुई और अभी भी वही संस्करण मिलता है। अब कहा जायेगा कि लोगों को मालूम नहीं है कि ऐसी किताबें मिलती हैं। तो बता दूं कि पुस्तक मेले में लाखों लोग आते हैं हर साल फिर भी उन किताबों की प्रति बची हुई ही है।
      कई धार्मिक पत्रिकाएं दस हजार से लाखों की संख्या में छपती हैं और बिकती हैं। पर साहित्य या अन्य चिंतन जैसे समाज, दर्शन आदि पर किताबें छपती हैं सैकड़ों की संख्या में और वो भी ज्यादा कीमत की। लेकिन अंग्रेजी में एक सनक चल रही है कि कोई भी नया लेखक कुछ भी लिखता है तो हजारों प्रतियां छपती हैं और बिकती भी हैं। पढनेवाले हैं तो वह बस वही लोग हैं जो उस क्षेत्र के हैं जैसे हिन्दी साहित्य का शिक्षक, लेखक या छात्र ही हिन्दी की किताबें पढते हैं। यानि हमारे युवा वर्ग में पढने की प्रवृत्ति घटी है। इसके विपरीत शोर मचाने की प्रवृत्ति बढी है। मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिला हूं जो घर, सड़क, स्कूल आदि में बिना अध्ययन किए या कुछ जाने खूब बहस करते हैं लेकिन जब कहता हूं कि यह किताब पढो या खरीदो तब बहाना शुरु हो जाता है।  ऐसा नहीं कि वो मेरे द्वारा बतायी गयी किताबों के अलावा दूसरी किताब खरीदते हैं या पढते हैं। अखबार या टीवी से छूटते ही क्रिकेट या दूसरा नशा उन्हें घेर लेता है। फिर दोस्त भी हैं। यहां तक कि अगर कोई किताब आप किसी को पढने को दें तो वह महीनों रखी रह जाती है। यानि न तो खरीदकर पढते हैं न ही किसी से मांगकर। अब सवाल पैदा होता है कि वैचारिक या मानसिक खुराक मिलेगी कैसे जो वे सोचें! इसमें अधिकांश दोष होता है मां-बाप का। बचपन से कोर्स में डुबाने का नतीजा यही होता है कि बच्चे जब युवा होते हैं तब कोर्स के अलावे, रोजगार आधारित या व्यावसायिक पढाई के अलावे वे दूसरी किताबों को बेकार समझते हैं। अगर युवा चाहते हैं कि उन्हें चिंतन के लिए अच्छा खुराक मिले तो उन्हें पढना तो पड़ेगा ही। क्योंकि किताबों में स्याही और कागज नहीं विचार होते हैं। भगतसिंह ने कहा था- क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। और विचार पढने से आते हैं। ऐसा नहीं कि पढने से ही विचार आते हैं। लेकिन जब हम पढते हैं तो समझते हैं कि हम क्या हैं और हमें क्या होना चाहिए? अगर हम किताबों को कचरा समझकर फेंक देंगे तो भविष्य का क्या होगा।
      किताबें जीवन में रोशनी का संचार करती हैं। जब आप किसी की जीवनी या विचार पढते हैं तब आप महसूस करते हैं कि वह आदमी या योद्धा या क्रांतिकारी या महापुरुष हमारे साथ है, हमारा दोस्त बन गया है। हमें जीवन के संघर्ष के दिनों में इनकी सहायता मिलती है। और कहा भी गया है कि किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त हैं। पुस्तकालयों की बुरी स्थिति के जिम्मेदार हम हैं। जब हमने वहां जाना छोड़ दिया तब उसकी हालत बिगड़ गयी। जीवन को बेहतर बनाती हैं किताबें। एक अलग समझ विकसित करती हैं किताबें। किताबें हमें बहुत बार रास्ता भी दिखाती हैं। भगतसिंह ने अपनी छोटी आयु में ही डान ब्रीन की आत्मकथा का अनुवाद किया था। और जब आप उसे पढेंगे तो लगेगा कि भगतसिंह के बहुत से विचार या कार्य उस किताब से प्रेरित हैं। भगतसिंह का एसेम्बली में बम फेंकना अनायास ही नहीं था। यह घटना फ्रांस में घटित बम फेंकने की घटना से ही प्रेरित होकर अंजाम दी गयी थी। कहा जाता कि आदमी जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। और सोचने के लिए दिमागी खुराक चाहिए। गांधी के उपर भी बहुत सी किताबों का असर पड़ा था। उन्हीं किताबों से गांधी का निर्माण होता है।
      एक बात अक्सर आप देखेंगे। जिंदा आदमी महान नहीं माने जाते। और जब आप किसी भी क्षेत्र के महान आदमी से मिलना चाहते हैं तब पता चलता है कि वह तो मर चुका है। ऐसा हमेशा नहीं लेकिन ज्यादातर होता है। तब एक ही उपाय बचता है उस आदमी की किताबें जिनमें वह अपने अनुभवों, उपलब्धियों, विचारों को समेटे रहता है। पढने के बाद ही पता चलता है कि किताबें क्यों पढी जानी चाहिए। सुभाषचंद्र बोस ने भी विवेकानंद की किताबों को पढने के बाद ऐसा ही कहा था। यहां तक सारे धर्मों के अपने अपने ग्रंथ हैं जिन्हें वे अपना आधार मानते हैं। कई बार हम पढने के नाम पर कुछ कचरे भी पढ जाते हैं। लेकिन हमें किसी चीज को पढने के बाद उसपर खुले दिमाग से सोचना चाहिए  तब जाकर उस किताब के प्रति अपनी धारणा बनानी चाहिए।
मान लीजिए कि किसी भी तरह अंग्रेजी स्पोकेन आप सीख लेते हैं। अब सीखने के बाद आप बोलेंगे क्या? बोलने के लिए ही तो सिखा था। अब इतना तो तय है कि बोलने के लिए कुछ बात चाहिए। और वह बात कहां से मिले यह फिर एक समस्या है। जवाब आसान है कि पढने से। किताबों को पढना ही भगतसिंह, सुभाष, गांधी या वैज्ञानिक बनाता है। क्योंकि हमारे आस-पास ऐसे लोग आसानी से मिलते नहीं जो सही रास्ता दिखायें तब किताबें जीवन के रास्ते में उजाला बनकर आती हैं। याद रहे आदमी मर जाते हैं, विचार जिंदा रहते हैं। अमर शहीद भगतसिंह शरीर से हमारे पास नहीं हैं लेकिन विचार से वे हमारे पास हैं। तो पढना और लिखना बिल्कुल आवश्यक है वैचारिक प्रगति के लिए। लेकिन लिखने को भी हमारे समाज और मां-बाप ने रोक दिया है। युवक तो लिखना चाहते ही नहीं। इसके पीछे कारण तलाशने पर मिलता है कि बचपन से हमने खुद से लिखना सीखा ही नहीं। शिक्षक प्रश्नों का उत्तर लिखा देते हैं। उसे रट कर परीक्षा में जाकर लिख देते हैं और इस तरह से लिखने का जो मौलिक तरीका था हम उसे मशीनी अंदाज में करते हुए अपनी प्रतिभा और सोच को छिन्न-भिन्न कर डालते हैं। 
हमें क्रांति की तलवार को विचारों की सान पर तेज करने के लिए घोर अध्ययन और चिंतन की जरुरत होती है। इसलिए पढना और लिखना आवश्यक कार्य हो जाते हैं। हमें कहानी-कविता कहकर साहित्य का अपमान नहीं करना चाहिए। जब तक हम साहित्य को समझेंगे नहीं तब तक भगतसिंह की बात हमसे कोसों दूर रहेगी। भगतसिंह कहते हैं-यह तो निश्चय ही है कि साहित्य के बिना कोई देश अथवा जाति उन्नति नहीं कर सकती, परन्तु साहित्य के लिए सबसे पहले भाषा की आवश्यकता होती है।
भगतसिंह साहित्य को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं यह समझने के लिए उन्हीं के शब्दों में-जिस देश के साहित्य का प्रवाह जिस ओर बहा, ठीक उसी ओर वह देश भी अग्रसर होता रहा। किसी भी जाति के उत्थान के लिए ऊंचे साहित्य की आवश्यकता हुआ करती है। ज्यों-ज्यों देश का साहित्य ऊंचा होता जाता है, त्यों-त्यों देश भी उन्नति करता जाता है। देशभक्त, चाहे वे निरे समाज-सुधारक हों अथवा राजनीतिक नेता, सबसे अधिक ध्यान देश के साहित्य की ओर दिया करते हैं। यदि वे सामाजिक समस्याओं तथा परिस्थितियों के अनुसार नवीन साहित्य की सृष्टि न करें तो उनके सब प्रयत्न निष्फल हो जाएं और उनके कार्य स्थाई न हो पाएं।
भगतसिंह कहते हैं कि रूसो और वाल्टेयर के साहित्य के बिना फ्रांस में तथा कार्ल मार्क्स, मैक्सिम गोर्की, टाल्स्टाय के साहित्य के बिना रूस में क्रांति नहीं हो पाती। इन लेखकों ने वर्षों तक लिखा तब जाकर इनके लेखन ने क्रांति में अपनी अहम भूमिका निभायी। इसलिए युवकों को चाहिए कि वे साहित्य पर ध्यान दें, साहित्यिक रचनाएं पढ़ें और खुद भी हो सके तो रचें। लेखक बहुत परिश्रम से लिखता है, काफी सोचने के बाद लिखता है फिर हमें उन्हें बेकार नहीं जाने देना चाहिए। क्या प्रेमचंद को पढने से हमें उस समय के समाज का पता नहीं चलता? हमें अच्छी रचनाएं जरुर पढनी चाहिएं। इससे हमारे समय का सदुपयोग भी होता है।